शेरशाह सूरी (1540 ई.–1545 ई.) | One-Liner Practice

भारतीय इतिहास मध्यकालीन भारत शेरशाह सूरी (1540 ई.–1545 ई.)

शेर खाँ का प्रारम्भिक नाम फरीद खाँ था।

शेर खाँ के पिता हसन खाँ (जौनपुर के छोटे जमींदार) थे।

फरीद खाँ बिहार के सुल्तान मुहम्मद शाह नुहानी के यहाँ नौकरी करता था।

फरीद को शेर खाँ की उपाधि मुहम्मद शाह नुहानी ने दी।

शेर खाँ 1540 ई. में 67 वर्ष की आयु में दिल्ली की गद्दी पर बैठा।

राज्याभिषेक के समय शेर खाँ ने शेरशाह की उपाधि ग्रहण की।

1541 ई. में शेरशाह ने गक्खरों के विरुद्ध अभियान किया।

गक्खर मुगलों की सहायता करते थे।

शेरशाह ने अपनी उत्तर-पश्चिम सीमा को सुरक्षित करने के लिये रोहतासगढ़ किले का निर्माण कराया।

शेरशाह ने शिकदारों को नियंत्रित करने के लिए अमीन-ए-बंगला की नियुक्ति की।

रणथम्भौर के शक्तिशाली किले को अपने अधीन कर अपने पुत्र आदिल खाँ को वहाँ का गवर्नर बनाया।

रायसीन किले पर रात्रि में किया गया आक्रमण, शेरशाह के जीवन पर काला धब्बा माना जाता है।

शेरशाह को अकबर का अग्रदूत भी कहा जाता है।

शेरशाह प्रशासनिक सुधारों के लिए प्रसिद्ध है।

मारवाड़ विजय के बारे में शेरशाह ने कहा— ‘मैं मुट्ठी भर बाजरे के लिये हिन्दुस्तान के साम्राज्य को लगभग खो चुका था।’

शेरशाह के समय कालिंजर का शासक कीरत सिंह था।

मृत्यु के समय शेरशाह उक्का नामक आग्नेयास्त्र चला रहा था।

शेरशाह ने अपने संपूर्ण साम्राज्य को 47 सरकारों में विभाजित किया था।

शेरशाह के समय स्थानीय करों को आबवाब कहा गया।

शेरशाह ने उत्पादन के आधार पर भूमि को अच्छी, मध्यम और खराब तीन श्रेणियों में बाँटा था।

शेरशाह की लगान व्यवस्था मुख्य रूप से रैयतवाड़ी थी, जिसमें किसानों से प्रत्यक्ष सम्पर्क स्थापित किया गया था।

शेरशाह ने भूमि मापने के लिए 39 अंगुल (32 इंच) वाला ‘सिकन्दरी गज’ तथा ‘सन की डंडी’ का प्रयोग किया।

शेरशाह ने 178 ग्रेन का चाँदी का रुपया तथा 380 ग्रेन का ताँबे का दाम जारी किया।

शेरशाह के शासनकाल में 23 टकसालें थीं।

शेरशाह ने लगभग 1700 सरायों, चार प्रमुख सड़कों का निर्माण कराया तथा सड़कों के किनारे वृक्ष लगवाए।

शेरशाह ने अनेक सड़कों का निर्माण कराया एवं पुरानी सड़कों की मरम्मत कराई। इनमें चार सड़कें अत्यंत प्रसिद्ध हैं।

ग्राण्ड ट्रंक रोड का निर्माण शेरशाह ने करवाया।

कन्नौज के स्थान पर ‘शेरसूर’ नामक नगर शेरशाह ने बसाया।

शेरशाह ने पाटलिपुत्र का नाम पटना रखा।

शेरशाह ने सिक्कों पर अपना नाम अरबी एवं देवनागरी लिपि में खुदवाया।

शेरशाह का मकबरा बिहार के सासाराम में झील के मध्य स्थित है।

शेरशाह ने हुमायूँ द्वारा निर्मित दीनपनाह को तुड़वाकर उसके अवशेषों पर पुराना किला बनवाया।

किला-ए-कुहना मस्जिद का निर्माण शेरशाह सूरी ने कराया।

अब्बास खाँ ने शेरशाह की प्रशंसा करते हुए कहा— ‘बुद्धिमता और अनुभव में वह दूसरा हैदर था।’

शेरशाह ने ‘सुल्तान-उल-अदल’ की उपाधि धारण की थी।

1545 ई. में कालिंजर किले की घेराबंदी के दौरान तोप का गोला दीवार से टकराकर लौट आया, जिससे शेरशाह गंभीर रूप से घायल हुआ और उसकी मृत्यु हो गई।

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