ब्रिटिश आर्थिक नीति की पृष्ठभूमि
➣ 17वीं शताब्दी में भारत विश्व का सबसे बड़ा निर्यातक देश हुआ करता था, जबकि 18वीं शताब्दी के अंत तक वह एक आयातक देश बन गया। इसका मुख्य कारण भारत में लागू की गई ब्रिटिश आर्थिक नीतियाँ थीं।
➣ ईस्ट इंडिया कंपनी प्रारम्भ में केवल व्यापार करने के उद्देश्य से भारत आई थी। किन्तु प्लासी का युद्ध (1757 ई.) तथा बक्सर का युद्ध (1764 ई.) के बाद उसने भारत की राजनीतिक एवं आर्थिक व्यवस्था पर अपना नियंत्रण स्थापित करना प्रारम्भ कर दिया।
➣ मुगल सम्राट औरंगज़ेब (1707 ई.) की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य के पतन से उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता का लाभ अंग्रेजों ने उठाया। उत्तरवर्ती मुगल शासकों द्वारा यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों को दी गई व्यापारिक रियायतों ने भी भारतीय व्यापारियों की स्थिति को कमजोर कर दिया।
➣ अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों का उद्देश्य भारतीय जनता का कल्याण नहीं था। उनका मुख्य उद्देश्य भारत से अधिकाधिक धन प्राप्त करना, कच्चा माल इंग्लैण्ड भेजना तथा ब्रिटेन में निर्मित वस्तुओं के लिए भारत को एक विशाल बाजार उपलब्ध कराना था।
➣ परिणामस्वरूप भारत की पारंपरिक अर्थव्यवस्था में व्यापक परिवर्तन हुए। भारतीय उद्योग-धंधों का पतन हुआ, किसानों का आर्थिक शोषण बढ़ा, बार-बार भीषण अकाल पड़े तथा भारत धीरे-धीरे एक औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था में परिवर्तित हो गया।
भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विभिन्न चरण
➣ भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद केवल राजनीतिक शासन तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका प्रमुख उद्देश्य भारत की आर्थिक संरचना को ब्रिटेन के हितों के अनुरूप ढालना भी था। समय के साथ अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों में परिवर्तन हुआ और उनका स्वरूप भी बदलता गया।
➣ प्रसिद्ध मार्क्सवादी इतिहासकार रजनी पाम दत्त ने अपनी प्रसिद्ध कृति इंडिया टुडे में कार्ल मार्क्स के औपनिवेशिक विचारों से प्रेरणा लेकर भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के आर्थिक विकास को तीन चरणों में विभाजित किया है।
➣ भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं—
| चरण | प्रमुख विशेषताएँ |
|---|---|
| वाणिज्यिक चरण (1757–1813 ई.) |
धन की लूट, ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार, भारतीय संसाधनों का दोहन तथा राजस्व की लूट। |
| औद्योगिक मुक्त व्यापार चरण (1813–1858 ई.) |
1813 के चार्टर एक्ट के बाद मुक्त व्यापार की शुरुआत, ब्रिटिश वस्तुओं का भारत में आयात, भारतीय कुटीर उद्योगों का पतन तथा रेल जैसी आधारभूत सुविधाओं का विकास। |
| वित्तीय पूँजीवाद चरण (1860 ई. के बाद) |
विदेशी पूँजी का निवेश, रेलवे, बागान, बैंक एवं बीमा का विस्तार तथा भारत को ब्रिटिश पूँजी के निवेश का प्रमुख क्षेत्र बनाना। |
➣ इन तीनों चरणों का मूल उद्देश्य भारत की आर्थिक शक्ति का उपयोग ब्रिटेन की समृद्धि के लिए करना था। केवल नीतियों के स्वरूप में परिवर्तन हुआ, जबकि आर्थिक शोषण की प्रवृत्ति पूरे ब्रिटिश शासनकाल में बनी रही।
ब्रिटिश औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के उद्देश्य
➣ भारत में ब्रिटिश शासन का उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास करना नहीं था। अंग्रेजों की समस्त आर्थिक नीतियाँ ब्रिटेन के औद्योगिक, व्यापारिक एवं वित्तीय हितों को ध्यान में रखकर बनाई गई थीं।
➣ ब्रिटिश सरकार ने ऐसी प्रशासनिक एवं आर्थिक व्यवस्थाएँ विकसित कीं, जिनके माध्यम से भारत के प्राकृतिक संसाधनों, कृषि, उद्योग एवं व्यापार का अधिकतम उपयोग ब्रिटेन के हित में किया जा सके।
➣ इन आर्थिक नीतियों का परिणाम यह हुआ कि भारत की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे ब्रिटिश साम्राज्य की आवश्यकताओं पर निर्भर होती चली गई।
➣ ब्रिटिश औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे—
1. भारत के संसाधनों का अधिकतम दोहन
- 1765 ई. में दीवानी अधिकार मिलने के बाद आर्थिक शोषण तेज हुआ।
- कृषि, वन, खनिज, व्यापार एवं हस्तशिल्प का उपयोग ब्रिटिश हितों के लिए किया गया।
- कपास, जूट, नील, चाय, अफीम, कोयला आदि का बड़े पैमाने पर निर्यात किया गया।
- भारत की राष्ट्रीय आय का बड़ा भाग ब्रिटेन भेजा गया।
2. ब्रिटिश उद्योगों के लिए कच्चा माल प्राप्त करना
- औद्योगिक क्रांति के बाद भारत कच्चे माल का प्रमुख स्रोत बन गया।
- कपास, जूट, नील, चाय, अफीम, रेशम आदि का बड़े पैमाने पर निर्यात किया गया।
- किसानों को नकदी फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित एवं कई स्थानों पर विवश किया गया।
- भारत सस्ते कच्चे माल का प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन गया।
3. भारत को तैयार माल का बाजार बनाना
- ब्रिटेन में निर्मित मशीन-निर्मित वस्तुओं का भारत में बड़े पैमाने पर आयात किया गया।
- भारतीय कुटीर एवं हस्तशिल्प उद्योगों का पतन हुआ।
- भारत कच्चा माल निर्यात करता था और तैयार माल आयात करता था।
- भारत ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं का विशाल बाजार बन गया।
4.अधिकतम भूमि राजस्व प्राप्त करना
- भूमि राजस्व को ब्रिटिश शासन की आय का प्रमुख स्रोत बनाया गया।
- स्थायी बंदोबस्त (1793 ई.), रैयतवाड़ी व्यवस्था एवं महालवाड़ी व्यवस्था लागू की गईं।
- अत्यधिक भूमि कर के कारण किसान ऋणग्रस्त एवं भूमिहीन होते गए।
- भारतीय कृषि एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर होती गई।
5. ब्रिटिश व्यापारिक हितों की रक्षा करना
- भारतीय वस्त्रों पर इंग्लैंड में प्रतिबंध एवं आयात शुल्क लगाया गया।
- ब्रिटिश व्यापारियों को कर रियायतें एवं विशेष व्यापारिक सुविधाएँ प्रदान की गईं।
- बंदरगाहों एवं विदेशी व्यापार पर ब्रिटिश नियंत्रण स्थापित किया गया।
- 1813 के चार्टर एक्ट के बाद भी विदेशी व्यापार पर ब्रिटिश प्रभुत्व बना रहा।
6.भारत को ब्रिटिश पूँजी के निवेश का क्षेत्र बनाना
- 1858 ई. के बाद रेलवे, बागान, बैंक, बीमा एवं खानों में ब्रिटिश पूँजी का निवेश बढ़ा।
- गारंटी प्रणाली के तहत ब्रिटिश कंपनियों को निश्चित लाभ दिया गया।
- लाभांश, ब्याज एवं मुनाफा ब्रिटेन भेजा जाता था।
- भारत विदेशी पूँजी पर निर्भर होता गया।
ब्रिटिश औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की प्रमुख नीतियाँ
➣ अपने आर्थिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए अंग्रेजों ने भारत में अनेक आर्थिक नीतियाँ लागू कीं। ब्रिटिश सरकार ने भूमि, कृषि, उद्योग, व्यापार, परिवहन, संचार तथा वित्त से संबंधित नीतियों में व्यापक परिवर्तन किए।
➣ इन परिवर्तनों ने भारत की पारंपरिक आर्थिक व्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया तथा देश को एक औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था में परिवर्तित कर दिया।
| नीति | उद्देश्य | ब्रिटेन को लाभ | भारत पर प्रभाव |
|---|---|---|---|
| भूमि राजस्व नीति | भूमि से अधिकतम राजस्व प्राप्त करना तथा ब्रिटिश शासन की आय बढ़ाना। | सरकारी आय में निरंतर वृद्धि हुई तथा ब्रिटिश शासन आर्थिक रूप से मजबूत हुआ। | किसान ऋणग्रस्त एवं भूमिहीन हुए तथा कृषि व्यवस्था कमजोर होती गई। |
| व्यापार नीति | भारत को कच्चे माल का स्रोत तथा ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं का विशाल बाजार बनाना। | ब्रिटिश व्यापारियों एवं उद्योगों को विशाल बाजार तथा अधिक लाभ प्राप्त हुआ। | भारतीय व्यापारियों एवं स्वदेशी उद्योगों का पतन हुआ तथा आर्थिक निर्भरता बढ़ी। |
| औद्योगिक नीति | ब्रिटिश उद्योगों को प्रोत्साहित करना तथा भारतीय उद्योगों को कमजोर बनाना। | ब्रिटेन के कारखानों का उत्पादन एवं निर्यात तेजी से बढ़ा। | कुटीर एवं हस्तशिल्प उद्योगों का पतन हुआ, बेरोजगारी एवं निर्धनता बढ़ी। |
| कृषि का वाणिज्यीकरण | नकदी फसलों का उत्पादन बढ़ाकर ब्रिटिश उद्योगों के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराना। | उद्योगों को सस्ता एवं पर्याप्त कच्चा माल निरंतर मिलता रहा। | खाद्यान्न उत्पादन घटा, अकाल की समस्या बढ़ी तथा किसान आर्थिक संकट में फँस गए। |
| परिवहन एवं संचार नीति | ब्रिटिश प्रशासन, व्यापार एवं सेना को अधिक प्रभावी बनाना। | व्यापार, सैनिक आवागमन एवं प्रशासनिक नियंत्रण सुदृढ़ हुआ। | परिवहन का विकास मुख्यतः औपनिवेशिक शोषण एवं ब्रिटिश हितों के लिए हुआ। |
| वित्तीय नीति | बैंकिंग, मुद्रा एवं कर व्यवस्था को ब्रिटिश हितों के अनुरूप संचालित करना। | ब्रिटिश पूँजीपतियों के निवेश एवं व्यापार को सुरक्षा तथा अधिक लाभ मिला। | भारतीय अर्थव्यवस्था विदेशी पूँजी पर निर्भर होती गई तथा आर्थिक स्वायत्तता कमजोर हुई। |
| धन निष्कासन सिद्धांत (Drain of Wealth) | भारत की संपत्ति एवं आय को विभिन्न माध्यमों से ब्रिटेन भेजना। | ब्रिटेन की औद्योगिक प्रगति एवं आर्थिक समृद्धि को निरंतर बल मिला। | भारत में पूँजी संचय नहीं हो सका, जिससे गरीबी एवं आर्थिक पिछड़ापन बढ़ता गया। |
वाणिज्यिक चरण (1757–1813 ई.)
➣ 1757 ई. के प्लासी के युद्ध से लेकर 1813 ई. के चार्टर एक्ट तक का काल भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद का वाणिज्यिक चरण कहलाता है।
➣ इस चरण में ईस्ट इंडिया कंपनी का मुख्य उद्देश्य भारत के व्यापार पर एकाधिकार स्थापित कर अधिक-से-अधिक आर्थिक लाभ प्राप्त करना था।
➣ प्रारम्भिक वर्षों में अंग्रेजों को भारत में व्यापारिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए पुर्तगाली, डच एवं फ्रांसीसी जैसी यूरोपीय शक्तियों से संघर्ष करना पड़ा। इन प्रतिद्वंद्वियों को पराजित करने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने धीरे-धीरे भारतीय व्यापार पर अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया।
➣ वाणिज्यिक चरण के दौरान ब्रिटिश कंपनी के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे—
- भारत के व्यापार पर पूर्ण एकाधिकार स्थापित करना।
- प्लासी एवं बक्सर के बाद राजनीतिक प्रभाव बढ़ाकर राजस्व प्राप्त करना।
- भारतीय वस्तुओं को कम कीमत पर खरीदकर यूरोप में अधिक मूल्य पर बेचना।
- पुर्तगाली, डच एवं फ्रांसीसी जैसी यूरोपीय प्रतिद्वंद्वी शक्तियों को व्यापार से बाहर करना।
- भारत की संपत्ति एवं संसाधनों का अधिक-से-अधिक आर्थिक दोहन करना।
- भारतीय प्रशासन, समाज एवं संस्कृति में न्यूनतम हस्तक्षेप करते हुए केवल आर्थिक लाभ पर ध्यान देना।
➣ इस प्रकार वाणिज्यिक चरण में ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रमुख उद्देश्य भारत को एक लाभदायक व्यापारिक उपनिवेश के रूप में उपयोग करना था। यही कारण है कि इस काल को धन की लूट एवं व्यापारिक एकाधिकार का युग भी कहा जाता है।
➣ प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार पर्सिवल स्पीयर ने इस काल के संबंध में टिप्पणी की कि अब बंगाल में खुली तथा बेशर्म लूट का काल आरंभ हुआ।
➣ वहीं प्रसिद्ध भारतीय इतिहासकार के. एम. पणिक्कर ने 1765 से 1772 ई. के काल को डाकू राज्य की संज्ञा दी है, क्योंकि इस अवधि में कंपनी का मुख्य उद्देश्य केवल भारत की संपत्ति का अधिक-से-अधिक दोहन करना था।
भूमि राजस्व नीति
➣ भारत प्राचीन काल से ही एक कृषि प्रधान देश रहा है। इसलिए कृषि एवं भूमि से प्राप्त होने वाला राजस्व किसी भी शासन की आय का प्रमुख स्रोत माना जाता था। मुगल काल में भी राज्य की आय का सबसे बड़ा भाग भू-राजस्व से प्राप्त होता था और अंग्रेजों ने भी इसी व्यवस्था को अपनी आर्थिक नीति का आधार बनाया।
➣ 1765 ई. में इलाहाबाद की संधि के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा की दीवानी प्राप्त हुई। इसके साथ ही कंपनी को इन क्षेत्रों से भू-राजस्व वसूलने का अधिकार भी मिल गया।
यही वह घटना थी जिसने अंग्रेजों को एक व्यापारिक संस्था से राजस्व वसूलने वाली शासकीय शक्ति में परिवर्तित कर दिया।
➣ दीवानी प्राप्त होने के बाद अंग्रेजों का मुख्य उद्देश्य कृषि व्यवस्था का विकास करना नहीं था, बल्कि किसानों से अधिक-से-अधिक भू-राजस्व वसूलकर अपनी आय बढ़ाना था। इसी आय के आधार पर कंपनी अपने प्रशासन, सेना तथा व्यापारिक गतिविधियों का संचालन करती थी।
➣ प्रारम्भिक वर्षों में कंपनी को भारतीय भूमि व्यवस्था एवं राजस्व प्रशासन का पर्याप्त अनुभव नहीं था। परिणामस्वरूप उसने अनेक प्रयोग किए, किन्तु इनमें से अधिकांश सफल नहीं रहे। दूसरी ओर अधिक राजस्व प्राप्त करने की लालसा में किसानों पर कर का बोझ लगातार बढ़ता गया।
➣ कंपनी की इन नीतियों के कारण पारंपरिक कृषि व्यवस्था धीरे-धीरे प्रभावित होने लगी। भू-राजस्व वसूली की पुरानी पद्धतियों में परिवर्तन किए गए तथा ऐसी नई व्यवस्थाएँ लागू की गईं, जिनका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार की आय में निरंतर वृद्धि करना था।
➣ इसी क्रम में अंग्रेजों ने पहले इजारेदारी प्रथा लागू की। इसके बाद क्रमशः स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी व्यवस्था तथा महालवाड़ी व्यवस्था जैसी विभिन्न भू-राजस्व प्रणालियाँ लागू की गईं। इन सभी व्यवस्थाओं का मूल उद्देश्य किसानों से अधिकतम राजस्व प्राप्त करना था।
दीवानी प्राप्ति के बाद भू-राजस्व व्यवस्था में परिवर्तन (1765–1772 ई.)
➣ दीवानी अधिकार प्राप्त होने के बाद अंग्रेजों के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक प्रभावी भू-राजस्व व्यवस्था स्थापित करने की थी, क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी का उद्देश्य कम-से-कम समय में अधिक-से-अधिक राजस्व प्राप्त करना था।
➣ प्रारम्भ में कंपनी ने द्वैध शासन व्यवस्था के माध्यम से प्रशासन चलाया। इस व्यवस्था में राजस्व वसूली का अधिकार कंपनी के पास था, जबकि प्रशासन एवं कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी नवाब के अधीन रही।
➣ परिणामस्वरूप उत्तरदायित्व का अभाव उत्पन्न हुआ और प्रशासनिक अव्यवस्था तेजी से बढ़ने लगी।
➣ 1770 ई. में बंगाल में भीषण अकाल पड़ा, जिसमें लाखों लोगों की मृत्यु हो गई। इसके बावजूद कंपनी ने भू-राजस्व में कोई उल्लेखनीय कमी नहीं की और किसानों से कठोरता के साथ लगान वसूला जाता रहा। इससे कंपनी की राजस्व नीति की व्यापक आलोचना हुई तथा उसकी प्रशासनिक कमियाँ उजागर हो गईं।
➣ अकाल के कारण कृषि उत्पादन में भारी गिरावट आई, अनेक गाँव उजड़ गए तथा किसानों की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई।
➣ इसके परिणामस्वरूप कंपनी की राजस्व आय भी प्रभावित होने लगी। अंग्रेजों को यह अनुभव हुआ कि सुव्यवस्थित भूमि राजस्व व्यवस्था के बिना स्थायी एवं नियमित आय प्राप्त करना संभव नहीं है।
➣ इन परिस्थितियों में कंपनी ने भू-राजस्व व्यवस्था में व्यापक सुधार करने का निर्णय लिया। इसी उद्देश्य से 1772 ई. में बंगाल का गवर्नर बनने के बाद वारेन हेस्टिंग्स ने द्वैध शासन व्यवस्था समाप्त की तथा नई भू-राजस्व नीति के रूप में इजारेदारी प्रथा लागू की।
इजारेदारी प्रथा (1772 ई.)
➣ 1772 ई. में बंगाल का गवर्नर बनने के बाद वारेन हेस्टिंग्स ने द्वैध शासन व्यवस्था समाप्त कर भू-राजस्व व्यवस्था में सुधार के उद्देश्य से इजारेदारी प्रथा अथवा खेती व्यवस्था लागू की। इस व्यवस्था को प्रारम्भ में पाँच वर्षीय व्यवस्था के रूप में लागू किया गया।
➣ इस व्यवस्था के अंतर्गत भू-राजस्व वसूली का अधिकार नीलामी के माध्यम से उस व्यक्ति को दिया जाता था, जो सरकार को सबसे अधिक राजस्व देने का वादा करता था। ऐसे व्यक्ति को इजारेदार कहा जाता था।
➣ वारेन हेस्टिंग्स का मानना था कि खुली नीलामी से ईस्ट इंडिया कंपनी को अधिक भू-राजस्व प्राप्त होगा। इसी कारण प्रारम्भ में पारंपरिक जमींदारों को विशेष प्राथमिकता नहीं दी गई और कोई भी व्यक्ति अधिक बोली लगाकर राजस्व वसूली का ठेका प्राप्त कर सकता था।
➣ अधिक बोली लगाने वाले इजारेदारों का मुख्य उद्देश्य कम समय में अधिक-से-अधिक धन वसूलना होता था। इसलिए वे किसानों से कठोरता के साथ लगान वसूलते थे। किसानों की आर्थिक स्थिति, फसल की स्थिति अथवा प्राकृतिक आपदाओं का प्रायः कोई ध्यान नहीं रखा जाता था।
➣ पाँच वर्षीय इजारेदारी व्यवस्था अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सकी। अनेक इजारेदार निर्धारित राजस्व जमा नहीं कर पाए तथा भ्रष्टाचार और अव्यवस्था बढ़ने लगी।
➣परिणामस्वरूप 1776 ई. में वारेन हेस्टिंग्स ने इसे एक वर्षीय व्यवस्था में बदल दिया, जिसमें जमींदारों को अपेक्षाकृत अधिक प्राथमिकता दी गई।
➣ इसके बावजूद भू-राजस्व व्यवस्था की मूल समस्याएँ समाप्त नहीं हुईं। किसानों का शोषण जारी रहा, कंपनी की आय भी स्थिर नहीं हो सकी तथा प्रशासनिक भ्रष्टाचार बढ़ता गया। इन परिस्थितियों ने अंग्रेजों को अधिक स्थायी एवं नियमित भू-राजस्व व्यवस्था की आवश्यकता का अनुभव कराया।
➣ इजारेदारी प्रथा की असफलता के बाद ही लॉर्ड कॉर्नवालिस ने भूमि राजस्व व्यवस्था में व्यापक सुधार करने का निर्णय लिया, जिसके परिणामस्वरूप आगे चलकर 1793 ई. में स्थायी बंदोबस्त लागू किया गया।
जमींदारी/स्थायी/इस्तमरारी व्यवस्था (1793 ई.)
➣ इजारेदारी प्रथा की असफलता के बाद अंग्रेजों ने ऐसी भू-राजस्व व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया, जिससे सरकार को नियमित एवं निश्चित आय प्राप्त हो सके।
➣इसी उद्देश्य से गवर्नर जनरल लॉर्ड कॉर्नवालिस ने जॉन शोर के सहयोग से पहले 1790 ई. में दशकीय बंदोबस्त (Decennial Settlement) लागू किया।
➣ प्रारम्भ में यह व्यवस्था केवल 10 वर्षों के लिए लागू की गई थी, किन्तु 22 मार्च 1793 ई. को इसे स्थायी रूप प्रदान कर दिया गया। इसी कारण इसे स्थायी बंदोबस्त कहा गया।
➣इसे जमींदारी व्यवस्था, इस्तमरारी व्यवस्था, मालगुजारी व्यवस्था तथा विस्वेदारी व्यवस्था के नाम से भी जाना जाता है।
➣ इस व्यवस्था के अंतर्गत जमींदारों को भूमि का स्वामी स्वीकार कर लिया गया तथा उनसे ही सरकार का स्थायी राजस्व समझौता किया गया। किसानों और सरकार के बीच जमींदार एक स्थायी मध्यस्थ बन गया, जिसका मुख्य दायित्व किसानों से लगान वसूलकर सरकार को निर्धारित राजस्व जमा कराना था।
➣ स्थायी बंदोबस्त में वसूले गए लगान का लगभग 10/11 भाग सरकार को तथा शेष 1/11 भाग जमींदार को प्राप्त होता था। किन्तु सरकार ने यह निर्धारित नहीं किया कि जमींदार किसानों से कितना लगान वसूल सकता है।
परिणामस्वरूप अनेक जमींदारों ने किसानों से मनमाने ढंग से अत्यधिक लगान वसूलना प्रारम्भ कर दिया।➣ 1793 ई. के विनियम-14 द्वारा सरकार को राजस्व बकाया रहने पर जमींदार की संपत्ति जब्त करने का अधिकार दिया गया। इसके बाद 1794 ई. में सूर्यास्त का नियम लागू किया गया, जिसके अनुसार यदि निर्धारित तिथि को सूर्यास्त तक राजस्व सरकारी कोष में जमा नहीं होता था, तो संबंधित जमींदारी की नीलामी कर दी जाती थी।
➣ यह व्यवस्था मुख्यतः बंगाल, बिहार, उड़ीसा, बनारस तथा उत्तरी कर्नाटक के कुछ क्षेत्रों में लागू की गई। ब्रिटिश भारत के लगभग 19 प्रतिशत भू-भाग पर स्थायी बंदोबस्त लागू था।
➣बनारस क्षेत्र में इस व्यवस्था को लागू करने में जोनाथन डंकन तथा थॉमस लॉ की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
➣ स्थायी बंदोबस्त से अंग्रेजों को नियमित एवं निश्चित राजस्व प्राप्त होने लगा तथा जमींदार वर्ग ब्रिटिश शासन का समर्थक बन गया। किन्तु किसानों का आर्थिक शोषण बढ़ गया, क्योंकि जमींदार अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए उनसे अत्यधिक लगान वसूलने लगे।
➣ बाद के वर्षों में अनेक विद्वानों ने इस व्यवस्था का मूल्यांकन किया। आर. सी. दत्त एवं राजा राममोहन राय ने कुछ परिस्थितियों में इसका समर्थन किया, जबकि 1940 के फ्लाउड आयोग ने इसकी कठोर आलोचना करते हुए इसे किसानों के हितों के प्रतिकूल बताया।
➣ स्थायी बंदोबस्त ने भारत में एक शक्तिशाली जमींदार वर्ग को जन्म दिया, किन्तु किसानों की स्थिति में सुधार नहीं हुआ। इसके विपरीत कृषि उत्पादन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा किसान जीवन पर इसके अनेक दीर्घकालीन प्रतिकूल प्रभाव पड़े।
स्थायी बंदोबस्त के प्रमुख लाभ एवं हानियाँ
| लाभ | हानियाँ |
|---|---|
| ब्रिटिश सरकार को नियमित एवं निश्चित राजस्व प्राप्त होने लगा। | किसानों का व्यापक आर्थिक शोषण हुआ। |
| एक शक्तिशाली एवं अंग्रेज समर्थक जमींदार वर्ग का निर्माण हुआ। | जमींदारों ने मनमाने ढंग से लगान वसूला। |
| सरकार को बार-बार भूमि का सर्वेक्षण कराने की आवश्यकता नहीं रही। | कृषि उत्पादन बढ़ने का लाभ किसानों को नहीं मिला। |
| सरकार की आय अपेक्षाकृत स्थिर एवं सुनिश्चित हो गई। | ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनता एवं ऋणग्रस्तता बढ़ी। |
| राजस्व वसूली का प्रशासनिक कार्य अपेक्षाकृत सरल हो गया। | सरकार और किसानों के बीच सीधा संबंध समाप्त हो गया तथा जमींदार मध्यस्थ बन गए। |
रैयतवाड़ी व्यवस्था
➣ रैयतवाड़ी व्यवस्था का जन्मदाता कैप्टन अलेक्जेंडर रीड तथा सर थॉमस मुनरो को माना जाता है।
➣ इस व्यवस्था को सर्वप्रथम 1792 ई. में कैप्टन अलेक्जेंडर रीड ने मद्रास (वर्तमान तमिलनाडु) के बारामहल क्षेत्र में प्रयोगात्मक रूप से लागू किया। बाद में थॉमस मुनरो ने इसे विकसित कर व्यापक रूप से लागू किया।
➣ स्थायी बंदोबस्त में जमींदारों द्वारा अत्यधिक लाभ अर्जित किए जाने तथा सरकार की आय स्थिर रहने के कारण अंग्रेज इस व्यवस्था से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे। इसलिए उन्होंने ऐसी नई भू-राजस्व व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया, जिसमें सरकार का सीधा संबंध किसानों से हो और बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो जाए।
➣ रैयतवाड़ी व्यवस्था में प्रत्येक पंजीकृत किसान (रैयत) को भूमि का स्वामी माना गया। किसान सीधे सरकार को भू-राजस्व अदा करता था तथा सरकार और किसान के बीच कोई जमींदार या अन्य मध्यस्थ नहीं होता था।
➣ इस व्यवस्था के अंतर्गत सामान्यतः कुल उपज का लगभग 33 प्रतिशत से 55 प्रतिशत तक भू-राजस्व के रूप में निर्धारित किया जाता था। यदि कोई किसान निर्धारित समय पर लगान जमा नहीं कर पाता था, तो उसे भूमि के स्वामित्व से वंचित किया जा सकता था।
➣ रैयतवाड़ी व्यवस्था में भूमि कर स्थायी नहीं था। समय-समय पर भूमि का पुनर्मूल्यांकन किया जाता था तथा लगभग 20 से 30 वर्ष के अंतराल पर भू-राजस्व की दरों में परिवर्तन किया जा सकता था।
➣ 1820 ई. में थॉमस मुनरो के मद्रास का गवर्नर बनने के बाद इस व्यवस्था को पूरे मद्रास प्रेसीडेंसी में व्यवस्थित रूप से लागू किया गया।
➣ इसके पश्चात् 1825 ई. में इसे बंबई प्रेसीडेंसी में तथा आगे चलकर दक्कन, असम, कुर्ग, सिंध एवं पूर्वी बंगाल के अनेक क्षेत्रों में भी लागू किया गया। ब्रिटिश भारत के लगभग 51 प्रतिशत भू-भाग में रैयतवाड़ी व्यवस्था प्रचलित थी।
➣ यद्यपि इस व्यवस्था में किसानों को भूमि का स्वामी माना गया, किन्तु व्यवहार में उन्हें कोई विशेष राहत नहीं मिली। सरकार ने अधिक राजस्व प्राप्त करने के लिए भूमि कर की दरें ऊँची रखीं, जिसके कारण अनेक किसान साहूकारों के ऋण के जाल में फँस गए और उनकी आर्थिक स्थिति लगातार खराब होती गई।
➣ रैयतवाड़ी व्यवस्था के दो प्रमुख दोष थे— (1) अत्यधिक भूमि कर तथा (2) भूमि कर की अनिश्चितता। इन्हीं कारणों से यह व्यवस्था भी किसानों के लिए लाभदायक सिद्ध नहीं हुई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसके अनेक प्रतिकूल प्रभाव पड़े।
रैयतवाड़ी व्यवस्था के प्रमुख लाभ एवं हानियाँ
| लाभ | हानियाँ |
|---|---|
| सरकार और किसान के बीच प्रत्यक्ष संबंध स्थापित हुआ। | भूमि कर की दरें अत्यधिक थीं। |
| जमींदारों की मध्यस्थ भूमिका समाप्त हो गई। | भूमि कर का समय-समय पर पुनर्निर्धारण किया जाता था। |
| किसानों को भूमि का सीमित स्वामित्व प्राप्त हुआ। | प्राकृतिक आपदाओं एवं अकाल के समय भी किसानों को कर देना पड़ता था। |
| भूमि अभिलेख एवं सर्वेक्षण व्यवस्था में सुधार हुआ। | किसानों की ऋणग्रस्तता एवं निर्धनता बढ़ी। |
| सरकार को राजस्व सीधे किसानों से प्राप्त होने लगा। | सरकार की कठोर राजस्व नीति के कारण कृषि विकास बाधित हुआ। |
रैयतवाड़ी व्यवस्था में सरकार का सीधा समझौता किसान (रैयत) से होता था। जमींदारों की मध्यस्थता समाप्त कर दी गई, लेकिन ऊँचे एवं अनिश्चित भूमि कर के कारण यह व्यवस्था किसानों के लिए लाभदायक सिद्ध नहीं हुई।
महालवाड़ी व्यवस्था
➣ महालवाड़ी व्यवस्था ब्रिटिश भारत की तीसरी प्रमुख भू-राजस्व व्यवस्था थी। इसमें महाल का अर्थ गाँव अथवा गाँवों के समूह से था। इस व्यवस्था के अंतर्गत संपूर्ण महाल (गाँव) को भू-राजस्व की इकाई माना गया तथा सरकार का समझौता पूरे गाँव अथवा उसके मुखिया से किया जाता था।
➣ इस व्यवस्था का प्रस्ताव सर्वप्रथम 1819 ई. में होल्ट मैकेंजी ने प्रस्तुत किया। इसके आधार पर 1822 ई. में रेगुलेशन-7 द्वारा इसे कानूनी मान्यता प्रदान की गई। बाद में लॉर्ड विलियम बेंटिक के शासनकाल में 1833 ई. से इसे व्यापक रूप से लागू किया गया।
➣ महालवाड़ी व्यवस्था में संपूर्ण गाँव अथवा महाल को भू-राजस्व की इकाई माना जाता था। गाँव के सभी किसान सामूहिक रूप से लगान देने के लिए उत्तरदायी होते थे तथा गाँव का मुखिया अथवा महाल प्रमुख सरकार और किसानों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाता था।
➣ इस व्यवस्था में जब तक किसान निर्धारित समय पर लगान अदा करता था, तब तक उसे भूमि का स्वामी माना जाता था। किसान अपनी भूमि का हस्तांतरण अथवा विक्रय भी कर सकता था, किन्तु समय पर लगान न चुकाने की स्थिति में उसे भूमि से बेदखल किया जा सकता था।
➣ महालवाड़ी व्यवस्था में भूमि का सर्वेक्षण एवं मानचित्र तैयार कर भू-राजस्व निर्धारित किया जाता था। यह व्यवस्था सर्वप्रथम आगरा एवं अवध के कुछ क्षेत्रों में लागू की गई।
➣ बाद में इसे उत्तर-पश्चिमी प्रांत, पंजाब, मध्य प्रांत तथा अवध के अनेक भागों में विस्तारित किया गया। ब्रिटिश भारत के लगभग 30 प्रतिशत भू-भाग में यह व्यवस्था लागू थी।
➣ महालवाड़ी व्यवस्था का उद्देश्य गाँव की सामूहिक जिम्मेदारी के आधार पर नियमित भू-राजस्व प्राप्त करना था, किन्तु व्यवहार में यह व्यवस्था भी किसानों के लिए लाभकारी सिद्ध नहीं हुई। भूमि कर का निर्धारण अक्सर वास्तविक उत्पादन के बजाय अनुमान के आधार पर किया जाता था, जिससे किसानों पर अधिक कर का बोझ पड़ता था।
➣ इस व्यवस्था ने महाल के मुखिया अथवा ग्राम प्रधान को अत्यधिक शक्तिशाली बना दिया। उसे किसानों से लगान वसूलने तथा निर्धारित समय पर लगान न देने वाले किसानों को भूमि से बेदखल करने का अधिकार प्राप्त था। इससे किसानों का शोषण बढ़ा और ग्रामीण समाज में असमानता भी बढ़ी।
➣ इस प्रकार महालवाड़ी व्यवस्था भी अंग्रेजों के राजस्व हितों की पूर्ति का माध्यम बनकर रह गई। यद्यपि इसकी संरचना स्थायी बंदोबस्त एवं रैयतवाड़ी व्यवस्था से भिन्न थी, फिर भी इसका मूल उद्देश्य किसानों से अधिक-से-अधिक भू-राजस्व प्राप्त करना ही था।
महालवाड़ी व्यवस्था के प्रमुख लाभ एवं हानियाँ
| लाभ | हानियाँ |
|---|---|
| गाँव (महाल) को भू-राजस्व की मूल इकाई के रूप में मान्यता मिली। | भूमि कर की दरें अपेक्षाकृत अधिक थीं। |
| भूमि अभिलेख एवं सर्वेक्षण व्यवस्था में सुधार हुआ। | भूमि कर का समय-समय पर पुनर्निर्धारण किया जाता था। |
| राजस्व निर्धारण में भूमि की गुणवत्ता एवं उत्पादन क्षमता का ध्यान रखा गया। | सामूहिक उत्तरदायित्व के कारण पूरे गाँव पर कर का दबाव बना रहता था। |
| ग्राम समुदाय की भागीदारी के आधार पर राजस्व वसूली की व्यवस्था विकसित हुई। | किसानों की निर्धनता एवं ऋणग्रस्तता में वृद्धि हुई। |
| भूमि सर्वेक्षण के आधार पर राजस्व निर्धारण का प्रयास किया गया। | इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य भी किसानों से अधिकतम भू-राजस्व प्राप्त करना था। |
▪ महालवाड़ी व्यवस्था में सरकार का समझौता गाँव (महाल) अथवा उसके मुखिया से किया जाता था। गाँव के सभी किसान सामूहिक रूप से भू-राजस्व के भुगतान के लिए उत्तरदायी होते थे।
तीनों भू-राजस्व व्यवस्थाओं की तुलना
➣ अंग्रेजों ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों की परिस्थितियों के अनुसार स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी व्यवस्था तथा महालवाड़ी व्यवस्था लागू की। यद्यपि इन तीनों व्यवस्थाओं की कार्यप्रणाली अलग-अलग थी, किन्तु इनका मूल उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के लिए अधिक-से-अधिक भू-राजस्व प्राप्त करना था।
| आधार | स्थायी बंदोबस्त | रैयतवाड़ी व्यवस्था | महालवाड़ी व्यवस्था |
|---|---|---|---|
| प्रवर्तक | लॉर्ड कॉर्नवालिस एवं जॉन शोर | कैप्टन रीड एवं सर थॉमस मुनरो | होल्ट मैकेंजी (प्रस्ताव), विलियम बेंटिक के काल में लागू |
| प्रारम्भ | 1793 ई. | 1792 ई. (प्रयोग), 1820 ई. से व्यापक रूप | 1822 ई. (मान्यता), 1833 ई. से व्यापक रूप |
| भूमि का स्वामी | जमींदार | किसान (रैयत) | किसान/ग्राम समुदाय |
| सरकार का समझौता | जमींदार से | किसान (रैयत) से | गाँव (महाल) अथवा उसके मुखिया से |
| मध्यस्थ | जमींदार | कोई मध्यस्थ नहीं | ग्राम मुखिया/महाल प्रमुख |
| लगान निर्धारण | स्थायी | 20–30 वर्ष बाद पुनर्निर्धारण | समय-समय पर पुनर्निर्धारण |
| प्रमुख क्षेत्र | बंगाल, बिहार, उड़ीसा, बनारस आदि | मद्रास, बंबई, असम, सिंध, कुर्ग आदि | उत्तर-पश्चिमी प्रांत, पंजाब, अवध, मध्य प्रांत आदि |
| ब्रिटिश भारत का भाग | लगभग 19% | लगभग 51% | लगभग 30% |
| मुख्य दोष | जमींदारों द्वारा किसानों का शोषण | अत्यधिक एवं अनिश्चित भू-राजस्व | ग्राम मुखिया का अत्यधिक प्रभुत्व एवं किसानों का शोषण |
➣ इन तीनों व्यवस्थाओं में केवल भू-राजस्व वसूली की पद्धति अलग-अलग थी, किन्तु इनका मूल उद्देश्य एक ही था—ब्रिटिश सरकार के लिए अधिक-से-अधिक राजस्व प्राप्त करना। परिणामस्वरूप किसानों पर कर का बोझ बढ़ा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर हुई तथा कृषि क्षेत्र में दीर्घकालीन संकट उत्पन्न हो गया।
▪ स्थायी बंदोबस्त में सरकार का समझौता जमींदार से, रैयतवाड़ी व्यवस्था में किसान (रैयत) से तथा महालवाड़ी व्यवस्था में गाँव (महाल) अथवा उसके मुखिया से किया जाता था।
व्यापार नीति
➣ अंग्रेजों की व्यापार नीति का मुख्य उद्देश्य भारतीय व्यापार को ब्रिटेन के आर्थिक हितों के अनुरूप बनाना था। इसके लिए उन्होंने व्यापार पर एकाधिकार स्थापित किया, भारतीय वस्तुओं पर विभिन्न प्रकार के प्रतिबंध लगाए तथा ब्रिटेन में निर्मित वस्तुओं के लिए भारत को एक विशाल बाजार में परिवर्तित कर दिया।
➣ प्रारम्भ में ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार पर एकाधिकार बनाए रखा, किन्तु बाद में 1813 एवं 1833 के चार्टर एक्टों के माध्यम से मुक्त व्यापार की नीति अपनाई गई। इन परिवर्तनों ने भारतीय व्यापार, उद्योग तथा संपूर्ण अर्थव्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया।
➣ ब्रिटिश व्यापार नीति के प्रमुख चरणों का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है—
ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार
➣ प्रारभ में 31 दिसम्बर 1600 ई. को इंग्लैंड की महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम ने ईस्ट इंडिया कंपनी को एक शाही चार्टर प्रदान किया था। इस चार्टर द्वारा कंपनी को पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने का विशेष (एकाधिकार) अधिकार प्राप्त हुआ।
➣ इस कारण इंग्लैंड का कोई अन्य व्यापारी कंपनी की अनुमति के बिना पूर्वी देशों के साथ में व्यापार नहीं कर सकता था।
➣ 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति आरम्भ हो चुकी थी। ब्रिटिश उद्योगपतियों एवं निजी व्यापारियों ने भारत के विशाल बाजार में स्वतंत्र व्यापार की माँग करनी शुरू कर दी। उनका तर्क था कि ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार ब्रिटिश व्यापार के विस्तार में बाधा बन रहा है।
➣ परिणामस्वरूप ब्रिटिश संसद ने 1813 ई. का चार्टर एक्ट पारित किया और निजी अंग्रेज व्यापारियों को भी भारत में व्यापार करने की अनुमति दे दी गई।
1813 का चार्टर एक्ट एवं मुक्त व्यापार की शुरुआत
➣ 1813 ई. में ब्रिटिश संसद ने चार्टर एक्ट, 1813 पारित किया। यह अधिनियम ब्रिटिश व्यापार नीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का प्रतीक था, क्योंकि इसके द्वारा भारत के साथ व्यापार पर ईस्ट इंडिया कंपनी का लगभग 213 वर्षों (1600–1813 ई.) पुराना एकाधिकार समाप्त कर दिया गया।
➣ इस अधिनियम के बाद भारत के साथ व्यापार करने का अधिकार केवल ईस्ट इंडिया कंपनी तक सीमित नहीं रहा। अब ब्रिटिश निजी व्यापारियों को भी भारत में व्यापार करने की अनुमति मिल गई, जिससे भारत में मुक्त व्यापार के युग की शुरुआत हुई।
➣ हालांकि, चाय के व्यापार तथा चीन के साथ व्यापार पर ईस्ट इंडिया कंपनी का एकाधिकार यथावत् बना रहा। इन दोनों क्षेत्रों में कंपनी को प्राप्त विशेषाधिकार 1833 ई. के चार्टर एक्ट द्वारा समाप्त किए गए।
➣ मुक्त व्यापार की शुरुआत के बाद भारत में ब्रिटिश व्यापारियों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। परिणामस्वरूप भारतीय बाजार में ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं का आयात बढ़ा तथा भारत का उपयोग ब्रिटिश उद्योगों के लिए एक विशाल बाजार के रूप में किया जाने लगा।
➣ इस प्रकार 1813 का चार्टर एक्ट ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार के अंत तथा भारत में मुक्त व्यापार नीति की शुरुआत का आधार बना। इसी अधिनियम ने ब्रिटिश औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था को वाणिज्यिक चरण से औद्योगिक मुक्त व्यापार चरण की ओर अग्रसर किया।
▪ 1813 के चार्टर एक्ट द्वारा भारत में ईसाई मिशनरियों को कार्य करने की अनुमति दी गई। साथ ही भारतीय शिक्षा के विकास के लिए प्रतिवर्ष एक लाख रुपये व्यय करने का प्रावधान भी किया गया था।
1833 का चार्टर एक्ट एवं मुक्त व्यापार नीति
➣ 1833 ई. में ब्रिटिश संसद ने चार्टर एक्ट, 1833 पारित किया, जिसने ईस्ट इंडिया कंपनी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। इस अधिनियम द्वारा कंपनी के चाय के व्यापार तथा चीन के साथ व्यापार पर शेष एकाधिकार भी समाप्त कर दिया गया। इसके साथ ही ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यापारिक संस्था के रूप में भूमिका समाप्त हो गई।
➣ 1833 ई. के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी केवल एक प्रशासनिक संस्था बनकर रह गई। अब उसका मुख्य कार्य भारत का शासन एवं प्रशासन संचालित करना था, जबकि भारत के साथ व्यापार का क्षेत्र ब्रिटिश निजी व्यापारियों एवं पूँजीपतियों के लिए पूर्णतः खोल दिया गया।➣ इस अधिनियम के बाद भारत में औपनिवेशिक मुक्त व्यापार नीति का पूर्ण विकास हुआ। इस नीति का उद्देश्य भारत को ब्रिटिश उद्योगों के लिए कच्चे माल का स्रोत तथा ब्रिटेन में निर्मित वस्तुओं का विशाल बाजार बनाना था।
➣ इस नीति के अंतर्गत ब्रिटिश व्यापारियों एवं पूँजीपतियों को भारत में व्यापार करने की व्यापक स्वतंत्रता प्रदान की गई, जबकि भारतीय व्यापारियों एवं उद्योगों को समान अवसर प्राप्त नहीं हुए। परिणामस्वरूप विदेशी निर्मित वस्तुओं का आयात तेजी से बढ़ा और भारतीय उत्पादकों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति लगातार कमजोर होती गई।
➣ इसके परिणामस्वरूप भारत से कपास, जूट, नील, चाय, अफीम तथा अन्य कच्चे माल का निर्यात बढ़ा, जबकि ब्रिटेन के कारखानों में निर्मित सूती वस्त्र, धातु उत्पाद तथा अन्य तैयार माल बड़ी मात्रा में भारतीय बाजारों में आने लगे। इससे भारत की पारंपरिक आर्थिक संरचना में व्यापक परिवर्तन हुआ।
➣ यद्यपि इस नीति को मुक्त व्यापार कहा गया, किन्तु व्यवहार में यह समान अवसरों पर आधारित नहीं थी। इसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश उद्योगों एवं व्यापारियों के आर्थिक हितों की पूर्ति करना था। इसी कारण इतिहासकार इसे औपनिवेशिक मुक्त व्यापार नीति की संज्ञा देते हैं।
➣ इस प्रकार 1833 का चार्टर एक्ट तथा मुक्त व्यापार नीति ने भारत को ब्रिटिश औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग बना दिया। आगे चलकर इन नीतियों का भारतीय उद्योग, व्यापार, कृषि एवं समग्र अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ा।
▪ ब्रिटिश व्यापार नीति के परिणामस्वरूप भारत कच्चे माल का निर्यातक तथा ब्रिटेन में निर्मित तैयार वस्तुओं का आयातक बन गया। यही औपनिवेशिक व्यापार नीति की सबसे प्रमुख विशेषता मानी जाती है।
औद्योगिक नीति
➣ 1813 ई. के चार्टर एक्ट के बाद भारत के साथ व्यापार पर ईस्ट इंडिया कंपनी का एकाधिकार अधिकांश क्षेत्रों में समाप्त हो गया। इसके साथ ही भारत में ब्रिटिश आर्थिक शोषण का एक नया चरण प्रारम्भ हुआ, जिसे औद्योगिक पूँजीवाद (1813–1858 ई.) कहा जाता है।
➣ इस काल में इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर कारखानों की स्थापना हुई। मशीनों द्वारा उत्पादन बढ़ने से ब्रिटिश उद्योगों का तीव्र विकास हुआ तथा उनकी आर्थिक आवश्यकताएँ भी बदल गईं।
➣ औद्योगिक क्रांति के बाद ब्रिटेन के सामने दो प्रमुख चुनौतियाँ थीं—
- उद्योगों के लिए पर्याप्त मात्रा में सस्ता कच्चा माल एवं खाद्यान्न उपलब्ध कराना।
- कारखानों में निर्मित वस्तुओं की बिक्री के लिए विशाल एवं स्थायी बाजार की व्यवस्था करना।
➣ इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ब्रिटिश सरकार ने भारत के प्रति अपनी आर्थिक नीति में परिवर्तन किया। 1813 ई. के चार्टर एक्ट के माध्यम से भारत में मुक्त व्यापार नीति की शुरुआत की गई, जिससे ब्रिटिश निजी व्यापारियों को भी भारत में व्यापार करने का अधिकार मिल गया।
➣ अंग्रेजों ने भारत को ब्रिटिश उद्योगों के लिए कच्चे माल का प्रमुख स्रोत तथा ब्रिटेन में निर्मित तैयार वस्तुओं का विशाल बाजार बनाने की नीति अपनाई। इसी उद्देश्य से कृषि, उद्योग, व्यापार तथा परिवहन से संबंधित अनेक नई नीतियाँ लागू की गईं।
➣ परिणामस्वरूप भारतीय कुटीर एवं हस्तशिल्प उद्योगों का पतन होने लगा, जबकि ब्रिटिश उद्योगों को निरंतर प्रोत्साहन मिला। यही औद्योगिक नीति आगे चलकर भारत की औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार बनी।
भारतीय कुटीर एवं हस्तशिल्प उद्योगों का पतन
➣ 18वीं शताब्दी तक भारत अपने विकसित कुटीर एवं हस्तशिल्प उद्योगों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध था। ढाका की मलमल, बनारस के रेशमी वस्त्र, बंगाल के सूती कपड़े, कश्मीर की शॉल तथा दक्षिण भारत के वस्त्रों की यूरोप सहित अनेक देशों में अत्यधिक माँग थी।
➣ 1813 ई. के चार्टर एक्ट के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार अधिकांश क्षेत्रों में समाप्त हो गया और ब्रिटिश निजी व्यापारियों को भारत में व्यापार करने की अनुमति मिल गई।
➣ इसके बाद इंग्लैण्ड के कारखानों में मशीनों से निर्मित वस्त्र एवं अन्य औद्योगिक उत्पाद बड़ी मात्रा में भारतीय बाजारों में आने लगे।
➣ ब्रिटेन में मशीनों द्वारा बड़े पैमाने पर उत्पादन होने के कारण वहाँ निर्मित वस्तुएँ भारतीय हस्तनिर्मित उत्पादों की तुलना में अधिक सस्ती थीं। परिणामस्वरूप भारतीय बुनकर, दस्तकार एवं शिल्पकार विदेशी वस्तुओं से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सके और उनके उत्पादों की माँग लगातार घटने लगी।
➣ धीरे-धीरे भारत के पारंपरिक कुटीर एवं हस्तशिल्प उद्योग कमजोर होते गए। अनेक प्रसिद्ध वस्त्र उत्पादन केन्द्रों का महत्व कम हो गया तथा सदियों से चले आ रहे अनेक पारंपरिक उद्योग पतन की ओर अग्रसर हो गए।
➣ भारतीय कुटीर एवं हस्तशिल्प उद्योगों के इस व्यापक पतन को इतिहास में विऔद्योगीकरण कहा जाता है। इसे ब्रिटिश औद्योगिक नीति का सबसे गंभीर परिणाम माना जाता है।
ब्रिटिश उद्योगों को संरक्षण
➣ औद्योगिक क्रांति के बाद ब्रिटेन के वस्त्र उद्योग का तीव्र विकास हुआ। अंग्रेज नहीं चाहते थे कि भारतीय वस्त्र यूरोपीय बाजारों में ब्रिटिश उत्पादों को प्रतिस्पर्धा दें। इसलिए उन्होंने अपने उद्योगों की सुरक्षा के लिए अनेक संरक्षणवादी नीतियाँ अपनाईं।
➣ भारतीय सूती एवं रेशमी वस्त्र अपनी उत्कृष्ट गुणवत्ता के कारण यूरोप में अत्यधिक लोकप्रिय थे। इससे ब्रिटिश वस्त्र उद्योग को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा था। इस प्रतिस्पर्धा को समाप्त करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने भारतीय वस्त्रों पर प्रतिबंध और भारी आयात शुल्क लगाना प्रारम्भ किया।
➣ 1700 ई. में ब्रिटिश सरकार ने भारत से इंग्लैण्ड आने वाले रंगीन एवं छपे हुए सूती वस्त्रों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया। साथ ही भारतीय सूती वस्त्रों पर लगभग 15 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया गया, ताकि ब्रिटिश वस्त्र उद्योग को संरक्षण मिल सके।
➣ इसके बाद 1720 ई. में भारतीय रेशमी एवं छपे हुए सूती वस्त्रों के उपयोग पर भी इंग्लैण्ड में लगभग पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया। यहाँ तक कि ऐसे वस्त्र पहनने वालों पर जुर्माना भी लगाया जाने लगा।
➣ यूरोप की प्रमुख व्यापारिक शक्तियों में केवल हॉलैण्ड ऐसा देश था, जिसने भारतीय सूती वस्त्रों के आयात पर न तो कोई प्रतिबंध लगाया और न ही उन पर अतिरिक्त आयात शुल्क लगाया।
➣ इन संरक्षणवादी नीतियों का उद्देश्य भारतीय उद्योगों का विकास रोकना तथा ब्रिटिश उद्योगों को सुरक्षित वातावरण प्रदान करना था। परिणामस्वरूप ब्रिटेन के वस्त्र उद्योग को तेजी से बढ़ने का अवसर मिला, जबकि भारतीय वस्त्र उद्योग लगातार कमजोर होता गया।
➣ इस प्रकार ब्रिटिश सरकार ने एक ओर भारतीय वस्त्रों पर प्रतिबंध लगाए और दूसरी ओर ब्रिटेन में निर्मित मशीनों के वस्त्रों को भारत के बाजार में बढ़ावा दिया। इससे ब्रिटिश उद्योगों को अत्यधिक लाभ हुआ, जबकि भारतीय कुटीर एवं हस्तशिल्प उद्योगों का पतन और अधिक तेज़ हो गया।
औद्योगिक नीति के प्रभाव
➣ ब्रिटिश औद्योगिक नीति के कारण भारतीय कुटीर एवं हस्तशिल्प उद्योगों का व्यापक पतन हुआ, जिसका भारतीय अर्थव्यवस्था एवं समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़ा। इन नीतियों ने भारत की पारंपरिक औद्योगिक संरचना को कमजोर कर दिया।
➣ उद्योगों के बंद होने से लाखों बुनकर, दस्तकार एवं कारीगर बेरोजगार हो गए। सदियों से चले आ रहे उनके पारंपरिक व्यवसाय समाप्त होने लगे और अनेक शिल्प समुदाय आर्थिक संकट का सामना करने लगे। भारतीय सूती वस्त्र उद्योग को ब्रिटिश औद्योगिक नीति से सर्वाधिक क्षति पहुँची।
➣ जीविका के अन्य साधन उपलब्ध न होने के कारण बड़ी संख्या में कारीगर कृषि की ओर मुड़ गए। दूसरी ओर अंग्रेजों ने कृषि के वाणिज्यीकरण को प्रोत्साहित किया।
➣ किसानों को नील, कपास, अफीम, चाय, जूट एवं कॉफी जैसी नकदी फसलों की खेती के लिए प्रेरित एवं कई स्थानों पर बाध्य किया गया। इसके परिणामस्वरूप खाद्यान्न फसलों का उत्पादन प्रभावित हुआ और देश में खाद्यान्न की कमी बढ़ने लगी।
➣ उद्योगों के पतन एवं कृषि पर बढ़ते दबाव के कारण भारत में गरीबी, बेरोजगारी तथा भुखमरी की समस्या लगातार गंभीर होती गई। अनेक परिवारों की आय का प्रमुख स्रोत समाप्त हो गया और उनकी आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई।
➣ ब्रिटिश शासन की नीतियों के कारण भारत में पूँजी संचय की प्रक्रिया भी बाधित हुई। उद्योगों से होने वाला लाभ भारतीय अर्थव्यवस्था में पुनर्निवेश होने के बजाय विभिन्न माध्यमों से ब्रिटेन भेज दिया जाता था।
➣ साथ ही 19वीं शताब्दी में भारत से ब्रिटेन को कपास का सबसे अधिक निर्यात किया जाता था, जिससे ब्रिटिश वस्त्र उद्योग को निरंतर कच्चा माल मिलता रहा। परिणामस्वरूप भारत में आधुनिक उद्योगों का विकास अपेक्षित गति से नहीं हो सका।
➣ भारत धीरे-धीरे एक औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था में परिवर्तित हो गया, जहाँ उसका प्रमुख कार्य ब्रिटेन के उद्योगों के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराना तथा ब्रिटेन में निर्मित तैयार वस्तुओं के लिए एक विशाल बाजार के रूप में कार्य करना रह गया।
➣ कार्ल मार्क्स ने इस स्थिति का वर्णन करते हुए कहा कि विश्व के कपड़ों के घर को विदेशी कपड़ों से भर दिया गया। वहीं गवर्नर जनरल विलियम बेंटिक ने भारतीय हस्तशिल्प उद्योगों की दुर्दशा पर टिप्पणी करते हुए कहा कि भारतीय बुनकरों की हड्डियाँ भारत के मैदानों में बिखरी पड़ी हैं। ये कथन ब्रिटिश औद्योगिक नीति के दुष्परिणामों को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।
कृषि का वाणिज्यीकरण
➣ ब्रिटिश शासनकाल में भारतीय कृषि की प्रकृति में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। परंपरागत रूप से भारतीय किसान अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मुख्यतः खाद्यान्न फसलों की खेती करते थे, किन्तु अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों के कारण कृषि का उद्देश्य धीरे-धीरे बदलने लगा।
➣ कृषि के इस परिवर्तन को कृषि का वाणिज्यीकरण कहा जाता है। इसका अर्थ है-कृषि का उत्पादन घरेलू उपभोग के बजाय बाजार एवं व्यापारिक लाभ को ध्यान में रखकर करना।
➣ ब्रिटिश शासन के दौरान नील, कपास, जूट, अफीम, चाय, कॉफी आदि नकदी फसलों के उत्पादन को विशेष बढ़ावा दिया गया। इन फसलों का उपयोग ब्रिटिश उद्योगों के लिए कच्चे माल के रूप में किया जाता था अथवा उनका निर्यात कर लाभ अर्जित किया जाता था।
➣ कृषि के वाणिज्यीकरण से ब्रिटिश व्यापार एवं उद्योगों को तो लाभ हुआ, किन्तु भारतीय किसानों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। खाद्यान्न फसलों का क्षेत्र घटने लगा, किसानों की नकदी फसलों पर निर्भरता बढ़ी तथा भारतीय कृषि धीरे-धीरे औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था का अंग बन गई।
कृषि के वाणिज्यीकरण की पृष्ठभूमि
➣ ब्रिटिश शासन से पूर्व भारतीय कृषि का मुख्य उद्देश्य किसानों एवं उनके परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति करना था। अधिकांश किसान गेहूँ, चावल, ज्वार, बाजरा एवं दालों जैसी खाद्यान्न फसलों की खेती करते थे और अतिरिक्त उत्पादन का ही व्यापार किया जाता था।
➣ ब्रिटिश शासनकाल में यह व्यवस्था बदलने लगी। अंग्रेजों ने अपनी आर्थिक आवश्यकताओं के अनुसार किसानों को नकदी फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित किया। कई क्षेत्रों में किसानों पर नील, कपास, जूट, अफीम तथा चाय जैसी फसलें उगाने का दबाव भी डाला गया।
➣ भूमि राजस्व की कठोर व्यवस्था ने भी कृषि के वाणिज्यीकरण को बढ़ावा दिया। किसानों को लगान नकद में चुकाना पड़ता था, इसलिए उन्हें अपनी उपज बाजार में बेचकर धन प्राप्त करना आवश्यक हो गया। इससे कृषि का संबंध सीधे बाजार व्यवस्था से जुड़ गया।
➣ अंग्रेजों ने भारत को ब्रिटिश उद्योगों के लिए कच्चे माल का आपूर्तिकर्ता बना दिया। इसलिए उन फसलों के उत्पादन पर विशेष बल दिया गया, जिनकी इंग्लैण्ड के उद्योगों एवं अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अधिक माँग थी।
➣ इस नीति के परिणामस्वरूप अनेक क्षेत्रों में खाद्यान्न फसलों का स्थान धीरे-धीरे नकदी फसलों ने ले लिया। इससे किसानों की आय बाजार की कीमतों पर निर्भर होने लगी तथा भारतीय कृषि आत्मनिर्भरता से हटकर निर्यातोन्मुख होती चली गई।
➣ यद्यपि कृषि के वाणिज्यीकरण से ब्रिटिश उद्योगों एवं व्यापारियों को लाभ हुआ, किन्तु भारतीय किसानों के लिए यह व्यवस्था अनेक आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं का कारण बनी।
`प्रमुख वाणिज्यिक फसलें
➣ ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेजों ने अपनी औद्योगिक एवं व्यापारिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनेक नकदी फसलों के उत्पादन को बढ़ावा दिया। इनमें नील, कपास, जूट, अफीम तथा चाय प्रमुख थीं।
| फसल | प्रमुख क्षेत्र | ब्रिटिश उद्देश्य / उपयोग |
|---|---|---|
| नील | बंगाल, बिहार | यूरोप के वस्त्र उद्योग के लिए नीले रंग (Indigo Dye) का उत्पादन। |
| कपास | महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य भारत | ब्रिटेन के सूती वस्त्र उद्योग हेतु कच्चा माल उपलब्ध कराना। |
| जूट | बंगाल | बोरे, रस्सियाँ एवं पैकिंग सामग्री के निर्माण के लिए। |
| अफीम | बिहार, उत्तर प्रदेश | मुख्यतः चीन को निर्यात कर व्यापारिक लाभ अर्जित करना। |
| चाय | असम, दार्जिलिंग, उत्तर-पूर्व भारत | यूरोपीय बाजार की बढ़ती माँग को पूरा करना। |
▪ ब्रिटिश शासनकाल में नील सबसे महत्त्वपूर्ण वाणिज्यिक फसलों में से एक थी। महात्मा गाँधी ने 1917 ई. में अपना प्रथम सत्याग्रह (चम्पारण सत्याग्रह) इसी के विरुद्ध किया था।
कृषि के वाणिज्यीकरण के प्रभाव
➣ नकदी फसलों के उत्पादन को बढ़ावा मिलने से गेहूँ, चावल, ज्वार, बाजरा एवं दालों जैसी खाद्यान्न फसलों का क्षेत्र कई स्थानों पर घटने लगा। इससे खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हुआ तथा अनेक क्षेत्रों में अनाज की कमी की स्थिति उत्पन्न हुई।
➣ किसानों को भूमि राजस्व चुकाने एवं बाजार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपनी उपज बेचनी पड़ती थी। इससे वे बाजार की कीमतों एवं महाजनों पर अधिक निर्भर हो गए और धीरे-धीरे ऋणग्रस्तता बढ़ने लगी।
➣ नकदी फसलों की खेती में लाभ-हानि पूरी तरह बाजार पर निर्भर थी। फसलों की कीमतों में गिरावट अथवा प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता था, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और कमजोर होती गई।
➣ खाद्यान्न उत्पादन में कमी तथा किसानों की आर्थिक कठिनाइयों के कारण अकाल एवं भुखमरी की समस्या भी अधिक गंभीर होती गई। अनेक इतिहासकारों का मत है कि ब्रिटिश कृषि नीति ने अकाल की विभीषिका को और बढ़ा दिया।
➣ कृषि के वाणिज्यीकरण से ब्रिटिश उद्योगों एवं विदेशी व्यापार को पर्याप्त लाभ हुआ, किन्तु भारतीय कृषि आत्मनिर्भरता खोती चली गई। किसान अपनी आवश्यकताओं के बजाय बाजार की माँग के अनुसार खेती करने के लिए विवश हो गए।
➣ इस प्रकार कृषि का वाणिज्यीकरण भारतीय किसानों के लिए लाभकारी सिद्ध नहीं हुआ। इसके परिणामस्वरूप कृषि पर बाजार का नियंत्रण बढ़ा, किसानों की आर्थिक निर्भरता गहरी हुई तथा भारतीय कृषि औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग बन गई।
इतिहासकारों के विचार
➣ ब्रिटिश शासनकाल में कृषि के वाणिज्यीकरण का मूल्यांकन विभिन्न इतिहासकारों एवं अर्थशास्त्रियों ने अलग-अलग दृष्टिकोण से किया है। अधिकांश विद्वानों का मत है कि यह नीति भारतीय किसानों के हित में नहीं, बल्कि ब्रिटिश आर्थिक हितों की पूर्ति के लिए अपनाई गई थी।
➣ दादाभाई नौरोजी ने अपनी धन निष्कासन की अवधारणा में स्पष्ट किया कि भारत की कृषि एवं प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग ब्रिटेन की समृद्धि बढ़ाने के लिए किया गया, जबकि भारतीय किसान लगातार निर्धन होते गए।
➣ आर. सी. दत्त के अनुसार ब्रिटिश भूमि राजस्व नीति तथा कृषि के वाणिज्यीकरण ने भारतीय किसानों पर अत्यधिक आर्थिक बोझ डाला। नकदी फसलों को बढ़ावा मिलने से खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हुआ और अकाल की स्थिति और गंभीर होती गई।
➣ बिपिन चंद्र का मत है कि कृषि का वाणिज्यीकरण स्वाभाविक आर्थिक विकास का परिणाम नहीं था, बल्कि यह ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति का हिस्सा था। इसका उद्देश्य भारत को ब्रिटिश उद्योगों के लिए कच्चे माल का स्रोत तथा ब्रिटेन में निर्मित वस्तुओं का बाजार बनाना था।
➣ इतिहासकारों के इन विचारों से स्पष्ट होता है कि कृषि का वाणिज्यीकरण भारतीय कृषि के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया नहीं था। इसका प्रमुख उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य के आर्थिक हितों की पूर्ति करना था, जिसके कारण भारतीय किसान, ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा खाद्यान्न उत्पादन पर दीर्घकालीन प्रतिकूल प्रभाव पड़े।
| इतिहासकार / विचारक | मुख्य विचार |
|---|---|
| दादाभाई नौरोजी | कृषि के वाणिज्यीकरण को धन निष्कासन (Drain of Wealth) की प्रक्रिया से जोड़ा। |
| आर. सी. दत्त | इसे किसानों की निर्धनता तथा बार-बार पड़ने वाले अकालों का प्रमुख कारण माना। |
| बिपिन चंद्र | कृषि के वाणिज्यीकरण को ब्रिटिश औपनिवेशिक आर्थिक नीति का अभिन्न अंग बताया। |
वित्तीय पूंजीवाद (1860 ई. के बाद)
➣ 1858 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन की समाप्ति तथा भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन आने के बाद ब्रिटिश उपनिवेशवाद का एक नया चरण प्रारम्भ हुआ, जिसे वित्तीय पूंजीवाद कहा जाता है। इस चरण में ब्रिटेन का मुख्य उद्देश्य भारत में व्यापार करने के बजाय अपनी पूँजी का निवेश कर अधिकतम लाभ अर्जित करना था।
➣ वित्तीय पूंजीवाद के दौर में ब्रिटिश पूँजी का सबसे अधिक निवेश सार्वजनिक ऋण के क्षेत्र में किया गया। इसके अतिरिक्त भारत में सबसे पहले बड़े पैमाने पर पूँजी निवेश रेलवे के निर्माण एवं विस्तार में हुआ, क्योंकि इससे ब्रिटिश व्यापारिक तथा सामरिक हितों की पूर्ति होती थी।
➣ इस काल में ब्रिटिश निवेशकों ने भारत में बैंकिंग, बीमा, रेलवे, जहाजरानी (नौ-परिवहन) तथा वित्तीय संस्थानों में व्यापक निवेश किया। इन क्षेत्रों के माध्यम से ब्रिटिश पूँजीपतियों को सुरक्षित एवं नियमित लाभ प्राप्त होता था।
➣ रेलवे एवं वित्तीय संस्थानों के अतिरिक्त चाय, कॉफी, रबर के बागान तथा जूट उद्योग में भी ब्रिटिश निवेश निरंतर बढ़ता गया। इसके विपरीत ब्रिटिश निवेशकों ने भारतीय स्वामित्व वाले सूती वस्त्र एवं लौह-इस्पात उद्योग में अपेक्षाकृत कम रुचि दिखाई, क्योंकि इनसे ब्रिटिश उद्योगों को प्रतिस्पर्धा मिलने की संभावना थी।
➣ इस प्रकार वित्तीय पूंजीवाद के दौर में भारत केवल कच्चे माल का स्रोत या तैयार माल का बाजार ही नहीं रहा, बल्कि ब्रिटिश पूँजी के निवेश का एक प्रमुख क्षेत्र भी बन गया। इससे भारत की अर्थव्यवस्था पर ब्रिटिश वित्तीय नियंत्रण और अधिक सुदृढ़ हो गया।
➣ वित्तीय पूंजीवाद के इस चरण में भारत में आधुनिक उद्योगों का विकास भी प्रारम्भ हुआ। यद्यपि प्रारम्भिक उद्योगों की स्थापना में ब्रिटिश पूँजी की भूमिका महत्वपूर्ण थी, किन्तु आगे चलकर भारतीय उद्यमियों ने भी आधुनिक उद्योगों के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया।
भारत में आधुनिक उद्योगों का विकास
➣ ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में आधुनिक उद्योगों का विकास मुख्यतः ब्रिटिश आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर हुआ। प्रारम्भिक उद्योगों की स्थापना का उद्देश्य भारतीय औद्योगीकरण नहीं, बल्कि कच्चे माल का प्रसंस्करण, निर्यात तथा ब्रिटिश व्यापार को सुविधा प्रदान करना था।
➣ भारत का पहला आधुनिक उद्योग सूती वस्त्र उद्योग माना जाता है। 1853 ई. में कावसजी नानाभाई डाबर ने बम्बई के तारदेव में पहली सफल सूती मिल स्थापित की।
➣ इसके बाद 1854 ई. में उन्होंने बॉम्बे स्पिनिंग एंड वीविंग कंपनी की स्थापना की, जिसे भारतीयों द्वारा स्थापित पहली आधुनिक सूती वस्त्र मिल माना जाता है।
➣ भारत की पहली जूट (पटसन) मिल 1855 ई. में जॉर्ज आकलैण्ड द्वारा बंगाल के रिशरा में स्थापित की गई। जूट उद्योग मुख्यतः निर्यात पर आधारित था और आगे चलकर बंगाल इसका प्रमुख केन्द्र बन गया।
➣ भारत में आधुनिक लौह एवं इस्पात उद्योग की शुरुआत के प्रयास भी इसी काल में हुए। 1830 ई. में मद्रास के अकर में जोसिया मार्शल हीथ ने आधुनिक इस्पात निर्माण का पहला प्रयास किया।
➣ बाद में 1874 ई. में पश्चिम बंगाल के कुल्टी में बाराकर आयरन वर्क्स (बाद में बंगाल आयरन वर्क्स) की स्थापना की गई, जो भारत के प्रारम्भिक लौह उद्योगों में से एक था।
➣ 1907 ई. में टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO) की स्थापना के साथ भारत में निजी क्षेत्र के आधुनिक लौह-इस्पात उद्योग को नई दिशा मिली। यह भारतीय उद्योग जगत की एक ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जाती है।
➣ 1833 ई. के चार्टर एक्ट के बाद कंपनी का चीन के साथ व्यापारिक एकाधिकार समाप्त होने पर भारत में 1835 ई. में पहला चाय बागान स्थापित किया गया तथा 1837 ई. में असम टी कंपनी की स्थापना हुई। इसके बाद चाय उद्योग भी ब्रिटिश निवेश का एक प्रमुख क्षेत्र बन गया।
➣ यद्यपि आधुनिक उद्योगों की स्थापना से भारत में औद्योगिक विकास की शुरुआत हुई, फिर भी इनका संचालन मुख्यतः औपनिवेशिक हितों के अनुरूप किया गया। इन उद्योगों का उद्देश्य भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ाना नहीं, बल्कि ब्रिटिश व्यापार एवं पूँजी को अधिक लाभ पहुँचाना था।
प्रथम विश्वयुद्ध एवं भारतीय उद्योग
➣ 1914–1918 ई. के बीच हुए प्रथम विश्वयुद्ध ने भारतीय उद्योगों के विकास को नई गति प्रदान की। युद्ध के दौरान ब्रिटेन के उद्योग युद्ध सामग्री के उत्पादन में व्यस्त हो गए, जिसके कारण भारत में निर्मित वस्तुओं की माँग देश एवं विदेश दोनों स्थानों पर बढ़ गई।
➣ इस अवधि में सूती वस्त्र, जूट, चीनी, इस्पात तथा अन्य उद्योगों का उत्पादन बढ़ा। भारतीय उद्योगपतियों को अपने उद्योगों के विस्तार का अवसर मिला और अनेक नए औद्योगिक प्रतिष्ठानों की स्थापना भी हुई।
➣ युद्ध के अनुभव से ब्रिटिश सरकार को भी यह महसूस हुआ कि भारत में कुछ प्रमुख उद्योगों का विकास आवश्यक है। इसी उद्देश्य से 1916 ई. में वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने सर थॉमस हॉलैण्ड की अध्यक्षता में भारतीय औद्योगिक आयोग की स्थापना की।
➣ इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट अनुशंसा की कि भारत के कुछ प्रमुख उद्योगों को सरकारी संरक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि उनका विकास हो सके और देश औद्योगिक दृष्टि से अधिक सक्षम बन सके।
➣ इसके बाद 1921 ई. में इब्राहिम रहीमतुल्ला की अध्यक्षता में गठित वित्तीय आयोग ने भी भारतीय उद्योगों को संरक्षण देने तथा औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित करने की सिफारिश की।
➣ इन आयोगों की अनुशंसाओं के परिणामस्वरूप भारत में संरक्षणवादी औद्योगिक नीति अपनाने की दिशा में कदम बढ़ाए गए। इससे कुछ भारतीय उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से राहत मिली और उनके विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार हुआ।
➣ इस प्रकार प्रथम विश्वयुद्ध भारतीय औद्योगिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ। इसके बाद भारतीय उद्योगों के विकास में गति आई तथा आगे चलकर भारतीय पूँजीपतियों की भूमिका भी निरंतर बढ़ने लगी।
भारतीय पूंजीपतियों का उदय
➣ 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक भारत के अधिकांश बड़े उद्योगों एवं व्यापारिक संस्थानों पर ब्रिटिश पूँजी का प्रभुत्व था। किन्तु धीरे-धीरे भारतीय उद्योगपतियों एवं व्यापारियों ने भी आधुनिक उद्योगों में निवेश करना प्रारम्भ किया और देश में एक नए भारतीय पूंजीपति वर्ग का उदय हुआ।
➣ 1920 के बाद भारतीय उद्यमियों ने कपड़ा, चीनी, सीमेंट, कागज, लौह-इस्पात तथा अन्य उद्योगों में बड़े पैमाने पर निवेश करना प्रारम्भ किया। इससे भारतीय स्वामित्व वाले उद्योगों का विस्तार हुआ और स्वदेशी औद्योगिक विकास को नई गति मिली।
➣ भारतीय उद्योगपतियों के हितों की रक्षा तथा उनकी समस्याओं को संगठित रूप से सरकार के समक्ष रखने के उद्देश्य से 1927 ई. में फिक्की (FICCI – Federation of Indian Chambers of Commerce and Industry) की स्थापना की गई। इस संगठन ने भारतीय उद्योग एवं व्यापार के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ भारतीय उद्योगपतियों ने केवल औद्योगिक विकास तक ही अपनी भूमिका सीमित नहीं रखी, बल्कि देश के आर्थिक भविष्य के संबंध में भी अपने विचार प्रस्तुत किए। इसी क्रम में 1944 ई. में प्रसिद्ध बॉम्बे प्लान (Bombay Plan) प्रस्तुत किया गया।
➣ बॉम्बे प्लान भारतीय अर्थव्यवस्था के नियोजित औद्योगिक विकास का एक महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव था। इसमें पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास, घनश्यामदास बिरला, जे. आर. डी. टाटा, अरदेशिर दलाल, लाला श्रीराम, कस्तूरभाई लालभाई, ए. डी. श्रॉफ तथा जॉन मथाई जैसे प्रमुख उद्योगपतियों एवं अर्थशास्त्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
➣ इस योजना में औद्योगीकरण, आधारभूत संरचना के विकास, उत्पादन वृद्धि तथा राज्य की सक्रिय आर्थिक भूमिका पर बल दिया गया। यद्यपि यह योजना औपनिवेशिक शासन के दौरान प्रस्तुत की गई थी, फिर भी स्वतंत्र भारत की आर्थिक योजना निर्माण प्रक्रिया पर इसका उल्लेखनीय प्रभाव पड़ा।
➣ इस प्रकार वित्तीय पूंजीवाद के अंतिम चरण में भारतीय पूंजीपति वर्ग एक संगठित आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा। आगे चलकर इसी वर्ग ने स्वदेशी उद्योगों के विकास, आर्थिक आत्मनिर्भरता तथा स्वतंत्र भारत के औद्योगिक निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
वित्तीय पूंजीवाद के प्रभाव एवं परिणाम
➣ वित्तीय पूंजीवाद के दौर में भारत में ब्रिटिश पूँजी का निवेश निरंतर बढ़ता गया। रेलवे, बैंक, बीमा, जहाजरानी, बागानों तथा अन्य क्षेत्रों में किए गए निवेश से ब्रिटिश निवेशकों को भारी लाभ हुआ, जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था पर विदेशी पूँजी का नियंत्रण और अधिक मजबूत हो गया।
➣ इस काल में ब्रिटिश सरकार ने सार्वजनिक ऋण के माध्यम से भी बड़ी मात्रा में पूँजी जुटाई। इन ऋणों पर ब्याज तथा लाभांश का भुगतान भारतीय राजस्व से किया जाता था, जिससे भारत की राष्ट्रीय आय का एक बड़ा भाग प्रतिवर्ष ब्रिटेन भेजा जाने लगा।
➣ ब्रिटिश आर्थिक नीतियों के कारण भारतीय उद्योगों एवं व्यापार का विकास औपनिवेशिक हितों के अधीन रहा। भारतीय संसाधनों का उपयोग मुख्यतः ब्रिटिश पूँजीपतियों के लाभ के लिए किया गया, जबकि भारतीय जनता को इसका अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका।
➣ वित्तीय पूंजीवाद के परिणामस्वरूप भारत की अर्थव्यवस्था पहले की अपेक्षा अधिक निर्भर एवं कमजोर होती गई। विदेशी पूँजी पर बढ़ती निर्भरता तथा धन के निरंतर निष्कासन ने देश की आर्थिक प्रगति को बाधित किया और गरीबी, बेरोजगारी तथा आर्थिक असमानता को बढ़ावा दिया।
➣ ब्रिटिश शासन भारतीयों को स्वशासन एवं उच्च प्रशासनिक उत्तरदायित्वों के योग्य नहीं मानता था। इसलिए आर्थिक शोषण के साथ-साथ भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी भी सीमित रखी गई, जिससे असंतोष निरंतर बढ़ता गया।
➣ भारतीय हितों तथा ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों के बीच बढ़ते टकराव ने राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया। आर्थिक शोषण, राजनीतिक भेदभाव तथा सामाजिक असंतोष के संयुक्त प्रभाव से एक शक्तिशाली भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का उदय हुआ, जिसने आगे चलकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा प्रदान की।
भारत में रेलवे का विकास
➣ औद्योगिक क्रांति के बाद ब्रिटिश उद्योगों को भारत से अधिक मात्रा में कपास, जूट, नील, चाय, अफीम तथा अन्य कच्चे माल की आवश्यकता थी। इन वस्तुओं को बंदरगाहों तक शीघ्र पहुँचाने के लिए तेज एवं सस्ते परिवहन साधनों की आवश्यकता महसूस हुई। रेलवे ने इस आवश्यकता को पूरा किया।
➣ दूसरी ओर ब्रिटेन के कारखानों में निर्मित तैयार वस्तुओं को भारत के दूर-दराज़ क्षेत्रों तक पहुँचाने के लिए भी रेलवे अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई। इससे ब्रिटिश उत्पादों का बाजार पूरे भारत में फैल गया और उनके व्यापार को व्यापक प्रोत्साहन मिला।
➣ रेलवे का एक प्रमुख उद्देश्य भारत के विभिन्न भागों को बंदरगाहों से जोड़ना भी था। इससे कच्चे माल का निर्यात तथा ब्रिटेन से आने वाले तैयार माल का आयात पहले की अपेक्षा अधिक तेज़ी और कम लागत पर होने लगा।
➣ आर्थिक कारणों के अतिरिक्त रेलवे का सामरिक महत्व भी था। अंग्रेज किसी भी विद्रोह अथवा अशांति की स्थिति में अपनी सेना एवं सैन्य सामग्री को कम समय में एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाना चाहते थे। विशेष रूप से 1857 के विद्रोह के बाद रेलवे का सामरिक महत्व और अधिक बढ़ गया।
➣ इस प्रकार रेलवे का विकास भारतीय जनता की आवश्यकताओं की अपेक्षा ब्रिटिश साम्राज्य के आर्थिक एवं राजनीतिक हितों को ध्यान में रखकर किया गया। यद्यपि बाद में भारतीय समाज एवं अर्थव्यवस्था को भी इससे कुछ लाभ प्राप्त हुए, किन्तु प्रारम्भिक उद्देश्य मुख्यतः औपनिवेशिक शासन को सुदृढ़ बनाना था।
भारत में रेलवे का विकास पृष्ठभूमि
➣ भारत में रेलवे स्थापित करने का पहला प्रस्ताव 1831 ई. में मद्रास में प्रस्तुत किया गया था। प्रारम्भिक योजना के अनुसार रेल के डिब्बों को घोड़ों द्वारा खींचने का विचार था, किन्तु यह योजना व्यावहारिक रूप से लागू नहीं हो सकी।
➣ भारत में रेलवे निर्माण की दिशा में वास्तविक पहल लॉर्ड डलहौजी (1848–1856 ई.) के शासनकाल में हुई। डलहौजी ने रेलवे को भारत के आर्थिक, प्रशासनिक एवं सामरिक विकास का महत्वपूर्ण साधन माना तथा इसके विस्तार के लिए एक स्पष्ट नीति तैयार की।
➣ 1849 ई. में भारत में पहली रेलवे लाइन कलकत्ता से रानीगंज तक बिछाने का कार्य प्रारम्भ किया गया। इसके बाद रेलवे निर्माण की गति धीरे-धीरे बढ़ने लगी।
➣ 1853 ई. में लॉर्ड डलहौजी के प्रसिद्ध रेलवे मेमो के बाद रेलवे निर्माण को नई दिशा मिली।
➣ इसी वर्ष 16 अप्रैल 1853 ई. को भारत की पहली यात्री रेलगाड़ी बंबई (मुंबई) से थाणे के बीच लगभग 34 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए चली। इसे भारतीय रेलवे के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना माना जाता है।
➣ रेलवे निर्माण के लिए आवश्यक पूँजी जुटाने हेतु अंग्रेजों ने गारंटी प्रणाली अपनाई। निजी ब्रिटिश कंपनियों को निवेश पर 5 प्रतिशत वार्षिक लाभ की सरकारी गारंटी दी गई।
➣यदि लाभ कम होता था, तो उसकी भरपाई भारतीय राजस्व से की जाती थी। 1856 ई. से रेलवे के क्षेत्र में विदेशी पूँजी निवेश का विस्तार भी प्रारम्भ हुआ।
➣ 1869 ई. तक भारत में रेलवे प्रबंधन के लिए कुल 33 कंपनियाँ कार्यरत थीं, जिनमें 24 निजी, 5 सरकारी तथा 4 देशी रियासतों की कंपनियाँ शामिल थीं।
➣ इन कंपनियों के साथ यह समझौता किया गया था कि निर्धारित अवधि के बाद रेलवे लाइनों का स्वामित्व सरकार को हस्तांतरित कर दिया जाएगा।
➣ 1879 ई. में लॉर्ड लिटन के शासनकाल में सरकार ने पहली बार ईस्ट इंडियन रेलवेका अधिग्रहण किया। इसके बाद रेलवे पर सरकारी नियंत्रण धीरे-धीरे बढ़ने लगा।
➣ रेलवे प्रशासन में सुधार के उद्देश्य से 1901 ई. में सर थॉमस रॉबर्टसन की अध्यक्षता में रेल आयोग का गठन किया गया।
➣ इस आयोग में गुरुदास बनर्जी एवं सैय्यद बिलग्रामी दो भारतीय सदस्य भी शामिल थे। आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1903 ई. में रेलवे बोर्ड की स्थापना की गई, जिससे रेलवे प्रशासन अधिक संगठित एवं प्रभावी बनाया जा सका।
➣ 1908 ई. में भारतीय रेलवे को एक स्वायत्तशासी संस्था का स्वरूप प्रदान किया गया। इससे रेलवे के प्रशासन एवं संचालन में अधिक दक्षता लाने का प्रयास किया गया।
➣ एकवर्थ समिति (1921–22 ई.) की सिफारिशों के आधार पर 1925 ई. से रेलवे बजट को सामान्य बजट से अलग कर दिया गया। इससे रेलवे के आय-व्यय का पृथक् लेखा-जोखा रखा जाने लगा।
➣ स्वतंत्रता से पूर्व 1947 ई. में के. सी. नियोगी की अध्यक्षता में रेलवे वित्त एवं प्रशासन से संबंधित विषयों की समीक्षा के लिए एक समिति का गठन किया गया। इस समिति ने स्वतंत्र भारत में रेलवे प्रशासन के पुनर्गठन हेतु महत्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए।
रेलवे के संबंध में इतिहासकारों के विचार
➣ कार्ल मार्क्स ने भारतीय रेलवे को आधुनिक युग का अग्रदूत कहा। उनका मत था कि रेलवे भारत में आधुनिक उद्योगों के विकास की पृष्ठभूमि तैयार करेगी, यद्यपि इसका निर्माण अंग्रेजों ने अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए किया था।
➣ रानाडे द्वारा प्रकाशित इन्दु प्रकाश में लिखा गया कि रेलवे ने भारतीय समृद्धि को अपेक्षित लाभ पहुँचाने के बजाय औपनिवेशिक शोषण को अधिक बढ़ावा दिया।
➣ सहचर समाचार-पत्र ने 1884 ई. में रेलवे को भारत के विकास में एक हथकड़ी बताया, क्योंकि इसका उपयोग मुख्यतः ब्रिटिश आर्थिक हितों की पूर्ति के लिए किया जा रहा था।
➣ बाल गंगाधर तिलक ने रेलवे के विषय में कहा कि ब्रिटिश भारत में रेलवे की उपयोगिता दूसरे की पत्नी को अलंकृत करने के समान है। उनका आशय था कि रेलवे का वास्तविक लाभ भारत के बजाय ब्रिटेन को प्राप्त हो रहा था।
धन निष्कासन
➣ ब्रिटिश शासनकाल में भारत की सबसे गंभीर आर्थिक समस्याओं में से एक धन निष्कासन (Drain of Wealth) थी। इसका अर्थ है— भारत में अर्जित आय एवं संपत्ति का बिना किसी प्रतिफल (Unrequited) के ब्रिटेन भेजा जाना।
➣ प्रारम्भ में ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार के माध्यम से भारत से धन अर्जित करती थी, किन्तु प्लासी (1757 ई.) तथा बक्सर (1764 ई.) के बाद राजनीतिक सत्ता प्राप्त होने पर यह प्रक्रिया और अधिक संगठित तथा व्यापक हो गई।
➣ ब्रिटिश शासन के दौरान भारत से विभिन्न माध्यमों द्वारा निरंतर धन ब्रिटेन भेजा जाता रहा, जिसके कारण देश में पूँजी संचय नहीं हो सका तथा गरीबी और आर्थिक पिछड़ापन बढ़ता गया।
➣ धन निष्कासन की अवधारणा ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक मजबूत आर्थिक आधार प्रदान किया तथा यह सिद्ध किया कि ब्रिटिश शासन भारत का केवल राजनीतिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक शोषण भी कर रहा था।
धन निष्कासन के प्रमुख माध्यम
➣ होम चार्जेज धन निष्कासन का सबसे प्रमुख माध्यम था। इसके अंतर्गत भारत सरकार को ब्रिटेन में भारत सचिव के कार्यालय का व्यय, सार्वजनिक ऋण पर ब्याज, पेंशन, भत्ते तथा अन्य प्रशासनिक खर्चों का भुगतान करना पड़ता था।
➣ ब्रिटिश अधिकारी सेवा समाप्त होने के बाद अपने वेतन, पेंशन एवं बचत का बड़ा भाग इंग्लैण्ड भेज देते थे। इससे भारत में अर्जित आय देश के आर्थिक विकास में उपयोग होने के बजाय ब्रिटेन चली जाती थी।
➣ भारत में लगाए गए विदेशी निवेश से प्राप्त लाभ, लाभांश एवं ब्याज भी नियमित रूप से ब्रिटेन भेजे जाते थे। विशेष रूप से रेलवे, बागान, बैंकिंग तथा व्यापारिक कंपनियों से होने वाली आय का अधिकांश भाग विदेशी निवेशकों को प्राप्त होता था।
➣ ब्रिटेन के साथ व्यापार में भारत को प्रायः व्यापार अधिशेष प्राप्त होता था, किन्तु इस अधिशेष का भुगतान भारत को नहीं मिलता था। इसका उपयोग होम चार्जेज तथा ब्रिटेन के अन्य देयों के भुगतान में कर दिया जाता था, जिससे भारत को वास्तविक लाभ नहीं मिल पाता था।
➣ भारतीय राजस्व का उपयोग ब्रिटिश साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में युद्धों, सेना के रख-रखाव तथा प्रशासनिक व्ययों के लिए भी किया जाता था। इन खर्चों का बोझ भारतीय जनता पर पड़ता था, जबकि उनका प्रत्यक्ष लाभ ब्रिटेन को प्राप्त होता था।
➣ इस प्रकार होम चार्जेज, वेतन एवं पेंशन, विदेशी पूँजी पर लाभ, व्यापार अधिशेष तथा प्रशासनिक एवं सैन्य व्यय, धन निष्कासन के प्रमुख माध्यम थे। इन सभी के कारण भारत की राष्ट्रीय संपत्ति निरंतर ब्रिटेन स्थानांतरित होती रही।
दादाभाई नौरोजी का धन निष्कासन सिद्धांत
➣ दादाभाई नौरोजी को धन निष्कासन सिद्धांत का प्रवर्तक माना जाता है। उन्होंने सर्वप्रथम वैज्ञानिक एवं आर्थिक आधार पर यह सिद्ध किया कि ब्रिटिश शासन भारत की संपत्ति का व्यवस्थित रूप से इंग्लैण्ड में स्थानांतरण कर रहा था।
➣ धन निष्कासन से उनका आशय उस आर्थिक प्रक्रिया से था, जिसके अंतर्गत भारत की राष्ट्रीय आय एवं संपत्ति बिना किसी प्रतिफल के विभिन्न माध्यमों से ब्रिटेन भेजी जाती थी। इसी कारण उन्होंने भारत को Tribute Paying Country की संज्ञा भी दी।
➣ दादाभाई नौरोजी ने धन निष्कासन को अनिष्टों का अनिष्ट की संज्ञा दी। उनका मत था कि भारत की आर्थिक दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण यही धन का निरंतर बहिर्गमन था।
➣ 2 मई 1867 ई. को लंदन में आयोजित ईस्ट India Association की बैठक में अपने प्रसिद्ध लेख Englands Debt to India में उन्होंने प्रतिपादित किया कि ब्रिटेन भारत में अपने शासन की कीमत के रूप में इस देश की संपत्ति का निरंतर दोहन कर रहा है।
➣ बाद में उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Poverty and Un-British Rule in India (1901 ई.) में धन निष्कासन सिद्धांत का विस्तृत प्रतिपादन किया। उन्होंने बताया कि भारत की गरीबी का मुख्य कारण प्राकृतिक संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासन द्वारा किया जा रहा आर्थिक शोषण था।
➣ उनके अनुसार भारत से प्रतिवर्ष होम चार्जेज, वेतन एवं पेंशन, विदेशी अधिकारियों की बचत, व्यापारिक लाभ, ब्याज तथा लाभांश आदि के माध्यम से भारी मात्रा में धन ब्रिटेन भेजा जाता था।
➣ भारत के निर्यात अधिशेष को उन्होंने Unrequited Exports कहा, क्योंकि इन निर्यातों के बदले भारत को कोई प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ प्राप्त नहीं होता था।
➣ 1895 ई. में वेल्बी (Welby) आयोग के समक्ष दादाभाई नौरोजी से धन निष्कासन के विषय में विस्तार से प्रश्न पूछे गए, जिससे यह विषय ब्रिटिश संसद एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का केंद्र बना।
➣ 1896 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन (अध्यक्ष— रहमतुल्ला सयानी) में दादाभाई नौरोजी के धन निष्कासन सिद्धांत को औपचारिक रूप से स्वीकार किया गया।
➣ बाद में 1901 ई. में इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के बजट पर अपने भाषण में गोपाल कृष्ण गोखले ने भी धन के बहिर्गमन के सिद्धांत का समर्थन करते हुए इसे भारत की आर्थिक निर्धनता का प्रमुख कारण बताया।
➣ दादाभाई नौरोजी के धन निष्कासन सिद्धांत ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक सशक्त आर्थिक आधार प्रदान किया। इसी सिद्धांत ने भारतीय आर्थिक राष्ट्रवाद की नींव रखी तथा पहली बार प्रमाणों के साथ यह स्पष्ट किया कि ब्रिटिश शासन केवल राजनीतिक प्रभुत्व का ही नहीं, बल्कि भारत के व्यवस्थित आर्थिक शोषण का भी माध्यम था।
धन निष्कासन के प्रभाव
➣ दादाभाई नौरोजी का मत था कि यदि यही धन भारत में निवेश किया जाता, तो उद्योगों का विकास होता, रोजगार के अवसर बढ़ते, कृषि को प्रोत्साहन मिलता तथा देश की आर्थिक स्थिति कहीं अधिक सुदृढ़ हो सकती थी।
➣ उन्होंने स्पष्ट किया कि धन निष्कासन के कारण भारत में पूँजी संचय नहीं हो पाया। परिणामस्वरूप उद्योगों का विकास बाधित हुआ, किसानों की निर्धनता बढ़ी तथा देश निरंतर आर्थिक रूप से कमजोर होता गया।
➣ पूँजी के अभाव में भारत के स्वदेशी उद्योगों का विकास अपेक्षित गति से नहीं हो सका। दूसरी ओर ब्रिटिश उद्योगों को भारतीय कच्चा माल, विशाल बाजार तथा वित्तीय लाभ लगातार प्राप्त होते रहे।
➣ धन निष्कासन का सबसे अधिक प्रभाव भारतीय किसानों एवं आम जनता पर पड़ा। अत्यधिक कर, अकाल, बेरोजगारी तथा आर्थिक शोषण के कारण गरीबी लगातार बढ़ती गई और लोगों का जीवन स्तर गिरता चला गया।
➣ भारत से धन के निरंतर बाहर जाने के कारण देश की राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो सकी। परिणामस्वरूप भारत आर्थिक रूप से पिछड़ता गया, जबकि ब्रिटेन की औद्योगिक एवं वित्तीय समृद्धि निरंतर बढ़ती रही।
➣ आर. सी. दत्त ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक The Economic History of India में धन निष्कासन को धन का बहिर्गमन बताते हुए इसकी तुलना एक बहते हुए घाव से की।
➣ उल्लेखनीय है कि The Economic History of India भारत के आर्थिक इतिहास पर लिखी गई प्रारम्भिक एवं सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पुस्तकों में से एक मानी जाती है।
➣ महादेव गोविंद रानाडे ने 1872 ई. में पुणे में दिए गए अपने व्याख्यान में कहा कि भारत की राष्ट्रीय पूँजी का लगभग एक-तिहाई भाग किसी-न-किसी रूप में ब्रिटिश शासन द्वारा देश से बाहर ले जाया जा रहा है।
➣ अमृत बाजार पत्रिका तथा तिलक के मराठा जैसे राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों ने भी ब्रिटिश धन निष्कासन नीति का निरंतर विरोध किया और जनता में आर्थिक शोषण के प्रति व्यापक जागरूकता उत्पन्न की।
➣ इस प्रकार धन निष्कासन ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की सबसे हानिकारक आर्थिक नीति सिद्ध हुई। इसने भारत की आर्थिक प्रगति को बाधित किया तथा देश को दीर्घकाल तक गरीबी, अविकास और आर्थिक निर्भरता की स्थिति में बनाए रखा।
ब्रिटिश काल में भारत के प्रमुख अकाल
➣ ब्रिटिश शासनकाल में भारत को बार-बार भीषण अकालों का सामना करना पड़ा। यद्यपि भारत में अकाल प्राचीन काल से समय-समय पर आते रहे थे, किन्तु ब्रिटिश शासन के दौरान इनकी संख्या, तीव्रता एवं विनाशकारी प्रभाव में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
➣ कई इतिहासकारों का मत है कि ब्रिटिश काल के अकालों को केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि औपनिवेशिक प्रशासनिक एवं आर्थिक नीतियों का भी परिणाम माना जाता है।
➣ 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से लेकर 20वीं शताब्दी के मध्य तक भारत के विभिन्न भागों में अनेक विनाशकारी अकाल पड़े। इन अकालों ने लाखों लोगों की जान ली, कृषि व्यवस्था को कमजोर किया तथा भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज पर गहरा प्रभाव छोड़ा।
अकालों के प्रमुख कारण
| अकालों के प्रमुख कारण | संक्षिप्त विवरण |
|---|---|
| उच्च भू-राजस्व नीति | किसानों को विपरीत परिस्थितियों में भी निर्धारित भूमि कर देना पड़ता था, जिससे उनके पास जीवन-निर्वाह के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं बचते थे। |
| कृषि का वाणिज्यीकरण | नकदी फसलों (नील, कपास, जूट, अफीम, चाय आदि) के बढ़ते उत्पादन से खाद्यान्न फसलों का क्षेत्रफल घटा और खाद्यान्न संकट उत्पन्न हुआ। |
| खाद्यान्न का निर्यात | अकाल के समय भी ब्रिटिश सरकार ने खाद्यान्न के निर्यात पर प्रभावी रोक नहीं लगाई, जिससे प्रभावित क्षेत्रों में अनाज की उपलब्धता और कम हो गई। |
| मुक्त व्यापार की नीति | स्थानीय आवश्यकताओं की अपेक्षा ब्रिटिश व्यापारिक हितों को प्राथमिकता दी गई, जिससे राहत एवं वितरण व्यवस्था प्रभावी नहीं बन सकी। |
| रेलवे एवं परिवहन का दुरुपयोग | रेल एवं परिवहन का उपयोग अकाल-पीड़ित क्षेत्रों में राहत पहुँचाने के बजाय व्यापारिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अधिक किया गया। |
| राहत नीति एवं प्रशासनिक उदासीनता | समय पर पर्याप्त सहायता, रोजगार एवं खाद्यान्न उपलब्ध न होने के कारण अकाल की गंभीरता बढ़ी और लाखों लोगों की मृत्यु हुई। |
प्रमुख अकाल
| वर्ष | अकाल | प्रभावित क्षेत्र | प्रमुख तथ्य |
|---|---|---|---|
| 1770 ई. | बंगाल का महान अकाल | बंगाल, बिहार | ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल का पहला भीषण अकाल। अनुमानतः लगभग एक-तिहाई जनसंख्या की मृत्यु हुई। |
| 1783–84 ई. | चालीसा अकाल | उत्तर भारत, दिल्ली, पंजाब, राजपूताना | भयंकर सूखे के कारण व्यापक जनहानि हुई। इसका नाम संवत 1840 (चालीसा) से जुड़ा है। |
| 1837–38 ई. | उत्तर भारत का अकाल | उत्तर-पश्चिमी प्रांत, बुंदेलखंड, दिल्ली | लाखों लोग प्रभावित हुए तथा कृषि एवं पशुधन को भारी क्षति पहुँची। |
| 1860–61 ई. | ऊपरी दोआब अकाल | पंजाब, उत्तर-पश्चिमी प्रांत | सूखे एवं खाद्यान्न संकट के कारण व्यापक जनहानि हुई। |
| 1865–66 ई. | उड़ीसा अकाल | उड़ीसा, बिहार, बंगाल, मद्रास के कुछ भाग | राहत कार्यों में विफलता के कारण लगभग 10 लाख लोगों की मृत्यु हुई। |
| 1873–74 ई. | बिहार अकाल | बिहार | सरकार द्वारा अपेक्षाकृत बेहतर राहत कार्य किए गए, जिससे जनहानि सीमित रही। |
| 1876–78 ई. | महान अकाल (Great Famine) | मद्रास, मैसूर, हैदराबाद, बंबई, दक्षिण भारत | ब्रिटिश काल के सबसे भीषण अकालों में से एक; लाखों लोगों की मृत्यु हुई। |
| 1896–97 ई. | भारतीय अकाल | मध्य भारत, बुंदेलखंड, बॉम्बे, मद्रास आदि | देश के अनेक भाग प्रभावित हुए; राहत व्यवस्था अपर्याप्त रही। |
| 1899–1900 ई. | भारतीय अकाल | राजपूताना, मध्य भारत, गुजरात | सूखे एवं महामारी के कारण भारी जनहानि हुई। |
| 1943 ई. | बंगाल का अकाल | बंगाल | द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान पड़ा। अनुमानतः 20–30 लाख लोगों की मृत्यु हुई। |
ब्रिटिश काल के प्रमुख अकालों में 1770 का बंगाल अकाल, 1865–66 का उड़ीसा अकाल, 1876–78 का महान अकाल तथा 1943 का बंगाल अकाल सर्वाधिक महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
अकाल आयोग एवं सरकारी नीतियाँ
1860–61 ई. : स्मिथ समिति
➣ 1860–61 ई. में दिल्ली एवं उसके आसपास के क्षेत्रों में पड़े अकाल के कारणों तथा उसकी गंभीरता की जाँच के लिए स्मिथ समिति का गठन किया गया। यह ब्रिटिश शासन द्वारा अकाल की परिस्थितियों का अध्ययन करने हेतु गठित प्रारम्भिक समितियों में से एक थी।
- दिल्ली क्षेत्र में पड़े अकाल के कारणों एवं प्रभावों की जाँच की।
- अकाल की गंभीरता का मूल्यांकन किया।
- भविष्य में राहत व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया।
1866 ई. : सर जॉर्ज कैंपबेल समिति
➣ 1865–66 ई. के उड़ीसा अकाल में लाखों लोगों की मृत्यु के बाद ब्रिटिश सरकार की राहत व्यवस्था की व्यापक आलोचना हुई। इसके परिणामस्वरूप 1866 ई. में सर जॉर्ज कैंपबेल की अध्यक्षता में एक अकाल जाँच समिति गठित की गई।
इस समिति का उद्देश्य अकालों के कारणों का अध्ययन करना तथा भविष्य में राहत कार्यों को अधिक प्रभावी एवं संगठित बनाना था।
- राहत कार्यों में सुधार पर बल दिया।
- अकाल-पीड़ित क्षेत्रों में समय पर सहायता पहुँचाने की आवश्यकता बताई।
- भविष्य में अकाल प्रबंधन के लिए बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था विकसित करने की अनुशंसा की।
1866–67 ई. : कैम्पबेल आयोग
➣ 1866–67 ई. में उड़ीसा (वर्तमान ओडिशा) के भीषण अकाल के बाद सर जॉर्ज कैम्पबेल की अध्यक्षता में आयोग गठित किया गया।
➣ इस आयोग ने अकाल राहत व्यवस्था की समीक्षा करते हुए सरकार की भूमिका को अधिक प्रभावी बनाने पर बल दिया।
- उड़ीसा अकाल के कारणों एवं राहत कार्यों की समीक्षा की।
- राहत कार्यों की जिम्मेदारी केवल स्वयंसेवी संस्थाओं पर छोड़ने का विरोध किया।
- सरकार की सक्रिय भागीदारी एवं प्रशासनिक उत्तरदायित्व पर बल दिया।
1878 ई. : रिचर्ड स्ट्रेची आयोग
➣ 1876–78 ई. के भीषण अकाल के बाद 1878 ई. में रिचर्ड स्ट्रेची की अध्यक्षता में अकाल आयोग का गठन किया गया।
➣ इस आयोग ने ब्रिटिश भारत में अकाल राहत व्यवस्था का व्यापक अध्ययन किया तथा भविष्य के लिए स्थायी दिशा-निर्देश सुझाए। आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर 1880 ई. में अकाल संहिता लागू की गई।
- अकाल की पहचान के लिए स्पष्ट मानदंड निर्धारित किए।
- राहत कार्यों एवं राहत शिविरों के संचालन के दिशा-निर्देश दिए।
- जरूरतमंद लोगों के लिए राहत कार्यों के माध्यम से रोजगार उपलब्ध कराने की व्यवस्था सुझाई।
- अकाल-पीड़ित क्षेत्रों में खाद्यान्न सहायता एवं प्रशासनिक उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने की अनुशंसा की।
- 1880 ई. में लागू अकाल संहिता (Famine Code) का आधार बना।
1878–80 ई. : स्ट्रेची आयोग
➣ 1876–78 ई. के भीषण अकाल के बाद रिचर्ड स्ट्रेची की अध्यक्षता में 1878 ई. में अकाल आयोग गठित किया गया।
➣ इस आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर 1880 ई. में अकाल संहिता (Famine Code) लागू की गई, जिसने अकाल राहत कार्यों के लिए औपचारिक दिशा-निर्देश निर्धारित किए।
- अकाल-पीड़ित लोगों की सहायता करना राज्य का कर्तव्य बताया।
- सक्षम व्यक्तियों को राहत कार्यों के माध्यम से रोजगार देने की अनुशंसा की।
- अशक्त एवं असहाय व्यक्तियों को निःशुल्क खाद्यान्न उपलब्ध कराने की सिफारिश की।
- प्रत्येक प्रांत में अकाल कोष (Famine Fund) स्थापित करने का सुझाव दिया।
- 1880 ई. में लागू अकाल संहिता (Famine Code) का आधार बना।
1897 ई. : लायल आयोग
➣ 1896–97 ई. के भीषण अकाल के बाद सर जेम्स लायल की अध्यक्षता में लायल आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने पूर्ववर्ती स्ट्रेची आयोग की अनुशंसाओं की समीक्षा की तथा उनमें आवश्यक संशोधनों का सुझाव दिया।
- स्ट्रेची आयोग की अधिकांश अनुशंसाओं का समर्थन किया।
- राहत कार्यों को अधिक प्रभावी बनाने हेतु कुछ संशोधन सुझाए।
- अकाल राहत व्यवस्था को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप लागू करने पर बल दिया।
1900 ई. : मैकडॉनल आयोग
➣ 1899–1900 ई. के भीषण अकाल के बाद सर एंथनी मैकडॉनल की अध्यक्षता में अकाल आयोग गठित किया गया। इस आयोग ने राहत नीति की समीक्षा करते हुए दीर्घकालीन उपायों पर विशेष बल दिया।
- अकाल सहायता एवं अनुदान पर अत्यधिक निर्भरता की आलोचना की।
- नैतिक उत्तरदायित्व एवं प्रशासनिक दक्षता पर बल दिया।
- ग्राम स्तर पर राहत एवं रोजगार संबंधी कार्यों को प्राथमिकता देने की अनुशंसा की।
- सिंचाई एवं ग्रामीण विकास जैसे स्थायी उपायों पर विशेष जोर दिया।
1945 ई. : जॉन बुडहेड आयोग
➣ 1943 ई. के बंगाल अकाल के कारणों एवं राहत व्यवस्था की जाँच के लिए 1945 ई. में सर जॉन बुडहेड की अध्यक्षता में अकाल जाँच आयोग का गठन किया गया। आयोग ने अकाल के कारणों, प्रशासनिक कमियों तथा भविष्य की राहत नीति का विस्तृत अध्ययन किया।
- बंगाल अकाल के कारणों एवं सरकारी राहत कार्यों की समीक्षा की।
- खाद्यान्न वितरण व्यवस्था में सुधार की अनुशंसा की।
- भविष्य में अकाल की रोकथाम एवं प्रभावी राहत नीति अपनाने पर बल दिया।
1901 ई. : सर एंथनी मैकडॉनेल आयोग
➣ 1896–97 तथा 1899–1900 के भीषण अकालों के बाद 1901 ई. में सर एंथनी मैकडॉनेल की अध्यक्षता में एक अन्य अकाल आयोग गठित किया गया। इस आयोग का उद्देश्य पूर्व की राहत व्यवस्था की समीक्षा करना तथा अकाल प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाना था।
- राहत कार्यों को अधिक संगठित एवं प्रभावी बनाने की अनुशंसा की।
- सिंचाई सुविधाओं के विस्तार पर विशेष बल दिया।
- अकाल संहिता को प्रभावी ढंग से लागू करने की सिफारिश की।
- अकाल-प्रभावित क्षेत्रों में प्रशासनिक उत्तरदायित्व एवं राहत व्यवस्था को मजबूत करने पर बल दिया।
राष्ट्रवादी नेताओं एवं इतिहासकारों की आलोचना
➣ ब्रिटिश शासनकाल में पड़ने वाले बार-बार के अकालों की राष्ट्रवादी नेताओं एवं इतिहासकारों ने तीव्र आलोचना की। उनका मत था कि इन अकालों का प्रमुख कारण केवल प्राकृतिक आपदाएँ नहीं थीं, बल्कि ब्रिटिश सरकार की दोषपूर्ण आर्थिक एवं प्रशासनिक नीतियाँ भी समान रूप से उत्तरदायी थीं।
| व्यक्ति | प्रमुख विचार / आलोचना |
|---|---|
| दादाभाई नौरोजी | Poverty and Un-British Rule in India में धन निष्कासन सिद्धांत प्रस्तुत करते हुए बताया कि भारत की संपत्ति के ब्रिटेन जाने से गरीबी एवं अकाल की समस्या बढ़ी। |
| आर. सी. दत्त | The Economic History of India में अत्यधिक भू-राजस्व, कृषि के वाणिज्यीकरण तथा ब्रिटिश आर्थिक नीतियों को अकालों का प्रमुख कारण बताया। |
| विलियम डिग्बी | Prosperous British India में लिखा कि ब्रिटिश आर्थिक नीतियों एवं प्रशासनिक उदासीनता ने भारत में गरीबी और अकाल को बढ़ाया। |
| माइक डेविस | Late Victorian Holocausts में 19वीं शताब्दी के अकालों को मुक्त व्यापार एवं औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों का परिणाम बताया। |
| अमर्त्य सेन | Poverty and Famines में Entitlement Theory प्रस्तुत करते हुए बताया कि अकाल केवल खाद्यान्न की कमी नहीं, बल्कि भोजन प्राप्त करने की क्षमता समाप्त होने से भी पड़ते हैं। |
ब्रिटिश औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
| क्षेत्र | प्रमुख प्रभाव |
|---|---|
| कृषि पर प्रभाव |
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| उद्योगों पर प्रभाव |
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| व्यापार पर प्रभाव |
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| सामाजिक प्रभाव |
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| आर्थिक प्रभाव |
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