मुगल-कालीन संगीत एंव संगीतकार
हुमायूँ कालीन संगीत एवं प्रमुख संगीतज्ञ
➣ हुमायूँ को संगीत से विशेष लगाव था। उसने अपने दरबार में अनेक गायकों एवं वादकों को संरक्षण दिया।
➣ समकालीन विवरणों के अनुसार, हुमायूँ के दरबार में लगभग 29 प्रसिद्ध गायक एवं वादक थे, जो विभिन्न अवसरों पर दरबारी संगीत प्रस्तुत करते थे।
➣ हुमायूँ के दरबार का प्रसिद्ध गवैया बच्चू था। उसे हुमायूँ ने 1536 ई. में माण्डु विजय के बाद अपने संरक्षण में लिया था।
➣ हुमायूँ की संगीत-प्रेमी परंपरा को आगे चलकर अकबर ने और अधिक विकसित किया, जिसके परिणामस्वरूप मुगल दरबार भारतीय संगीत का एक प्रमुख केंद्र बन गया।
अकबर कालीन संगीत एवं प्रमुख संगीतज्ञ
➣ यद्यपि बाबर एवं हुमायूँ ने भी संगीत को प्रोत्साहन दिया है। किन्तु यह अकबर के ही काल में अपने शिखर पर पहुँची।
➣ अबुल फजल के अनुसार-“अकबर के दरबार में 36 गायकों को राज्याश्रम प्राप्त था; किन्तु उसमें सर्वाधिक प्रसिद्ध तानसेन एवं बाजबहादुर थे।
➣ तानसेन अकबर के नवरत्नों में से एक था। इसे अकबर ने रीवा के राजा रामचन्द्र से प्राप्त किया था।
➣ अकबर स्वयं ही बहुत अच्छा नक्कारा (नगाड़ा) बजाता था। नक्कारा बजाना उसने बाजबहादुर से सिखा था।
➣ अकबर द्वारा तानसेन को कण्ठाभरणवाणी विलास उपाधि दी गयी। तानसेन का वास्तविक नाम रामतनु पाण्डेय था।
➣ तानसेन की रचनाओं में मियां की तोड़ी, मियां की मल्हार, मियां की सारंग तथा दरबारी कान्हड़ा प्रमुख थीं।
➣ तानसेन के संगीत गुरू वृंदावन के हरिदास एवं आध्यात्मिक गुरू मोहम्मद गौस थे। अकबर वृदांवन के हरिदास का संगीत सुनने के लिए भेष बदलकर जाता था।
➣ अकबर ने लाल कुलवन्त से हिन्दू संगीत/वादन की शिक्षा ली थी।
➣ अकबर के समय के मालवा शासक बाज बहादूर के संबंध में अबुल फजल ने कहा था कि वह संगीत विज्ञान एवं हिंदी गीत में अपने समय का सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति है।
➣ अकबर के समय ध्रुपद-गायन की चार शैलियाँ प्रचलित थी- नोहारवाणी, खण्डारवाणी, गोवरहारी या गौरारीवाणी और डागुरवाणी। कालान्तर में ध्रुपद का स्थान ख्याल गायन शैली ने ले लिया।
अकबर के समय के संगीतज्ञ| संगीतज्ञ | परिचय एवं प्रमुख योगदान |
|---|---|
| तानसेन | मूल नाम रामतनु पांडे था। ग्वालियर नरेश रामचंद्र के दरबार से अकबर के यहां आए। अकबर के नवरत्नों में शामिल तथा भारतीय संगीत के सबसे महान स्तंभों में गिने जाते हैं। मियां की मल्हार, मियां की तोड़ी, दरबारी कान्हड़ा और रागमाला जैसी रचनाओं/रागों का श्रेय इन्हें दिया जाता है। ध्रुपद गायकी में निपुण थे। इनकी संतानों ने भी संगीत परंपरा को आगे बढ़ाया, जिसे सेनिया घराना कहा जाता है। |
| बाज बहादुर | मालवा (माण्डू) के अंतिम स्वतंत्र सुल्तान, स्वयं कुशल गायक एवं संगीत प्रेमी थे। रानी रूपमती के साथ इनकी प्रेम-कथा प्रसिद्ध है, जो संगीत एवं काव्य दोनों में रुचि रखती थीं। 1561 ई. में अकबर से पराजित होने के बाद मुगल दरबार में सम्मिलित हुए। |
| बैजबख्श | आइन-ए-अकबरी में वर्णित प्रमुख दरबारी संगीतज्ञ। गायन एवं वादन कला में पारंगत तथा दरबार के संगीत समारोहों का महत्वपूर्ण हिस्सा थे। |
| गोपाल | अकबर के दरबार के प्रमुख गायकों में से एक। शास्त्रीय गायन शैली में दक्ष थे। |
| हरिदास | स्वामी हरिदास वृंदावन के संत-संगीतज्ञ तथा ध्रुपद गायकी के महान साधक थे। हरिदासी संप्रदाय के प्रवर्तक तथा राधावल्लभ भक्ति परंपरा से जुड़े थे। तानसेन को इनका शिष्य माना जाता है, हालांकि इनका सीधा दरबारी संबंध इतिहासकारों में विवाद का विषय है। |
| रामदास | दरबारी संगीत परंपरा से जुड़े गायक, जिन्हें ध्रुपद शैली का कुशल कलाकार माना जाता है। |
| सुजान खां | गायन एवं वादन दोनों विधाओं में दक्ष दरबारी संगीतज्ञ। |
| मियां चांद | अकबर कालीन संगीत साधक, जो दरबार के विभिन्न सांगीतिक आयोजनों से जुड़े थे। |
| मियां लाल | संगीत कला में निपुण कलाकार, जिनकी गणना अकबर के दरबार के 36 प्रमुख संगीतज्ञों में की जाती है। |
| बैजू बावरा | दरबार से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित नहीं थे, लेकिन इस युग के महानतम स्वतंत्र गायकों में गिने जाते हैं। इनका मूल नाम वासुदेव माना जाता है। ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर तथा रानी मृगनयनी के संरक्षण से जुड़ी किंवदंतियां प्रसिद्ध हैं। तानसेन के साथ इनकी संगीत प्रतिद्वंद्विता (गायन प्रतियोगिता) की लोककथाएं अत्यंत लोकप्रिय हैं। इन्हें ध्रुपद गायकी का महारथी माना जाता है। |
जहाँगीर कालीन संगीत एवं प्रमुख संगीतज्ञ
➣ जहाँगीर (1605–1627 ई.) स्वयं संगीत का अच्छा पारखी था। उसके शासनकाल में ध्रुपद, खयाल, गजल तथा वाद्य संगीत को संरक्षण मिला। जहाँगीर ने योग्य संगीतज्ञों को सम्मानित किया तथा मुगल दरबार की संगीत परंपरा को आगे बढ़ाया।
➣ इस काल में बिलास खाँ (तानसेन के पुत्र), छतर खाँ, मक्खू, हमजान, खुर्रम दाद तथा परवेज दाद जैसे अनेक प्रसिद्ध संगीतज्ञ जहाँगीर के दरबार से जुड़े थे।
➣ जहाँगीर ने प्रसिद्ध गजल गायक शौकी को उसकी प्रतिभा से प्रभावित होकर ‘आनन्द खाँ’ की उपाधि प्रदान की। सामान्य अध्ययन की पुस्तकों में यह उल्लेख मिलता है कि इसी काल में गजल गायन को मुगल दरबार में विशेष संरक्षण प्राप्त हुआ।
जहाँगीर कालीन प्रमुख संगीतज्ञ
| संगीतज्ञ | परिचय एवं प्रमुख योगदान |
|---|---|
| बिलास खाँ | तानसेन के पुत्र तथा सेनिया परंपरा के प्रमुख संगीतज्ञ। ध्रुपद गायकी में निपुण थे और जहाँगीर के दरबार में विशेष सम्मान प्राप्त था। |
| छतर खाँ | जहाँगीर के दरबार के प्रमुख संगीतज्ञों में से एक, जो गायन कला में दक्ष थे। |
| मक्खू | दरबारी संगीतज्ञ, जिनका उल्लेख जहाँगीर काल के प्रमुख कलाकारों में मिलता है। |
| हमजान | जहाँगीर के दरबार से जुड़े संगीतज्ञ, जिन्होंने दरबारी संगीत परंपरा को समृद्ध किया। |
| खुर्रम दाद | मुगल दरबार के प्रसिद्ध संगीतज्ञ, जिनका नाम जहाँगीर कालीन संगीतकारों में उल्लेखित है। |
| परवेज दाद | जहाँगीर के दरबार के प्रमुख संगीतज्ञों में से एक, जो शाही संगीत समारोहों में भाग लेते थे। |
| शौकी (आनन्द खाँ) | प्रसिद्ध गजल गायक। जहाँगीर ने इन्हें ‘आनन्द खाँ’ की उपाधि प्रदान की। सामान्य अध्ययन के अनुसार, इनके माध्यम से मुगल दरबार में गजल गायन को विशेष संरक्षण मिला। |
शाहजहाँ कालीन संगीत एवं प्रमुख संगीतज्ञ
➣ शाहजहाँ (1628–1658 ई.) स्वयं संगीत का अच्छा ज्ञाता एवं संरक्षक था। उसके शासनकाल में ध्रुपद, वाद्य संगीत तथा दरबारी संगीत को विशेष संरक्षण प्राप्त हुआ। शाही दरबार में अनेक प्रसिद्ध गायक एवं वादक उपस्थित रहते थे।
➣ शाहजहाँ के दरबार में लाल खाँ, खुशहाल खाँ, बिसराम खाँ, जगन्नाथ, रामदास, सूरसेन, दुरंग खाँ, महापात्र तथा सैदाई गिलानी जैसे प्रसिद्ध संगीतज्ञ थे।
➣ शाहजहाँ ने लाल खाँ की संगीत प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें ‘गुण समुद्र’ की उपाधि प्रदान की।
➣ सामान्य अध्ययन की पुस्तकों के अनुसार, शाहजहाँ के काल में कसीदा (प्रशस्ति काव्य) शैली को विशेष प्रोत्साहन मिला।
➣ शाहजहाँ के दरबार में सुखसेन रबाब वादन तथा सूरसेन वीणा वादन के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध थे।
शाहजहाँ कालीन प्रमुख संगीतज्ञ
| संगीतज्ञ | परिचय एवं प्रमुख योगदान |
|---|---|
| लाल खाँ | बिलास खाँ के दामाद तथा शाहजहाँ के दरबार के प्रमुख संगीतज्ञ। उत्कृष्ट ध्रुपद गायक थे। शाहजहाँ ने इन्हें ‘गुण समुद्र’ की उपाधि प्रदान की। |
| खुशहाल खाँ | शाहजहाँ के दरबार के प्रसिद्ध गायक, जिन्हें शास्त्रीय संगीत में विशेष दक्षता प्राप्त थी। |
| बिसराम खाँ | मुगल दरबार के प्रतिष्ठित संगीतज्ञ, जिनका उल्लेख शाहजहाँ कालीन कलाकारों में मिलता है। |
| जगन्नाथ | शाहजहाँ के दरबार के प्रमुख संगीतज्ञ एवं विद्वान कलाकारों में से एक। |
| रामदास | ध्रुपद परंपरा से जुड़े कुशल दरबारी गायक। |
| सूरसेन | वीणा वादन में निपुण संगीतज्ञ। शाहजहाँ के दरबार के प्रमुख वादकों में उनकी गणना होती है। |
| दुरंग खाँ | शाहजहाँ के दरबार के प्रमुख संगीतज्ञ, जिन्होंने शाही संगीत परंपरा को समृद्ध किया। |
| महापात्र | दरबारी संगीतज्ञ, जिनका उल्लेख शाहजहाँ कालीन संगीतकारों में मिलता है। |
| सैदाई गिलानी | शाहजहाँ के दरबार के प्रतिष्ठित संगीतज्ञ एवं शाही संगीत समारोहों के प्रमुख कलाकार। |
| सुखसेन | रबाब वादन के प्रसिद्ध कलाकार। शाहजहाँ के दरबार में अपने वादन कौशल के लिए विशेष सम्मान प्राप्त था। |
औरंगजेब कालीन संगीत एवं प्रमुख संगीतज्ञ
➣ औरंगजेब (1658–1707 ई.) के शासनकाल में शाही दरबार में संगीत को पहले की अपेक्षा कम संरक्षण मिला।
➣ 1668 ई. अन्य में 1669 ई. के आसपास उसने दरबारी संगीत पर प्रतिबंध लगा दिया। इसका उद्देश्य दरबार की विलासिता एवं अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण माना जाता है।
➣ प्रसिद्ध किंवदंती के अनुसार, जब संगीतज्ञों ने तबले और तानपुरे का जनाजा निकालकर विरोध प्रकट किया, तब औरंगजेब ने कहा- “इसे इतनी गहराई में दफनाना कि इसकी आवाज फिर बाहर न आ सके।” यह घटना ऐतिहासिक प्रमाणों की अपेक्षा लोककथाओं में अधिक प्रसिद्ध है।
➣ यद्यपि औरंगजेब ने दरबारी संगीत को प्रोत्साहन नहीं दिया, फिर भी उसके शासनकाल में फारसी भाषा में भारतीय शास्त्रीय संगीत पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना एवं अनुवाद हुए।
➣ औरंगजेब स्वयं वीणा वादन में निपुण था। अनेक इतिहासकारों ने उल्लेख किया है कि वह संगीत का ज्ञान रखता था, यद्यपि सार्वजनिक रूप से उसका संरक्षण नहीं करता था।
➣ इसी काल में फकीरूल्लाह ने मानकुतूहल का फारसी अनुवाद राग दर्पण नाम से कर औरंगजेब को समर्पित किया।
➣ मिर्जा रोशन जमीर ने 1666 ई. में संगीत-परिजात का फारसी अनुवाद औरंगजेब के संरक्षण में किया।
➣ औरंगजेब ने अपने पौत्र जहांदरशाह के लिए मिर्जा मुहम्मद खान से संगीत विषयक ग्रंथ तुहफत-उल-हिन्द की रचना करवाई।
औरंगजेब कालीन प्रमुख संगीतज्ञ
| संगीतज्ञ | परिचय एवं प्रमुख योगदान |
|---|---|
| रसबैन खाँ | औरंगजेब काल के प्रमुख संगीतज्ञ, जिनका उल्लेख तत्कालीन दरबारी कलाकारों में मिलता है। |
| सुखी सेन | शास्त्रीय संगीत के कुशल कलाकार, जो औरंगजेब कालीन संगीत परंपरा से जुड़े थे। |
| कलावन्त | ध्रुपद एवं शास्त्रीय संगीत परंपरा के प्रसिद्ध गायक, जिनका नाम औरंगजेब काल के प्रमुख संगीतज्ञों में लिया जाता है। |
| हयात सरस नैन | औरंगजेब के समय के उल्लेखनीय संगीतज्ञ, जिन्होंने दरबारी संगीत परंपरा को जीवित बनाए रखा। |
| किरपा | औरंगजेब काल के प्रमुख संगीतज्ञ, जिनका उल्लेख समकालीन संगीतज्ञों की सूची में मिलता है। |
| फकीरूल्लाह | प्रसिद्ध संगीतशास्त्री। मानकुतूहल का फारसी अनुवाद राग दर्पण नाम से कर औरंगजेब को समर्पित किया। |
| मिर्जा रोशन जमीर | 1666 ई. में संगीत-परिजात का फारसी अनुवाद किया, जिससे भारतीय संगीत का ज्ञान फारसी साहित्य में व्यापक रूप से प्रसारित हुआ। |
| मिर्जा मुहम्मद खान | औरंगजेब के आदेश पर उसके पौत्र जहांदरशाह के लिए तुहफत-उल-हिन्द नामक संगीत एवं भारतीय ज्ञान पर आधारित ग्रंथ की रचना की। |
मुहम्मद शाह रंगीला कालीन संगीत एवं प्रमुख संगीतज्ञ
➣ मुहम्मद शाह रंगीला (1719–1748 ई.) के शासनकाल में मुगल दरबार में संगीत का पुनः उत्कर्ष हुआ। 18वीं शताब्दी में हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के विकास में उनके संरक्षण का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।
➣ उनके दरबार में नेमत खाँ (सदारंग) तथा उनके भतीजे फिरोज खाँ (अदारंग) ने खयाल गायकी को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। आज भी खयाल परंपरा में सदारंग एवं अदारंग की अनेक बंदिशें गाई जाती हैं।
➣ सामान्य अध्ययन की पुस्तकों के अनुसार, खुसरो खाँ मुहम्मद शाह रंगीला के दरबार से जुड़े थे और उन्हें आधुनिक सितार के विकास से संबंधित माना जाता है।
➣ इसी काल में खयाल, टप्पा, तराना, ठुमरी तथा दादरा जैसी हिन्दुस्तानी गायन शैलियों को विशेष संरक्षण एवं लोकप्रियता मिली।
मुहम्मद शाह रंगीला कालीन प्रमुख संगीतज्ञ
| संगीतज्ञ | परिचय एवं प्रमुख योगदान |
|---|---|
| नेमत खाँ (सदारंग) | मुहम्मद शाह रंगीला के दरबार के महान संगीतज्ञ एवं खयाल गायकी के प्रमुख प्रवर्तकों में से एक। इन्होंने अनेक प्रसिद्ध बंदिशों की रचना की और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को नई दिशा प्रदान की। |
| फिरोज खाँ (अदारंग) | सदारंग के भतीजे एवं प्रसिद्ध संगीतज्ञ। खयाल गायकी के विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा तथा उन्होंने अनेक उत्कृष्ट बंदिशों की रचना की। |
| खुसरो खाँ | सामान्य अध्ययन की पुस्तकों के अनुसार, मुहम्मद शाह रंगीला के दरबार से जुड़े संगीतज्ञ। इन्हें आधुनिक सितार के विकास से संबंधित माना जाता है। |
मुगल-कालीन चित्रकला
➣ मुगल चित्रकला भारतीय एवं फारसी चित्रकला का उत्कृष्ट समन्वय है। इसमें दरबारी जीवन, युद्ध-दृश्य, शिकार, प्राकृतिक दृश्य, पशु-पक्षी, व्यक्तिचित्र (Portrait) तथा ऐतिहासिक घटनाओं का अत्यंत सजीव चित्रण किया गया।
➣ मुगल चित्रकला की नींव हुमायूँ के शासनकाल में पड़ी। निर्वासन के समय उसने फारस से प्रसिद्ध चित्रकार मीर सैय्यद अली तथा अब्दुस्समद को भारत लाकर शाही चित्रशाला की स्थापना की।
➣ प्रसिद्ध फारसी चित्रकार बिहज़ाद (पूर्व का राफेल) का उल्लेख तुज़ुक-ए-बाबरी में मिलता है। यद्यपि वह मुगल दरबार का चित्रकार नहीं था, फिर भी उसकी शैली का प्रभाव प्रारम्भिक मुगल चित्रकला पर पड़ा।
➣ मुगल चित्रकला की सबसे प्रारम्भिक एवं महत्वपूर्ण चित्रित पाण्डुलिपि हम्ज़ानामा (दास्तान-ए-अमीर हम्ज़ा) है। इसका निर्माण हुमायूँ के समय आरम्भ हुआ तथा अकबर के शासनकाल में पूर्ण हुआ। इस ग्रंथ में लगभग 1,200 से अधिक चित्र थे।
➣ दसवंत एवं बसावन अकबर काल के सर्वश्रेष्ठ चित्रकार थे। दसवंत ने हम्ज़ानामा, तूतीनामा तथा खानदान-ए-तैमूरिया जैसी चित्रित पाण्डुलिपियों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
➣ बसावन अपनी यथार्थवादी शैली एवं रंगों के उत्कृष्ट प्रयोग के लिए प्रसिद्ध था। ‘दुबले-पतले घोड़े के साथ निर्जन प्रदेश में भटकता मजनूँ’ उसका प्रसिद्ध चित्र माना जाता है।
➣ जहाँगीर का शासनकाल मुगल चित्रकला का स्वर्णकाल माना जाता है। इस काल में व्यक्तिचित्र (Portrait), प्राकृतिक दृश्य तथा पशु-पक्षियों के चित्रण में अभूतपूर्व प्रगति हुई।
➣ जहाँगीर ने फारसी चित्रकार आगा रज़ा के नेतृत्व में आगरा में शाही चित्रशाला का विकास कराया।
➣ चित्रकार फारुख बेग द्वारा बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह का प्रसिद्ध चित्र बनाया गया।
➣ जहाँगीर ने चित्रकार बिसनदास को फारस के शाह के दरबार में उसके तथा दरबारियों के चित्र बनाने के लिए भेजा था।
➣ जहाँगीर ने उस्ताद मंसूर को ‘नादिर-उल-असर’ तथा अबुल हसन को ‘नादिर-उज़्-ज़माँ’ की उपाधि प्रदान की।
➣ उस्ताद मंसूर पशु-पक्षियों एवं प्राकृतिक चित्रों का महान चित्रकार था। साइबेरियाई सारस, दुर्लभ पक्षियों एवं वनस्पतियों के चित्र इसके प्रमुख कार्य हैं। अबुल हसन व्यक्तिचित्र (Portrait) बनाने में विशेष रूप से प्रसिद्ध था।
➣ दौलत ने जहाँगीर के आदेश पर बिसनदास, गोवर्धन एवं अबुल हसन का सामूहिक चित्र बनाया था।
➣ तुज़ुक-ए-जहाँगीरी जहाँगीर की आत्मकथा है, जो फारसी भाषा में लिखी गई। इसके मुखपृष्ठ का चित्र अबुल हसन द्वारा बनाया गया था।
मुगल काल के प्रमुख चित्रकार
| शासक | प्रमुख चित्रकार | विशेष योगदान |
|---|---|---|
| हुमायूँ | बिहज़ाद*, मीर सैय्यद अली, अब्दुस्समद | मुगल चित्रकला की नींव; फारसी शैली का प्रवेश। (*बिहज़ाद प्रत्यक्ष दरबारी चित्रकार नहीं थे, लेकिन उनकी शैली का प्रभाव था।) |
| अकबर | दसवंत, बसावन, केशव (केशवदास), महेश, लाल, मुकुन्द, सावलदास, अब्दुस्समद | हम्ज़ानामा, तूतीनामा एवं अन्य चित्रित पाण्डुलिपियों का निर्माण; भारतीय एवं फारसी शैली का समन्वय। |
| जहाँगीर | आगा रज़ा, फारुख बेग, दौलत, मनोहर, विचित्र, उस्ताद मंसूर, अबुल हसन, बिसनदास, गोवर्धन | मुगल चित्रकला का स्वर्णकाल; व्यक्तिचित्र एवं प्राकृतिक चित्रण का उत्कर्ष। |
| शाहजहाँ | फकीरुल्लाह (फकीर), मीर हाशिम | चित्रकला में अलंकरण एवं दरबारी वैभव का विकास। |
मुगलकालीन स्थापत्य कला
➣ मुगल वास्तुकला भारतीय, फारसी (ईरानी), तूरानी तथा मध्य एशियाई (ट्रांस-ऑक्सियाना) स्थापत्य परंपराओं का सुंदर समन्वय है। इसे इंडो-इस्लामिक स्थापत्य का सर्वाधिक विकसित एवं अंतिम चरण माना जाता है।
➣ मुगल स्थापत्य की प्रमुख विशेषताएँ हैं— लाल बलुआ पत्थर एवं संगमरमर का उपयोग, विशाल गुम्बद, ऊँची मीनारें, नुकीली मेहराबें, चारबाग शैली, पिएत्रा ड्यूरा (Pietra Dura) अलंकरण, जालीनुमा खिड़कियाँ, संतुलित योजना तथा महलों में बहते जल (जल-प्रणाली) का प्रयोग।
➣ पिएत्रा ड्यूरा (Pietra Dura) संगमरमर पर बहुमूल्य एवं अर्द्ध-बहुमूल्य रंगीन पत्थरों की जड़ाई (Inlay Work) की कला है। इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण ताजमहल में देखने को मिलता है।
➣ मुगल वास्तुकला का विकासक्रम सामान्यतः इस प्रकार माना जाता है— प्रारम्भ – बाबर, विकास – अकबर, स्वर्णकाल – शाहजहाँ तथा पतन – औरंगजेब।
बाबर कालीन स्थापत्य
➣ बाबर ने भारत में मुगल स्थापत्य की नींव रखी। उसे उद्यान (चारबाग शैली) एवं मस्जिदों के निर्माण में विशेष रुचि थी।
➣ बाबर के काल की प्रमुख इमारतों में पानीपत की काबुली बाग मस्जिद, संभल की जामा मस्जिद, अयोध्या की बाबरी मस्जिद (समकालीन स्रोतों के अनुसार मीर बाकी द्वारा निर्मित) तथा आगरा का आरामबाग (रामबाग) प्रमुख हैं।
हुमायूँ कालीन स्थापत्य
➣ 1533 ई. में हुमायूँ ने दिल्ली में दीनपनाह नामक नवीन नगर की स्थापना की। वर्तमान में इसके अवशेष पुराना किला के रूप में विद्यमान हैं।
➣ हुमायूँ का शासनकाल राजनीतिक अस्थिरता के कारण स्थापत्य की दृष्टि से अधिक समृद्ध नहीं रहा, फिर भी उसने मुगल स्थापत्य की आधारशिला को सुदृढ़ किया।
शेरशाह सूरी का योगदान
➣ शेरशाह सूरी ने दिल्ली पर अधिकार करने के बाद शेरगढ़ (दिल्ली शेरशाही) नामक नगर का विकास किया। इसके अवशेषों में खूनी दरवाजा तथा अन्य संरचनाएँ आज भी देखी जा सकती हैं।
➣ बिहार के सासाराम स्थित शेरशाह का मकबरा भारतीय एवं इस्लामी स्थापत्य के उत्कृष्ट समन्वय का श्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है।
अकबर कालीन स्थापत्य
➣ अकबर (1556–1605 ई.) के शासनकाल में मुगल वास्तुकला का वास्तविक विकास हुआ। इस काल में लाल बलुआ पत्थर का व्यापक उपयोग हुआ तथा भारतीय (हिन्दू) एवं इस्लामी स्थापत्य शैलियों का सफल समन्वय दिखाई देता है।
➣ अकबर काल की प्रमुख इमारतों में आगरा का किला, फतेहपुर सीकरी, बुलन्द दरवाजा, पंचमहल, इलाहाबाद का किला, लाहौर का किला तथा हुमायूँ का मकबरा प्रमुख हैं।
➣ अकबर की धाय माँ माहम अनगा ने दिल्ली में खैर-उल-मंजिल मस्जिद एवं मदरसे का निर्माण कराया, जिसे मदरसा-ए-बेगम भी कहा जाता है।
जहाँगीर कालीन स्थापत्य
➣ जहाँगीर की रुचि भवन निर्माण की अपेक्षा चित्रकला एवं उद्यान निर्माण में अधिक थी। इसी कारण कुछ इतिहासकार उसके शासनकाल को “स्थापत्य का विश्राम काल” कहते हैं।
➣ जहाँगीर काल की प्रमुख इमारतों में अकबर का मकबरा (सिकंदरा), एतमादुद्दौला का मकबरा (आगरा), जहाँगीर का मकबरा (शाहदरा, लाहौर), अब्दुर्रहीम खानखाना का मकबरा (दिल्ली), अनारकली का मकबरा (लाहौर), शालीमार बाग (कश्मीर) तथा दिलकुशा बाग (लाहौर) उल्लेखनीय हैं।
➣ मरियम-उज़-ज़मानी का मकबरा भी सिकंदरा में अकबर के मकबरे के समीप स्थित है।
शाहजहाँ कालीन स्थापत्य
➣ शाहजहाँ (1628–1658 ई.) का शासनकाल मुगल वास्तुकला का स्वर्णकाल माना जाता है। इस काल में सफेद संगमरमर तथा पिएत्रा ड्यूरा कला का सर्वाधिक उत्कृष्ट विकास हुआ।
➣ शाहजहाँ ने 1638 ई. में यमुना नदी के तट पर अपनी नई राजधानी शाहजहानाबाद की स्थापना की, जो 1648 ई. में पूर्ण हुई।
➣ शाहजहाँ की प्रमुख स्थापत्य उपलब्धियों में दिल्ली का लाल किला, जामा मस्जिद (दिल्ली), ताजमहल (आगरा), आगरा किले का संगमरमर द्वारा पुनरुद्धार तथा मोती मस्जिद (आगरा किला) प्रमुख हैं।
➣ लाल किला का निर्माण उस्ताद अहमद लाहौरी के निर्देशन में कराया गया। इसका पश्चिमी प्रवेशद्वार लाहौरी गेट तथा दक्षिणी प्रवेशद्वार दिल्ली गेट कहलाता है।
औरंगजेब कालीन स्थापत्य
➣ औरंगजेब की रुचि स्थापत्य कला में अपेक्षाकृत कम थी। उसके शासनकाल में विशाल भवनों की अपेक्षा धार्मिक इमारतों का निर्माण अधिक हुआ।
➣ औरंगजेब की प्रमुख स्थापत्य कृतियों में बादशाही मस्जिद (लाहौर), मोती मस्जिद (लाल किला, दिल्ली) तथा बीबी का मकबरा (औरंगाबाद) उल्लेखनीय हैं।
मुगल स्थापत्य का विकासक्रम
| शासक | प्रमुख स्थापत्य | विशेष योगदान |
|---|---|---|
| बाबर | काबुली बाग मस्जिद, जामा मस्जिद (संभल), आरामबाग | चारबाग शैली एवं मुगल स्थापत्य की नींव |
| हुमायूँ | दीनपनाह (पुराना किला) | मुगल स्थापत्य की प्रारम्भिक आधारशिला |
| अकबर | आगरा किला, फतेहपुर सीकरी, बुलन्द दरवाजा, पंचमहल | हिन्दू एवं इस्लामी स्थापत्य का समन्वय |
| जहाँगीर | एतमादुद्दौला, अकबर का मकबरा, शालीमार बाग | उद्यान एवं मकबरा स्थापत्य का विकास |
| शाहजहाँ | ताजमहल, लाल किला, जामा मस्जिद, शाहजहानाबाद | मुगल स्थापत्य का स्वर्णकाल, संगमरमर एवं पिएत्रा ड्यूरा का उत्कर्ष |
| औरंगजेब | बादशाही मस्जिद, मोती मस्जिद, बीबी का मकबरा | धार्मिक इमारतों का निर्माण; स्थापत्य का अवसान |
मुगलकालीन मकबरे एवं प्रमुख स्थापत्य
मुगलकालीन प्रमुख मकबरे
➣ बाबर एवं जहाँगीर के मकबरे क्रमशः काबुल (अफगानिस्तान) तथा शाहदरा (लाहौर, पाकिस्तान) में स्थित हैं।
➣ हुमायूँ का मकबरा (1570 ई.) दिल्ली में स्थित है। इसका निर्माण हमीदा बानो बेगम (हाजी बेगम) ने अपने पति हुमायूँ की स्मृति में कराया। इसके वास्तुकार मीरक मिर्ज़ा ग़ियास थे।
➣ हुमायूँ का मकबरा भारत का पहला भव्य उद्यान-मकबरा (Garden Tomb) है। इसमें पहली बार चारबाग शैली तथा दोहरे गुम्बद (Double Dome) का प्रभावी प्रयोग हुआ। इसी कारण इसे ताजमहल का पूर्ववर्ती (Forerunner of Taj Mahal) कहा जाता है।
➣ एतमादुद्दौला का मकबरा (1622–1628 ई.) आगरा में स्थित है। इसका निर्माण नूरजहाँ ने अपने पिता मिर्ज़ा ग़ियास बेग (एतमादुद्दौला) की स्मृति में कराया।
➣ एतमादुद्दौला का मकबरा मुगलकाल की प्रथम पूर्ण संगमरमर निर्मित इमारत माना जाता है। इसमें पहली बार व्यापक स्तर पर पिएत्रा ड्यूरा (Pietra Dura) अलंकरण का प्रयोग हुआ।
➣ सासाराम (बिहार) स्थित शेरशाह सूरी का मकबरा भारतीय एवं इस्लामी स्थापत्य शैली के उत्कृष्ट समन्वय का अद्भुत उदाहरण है।
➣ अकबर का मकबरा सिकंदरा (आगरा) में स्थित है। इसकी योजना स्वयं अकबर ने बनाई थी, जबकि इसका निर्माण जहाँगीर ने 1613 ई. में पूर्ण कराया।
➣ ताजमहल का निर्माण शाहजहाँ ने अपनी प्रिय पत्नी मुमताज महल की स्मृति में कराया। इसके मुख्य वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी थे। इसका निर्माण लगभग 1632–1653 ई. के बीच हुआ तथा इसमें लगभग 22 वर्ष लगे।
➣ ताजमहल के निर्माण में सफेद संगमरमर, पिएत्रा ड्यूरा, चारबाग योजना तथा पूर्ण सममिति (Symmetry) का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। इसे विश्व की सर्वश्रेष्ठ मुगल स्थापत्य कृतियों में गिना जाता है।
➣ बीबी का मकबरा (औरंगाबाद) का निर्माण औरंगजेब के पुत्र आज़म शाह ने अपनी माता रबिया-उद्-दुर्रानी की स्मृति में कराया। इसे प्रायः ‘दक्षिण का ताजमहल’ कहा जाता है।
मुगलकालीन स्थापत्य की प्रमुख विशेषताएँ
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| चारबाग शैली | उद्यान को चार समान भागों में विभाजित करने वाली फारसी शैली। |
| दोहरा गुम्बद | भीतरी एवं बाहरी दो गुम्बदों का प्रयोग, जिससे भव्यता एवं ऊँचाई बढ़ती है। |
| पिएत्रा ड्यूरा | संगमरमर पर रंगीन बहुमूल्य पत्थरों की जड़ाई की कला। |
| चार मीनार योजना | मुख्य इमारत के चारों कोनों पर मीनारों का निर्माण। |
| मेहराब एवं गुम्बद | मुगल स्थापत्य की प्रमुख पहचान। |
| जल-प्रणाली | महलों एवं उद्यानों में बहते जल एवं फव्वारों का प्रयोग। |
प्रमुख मुगलकालीन इमारतें एवं उनके वास्तुकार
| इमारत | मुख्य वास्तुकार |
|---|---|
| हुमायूँ का मकबरा | मीरक मिर्ज़ा ग़ियास |
| आगरा का किला | कासिम खाँ |
| फतेहपुर सीकरी | बहाउद्दीन |
| ताजमहल | उस्ताद अहमद लाहौरी |
| दिल्ली का लाल किला | उस्ताद अहमद लाहौरी (निर्देशन) |
प्रमुख मुगलकालीन इमारतें एवं उनके निर्माता
| इमारत | स्थान | निर्माता |
|---|---|---|
| शेरशाह का मकबरा | सासाराम (बिहार) | शेरशाह सूरी |
| हुमायूँ का मकबरा | दिल्ली | हमीदा बानो बेगम (हाजी बेगम) |
| जहाँगीरी महल | आगरा किला | अकबर |
| अकबरी महल | आगरा किला | अकबर |
| आगरा का किला | आगरा | अकबर |
| फतेहपुर सीकरी | उत्तर प्रदेश | अकबर |
| दीवान-ए-आम | फतेहपुर सीकरी | अकबर |
| दीवान-ए-खास | फतेहपुर सीकरी | अकबर |
| पंचमहल | फतेहपुर सीकरी | अकबर |
| मरियम महल | फतेहपुर सीकरी | अकबर |
| जामा मस्जिद | फतेहपुर सीकरी | अकबर |
| तुर्की सुल्ताना का महल | फतेहपुर सीकरी | अकबर |
| बुलन्द दरवाजा | फतेहपुर सीकरी | अकबर |
| अकबर का मकबरा | सिकंदरा (आगरा) | जहाँगीर |
| एतमादुद्दौला का मकबरा | आगरा | नूरजहाँ |
| जहाँगीर का मकबरा | शाहदरा (लाहौर) | नूरजहाँ |
| दीवान-ए-खास | आगरा किला | शाहजहाँ |
| दीवान-ए-आम | आगरा किला | शाहजहाँ |
| शीश महल | आगरा किला | शाहजहाँ |
| खास महल | आगरा किला | शाहजहाँ |
| नगीना मस्जिद | आगरा किला | शाहजहाँ |
| जामा मस्जिद | आगरा | जहाँआरा बेगम |
| मच्छी भवन | आगरा किला | शाहजहाँ |
| लाल किला | दिल्ली | शाहजहाँ |
| मोती मस्जिद | आगरा किला | शाहजहाँ |
| शाहजहानाबाद | दिल्ली | शाहजहाँ |
| जामा मस्जिद | दिल्ली | शाहजहाँ |
| दीवान-ए-आम | लाल किला, दिल्ली | शाहजहाँ |
| दीवान-ए-खास | लाल किला, दिल्ली | शाहजहाँ |
| बादशाही मस्जिद | लाहौर | औरंगजेब |
| मोती मस्जिद | लाल किला, दिल्ली | औरंगजेब |
| बीबी का मकबरा | औरंगाबाद | आज़म शाह (रबिया-उद्-दुर्रानी की स्मृति में) |
मुगलकालीन शिक्षा
➣ मुगल शासकों ने शिक्षा एवं विद्या के संरक्षण को प्रोत्साहन दिया। इस काल में मकतब (प्राथमिक शिक्षा) तथा मदरसे (उच्च शिक्षा) शिक्षा के प्रमुख केन्द्र थे।
➣ मकतबों में बच्चों को पढ़ना-लिखना, कुरान, फारसी भाषा तथा प्रारम्भिक गणित की शिक्षा दी जाती थी, जबकि मदरसों में धर्मशास्त्र, दर्शन, तर्कशास्त्र, गणित, ज्योतिष, चिकित्सा, इतिहास तथा साहित्य जैसे विषय पढ़ाए जाते थे।
➣ सामान्यतः लड़कियों के लिए पृथक विद्यालय नहीं थे। राजपरिवार एवं संपन्न परिवारों की कन्याओं को घर पर निजी शिक्षकों द्वारा शिक्षा दी जाती थी, जबकि सामान्य परिवारों में कुछ स्थानों पर लड़के-लड़कियाँ प्रारम्भिक स्तर पर साथ पढ़ते थे।
➣ बाबर के शासनकाल में शुहरत-ए-आम नामक विभाग शिक्षा संस्थानों एवं सार्वजनिक कार्यों की देखरेख करता था।
➣ हुमायूँ ज्योतिष एवं भूगोल का अच्छा ज्ञाता था। उसके बारे में कहा जाता है कि वह सदैव अपने साथ एक चलित पुस्तकालय (मोबाइल लाइब्रेरी) रखता था।
➣ दिल्ली स्थित खैर-उल-मंजिल (मदरसा-ए-बेगम) का निर्माण माहम अनगा (अकबर की धाय माँ) ने कराया था।
➣ अकबर स्वयं औपचारिक रूप से शिक्षित नहीं था, किन्तु वह विद्या एवं विद्वानों का महान संरक्षक था। उसने आगरा, फतेहपुर सीकरी, लाहौर आदि स्थानों पर अनेक मकतबों एवं मदरसों की स्थापना कर शिक्षा को प्रोत्साहित किया।
➣ अकबर के समय शिक्षा में धार्मिक विषयों के साथ-साथ गणित, इतिहास, दर्शन, कृषि, भूगोल एवं नैतिक शिक्षा जैसे लौकिक विषयों को भी महत्त्व दिया गया।
➣ शाहजहाँ ने दिल्ली में एक नए कॉलेज की स्थापना कराई तथा दार-उल-बका (Dar-ul-Baqa) नामक पुराने कॉलेज का पुनर्निर्माण करवाया।
➣ मुगल राजपरिवार में दाराशिकोह सर्वाधिक विद्वान राजकुमार माना जाता है। उसने भारतीय एवं इस्लामी दर्शन के समन्वय का प्रयास किया तथा अनेक संस्कृत ग्रंथों का फारसी में अनुवाद कराया।
➣ औरंगजेब के शासनकाल में मकतबों एवं मदरसों को संरक्षण मिलता रहा, किन्तु उसने अनेक स्थानों पर हिन्दू शिक्षण संस्थानों पर प्रतिबंध लगाने अथवा उन्हें नियंत्रित करने का प्रयास किया।
➣ औरंगजेब की विदुषी पुत्री जेबुन्निसा ने दिल्ली में बैत-उल-उलूम नामक शिक्षण संस्थान की स्थापना कराई, जहाँ उच्च वर्ग के साथ-साथ अन्य विद्यार्थियों को भी शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलता था।
➣ मुगलकालीन मकतबों एवं मदरसों में शिक्षा का प्रमुख माध्यम फारसी भाषा थी, जबकि धार्मिक शिक्षा में अरबी का भी उपयोग किया जाता था।
➣ विभिन्न मदरसे विशेष विषयों के लिए प्रसिद्ध थे। लखनऊ का फरंगी महल न्याय एवं इस्लामी विधि की शिक्षा के लिए तथा स्यालकोट व्याकरण एवं भाषा अध्ययन के लिए प्रसिद्ध था।
➣ मुगलकालीन शिक्षा में विद्यार्थियों को विषयानुसार विभिन्न उपाधियाँ प्रदान की जाती थीं— फाज़िल (तर्क एवं दर्शन), आलिम (धार्मिक शिक्षा), तथा काबिल (साहित्य एवं भाषा)।
➣ बनारस (काशी) हिन्दू शिक्षा एवं संस्कृत अध्ययन का प्रमुख केन्द्र था। फ्रांसीसी यात्री जाँ बैप्टिस्ट टेवर्नियर ने इसकी विद्वत्ता एवं शिक्षा व्यवस्था की प्रशंसा की है।
मुगलकालीन शिक्षा व्यवस्था
| शिक्षण संस्थान / विषय | विवरण |
|---|---|
| मकतब | प्राथमिक शिक्षा का केन्द्र |
| मदरसा | उच्च शिक्षा का केन्द्र |
| शिक्षा का माध्यम | फारसी (धार्मिक शिक्षा में अरबी) |
| फरंगी महल (लखनऊ) | न्याय एवं इस्लामी विधि की शिक्षा |
| स्यालकोट का मदरसा | व्याकरण एवं भाषा अध्ययन |
| बनारस | हिन्दू एवं संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केन्द्र |
मुगल शासकों का शिक्षा में योगदान
| शासक | प्रमुख योगदान |
|---|---|
| बाबर | शुहरत-ए-आम विभाग द्वारा शिक्षा संस्थानों की देखरेख। |
| हुमायूँ | ज्योतिष एवं भूगोल का विद्वान; पुस्तक-प्रेमी; शिक्षा को संरक्षण। |
| अकबर | आगरा, फतेहपुर सीकरी एवं लाहौर में मकतब एवं मदरसों की स्थापना; लौकिक शिक्षा को बढ़ावा। |
| शाहजहाँ | दिल्ली में नया कॉलेज तथा दार-उल-बका कॉलेज का पुनर्निर्माण। |
| औरंगजेब | मदरसों को संरक्षण; जेबुन्निसा द्वारा बैत-उल-उलूम की स्थापना। |
मुगलकालीन साहित्य
➣ मुगलकालीन साहित्य का प्रमुख माध्यम फारसी भाषा थी। इसके अतिरिक्त तुर्की, अरबी, संस्कृत तथा हिन्दी भाषाओं में भी अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना हुई।
➣ मुगल सम्राटों ने साहित्यकारों, इतिहासकारों एवं कवियों को संरक्षण प्रदान किया। विशेष रूप से अकबर के शासनकाल में इतिहास लेखन एवं अनुवाद कार्य को अभूतपूर्व प्रोत्साहन मिला।
➣ मुगलकालीन साहित्य को मुख्यतः आत्मकथाओं, राजकीय इतिहासों, जीवनी ग्रन्थों, धार्मिक ग्रन्थों तथा अनुवाद साहित्य के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।
बाबर कालीन साहित्य
➣ बाबर स्वयं एक विद्वान, कवि एवं साहित्य-प्रेमी शासक था। उसने अपनी आत्मकथा तुज़ुक-ए-बाबरी (बाबरनामा) चगताई तुर्की भाषा में लिखी।
➣ बाबरनामा का फारसी में कई बार अनुवाद हुआ। सर्वाधिक प्रसिद्ध अनुवाद अब्दुर्रहीम खानखाना द्वारा कराया गया।
➣ बाबरनामा में तत्कालीन भारत की राजनीतिक स्थिति, समाज, कृषि, वनस्पति, पशु-पक्षी तथा प्राकृतिक दशा का विस्तृत एवं प्रामाणिक वर्णन मिलता है।
➣ बाबर ने मुबैय्यान (मुबइयान) नामक नई काव्य-शैली का विकास किया तथा दीवान नाम से अपनी कविताओं का संग्रह भी तैयार किया।
| ग्रन्थ | लेखक | विशेषता |
|---|---|---|
| तुज़ुक-ए-बाबरी (बाबरनामा) | बाबर | चगताई तुर्की में लिखी गई आत्मकथा |
| दीवान | बाबर | तुर्की भाषा का काव्य-संग्रह |
हुमायूँ कालीन साहित्य
➣ हुमायूँ स्वयं ज्योतिष, गणित एवं भूगोल का विद्वान था तथा विद्वानों को संरक्षण देता था।
➣ मिर्जा हैदर दुगलत ने तारीख-ए-रशीदी की रचना की, जिसमें मध्य एशिया के तुर्कों तथा हुमायूँ काल का विस्तृत वर्णन मिलता है।
➣ गुलबदन बेगम (बाबर की पुत्री) ने अकबर के आदेश पर हुमायूँनामा की रचना की। इसमें बाबर एवं हुमायूँ के जीवन तथा मुगल दरबार की घटनाओं का प्रत्यक्ष विवरण मिलता है।
➣ ख्वांदमीर ने कानून-ए-हुमायूँ (हुमायूँनामा) की रचना की, जिसमें हुमायूँ के शासन-प्रबंध का वर्णन है। हुमायूँ ने उन्हें अमीर-ए-अख़बार की उपाधि प्रदान की।
➣ जौहर आफताबची ने तज़किरात-उल-वाकियात की रचना की, जिसमें हुमायूँ के जीवन के संघर्षों का वर्णन मिलता है।
➣ रिज़कुल्लाह मुश्ताकी द्वारा रचित वाकयात-ए-मुश्ताकी लोदी एवं सूर वंश के इतिहास का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
| ग्रन्थ | लेखक | विशेषता |
|---|---|---|
| तारीख-ए-रशीदी | मिर्जा हैदर दुगलत | मध्य एशिया एवं हुमायूँ काल का इतिहास |
| हुमायूँनामा | गुलबदन बेगम | बाबर एवं हुमायूँ का संस्मरणात्मक इतिहास |
| कानून-ए-हुमायूँ | ख्वांदमीर | हुमायूँ के शासन-प्रबंध का वर्णन |
| तज़किरात-उल-वाकियात | जौहर आफताबची | हुमायूँ के जीवन का प्रत्यक्ष विवरण |
| वाकयात-ए-मुश्ताकी | रिज़कुल्लाह मुश्ताकी | लोदी एवं सूर वंश का इतिहास |
अकबर कालीन साहित्य
➣ अकबर (1556–1605 ई.) का शासनकाल मुगल साहित्य का स्वर्णकाल माना जाता है। उसने इतिहास लेखन, अनुवाद तथा विद्वानों के संरक्षण को विशेष प्रोत्साहन दिया।
➣ अबुल फ़ज़ल ने अकबर के दरबार के 59 प्रमुख कवियों का उल्लेख किया है। इनमें फ़ैज़ी, नज़ीरी, उर्फ़ी, अब्दुर्रहीम खानखाना आदि प्रमुख थे।
➣ अकबर ने भारत में राजकीय इतिहास लेखन की परंपरा को व्यवस्थित रूप से विकसित किया।
➣ अबुल फ़ज़ल द्वारा रचित अकबरनामा तीन भागों में विभाजित है। इसका तीसरा भाग आइन-ए-अकबरी है, जिसमें मुगल प्रशासन, अर्थव्यवस्था, समाज एवं संस्कृति का विस्तृत विवरण मिलता है।
➣ मुन्तख़ब-उत-तवारीख के लेखक अब्दुल कादिर बदायूँनी थे। यह अकबर काल का महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रन्थ है।
➣ अन्य प्रमुख ग्रन्थों में तारीख-ए-अल्फी (मुल्ला दाऊद), तबकात-ए-अकबरी (निज़ामुद्दीन अहमद) तथा मआसिर-ए-रहीमी (अब्दुल बाकी नहावन्दी) प्रमुख हैं।
| ग्रन्थ | लेखक | विशेषता |
|---|---|---|
| अकबरनामा | अबुल फ़ज़ल | अकबर का आधिकारिक इतिहास |
| आइन-ए-अकबरी | अबुल फ़ज़ल | मुगल प्रशासन, समाज एवं अर्थव्यवस्था का विवरण |
| मुन्तख़ब-उत-तवारीख | अब्दुल कादिर बदायूँनी | अकबर काल का प्रमुख ऐतिहासिक ग्रन्थ |
| तारीख-ए-अल्फी | मुल्ला दाऊद | इस्लाम के प्रथम हजार वर्षों का इतिहास |
| तबकात-ए-अकबरी | निज़ामुद्दीन अहमद | भारत का विस्तृत इतिहास |
| मआसिर-ए-रहीमी | अब्दुल बाकी नहावन्दी | अब्दुर्रहीम खानखाना का जीवन एवं समकालीन इतिहास |
जहाँगीर कालीन साहित्य
➣ जहाँगीर (1605–1627 ई.) स्वयं एक विद्वान एवं साहित्य-प्रेमी शासक था। उसके शासनकाल में इतिहास लेखन तथा आत्मकथात्मक साहित्य का विशेष विकास हुआ।
➣ तुज़ुक-ए-जहाँगीरी (जहाँगीरनामा) जहाँगीर की आत्मकथा है। उसने स्वयं अपने शासन के लगभग 17वें वर्ष तक इसका लेखन किया। इसके बाद इसे मुतामिद खाँ ने आगे बढ़ाया तथा अंतिम रूप मुहम्मद हादी ने दिया।
➣ इकबालनामा-ए-जहाँगीरी के लेखक मुतामिद खाँ बख्शी थे। यह जहाँगीर के शासनकाल का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रन्थ है।
➣ मुहम्मद हादी ने ततिम्मा-ए-वाकियात-ए-जहाँगीरी की रचना कर जहाँगीर के शासनकाल का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया।
➣ तालिब आमुली जहाँगीर का राजकवि था और फारसी साहित्य के प्रमुख कवियों में गिना जाता है।
➣ अब्दुल्ला द्वारा रचित तारीख-ए-दाऊदी लोदी एवं सूर वंश के इतिहास का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
➣ मुहम्मद कासिम हिन्दूशाह फरिश्ता ने बीजापुर के शासक इब्राहीम आदिलशाह द्वितीय के संरक्षण में तारीख-ए-फरिश्ता (गुलशन-ए-इब्राहीमी) की रचना की, जिसमें जहाँगीर काल तक का इतिहास मिलता है।
| ग्रन्थ | लेखक | विशेषता |
|---|---|---|
| तुज़ुक-ए-जहाँगीरी | जहाँगीर, बाद में मुतामिद खाँ एवं मुहम्मद हादी | जहाँगीर की आत्मकथा |
| इकबालनामा-ए-जहाँगीरी | मुतामिद खाँ बख्शी | जहाँगीर काल का इतिहास |
| ततिम्मा-ए-वाकियात-ए-जहाँगीरी | मुहम्मद हादी | जहाँगीर के शासन का विस्तृत विवरण |
| तारीख-ए-दाऊदी | अब्दुल्ला | लोदी एवं सूर वंश का इतिहास |
| तारीख-ए-फरिश्ता | मुहम्मद कासिम फरिश्ता | मध्यकालीन भारत का इतिहास |
शाहजहाँ कालीन साहित्य
➣ शाहजहाँ (1628–1658 ई.) के शासनकाल में इतिहास, काव्य एवं संस्कृत ग्रन्थों के फारसी अनुवाद को विशेष संरक्षण प्राप्त हुआ।
➣ अब्दुल हमीद लाहौरी शाहजहाँ का राजकीय इतिहासकार था। उसकी रचना पादशाहनामा शाहजहाँ काल का सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत मानी जाती है।
➣ शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दाराशिकोह भारतीय एवं इस्लामी दर्शन के समन्वय का समर्थक था। उसने भगवद्गीता, योगवशिष्ठ तथा 52 उपनिषदों का फारसी में अनुवाद कराया। उपनिषदों के अनुवाद का नाम सिर्र-ए-अकबर है।
➣ दाराशिकोह ने मज्मा-उल-बहरीन नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ की रचना की, जिसमें हिन्दू एवं इस्लामी दर्शन की समानताओं का वर्णन किया गया है।
➣ शाहजहाँ के समय रामायण का फारसी अनुवाद इब्न-ए-हरकरण ने किया।
➣ अबू तालिब कलीम (कलीम) शाहजहाँ का राजकवि था। उसने साकीनामा, मसनवी तथा कसीदों की रचना की। उसके बाद पण्डित जगन्नाथ को राजकवि बनाया गया।
| ग्रन्थ | लेखक | विशेषता |
|---|---|---|
| पादशाहनामा | अब्दुल हमीद लाहौरी | शाहजहाँ का आधिकारिक इतिहास |
| सिर्र-ए-अकबर | दाराशिकोह | 52 उपनिषदों का फारसी अनुवाद |
| मज्मा-उल-बहरीन | दाराशिकोह | हिन्दू एवं इस्लामी दर्शन का समन्वय |
| रामायण (फारसी) | इब्न-ए-हरकरण | रामायण का फारसी अनुवाद |
औरंगजेब कालीन साहित्य
➣ औरंगजेब (1658–1707 ई.) के प्रारम्भिक शासनकाल में राजकीय इतिहास लेखन को संरक्षण मिला, किन्तु बाद में उसने समकालीन इतिहास लिखने पर प्रतिबंध लगा दिया।
➣ मिर्जा मुहम्मद काज़िम ने आलमगीरनामा की रचना की, जिसमें औरंगजेब के शासन के प्रारम्भिक वर्षों का वर्णन है।
➣ खफी खाँ (मुहम्मद हाशिम) ने गुप्त रूप से मुन्तखब-उल-लुबाब की रचना की। यह बाबर से लेकर मुहम्मद शाह रंगीला तक के इतिहास का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
➣ आकिल खाँ राजी ने वाकियात-ए-आलमगीरी (जफरनामा-ए-आलमगीरी) की रचना की।
➣ भीमसेन द्वारा रचित नुस्खा-ए-दिलकुशा दक्षिण भारत में औरंगजेब के अभियानों का प्रमुख स्रोत है।
➣ ईश्वरदास नागर ने फुतूहात-ए-आलमगीरी की रचना की, जिसमें राजपूताना एवं मालवा में औरंगजेब की गतिविधियों का वर्णन है।
➣ फतावा-ए-आलमगीरी औरंगजेब के आदेश पर तैयार इस्लामी कानूनों का सबसे बड़ा संकलन (Digest) माना जाता है।
➣ औरंगजेब की पुत्री जेबुन्निसा एक प्रसिद्ध कवयित्री थी। उसने दीवान-ए-मख्फी की रचना की।
| ग्रन्थ | लेखक | विशेषता |
|---|---|---|
| आलमगीरनामा | मिर्जा मुहम्मद काज़िम | औरंगजेब के प्रारम्भिक शासन का इतिहास |
| मुन्तखब-उल-लुबाब | खफी खाँ | बाबर से मुहम्मद शाह तक का इतिहास |
| वाकियात-ए-आलमगीरी | आकिल खाँ राजी | औरंगजेब काल का इतिहास |
| नुस्खा-ए-दिलकुशा | भीमसेन | दक्षिण भारत के अभियानों का विवरण |
| फुतूहात-ए-आलमगीरी | ईश्वरदास नागर | राजपूताना एवं मालवा की घटनाएँ |
| फतावा-ए-आलमगीरी | औरंगजेब के आदेश से संकलित | इस्लामी कानूनों का विशाल संकलन |
| दीवान-ए-मख्फी | जेबुन्निसा | फारसी काव्य-संग्रह |
अनुवाद विभाग (मकतबखाना)
➣ अकबर ने 1582 ई. में फतेहपुर सीकरी में मकतबखाना (अनुवाद विभाग) की स्थापना की। इसका उद्देश्य संस्कृत, हिन्दी, अरबी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के प्रमुख ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद कराना था।
➣ इस अनुवाद विभाग का संचालन अकबर के राजकवि फैज़ी (अबुल फ़ज़ल के बड़े भाई) के निर्देशन में किया जाता था।
➣ अनुवाद विभाग के माध्यम से भारतीय संस्कृति, दर्शन एवं धर्मग्रन्थों का परिचय फारसी भाषी विद्वानों तक पहुँचा तथा हिन्दू-मुस्लिम सांस्कृतिक समन्वय को बढ़ावा मिला।
➣ अकबर के आदेश पर महाभारत का फारसी में अनुवाद किया गया, जिसे रज़्मनामा के नाम से जाना जाता है।
➣ मौलाना शाह मुहम्मद शाहाबादी ने राजतरंगिणी का फारसी अनुवाद किया।
➣ अबुल फ़ज़ल ने पंचतंत्र का फारसी अनुवाद अनवार-ए-सुहैली नाम से कराया। जबकि इसका प्रसिद्ध अरबी अनुवाद कलीला वा दिमना कहलाता है।
➣ फैज़ी ने लीलावती तथा नल-दमयंती का फारसी अनुवाद किया।
➣ हाजी इब्राहीम सरहिन्दी ने अथर्ववेद का फारसी अनुवाद किया।
➣ दाराशिकोह ने 52 उपनिषदों, भगवद्गीता तथा योगवशिष्ठ का फारसी में अनुवाद कराया। उपनिषदों के अनुवाद का नाम सिर्र-ए-अकबर है।
फारसी में अनूदित प्रमुख ग्रन्थ
| मूल ग्रन्थ | अनुवादक | फारसी नाम / टिप्पणी |
|---|---|---|
| तुज़ुक-ए-बाबरी (बाबरनामा) | अब्दुर्रहीम खानखाना | फारसी अनुवाद |
| महाभारत | नकी खाँ, बदायूँनी, अबुल फ़ज़ल, फैज़ी आदि | रज़्मनामा |
| रामायण | अब्दुल कादिर बदायूँनी | फारसी अनुवाद |
| राजतरंगिणी | शाह मुहम्मद शाहाबादी | फारसी अनुवाद |
| पंचतंत्र | अबुल फ़ज़ल | अनवार-ए-सुहैली |
| हरिवंश पुराण | मौलाना शौरी | फारसी अनुवाद |
| नल-दमयंती | फैज़ी | फारसी अनुवाद |
| लीलावती | फैज़ी | फारसी अनुवाद |
| अथर्ववेद | हाजी इब्राहीम सरहिन्दी | फारसी अनुवाद |
| कालियदमन | अबुल फ़ज़ल | फारसी अनुवाद |
| प्रबोधचन्द्रोदय | मुंशी बनवारीदास | फारसी अनुवाद |
| भगवद्गीता | दाराशिकोह | फारसी अनुवाद |
| योगवशिष्ठ | दाराशिकोह | फारसी अनुवाद |
| 52 उपनिषद | दाराशिकोह | सिर्र-ए-अकबर |
अनुवाद विभाग की प्रमुख उपलब्धियाँ
| विषय | महत्त्व |
|---|---|
| स्थापना | अकबर द्वारा फतेहपुर सीकरी में मकतबखाना (1582 ई.) |
| प्रधान | फैज़ी |
| मुख्य उद्देश्य | भारतीय ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद तथा सांस्कृतिक समन्वय |
| सबसे प्रसिद्ध अनुवाद | महाभारत → रज़्मनामा |
| विशेष योगदान | भारतीय दर्शन, साहित्य एवं धर्मग्रन्थों को फारसी जगत तक पहुँचाया |
संस्कृत एवं हिन्दी साहित्य
➣ मुगल काल में फारसी के साथ-साथ संस्कृत एवं हिन्दी साहित्य का भी उल्लेखनीय विकास हुआ। विशेष रूप से अकबर के शासनकाल में संस्कृत एवं हिन्दी विद्वानों को राजकीय संरक्षण प्रदान किया गया।
➣ सामान्यतः अकबर का शासनकाल हिन्दी साहित्य का स्वर्णकाल माना जाता है। उसने संस्कृत विद्वानों, हिन्दी कवियों तथा अनुवादकों को संरक्षण देकर भारतीय साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
अकबर कालीन संस्कृत एवं हिन्दी साहित्य
➣ अकबर संस्कृत भाषा को संरक्षण देने वाला प्रथम प्रमुख मुगल सम्राट था। उसके संरक्षण में अनेक संस्कृत ग्रन्थों का अध्ययन एवं अनुवाद हुआ।
➣ महेश ठाकुर (दरभंगा) ने संस्कृत में अकबर के शासन का इतिहास लिखा।
➣ अकबर के समय तुलसीदास, सूरदास, अब्दुर्रहीम खानखाना (रहीम) तथा रसखान हिन्दी साहित्य के प्रमुख कवि थे।
➣ तुलसीदास को “मानस का हंस” तथा “लोकनायक” कहा जाता है। उन्होंने रामचरितमानस, विनय पत्रिका, गीतावली, कवितावली तथा दोहावली जैसी अमर कृतियों की रचना की।
➣ अकबर ने बीरबल को कविप्रिय (कविराय) तथा नरहरि चक्रवर्ती को महापात्र की उपाधि प्रदान की।
➣ मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा अवधी भाषा में रचित पद्मावत (1540 ई.) हिन्दी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कृतियों में गिनी जाती है।
➣ जैन विद्वान पद्मसुन्दर ने फारसी-प्रकाश नामक प्रथम फारसी-संस्कृत शब्दकोश तैयार किया।
➣ अकबर के आदेश पर फैज़ी ने संस्कृत में अल्लोपनिषद् की रचना की।
| कवि / विद्वान | प्रमुख रचनाएँ / योगदान |
|---|---|
| तुलसीदास | रामचरितमानस, विनय पत्रिका, गीतावली, कवितावली, दोहावली |
| सूरदास | भक्ति काव्य के महान कवि |
| रहीम | रहीम के दोहे, हिन्दी एवं फारसी साहित्य |
| रसखान | कृष्ण भक्ति काव्य |
| मलिक मुहम्मद जायसी | पद्मावत |
| महेश ठाकुर | संस्कृत में अकबर के शासन का इतिहास |
जहाँगीर कालीन संस्कृत एवं हिन्दी साहित्य
➣ जहाँगीर के शासनकाल में हिन्दी एवं ब्रजभाषा साहित्य का निरन्तर विकास हुआ।
➣ इस काल के प्रमुख कवियों में केशवदास, रसखान, परमानन्ददास, कुम्भनदास, वृक्षराज, राजा सूरजसिंह तथा जगतरूप गोसाईं उल्लेखनीय हैं।
➣ केशवदास ओरछा के शासक वीरसिंह बुन्देला के दरबार के राजकवि थे। उन्होंने जहाँगीर चन्द्रिका, रामचन्द्रिका, रसिकप्रिया, कविप्रिया तथा वीरसिंह देव चरित की रचना की। इन्हें “कठिन काव्य का प्रेत” कहा जाता है।
➣ सूरदास की प्रसिद्ध रचना सूरसागर इसी काल में व्यापक रूप से लोकप्रिय हुई।
➣ जहाँगीर के भाई दानियाल तथा राजा मानसिंह भी हिन्दी काव्य के संरक्षक एवं रचनाकार थे।
➣ इतिहासकार बेनी प्रसाद ने जहाँगीर के शासनकाल को “मध्यकालीन भारतीय साहित्य का आगस्टस युग” कहा है।
| कवि | प्रमुख रचनाएँ |
|---|---|
| केशवदास | जहाँगीर चन्द्रिका, रामचन्द्रिका, रसिकप्रिया, कविप्रिया, वीरसिंह देव चरित |
| सूरदास | सूरसागर |
| रसखान | कृष्ण भक्ति काव्य |
| परमानन्ददास | भक्ति साहित्य |
| कुम्भनदास | भक्ति साहित्य |
शाहजहाँ कालीन संस्कृत एवं हिन्दी साहित्य
➣ शाहजहाँ के शासनकाल में संस्कृत एवं हिन्दी साहित्य को निरन्तर संरक्षण प्राप्त होता रहा।
➣ पण्डित जगन्नाथ शाहजहाँ के राजकवि थे। उन्होंने रसगंगाधर तथा गंगालहरी जैसे प्रसिद्ध संस्कृत ग्रन्थों की रचना की।
➣ कवीन्द्र आचार्य ने कवीन्द्र कल्पतरु की रचना की।
➣ रसखान की प्रसिद्ध रचना प्रेमवाटिका हिन्दी साहित्य की महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है।
➣ बनारसीदास ने 1641 ई. में ब्रजभाषा में अर्द्धकथानक नामक आत्मकथा लिखी, जिसे हिन्दी की प्रथम आत्मकथा माना जाता है।
➣ शाहजहाँ ने हिन्दी कवियों सुन्दरदास, चिन्तामणि तथा सेनापति को संरक्षण प्रदान किया।
➣ सुन्दरदास ने सुन्दर शृंगार, बारहमासा तथा सिंहासन बत्तीसी की रचना की। शाहजहाँ ने उन्हें महाकविराय की उपाधि प्रदान की।
| कवि / विद्वान | प्रमुख रचनाएँ |
|---|---|
| पण्डित जगन्नाथ | रसगंगाधर, गंगालहरी |
| कवीन्द्र आचार्य | कवीन्द्र कल्पतरु |
| रसखान | प्रेमवाटिका |
| बनारसीदास | अर्द्धकथानक (हिन्दी की प्रथम आत्मकथा) |
| सुन्दरदास | सुन्दर शृंगार, बारहमासा, सिंहासन बत्तीसी |
| सेनापति | रीतिकालीन हिन्दी साहित्य |
मुगलकालीन प्रमुख ग्रन्थ
तुर्की भाषा के प्रमुख ग्रन्थ
| ग्रन्थ | लेखक |
|---|---|
| तुज़ुक-ए-बाबरी (बाबरनामा) | बाबर |
| दीवान | बाबर |
फारसी भाषा के प्रमुख ग्रन्थ
| ग्रन्थ | लेखक |
|---|---|
| हुमायूँनामा | गुलबदन बेगम |
| कानून-ए-हुमायूँ | ख्वांदमीर |
| तारीख-ए-रशीदी | मिर्जा हैदर दुगलत |
| तज़किरात-उल-वाकियात | जौहर आफताबची |
| वाकयात-ए-मुश्ताकी | रिज़कुल्लाह मुश्ताकी |
| अकबरनामा | अबुल फ़ज़ल |
| आइन-ए-अकबरी | अबुल फ़ज़ल |
| तबकात-ए-अकबरी | निज़ामुद्दीन अहमद |
| तारीख-ए-अल्फी | मुल्ला दाऊद |
| मुन्तख़ब-उत-तवारीख | अब्दुल कादिर बदायूँनी |
| मआसिर-ए-रहीमी | अब्दुल बाकी नहावन्दी |
| तारीख-ए-शेरशाही | अब्बास खाँ सरवानी |
| तारीख-ए-सलातीन-ए-अफगाना | अहमद यादगार |
| तज़किरा-ए-हुमायूँ | बयाजिद बयात |
| तुज़ुक-ए-जहाँगीरी | जहाँगीर (पूर्णता: मुतामिद खाँ एवं मुहम्मद हादी) |
| इकबालनामा-ए-जहाँगीरी | मुतामिद खाँ बख्शी |
| मआसिर-ए-जहाँगीरी | ख्वाजा कामगार |
| तारीख-ए-फरिश्ता | मुहम्मद कासिम फरिश्ता |
| पादशाहनामा | अब्दुल हमीद लाहौरी |
| पादशाहनामा | मुहम्मद अमीन कज़वीनी |
| शाहजहाँनामा | इनायत खाँ |
| आलम-ए-सालेह | मुहम्मद सालेह |
| मज्मा-उल-बहरीन | दाराशिकोह |
| आलमगीरनामा | मिर्जा मुहम्मद काज़िम |
| मुन्तखब-उल-लुबाब | खफी खाँ |
| नुस्खा-ए-दिलकुशा | भीमसेन |
| फुतूहात-ए-आलमगीरी | ईश्वरदास नागर |
| वाकियात-ए-आलमगीरी | आकिल खाँ राजी |
| मआसिर-ए-आलमगीरी | मुहम्मद साकी मुस्तैद खाँ |
| खुलासा-उल-तवारीख | सुजान राय |
| सियार-उल-मुताख्खिरीन | गुलाम हुसैन |
| तवारीख-ए-मुज़फ्फरी | मुहम्मद अली |
फारसी में अनूदित प्रमुख भारतीय ग्रन्थ
| मूल ग्रन्थ | अनुवादक |
|---|---|
| महाभारत (रज़्मनामा) | नकी खाँ, बदायूँनी, अबुल फ़ज़ल, फैज़ी आदि |
| रामायण | अब्दुल कादिर बदायूँनी |
| राजतरंगिणी | शाह मुहम्मद शाहाबादी |
| अथर्ववेद | हाजी इब्राहीम सरहिन्दी |
| हरिवंश पुराण | मौलाना शौरी |
| लीलावती | फैज़ी |
| नल-दमयंती | फैज़ी |
| पंचतंत्र (अनवार-ए-सुहैली) | अबुल फ़ज़ल |
| कालियदमन | अबुल फ़ज़ल |
| प्रबोधचन्द्रोदय | मुंशी बनवारीदास |
| भगवद्गीता | दाराशिकोह |
| योगवशिष्ठ | दाराशिकोह |
| 52 उपनिषद (सिर्र-ए-अकबर) | दाराशिकोह |
हिन्दी एवं संस्कृत के प्रमुख ग्रन्थ
| ग्रन्थ | लेखक |
|---|---|
| रामचरितमानस | तुलसीदास |
| विनय पत्रिका | तुलसीदास |
| सूरसागर | सूरदास |
| प्रेमवाटिका | रसखान |
| रामचन्द्रिका | केशवदास |
| रसिकप्रिया | केशवदास |
| कविप्रिया | केशवदास |
| जहाँगीर चन्द्रिका | केशवदास |
| वीरसिंह देव चरित | केशवदास |
| रसगंगाधर | पण्डित जगन्नाथ |
| गंगालहरी | पण्डित जगन्नाथ |
| कवीन्द्र कल्पतरु | कवीन्द्र आचार्य |
| अर्द्धकथानक | बनारसीदास |
| सुन्दर शृंगार | सुन्दरदास |
| बारहमासा | सुन्दरदास |
| सिंहासन बत्तीसी | सुन्दरदास |
| अकबरशाही | पद्मसुन्दर |
| शृंगार दर्पण | पद्मसुन्दर |
| भानुचन्द्र चरित | आचार्य सिद्धचन्द्र उपाध्याय |
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