ब्रिटिश भारत में प्रेस : विकास, प्रमुख समाचार-पत्र एवं प्रेस अधिनियम

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भारत में प्रेस का विकास

➣ भारत में आधुनिक पत्रकारिता का इतिहास प्रिंटिंग प्रेस के आगमन से प्रारम्भ होता है। प्रारम्भ में मुद्रण का उपयोग मुख्यतः धार्मिक ग्रंथों, सरकारी सूचनाओं तथा व्यापारिक दस्तावेजों के प्रकाशन तक सीमित था,

➣ किन्तु समय के साथ यही तकनीक समाचार-पत्रों के प्रकाशन का आधार बनी। समाचार-पत्रों ने भारतीय समाज में नई चेतना उत्पन्न की तथा शिक्षा, सामाजिक सुधार, राजनीतिक जागरूकता और राष्ट्रीय आन्दोलन को एक नई दिशा प्रदान की।

➣ ब्रिटिश शासन के प्रारम्भिक वर्षों में प्रेस का विकास धीमी गति से हुआ, क्योंकि ईस्ट इंडिया कम्पनी नहीं चाहती थी कि उसके प्रशासन की आलोचना जनता तक पहुँचे।

➣ इसके बावजूद अनेक यूरोपीय तथा भारतीय पत्रकारों ने समाचार-पत्रों के माध्यम से स्वतंत्र विचारों को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया। यही प्रयास आगे चलकर भारतीय प्रेस के विकास की नींव बना।

➣ उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में भारतीय पत्रकारिता को नई दिशा देने का श्रेय राजा राममोहन राय को दिया जाता है। उन्होंने समाचार-पत्रों को केवल सूचना प्रसारित करने का माध्यम न मानकर सामाजिक सुधार, धार्मिक जागरण तथा जनमत निर्माण का प्रभावी साधन बनाया।

➣ राजा राममोहन राय का विश्वास था कि किसी भी समाज की उन्नति के लिए विचारों का स्वतंत्र आदान-प्रदान आवश्यक है। उन्होंने अपने समाचार-पत्रों के माध्यम से सती प्रथा, जातिगत भेदभाव, धार्मिक कट्टरता तथा सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया और आधुनिक शिक्षा तथा तार्किक सोच का समर्थन किया।

भारत में प्रिंटिंग प्रेस का आगमन

➣ भारत में मुद्रण कला का आगमन यूरोपीय शक्तियों के आगमन के साथ हुआ। 16वीं शताब्दी के मध्य पुर्तग़ालियों ने गोवा में भारत का पहला मुद्रणालय स्थापित किया।

➣ प्रारम्भ में इसका उपयोग मुख्यतः ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार तथा धार्मिक साहित्य के प्रकाशन के लिए किया जाता था, किन्तु धीरे-धीरे इसका उपयोग अन्य पुस्तकों के मुद्रण में भी होने लगा।

➣ भारत में मुद्रण कला के प्रसार ने शिक्षा, साहित्य और संचार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। पहले जहाँ हस्तलिखित पांडुलिपियों पर निर्भर रहना पड़ता था,

➣ वहीं मुद्रणालय स्थापित होने के बाद पुस्तकों और अन्य प्रकाशनों का व्यापक स्तर पर प्रकाशन संभव हो गया। इसी तकनीकी परिवर्तन ने आगे चलकर भारतीय पत्रकारिता के विकास का मार्ग प्रशस्त किया।

भारत में मुद्रण कला का श्रेय पुर्तग़ालियों को दिया जाता है। गोवा में स्थापित मुद्रणालय ने भारतीय पत्रकारिता और प्रकाशन जगत की आधारशिला रखी।

➣ भारत में अपने प्रशासन और व्यापार के विस्तार के साथ ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भी मुद्रण व्यवस्था के महत्व को समझा।

➣ कम्पनी ने सरकारी आदेशों, अधिसूचनाओं, व्यापारिक सूचनाओं तथा प्रशासनिक दस्तावेजों के प्रकाशन के लिए अपने मुद्रणालय स्थापित किए। इससे मुद्रण तकनीक का उपयोग धीरे-धीरे अधिक संगठित रूप में होने लगा।

➣ यद्यपि उस समय कम्पनी स्वतंत्र पत्रकारिता के पक्ष में नहीं थी, फिर भी मुद्रणालयों की बढ़ती संख्या ने समाचार-पत्रों के प्रकाशन की संभावनाओं को जन्म दिया। आगे चलकर इन्हीं परिस्थितियों में भारत के प्रारम्भिक समाचार-पत्र अस्तित्व में आए।

भारत में समाचार-पत्रों की शुरुआत

➣ भारत में समाचार-पत्र प्रकाशित करने का पहला प्रयास 1766 ई. में कम्पनी के पूर्व कर्मचारी विलियम वोल्ट्स ने किया था।

➣ उनका उद्देश्य कम्पनी प्रशासन की नीतियों और भ्रष्टाचार को सार्वजनिक करना था, किन्तु कम्पनी के विरोध के कारण यह प्रयास सफल नहीं हो सका।

➣ यद्यपि विलियम वोल्ट्स अपना समाचार-पत्र प्रकाशित नहीं कर सके, फिर भी भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में उनका प्रयास अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इस घटना से स्पष्ट हो गया कि कम्पनी स्वतंत्र प्रेस को अपने प्रशासन के लिए चुनौती मानती थी।

भारत में समाचार-पत्र निकालने का पहला प्रयास विलियम वोल्ट्स (1766 ई.) ने किया था, जबकि पहला प्रकाशित समाचार-पत्र जेम्स ऑगस्टस हिक्की द्वारा 1780 ई. में निकाला गया।

भारत का प्रथम समाचार-पत्र : बंगाल गजट (1780 ई.)

➣ भारत में नियमित रूप से प्रकाशित होने वाले प्रथम समाचार-पत्र का श्रेय जेम्स ऑगस्टस हिक्की को दिया जाता है।

➣ उन्होंने 29 जनवरी 1780 ई. को कोलकाता से बंगाल गजट अथवा द कलकत्ता जनरल एडवरटाइजर का प्रकाशन प्रारम्भ किया। यही भारत के आधुनिक समाचार-पत्र इतिहास का वास्तविक प्रारम्भ माना जाता है।

बंगाल गजट एक साप्ताहिक अंग्रेज़ी समाचार-पत्र था, जिसमें तत्कालीन प्रशासन, व्यापार, सामाजिक गतिविधियों तथा सार्वजनिक जीवन से जुड़े समाचार प्रकाशित किए जाते थे।

➣ हिक्की प्रेस की स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे। उनका मानना था कि समाचार-पत्र का उद्देश्य केवल समाचार प्रकाशित करना नहीं, बल्कि शासन और प्रशासन की गतिविधियों को जनता के सामने लाना भी है।

➣ इसी कारण उन्होंने तत्कालीन गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स तथा ईस्ट इंडिया कम्पनी के अनेक उच्च अधिकारियों की नीतियों और कार्यप्रणाली की निर्भीक आलोचना की। उस समय यह एक साहसिक कदम था, क्योंकि प्रेस की स्वतंत्रता के लिए कोई कानूनी संरक्षण उपलब्ध नहीं था।

➣ हिक्की ने अपने समाचार-पत्र को सरकारी प्रभाव से मुक्त रखने का प्रयास किया। परिणामस्वरूप बंगाल गजट शीघ्र ही यूरोपीय अधिकारियों तथा शिक्षित वर्ग के बीच लोकप्रिय हो गया, किन्तु कम्पनी प्रशासन के लिए असुविधाजनक भी सिद्ध हुआ।

बंगाल गजट पर प्रतिबन्ध

➣ ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बंगाल गजट में प्रकाशित आलोचनात्मक लेखों को अपने अधिकार और प्रतिष्ठा के लिए चुनौती माना। परिणामस्वरूप जेम्स ऑगस्टस हिक्की पर मानहानि के मुकदमे चलाए गए, उन्हें कारावास का सामना करना पड़ा।

➣ अंततः उनका मुद्रणालय और प्रेस जब्त कर लिया गया। इसके साथ ही बंगाल गजट का प्रकाशन भी बंद हो गया।

➣ यद्यपि बंगाल गजट का जीवनकाल अधिक लंबा नहीं रहा, फिर भी इसने भारत में स्वतंत्र पत्रकारिता की परम्परा की शुरुआत की। इसने यह सिद्ध किया कि समाचार-पत्र केवल सूचना देने का माध्यम नहीं, बल्कि शासन की जवाबदेही सुनिश्चित करने का भी प्रभावी साधन हो सकते हैं।

भारत का पहला प्रकाशित समाचार-पत्र बंगाल गजट (1780 ई.) था। इसके संस्थापक एवं सम्पादक जेम्स ऑगस्टस हिक्की थे। इसे The Calcutta General Advertiser के नाम से भी जाना जाता है।

प्रारम्भिक अंग्रेज़ी समाचार-पत्रों का विकास

➣ बंगाल गजट के प्रकाशन के बाद भारत में अन्य अंग्रेज़ी समाचार-पत्रों का प्रकाशन भी प्रारम्भ होने लगा। यद्यपि इनका अधिकांश पाठक वर्ग यूरोपीय अधिकारी, व्यापारी तथा कम्पनी के कर्मचारी थे, फिर भी इन समाचार-पत्रों ने भारत में पत्रकारिता के विस्तार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

➣ कोलकाता से Calcutta Courier, Asiatic Mirror तथा Oriental Star जैसे समाचार-पत्र प्रकाशित हुए। इसी प्रकार मद्रास से Madras Courier और Madras Gazette, जबकि बम्बई से Bombay Herald तथा Bombay Gazette का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ।

➣ इन समाचार-पत्रों में मुख्यतः व्यापार, प्रशासन, न्यायालय, समुद्री गतिविधियों तथा यूरोप से संबंधित समाचार प्रकाशित किए जाते थे।

➣ इन प्रारम्भिक अंग्रेज़ी समाचार-पत्रों ने भारत में समाचार-संग्रह, संपादन, मुद्रण और वितरण की ऐसी परम्परा विकसित की, जिसने आगे चलकर भारतीय स्वामित्व वाले समाचार-पत्रों के विकास के लिए आधार तैयार किया।

जेम्स सिल्क बकिंघम एवं भारतीय प्रेस का आधुनिकीकरण

➣ भारत में पत्रकारिता के प्रारम्भिक विकास में जेम्स सिल्क बकिंघम का विशेष स्थान है। उन्होंने 1818 ई. में कोलकाता से कलकत्ता जर्नल का प्रकाशन प्रारम्भ किया। यह समाचार-पत्र अपने निर्भीक विचारों और निष्पक्ष लेखन के कारण शीघ्र ही लोकप्रिय हो गया।

➣ बकिंघम का मानना था कि समाचार-पत्र केवल सरकारी घोषणाओं के प्रकाशन तक सीमित नहीं होने चाहिए, बल्कि उन्हें जनता और शासन के बीच संवाद का माध्यम भी बनना चाहिए। उन्होंने प्रशासनिक कमियों, न्यायिक व्यवस्था तथा जनहित से जुड़े अनेक विषयों पर खुलकर लेख लिखे।

➣ उनकी स्वतंत्र पत्रकारिता से ईस्ट इंडिया कम्पनी असंतुष्ट हो गई। परिणामस्वरूप कम्पनी प्रशासन ने उनके विरुद्ध कठोर कदम उठाए और अंततः उन्हें भारत छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया।

➣ यद्यपि उनका भारत में कार्यकाल अधिक लंबा नहीं रहा, फिर भी उन्होंने भारतीय पत्रकारिता को नई दिशा प्रदान की।

जेम्स सिल्क बकिंघम को भारत में आधुनिक पत्रकारिता का अग्रदूत माना जाता है। उन्होंने समाचार-पत्रों को जनमत निर्माण का प्रभावी माध्यम बनाया।

भारतीयों द्वारा प्रकाशित समाचार-पत्रों का प्रारम्भ

➣ उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक भारत में अधिकांश समाचार-पत्र यूरोपीय व्यक्तियों द्वारा प्रकाशित किए जाते थे।

➣ धीरे-धीरे भारतीय शिक्षित वर्ग ने भी पत्रकारिता के महत्व को समझा और समाचार-पत्रों को सामाजिक सुधार, जनजागरण तथा भारतीय समाज की समस्याओं को सामने लाने का प्रभावी माध्यम बनाया। यही वह दौर था जब भारतीय पत्रकारिता ने अपनी स्वतंत्र पहचान बनानी शुरू की।

पहला भारतीय अंग्रेज़ी समाचार-पत्र

1816 ई. में गंगाधर भट्टाचार्य ने कोलकाता से बंगाल गजट नामक समाचार-पत्र का प्रकाशन किया। यह भारत का प्रथम भारतीय स्वामित्व वाला अंग्रेज़ी समाचार-पत्र माना जाता है।

➣ यह एक साप्ताहिक समाचार-पत्र था तथा इससे पहले प्रकाशित होने वाले सभी अंग्रेज़ी समाचार-पत्र या तो यूरोपीय व्यक्तियों द्वारा अथवा कंपनी के अधिकारियों द्वारा संचालित थे।

➣ इसका उद्देश्य भारतीय समाज से जुड़े विषयों को प्रमुखता देना तथा शिक्षित भारतीयों के विचारों को अभिव्यक्ति प्रदान करना था।

➣ गंगाधर भट्टाचार्य को इस दृष्टि से भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में प्रथम भारतीय संपादक होने का गौरव भी प्राप्त है, क्योंकि उनसे पूर्व अंग्रेज़ी समाचार-पत्रों का संपादन सदैव यूरोपीय व्यक्तियों के हाथों में रहा था।

आधार हिक्कीज़ बंगाल गजट गंगाधर भट्टाचार्य का बंगाल गजट
संस्थापक जेम्स ऑगस्टस हिक्की गंगाधर भट्टाचार्य
प्रकाशन वर्ष 29 जनवरी 1780 ई. 1816 ई.
प्रकाशन स्थल कोलकाता कोलकाता
भाषा अंग्रेज़ी अंग्रेज़ी
विशेषता भारत का प्रथम नियमित रूप से प्रकाशित समाचार-पत्र भारत का प्रथम भारतीय स्वामित्व वाला अंग्रेज़ी समाचार-पत्र
अन्य नाम द कलकत्ता जनरल एडवरटाइजर (The Calcutta General Advertiser) केवल बंगाल गजट के नाम से प्रसिद्ध

समाचार दर्पण एवं दिग्दर्शन

1818 ई. में श्रीरामपुर मिशन से समाचार दर्पण नामक साप्ताहिक समाचार-पत्र तथा दिग्दर्शन नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ।।

➣ समाचार दर्पण की स्थापना 23 मई, 1818 को हुई और यह बंगाली भाषा में प्रकाशित होने वाला पहला महत्वपूर्ण समाचार-पत्र माना जाता है, जबकि दिग्दर्शन अल्पकालिक सिद्ध हुआ।

➣ इनके संपादन में जॉन क्लार्क मार्शमैन की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इन प्रकाशनों में समाचारों के साथ-साथ शिक्षा, विज्ञान, इतिहास और सामाजिक विषयों से संबंधित लेख भी प्रकाशित किए जाते थे।।

➣ दोनों प्रकाशन बैप्टिस्ट मिशनरी सोसाइटी के अंतर्गत श्रीरामपुर मिशन प्रेस से निकाले जाते थे, जो उस समय भारत में मुद्रण-गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र था।

➣ यद्यपि इनका संचालन मिशनरियों द्वारा किया जाता था, फिर भी भारतीय भाषाओं में पत्रकारिता के विकास में इनका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। इन्होंने भारतीय भाषाओं में नियमित समाचार-पत्र प्रकाशन की परम्परा को मजबूत किया और आगे

➣ चलकर भारतीय संपादकों को भी प्रेरित किया। समाचार दर्पण का प्रकाशन लगभग 1841 ई. तक जारी रहा।

समाचार दर्पण भारतीय भाषाओं में प्रकाशित प्रारम्भिक समाचार-पत्रों में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, जबकि दिग्दर्शन प्रारम्भिक मासिक पत्रिकाओं में प्रमुख स्थान रखता है।

संवाद कौमुदी (1821 ई.)

1821 ई. में राजा राममोहन राय ने बंगाली भाषा में संवाद कौमुदी नामक साप्ताहिक समाचार-पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ किया। इसका उद्देश्य समाज में व्याप्त कुरीतियों के विरुद्ध जनमत तैयार करना तथा शिक्षा एवं सामाजिक सुधार के विचारों का प्रचार-प्रसार करना था।

➣ यह भारतीय भाषा में प्रकाशित होने वाला पहला समाचार-पत्र माना जाता है, यद्यपि इसका औपचारिक संपादन भवानीचरण बंदोपाध्याय के नाम से होता था, जबकि वास्तविक स्वामित्व एवं मार्गदर्शन राजा राममोहन राय के हाथों में था।

➣ संवाद कौमुदी के माध्यम से उन्होंने विशेष रूप से सती प्रथा के उन्मूलन, महिला शिक्षा, धार्मिक सहिष्णुता तथा सामाजिक समानता जैसे विषयों को प्रमुखता से उठाया। यह समाचार-पत्र भारतीय समाज में जागरूकता फैलाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गया।

➣ सती प्रथा के विरुद्ध चलाए गए इस अभियान ने आगे चलकर 1829 ई. में गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक द्वारा सती प्रथा प्रतिषेध अधिनियम लागू किए जाने की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ संवाद कौमुदी के अतिरिक्त राजा राममोहन राय ने पत्रकारिता के क्षेत्र में अन्य महत्वपूर्ण योगदान भी दिए। 1822 ई. में उन्होंने फ़ारसी भाषा में मिरात-उल-अख़बार तथा अंग्रेज़ी भाषा में ब्रह्मनिकल मैगज़ीन का प्रकाशन किया।

➣ इस प्रकार वे एक साथ तीन भाषाओं (बंगाली, फ़ारसी, अंग्रेज़ी) में पत्रकारिता करने वाले उस युग के एकमात्र भारतीय संपादक थे। 1823 ई. में जॉन एडम के अनुज्ञप्ति नियमों के विरोध में उन्होंने अपना फ़ारसी पत्र मिरात-उल-अख़बार स्वेच्छा से बंद कर दिया, क्योंकि वे लाइसेंस की शर्तों के अंतर्गत कार्य करने के पक्ष में नहीं थे।

➣ राजा राममोहन राय को उनके इन प्रयासों के कारण भारतीय पत्रकारिता का जनक तथा भारतीय नवजागरण का अग्रदूत कहा जाता है।

समाचार चंद्रिका (1822 ई.)

➣ संवाद कौमुदी में प्रकाशित सुधारवादी विचारों का उस समय समाज के एक वर्ग ने विरोध किया। इसी पृष्ठभूमि में मार्च, 1822 ई. में समाचार चंद्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ।

➣ यह पत्र सामाजिक एवं धार्मिक विषयों पर अपेक्षाकृत रूढ़िवादी विचारधारा का समर्थन करता था। इस पत्र के संस्थापक भवानीचरण बंदोपाध्याय थे, जो पूर्व में राजा राममोहन राय की संवाद कौमुदी से भी जुड़े हुए थे।

➣ सामाजिक-धार्मिक विषयों, विशेषकर सती प्रथा तथा अन्य परम्परागत हिंदू रीति-रिवाज़ों को लेकर राममोहन राय से वैचारिक मतभेद होने के कारण उन्होंने अलग होकर समाचार चंद्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया, जो परम्परावादी हिंदू पक्ष का प्रतिनिधित्व करता था।

➣ संवाद कौमुदी और समाचार चंद्रिका के माध्यम से तत्कालीन भारतीय समाज में सामाजिक सुधार तथा परम्परागत विचारधाराओं के बीच वैचारिक बहस को नई गति मिली। यह वाद-विवाद भारतीय समाज में सुधारवादी और परम्परावादी विचारों के बीच का प्रारंभिक और सबसे प्रभावशाली संघर्ष माना जाता है।

समाचार-पत्र / पत्रिका प्रकाशन वर्ष भाषा प्रमुख विशेषता
संवाद कौमुदी 1821 ई. बंगाली साप्ताहिक समाचार-पत्र, सामाजिक एवं धार्मिक सुधारों का समर्थक।
समाचार चंद्रिका 1822 ई. बंगाली रूढ़िवादी विचारधारा का समर्थक समाचार-पत्र।
मिरात-उल-अखबार 1822 ई. फ़ारसी समकालीन राजनीतिक एवं सामाजिक विषयों पर आधारित प्रभावशाली समाचार-पत्र।
ब्राह्मनिकल मैगज़ीन अंग्रेज़ी सुधारवादी विचारों के प्रचार-प्रसार हेतु प्रकाशित पत्रिका।

भारतीय भाषाओं में समाचार-पत्रों का विस्तार

➣ उन्नीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक से भारतीय भाषाओं में समाचार-पत्रों का प्रकाशन तेजी से बढ़ने लगा। इसका प्रमुख कारण शिक्षा का प्रसार, भारतीय मध्यम वर्ग का उदय तथा सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों का विस्तार था।

➣ भारतीय भाषाओं में प्रकाशित समाचार-पत्रों ने सामान्य जनता तक समाचार, विचार और जागरूकता पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ इन समाचार-पत्रों ने केवल स्थानीय घटनाओं को ही नहीं, बल्कि शिक्षा, सामाजिक सुधार, प्रशासनिक नीतियों तथा जनहित से जुड़े विषयों को भी प्रमुखता से प्रकाशित किया। परिणामस्वरूप भारतीय पत्रकारिता धीरे-धीरे शिक्षित वर्ग से निकलकर व्यापक समाज तक पहुँचने लगी।

उदन्त मार्तण्ड : प्रथम हिन्दी समाचार-पत्र

30 मई, 1826 ई. को पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) से उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन प्रारम्भ किया। इसे भारत का प्रथम हिन्दी समाचार-पत्र माना जाता है।

➣ उस समय अधिकांश समाचार-पत्र अंग्रेज़ी, फ़ारसी या बंगाली भाषा में प्रकाशित होते थे, जबकि हिन्दी भाषी जनता के लिए कोई नियमित समाचार-पत्र उपलब्ध नहीं था।

उदन्त मार्तण्ड का मुख्य उद्देश्य हिन्दी भाषी समाज तक समाचार पहुँचाना, हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार करना तथा भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता को नई पहचान देना था।

➣ इसके माध्यम से सामाजिक, राजनीतिक तथा प्रशासनिक विषयों से संबंधित समाचार हिन्दी पाठकों तक पहुँचाए जाते थे।

➣ उस समय हिन्दी भाषी पाठकों की संख्या सीमित थी तथा अधिकांश पाठक उत्तर भारत में रहते थे, जबकि समाचार-पत्र का प्रकाशन कलकत्ता से होता था। इसके कारण वितरण व्यवस्था कठिन और महँगी थी।

➣ साथ ही, ब्रिटिश सरकार ने इसे डाक-शुल्क में कोई विशेष रियायत नहीं दी, जिससे इसके संचालन का खर्च लगातार बढ़ता गया।

सरकारी संरक्षण के अभाव, आर्थिक कठिनाइयों तथा सीमित पाठक वर्ग के कारण उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन लगभग डेढ़ वर्ष बाद 4 दिसम्बर, 1827 ई. को बंद करना पड़ा।

➣ यद्यपि इसका प्रकाशन अल्पकाल तक ही हुआ, फिर भी हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास में इसका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

उदन्त मार्तण्ड भारत का प्रथम हिन्दी समाचार-पत्र था। इसका प्रकाशन 30 मई, 1826 ई. को पंडित जुगल किशोर शुक्ल द्वारा कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) से प्रारम्भ किया गया था।

रस्त गोफ्तार

1851 ई. में दादाभाई नौरोजी ने गुजराती भाषा में रस्त गोफ्तार (Rast Goftar) का प्रकाशन प्रारम्भ किया।

रस्त गोफ्तार का अर्थ है- सत्य का वक्ता। यह समाचार-पत्र प्रारम्भ में साप्ताहिक रूप में प्रकाशित होता था और शीघ्र ही गुजराती समाज का एक प्रभावशाली पत्र बन गया।

रस्त गोफ्तार का मुख्य उद्देश्य पारसी समाज तथा व्यापक भारतीय समाज में सामाजिक सुधार, शिक्षा और आधुनिक विचारों का प्रचार-प्रसार करना था।

➣ इसके माध्यम से दादाभाई नौरोजी ने रूढ़िवादी प्रथाओं, अंधविश्वासों, सामाजिक कुरीतियों तथा समाज में व्याप्त अन्य बुराइयों का विरोध किया और लोगों को प्रगतिशील विचार अपनाने के लिए प्रेरित किया।

➣ इस समाचार-पत्र में महिला शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह, सामाजिक सुधार, सार्वजनिक जीवन, राजनीतिक जागरूकता, राष्ट्रीय चेतना तथा भारतीयों के अधिकारों से संबंधित विषयों पर नियमित रूप से लेख प्रकाशित किए जाते थे। इससे गुजराती समाज में शिक्षा, सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्रीय भावना को बढ़ावा मिला।

रस्त गोफ्तार ने गुजराती पत्रकारिता को नई दिशा प्रदान की तथा दादाभाई नौरोजी के सार्वजनिक जीवन और राष्ट्रवादी विचारों को व्यापक पहचान दिलाई।

➣ आगे चलकर उन्होंने अपने प्रसिद्ध धन का अपवाह (Drain of Wealth) सिद्धांत से संबंधित विचारों का प्रचार-प्रसार भी इसी समाचार-पत्र के माध्यम से किया, जिन्हें बाद में उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Poverty and Un-British Rule in India में विस्तार से प्रस्तुत किया।

रस्त गोफ्तार को गुजराती भाषा के प्रारंभिक और प्रभावशाली समाचार-पत्रों में गिना जाता है। इसने विशेष रूप से बंबई (मुंबई) के पारसी तथा गुजराती-भाषी समाज में शिक्षा, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय चेतना के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मद्रास मेल

1868 ई. में मद्रास (वर्तमान चेन्नई) से अंग्रेज़ी भाषा में मद्रास मेल का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ।

➣ इसे भारत का पहला सांध्य समाचार-पत्र माना जाता है। यह एक एंग्लो-इंडियन समाचार-पत्र था, अर्थात् इसका संचालन एवं संपादन मुख्यतः अंग्रेज़ पत्रकारों तथा व्यापारिक हितों द्वारा किया जाता था।

मद्रास मेल ने दक्षिण भारत में पत्रकारिता के विकास, समसामयिक समाचारों के नियमित प्रकाशन तथा अंग्रेज़ी पत्रकारिता को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ सांध्यकालीन प्रकाशन होने के कारण यह उसी दिन की ताज़ा घटनाओं, व्यापारिक सूचनाओं तथा प्रशासनिक गतिविधियों को शीघ्रता से पाठकों तक पहुँचाने में सक्षम था, जो उस समय की पत्रकारिता में एक नवीन प्रयोग था।

➣ यह समाचार-पत्र लंबे समय तक दक्षिण भारत के प्रमुख समाचार-पत्रों में शामिल रहा और मद्रास प्रेस के विकास में इसका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।

➣ यह मुख्यतः यूरोपीय समुदाय, व्यापारिक वर्ग तथा सरकारी अधिकारियों में लोकप्रिय था, तथापि इसने दक्षिण भारत में अंग्रेज़ी पत्रकारिता की नींव को भी सुदृढ़ किया।

➣ मद्रास मेल के समकालीन प्रमुख एंग्लो-इंडियन (अंग्रेज़ों द्वारा संपादित) समाचार-पत्रों में टाइम्स ऑफ इंडिया (1861, बंबई), स्टेट्समैन (1875, कलकत्ता), पायनियर (इलाहाबाद) तथा सिविल एंड मिलिट्री गज़ट (1876) प्रमुख थे।

वर्ष घटना
1556 ई. गोवा में भारत में मुद्रण कला का प्रारम्भ (पुर्तग़ालियों द्वारा)
1766 ई. विलियम वोल्ट्स द्वारा समाचार-पत्र निकालने का प्रथम प्रयास
1780 ई. जेम्स ऑगस्टस हिक्की द्वारा बंगाल गजट का प्रकाशन
1816 ई. गंगाधर भट्टाचार्य द्वारा प्रथम भारतीय अंग्रेज़ी समाचार-पत्र
1818 ई. समाचार दर्पण एवं दिग्दर्शन का प्रकाशन
1821–22 ई. राजा राममोहन राय के सुधारवादी समाचार-पत्रों का प्रकाशन
1826 ई. उदन्त मार्तण्ड – प्रथम हिन्दी समाचार-पत्र
1851 ई. रस्त गोफ्तार – प्रथम प्रमुख गुजराती सुधारवादी समाचार-पत्र
1868 ई. मद्रास मेल – भारत का प्रथम सांध्य समाचार-पत्र
1881 ई. बाल गंगाधर तिलक द्वारा केसरी एवं मराठा का प्रकाशन

राष्ट्रवादी पत्रकारिता की दिशा में एक नया चरण

➣ उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक भारतीय समाचार-पत्र केवल सामाजिक सुधार तक सीमित नहीं रहे। धीरे-धीरे उनमें राष्ट्रीय चेतना, राजनीतिक जागरूकता तथा जनमत निर्माण के स्वर भी दिखाई देने लगे।

➣ प्रारंभिक दौर के समाचार-पत्र, जो मुख्यतः सती प्रथा, विधवा पुनर्विवाह, महिला शिक्षा तथा अन्य सामाजिक-धार्मिक विषयों पर केंद्रित थे, अब ब्रिटिश शासन की नीतियों की आलोचना, स्वशासन की माँग तथा भारतीयों के राजनीतिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता देने लगे।

➣ इस परिवर्तन के पीछे कई कारण उत्तरदायी थे। अंग्रेज़ी शिक्षा के प्रसार से शिक्षित मध्यम वर्ग का उदय हुआ, 1857 के विद्रोह के बाद भारतीयों में ब्रिटिश शासन के वास्तविक स्वरूप के प्रति जागरूकता बढ़ी तथा यूरोप और अन्य देशों के राष्ट्रवादी एवं उदारवादी आंदोलनों का भी भारतीय समाज पर प्रभाव पड़ा।

➣ इसके साथ ही 1861 के इंडियन काउंसिल्स एक्ट तथा प्रशासनिक सुधारों ने भारतीयों में राजनीतिक भागीदारी की आकांक्षा को और अधिक मजबूत किया।

➣ इसी दौर में कई ऐसे समाचार-पत्र प्रकाशित हुए जिन्होंने आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन को वैचारिक आधार प्रदान किया।

➣ इनमें अमृत बाज़ार पत्रिका (1868, शिशिर कुमार घोष), द बंगाली (1862, गिरीशचंद्र घोष; बाद में सुरेंद्रनाथ बनर्जी के संपादन में प्रसिद्ध), केसरी तथा मराठा (1881, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक) तथा आगे चलकर यंग इंडिया एवं हरिजन (महात्मा गांधी) जैसे समाचार-पत्र विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

➣ इन समाचार-पत्रों ने ब्रिटिश प्रशासनिक नीतियों, विशेषकर आर्थिक शोषण और नस्लीय भेदभाव, की खुलकर आलोचना की। इन्होंने भारतीयों के लिए सिविल सेवा में समान अवसर, स्वशासन तथा प्रतिनिधित्व के अधिकार जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।

क्षेत्रीय भाषाओं में प्रकाशित होने के कारण ये समाचार-पत्र राष्ट्रीय विचारों को आम जनता तक पहुँचाने का प्रभावी माध्यम बने। यही राष्ट्रवादी पत्रकारिता आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885) की स्थापना के लिए वैचारिक भूमि तैयार करने में सहायक सिद्ध हुई।

➣ हालाँकि, राष्ट्रवादी विचारों के बढ़ते प्रभाव से चिंतित ब्रिटिश सरकार ने इन्हें नियंत्रित करने के लिए कई कठोर कानून भी लाई जिसमे 1878 का वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

केसरी एवं मराठा (1881)

1881 ई. में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने दो महत्वपूर्ण समाचार-पत्रों- केसरी (मराठी) तथा मराठा (अंग्रेज़ी) – का प्रकाशन प्रारम्भ किया।

➣ इन दोनों समाचार-पत्रों का उद्देश्य राष्ट्रीय चेतना का प्रसार करना, भारतीयों में राजनीतिक जागरूकता उत्पन्न करना तथा ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों का विरोध करना था।

केसरी मुख्य रूप से मराठी भाषी जनता को ध्यान में रखकर प्रकाशित किया जाता था, जबकि मराठा के माध्यम से अंग्रेज़ी शिक्षित वर्ग तक राष्ट्रवादी विचार पहुँचाए जाते थे।

➣ इन समाचार-पत्रों में स्वराज्य, स्वदेशी, राष्ट्रीय एकता तथा जन-जागरण से संबंधित लेख नियमित रूप से प्रकाशित किए जाते थे।

केसरी और मराठा ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक आधार प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन समाचार-पत्रों के माध्यम से लोकमान्य तिलक ने जनता को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संगठित किया और भारतीय पत्रकारिता को राष्ट्रीय आंदोलन का एक प्रभावशाली माध्यम बना दिया।

केसरी का प्रकाशन मराठी भाषा में तथा मराठा का प्रकाशन अंग्रेज़ी भाषा में किया जाता था। दोनों समाचार-पत्रों के संस्थापक लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक थे।

समाचार-पत्र (वर्ष) संस्थापक / प्रमुख संपादक संक्षिप्त विवरण
इंडियन मिरर (1861) देवेन्द्रनाथ ठाकुर (बाद में नरेन्द्रनाथ सेन) ब्राह्म समाज तथा सामाजिक-धार्मिक सुधारों एवं राष्ट्रीय चेतना के प्रचार का प्रमुख माध्यम।
द बंगाली (1862) गिरीशचंद्र घोष (बाद में सुरेंद्रनाथ बनर्जी) उदारवादी राष्ट्रवाद तथा भारतीय राजनीतिक अधिकारों का प्रमुख समर्थक समाचार-पत्र।
अमृत बाज़ार पत्रिका (1868) शिशिर कुमार घोष एवं मोतीलाल घोष राष्ट्रवादी पत्रकारिता का अग्रणी समाचार-पत्र; वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट (1878) से बचने हेतु अंग्रेज़ी में प्रकाशित किया गया।
द हिन्दू (1878) जी. सुब्रमण्यम अय्यर दक्षिण भारत में राष्ट्रवादी विचारों तथा भारतीय हितों का प्रमुख समर्थक समाचार-पत्र।
केसरी (1881) लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक मराठी भाषी जनता में स्वराज्य, स्वदेशी और राष्ट्रीय चेतना का प्रचार।
मराठा (1881) लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक अंग्रेज़ी शिक्षित वर्ग तक राष्ट्रवादी विचार पहुँचाने का प्रभावी माध्यम।
बॉम्बे क्रॉनिकल (1913) फिरोजशाह मेहता राष्ट्रीय आंदोलन तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विचारों का प्रमुख समर्थक।
यंग इंडिया (1919) महात्मा गांधी असहयोग, सत्याग्रह तथा स्वराज्य के विचारों के प्रचार का प्रमुख माध्यम।
नवजीवन (1919) महात्मा गांधी गुजराती भाषा के माध्यम से स्वदेशी, खादी एवं रचनात्मक कार्यक्रमों का प्रचार।
हरिजन (1933) महात्मा गांधी अस्पृश्यता उन्मूलन, सामाजिक समानता तथा रचनात्मक कार्यक्रमों के प्रचार का प्रमुख समाचार-पत्र।

ब्रिटिश भारत में प्रेस पर नियंत्रण एवं प्रेस कानून

➣ भारत में समाचार-पत्रों के विकास के साथ-साथ उनका प्रभाव भी निरंतर बढ़ने लगा। प्रारम्भिक समाचार-पत्र केवल व्यापार, प्रशासन और सामाजिक घटनाओं तक सीमित थे, किन्तु समय के साथ उन्होंने सरकारी नीतियों की आलोचना करना, जनमत तैयार करना तथा समाज में राजनीतिक चेतना फैलाना प्रारम्भ कर दिया।।

➣ इससे ब्रिटिश सरकार को यह अनुभव होने लगा कि स्वतंत्र प्रेस उसके औपनिवेशिक शासन के लिए चुनौती बन सकता है।

➣ ईस्ट इंडिया कम्पनी का मुख्य उद्देश्य भारत में अपना व्यापारिक और राजनीतिक प्रभुत्व बनाए रखना था। इसलिए वह नहीं चाहती थी कि समाचार-पत्रों के माध्यम से उसकी नीतियों, भ्रष्टाचार या प्रशासनिक कमियों की जानकारी जनता तक पहुँचे।।

➣ यही कारण था कि कम्पनी ने समय-समय पर प्रेस की स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए अनेक नियम और अधिनियम लागू किए।

➣ प्रारम्भ में ये प्रतिबंध मुख्यतः यूरोपीय समाचार-पत्रों पर लागू किए गए, लेकिन जैसे-जैसे भारतीय स्वामित्व वाले समाचार-पत्रों की संख्या बढ़ी और उनमें राष्ट्रीय चेतना के स्वर मुखर होने लगे, ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण और अधिक कठोर होता गया।।

➣ विशेष रूप से 1857 के विद्रोह के बाद तथा उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में प्रेस को नियंत्रित करना ब्रिटिश शासन की प्रमुख नीति बन गई।

ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य प्रेस को समाप्त करना नहीं था, बल्कि उसकी स्वतंत्रता को नियंत्रित करना था, ताकि सरकार के विरुद्ध जनमत तैयार न हो सके और औपनिवेशिक शासन सुरक्षित बना रहे।

प्रेस कानून संबंधित गवर्नर-जनरल / वायसराय संक्षिप्त विवरण
समाचार-पत्र पत्रेक्षण अधिनियम (1799 ई.) लॉर्ड वेलेजली पूर्व सेंसरशिप (Pre-Censorship) तथा प्रकाशन से पूर्व सरकारी अनुमति अनिवार्य।
अनुज्ञप्ति नियम (1823 ई.) जॉन एडम्स सरकारी लाइसेंस के बिना मुद्रणालय एवं समाचार-पत्र का संचालन प्रतिबंधित।
मेटकॉफ प्रेस अधिनियम (1835 ई.) सर चार्ल्स मेटकॉफ 1823 के अनुज्ञप्ति नियम समाप्त; प्रेस को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता
अनुज्ञप्ति अधिनियम (Licensing Act, 1857 ई.) लॉर्ड कैनिंग 1857 के विद्रोह के दौरान प्रेस पर नियंत्रण हेतु लाइसेंस प्रणाली पुनः लागू।
प्रेस एवं पुस्तकों का पंजीकरण अधिनियम (1867 ई.) लॉर्ड जॉन लॉरेंस मुद्रणालयों, समाचार-पत्रों तथा पुस्तकों के पंजीकरण की व्यवस्था।
वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट (1878 ई.) लॉर्ड लिटन भारतीय भाषाओं के समाचार-पत्रों पर कठोर नियंत्रण; “गैगिंग एक्ट” के नाम से प्रसिद्ध।
समाचार-पत्र (अपराध उद्दीपन) अधिनियम (1908 ई.) लॉर्ड मिंटो द्वितीय क्रांतिकारी एवं हिंसा भड़काने वाली सामग्री प्रकाशित करने वाले समाचार-पत्रों पर कार्रवाई।
भारतीय प्रेस अधिनियम (1910 ई.) लॉर्ड मिंटो द्वितीय जमानत राशि, प्रेस की जब्ती तथा प्रतिबंध की व्यापक सरकारी शक्तियाँ।
भारतीय प्रेस (आपात शक्तियाँ) अधिनियम (1931 ई.) लॉर्ड इरविन सविनय अवज्ञा आंदोलन एवं राष्ट्रवादी प्रचार पर कठोर नियंत्रण।

➣ इन अधिनियमों का उद्देश्य, प्रभाव तथा विशेष प्रावधान एक-दूसरे से भिन्न थे। कुछ कानूनों के माध्यम से सरकार ने समाचार-पत्रों पर पूर्व सेंसरशिप लागू की, जबकि कुछ के द्वारा मुद्रकों एवं प्रकाशकों पर लाइसेंस, जमानत राशि तथा दंडात्मक कार्यवाही जैसी व्यवस्थाएँ लागू की गईं। ।

समाचार-पत्र पत्रेक्षण अधिनियम, 1799 ई.

➣ भारत में प्रेस पर औपचारिक सरकारी नियंत्रण की शुरुआत 1799 ई. में हुई, जब तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड वेलेज़ली ने समाचार-पत्र पत्रेक्षण अधिनियम लागू किया। यह भारतीय इतिहास में प्रेस को नियंत्रित करने वाला पहला औपचारिक कानून माना जाता है।

➣ उस समय ब्रिटेन और फ्रांस के बीच नेपोलियन युद्ध चल रहे थे तथा ब्रिटिश सरकार को आशंका थी कि समाचार-पत्रों के माध्यम से ऐसी सूचनाएँ प्रकाशित हो सकती हैं, जो उसकी सैन्य एवं राजनीतिक स्थिति को प्रभावित करें।

➣ विशेष रूप से यह डर था कि फ्रांसीसी गुप्तचर भारत में प्रकाशित समाचार-पत्रों से सैन्य गतिविधियों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं, क्योंकि उस समय भारत में फ्रांसीसी उपस्थिति (विशेषकर पांडिचेरी) एक चिंता का विषय बनी हुई थी।

➣ इसी पृष्ठभूमि में वेलेज़ली ने प्रेस पर कठोर नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से यह अधिनियम लागू किया। इसका मुख्य उद्देश्य सरकारी नीतियों, सैन्य गतिविधियों तथा प्रशासन से संबंधित संवेदनशील सूचनाओं के प्रकाशन को नियंत्रित करना था।

अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ

➣ ➣ इस अधिनियम के अंतर्गत पूर्व-सेंसरशिप की व्यवस्था लागू की गई, अर्थात् किसी भी सामग्री को प्रकाशित करने से पहले सरकारी अनुमति लेना अनिवार्य था।

➣ ➣ प्रत्येक समाचार-पत्र को अपने मुद्रक (Printer), संपादक (Editor) तथा स्वामी (Proprietor) का नाम सरकार को अनिवार्य रूप से बताना होता था।

➣ ➣ बिना सरकारी अनुमति प्रकाशित सामग्री को ज़ब्त किया जा सकता था तथा संबंधित समाचार-पत्र को बंद भी किया जा सकता था।

➣ ➣ नियमों का उल्लंघन करने वाले प्रकाशकों को भारत से निर्वासित किए जाने का भी प्रावधान था।

➣ ➣ यह अधिनियम मुख्यतः सैन्य सुरक्षा तथा युद्धकालीन आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाया गया था, न कि सामान्य प्रशासनिक नियंत्रण हेतु।

➣ वेलेज़ली की विस्तारवादी नीति (सहायक संधि व्यवस्था) के दौर में अंग्रेज़ भारत में अपनी स्थिति को लेकर अत्यंत सतर्क थे। कलकत्ता में उस समय अंग्रेज़ों द्वारा संचालित कुछ समाचार-पत्र सक्रिय थे, जिनमें प्रकाशित सामग्री पर वेलेज़ली को नियंत्रण की आवश्यकता महसूस हुई।

➣ यही कारण है कि इस अधिनियम को भारत में प्रेस-नियंत्रण की परंपरा की शुरुआत माना जाता है, जो आगे चलकर 1823, 1835, 1857 तथा 1878 के अधिनियमों के रूप में विकसित होती रही।

➣ युद्ध की समाप्ति के पश्चात इस अधिनियम की कठोरता में कुछ ढील दी गई, परंतु प्रेस पर सरकारी निगरानी की मूल भावना आगे के वर्षों में भी बनी रही, जब तक कि 1835 में मेटकॉफ

1799 ई. का समाचार-पत्र पत्रेक्षण अधिनियम लॉर्ड वेलेजली द्वारा लागू किया गया था। यह भारत में प्रेस पर सरकारी सेंसरशिप लागू करने का पहला प्रमुख प्रयास था।

1818 ई. में लॉर्ड हेस्टिंग्स ने 1799 ई. में लागू पूर्व सेंसरशिप की व्यवस्था समाप्त कर प्रेस को पहले की अपेक्षा अधिक स्वतंत्रता प्रदान की। ध्यान रहे यह कोई नया प्रेस कानून नहीं था, बल्कि सरकारी प्रेस नीति में किया गया परिवर्तन था।

अनुज्ञप्ति नियम (1823 ई.)

1818 ई. में लॉर्ड हेस्टिंग्स द्वारा प्रेस पर लगाए गए पूर्व-नियंत्रणको समाप्त करने के बाद भारतीय प्रेस को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता प्राप्त हुई। इसके परिणामस्वरूप अनेक नए समाचार-पत्र प्रकाशित होने लगे और सरकारी नीतियों की खुलकर आलोचना भी होने लगी।

➣ ब्रिटिश सरकार को यह स्थिति स्वीकार्य नहीं थी। इसलिए 1823 ई. में कार्यवाहक गवर्नर-जनरल जॉन एडम्स ने प्रेस पर पुनः कठोर नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से अनुज्ञप्ति नियम लागू किए।

➣ इन नियमों के अनुसार सरकारी लाइसेंस के बिना किसी भी मुद्रणालय अथवा समाचार-पत्र का संचालन अवैध घोषित कर दिया गया।

➣ इन नियमों का सबसे अधिक प्रभाव भारतीय स्वामित्व वाले समाचार-पत्रों पर पड़ा। सरकार ने लाइसेंस देने, रद्द करने तथा नियमों का उल्लंघन करने वाले समाचार-पत्रों के विरुद्ध कार्रवाई करने का अधिकार अपने हाथ में रख लिया।

अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ

➣ ➣ मुद्रणालय स्थापित करने के लिए गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल से पूर्व-लाइसेंस लेना अनिवार्य कर दिया गया।

➣ ➣ सरकार को यह अधिकार प्राप्त था कि वह बिना कोई कारण बताए किसी भी समय लाइसेंस रद्द कर सकती थी।

➣ ➣ लाइसेंस के नियमों का उल्लंघन करने पर मुद्रणालय की ज़ब्ती तथा संचालक को दंड देने का प्रावधान था।

➣ ➣ इन नियमों का सर्वाधिक प्रभावशाली उदाहरण कलकत्ता जर्नल के संपादक जेम्स सिल्क बकिंघम का मामला था, जिनका लाइसेंस रद्द कर उन्हें भारत से निष्कासित कर दिया गया।

➣ ➣ इन नियमों का सबसे मुखर विरोध राजा राममोहन राय ने किया, जिन्होंने इसके विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में एक स्मरण-पत्र प्रस्तुत किया तथा बाद में इंग्लैंड की प्रिवी काउंसिल को भी याचिका भेजी।

ऐतिहासिक महत्व

➣ 1823 के अनुज्ञप्ति नियमों को भारतीय प्रेस-इतिहास का सर्वाधिक दमनकारी चरण माना जाता है, क्योंकि इसने भारतीय संपादकों तथा प्रकाशकों की आवाज़ को प्रभावी ढंग से दबा दिया।

➣ इन कठोर नियमों का सबसे तीव्र विरोध राजा राममोहन राय ने किया। उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता को नागरिक अधिकारों के लिए आवश्यक बताया और विरोध स्वरूप अपना प्रसिद्ध फ़ारसी समाचार-पत्र ‘मिरात-उल-अखबार’ बंद कर दिया।

राजा राममोहन राय द्वारा किया गया विरोध भारत में प्रेस-स्वतंत्रता के लिए पहला संगठित संघर्ष माना जाता है, जिसने आगे चलकर 1835 में मेटकॉफ द्वारा इन नियमों को समाप्त किए जाने की पृष्ठभूमि तैयार की।

मेटकॉफ प्रेस अधिनियम (1835 ई.)

1823 ई. के अनुज्ञप्ति नियमों के कारण भारतीय प्रेस पर कड़ा सरकारी नियंत्रण स्थापित हो गया था। किसी भी समाचार-पत्र या मुद्रणालय को संचालित करने के लिए सरकार से पूर्व अनुमति (लाइसेंस) लेना अनिवार्य था। इससे भारतीय पत्रकारिता का विकास बाधित हो गया और अनेक समाचार-पत्र बंद हो गए।

➣ ऐसी परिस्थितियों में 1835 ई. में कार्यवाहक गवर्नर-जनरल सर चार्ल्स मेटकॉफ ने भारतीय प्रेस नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। उन्होंने प्रेस पर लगाए गए अनावश्यक प्रतिबंधों को हटाकर समाचार-पत्रों को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता प्रदान की।

इस उदार प्रेस नीति के कारण उन्हें भारतीय प्रेस का मुक्तिदाता कहा जाता है तथा 1835 के मेटकॉफ प्रेस अधिनियम को भारतीय प्रेस का मैग्नाकार्टा भी कहा जाता है।

➣ मेटकॉफ का विश्वास था कि स्वतंत्र प्रेस किसी भी सुशासन का महत्वपूर्ण आधार है। इसलिए उन्होंने 1823 ई. के कठोर अनुज्ञप्ति नियमों को समाप्त कर दिया और लाइसेंस प्रणाली के स्थान पर केवल घोषणा-पत्र की व्यवस्था लागू की।

➣ इसके अनुसार मुद्रक एवं प्रकाशक को अपने मुद्रणालय तथा प्रकाशन का विवरण स्थानीय प्रशासन के समक्ष दर्ज कराना आवश्यक था।

➣ इस नई व्यवस्था से समाचार-पत्रों का प्रकाशन पहले की तुलना में काफी सरल हो गया। परिणामस्वरूप भारत में नए समाचार-पत्रों की संख्या तेजी से बढ़ी तथा भारतीय पत्रकारिता को विकास का नया अवसर प्राप्त हुआ।

प्रमुख प्रावधान

  • 1823 ई. के अनुज्ञप्ति नियम समाप्त कर दिए गए।
  • समाचार-पत्र प्रकाशित करने तथा मुद्रणालय स्थापित करने के लिए सरकारी लाइसेंस की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई।
  • मुद्रक एवं प्रकाशक को अपने मुद्रणालय तथा प्रकाशन का विवरण घोषणा-पत्र के माध्यम से सरकार के समक्ष प्रस्तुत करना आवश्यक था।
  • प्रेस पर प्रत्यक्ष सरकारी नियंत्रण कम किया गया तथा समाचार-पत्रों को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्र वातावरण प्रदान किया गया।
  • सरकार ने लाइसेंस प्रणाली समाप्त कर केवल प्रशासनिक अभिलेख बनाए रखने की व्यवस्था अपनाई।

मेटकॉफ प्रेस अधिनियम, 1835 भारतीय प्रेस के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ। इस अधिनियम के लागू होने के बाद भारत में समाचार-पत्रों की संख्या तेजी से बढ़ी, पत्रकारों का उत्साह बढ़ा तथा भारतीय समाज में राजनीतिक जागरूकता और जनमत निर्माण को नया बल मिला।

➣ मेटकॉफ की इस नीति ने भारतीय बुद्धिजीवियों तथा समाचार-पत्र संपादकों को खुलकर अपने विचार व्यक्त करने का अवसर दिया, जिससे राष्ट्रीय चेतना के विकास में भी अप्रत्यक्ष रूप से सहायता मिली।

➣ हालाँकि यह स्वतंत्रता अधिक समय तक नहीं टिक सकी, क्योंकि 1857 के विद्रोह के पश्चात लॉर्ड कैनिंग ने पुनः अनुज्ञप्ति अधिनियम, 1857 के माध्यम से प्रेस पर नियंत्रण लगा दिया।

अनुज्ञप्ति अधिनियम (1857 ई.)

1857 ई. के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम ने ब्रिटिश शासन की नींव को हिला दिया। इस विद्रोह के दौरान अनेक समाचार-पत्रों, पर्चों तथा अन्य मुद्रित सामग्री के माध्यम से ब्रिटिश-विरोधी विचारों का व्यापक प्रचार हुआ।

हिंदी, उर्दू तथा फ़ारसी में प्रकाशित होने वाले पत्र-पत्रिकाओं ने जनता के बीच विद्रोह की भावना को और तीव्र करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे कंपनी सरकार बुरी तरह चिंतित हो उठी।

➣ विद्रोह के फैलते प्रभाव को देखते हुए अंग्रेज़ सरकार ने यह अनुभव किया कि यदि प्रेस पर प्रभावी नियंत्रण नहीं रखा गया, तो जनमत उसके विरुद्ध और अधिक संगठित हो सकता है। इसलिए सरकार ने प्रेस को नियंत्रित करने के लिए शीघ्रता से एक कठोर कानून लागू करने का निर्णय लिया।

➣ इसी पृष्ठभूमि में तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड कैनिंग ने 13 जून, 1857 ई. को अनुज्ञप्ति अधिनियम1857 लागू किया। इसका उद्देश्य मुद्रणालयों तथा समाचार-पत्रों को सरकारी नियंत्रण में लाना और बिना सरकारी अनुमति किसी भी प्रकार के प्रकाशन को रोकना था।

➣ यह एक अस्थायी एवं आपातकालीन कानून था, जिसे विशेष रूप से 1857 के विद्रोह की परिस्थितियों से निपटने के लिए लागू किया गया था।

अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ

➣ ➣ यह अधिनियम 13 जून, 1857 को पारित किया गया, अर्थात् विद्रोह अपने चरम पर था।

➣ ➣ इसके अंतर्गत प्रत्येक मुद्रणालय (प्रिंटिंग प्रेस) के लिए सरकार से लाइसेंस लेना अनिवार्य कर दिया गया।

➣ ➣ सरकार को यह अधिकार प्राप्त था कि वह किसी भी समय, बिना कारण बताए, किसी भी मुद्रणालय अथवा समाचार-पत्र का लाइसेंस रद्द कर सकती थी।

➣ ➣ इस अधिनियम का प्रभाव भारतीय भाषाओं तथा अंग्रेज़ी – दोनों प्रकार के समाचार-पत्रों पर समान रूप से पड़ता था, अर्थात् यह पहला ऐसा कानून था जिसने अंग्रेज़ी प्रेस को भी नियंत्रण के दायरे में रखा।

➣ ➣ बिना लाइसेंस के मुद्रणालय चलाना या प्रकाशन करना दंडनीय अपराध घोषित किया गया।

➣ ➣ यह अधिनियम मूलतः एक आपातकालीन एवं अस्थायी उपाय था, जिसे विद्रोह की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए लागू किया गया था।

➣ इस अधिनियम के माध्यम से सरकार का मुख्य लक्ष्य विद्रोह से संबंधित समाचारों, अफवाहों तथा ब्रिटिश-विरोधी सामग्री के प्रसार को रोकना था। सरकार को आशंका थी कि यदि प्रेस पर अंकुश नहीं लगाया गया तो विद्रोह की चिंगारी अन्य क्षेत्रों में भी फैल सकती है।

➣ चूँकि यह अधिनियम मूलतः विद्रोह की आपातकालीन परिस्थिति में लाया गया था, इसलिए विद्रोह के दबने के पश्चात 1858 ई. में इसे निरस्त कर दिया गया। इसके पश्चात प्रेस-नियंत्रण से संबंधित अगला महत्वपूर्ण कानून 1867 ई. में प्रेस एवं पुस्तक पंजीकरण अधिनियम के रूप में आया, जो नियंत्रण की अपेक्षा पंजीकरण पर केंद्रित था।

1857 से 1867 के बीच ब्रिटिश प्रेस नीति में परिवर्तन

1857 के विद्रोह ने ब्रिटिश सरकार को यह अनुभव करा दिया कि समाचार-पत्र जनता में राजनीतिक चेतना और सरकार-विरोधी विचारों के प्रसार का प्रभावशाली माध्यम बन सकते हैं। इसलिए विद्रोह के बाद सरकार की प्रेस नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देने लगा।

➣ अब सरकार केवल समय-समय पर प्रेस पर प्रतिबंध लगाने तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने मुद्रणालयों के पंजीकरण, मुद्रकों एवं प्रकाशकों की पहचान, घोषणा-पत्र तथा प्रत्येक प्रकाशन का सरकारी अभिलेख तैयार करने जैसी स्थायी प्रशासनिक व्यवस्थाएँ विकसित कीं।

➣ इसी नीति के परिणामस्वरूप 1867 ई. में प्रेस एवं पुस्तकों का पंजीकरण अधिनियम लागू किया गया, जिसने प्रेस की प्रशासनिक निगरानी के लिए एक संगठित कानूनी ढाँचा प्रदान किया।

➣ बाद के वर्षों में ब्रिटिश सरकार ने इसी व्यवस्था का उपयोग राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों पर अधिक प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने के लिए किया।

➣ यही प्रशासनिक ढाँचा आगे चलकर वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट, 1878 जैसे दमनकारी कानूनों का आधार बना, जिसके माध्यम से भारतीय भाषाओं के राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया।

1857 के बाद ब्रिटिश प्रेस नीति का उद्देश्य केवल प्रत्यक्ष सेंसरशिप नहीं रहा, बल्कि पंजीकरण, प्रशासनिक निगरानी और कानूनी नियंत्रण के माध्यम से प्रेस पर स्थायी नियंत्रण स्थापित करना था।

प्रेस एवं पुस्तकों का पंजीकरण अधिनियम (1867)

1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार ने यह अनुभव किया कि केवल अस्थायी प्रेस कानूनों के माध्यम से समाचार-पत्रों पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखना संभव नहीं है।

➣ इसलिए प्रेस एवं प्रकाशनों का व्यवस्थित अभिलेख तैयार करने तथा उनकी प्रशासनिक निगरानी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से 1867 ई. में प्रेस एवं पुस्तकों का पंजीकरण अधिनियम लागू किया गया।

➣ यह अधिनियम तत्कालीन वायसराय लॉर्ड जॉन लॉरेंस के शासनकाल में पारित हुआ। इसका उद्देश्य प्रत्यक्ष सेंसरशिप लागू करना नहीं था, बल्कि मुद्रणालयों, समाचार-पत्रों तथा पुस्तकों का आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार करना और प्रत्येक प्रकाशन की जिम्मेदारी निश्चित करना था।

➣ इस अधिनियम के माध्यम से सरकार प्रत्येक मुद्रक, प्रकाशक तथा मुद्रणालय की पहचान सुनिश्चित करना चाहती थी, ताकि आवश्यकता पड़ने पर किसी भी प्रकाशित सामग्री के लिए उत्तरदायी व्यक्ति की पहचान आसानी से की जा सके।

➣ बाद के वर्षों में ब्रिटिश सरकार ने इसी प्रशासनिक व्यवस्था का उपयोग राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों पर निगरानी रखने और उनके विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए भी किया।

प्रमुख प्रावधान

  • प्रत्येक मुद्रणालय का पंजीकरण अनिवार्य किया गया।
  • समाचार-पत्र प्रारम्भ करने से पूर्व मुद्रक एवं प्रकाशक को जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष घोषणा-पत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य था।
  • प्रत्येक समाचार-पत्र पर मुद्रक, प्रकाशक, मुद्रण स्थल तथा प्रकाशन स्थल का स्पष्ट उल्लेख करना अनिवार्य किया गया।
  • प्रकाशित प्रत्येक पुस्तक तथा समाचार-पत्र की एक प्रति सरकार को उपलब्ध कराना अनिवार्य किया गया।
  • मुद्रकों, प्रकाशकों तथा प्रकाशनों का आधिकारिक अभिलेख तैयार करने की व्यवस्था की गई।

➣ यह अधिनियम प्रत्यक्ष रूप से प्रेस की स्वतंत्रता समाप्त करने के लिए नहीं बनाया गया था, बल्कि प्रकाशनों की पहचान, पंजीकरण, अभिलेखन तथा प्रशासनिक निगरानी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लागू किया गया था।

➣ यद्यपि यह कानून अपेक्षाकृत उदार माना जाता है, फिर भी बाद के वर्षों में ब्रिटिश सरकार ने इसी व्यवस्था का उपयोग राष्ट्रवादी प्रेस पर प्रभावी नियंत्रण रखने के लिए किया।

वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट, 1878 ई.

➣ उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक भारतीय भाषाओं में प्रकाशित समाचार-पत्रों का प्रभाव निरंतर बढ़ने लगा था। ये समाचार-पत्र ब्रिटिश शासन की नीतियों की आलोचना करने के साथ-साथ जनता में राष्ट्रीय चेतना और राजनीतिक जागरूकता भी उत्पन्न कर रहे थे।

विशेष रूप से 1876–78 के भीषण अकाल, दिल्ली दरबार (1877) तथा द्वितीय अफ़ग़ान युद्ध के दौरान सरकार की नीतियों की तीखी आलोचना की गई। इससे ब्रिटिश प्रशासन चिंतित हो उठा।

➣ इन्हीं परिस्थितियों में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिटन ने 1878 ई. में वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट लागू किया।

➣ इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य भारतीय भाषाओं में प्रकाशित उन समाचार-पत्रों को नियंत्रित करना था, जो सरकार की आलोचना कर रहे थे और जनता में असंतोष फैला रहे थे।

➣ यह अधिनियम केवल देशी (भारतीय) भाषाओं में प्रकाशित समाचार-पत्रों पर लागू होता था। अंग्रेज़ी भाषा के समाचार-पत्रों को इसके दायरे से बाहर रखा गया, जिससे स्पष्ट होता है कि इसका लक्ष्य विशेष रूप से भारतीय प्रेस था।

प्रमुख प्रावधान

  • जिला मजिस्ट्रेट को किसी भी भारतीय भाषा के समाचार-पत्र के विरुद्ध बिना न्यायिक प्रक्रिया के कार्रवाई करने का व्यापक अधिकार दिया गया।
  • समाचार-पत्र के मुद्रक अथवा प्रकाशक से यह प्रतिज्ञा (Bond) ली जा सकती थी कि वह सरकार-विरोधी या उत्तेजक सामग्री प्रकाशित नहीं करेगा। आवश्यकता पड़ने पर उससे सुरक्षा राशि (Security Deposit) भी जमा कराई जा सकती थी।
  • यदि किसी समाचार-पत्र में सरकार-विरोधी, राजद्रोहात्मक अथवा उत्तेजक सामग्री प्रकाशित होती, तो सरकार उसकी सुरक्षा राशि जब्त कर सकती थी।
  • सरकार को बिना न्यायालय की अनुमति मुद्रणालय, मुद्रण मशीनें, प्रतियाँ तथा अन्य मुद्रित सामग्री जब्त करने का अधिकार प्राप्त था।
  • सरकारी आदेश के विरुद्ध सामान्य न्यायालय में अपील का अधिकार नहीं था। केवल सरकार ही अपने निर्णय पर पुनर्विचार कर सकती थी।
  • यह अधिनियम केवल भारतीय (देशी) भाषाओं के समाचार-पत्रों पर लागू होता था, जबकि अंग्रेज़ी भाषा के समाचार-पत्रों को इसके दायरे से बाहर रखा गया था।

इसे “मुंह बंद करने वाला अधिनियम भी कहा जाता है।
अमृत बाजार पत्रिका ने इस कानून से बचने के लिए अपना प्रकाशन बांग्ला से अंग्रेज़ी में परिवर्तित कर दिया था।

सोम प्रकाश को क्यों बनाया गया लक्ष्य?

सोम प्रकाश उन्नीसवीं शताब्दी के सबसे प्रभावशाली बंगाली समाचार-पत्रों में से एक था। इसका संपादन द्वारकानाथ विद्याभूषण करते थे।

➣ यह समाचार-पत्र केवल समाचार प्रकाशित करने तक सीमित नहीं था, बल्कि ब्रिटिश प्रशासन की नीतियों की तथ्यपूर्ण और निर्भीक आलोचना भी करता था।

1876–78 के भीषण अकाल के दौरान जब दक्षिण भारत के अनेक क्षेत्रों में लाखों लोग भूख और महामारी से पीड़ित थे, तब सोम प्रकाश ने सरकार की राहत व्यवस्था की कठोर आलोचना की।

➣ समाचार-पत्र का मत था कि ब्रिटिश सरकार ने अकाल-पीड़ित जनता की सहायता करने के बजाय अपने आर्थिक हितों को अधिक महत्व दिया तथा पर्याप्त राहत कार्य नहीं किए।

➣ इसी अवधि में 1 जनवरी 1877 ई. को दिल्ली दरबार का भव्य आयोजन किया गया, जिसमें महारानी विक्टोरिया को भारत की सम्राज्ञी घोषित किया गया।

➣ एक ओर देश के अनेक भाग अकाल से जूझ रहे थे, वहीं दूसरी ओर इस भव्य समारोह पर भारी सरकारी व्यय किया गया। सोम प्रकाश सहित अनेक भारतीय भाषा के समाचार-पत्रों ने इसे जनता की पीड़ा के प्रति सरकार की असंवेदनशीलता का प्रतीक बताया।

सोम प्रकाश ने केवल अकाल और दिल्ली दरबार की ही आलोचना नहीं की, बल्कि भूमि-राजस्व नीति, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, अधिकारियों की मनमानी, भारतीयों के साथ होने वाले भेदभाव तथा औपनिवेशिक आर्थिक शोषण जैसे विषयों पर भी लगातार लेख प्रकाशित किए। इन लेखों के कारण भारतीय समाज में राजनीतिक चेतना और सरकार के प्रति असंतोष बढ़ने लगा।

➣ इसके अतिरिक्त समाचार-पत्र ने लॉर्ड लिटन की अनेक नीतियों, जैसे अफगान युद्ध पर अत्यधिक सरकारी व्यय, भारतीय जनता पर बढ़ते आर्थिक बोझ तथा प्रशासन की दमनकारी कार्यप्रणाली की भी आलोचना की।

➣ इससे ब्रिटिश सरकार को यह भय होने लगा कि भारतीय भाषाओं के समाचार-पत्र जनता को सरकार के विरुद्ध संगठित कर सकते हैं। इन्हीं परिस्थितियों में 1878 ई. में वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट लागू किया गया।

➣ इतिहासकारों का मत है कि इसका उद्देश्य विशेष रूप से सोम प्रकाश, अमृत बाज़ार पत्रिका तथा अन्य प्रभावशाली भारतीय भाषा के समाचार-पत्रों की आलोचनात्मक आवाज़ को नियंत्रित करना था।

अमृत बाजार पत्रिका की ऐतिहासिक रणनीति

➣ जहाँ सोम प्रकाश जैसे भारतीय भाषा के समाचार-पत्र वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट के प्रत्यक्ष निशाने पर थे, वहीं अमृत बाजार पत्रिका के संपादकों ने इस अधिनियम से बचने के लिए एक अद्भुत रणनीति अपनाई।

➣ उस समय यह समाचार-पत्र मुख्यतः बांग्ला भाषा में प्रकाशित होता था, इसलिए इसके विरुद्ध भी सरकारी कार्रवाई की आशंका थी।

➣ अमृत बाजार पत्रिका के संस्थापक शिशिर कुमार घोष और मोतीलाल घोष ने अधिनियम लागू होते ही अत्यंत सूझबूझ का परिचय देते हुए बहुत कम समय में पूरे समाचार-पत्र को अंग्रेज़ी भाषा में प्रकाशित करना प्रारम्भ कर दिया।

➣ चूँकि वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट (1878) केवल भारतीय भाषाओं के समाचार-पत्रों पर लागू होता था, इसलिए अंग्रेज़ी में परिवर्तित होते ही यह अधिनियम अमृत बाजार पत्रिका पर लागू नहीं रह गया।

➣ यह परिवर्तन केवल भाषा बदलने तक सीमित नहीं था, बल्कि ब्रिटिश सरकार के दमनकारी कानून का कानूनी और बौद्धिक उत्तर भी था। इसके बाद अमृत बाजार पत्रिका ने अंग्रेज़ी में प्रकाशित होते हुए भी राष्ट्रवादी विचारों, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, आर्थिक शोषण तथा औपनिवेशिक नीतियों की आलोचना जारी रखी।

➣ भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में यह घटना प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपनाई गई सबसे सफल और ऐतिहासिक रणनीतियों में गिनी जाती है। यही कारण है कि अमृत बाजार पत्रिका को भारतीय राष्ट्रीय प्रेस के इतिहास में एक साहसी और दूरदर्शी समाचार-पत्र के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है।

वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट की आलोचना

वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट लागू होते ही भारतीय बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, समाज-सुधारकों तथा अनेक सार्वजनिक नेताओं ने इसकी तीखी आलोचना की।

➣ उनका मत था कि यह अधिनियम प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है। सरकार का उद्देश्य निष्पक्ष पत्रकारिता को प्रोत्साहित करना नहीं, बल्कि अपनी आलोचना करने वाले भारतीय भाषा के समाचार-पत्रों की आवाज़ दबाना था।

➣ इस अधिनियम की सबसे बड़ी आलोचना इसका भेदभावपूर्ण स्वरूप था। जहाँ बांग्ला, हिन्दी, उर्दू, मराठी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के समाचार-पत्रों पर कठोर प्रतिबंध लगाए गए,

➣ वहीं अंग्रेज़ी भाषा के समाचार-पत्रों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया। इससे स्पष्ट था कि ब्रिटिश सरकार भारतीय जनता तक पहुँचने वाली आलोचनात्मक आवाज़ों को नियंत्रित करना चाहती थी, जबकि अंग्रेज़ी प्रेस को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता प्राप्त थी।

➣ अधिनियम के अंतर्गत जिला मजिस्ट्रेट को बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया के समाचार-पत्र को चेतावनी देने, जमानत जब्त करने, मुद्रण सामग्री जब्त करने तथा प्रकाशन बंद कराने का अधिकार प्राप्त था। इन प्रावधानों ने प्रेस की स्वतंत्रता को गंभीर रूप से प्रभावित किया और पत्रकारों में भय का वातावरण उत्पन्न कर दिया।

भारतीय राष्ट्रीय नेताओं ने इसे ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति का प्रतीक माना। इसी कारण इतिहास में यह अधिनियम मुंह बंद करने वाला अधिनियम के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ। इसके विरोध ने भारतीय पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को प्रेस की स्वतंत्रता के पक्ष में और अधिक संगठित किया।

वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट का अंत

1880 ई. में लॉर्ड लिटन के स्थान पर लॉर्ड रिपन भारत के वायसराय बने। लॉर्ड रिपन को ब्रिटिश भारत के सबसे उदार प्रशासकों में गिना जाता है।

➣ उनका मानना था कि प्रेस पर अत्यधिक नियंत्रण उचित नहीं है और जनता को अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए।

भारतीय नेताओं, पत्रकारों तथा शिक्षित वर्ग द्वारा लगातार किए गए विरोध के साथ-साथ इस अधिनियम की व्यापक आलोचना को देखते हुए लॉर्ड रिपन ने इसकी समीक्षा कराई।

➣ अंततः 1882 ई. में वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट को निरस्त (Repeal) कर दिया गया। इसके साथ ही भारतीय भाषाओं के समाचार-पत्रों पर लगाए गए विशेष प्रतिबंध समाप्त हो गए।

➣ इस अधिनियम के निरस्त होने के बाद भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्र वातावरण प्राप्त हुआ। इससे राष्ट्रीय चेतना, राजनीतिक जागरूकता तथा स्वतंत्रता आन्दोलन को नई गति मिली और भारतीय प्रेस राष्ट्रवादी विचारों के प्रसार का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरा।

लॉर्ड लिटन ने 1878 ई. में वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट लागू किया, जबकि लॉर्ड रिपन ने 1882 ई. में इसे निरस्त कर भारतीय भाषाओं के समाचार-पत्रों को पुनः अपेक्षाकृत स्वतंत्रता प्रदान की।

समाचार-पत्र (अपराध उद्दीपन) अधिनियम, 1908 ई.
(Newspapers (Incitement to Offences) Act)

बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में भारत में राष्ट्रवादी आन्दोलन और क्रांतिकारी गतिविधियों में तीव्र वृद्धि होने लगी। इस समय अनेक भारतीय समाचार-पत्र केवल समाचार प्रकाशित करने तक सीमित नहीं थे,

➣ बल्कि वे स्वदेशी आन्दोलन, राष्ट्रीय चेतना तथा ब्रिटिश शासन के विरोध के विचारों का भी व्यापक प्रचार-प्रसार कर रहे थे। इससे भारतीय जनता में राजनीतिक जागरूकता और स्वतंत्रता की भावना लगातार बढ़ रही थी।

➣ विशेष रूप से बंगाल विभाजन (1905 ई.) के बाद प्रारम्भ हुए स्वदेशी एवं बहिष्कार आन्दोलन ने पूरे देश में राष्ट्रीय भावना को नई ऊर्जा प्रदान की।

➣ इसी अवधि में युगांतर, संध्या, वंदे मातरम्, केसरी तथा अन्य राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों ने ब्रिटिश सरकार की नीतियों की तीखी आलोचना की और जनता को विदेशी शासन के विरुद्ध संगठित होने के लिए प्रेरित किया।

➣ दूसरी ओर अनुशीलन समिति, युगांतर दल तथा अन्य क्रांतिकारी संगठनों की गतिविधियाँ भी तेज़ हो रही थीं। मुज़फ्फरपुर बम कांड (1908 ई.) जैसी घटनाओं के बाद ब्रिटिश सरकार को यह विश्वास हो गया कि कुछ

➣ समाचार-पत्र अपने लेखों के माध्यम से युवाओं को क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

➣ इन परिस्थितियों में 1908 ई. में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड मिंटो द्वितीय के शासनकाल में समाचार-पत्र (अपराध उद्दीपन) अधिनियम लागू किया गया।

➣ इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य ऐसे समाचार-पत्रों, पुस्तिकाओं और अन्य प्रकाशनों पर नियंत्रण स्थापित करना था, जिनकी सामग्री को सरकार हिंसा, विद्रोह, राजद्रोह अथवा अपराध के लिए उकसाने वाली मानती थी।

➣ यह अधिनियम ब्रिटिश सरकार की उस व्यापक नीति का हिस्सा था, जिसके माध्यम से वह राष्ट्रवादी प्रेस और क्रांतिकारी साहित्य पर कठोर नियंत्रण स्थापित करना चाहती थी। परिणामस्वरूप अनेक समाचार-पत्रों के विरुद्ध मुकदमे चलाए गए, उनकी प्रतियाँ जब्त की गईं तथा संपादकों और प्रकाशकों को दंडित किया गया।

प्रमुख प्रावधान

  • सरकार को हिंसा, राजद्रोह अथवा अपराध के लिए उकसाने वाली सामग्री प्रकाशित करने वाले समाचार-पत्रों एवं अन्य प्रकाशनों को जब्त (Forfeit) करने का अधिकार दिया गया।
  • ऐसे समाचार-पत्रों, पुस्तिकाओं एवं पर्चों के मुद्रण, प्रकाशन, वितरण तथा प्रसार पर प्रतिबंध लगाया जा सकता था।
  • दोषी पाए जाने पर मुद्रक, प्रकाशक एवं संपादक के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई तथा दंड का प्रावधान किया गया।
  • सरकार को आपत्तिजनक सामग्री की प्रतियाँ जब्त करने तथा संबंधित प्रेस पर छापेमारी करने का अधिकार प्राप्त था।
  • इस अधिनियम का मुख्य लक्ष्य क्रांतिकारी साहित्य तथा राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों के माध्यम से फैलाए जा रहे सरकार-विरोधी प्रचार पर नियंत्रण स्थापित करना था।

1908 ई. का यह अधिनियम मुख्यतः बढ़ती क्रांतिकारी गतिविधियों और राष्ट्रवादी प्रेस पर नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से लागू किया गया था।


भारतीय प्रेस अधिनियम (1910 ई.)

समाचार-पत्र (अपराध उद्दीपन) अधिनियम, 1908 ई. लागू होने के बाद भी ब्रिटिश सरकार राष्ट्रवादी तथा क्रांतिकारी समाचार-पत्रों को प्रभावी रूप से नियंत्रित नहीं कर सकी।

स्वदेशी आन्दोलन, क्रांतिकारी गतिविधियों तथा राष्ट्रीय चेतना के निरंतर विस्तार के कारण अनेक समाचार-पत्र ब्रिटिश शासन की आलोचना करते रहे और स्वतंत्रता आन्दोलन के विचारों का व्यापक प्रचार-प्रसार करते रहे।

➣ विशेष रूप से बंगाल विभाजन (1905 ई.) के बाद राष्ट्रवादी प्रेस का प्रभाव लगातार बढ़ रहा था। केसरी, युगांतर, वंदे मातरम्, संध्या तथा अन्य समाचार-पत्रों ने ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों की खुलकर आलोचना की।

➣ सरकार का मानना था कि ऐसे समाचार-पत्र जनता में राष्ट्रीय भावना और ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष को बढ़ावा दे रहे हैं।

➣ इन्हीं परिस्थितियों में 1910 ई. में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड मिंटो द्वितीय के शासनकाल में भारतीय प्रेस अधिनियम (Indian Press Act) लागू किया गया।

➣ यह अधिनियम 1908 ई. के कानून की तुलना में अधिक कठोर था। इसका मुख्य उद्देश्य केवल समाचार-पत्रों की सामग्री पर नियंत्रण रखना नहीं, बल्कि राष्ट्रवादी प्रेस को आर्थिक तथा प्रशासनिक रूप से कमजोर करना भी था।

प्रमुख प्रावधान

  • समाचार-पत्रों एवं मुद्रणालयों (Printing Presses) से भारी जमानत राशि (Security Deposit) जमा कराना अनिवार्य किया गया।
  • यदि सरकार को किसी समाचार-पत्र की सामग्री राजद्रोह, हिंसा अथवा सरकार-विरोधी प्रतीत होती, तो उसकी जमानत राशि जब्त की जा सकती थी।
  • सरकार को समाचार-पत्रों, पुस्तकों, पर्चों तथा अन्य मुद्रित सामग्री को जब्त करने का व्यापक अधिकार प्रदान किया गया।
  • मुद्रक, प्रकाशक तथा संपादक के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई एवं दंड का प्रावधान किया गया।
  • आवश्यकता पड़ने पर सरकार किसी समाचार-पत्र का प्रकाशन बंद करा सकती थी तथा उसके प्रेस और मुद्रण उपकरणों को भी जब्त कर सकती थी।

➣ इस अधिनियम का सबसे अधिक प्रभाव छोटे राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों पर पड़ा। भारी जमानत राशि जमा करने की अनिवार्यता के कारण अनेक समाचार-पत्र आर्थिक संकट में आ गए और उनका प्रकाशन बंद हो गया।

➣ कई प्रमुख समाचार-पत्रों को बार-बार जमानत राशि जमा करनी पड़ी, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर होती गई।

➣ यद्यपि इस अधिनियम ने कुछ समय के लिए राष्ट्रवादी प्रेस पर दबाव अवश्य बनाया, किन्तु भारतीय पत्रकारों ने विभिन्न उपायों से अपने विचारों का प्रचार-प्रसार जारी रखा।

➣ परिणामस्वरूप भारतीय प्रेस स्वतंत्रता आन्दोलन का एक प्रभावशाली माध्यम बना रहा और जनता में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार निरंतर होता रहा।

1908 ई. का अधिनियम मुख्यतः क्रांतिकारी एवं अपराध के लिए उकसाने वाली सामग्री पर नियंत्रण के लिए था, जबकि भारतीय प्रेस अधिनियम, 1910 ई. का प्रमुख उद्देश्य जमानत राशि, जब्ती और आर्थिक दबाव के माध्यम से राष्ट्रवादी प्रेस को कमजोर करना था।


सप्रू समिति (Press Committee), 1921 ई.

प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) के बाद भारत में राजनीतिक जागरूकता और राष्ट्रीय आन्दोलन का विस्तार तेजी से हुआ। इस समय भारतीय नेताओं, पत्रकारों तथा सार्वजनिक संगठनों द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता की माँग भी लगातार उठाई जा रही थी।

➣ उनका मत था कि 1908 ई. तथा 1910 ई. के प्रेस कानून अत्यधिक दमनकारी हैं और इनका उपयोग राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों को दबाने के लिए किया जा रहा है।

➣ इन परिस्थितियों में 1921 ई. में सर तेज बहादुर सप्रू की अध्यक्षता में प्रेस समिति का गठन किया गया। इस समिति का उद्देश्य तत्कालीन प्रेस कानूनों की समीक्षा करना तथा यह सुझाव देना था कि प्रेस की स्वतंत्रता और सरकारी नियंत्रण के बीच उचित संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जा सकता है।

➣ समिति ने विभिन्न पत्रकारों, समाचार-पत्रों के संपादकों, प्रकाशकों तथा सरकारी अधिकारियों से विचार-विमर्श करने के बाद अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। समिति ने माना कि प्रेस पर लगाए गए अनेक प्रतिबंध अनावश्यक रूप से कठोर हैं और इनसे स्वतंत्र पत्रकारिता बाधित हो रही है।

➣ सप्रू समिति ने अपनी रिपोर्ट में 1908 ई. तथा 1910 ई. के कई दमनकारी प्रावधानों में ढील देने तथा प्रेस को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता प्रदान करने की अनुशंसा की। इसके आधार पर ब्रिटिश सरकार ने कुछ कठोर व्यवस्थाओं को समाप्त किया, यद्यपि भारतीय प्रेस को पूर्ण स्वतंत्रता अभी भी प्राप्त नहीं हुई।

सप्रू समिति (1921) कोई प्रेस कानून नहीं थी, बल्कि प्रेस संबंधी कानूनों की समीक्षा के लिए गठित एक समिति थी। इसकी सिफारिशों के आधार पर प्रेस पर लगाए गए कुछ कठोर प्रतिबंधों में ढील दी गई।

भारतीय प्रेस (आपात शक्तियाँ) अधिनियम (1931 ई.)

सप्रू समिति की सिफारिशों के बाद कुछ समय के लिए प्रेस को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता मिली, किन्तु यह स्थिति अधिक समय तक नहीं रही।

1930 ई. में महात्मा गांधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आन्दोलन (Civil Disobedience Movement) प्रारम्भ हुआ, जिसने पूरे देश में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक जनसमर्थन उत्पन्न कर दिया।

➣ इस आन्दोलन के दौरान यंग इंडिया, नवजीवन, द ट्रिब्यून, द हिन्दू, बॉम्बे क्रॉनिकल तथा अनेक अन्य राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों ने आन्दोलन, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, नमक सत्याग्रह तथा ब्रिटिश दमनकारी नीतियों का व्यापक प्रचार-प्रसार किया। इससे ब्रिटिश सरकार को यह आशंका होने लगी कि प्रेस राष्ट्रीय आन्दोलन को और अधिक गति प्रदान कर रहा है।

➣ इन्हीं परिस्थितियों में 1931 ई. में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन के शासनकाल में भारतीय प्रेस (आपात शक्तियाँ) अधिनियम लागू किया गया।

➣ इस अधिनियम का उद्देश्य राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों, क्रांतिकारी साहित्य तथा सरकार-विरोधी प्रचार पर पुनः कठोर नियंत्रण स्थापित करना था।

प्रमुख प्रावधान

  • सरकार को समाचार-पत्रों एवं मुद्रणालयों से सुरक्षा राशि (Security Deposit) जमा कराने का व्यापक अधिकार दिया गया।
  • यदि किसी समाचार-पत्र में राजद्रोह, हिंसा, क्रांतिकारी गतिविधियों अथवा सरकार-विरोधी प्रचार से संबंधित सामग्री प्रकाशित होती, तो उसकी जमानत राशि जब्त की जा सकती थी।
  • समाचार-पत्रों, पुस्तकों, पर्चों तथा अन्य मुद्रित सामग्री को जब्त करने और उनके वितरण पर रोक लगाने की शक्ति सरकार को प्रदान की गई।
  • मुद्रक, प्रकाशक तथा संपादक के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई तथा दंड का प्रावधान किया गया।
  • इस अधिनियम का उपयोग विशेष रूप से सविनय अवज्ञा आन्दोलन तथा अन्य राष्ट्रवादी आंदोलनों से संबंधित समाचारों और साहित्य को नियंत्रित करने के लिए किया गया।

➣ इस अधिनियम के अंतर्गत अनेक राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों पर मुकदमे चलाए गए, उनकी जमानत राशि जब्त की गई, अनेक प्रकाशनों की प्रतियाँ जब्त कर ली गईं तथा कई समाचार-पत्रों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

➣ यद्यपि यह अधिनियम प्रेस पर नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से बनाया गया था, फिर भी यह भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की गति को रोकने में सफल नहीं हो सका।भारतीय पत्रकारों ने विभिन्न उपायों से राष्ट्रीय आन्दोलन का समर्थन जारी रखा।

1947 ई. में भारत की स्वतंत्रता तक विभिन्न संशोधनों के साथ यह अधिनियम प्रभावी बना रहा और ब्रिटिश सरकार समय-समय पर इसका उपयोग राष्ट्रवादी प्रेस पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए करती रही।

सप्रू समिति (1921) ने प्रेस कानूनों में उदारता की सिफारिश की थी, जबकि भारतीय प्रेस (आपात शक्तियाँ) अधिनियम, 1931 ई. ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान प्रेस पर पुनः कठोर नियंत्रण स्थापित कर दिया।

समाचार-पत्र जाँच समिति, 1947 ई.

द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) के अंतिम वर्षों तथा भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के तीव्र चरण में प्रेस की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई थी।

➣ इस अवधि में भारतीय समाचार-पत्रों ने राष्ट्रीय आन्दोलन, संवैधानिक परिवर्तन तथा स्वतंत्रता से संबंधित विचारों को जनता तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। साथ ही, ब्रिटिश शासन द्वारा लागू विभिन्न प्रेस कानूनों और प्रतिबंधों की भी व्यापक आलोचना होने लगी।

➣ इन परिस्थितियों में 1947 ई. में समाचार-पत्र जाँच समिति का गठन किया गया। इस समिति का उद्देश्य भारत में प्रेस व्यवस्था, प्रेस कानूनों, समाचार-पत्रों की कार्यप्रणाली तथा पत्रकारिता की समस्याओं का अध्ययन कर भविष्य के लिए उपयुक्त सुझाव देना था।

➣ समिति ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया कि स्वतंत्र भारत में प्रेस को लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ मानते हुए उसे अनावश्यक सरकारी नियंत्रण से मुक्त रखा जाना चाहिए। साथ ही, जिम्मेदार पत्रकारिता, प्रेस की स्वतंत्रता तथा जनहित के बीच संतुलन बनाए रखने पर भी बल दिया गया।

15 अगस्त 1947 ई. को भारत की स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता प्रदान की गई।

➣ यद्यपि संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता का अलग से उल्लेख नहीं है, फिर भी उच्चतम न्यायालय ने समय-समय पर अपने निर्णयों के माध्यम से इसे अनुच्छेद 19(1)(a) का अभिन्न अंग माना है।

➣ स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय प्रेस ने लोकतंत्र, जनमत निर्माण, शासन की जवाबदेही तथा नागरिक अधिकारों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारतीय पत्रकारिता के विकास का एक नया युग प्रारम्भ हुआ।

ब्रिटिश कालीन प्रमुख समाचार-पत्र एवं उनके संस्थापक

➣ भारत में पत्रकारिता की शुरुआत अंग्रेज़ी भाषा के समाचार-पत्रों से हुई, लेकिन समय के साथ भारतीय भाषाओं में भी अनेक प्रभावशाली समाचार-पत्र प्रकाशित होने लगे।

➣ इन समाचार-पत्रों ने केवल समाचारों का प्रसार ही नहीं किया, बल्कि सामाजिक सुधार, शिक्षा, धार्मिक जागरण और राष्ट्रीय चेतना को भी नई दिशा प्रदान की।

➣ उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता मजबूत होने लगी थी। इसके बाद विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय भाषाओं के समाचार-पत्र बड़ी संख्या में प्रकाशित होने लगे।

➣ प्रत्येक समाचार-पत्र का अपना उद्देश्य था- कुछ सामाजिक सुधार के पक्षधर थे, कुछ शिक्षा के प्रसार के लिए कार्य कर रहे थे, जबकि अनेक समाचार-पत्र ब्रिटिश शासन की नीतियों की आलोचना करते हुए भारतीय जनता की आवाज़ बन गए।

➣ ब्रिटिश शासन द्वारा समय-समय पर लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद भारतीय पत्रकारिता निरंतर विकसित होती रही। यही कारण है कि स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान समाचार-पत्र केवल सूचना का माध्यम नहीं रहे, बल्कि जनमत निर्माण और राष्ट्रीय आन्दोलन के सशक्त साधन बन गए।

ब्रिटिश काल में प्रकाशित सभी समाचार-पत्रों का उद्देश्य एक जैसा नहीं था। कुछ समाचार-पत्र प्रशासनिक या व्यावसायिक विषयों पर केंद्रित थे, जबकि अनेक पत्र सामाजिक सुधार, शिक्षा तथा राष्ट्रीय चेतना के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे।

अंग्रेज़ी भाषा के प्रमुख समाचार-पत्र

समाचार-पत्र संस्थापक / संपादक प्रकाशन वर्ष विशेष तथ्य
बंगाल गजट (Hicky’s Bengal Gazette) जेम्स ऑगस्टस हिक्की 1780 ई. भारत का प्रथम मुद्रित समाचार-पत्र
इंडिया गजट बर्नार्ड मेसिंक एवं पीटर रीड 1780 ई. सरकारी समर्थन प्राप्त प्रारम्भिक समाचार-पत्र
कलकत्ता गजट सरकारी प्रकाशन 1784 ई. सरकारी अधिसूचनाओं का प्रकाशन
मद्रास कुरियर रिचर्ड जॉनस्टन 1785 ई. दक्षिण भारत का प्रारम्भिक अंग्रेज़ी समाचार-पत्र
बॉम्बे हेराल्ड 1789 ई. बॉम्बे का प्रारम्भिक अंग्रेज़ी समाचार-पत्र
बॉम्बे कुरियर 1790 ई. बाद में Bombay Times के विकास में योगदान
बॉम्बे टाइम्स 1838 ई. बाद में The Times of India बना
कलकत्ता जर्नल जेम्स सिल्क बकिंघम 1818 ई. स्वतंत्र पत्रकारिता का समर्थक समाचार-पत्र
मद्रास मेल चार्ल्स लॉसन एवं हेनरी कॉर्निश 1868 ई. भारत का प्रथम सांध्य (Evening) समाचार-पत्र

बंगाली भाषा के प्रमुख समाचार-पत्र

➣ भारतीय भाषाओं में पत्रकारिता के विकास में बंगाली भाषा का सबसे महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी में बंगाल सामाजिक, धार्मिक और बौद्धिक जागरण का प्रमुख केंद्र था।

➣ यही कारण था कि यहाँ अनेक ऐसे समाचार-पत्र प्रकाशित हुए, जिन्होंने समाज सुधार, शिक्षा के प्रसार तथा राष्ट्रीय चेतना को नई दिशा प्रदान की।

राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर तथा अन्य समाज सुधारकों ने समाचार-पत्रों को अपने विचारों के प्रचार का प्रभावी माध्यम बनाया। आगे चलकर यही बंगाली समाचार-पत्र ब्रिटिश शासन की आलोचना और भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के समर्थन के लिए भी प्रसिद्ध हुए।

समाचार-पत्र संस्थापक / संपादक प्रकाशन वर्ष विशेष तथ्य
समाचार दर्पण जोषुआ मार्शमैन 1818 ई. प्रथम नियमित बंगाली समाचार-पत्र
दिग्दर्शन सेरामपुर मिशन 1818 ई. बंगाली भाषा की प्रारम्भिक मासिक पत्रिका
संवाद कौमुदी राजा राममोहन राय 1821 ई. सामाजिक सुधार एवं सती प्रथा उन्मूलन का समर्थन
समाचार चंद्रिका भवानीचरण बंद्योपाध्याय 1822 ई. रूढ़िवादी विचारों का समर्थक समाचार-पत्र
तत्त्वबोधिनी पत्रिका देवेन्द्रनाथ ठाकुर 1843 ई. ब्रह्म समाज के विचारों का प्रचार
हिन्दू पैट्रियट (Hindu Patriot) गिरीशचंद्र घोष 1853 ई. नील विद्रोह के समर्थन के लिए प्रसिद्ध
सोम प्रकाश द्वारकानाथ विद्याभूषण 1858 ई. ब्रिटिश नीतियों की आलोचना; वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट के संदर्भ में प्रसिद्ध
अमृत बाजार पत्रिका शिशिर कुमार घोष एवं मोतीलाल घोष 1868 ई. 1878 में बांग्ला से अंग्रेज़ी भाषा में परिवर्तित
बंगवासी योगेन्द्रचंद्र बसु 1880 के दशक राष्ट्रवादी विचारों का प्रमुख समाचार-पत्र
संजीवनी कृष्ण कुमार मित्र 1883 ई. स्वदेशी आन्दोलन का समर्थक

बंगाली पत्रकारिता का योगदान

➣ बंगाली समाचार-पत्रों ने केवल समाचारों का प्रकाशन ही नहीं किया, बल्कि समाज सुधार, महिला शिक्षा, सती प्रथा उन्मूलन, विधवा पुनर्विवाह तथा आधुनिक शिक्षा के प्रसार जैसे विषयों पर भी जनमत तैयार किया। बाद में यही समाचार-पत्र स्वदेशी आन्दोलन और भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रमुख वैचारिक मंच बन गए।

➣ ब्रिटिश सरकार ने सबसे पहले जिन भारतीय भाषा के समाचार-पत्रों पर कड़ी निगरानी रखनी शुरू की, उनमें अधिकांश बंगाली समाचार-पत्र ही थे। यही कारण था कि 1878 का वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट लागू होने पर सबसे अधिक प्रभाव बंगाल की पत्रकारिता पर पड़ा।

➣ यदि भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता का केंद्र बंगाल को कहा जाए, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। सामाजिक सुधार से लेकर राष्ट्रीय आन्दोलन तक, लगभग हर प्रमुख वैचारिक परिवर्तन में बंगाली समाचार-पत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

हिन्दी भाषा के प्रमुख समाचार-पत्र

➣ हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में आरम्भ हुआ। प्रारम्भिक वर्षों में हिन्दी भाषी पाठकों की संख्या सीमित थी, आर्थिक संसाधनों का अभाव था तथा वितरण व्यवस्था भी विकसित नहीं थी।

➣ इन कठिनाइयों के बावजूद हिन्दी समाचार-पत्रों ने धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई और आगे चलकर राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रभावशाली माध्यम बन गए।

➣ हिन्दी पत्रकारिता ने केवल समाचारों का प्रसार ही नहीं किया, बल्कि हिन्दी भाषा के विकास, सामाजिक सुधार, राष्ट्रीय चेतना तथा जनजागरण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

समाचार-पत्र / पत्रिका संस्थापक / संपादक प्रकाशन वर्ष विशेष तथ्य
उदन्त मार्तण्ड पंडित जुगल किशोर शुक्ल 1826 ई. भारत का प्रथम हिन्दी समाचार-पत्र
बनारस अख़बार राजा शिवप्रसाद ‘सितारे-हिन्द’ 1845 ई. प्रारम्भिक हिन्दी समाचार-पत्रों में प्रमुख
सुधाकर तारामोहन मैत्र 1850 ई. हिन्दी एवं बंगाली दोनों भाषाओं में प्रकाशित
कवि वचन सुधा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र 1868 ई. हिन्दी नवजागरण की प्रमुख साहित्यिक पत्रिका
हिन्दी प्रदीप बालकृष्ण भट्ट 1877 ई. सामाजिक एवं राष्ट्रीय विषयों की प्रमुख पत्रिका
भारत मित्र बालमुकुन्द गुप्त (प्रमुख संपादक) 1878 ई. राष्ट्रवादी विचारों के लिए प्रसिद्ध
सरस्वती चिन्तामणि घोष (प्रकाशक)
महावीर प्रसाद द्विवेदी (प्रमुख संपादक)
1900 ई. आधुनिक हिन्दी साहित्य की सबसे प्रभावशाली पत्रिका
अभ्युदय पंडित मदन मोहन मालवीय 1907 ई. राष्ट्रीय जागरण एवं राजनीतिक चेतना का प्रचार
प्रताप गणेश शंकर विद्यार्थी 1913 ई. स्वतंत्रता आन्दोलन एवं जनसरोकारों का प्रमुख समाचार-पत्र
आज शिवप्रसाद गुप्त 1920 ई. हिन्दी का अत्यंत लोकप्रिय राष्ट्रवादी दैनिक

भारतेन्दु युग और हिन्दी पत्रकारिता

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को आधुनिक हिन्दी साहित्य का जनक कहा जाता है, वहीं हिन्दी पत्रकारिता के विकास में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने कवि वचन सुधा तथा अन्य पत्रिकाओं के माध्यम से हिन्दी भाषा, साहित्य, समाज सुधार और राष्ट्रीय चेतना को नई दिशा प्रदान की।

➣ भारतेन्दु युग में हिन्दी पत्रकारिता केवल समाचारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि साहित्य, संस्कृति, इतिहास, आर्थिक शोषण तथा सामाजिक समस्याओं पर भी गंभीर लेख प्रकाशित किए जाने लगे। इसी काल में हिन्दी पत्रकारिता का बौद्धिक स्तर काफी ऊँचा हुआ।

द्विवेदी युग और राष्ट्रवादी पत्रकारिता

महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में सरस्वती पत्रिका ने हिन्दी भाषा और साहित्य को नई पहचान दी। इस पत्रिका ने अनेक प्रसिद्ध साहित्यकारों को मंच प्रदान किया तथा हिन्दी गद्य और आलोचना को व्यवस्थित स्वरूप दिया।

➣ इसी अवधि में गणेश शंकर विद्यार्थी का प्रताप और मदन मोहन मालवीय का अभ्युदय जैसे समाचार-पत्र राष्ट्रीय आन्दोलन, सामाजिक न्याय तथा जनहित के मुद्दों को प्रमुखता से उठाने लगे। इससे हिन्दी पत्रकारिता का प्रभाव उत्तर भारत के व्यापक क्षेत्रों तक फैल गया।

मराठी, गुजराती, उर्दू एवं अन्य भारतीय भाषाओं के प्रमुख समाचार-पत्र

➣ बंगाली और हिन्दी पत्रकारिता के समान ही मराठी, गुजराती, उर्दू तथा अन्य भारतीय भाषाओं में भी अनेक प्रभावशाली समाचार-पत्र प्रकाशित हुए।

➣ इन समाचार-पत्रों ने अपने-अपने क्षेत्रों में सामाजिक सुधार, शिक्षा, राजनीतिक जागरूकता तथा राष्ट्रीय आन्दोलन को गति प्रदान की। कई पत्रों ने ब्रिटिश शासन की नीतियों का खुलकर विरोध किया, जबकि कुछ ने समाज सुधार और आधुनिक शिक्षा के प्रसार को अपना प्रमुख उद्देश्य बनाया।

मराठी भाषा के प्रमुख समाचार-पत्र

समाचार-पत्र संस्थापक / संपादक प्रकाशन वर्ष विशेष तथ्य
दर्पण बालशास्त्री जांभेकर 1832 ई. प्रथम मराठी समाचार-पत्र; जांभेकर को मराठी पत्रकारिता का जनक कहा जाता है।
प्रभाकर भाऊ महाजन 1841 ई. सामाजिक एवं साहित्यिक विषयों का प्रमुख पत्र।
इन्दु प्रकाश करसंदास मूलजी 1862 ई. सामाजिक सुधार तथा आधुनिक विचारों का समर्थक।
केसरी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक 1881 ई. मराठी का प्रसिद्ध राष्ट्रवादी समाचार-पत्र।
मराठा लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक 1881 ई. अंग्रेज़ी भाषा में प्रकाशित राष्ट्रवादी समाचार-पत्र।

गुजराती भाषा के प्रमुख समाचार-पत्र

समाचार-पत्र संस्थापक / संपादक प्रकाशन वर्ष विशेष तथ्य
मुंबई समाचार फर्दूनजी मर्ज़बान 1822 ई. एशिया के सबसे पुराने निरंतर प्रकाशित होने वाले समाचार-पत्रों में से एक।
रस्त गोफ्तार दादाभाई नौरोजी 1851 ई. सामाजिक सुधार एवं जनजागरण का प्रमुख पत्र।
गुजरात मित्र दीनशॉ अरदेशर तालेयारखान 1863 ई. गुजरात के प्रमुख प्रारम्भिक समाचार-पत्रों में से एक।

उर्दू भाषा के प्रमुख समाचार-पत्र

समाचार-पत्र संस्थापक / संपादक प्रकाशन वर्ष विशेष तथ्य
जाम-ए-जहाँ-नुमा हरिहर दत्त 1822 ई. प्रारम्भिक उर्दू समाचार-पत्रों में प्रमुख।
तहज़ीब-उल-अख़लाक़ सर सैयद अहमद ख़ाँ 1870 ई. अलीगढ़ आन्दोलन एवं सामाजिक सुधार का समर्थक।
अल-हिलाल मौलाना अबुल कलाम आज़ाद 1912 ई. राष्ट्रवादी विचारों एवं हिन्दू-मुस्लिम एकता का समर्थक।
अल-बलाग़ मौलाना अबुल कलाम आज़ाद 1915 ई. अल-हिलाल पर प्रतिबंध के बाद प्रकाशित।
कॉमरेड मौलाना मोहम्मद अली 1911 ई. अंग्रेज़ी भाषा का प्रभावशाली राष्ट्रवादी समाचार-पत्र।
हमदर्द मौलाना मोहम्मद अली 1913 ई. उर्दू भाषा का प्रमुख राष्ट्रवादी समाचार-पत्र।

अन्य महत्वपूर्ण समाचार-पत्र

समाचार-पत्र संस्थापक / संपादक विशेष तथ्य
दि हिन्दू जी. सुब्रमण्यम अय्यर एवं सहयोगी दक्षिण भारत का प्रमुख अंग्रेज़ी समाचार-पत्र।
स्वदेशमित्रन जी. सुब्रमण्यम अय्यर प्रमुख तमिल समाचार-पत्र।
ट्रिब्यून (The Tribune) सरदार दयाल सिंह मजीठिया पंजाब का प्रसिद्ध अंग्रेज़ी समाचार-पत्र।
दि लीडर (The Leader) मदन मोहन मालवीय इलाहाबाद से प्रकाशित प्रभावशाली अंग्रेज़ी दैनिक।
यंग इंडिया महात्मा गाँधी (संपादक) राष्ट्रीय आन्दोलन का प्रमुख अंग्रेज़ी साप्ताहिक।
नवजीवन महात्मा गाँधी गुजराती भाषा का प्रमुख राष्ट्रवादी पत्र।
हरिजन महात्मा गाँधी अस्पृश्यता उन्मूलन एवं सामाजिक सुधार पर केंद्रित।

महत्वपूर्ण समाचार-पत्र एवं उनके संस्थापक : एक नजर में

समाचार-पत्र संस्थापक / संपादक भाषा विशेष तथ्य
बंगाल गजट जेम्स ऑगस्टस हिक्की अंग्रेज़ी भारत का प्रथम मुद्रित समाचार-पत्र (1780)
कलकत्ता जर्नल जेम्स सिल्क बकिंघम अंग्रेज़ी स्वतंत्र पत्रकारिता का समर्थक
समाचार दर्पण जोषुआ मार्शमैन बंगाली प्रथम नियमित बंगाली समाचार-पत्र
संवाद कौमुदी राजा राममोहन राय बंगाली सामाजिक सुधार का समर्थक
समाचार चंद्रिका भवानीचरण बंद्योपाध्याय बंगाली रूढ़िवादी विचारधारा का समर्थक
सोम प्रकाश द्वारकानाथ विद्याभूषण बंगाली वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट से जुड़ा प्रसिद्ध पत्र
अमृत बाजार पत्रिका शिशिर कुमार घोष एवं मोतीलाल घोष बांग्ला → अंग्रेज़ी 1878 में अंग्रेज़ी में परिवर्तित
उदन्त मार्तण्ड पं. जुगल किशोर शुक्ल हिन्दी भारत का प्रथम हिन्दी समाचार-पत्र
बनारस अख़बार राजा शिवप्रसाद ‘सितारे-हिन्द’ हिन्दी प्रारम्भिक हिन्दी समाचार-पत्र
कवि वचन सुधा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी हिन्दी नवजागरण की प्रमुख पत्रिका
हिन्दी प्रदीप बालकृष्ण भट्ट हिन्दी राष्ट्रीय एवं सामाजिक विषयों की पत्रिका
सरस्वती महावीर प्रसाद द्विवेदी (प्रमुख संपादक) हिन्दी आधुनिक हिन्दी साहित्य की प्रमुख पत्रिका
प्रताप गणेश शंकर विद्यार्थी हिन्दी राष्ट्रवादी पत्रकारिता का प्रमुख पत्र
आज शिवप्रसाद गुप्त हिन्दी लोकप्रिय हिन्दी दैनिक
दर्पण बालशास्त्री जांभेकर मराठी प्रथम मराठी समाचार-पत्र
केसरी बाल गंगाधर तिलक मराठी राष्ट्रवादी समाचार-पत्र
मराठा बाल गंगाधर तिलक अंग्रेज़ी केसरी का अंग्रेज़ी समकक्ष
मुंबई समाचार फर्दूनजी मर्ज़बान गुजराती एशिया के सबसे पुराने समाचार-पत्रों में एक
रस्त गोफ्तार दादाभाई नौरोजी गुजराती सामाजिक सुधार का समर्थक
तहज़ीब-उल-अख़लाक़ सर सैयद अहमद ख़ाँ उर्दू अलीगढ़ आन्दोलन से संबंधित
अल-हिलाल मौलाना अबुल कलाम आज़ाद उर्दू राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार
अल-बलाग़ मौलाना अबुल कलाम आज़ाद उर्दू अल-हिलाल पर प्रतिबंध के बाद प्रकाशित
कॉमरेड मौलाना मोहम्मद अली अंग्रेज़ी राष्ट्रवादी साप्ताहिक
हमदर्द मौलाना मोहम्मद अली उर्दू राष्ट्रीय आन्दोलन का समर्थक
दि हिन्दू जी. सुब्रमण्यम अय्यर एवं सहयोगी अंग्रेज़ी दक्षिण भारत का प्रमुख समाचार-पत्र
स्वदेशमित्रन जी. सुब्रमण्यम अय्यर तमिल प्रमुख तमिल समाचार-पत्र
दि ट्रिब्यून सरदार दयाल सिंह मजीठिया अंग्रेज़ी पंजाब का प्रसिद्ध समाचार-पत्र
दि लीडर मदन मोहन मालवीय अंग्रेज़ी इलाहाबाद से प्रकाशित प्रभावशाली दैनिक
यंग इंडिया महात्मा गाँधी अंग्रेज़ी राष्ट्रीय आन्दोलन का प्रमुख पत्र
नवजीवन महात्मा गाँधी गुजराती गांधीजी के विचारों का प्रमुख माध्यम
हरिजन महात्मा गाँधी अंग्रेज़ी / हिन्दी / गुजराती अस्पृश्यता उन्मूलन एवं सामाजिक सुधार

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में प्रेस की भूमिका

➣ ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय प्रेस ने केवल समाचारों का प्रकाशन नहीं किया, बल्कि सामाजिक सुधार, राष्ट्रीय चेतना, स्वदेशी आन्दोलन तथा स्वतंत्रता संग्राम को जन-जन तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ समाचार-पत्र उस समय जनमत निर्माण का सबसे प्रभावी माध्यम थे। इनके द्वारा राष्ट्रीय नेताओं के विचार, आंदोलनों की जानकारी तथा ब्रिटिश शासन की नीतियों की आलोचना पूरे देश में फैलने लगी।

क्षेत्र प्रेस की भूमिका प्रमुख समाचार-पत्र
सामाजिक सुधार आन्दोलन सती प्रथा, विधवा पुनर्विवाह, महिला शिक्षा, सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जनमत तैयार किया। संवाद कौमुदी, मिरात-उल-अख़बार, तत्त्वबोधिनी पत्रिका
राष्ट्रीय चेतना भारतीयों में राजनीतिक अधिकारों, स्वशासन तथा राष्ट्रीय एकता की भावना विकसित की। केसरी, मराठा, अमृत बाजार पत्रिका, प्रताप, दि हिन्दू
स्वदेशी आन्दोलन (1905) विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तथा स्वदेशी उद्योगों के समर्थन का व्यापक प्रचार किया। अमृत बाजार पत्रिका, बंगाली, संध्या, केसरी
बंग-भंग विरोधी आन्दोलन लॉर्ड कर्ज़न की विभाजन नीति का विरोध करते हुए राष्ट्रीय एकता का संदेश फैलाया। वंदे मातरम्, युगांतर, संध्या
क्रांतिकारी आन्दोलन युवाओं में देशभक्ति तथा स्वतंत्रता के लिए संघर्ष की भावना को प्रोत्साहित किया। युगांतर, वंदे मातरम्, गदर, इंडियन सोशियोलॉजिस्ट
महात्मा गाँधी एवं प्रेस सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, असहयोग तथा सामाजिक सुधार के विचारों का प्रचार किया। इंडियन ओपिनियन, यंग इंडिया, नवजीवन, हरिजन
ब्रिटिश दमन प्रेस कानून, मुकदमे, जमानत, जब्ती एवं प्रतिबंधों के माध्यम से प्रेस को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया। वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट, भारतीय प्रेस अधिनियम आदि का प्रभाव
  • भारत में मुद्रण कला का आगमन 1556 ई. में पुर्तगालियों द्वारा गोवा में हुआ।
  • भारत का प्रथम मुद्रित समाचार-पत्रबंगाल गजट (1780 ई.), संस्थापक जेम्स ऑगस्टस हिक्की
  • भारत का प्रथम हिन्दी समाचार-पत्रउदन्त मार्तण्ड (1826 ई.)
  • प्रथम नियमित बंगाली समाचार-पत्रसमाचार दर्पण (1818 ई.)
  • प्रथम मराठी समाचार-पत्रदर्पण (1832 ई.)
  • मुंबई समाचार (1822 ई.) एशिया के सबसे पुराने निरंतर प्रकाशित होने वाले समाचार-पत्रों में से एक है।
  • राजा राममोहन राय ने संवाद कौमुदी तथा मिरात-उल-अख़बार का प्रकाशन किया।
  • बाल गंगाधर तिलक ने केसरी (मराठी) तथा मराठा (अंग्रेज़ी) का प्रकाशन प्रारम्भ किया।
  • महात्मा गाँधी के प्रमुख समाचार-पत्र थे – यंग इंडिया, नवजीवन तथा हरिजन
  • मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने अल-हिलाल तथा अल-बलाग़ का प्रकाशन किया।
  • गणेश शंकर विद्यार्थी प्रताप समाचार-पत्र के संस्थापक-संपादक थे।
  • महावीर प्रसाद द्विवेदी सरस्वती पत्रिका के प्रसिद्ध संपादक थे।
  • भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कवि वचन सुधा के माध्यम से हिन्दी पत्रकारिता को नई दिशा दी।
  • अमृत बाजार पत्रिका ने 1878 में अपनी भाषा बांग्ला से अंग्रेज़ी में परिवर्तित कर दी।
  • बालशास्त्री जांभेकर को मराठी पत्रकारिता का जनक कहा जाता है।
  • वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट केवल भारतीय भाषाओं के समाचार-पत्रों पर लागू था।
  • सर चार्ल्स मेटकॉफ को भारतीय प्रेस का मुक्तिदाता (Liberator of the Indian Press) कहा जाता है।
  • राजा राममोहन राय ने 1823 के अनुज्ञप्ति नियमों के विरोध में मिरात-उल-अख़बार का प्रकाशन बंद कर दिया था।
  • वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट को “मुंह बंद करने वाला अधिनियम (Gagging Act)” भी कहा जाता है।
  • लॉर्ड रिपन ने 1882 ई. में वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट को समाप्त कर दिया।

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