अखिल भारतीय मुस्लिम लीग (1906)
➣ अखिल भारतीय मुस्लिम लीग भारत के आधुनिक इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण राजनीतिक संगठन था, जिसकी स्थापना 30 दिसम्बर 1906 ई. को ढाका (वर्तमान बांग्लादेश) में हुई।
➣ प्रारम्भ में इसका उद्देश्य भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक, सामाजिक एवं शैक्षिक हितों की रक्षा करना तथा ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा बनाए रखना था। समय के साथ मुस्लिम लीग की नीतियों में परिवर्तन हुआ और यह संगठन भारतीय राजनीति में एक प्रभावशाली शक्ति बन गया।
➣ प्रारम्भिक वर्षों में मुस्लिम लीग ब्रिटिश सरकार के सहयोग से मुसलमानों के लिए पृथक राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने का प्रयास करती रही। मार्ले-मिंटो सुधार (1909) के अंतर्गत मुसलमानों को पृथक निर्वाचन की व्यवस्था मिलने से मुस्लिम लीग की राजनीतिक स्थिति और मजबूत हुई।
➣ बाद के वर्षों में मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने अपने उद्देश्य बदलते हुए दो-राष्ट्र सिद्धांत को अपनाया।
➣ इसी विचारधारा के आधार पर 23 मार्च 1940 ई. को पारित लाहौर प्रस्ताव के माध्यम से पृथक मुस्लिम राष्ट्र की मांग को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया, जिसके परिणामस्वरूप अंततः 14 अगस्त 1947 ई. को पाकिस्तान का गठन हुआ।
➣ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में मुस्लिम लीग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। एक ओर इसने मुसलमानों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को संगठित किया, वहीं दूसरी ओर इसकी नीतियों ने भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक आधार को मजबूत किया, जिसका अंतिम परिणाम भारत का विभाजन रहा।
मुस्लिम लीग की स्थापना की पृष्ठभूमि
➣ उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तथा बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारत की राजनीतिक परिस्थितियाँ तेजी से बदल रही थीं। अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना, सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों तथा ब्रिटिश सरकार की नीतियों ने भारतीय समाज में नई राजनीतिक चेतना उत्पन्न की।
➣ इसी परिवर्तित वातावरण में मुसलमानों के एक वर्ग ने अपने पृथक राजनीतिक संगठन की आवश्यकता अनुभव की, जिसके परिणामस्वरूप 1906 ई. में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। इसके पीछे अनेक कारण उत्तरदायी थे।
1857 की क्रांति के बाद मुसलमानों की स्थिति
➣ 1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश सरकार ने यह मान लिया कि इस विद्रोह के प्रमुख प्रेरक पूर्व मुगल शासक वर्ग तथा मुस्लिम अभिजात वर्ग थे। परिणामस्वरूप मुसलमानों के प्रति अंग्रेजों का दृष्टिकोण कठोर हो गया।
➣ अनेक मुस्लिम जमींदारों और नवाबों की जागीरें एवं संपत्तियाँ जब्त कर ली गईं तथा उन्हें प्रशासनिक पदों से भी वंचित किया गया।
➣ मुगल साम्राज्य के अंतिम सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र को रंगून निर्वासित कर दिया गया, जिससे मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व का अंतिम प्रतीक भी समाप्त हो गया।
➣ अंग्रेजी शिक्षा एवं आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था को अपनाने में मुसलमान अपेक्षाकृत पीछे रह गए, जबकि शिक्षित हिंदू वर्ग सरकारी नौकरियों एवं प्रशासनिक सेवाओं में तेजी से आगे बढ़ने लगा।
➣ परिणामस्वरूप मुस्लिम समाज में यह भावना विकसित हुई कि यदि उनके हितों की रक्षा के लिए अलग राजनीतिक प्रयास नहीं किए गए, तो वे प्रशासन एवं राजनीति में और अधिक पिछड़ जाएंगे।
सर सैयद अहमद ख़ाँ और अलीगढ़ आंदोलन
➣ सर सैयद अहमद ख़ाँ ने 1857 की क्रांति के बाद मुस्लिम समाज के उत्थान के लिए आधुनिक शिक्षा को सबसे आवश्यक माना।
➣ उन्होंने 1875 ई. में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज (वर्तमान अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय) की स्थापना की, जो आगे चलकर अलीगढ़ आंदोलन का केंद्र बना।
➣ उन्होंने मुसलमानों को अंग्रेजी शिक्षा, विज्ञान एवं आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था अपनाने के लिए प्रेरित किया। सर सैयद का मत था कि तत्कालीन परिस्थितियों में मुसलमानों को ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग करना चाहिए तथा टकराव की नीति से बचना चाहिए।
➣ वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885) के समर्थक नहीं थे। उनका मानना था कि भारत में हिंदू और मुसलमान दो भिन्न समुदाय हैं तथा संयुक्त प्रतिनिधित्व की स्थिति में मुसलमान राजनीतिक रूप से कमजोर पड़ सकते हैं।
➣ यद्यपि सर सैयद अहमद ख़ाँ का निधन 1898 ई. में हो गया था, फिर भी उनके विचारों ने आगे चलकर मुस्लिम राजनीतिक संगठन के निर्माण की वैचारिक आधारभूमि तैयार की।
बंगाल विभाजन (1905 ई.) का प्रभाव
➣ 16 अक्टूबर 1905 ई. को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्ज़न ने बंगाल का विभाजन लागू किया।
➣ पूर्वी बंगाल एवं असम में मुसलमानों की जनसंख्या अपेक्षाकृत अधिक थी। इसलिए मुस्लिम जमींदारों एवं अभिजात वर्ग के एक बड़े हिस्से ने इस विभाजन का स्वागत किया।
➣ दूसरी ओर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तथा अधिकांश राष्ट्रवादियों ने इसे फूट डालो और शासन करो की नीति का हिस्सा मानते हुए इसका तीव्र विरोध किया।
➣ बंगाल विभाजन के समर्थन और विरोध ने हिंदू एवं मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व के बीच मतभेदों को और स्पष्ट कर दिया।
➣ ब्रिटिश सरकार ने भी मुसलमानों को अलग राजनीतिक पहचान देने की नीति अपनाई, जिससे पृथक राजनीतिक संगठन की आवश्यकता और अधिक मजबूत हुई।
शिमला प्रतिनिधिमंडल (1906)
➣ 1 अक्टूबर 1906 ई. को लगभग 35 प्रमुख मुस्लिम नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल आगा ख़ाँ तृतीय के नेतृत्व में शिमला में वायसराय लॉर्ड मिंटो से मिला।
➣ इस प्रतिनिधिमंडल ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन तथा उनकी जनसंख्या से अधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग की।
➣ लॉर्ड मिंटो ने मुस्लिम नेताओं की मांगों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाया, जिससे मुस्लिम नेतृत्व को ब्रिटिश सरकार का समर्थन मिलने का विश्वास हुआ।
➣ शिमला प्रतिनिधिमंडल को मुस्लिम लीग की स्थापना की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना माना जाता है, क्योंकि इसी के बाद अखिल भारतीय स्तर पर मुस्लिम संगठन बनाने का निर्णय तेजी से आगे बढ़ा।
अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना (30 दिसम्बर 1906 ई.)
➣ 30 दिसम्बर 1906 ई. को ढाका (शाहबाग) में आयोजित ऑल इंडिया मोहम्मडन एजुकेशनल कॉन्फ्रेंस के अधिवेशन के दौरान अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना की गई।
➣ इस संगठन की स्थापना में नवाब सलीमुल्लाह ख़ाँ (ढाका) ने प्रमुख भूमिका निभाई।
➣ मुस्लिम लीग के प्रथम सम्मानित अध्यक्ष के रूप में सर सुल्तान मोहम्मद शाह आगा ख़ाँ तृतीय को स्वीकार किया गया।
➣ प्रारम्भ में मुस्लिम लीग का मुख्यालय अलीगढ़ में स्थापित किया गया, जिसे बाद में 1910 ई. में लखनऊ स्थानांतरित कर दिया गया।
➣ स्थापना के समय मुस्लिम लीग का उद्देश्य स्वतंत्रता प्राप्त करना नहीं था, बल्कि ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा बनाए रखते हुए भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक, शैक्षिक एवं प्रशासनिक हितों की रक्षा करना था।
➣ आगे चलकर यही संगठन भारतीय राजनीति का सबसे प्रभावशाली मुस्लिम राजनीतिक दल बना और अंततः पाकिस्तान की स्थापना का प्रमुख समर्थक बना।
मुस्लिम लीग के उद्देश्य
➣ अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना के समय इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन का विरोध करना नहीं था। इसके संस्थापक नेताओं का मानना था कि भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक, शैक्षिक एवं प्रशासनिक हितों की रक्षा ब्रिटिश सरकार के सहयोग से अधिक प्रभावी ढंग से की जा सकती है। इसी कारण मुस्लिम लीग ने अपने गठन के समय कुछ स्पष्ट उद्देश्य निर्धारित किए।
- ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा बनाए रखना तथा सरकार के साथ सहयोगपूर्ण संबंध स्थापित करना।
- भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों एवं हितों की रक्षा करना तथा सरकारी सेवाओं एवं प्रशासन में उनका उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कराना।
- मुसलमानों में राजनीतिक चेतना का विकास करना तथा उन्हें संगठित करना।
- ब्रिटिश सरकार के समक्ष मुसलमानों की मांगों एवं समस्याओं को संगठित रूप से प्रस्तुत करना।
- अन्य समुदायों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखना, बशर्ते इससे मुसलमानों के राजनीतिक हित प्रभावित न हों।
- शिक्षा एवं सामाजिक सुधार को बढ़ावा देना ताकि मुस्लिम समाज आधुनिक शिक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था में आगे बढ़ सके।
➣ यद्यपि स्थापना के समय मुस्लिम लीग ने हिंदू-मुस्लिम सहयोग की बात कही थी, लेकिन आगे चलकर इसकी राजनीतिक दिशा बदलती गई और यह मुसलमानों के पृथक राजनीतिक प्रतिनिधित्व तथा अंततः पृथक राष्ट्र की मांग का प्रमुख संगठन बन गई।
प्रारम्भिक नीति एवं कार्य
➣ 1906 से लगभग 1913 ई. तक मुस्लिम लीग की राजनीति अपेक्षाकृत उदार एवं ब्रिटिश समर्थक रही। इस अवधि में संगठन का मुख्य उद्देश्य मुसलमानों के लिए विशेष राजनीतिक सुविधाएँ प्राप्त करना था, न कि अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता आंदोलन चलाना।
- मुस्लिम लीग ने प्रारम्भिक वर्षों में ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग की नीति अपनाई।
- संगठन ने मुसलमानों के लिए सरकारी नौकरियों, शिक्षा तथा विधायी परिषदों में प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग की।
- मुस्लिम लीग ने कांग्रेस की कई राजनीतिक मांगों का समर्थन नहीं किया क्योंकि उसे आशंका थी कि संयुक्त प्रतिनिधित्व की स्थिति में मुसलमानों का प्रभाव कम हो जाएगा।
- संगठन ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की मांग को लगातार प्रमुखता दी।
- मुस्लिम लीग के नेताओं ने विभिन्न प्रांतों में शाखाएँ स्थापित कर संगठन का विस्तार प्रारम्भ किया।
- मुस्लिम समाज के शिक्षित वर्ग, नवाबों, जमींदारों तथा अभिजात वर्ग ने मुस्लिम लीग को व्यापक समर्थन दिया।
➣ इन प्रारम्भिक गतिविधियों ने मुस्लिम लीग को शीघ्र ही भारतीय मुसलमानों के प्रमुख राजनीतिक संगठन के रूप में स्थापित कर दिया।
मुस्लिम लीग के प्रमुख संस्थापक एवं प्रारम्भिक नेता
➣ अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना किसी एक व्यक्ति का कार्य नहीं थी। अनेक मुस्लिम नेताओं, शिक्षाविदों एवं नवाबों ने मिलकर इस संगठन को स्थापित किया तथा प्रारम्भिक वर्षों में इसका नेतृत्व किया।
नवाब सलीमुल्लाह ख़ाँ
➣ ढाका के नवाब नवाब सलीमुल्लाह ख़ाँ मुस्लिम लीग की स्थापना के प्रमुख प्रेरक माने जाते हैं।
➣ उन्होंने 1906 ई. के ढाका अधिवेशन में अखिल भारतीय मुस्लिम संगठन बनाने का प्रस्ताव रखा।
➣ उनके प्रयासों से विभिन्न प्रांतों के मुस्लिम नेताओं को एक मंच पर लाया जा सका।
सर सुल्तान मोहम्मद शाह आगा ख़ाँ तृतीय
➣ वे शिमला प्रतिनिधिमंडल (1906) के नेता थे।
➣ मुस्लिम लीग के प्रथम सम्मानित अध्यक्ष (Honorary President) बने।
➣ उन्होंने मुस्लिम समाज को संगठित करने तथा ब्रिटिश सरकार से राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
नवाब मोहसिन-उल-मुल्क
➣ वे सर सैयद अहमद ख़ाँ के निकट सहयोगी थे।
➣ अलीगढ़ आंदोलन के प्रमुख नेताओं में उनका महत्वपूर्ण स्थान था।
➣ उन्होंने मुस्लिम समाज में राजनीतिक संगठन की आवश्यकता पर बल दिया।
नवाब वकार-उल-मुल्क
➣ मुस्लिम लीग के प्रारम्भिक संगठनात्मक विकास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
➣ उन्होंने विभिन्न प्रांतों में संगठन का विस्तार करने में योगदान दिया।
सैयद अली इमाम
➣ वे मुस्लिम लीग के प्रमुख विधिवेत्ता एवं राजनीतिक नेता थे।
➣ उन्होंने संगठन की नीतियों एवं राजनीतिक कार्यक्रमों को व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मार्ले–मिंटो सुधार (1909) एवं पृथक निर्वाचन
➣ मुस्लिम लीग की प्रारम्भिक सबसे बड़ी राजनीतिक सफलता भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 (Indian Councils Act, 1909) था, जिसे सामान्यतः मार्ले–मिंटो सुधार कहा जाता है। यह अधिनियम भारत सचिव लॉर्ड मार्ले तथा वायसराय लॉर्ड मिंटो के नाम पर जाना जाता है।
पृथक निर्वाचन क्या था?
➣ पृथक निर्वाचन ऐसी व्यवस्था थी, जिसमें मुसलमान अपने प्रतिनिधियों का चुनाव केवल मुस्लिम मतदाताओं द्वारा करते थे। अर्थात् मुस्लिम निर्वाचन क्षेत्र से केवल मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव लड़ सकते थे और केवल मुस्लिम मतदाता ही उन्हें वोट दे सकते थे।
मार्ले–मिंटो सुधार की प्रमुख विशेषताएँ
- पहली बार मुसलमानों को पृथक निर्वाचन का संवैधानिक अधिकार प्रदान किया गया।
- केंद्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों का विस्तार किया गया।
- सीमित रूप में चुनाव की व्यवस्था का विस्तार किया गया।
- भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई, किंतु वास्तविक सत्ता अभी भी ब्रिटिश सरकार के हाथों में रही।
मुस्लिम लीग पर प्रभाव
- मुस्लिम लीग की प्रमुख मांग स्वीकार होने से उसकी राजनीतिक प्रतिष्ठा बढ़ी।
- मुसलमानों की पृथक राजनीतिक पहचान को सरकारी मान्यता मिल गई।
- ब्रिटिश सरकार की फूट डालो और शासन करो की नीति को बल मिला।
- भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की शुरुआत हुई, जिसका प्रभाव आगे चलकर भारत के विभाजन तक दिखाई दिया।
- कांग्रेस ने पृथक निर्वाचन का विरोध किया क्योंकि इससे राष्ट्रीय एकता कमजोर होने की आशंका थी।
1906 से 1913 ई. तक मुस्लिम लीग का विकास
➣ स्थापना के बाद मुस्लिम लीग धीरे-धीरे एक अखिल भारतीय राजनीतिक संगठन के रूप में विकसित होने लगी। यद्यपि इस अवधि में इसका प्रभाव मुख्यतः शिक्षित मुस्लिम अभिजात वर्ग तक सीमित था, फिर भी इसकी राजनीतिक भूमिका निरंतर बढ़ती गई।
- विभिन्न प्रांतों में मुस्लिम लीग की शाखाओं की स्थापना की गई।
- संगठन ने मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया।
- ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग की नीति जारी रखी गई।
- 1910 ई. में मुस्लिम लीग का मुख्यालय अलीगढ़ से लखनऊ स्थानांतरित किया गया।
- 1913 ई. में मुस्लिम लीग ने अपने संविधान में संशोधन कर पहली बार ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्वशासन प्राप्त करने का लक्ष्य स्वीकार किया।
- इसी परिवर्तन के बाद कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सहयोग की संभावनाएँ बढ़ने लगीं, जिसका परिणाम आगे चलकर 1916 के लखनऊ समझौते के रूप में सामने आया।
मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग
➣ मोहम्मद अली जिन्ना भारतीय राजनीति के उन प्रमुख नेताओं में से थे, जिन्होंने प्रारम्भ में हिंदू-मुस्लिम एकता का समर्थन किया, परन्तु बाद में मुस्लिम लीग के सबसे प्रभावशाली नेता बनकर पाकिस्तान की स्थापना का नेतृत्व किया। उनके नेतृत्व में मुस्लिम लीग एक सीमित राजनीतिक संगठन से बदलकर भारतीय मुसलमानों की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बन गई।
मोहम्मद अली जिन्ना का प्रारम्भिक राजनीतिक जीवन
➣ मोहम्मद अली जिन्ना का जन्म 25 दिसम्बर 1876 ई. को कराची में हुआ था।
➣ उन्होंने इंग्लैंड के लिंकन इन (Lincoln’s Inn) से विधि (Law) की शिक्षा प्राप्त की तथा भारत लौटकर बंबई (मुंबई) में सफल वकील के रूप में कार्य किया।
➣ जिन्ना प्रारम्भ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े तथा संवैधानिक सुधारों एवं राजनीतिक अधिकारों के समर्थक थे।
➣ 1906 ई. में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में उन्होंने दादाभाई नौरोजी के निजी सचिव के रूप में कार्य किया।
➣ 1913 ई. में वे औपचारिक रूप से अखिल भारतीय मुस्लिम लीग में शामिल हुए, लेकिन कांग्रेस की सदस्यता भी बनाए रखी।
हिंदू-मुस्लिम एकता के राजदूत
➣ प्रसिद्ध नेता सरोजिनी नायडू ने मोहम्मद अली जिन्ना को हिंदू-मुस्लिम एकता का राजदूत कहा था।
➣ जिन्ना का विश्वास था कि भारत के राजनीतिक विकास में हिंदू और मुसलमान मिलकर कार्य कर सकते हैं।
➣ उन्होंने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सहयोग स्थापित करने का प्रयास किया तथा दोनों संगठनों के बीच समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कांग्रेस और मुस्लिम लीग के संबंध
➣ मुस्लिम लीग की स्थापना के समय कांग्रेस और लीग के संबंध बहुत घनिष्ठ नहीं थे। कांग्रेस सभी भारतीयों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती थी, जबकि मुस्लिम लीग मुसलमानों के पृथक राजनीतिक हितों पर बल देती थी। फिर भी 1913 से 1916 ई. के बीच दोनों संगठनों के बीच सहयोग की भावना विकसित हुई।
सहयोग के प्रमुख कारण
- मुस्लिम लीग ने 1913 ई. में स्वशासन की मांग स्वीकार कर ली।
- कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ब्रिटिश सरकार से संवैधानिक सुधार चाहते थे।
- दोनों संगठनों के अनेक नेता यह मानते थे कि संयुक्त प्रयासों से राजनीतिक अधिकार अधिक आसानी से प्राप्त किए जा सकते हैं।
- मोहम्मद अली जिन्ना ने दोनों संगठनों के बीच समन्वय स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लखनऊ समझौता (1916 ई.)
➣ 1916 ई. में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच हुआ लखनऊ समझौता भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। इस समझौते में पहली बार दोनों संगठनों ने संयुक्त रूप से ब्रिटिश सरकार के समक्ष संवैधानिक सुधारों की मांग रखी।
लखनऊ समझौते की पृष्ठभूमि
- प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) के दौरान भारतीय नेताओं को आशा थी कि युद्ध में सहयोग के बदले ब्रिटिश सरकार राजनीतिक सुधार करेगी।
- कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने संयुक्त रूप से अपने राजनीतिक अधिकारों की मांग करने का निर्णय लिया।
- मोहम्मद अली जिन्ना ने दोनों संगठनों के बीच समझौता कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रमुख विशेषताएँ
- कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने पहली बार संयुक्त रूप से संवैधानिक सुधारों की मांग की।
- कांग्रेस ने मुसलमानों के पृथक निर्वाचन की व्यवस्था को स्वीकार कर लिया।
- प्रांतीय विधान परिषदों में मुसलमानों को निश्चित प्रतिनिधित्व देने पर सहमति बनी।
- केंद्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों के अधिकार बढ़ाने की मांग की गई।
- भारतीयों को प्रशासन में अधिक भागीदारी देने की मांग रखी गई।
महत्व
- कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सहयोग का यह सर्वोच्च चरण माना जाता है।
- मोहम्मद अली जिन्ना की प्रतिष्ठा एक राष्ट्रीय नेता के रूप में बढ़ी।
- ब्रिटिश सरकार पर संवैधानिक सुधारों के लिए दबाव बढ़ा।
- यद्यपि बाद में दोनों संगठनों के संबंध बिगड़ गए, फिर भी यह समझौता भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।
खिलाफत आंदोलन एवं असहयोग आंदोलन में मुस्लिम लीग
➣ प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की के खलीफा की स्थिति कमजोर होने पर भारतीय मुसलमानों ने खिलाफत आंदोलन (1919–1924) प्रारम्भ किया। महात्मा गांधी ने इस आंदोलन का समर्थन करते हुए इसे असहयोग आंदोलन (1920–1922) से जोड़ दिया।
मुस्लिम लीग का दृष्टिकोण
- मुस्लिम लीग के कई नेता खिलाफत आंदोलन के समर्थक थे।
- अनेक मुस्लिम नेता कांग्रेस और गांधीजी के साथ मिलकर असहयोग आंदोलन में शामिल हुए।
- हालांकि मुस्लिम लीग स्वयं इस आंदोलन का एकमात्र नेतृत्वकर्ता संगठन नहीं थी।
- आंदोलन के समाप्त होने के बाद कांग्रेस और मुस्लिम लीग के संबंध पुनः कमजोर होने लगे।
नेहरू रिपोर्ट (1928 ई.)
➣ 1928 ई. में मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में नेहरू रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। यह भारत के लिए स्वशासन संबंधी संवैधानिक प्रस्ताव था।
मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया
- नेहरू रिपोर्ट में पृथक निर्वाचन समाप्त करने का प्रस्ताव रखा गया था।
- मुस्लिम लीग के अधिकांश नेताओं ने इसका विरोध किया।
- मोहम्मद अली जिन्ना ने इसे मुसलमानों के राजनीतिक हितों के विरुद्ध बताया।
- परिणामस्वरूप कांग्रेस और मुस्लिम लीग के संबंधों में पुनः तनाव बढ़ गया।
जिन्ना के चौदह सूत्र (1929)
➣ नेहरू रिपोर्ट के उत्तर में 1929 ई. में मोहम्मद अली जिन्ना ने मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से अपने प्रसिद्ध 14 सूत्र (Fourteen Points) प्रस्तुत किए। इन्हें मुस्लिम लीग की भविष्य की राजनीतिक नीति का आधार माना जाता है।
जिन्ना के 14 सूत्रों की प्रमुख बातें
- भारत में संघीय शासन की स्थापना की जाए।
- प्रांतों को अधिकतम स्वायत्तता प्रदान की जाए।
- मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था जारी रखी जाए।
- केंद्रीय विधानमंडल में मुसलमानों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाए।
- किसी भी प्रांत की सीमाओं में ऐसा परिवर्तन न किया जाए जिससे मुस्लिम बहुमत प्रभावित हो।
- सभी समुदायों को धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्वतंत्रता प्राप्त हो।
- सिंध को बंबई प्रेसीडेंसी से अलग किया जाए।
- उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत एवं बलूचिस्तान में अन्य प्रांतों के समान संवैधानिक सुधार लागू किए जाएँ।
➣ जिन्ना के ये 14 सूत्र आगे चलकर मुस्लिम लीग की पृथक राजनीतिक पहचान का आधार बने तथा कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच वैचारिक दूरी और अधिक बढ़ गई।
इलाहाबाद भाषण (1930 ई.)
➣ 29 दिसम्बर 1930 ई. को अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के इलाहाबाद अधिवेशन में प्रसिद्ध कवि एवं दार्शनिक डॉ. मोहम्मद इक़बाल ने अपना ऐतिहासिक अध्यक्षीय भाषण दिया। इस भाषण को भारतीय उपमहाद्वीप में पृथक मुस्लिम राष्ट्र की अवधारणा का प्रारम्भिक आधार माना जाता है।
इलाहाबाद भाषण की प्रमुख बातें
- डॉ. मोहम्मद इक़बाल ने उत्तर-पश्चिम भारत के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को एक राजनीतिक इकाई के रूप में संगठित करने का विचार प्रस्तुत किया।
- उन्होंने पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान तथा उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) को मिलाकर एक स्वायत्त मुस्लिम राज्य की परिकल्पना की।
- उनका उद्देश्य भारतीय मुसलमानों की राजनीतिक एवं सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करना था।
- यद्यपि उन्होंने स्पष्ट रूप से “पाकिस्तान” शब्द का प्रयोग नहीं किया, फिर भी उनके भाषण को आगे चलकर पाकिस्तान की अवधारणा का वैचारिक आधार माना गया।
गोलमेज सम्मेलन (1930–1932 ई.) एवं मुस्लिम लीग
➣ ब्रिटिश सरकार ने भारत के संवैधानिक भविष्य पर विचार करने के लिए लंदन में तीन गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conferences) आयोजित किए। मुस्लिम लीग ने इन सम्मेलनों में सक्रिय भाग लिया और मुसलमानों के पृथक राजनीतिक अधिकारों की मांग को प्रमुखता से रखा।
प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930 ई.)
- कांग्रेस ने इस सम्मेलन का बहिष्कार किया।
- मुस्लिम लीग सहित विभिन्न राजनीतिक एवं सामाजिक समूहों ने भाग लिया।
- मुस्लिम प्रतिनिधियों ने पृथक निर्वाचन तथा पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग दोहराई।
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931 ई.)
- गांधी-इरविन समझौते के बाद महात्मा गांधी ने कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया।
- मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर सहमति नहीं बन सकी।
- मोहम्मद अली जिन्ना इस सम्मेलन के परिणामों से निराश हुए।
तृतीय गोलमेज सम्मेलन (1932 ई.)
- कांग्रेस ने इसमें भाग नहीं लिया।
- सम्मेलन के निष्कर्षों के आधार पर आगे चलकर भारत शासन अधिनियम, 1935 बनाया गया।
रहमत अली और पाकिस्तान की अवधारणा
➣ 1933 ई. में इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के छात्र चौधरी रहमत अली ने Now or Never नामक पुस्तिका प्रकाशित की।
➣ इसी पुस्तिका में पहली बार Pakistan शब्द का प्रयोग किया गया।
➣ प्रारम्भ में मुस्लिम लीग ने रहमत अली के प्रस्ताव को आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया, किंतु आगे चलकर पाकिस्तान की मांग इसी दिशा में विकसित हुई।
भारत शासन अधिनियम, 1935 एवं मुस्लिम लीग
➣ भारत शासन अधिनियम, 1935 ब्रिटिश शासन द्वारा बनाया गया सबसे व्यापक संवैधानिक अधिनियम था। मुस्लिम लीग ने इस अधिनियम के अंतर्गत होने वाले चुनावों को अपनी राजनीतिक शक्ति बढ़ाने का महत्वपूर्ण अवसर माना।
प्रमुख प्रावधान
- प्रांतीय स्वायत्तता लागू की गई।
- प्रांतीय स्तर पर उत्तरदायी शासन की व्यवस्था की गई।
- निर्वाचन व्यवस्था का विस्तार किया गया।
- पृथक निर्वाचन की व्यवस्था यथावत रखी गई।
मुस्लिम लीग पर प्रभाव
- मुस्लिम लीग ने प्रांतीय राजनीति में अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास किया।
- जिन्ना ने संगठन का पुनर्गठन प्रारम्भ किया तथा प्रांतीय शाखाओं को सक्रिय बनाया।
1937 के प्रांतीय चुनाव एवं मुस्लिम लीग
➣ 1937 ई. में भारत शासन अधिनियम, 1935 के अंतर्गत पूरे ब्रिटिश भारत में प्रांतीय चुनाव कराए गए। ये चुनाव मुस्लिम लीग के राजनीतिक भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुए।
चुनाव परिणाम
- कांग्रेस ने अधिकांश प्रांतों में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की तथा 11 में से 7 प्रांतों में अपनी सरकारें बनाई।
- मुस्लिम लीग को मुस्लिम बहुल प्रांतों में भी अपेक्षित सफलता नहीं मिली।
- पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी, बंगाल में कृषक प्रजा पार्टी तथा सिंध के क्षेत्रीय दलों का प्रभाव अधिक रहा।
चुनावों का प्रभाव
- चुनावी परिणामों ने जिन्ना को यह एहसास कराया कि मुस्लिम लीग को पूरे भारत के मुसलमानों का वास्तविक प्रतिनिधि बनने के लिए संगठन को और मजबूत करना होगा।
- कांग्रेस मंत्रिमंडलों की कुछ नीतियों को मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के हितों के विरुद्ध बताकर व्यापक प्रचार किया।
- इसके बाद मुस्लिम लीग ने स्वयं को मुसलमानों का एकमात्र राजनीतिक प्रतिनिधि सिद्ध करने का अभियान तेज कर दिया।
मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा मुस्लिम लीग का पुनर्गठन
➣ 1937 के चुनावों के बाद मोहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम लीग को एक अभिजात वर्ग के संगठन से बदलकर जनाधार वाले राजनीतिक दल में परिवर्तित करने का प्रयास किया।
पुनर्गठन के प्रमुख कदम
- विभिन्न प्रांतों में मुस्लिम लीग की नई शाखाओं की स्थापना की गई।
- सदस्यता अभियान चलाकर आम मुसलमानों को संगठन से जोड़ा गया।
- छात्रों, युवाओं, व्यापारियों तथा धार्मिक नेताओं को भी मुस्लिम लीग से जोड़ा गया।
- समाचार-पत्रों, जनसभाओं एवं राजनीतिक प्रचार के माध्यम से मुस्लिम लीग की लोकप्रियता बढ़ाई गई।
- जिन्ना ने यह प्रचारित किया कि केवल मुस्लिम लीग ही भारतीय मुसलमानों के हितों की रक्षा कर सकती है।
➣ इन्हीं प्रयासों के परिणामस्वरूप 1940 के दशक तक मुस्लिम लीग भारतीय मुसलमानों का सबसे प्रभावशाली राजनीतिक संगठन बन गई।
1930 ई. – डॉ. मोहम्मद इक़बाल का इलाहाबाद भाषण।
▪ 1930–1932 ई. – गोलमेज सम्मेलनों में मुस्लिम लीग की सक्रिय भागीदारी।
▪ 1933 ई. – चौधरी रहमत अली ने पहली बार Pakistan शब्द का प्रयोग किया।
▪ 1935 ई. – भारत शासन अधिनियम लागू हुआ, जिसमें प्रांतीय स्वायत्तता एवं पृथक निर्वाचन की व्यवस्था बनी रही।
▪ 1937 ई. – प्रांतीय चुनावों में अपेक्षित सफलता न मिलने के बाद जिन्ना ने मुस्लिम लीग का व्यापक पुनर्गठन किया।
▪ इसी काल में मुस्लिम लीग ने पृथक मुस्लिम राजनीतिक पहचान को मजबूत किया, जिसने आगे चलकर 1940 के लाहौर प्रस्ताव का मार्ग प्रशस्त किया।
➣
लाहौर प्रस्ताव (1940 ई.)
➣ 23 मार्च 1940 ई. को लाहौर (मिंटो पार्क, वर्तमान इक़बाल पार्क) में आयोजित अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के वार्षिक अधिवेशन में एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसे लाहौर प्रस्ताव कहा जाता है। बाद में यही प्रस्ताव पाकिस्तान प्रस्ताव के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
लाहौर प्रस्ताव की पृष्ठभूमि
- 1937 के प्रांतीय चुनावों के बाद मुस्लिम लीग ने स्वयं को भारतीय मुसलमानों का प्रमुख प्रतिनिधि संगठन घोषित करने का प्रयास तेज कर दिया।
- कांग्रेस मंत्रिमंडलों की नीतियों की मुस्लिम लीग ने आलोचना की तथा मुसलमानों में असुरक्षा की भावना उत्पन्न होने का दावा किया।
- मोहम्मद अली जिन्ना का विश्वास था कि संयुक्त भारत में मुसलमानों के राजनीतिक हित सुरक्षित नहीं रहेंगे।
लाहौर प्रस्ताव की प्रमुख बातें
- प्रस्ताव ए. के. फ़ज़लुल हक़ ने प्रस्तुत किया।
- इसमें भारत के उत्तर-पश्चिमी एवं पूर्वी मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को मिलाकर स्वतंत्र राज्यों के गठन की मांग की गई।
- इन राज्यों को पूर्ण स्वायत्तता एवं संप्रभुता प्रदान करने की बात कही गई।
- प्रस्ताव में Pakistan शब्द का प्रयोग नहीं किया गया था।
महत्व
- मुस्लिम लीग ने पहली बार पृथक मुस्लिम राष्ट्र की मांग को औपचारिक रूप दिया।
- आगे चलकर यही प्रस्ताव पाकिस्तान की स्थापना का आधार बना।
- भारतीय राजनीति में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मतभेद और अधिक गहरे हो गए।
द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) के दौरान मुस्लिम लीग
➣ सितम्बर 1939 ई. में ब्रिटेन ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की और बिना भारतीय नेताओं से परामर्श किए भारत को भी युद्ध में शामिल कर दिया। इस निर्णय पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग की प्रतिक्रियाएँ भिन्न थीं।
मुस्लिम लीग का दृष्टिकोण
- मुस्लिम लीग ने युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार के प्रति अपेक्षाकृत सहयोगात्मक नीति अपनाई।
- जिन्ना ने इस अवसर का उपयोग ब्रिटिश सरकार से राजनीतिक रियायतें प्राप्त करने के लिए किया।
- कांग्रेस मंत्रिमंडलों के इस्तीफे (1939) के बाद मुस्लिम लीग ने 22 दिसम्बर 1939 ई. को मुक्ति दिवस (Day of Deliverance) मनाया।
मुक्ति दिवस
➣ मुस्लिम लीग का आरोप था कि कांग्रेस मंत्रिमंडलों के शासनकाल में मुसलमानों के साथ भेदभाव हुआ।
➣ इसी कारण कांग्रेस सरकारों के त्यागपत्र देने के बाद जिन्ना ने 22 दिसम्बर 1939 को “मुक्ति दिवस” मनाने का आह्वान किया।
➣ कांग्रेस ने इस कदम की तीव्र आलोचना की, जिससे दोनों संगठनों के संबंध और अधिक तनावपूर्ण हो गए।
अगस्त प्रस्ताव(1940)
➣ 8 अगस्त 1940 ई. को वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने भारतीय नेताओं का सहयोग प्राप्त करने के उद्देश्य से अगस्त प्रस्ताव प्रस्तुत किया।
मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया
- मुस्लिम लीग ने इस प्रस्ताव का पूर्ण विरोध नहीं किया।
- ब्रिटिश सरकार ने यह संकेत दिया कि भविष्य के संवैधानिक परिवर्तन अल्पसंख्यकों की सहमति के बिना लागू नहीं किए जाएंगे।
- इससे मुस्लिम लीग की राजनीतिक स्थिति और मजबूत हुई क्योंकि उसे प्रभावी रूप से वीटो शक्ति जैसी स्थिति प्राप्त हो गई।
क्रिप्स मिशन (1942 ई.) एवं मुस्लिम लीग
➣ मार्च 1942 ई. में ब्रिटिश सरकार ने सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा। उद्देश्य था कि भारतीय नेताओं का सहयोग प्राप्त कर युद्ध में ब्रिटेन की सहायता सुनिश्चित की जाए।
मुस्लिम लीग का दृष्टिकोण
- मुस्लिम लीग ने मिशन के कुछ प्रावधानों का स्वागत किया क्योंकि इसमें प्रांतों को भविष्य में संघ से अलग होने की संभावना दिखाई देती थी।
- फिर भी लीग पाकिस्तान की मांग की स्पष्ट स्वीकृति चाहती थी, जो इस योजना में नहीं थी।
- अंततः मुस्लिम लीग ने भी क्रिप्स प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।
भारत छोड़ो आंदोलन (1942 ई.) एवं मुस्लिम लीग
➣ 8 अगस्त 1942 ई. को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) प्रारम्भ किया।
मुस्लिम लीग की नीति
- मुस्लिम लीग ने भारत छोड़ो आंदोलन का समर्थन नहीं किया।
- जिन्ना का मत था कि यदि अंग्रेज तुरंत भारत छोड़ देंगे, तो मुसलमानों के हित सुरक्षित नहीं रहेंगे।
- मुस्लिम लीग ने ब्रिटिश सरकार के साथ राजनीतिक वार्ता जारी रखी।
- इस अवधि में कांग्रेस के अधिकांश नेता जेल में थे, जबकि मुस्लिम लीग को अपने संगठन का विस्तार करने का अवसर मिला।
राजगोपालाचारी फ़ॉर्मूला (1944 ई.)
➣ सी. राजगोपालाचारी ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौते का मार्ग निकालने के उद्देश्य से राजगोपालाचारी फ़ॉर्मूला प्रस्तुत किया।
प्रमुख प्रस्ताव
- स्वतंत्रता के बाद मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में जनमत-संग्रह (Plebiscite) कराया जाए।
- यदि जनता चाहे तो पृथक राष्ट्र का गठन किया जा सकता है।
- रक्षा, व्यापार तथा संचार जैसे विषयों पर दोनों देशों के बीच समझौता किया जाए।
➣ मुस्लिम लीग ने इस प्रस्ताव को पर्याप्त नहीं माना क्योंकि वह पाकिस्तान की स्पष्ट एवं तत्काल स्वीकृति चाहती थी।
गांधी–जिन्ना वार्ता (1944 ई.)
➣ सितम्बर 1944 ई. में महात्मा गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना के बीच बंबई में कई दौर की वार्ता हुई। इसका उद्देश्य कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मतभेद दूर करना था।
वार्ता की विफलता के कारण
- गांधीजी संयुक्त एवं अखंड भारत के पक्षधर थे।
- जिन्ना पहले पाकिस्तान की मांग को स्वीकार कराने पर अड़े रहे।
- दोनों पक्ष किसी साझा समाधान पर सहमत नहीं हो सके।
➣ गांधी–जिन्ना वार्ता की विफलता के बाद भारत के विभाजन की संभावना और अधिक बढ़ गई।
वेवल योजना (1945 ई.) एवं शिमला सम्मेलन
➣ जून 1945 ई. में वायसराय लॉर्ड वेवल ने भारत की राजनीतिक समस्या के समाधान के लिए वेवल योजना प्रस्तुत की। इसी योजना पर विचार करने के लिए शिमला सम्मेलन (25 जून–14 जुलाई 1945) आयोजित किया गया।
मुस्लिम लीग का रुख
- मुस्लिम लीग ने मांग की कि वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में सभी मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति केवल मुस्लिम लीग की सिफारिश पर हो।
- कांग्रेस ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया क्योंकि वह सभी भारतीयों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती थी।
- दोनों पक्षों के बीच सहमति न बनने के कारण शिमला सम्मेलन असफल रहा।
शिमला सम्मेलन का महत्व
- मुस्लिम लीग ने स्वयं को भारतीय मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि सिद्ध करने का प्रयास किया।
- कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक दूरी और बढ़ गई।
- भारत की संवैधानिक समस्या का समाधान नहीं हो सका।
1945–46 के चुनाव एवं मुस्लिम लीग की सफलता
➣ द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत में केंद्रीय एवं प्रांतीय विधानमंडलों के चुनाव कराने का निर्णय लिया। 1945–46 के चुनाव मुस्लिम लीग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुए, क्योंकि इन चुनावों ने यह स्पष्ट कर दिया कि अधिकांश मुस्लिम मतदाता मुस्लिम लीग का समर्थन कर रहे थे।
चुनाव परिणाम
- मुस्लिम लीग ने केंद्रीय विधानमंडल की लगभग सभी मुस्लिम सीटों पर विजय प्राप्त की।
- प्रांतीय विधानसभाओं में भी अधिकांश आरक्षित मुस्लिम सीटों पर मुस्लिम लीग विजयी रही।
- इन चुनावों के बाद मोहम्मद अली जिन्ना ने दावा किया कि मुस्लिम लीग ही भारतीय मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था है।
- चुनावी सफलता से पाकिस्तान की मांग को व्यापक राजनीतिक समर्थन मिला।
कैबिनेट मिशन योजना (1946 ई.) एवं मुस्लिम लीग
➣ मार्च 1946 ई. में ब्रिटिश सरकार ने भारत की संवैधानिक समस्या का समाधान खोजने के लिए कैबिनेट मिशन भारत भेजा। इस मिशन में लॉर्ड पैथिक-लॉरेंस, सर स्टैफर्ड क्रिप्स तथा ए. वी. एलेक्ज़ेंडर शामिल थे।
योजना की प्रमुख बातें
- भारत को एक संघ के रूप में बनाए रखने का प्रस्ताव रखा गया।
- केंद्र के पास केवल रक्षा, विदेश नीति एवं संचार जैसे विषय रखने का सुझाव दिया गया।
- प्रांतों को तीन समूहों (A, B और C) में विभाजित करने का प्रस्ताव रखा गया।
- संविधान सभा के गठन का प्रावधान किया गया।
मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया
- प्रारम्भ में मुस्लिम लीग ने इस योजना को स्वीकार कर लिया क्योंकि समूह व्यवस्था से मुस्लिम बहुल प्रांतों को विशेष महत्व मिलता था।
- बाद में कांग्रेस द्वारा योजना की अलग व्याख्या किए जाने पर मुस्लिम लीग ने अपना समर्थन वापस ले लिया।
- इसके बाद जिन्ना ने पाकिस्तान प्राप्त करने के लिए अधिक कठोर राजनीतिक संघर्ष का निर्णय लिया।
प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस (1946 ई.)
➣ कैबिनेट मिशन योजना पर मतभेद बढ़ने के बाद मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त 1946 ई. को प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस मनाने की घोषणा की। इसका उद्देश्य पाकिस्तान की मांग के समर्थन में अपनी राजनीतिक शक्ति का प्रदर्शन करना था।
घटनाक्रम
- मुस्लिम लीग ने पूरे देश में प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस मनाने का आह्वान किया।
- सबसे अधिक हिंसा कलकत्ता में हुई, जहाँ बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे।
- इन दंगों में हजारों लोगों की मृत्यु हुई तथा बड़ी संख्या में लोग घायल एवं बेघर हुए।
- इसके बाद नोआखाली, बिहार, पंजाब सहित अनेक क्षेत्रों में भी सांप्रदायिक हिंसा फैल गई।
प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस का प्रभाव
- हिंदू-मुस्लिम संबंध अत्यंत तनावपूर्ण हो गए।
- भारत के विभाजन की संभावना और अधिक प्रबल हो गई।
- ब्रिटिश सरकार पर शीघ्र सत्ता हस्तांतरण का दबाव बढ़ गया।
अंतरिम सरकार (1946 ई.) एवं मुस्लिम लीग
➣ 2 सितम्बर 1946 ई. को जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन किया गया। प्रारम्भ में मुस्लिम लीग ने इसमें भाग नहीं लिया।
मुस्लिम लीग का रुख
- प्रारम्भ में मुस्लिम लीग ने अंतरिम सरकार का बहिष्कार किया।
- बाद में अक्टूबर 1946 ई. में मुस्लिम लीग सरकार में शामिल हो गई।
- सरकार में शामिल होने के बाद भी कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच निरंतर मतभेद बने रहे।
- प्रशासनिक कार्यों में दोनों दलों के बीच सहयोग स्थापित नहीं हो सका।
माउंटबेटन योजना (3 जून 1947 ई.)
➣ भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने 3 जून 1947 ई. को भारत की सत्ता के हस्तांतरण की अंतिम योजना प्रस्तुत की, जिसे माउंटबेटन योजना कहा जाता है।
योजना की प्रमुख बातें
- भारत का विभाजन कर दो स्वतंत्र अधिराज्यों – भारत और पाकिस्तान – की स्थापना की जाएगी।
- पंजाब एवं बंगाल का विभाजन किया जाएगा।
- सीमाओं के निर्धारण के लिए रेडक्लिफ आयोग का गठन किया जाएगा।
- ब्रिटिश सत्ता का हस्तांतरण अगस्त 1947 में कर दिया जाएगा।
मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया
- मुस्लिम लीग ने इस योजना को स्वीकार कर लिया क्योंकि इससे पाकिस्तान की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो गया।
- कांग्रेस ने भी परिस्थितियों को देखते हुए योजना को स्वीकार कर लिया।
भारत का विभाजन (1947 ई.) एवं मुस्लिम लीग की भूमिका
➣ भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 (Indian Independence Act, 1947) के आधार पर ब्रिटिश संसद ने भारत के विभाजन को कानूनी स्वीकृति प्रदान की।
विभाजन
- 14 अगस्त 1947 ई. को पाकिस्तान एक स्वतंत्र राष्ट्र बना।
- 15 अगस्त 1947 ई. को भारत स्वतंत्र हुआ।
- मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर-जनरल बने।
- लियाकत अली ख़ाँ पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री बने।
विभाजन के परिणाम
- भारत के इतिहास का सबसे बड़ा जन-स्थानांतरण हुआ।
- लाखों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े।
- व्यापक सांप्रदायिक दंगे हुए, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु हुई।
- भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय तक राजनीतिक एवं सीमा संबंधी विवाद बने रहे।
मुस्लिम लीग का विभाजन के बाद का स्वरूप
➣ भारत के विभाजन के बाद मुस्लिम लीग का स्वरूप दोनों देशों में अलग-अलग हो गया।
पाकिस्तान में
- पाकिस्तान की स्थापना के बाद मुस्लिम लीग वहाँ की प्रमुख शासक राजनीतिक पार्टी बन गई।
- प्रारम्भिक वर्षों में पाकिस्तान की सरकार का नेतृत्व मुस्लिम लीग के हाथों में रहा।
भारत में
- भारत में मुस्लिम लीग का प्रभाव बहुत कम हो गया।
- बाद में इसके कुछ क्षेत्रीय स्वरूप विकसित हुए, जिनमें इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) प्रमुख है।
अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का मूल्यांकन
➣ अखिल भारतीय मुस्लिम लीग भारतीय इतिहास का एक अत्यंत प्रभावशाली राजनीतिक संगठन था। इसकी स्थापना मुसलमानों के राजनीतिक हितों की रक्षा के उद्देश्य से हुई थी, लेकिन समय के साथ इसकी नीतियाँ बदलती गईं और यह पृथक मुस्लिम राष्ट्र की मांग का सबसे प्रमुख समर्थक बन गया। इतिहासकार मुस्लिम लीग की भूमिका का मूल्यांकन विभिन्न दृष्टिकोणों से करते हैं।
सकारात्मक पक्ष
- मुस्लिम समाज में राजनीतिक जागरूकता उत्पन्न की।
- मुसलमानों को अखिल भारतीय स्तर पर एक राजनीतिक मंच प्रदान किया।
- शिक्षा, प्रशासन एवं प्रतिनिधित्व से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीति में प्रमुखता से उठाया।
- ब्रिटिश सरकार के समक्ष मुसलमानों की राजनीतिक मांगों को संगठित रूप में प्रस्तुत किया।
आलोचनाएँ
- पृथक निर्वाचन की राजनीति को बढ़ावा दिया, जिससे सांप्रदायिक राजनीति मजबूत हुई।
- दो-राष्ट्र सिद्धांत का समर्थन कर भारत के विभाजन का मार्ग प्रशस्त किया।
- कांग्रेस एवं अन्य राष्ट्रीय दलों के साथ स्थायी राजनीतिक सहयोग स्थापित नहीं कर सकी।
- विभाजन के दौरान हुए सांप्रदायिक तनाव एवं हिंसा के लिए इसकी नीतियों की आलोचना की जाती है।
अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के प्रमुख अध्यक्ष
| वर्ष | अध्यक्ष | विशेष तथ्य |
|---|---|---|
| 1906 ई. | सर सुल्तान मोहम्मद शाह आगा ख़ाँ तृतीय | प्रथम सम्मानित (Honorary) अध्यक्ष |
| 1907 ई. | नवाब वकार-उल-मुल्क | प्रारम्भिक संगठनात्मक नेतृत्व |
| 1908 ई. | सैयद अली इमाम | राजनीतिक विस्तार में योगदान |
| 1913 ई. के बाद | मोहम्मद अली जिन्ना (प्रमुख नेता) | मुस्लिम लीग के सबसे प्रभावशाली नेता |
अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की प्रमुख घटनाएँ
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1906 ई. | ढाका में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना |
| 1906 ई. | शिमला प्रतिनिधिमंडल द्वारा लॉर्ड मिंटो से भेंट |
| 1909 ई. | मार्ले–मिंटो सुधार एवं पृथक निर्वाचन |
| 1913 ई. | मुस्लिम लीग ने स्वशासन की मांग स्वीकार की |
| 1916 ई. | लखनऊ समझौता |
| 1928 ई. | नेहरू रिपोर्ट का विरोध |
| 1929 ई. | जिन्ना के 14 सूत्र |
| 1930 ई. | इलाहाबाद भाषण (डॉ. मोहम्मद इक़बाल) |
| 1933 ई. | रहमत अली द्वारा “Pakistan” शब्द का प्रयोग |
| 1937 ई. | प्रांतीय चुनाव एवं मुस्लिम लीग का पुनर्गठन |
| 1940 ई. | लाहौर प्रस्ताव (Pakistan Resolution) |
| 1942 ई. | भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध |
| 1945–46 ई. | चुनावों में मुस्लिम लीग की बड़ी सफलता |
| 1946 ई. | कैबिनेट मिशन योजना एवं प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस |
| 1947 ई. | भारत का विभाजन एवं पाकिस्तान की स्थापना |
कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग : तुलनात्मक अध्ययन
| आधार | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | अखिल भारतीय मुस्लिम लीग |
|---|---|---|
| स्थापना | 1885 ई. | 1906 ई. |
| प्रमुख उद्देश्य | संपूर्ण भारत का राजनीतिक प्रतिनिधित्व | मुसलमानों के राजनीतिक हितों की रक्षा |
| प्रारम्भिक नीति | संवैधानिक सुधार एवं राष्ट्रीय एकता | ब्रिटिश सरकार से सहयोग एवं पृथक प्रतिनिधित्व |
| पृथक निर्वाचन | प्रारम्भ में विरोध (1916 में लखनऊ समझौते में स्वीकार) | दृढ़ समर्थन |
| मुख्य नेता | दादाभाई नौरोजी, गोखले, तिलक, गांधी, नेहरू, पटेल | आगा ख़ाँ तृतीय, मोहम्मद अली जिन्ना, लियाकत अली ख़ाँ |
| अंतिम लक्ष्य | स्वतंत्र एवं अखंड भारत | पाकिस्तान की स्थापना |
महत्वपूर्ण तथ्य
- अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना 30 दिसम्बर 1906 ई. को ढाका में हुई।
- मुस्लिम लीग की स्थापना ऑल इंडिया मोहम्मडन एजुकेशनल कॉन्फ्रेंस के अधिवेशन के दौरान हुई।
- मुस्लिम लीग की स्थापना में नवाब सलीमुल्लाह ख़ाँ की प्रमुख भूमिका थी।
- प्रथम सम्मानित अध्यक्ष सर सुल्तान मोहम्मद शाह आगा ख़ाँ तृतीय थे।
- 1909 के मार्ले–मिंटो सुधार द्वारा मुसलमानों को पृथक निर्वाचन प्राप्त हुआ।
- 1916 का लखनऊ समझौता कांग्रेस और मुस्लिम लीग के सहयोग का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
- 1929 में मोहम्मद अली जिन्ना ने प्रसिद्ध 14 सूत्र प्रस्तुत किए।
- 23 मार्च 1940 को लाहौर प्रस्ताव पारित किया गया।
- 16 अगस्त 1946 को प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस मनाया गया।
- 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान स्वतंत्र हुआ।
- पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर-जनरल मोहम्मद अली जिन्ना बने।
निष्कर्ष
➣ अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का इतिहास आधुनिक भारत की राजनीति, सांप्रदायिक संबंधों और स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसकी स्थापना मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से हुई थी, लेकिन समय के साथ इसका स्वरूप बदलता गया और यह पृथक राष्ट्र की मांग का प्रमुख समर्थक बन गया।
➣ लाहौर प्रस्ताव (1940), प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस (1946) तथा भारत का विभाजन (1947) जैसी घटनाओं में मुस्लिम लीग की निर्णायक भूमिका रही। इसलिए आधुनिक भारतीय इतिहास का अध्ययन मुस्लिम लीग के बिना पूर्ण नहीं माना जा सकता।
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