मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगज़ेब (1658–1707 ई.) : युद्ध, विद्रोह एवं प्रमुख घटनाएँ

भारतीय इतिहास मध्यकालीन भारत मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगज़ेब (1658–1707 ई.)
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औरंगज़ेब : परिचय

➣ औरंगज़ेब का जन्म 4 नवम्बर, 1618 ई. को गुजरात के दोहद नामक स्थान पर मुमताज़ महल के गर्भ से हुआ था। उसके बचपन का प्रारम्भिक समय नूरजहाँ के संरक्षण में बीता।

➣ औरंगज़ेब का विवाह 18 मई, 1637 ई. को फ़ारस के राजघराने के शाहनवाज़ ख़ाँ सफ़वी की पुत्री दिलरास बानो बेगम (राबिया-उद्-दौरानी) से हुआ। उनसे ज़ेबुन्निसा, ज़ीनत-उन-निसा, ज़ुबदत-उन-निसा तथा मेहर-उन-निसा सहित कई संतानें हुईं।

➣ औरंगज़ेब 1636 ई. से 1644 ई. तथा 1652 ई. से 1657 ई. तक दो बार दक्कन का सूबेदार रहा। इसके अतिरिक्त वह 1645 ई. से 1647 ई. तक गुजरात तथा 1648 ई. से 1652 ई. तक मुल्तान एवं सिंध का सूबेदार भी नियुक्त किया गया।

राज्याभिषेक

➣ औरंगज़ेब का दो बार राज्याभिषेक हुआ था।

सामूगढ़ के युद्ध (29 मई, 1658 ई.) में विजय तथा आगरा पर अधिकार करने के बाद उसने 21 जुलाई, 1658 ई. को दिल्ली में अपना प्रथम राज्याभिषेक कराया और अबुल मुज़फ़्फ़र मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगज़ेब बहादुर आलमगीर बादशाह ग़ाज़ी की शाही उपाधि धारण की।

खाजवा (5 जनवरी, 1659 ई.) तथा देवराई (12–14 अप्रैल, 1659 ई.) के युद्धों में क्रमशः शाह शूजा और दारा शिकोह को अंतिम रूप से पराजित करने के बाद 5 जून, 1659 ई. को दिल्ली में उसका द्वितीय (औपचारिक) राज्याभिषेक सम्पन्न हुआ।

➣ सिंहासन पर बैठने के बाद औरंगज़ेब ने अनेक अबवाब (स्थानीय कर) समाप्त कर दिए। इनमें राहदारी (परिवहन/मार्ग शुल्क), पानदारी (चुंगी कर) आदि प्रमुख थे। विभिन्न समकालीन एवं आधुनिक स्रोतों में इन करों की संख्या लगभग 80 बताई गई है।

फ़ारस के शाह अब्बास द्वितीय ने सर्वप्रथम औरंगज़ेब को मुगल सम्राट के रूप में मान्यता दी तथा उसके दरबार में एक दूतमण्डल भेजा। इस घटना का वर्णन निकोलाओ मनूची ने अपनी पुस्तक स्टोरिया दो मोगोर में किया है।

सैन्य अभियान

असम एवं पूर्वी भारत

➣ औरंगज़ेब के शासनकाल में पूर्वोत्तर भारत, विशेषकर असम (अहोम राज्य) पर मुगल अधिकार स्थापित करने का प्रयास किया गया। असम के अहोम शासकों और मुगलों के बीच लंबे समय तक संघर्ष चलता रहा।

1658 ई. में उत्तराधिकार युद्ध का लाभ उठाकर अहोम राजा जयध्वज सिंह ने मुगलों से कामरूप (गुवाहाटी) का क्षेत्र पुनः छीन लिया। इसके बाद औरंगज़ेब ने असम पर पुनः अधिकार स्थापित करने का निश्चय किया।

➣ औरंगज़ेब ने 1660 ई. में मीर जुमला (वास्तविक नाम मुहम्मद सईद) को बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया और उसे कूच बिहार तथा असम पर अभियान चलाने का आदेश दिया।

➣ मीर जुमला ने 1661 ई. में कूच बिहार पर अधिकार कर लिया तथा इसके बाद असम की ओर बढ़ते हुए 17 मार्च, 1662 ई. को गढ़गाँव (अहोम राजधानी) पर अधिकार कर लिया।

➣ मीर जुमला की सफलता के परिणामस्वरूप 6 जनवरी, 1663 ई. को घिलाजारिघाट की संधि हुई, जिसके अनुसार अहोम राजा जयध्वज सिंह ने मुगलों की अधीनता स्वीकार की, भारी क्षतिपूर्ति देने तथा कुछ क्षेत्र मुगलों को सौंपने पर सहमति व्यक्त की।

➣ अभियान के दौरान असम की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, वर्षा, बाढ़ तथा महामारी के कारण मुगल सेना को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। वापसी के दौरान 30 मार्च, 1663 ई. को मीर जुमला की मृत्यु हो गई।

➣ मीर जुमला के अभियान के कुछ वर्षों बाद 1667 ई. में अहोम शासकों ने पुनः गुवाहाटी पर अधिकार कर लिया। इसके बाद 1671 ई. में सरायघाट के युद्ध में लाचित बरफुकन के नेतृत्व में अहोम सेना ने राजा राम सिंह के नेतृत्व वाली मुगल सेना को निर्णायक रूप से पराजित किया, जिससे असम पर मुगलों का स्थायी अधिकार स्थापित नहीं हो सका।

➣ अहोम पर मीर जुमला के अभियान का विस्तृत वर्णन मिर्जा मुहम्मद काज़िम द्वारा रचित आलमगीरनामा में मिलता है।

दक्षिण विजय

➣ दक्षिण में औरंगज़ेब के अभियान को सामान्यतः दो चरणों में विभाजित किया जाता है-
1660–1681 ई. : इस अवधि में औरंगज़ेब ने अपने सेनापतियों एवं शहज़ादों के माध्यम से मराठों तथा दक्कनी राज्यों के विरुद्ध अभियान चलाए।
1681–1707 ई. : इस अवधि में औरंगज़ेब स्वयं दक्षिण में रहकर अभियानों का नेतृत्व करता रहा।

दक्षिण अभियान में प्रमुख नेतृत्व का क्रम

शाइस्ता ख़ाँराजा जयसिंह (मिर्ज़ा राजा जयसिंह)शहज़ादा मुअज्ज़मबहादुर ख़ाँदिलेर ख़ाँऔरंगज़ेब

नेतृत्व मुख्य कार्य / उपलब्धि
शाइस्ता ख़ाँ
(1660–1663 ई.)
पुणे पर अधिकार किया, किंतु 1663 ई. में शिवाजी के आकस्मिक आक्रमण में पराजित होकर वापस बुला लिया गया।
मिर्ज़ा राजा जयसिंह
(1665–1667 ई.)
पुरन्दर की संधि (1665 ई.) कराई तथा शिवाजी को आगरा दरबार भेजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
शहज़ादा मुअज्ज़म
(1667–1672 ई.)
दक्षिण का सूबेदार नियुक्त हुआ तथा मराठों के विरुद्ध अभियान जारी रखा।
बहादुर ख़ाँ
(1673–1677 ई.)
मराठों के विरुद्ध अभियान चलाया, परंतु कोई निर्णायक सफलता प्राप्त नहीं हुई।
दिलेर ख़ाँ
(1677–1680 ई.)
बीजापुर एवं मराठों के विरुद्ध अभियानों में भाग लिया और बहादुर ख़ाँ के साथ मिलकर कार्य किया।
औरंगज़ेब
(1681–1707 ई.)
स्वयं दक्षिण पहुँचा। बीजापुर (1686 ई.) एवं गोलकुंडा (1687 ई.) पर अधिकार किया, किंतु मराठों को पूर्णतः पराजित नहीं कर सका।

बीजापुर (1686 ई.)

➣ औरंगज़ेब ने 1665 ई. में मिर्जा राजा जयसिंह को शिवाजी तथा बीजापुर के विरुद्ध अभियान का नेतृत्व करने के लिए दक्कन भेजा।

➣ सर्वप्रथम जयसिंह ने पुरन्दर की संधि (11 जून, 1665 ई.) के लिए शिवाजी को विवश कर दिया। इसके बाद उसने बीजापुर पर आक्रमण किया, किन्तु पर्याप्त सफलता प्राप्त नहीं कर सका और अभियान असफल रहा।

➣ वापस लौटते समय 12 जुलाई, 1667 ई. को बुरहानपुर में मिर्जा राजा जयसिंह की मृत्यु हो गई। वे शिवाजी और औरंगज़ेब के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी माने जाते हैं।

1676 ई. में मुगल सेनापति दिलेर ख़ाँ ने बीजापुर के शक्तिशाली मंत्री सिद्दी मसूद पर दबाव डालकर संधि करने के लिए विवश किया। संधि की शर्तों के अनुसार बीजापुर के सुल्तान की बहन शहरबानू बेगम का विवाह औरंगज़ेब के पुत्र शहज़ादा मुहम्मद आज़म से कराया गया।

➣ इसके बाद भी बीजापुर की स्वतंत्र नीति और मराठों से उसके संबंधों के कारण औरंगज़ेब संतुष्ट नहीं हुआ। अंततः उसने 1686 ई. में स्वयं बीजापुर पर चढ़ाई की। लंबे घेराव के बाद 22 सितम्बर, 1686 ई. को बीजापुर मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया। अंतिम आदिलशाही शासक सिकन्दर आदिलशाह ने आत्मसमर्पण कर दिया।

➣ औरंगज़ेब ने सिकन्दर आदिलशाह का सम्मानपूर्वक स्वागत किया, उसे ‘ख़ान’ की उपाधि तथा लगभग 1 लाख रुपये वार्षिक पेंशन प्रदान की। बाद में उसकी अल्पायु में ही मृत्यु हो गई।

➣ औरंगज़ेब के स्वयं अभियान का नेतृत्व करने से पूर्व बहादुर ख़ाँ, दिलेर ख़ाँ, शहज़ादा शाहआलम (मुहम्मद मुअज्ज़म) तथा शहज़ादा मुहम्मद आज़म को भी बीजापुर के विरुद्ध अभियानों पर भेजा गया था, किन्तु उन्हें निर्णायक सफलता नहीं मिली।

गोलकुंडा (1687 ई.)

अब्दुल्ला कुतुबशाह ने 1626 ई. से 1672 ई. तक गोलकुंडा पर शासन किया। उसने मुगलों के साथ समझौते की नीति अपनाकर अपने राज्य की स्वतंत्रता बनाए रखी।

➣ उसके बाद 1672 ई. में अबुल हसन कुतुबशाह (ताना शाह) शासक बना। उसके शासनकाल में प्रशासन की वास्तविक बागडोर दो ब्राह्मण भाइयों मदन्ना और अक्कन्ना (अखन्ना) के हाथों में थी, जिनके मराठों एवं शिवाजी से मैत्रीपूर्ण संबंध थे।

1685 ई. में औरंगज़ेब ने अपने पुत्र शहज़ादा मुअज्ज़म (शाहआलम) तथा खान-ए-जहाँ के नेतृत्व में गोलकुंडा के विरुद्ध अभियान भेजा, किन्तु उसे निर्णायक सफलता नहीं मिली।

➣ इसके बाद 1687 ई. में औरंगज़ेब ने स्वयं गोलकुंडा का घेराव किया। लगभग आठ महीने तक चले घेराव के बाद भी मुगल सेना किले पर अधिकार नहीं कर सकी।

➣ अंततः औरंगज़ेब ने अब्दुल्ला पानी (सरदार ख़ाँ) नामक एक अफ़ग़ान अधिकारी को धन का लालच देकर अपनी ओर मिला लिया। उसके विश्वासघात के कारण किले का द्वार खोल दिया गया और 22 सितम्बर, 1687 ई. को मुगलों ने गोलकुंडा पर अधिकार कर लिया। इसके साथ ही कुतुबशाही वंश का अंत हो गया।

➣ गोलकुंडा के मुगल साम्राज्य में विलय के बाद मुगल साम्राज्य में सूबों की संख्या 20 हो गई।

कहा जाता है कि औरंगज़ेब ने गोलकुंडा के किले को उसी प्रकार सोने की कुंजियों (रिश्वत) से जीता, जिस प्रकार अकबर ने असीरगढ़ के किले पर अधिकार किया था। असीरगढ़ अकबर का अंतिम अभियान था।

➣ औरंगज़ेब द्वारा दक्षिण में जीता गया अंतिम प्रमुख दुर्ग वाजिन्गेरा (वागिनगेरा) था, जिस पर 1705 ई. में अधिकार किया गया।

मराठों से संघर्ष

➣ औरंगज़ेब के विरुद्ध मराठों की चार पीढ़ियों ने संघर्ष किया—शिवाजी (1674–1680 ई. तक छत्रपति), शंभाजी (1681–1689 ई.), राजाराम (1689–1700 ई.) तथा ताराबाई (1700–1707 ई.)

➣ मुगलों और शिवाजी के बीच संघर्ष का प्रारम्भ 1656–57 ई. में हुआ, जब शिवाजी ने अहमदनगर तथा जुन्नार क्षेत्र पर आक्रमण किए। उस समय औरंगज़ेब दक्कन का सूबेदार था।

➣ औरंगज़ेब ने 1660 ई. में दक्कन के मुगल सूबेदार शाइस्ता ख़ाँ को शिवाजी के विरुद्ध भेजा। शाइस्ता ख़ाँ ने पूना, चाकन तथा आसपास के अनेक क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया और पूना में डेरा डाल दिया।

5 अप्रैल, 1663 ई. की रात्रि में शिवाजी ने पूना स्थित शाइस्ता ख़ाँ के निवास पर अचानक आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण में शाइस्ता ख़ाँ के हाथ की तीन उँगलियाँ कट गईं तथा उसका पुत्र फ़तेह ख़ाँ सहित अनेक सैनिक मारे गए। इसके बाद शाइस्ता ख़ाँ को दक्कन से हटा दिया गया।

➣ औरंगज़ेब ने 1665 ई. में मिर्जा राजा जयसिंह को शिवाजी के विरुद्ध भेजा। जयसिंह ने शिवाजी को पराजित कर पुरन्दर की संधि (11 जून, 1665 ई.) करने के लिए विवश किया।

निकोलाओ मनूची उस समय मिर्जा राजा जयसिंह के साथ दक्कन अभियान में उपस्थित था और उसने पुरन्दर की संधि का उल्लेख अपनी पुस्तक स्टोरिया दो मोगोर (Storia do Mogor) में किया है।

➣ यह संधि अधिक समय तक प्रभावी नहीं रही। बाद में शिवाजी ने पुनः अपने खोए हुए दुर्गों पर अधिकार करना प्रारम्भ किया तथा मराठा स्वराज्य के विस्तार का अभियान जारी रखा।

1680 ई. में शिवाजी की मृत्यु के बाद उनके पुत्र शंभाजी ने संघर्ष जारी रखा। 1689 ई. में मुगलों ने शंभाजी को बंदी बनाकर मृत्युदंड दे दिया तथा उनके पुत्र शाहू को बंदी बना लिया।

➣ इसके बाद राजाराम तथा उनकी मृत्यु के पश्चात् ताराबाई के नेतृत्व में मराठों ने मुगलों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा। इस दीर्घकालीन युद्ध में औरंगज़ेब को कोई निर्णायक सफलता प्राप्त नहीं हुई।

➣ इतिहासकार एस. आर. शर्मा के अनुसार, “दक्षिण भारत औरंगज़ेब के लिए कब्रिस्तान सिद्ध हुआ।” मराठों के साथ लंबे संघर्ष ने मुगल साम्राज्य की सैन्य, आर्थिक तथा प्रशासनिक शक्ति को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया।

औरंगज़ेब की मृत्यु (1707 ई.)

➣ दक्षिण में मराठों के विरुद्ध दीर्घकालीन अभियान चलाते हुए 3 मार्च, 1707 ई. को अहमदनगर के निकट औरंगज़ेब की मृत्यु हो गई। उस समय उसकी आयु लगभग 88 वर्ष थी।

➣ औरंगज़ेब की इच्छा के अनुसार उसके शव को दौलताबाद से लगभग 4 किमी दूर खुल्दाबाद में सूफ़ी संत शेख ज़ैनुद्दीन शिराज़ी की दरगाह के परिसर में दफनाया गया। उसकी कब्र अत्यंत सादगीपूर्ण है और उसी की इच्छा के अनुसार बनाई गई थी।

➣ औरंगज़ेब ने मुगल सिंहासन तलवार के बल पर प्राप्त किया था। उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्रों मुहम्मद आज़म, मुहम्मद मुअज्ज़म तथा कामबख्श के बीच भी उत्तराधिकार का युद्ध छिड़ गया।

➣ उत्तराधिकार युद्ध में अपने भाइयों को पराजित करने के बाद मुहम्मद मुअज्ज़म बहादुर शाह प्रथम (शाहआलम प्रथम) के नाम से मुगल सम्राट बना।

औरंगजेब के समय प्रमुख विद्रोह

बुन्देलों का विद्रोह (1661 ई.)

➣ बुन्देलों की राजधानी ओरछा थी। औरंगज़ेब के शासनकाल के प्रारम्भिक विद्रोहों में बुन्देलों का विद्रोह प्रमुख था।

चंपतराय बुन्देला ने 1661 ई. में मुगलों के विरुद्ध विद्रोह किया। यद्यपि चंपतराय ने उत्तराधिकार युद्ध में औरंगज़ेब का साथ दिया था,

➣ फिर भी बाद में दोनों के संबंध बिगड़ गए। मुगल सेना के दबाव में 1661 ई. में चंपतराय की मृत्यु हो गई और विद्रोह अस्थायी रूप से शांत हो गया।

➣ इसके बाद चंपतराय के पुत्र महाराजा छत्रसाल बुन्देला ने 1671 ई. में पुनः मुगलों के विरुद्ध विद्रोह का नेतृत्व किया। उन्होंने धीरे-धीरे बुन्देलखंड के अधिकांश भाग पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।

➣ औरंगज़ेब अपने शासनकाल में छत्रसाल को निर्णायक रूप से पराजित नहीं कर सका। 1707 ई. में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद छत्रसाल ने पूर्ण स्वतंत्रता स्थापित कर बुन्देलखंड में एक शक्तिशाली राज्य की नींव रखी।

बुन्देला शासक वीरसिंह देव ने जहाँगीर (तत्कालीन शहज़ादा सलीम) के कहने पर 1602 ई. में अबुल फ़ज़ल की हत्या कर दी थी।

जाटों का विद्रोह (1669 ई.)

➣ औरंगज़ेब के शासनकाल में जाट विद्रोह का नेतृत्व क्रमशः गोकुला, राजाराम तथा चूड़ामन ने किया।

➣ जाट विद्रोह का प्रारम्भ 1669 ई. में मथुरा के निकट तिलपत के जाट जमींदार गोकुला के नेतृत्व में हुआ।

➣ गोकुला ने मथुरा के मुगल फ़ौजदार अब्दुन नबी की हत्या कर दी। इसके बाद मुगल सेना ने गोकुला को पराजित कर बंदी बना लिया और उसे मृत्युदंड दे दिया।

1685 ई. में राजाराम के नेतृत्व में जाटों ने पुनः संगठित होकर विद्रोह किया। इस विद्रोह ने मुगल प्रशासन को गंभीर चुनौती दी।

➣ राजाराम ने मुगल सेनापति महावत ख़ाँ को पराजित किया तथा सिकंदरा स्थित अकबर के मकबरे में लूटपाट कराई। निकोलाओ मनूची के अनुसार, जाटों ने अकबर की कब्र को खोदकर उसकी अस्थियों को जला दिया था।

1688 ई. में राजाराम, औरंगज़ेब के पौत्र बीदर बख़्श तथा आमेर के राजा बिशन सिंह के संयुक्त अभियान में मारा गया।

➣ इसके बाद जाट विद्रोह का नेतृत्व चूड़ामन ने संभाला। उसका प्रमुख केन्द्र थून (Thun) था। औरंगज़ेब के दक्षिणी अभियानों में व्यस्त रहने के कारण वह इस विद्रोह को पूरी तरह दबा नहीं सका।

➣ आगे चलकर बदन सिंह ने जाट शक्ति को संगठित किया तथा उसके उत्तराधिकारी सूरजमल के नेतृत्व में भरतपुर एक शक्तिशाली स्वतंत्र जाट राज्य के रूप में विकसित हुआ।

अफगान विद्रोह (1667–1675 ई.) (उत्तर-पश्चिम सीमा प्रान्त)

1667 ई. में भागू नामक यूसुफजई सरदार ने मुहम्मदशाह नामक व्यक्ति को अपना राजा घोषित कर स्वयं उसका वज़ीर बन गया। इसी के साथ उत्तर-पश्चिम सीमा प्रान्त में अफगान विद्रोह का प्रारम्भ हुआ।

➣ मुगल सूबेदार कामिल ख़ाँ तथा बाद में अमीर ख़ाँ ने इस विद्रोह का सफलतापूर्वक दमन कर दिया।

1672 ई. में अफ़रीदी सरदार अकमल ख़ाँ ने पुनः विद्रोह कर स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित किया, अपने नाम का ख़ुतबा पढ़वाया तथा सिक्के जारी किए।

➣ अफ़रीदियों ने अली मस्जिद के निकट मुगल सेना को पराजित किया तथा खैबर दर्रे पर अधिकार कर लिया। इस विद्रोह में खुशहाल ख़ाँ खटक ने भी अफगानों का समर्थन किया।

1674-1675 ई. में औरंगज़ेब स्वयं उत्तर-पश्चिम सीमा पर पहुँचा और सैन्य शक्ति तथा कूटनीति-दोनों के माध्यम से अफगान कबीलों को नियंत्रित किया।

➣ इसके बाद अमीर ख़ाँ को काबुल का सूबेदार नियुक्त किया गया, जिसने अधिकांश अफगान सरदारों को अपने पक्ष में कर विद्रोह को शांत कर दिया।

सतनामी विद्रोह / कृषक विद्रोह (1672 ई.)

सतनामी एक धार्मिक-कृषक समुदाय था, जिसका प्रमुख निवास क्षेत्र नारनौल (वर्तमान हरियाणा) था। इस समुदाय में मुख्यतः किसान, दस्तकार, मजदूर तथा समाज के निम्न वर्गों के लोग सम्मिलित थे।

1672 ई. में एक मुगल सैनिक और एक सतनामी किसान के बीच हुए विवाद ने विद्रोह का रूप ले लिया। शीघ्र ही यह संघर्ष पूरे नारनौल क्षेत्र में फैल गया।

➣ सतनामियों ने प्रारम्भ में मुगल सैनिकों को पराजित कर क्षेत्र पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया, जिससे औरंगज़ेब को विशेष सेना भेजनी पड़ी।

➣ औरंगज़ेब के आदेश पर मुगल सेना ने 1672 ई. में नारनौल के निकट सतनामियों का कठोर दमन किया और विद्रोह को समाप्त कर दिया।

शाहज़ादा अकबर का विद्रोह (1681 ई.)

मारवाड़ के राठौड़ों, विशेषकर दुर्गादास राठौड़, तथा मेवाड़ के समर्थन से औरंगज़ेब के पुत्र शाहज़ादा अकबर ने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह कर 11 जनवरी, 1681 ई. को स्वयं को भारत का सम्राट घोषित कर दिया।

➣ औरंगज़ेब की कूटनीति के कारण यह विद्रोह शीघ्र ही विफल हो गया। पराजित होकर शाहज़ादा अकबर दुर्गादास राठौड़ के साथ दक्षिण पहुँचा और पाली नामक स्थान पर शंभाजी से मिला। बाद में वह फ़ारस (ईरान) चला गया, जहाँ 1706 ई. में उसकी मृत्यु हुई।

➣ इस विद्रोह के दौरान औरंगज़ेब को संदेह हुआ कि उसकी पुत्री ज़ेबुन्निसा शाहज़ादा अकबर के साथ गुप्त पत्र-व्यवहार कर रही है। इसलिए उसने ज़ेबुन्निसा को सलीमगढ़ किले (दिल्ली) में नज़रबंद कर दिया, जहाँ जीवन के शेष वर्ष उसने कैद में बिताए।

मारवाड़ का उत्तराधिकार विवाद

➣ मारवाड़ और मुगलों के बीच चला यह संघर्ष लगभग 30 वर्षों तक जारी रहा। इतिहासकार इसे सामान्यतः तीन चरणों—1681–1687 ई., 1687–1701 ई. तथा 1701–1707 ई. में विभाजित करते हैं। अंतिम चरण में राजपूतों ने मारवाड़ पर पुनः अपना प्रभाव स्थापित कर लिया।

➣ मारवाड़ के शासक महाराजा जसवंत सिंह की 28 नवम्बर, 1678 ई. को जमरूद (अफगान सीमा) में मृत्यु हो गई। उस समय उनका कोई जीवित उत्तराधिकारी नहीं था, क्योंकि उनकी रानियाँ गर्भवती थीं।

➣ जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद औरंगज़ेब ने मारवाड़ को मुगल साम्राज्य में मिलाने का प्रयास किया तथा उसे अस्थायी रूप से मुगल प्रशासन के अधीन कर दिया। यही आगे चलकर राजपूत विद्रोह का प्रमुख कारण बना।

➣ बाद में अजीत सिंह का जन्म हुआ। दुर्गादास राठौड़ ने अजीत सिंह को सुरक्षित निकालकर मारवाड़ का वैध उत्तराधिकारी घोषित किया। दूसरी ओर औरंगज़ेब ने अमरसिंह राठौड़ के पौत्र इन्द्रसिंह को मारवाड़ का शासक नियुक्त कर दिया।

➣ दुर्गादास राठौड़ ने अजीत सिंह तथा उनकी माता को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाकर मुगलों के विरुद्ध संघर्ष प्रारम्भ किया। 1679 ई. में औरंगज़ेब ने विद्रोह के दमन के लिए मुगल सेना भेजी, किन्तु संघर्ष लंबे समय तक चलता रहा।

➣ इस दीर्घकालीन संघर्ष का प्रमुख नायक दुर्गादास राठौड़ माना जाता है। कर्नल जेम्स टॉड ने उन्हें “राठौड़ों का यूलिसीज़” कहा है।

➣ अंततः 1709 ई. में बहादुरशाह प्रथम ने अजीत सिंह को मारवाड़ का वैध शासक स्वीकार कर लिया।

मारवाड़ अभियान के दौरान ही 2 अप्रैल, 1679 ई. को औरंगज़ेब ने हिंदुओं पर पुनः जज़िया कर लगा दिया।

मेवाड़ से संघर्ष (1679–1681 ई.)

➣ मारवाड़ के उत्तराधिकार विवाद में महाराणा राजसिंह ने अजीत सिंह तथा दुर्गादास राठौड़ का समर्थन किया। इसके परिणामस्वरूप मेवाड़ और मुगलों के बीच संघर्ष प्रारम्भ हो गया। राजसिंह ने औरंगज़ेब के विरुद्ध ‘विजयकटकात’ की उपाधि धारण की।

➣ महाराणा राजसिंह ने 1615 ई. की मुगल–मेवाड़ संधि (जहाँगीर एवं राणा अमरसिंह) की शर्तों की अवहेलना करते हुए चित्तौड़ दुर्ग की मरम्मत एवं सुदृढ़ीकरण का कार्य प्रारम्भ कराया, जिससे औरंगज़ेब क्रोधित हो गया।

➣ इसी दौरान औरंगज़ेब के पुत्र शाहज़ादा अकबर ने भी 1681 ई. में राजपूतों के सहयोग से अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह कर स्वयं को सम्राट घोषित करने का प्रयास किया, किन्तु यह विद्रोह असफल रहा।

22 अक्टूबर, 1680 ई. को महाराणा राजसिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र महाराणा जयसिंह मेवाड़ के शासक बने।

24 जून, 1681 ई. को महाराणा जयसिंह और औरंगज़ेब के बीच उदयपुर की संधि हुई। इस संधि में बीकानेर के राजा श्यामसिंह ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई।

➣ संधि के अनुसार मेवाड़ ने माण्डल, मादलपुर तथा बेदनौर के परगने मुगलों को सौंप दिए। इसके बदले औरंगज़ेब ने मेवाड़ से अपनी सेना हटा ली तथा संघर्ष समाप्त हो गया। इस अभियान का नेतृत्व औरंगज़ेब ने स्वयं किया था।

अंग्रेजों से संघर्ष (1686–1690 ई.)

1686 ई. में अंग्रेजों और मुगल साम्राज्य के बीच संघर्ष प्रारम्भ हुआ, जिसे चाइल्ड का युद्ध कहा जाता है। इसका प्रमुख कारण अंग्रेजों द्वारा व्यापारिक विशेषाधिकार प्राप्त करने के लिए मुगलों पर दबाव डालना था।

➣ औरंगज़ेब ने अंग्रेजों के विरुद्ध कठोर नीति अपनाई। मुगल सेना ने हुगली सहित अनेक स्थानों पर अंग्रेजों को पराजित किया और उनकी व्यापारिक कोठियों पर अधिकार कर लिया।

➣ अंततः अंग्रेजों ने क्षमा माँगी, हर्जाना देने पर सहमति व्यक्त की तथा मुगल सम्राट की अधीनता स्वीकार की। इसके बाद औरंगज़ेब ने उन्हें पुनः व्यापार करने की अनुमति प्रदान कर दी।

चटगाँव पर मुगल अधिकार 1666 ई. में शाइस्ता ख़ाँ ने अराकान (मग) से प्राप्त किया था। इसके बाद चटगाँव का नाम इस्लामाबाद रखा गया तथा वहाँ एक मुगल फ़ौजदार नियुक्त किया गया।

सिक्ख विद्रोह (1675–1707 ई.)

➣ औरंगज़ेब के शासनकाल में सिखों का संघर्ष मुख्यतः उसकी धार्मिक नीति तथा मुगल सत्ता के विरोध के कारण विकसित हुआ। यह उसके शासनकाल के प्रमुख धार्मिक-राजनीतिक संघर्षों में से एक था।

1675 ई. में औरंगज़ेब ने नौवें सिख गुरु गुरु तेगबहादुर को दिल्ली में मृत्युदण्ड दिलवाया, क्योंकि उन्होंने धार्मिक उत्पीड़न तथा कश्मीरी पंडितों पर हो रहे अत्याचारों का विरोध किया था।

➣ गुरु तेगबहादुर के संबंध में प्रसिद्ध उक्ति है— “सिर दिया, पर सार (धर्म) न दिया।”

➣ गुरु तेगबहादुर के बाद गुरु गोविन्द सिंह दसवें सिख गुरु बने। उन्होंने आनन्दपुर को अपना प्रमुख केन्द्र बनाया और मुगल सत्ता के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा।

1699 ई. में बैसाखी के अवसर पर गुरु गोविन्द सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की। इस पंथ में दीक्षित व्यक्ति को खालसा कहा गया।

1704 ई. (कुछ स्रोत 1705 ई. मानते हैं) में मुगल सेना तथा पहाड़ी राजाओं की संयुक्त सेना ने आनन्दपुर का घेराव किया। मुगल पक्ष में सरहिन्द का फ़ौजदार वज़ीर ख़ाँ सहित अनेक मुगल अधिकारी सम्मिलित थे।

➣ आनन्दपुर छोड़ने के बाद चमकौर के युद्ध में गुरु गोविन्द सिंह ने वीरतापूर्वक संघर्ष किया। इस युद्ध में उनके दो बड़े पुत्र अजीत सिंह और जुझार सिंह वीरगति को प्राप्त हुए, जबकि गुरु गोविन्द सिंह सुरक्षित निकलने में सफल रहे।

1707 ई. में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य की शक्ति क्रमशः क्षीण होने लगी। आगे चलकर बंदा सिंह बहादुर के नेतृत्व में सिखों ने मुगल सत्ता को गंभीर चुनौती दी तथा पंजाब में अपनी शक्ति का विस्तार किया।

औरंगज़ेब की धार्मिक नीति

धार्मिक विचारधारा एवं व्यक्तिगत जीवन

➣ औरंगज़ेब एक कट्टर सुन्नी मुसलमान तथा रूढ़िवादी शासक था। उसने कुरान एवं शरीयत के सिद्धान्तों को अपने शासन का आधार बनाया।

➣ औरंगज़ेब ने अपने शासनकाल में ‘गाज़ी’ की उपाधि धारण की। वह स्वयं को इस्लाम का संरक्षक मानता था तथा अपने शासन को इस्लामी सिद्धान्तों के अनुरूप संचालित करने का प्रयास करता था।

➣ औरंगज़ेब इस्लामी धार्मिक जीवन का कठोरता से पालन करता था। वह अत्यन्त सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करता था, इसलिए उसे ‘जिन्दा पीर’ तथा ‘शाही दरवेश’ भी कहा जाता था।

➣ औरंगज़ेब को सम्पूर्ण कुरान कण्ठस्थ था, इसलिए उसे ‘हाफ़िज़’ भी कहा जाता है।

➣ कुछ इतिहासकारों के अनुसार औरंगज़ेब का उद्देश्य भारत को दारुल-हर्ब (गैर-इस्लामी क्षेत्र) से दारुल-इस्लाम (इस्लामी राज्य) में परिवर्तित करना था।

चिश्ती संत कलीमुल्ला ने सल्तनत एवं फ़क़ीरी को एक साथ अपनाने के कारण औरंगज़ेब की आलोचना करते हुए उसे पाखण्डी कहा था।

इस्लामीकरण एवं प्रशासनिक परिवर्तन

➣ औरंगज़ेब ने अपने शासनकाल में दरबार की अनेक परम्पराओं में परिवर्तन किए। उसने नौरोज़ का उत्सव, झरोखा दर्शन तथा तुलादान जैसी प्रथाओं को समाप्त कर दिया।

➣ उसने सिक्कों पर कलमा अंकित कराने की परम्परा भी समाप्त कर दी, क्योंकि उसके अनुसार सिक्कों के अपवित्र हाथों में जाने से धार्मिक भावना आहत हो सकती थी।

1663 ई. में उसने जबरन सती प्रथा पर रोक लगाने का आदेश दिया।

➣ अपने शासनकाल के 11वें वर्ष (1669 ई.) में झरोखा दर्शन तथा 12वें वर्ष में तुलादान की प्रथा को औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया।

➣ उसने गुरुवार की रात्रि को पीरों की मजारों एवं कब्रों पर दीपक जलाने जैसी प्रथाओं पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया, क्योंकि वह इन्हें इस्लामी सिद्धान्तों के विरुद्ध मानता था।

➣ दरबार में बसंत, होली, दीवाली तथा अन्य राजकीय उत्सव मनाने की परम्परा भी समाप्त कर दी गई।

➣ औरंगज़ेब ने भांग की खेती पर नियंत्रण लगाने तथा दरबार में गायन-वादन को बन्द करने का आदेश दिया। यद्यपि वह स्वयं वीणा वादन का अच्छा ज्ञान रखता था।

➣ उसने वेश्याओं को विवाह करने अथवा राज्य छोड़ने का आदेश दिया, जिसे उसने नैतिक सुधार की नीति का भाग माना।

1670 ई. से उसने अपना जन्मोत्सव मनाना भी बन्द कर दिया।

हिन्दुओं के प्रति नीति

हिन्दुओं के प्रति प्रशासनिक नीति

➣ औरंगज़ेब ने अपने शासनकाल में इस्लामी सिद्धान्तों के अनुरूप अनेक प्रशासनिक निर्णय लिए, जिनका सर्वाधिक प्रभाव हिन्दू प्रजा पर पड़ा।

1665 ई. में एक राज्यादेश द्वारा मुस्लिम व्यापारियों पर 2.5 प्रतिशत तथा हिन्दू व्यापारियों पर 5 प्रतिशत सीमा शुल्क निर्धारित किया गया।

1667 ई. में मुस्लिम व्यापारियों को सीमा शुल्क से पूर्णतः मुक्त कर दिया गया, किन्तु बाद में पुनः सीमा शुल्क लगा दिया गया।

1668 ई. में राजपूतों एवं मराठों को छोड़कर अधिकांश हिन्दुओं के लिए पालकी में चलने, उत्तम नस्ल के घोड़े पर सवारी करने तथा हथियार रखने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।

➣ औरंगज़ेब ने अकबर द्वारा प्रारम्भ की गई हिन्दू राजाओं को अपने हाथों से तिलक लगाने की परम्परा समाप्त कर दी।

➣ उसके शासनकाल में गोवध पर पूर्ववर्ती प्रतिबन्धों को शिथिल कर दिया गया।

जज़िया एवं तीर्थयात्रा कर

1663 ई. में औरंगज़ेब ने हिन्दुओं से पुनः तीर्थयात्रा कर वसूलना प्रारम्भ किया।

12 अप्रैल, 1679 ई. को उसने हिन्दुओं पर पुनः जज़िया कर लगा दिया। उल्लेखनीय है कि अकबर ने अपने शासनकाल में इस कर को समाप्त कर दिया था।

➣ जज़िया कर के लिए हिन्दुओं को तीन वर्गों में विभाजित किया गया—

(i) जिनकी वार्षिक आय 200 दिरहम से कम थी, उन्हें 12 दिरहम प्रतिवर्ष देना पड़ता था।
(ii) जिनकी वार्षिक आय 200 से 10,000 दिरहम के बीच थी, उन्हें 24 दिरहम प्रतिवर्ष देना पड़ता था।
(iii) जिनकी वार्षिक आय 10,000 दिरहम से अधिक थी, उन्हें 48 दिरहम प्रतिवर्ष देना पड़ता था।

स्त्रियाँ, गुलाम, भिखारी, आय रहित व्यक्ति तथा 14 वर्ष से कम आयु के बच्चे जज़िया कर से मुक्त थे।

➣ अधीनस्थ हिन्दू शासकों तथा अनेक ब्राह्मणों को भी जज़िया कर देने के लिए बाध्य किया गया।

➣ अनेक इतिहासकारों का मत है कि जज़िया कर का उद्देश्य केवल धार्मिक नहीं था, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक एवं आर्थिक कारण भी थे। इसके माध्यम से औरंगज़ेब मुस्लिम वर्ग का समर्थन बनाए रखना तथा राजस्व में वृद्धि करना चाहता था।

धार्मिक सहिष्णुता के उदाहरण

➣ यद्यपि औरंगज़ेब की धार्मिक नीति सामान्यतः रूढ़िवादी मानी जाती है, फिर भी उसने कुछ हिन्दू एवं सिख धार्मिक संस्थानों को संरक्षण एवं अनुदान भी प्रदान किया।

➣ औरंगज़ेब ने मथुरा के दाऊजी महाराज मंदिर को पाँच गाँव दानस्वरूप प्रदान किए थे।

➣ उसने बनारस के कुछ मंदिरों को भी भूमि अनुदान प्रदान किया।

➣ देहरादून स्थित गुरु रामराय के गुरुद्वारे को भी औरंगज़ेब द्वारा अनुदान दिया गया था। उल्लेखनीय है कि सातवें सिख गुरु हरराय ने रामराय को अपने पंथ से निष्कासित कर दिया था।

➣ कहा जाता है कि औरंगज़ेब समय-समय पर हिन्दू बैरागी शिवमंगल दास महाराज के तत्त्वमीमांसा विषयक प्रवचन भी सुनने जाता था।

हिन्दू अधिकारियों की स्थिति

➣ औरंगज़ेब के शासनकाल में हिन्दू मनसबदारों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। उसके शासनकाल में उनका प्रतिशत लगभग 33% तक पहुँच गया, जो मुगल काल में सर्वाधिक माना जाता है। इनमें मराठा तथा दक्षिण भारत के सरदारों की संख्या अधिक थी।

➣ तुलना के लिए, अकबर के शासनकाल में हिन्दू मनसबदारों का प्रतिशत लगभग 22.5% तथा शाहजहाँ के शासनकाल में लगभग 22.4% था।

➣ औरंगज़ेब के शासनकाल के उत्तरार्द्ध में मुगल सेना के प्रमुख सेनापतियों में लगभग 31.6% हिन्दू थे, जिनमें मराठा सरदारों की संख्या सर्वाधिक थी।

मंदिर नीति

मंदिरों के प्रति औरंगज़ेब की नीति

➣ औरंगज़ेब की मंदिर नीति पूर्णतः एकरूप नहीं थी। उसने जहाँ अनेक प्रमुख हिन्दू मंदिरों को ध्वस्त करने का आदेश दिया, वहीं कुछ मंदिरों तथा धार्मिक संस्थानों को भूमि अनुदान एवं संरक्षण भी प्रदान किया।

➣ औरंगज़ेब का मानना था कि कुछ मंदिर राजनीतिक विद्रोह, षड्यंत्र तथा मुगल-विरोधी गतिविधियों के केन्द्र बन चुके थे। इसलिए उसने ऐसे मंदिरों के विरुद्ध कठोर नीति अपनाई।

1669 ई. में औरंगज़ेब ने एक शाही फ़रमान जारी कर नवीन मंदिरों के निर्माण तथा कुछ प्रमुख मंदिरों एवं संस्कृत पाठशालाओं को ध्वस्त करने का आदेश दिया।

प्रमुख मंदिरों का ध्वंस

1669 ई. में काशी (बनारस) के प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त कर उसके स्थान पर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण कराया गया।

1670 ई. में मथुरा के केशवदेव मंदिर (जिसका निर्माण वीरसिंह बुन्देला ने कराया था) को ध्वस्त कर वहाँ शाही ईदगाह का निर्माण कराया गया। उसी समय मथुरा का नाम बदलकर इस्लामाबाद भी रखा गया।

सोमनाथ मंदिर के विरुद्ध भी औरंगज़ेब ने अभियान चलाया। उसके शासनकाल में इस मंदिर को क्षति पहुँचाई गई तथा 1706 ई. में इसे पुनः ध्वस्त करने का आदेश दिया गया।

स्वतंत्र भारत में वर्तमान सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की पहल सरदार वल्लभभाई पटेल ने की। मंदिर का पुनर्निर्माण पूर्ण होने के बाद 1951 ई. में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने इसका उद्घाटन किया।

धार्मिक सहिष्णुता के उदाहरण

➣ यद्यपि औरंगज़ेब ने अनेक प्रमुख मंदिरों को ध्वस्त कराया, फिर भी उसने सभी मंदिरों के प्रति समान नीति नहीं अपनाई। कई मंदिरों एवं धार्मिक संस्थानों को उसके शासनकाल में संरक्षण एवं भूमि अनुदान भी प्राप्त हुए।

➣ औरंगज़ेब ने मथुरा के दाऊजी महाराज मंदिर को पाँच गाँव दानस्वरूप प्रदान किए।

बनारस के कुछ मंदिरों को भी भूमि अनुदान दिया गया, जिनके फ़रमान आज भी उपलब्ध हैं।

➣ देहरादून स्थित गुरु रामराय के गुरुद्वारे को भी औरंगज़ेब ने अनुदान प्रदान किया था।

मंदिर नीति का मूल्यांकन

➣ अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि औरंगज़ेब की मंदिर नीति केवल धार्मिक कट्टरता पर आधारित नहीं थी। कई अवसरों पर मंदिरों के विरुद्ध की गई कार्रवाई के पीछे राजनीतिक विद्रोह, राजस्व तथा प्रशासनिक कारण भी थे।

➣ दूसरी ओर, यह भी सत्य है कि उसके शासनकाल में काशी विश्वनाथ, केशवदेव तथा सोमनाथ जैसे अनेक प्रसिद्ध मंदिरों को ध्वस्त किया गया, जिससे उसकी धार्मिक नीति की व्यापक आलोचना हुई।

➣ इस प्रकार इतिहासकारों का सामान्य मत है कि औरंगज़ेब की मंदिर नीति पूर्णतः उदार अथवा पूर्णतः असहिष्णु नहीं थी, बल्कि परिस्थितियों, राजनीतिक हितों एवं धार्मिक विश्वासों से प्रभावित थी।

सामाजिक एवं सांस्कृतिक नीति

सामाजिक एवं नैतिक सुधार

➣ औरंगज़ेब ने अपने शासनकाल में इस्लामी नैतिक मूल्यों के अनुरूप अनेक सामाजिक सुधार लागू करने का प्रयास किया।

1663 ई. में उसने जबरन सती प्रथा पर रोक लगाने का आदेश दिया।

➣ उसने वेश्याओं को विवाह करने अथवा राज्य छोड़ने का आदेश दिया तथा समाज में नैतिक अनुशासन स्थापित करने का प्रयास किया।

➣ उसने भांग जैसी मादक वस्तुओं के उत्पादन एवं सेवन पर नियंत्रण लगाने के निर्देश दिए।

➣ दरबार में नौरोज़, बसंत, होली, दीपावली आदि राजकीय उत्सवों को मनाने की परम्परा समाप्त कर दी गई।

संगीत एवं कला के प्रति दृष्टिकोण

➣ औरंगज़ेब ने शाही दरबार से गायन-वादन को समाप्त कर दिया तथा दरबारी संगीतकारों को संरक्षण देना बन्द कर दिया।

➣ यद्यपि उसने दरबार से संगीत को हटाया, किन्तु पूरे साम्राज्य में संगीत पर पूर्ण प्रतिबन्ध नहीं लगाया गया। प्रान्तीय दरबारों एवं निजी स्तर पर संगीत का विकास निरन्तर जारी रहा।

➣ कहा जाता है कि औरंगज़ेब स्वयं वीणा वादन का अच्छा ज्ञान रखता था तथा संगीत की तकनीकी समझ भी रखता था।

धार्मिक नीति का प्रभाव

➣ औरंगज़ेब की धार्मिक एवं प्रशासनिक नीतियों के कारण जाट, सतनामी, सिख, राजपूत तथा मराठा जैसे अनेक समुदायों में असन्तोष उत्पन्न हुआ, जिसने समय-समय पर विद्रोह का रूप धारण किया।

➣ विशेषतः जज़िया कर, मंदिरों के ध्वंस तथा धार्मिक मामलों में कठोर हस्तक्षेप ने उसकी लोकप्रियता को प्रभावित किया।

➣ दूसरी ओर, उसके शासनकाल में हिन्दू मनसबदारों एवं मराठा सरदारों की संख्या में वृद्धि भी हुई, जिससे स्पष्ट होता है कि उसकी प्रशासनिक नीति केवल धार्मिक आधार पर संचालित नहीं थी।

इतिहासकारों का मूल्यांकन

➣ इतिहासकारों में औरंगज़ेब की धार्मिक नीति को लेकर मतभेद है। कुछ इतिहासकार उसे कट्टर सुन्नी एवं रूढ़िवादी शासक मानते हैं, जबकि अन्य इतिहासकार उसकी नीतियों में राजनीतिक एवं प्रशासनिक कारणों को भी महत्त्वपूर्ण मानते हैं।

सर जदुनाथ सरकार के अनुसार औरंगज़ेब की धार्मिक कट्टरता ने मुगल साम्राज्य की एकता को कमजोर किया तथा अनेक विद्रोहों को जन्म दिया।

सतीश चन्द्र तथा अथर अली जैसे इतिहासकारों का मत है कि औरंगज़ेब की अनेक नीतियों के पीछे केवल धार्मिक कारण नहीं थे, बल्कि राजनीतिक, आर्थिक एवं साम्राज्यवादी हित भी कार्य कर रहे थे।

रिचर्ड एम. ईटन के अनुसार मंदिरों के विरुद्ध की गई अनेक कार्रवाइयाँ मुख्यतः राजनीतिक विद्रोहों तथा राज्य-विरोधी गतिविधियों से जुड़ी थीं, न कि सम्पूर्ण हिन्दू समाज के विरुद्ध किसी समान नीति का परिणाम।

➣ औरंगज़ेब की धार्मिक नीति को केवल कट्टरता अथवा केवल व्यावहारिक राजनीति के आधार पर नहीं समझा जा सकता। उसकी नीतियाँ धार्मिक विश्वास, इस्लामी शासन की अवधारणा, राजनीतिक परिस्थितियों तथा साम्राज्यवादी आवश्यकताओं- सभी से प्रभावित थीं। इसलिए आधुनिक इतिहासकार उसकी धार्मिक नीति का मूल्यांकन संतुलित दृष्टिकोण से करते हैं।

औरंगज़ेब की धार्मिक नीति

➣ औरंगजेब एक कट्टर सुन्नी मुसलमान तथा रूढ़िवादी शासक था। उसने कुरान (शरीयत) को अपने शासन का आधार बनाया।

➣ औरंगजेब कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसने सिक्कों पर कलमा खुदवाना, नौरोज का त्योहार मनाना, तुलादानझरोखा दर्शन बन्द कर दिया।

➣ औरंगजेब के काल में अनेक हिंदू मंदिर तुड़वाए गए, क्योंकि उसे विश्वास था कि मंदिर षड्यंत्र और राजद्रोही कार्रवाइयों के केंद्र बन चुके हैं।

➣ औरंगजेब ने गाजी की उपाधि धारण की, जो उसकी असहिष्णुजेहादी मनोवृत्ति का प्रतीक था।

➣ औरंगजेब ने 1665 ई. में एक राज्यादेश द्वारा मुस्लिम व्यापारियों पर ढाईहिन्दू व्यापारियों 5 प्रतिशत सीमा शुल्क निर्धारित किया।

1667 ई. में मुस्लिम व्यापारियों को सीमा शुल्क से पूर्णतः मुक्त कर दिया, लेकिन बाद में पुनः लगा दिया।

1668 ई. से ही राजपूतों एवं मराठों को छोड़कर सभी हिन्दुओं को पालकी या अच्छे घोड़ों की सवारी पर प्रतिबंध लगा दिया तथा हथियार रखने पर भी प्रतिबंध लगा दिया।

➣ औरंगजेब ने मथुरा के दाउजी महाराज मन्दिर को 5 गाँव एवं बनारस के मन्दिरों को भू अनुदान दिया था।

➣ देहरादून के गुरू रामराय गुरुद्वारे को औरंगजेब ने अनुदान दिया था। सिखों के 7वें गुरु हरराय ने पुत्र रामराय को संघ से निष्कासित कर दिया था।

➣ औरंगजेब को इस्लामिक कट्टरता के कारण जिन्दा पीर तथा सादगी पूर्ण जीवन के लिए शाही दरवेश कहा जाता था।

1663 ई. में सती प्रथा पर प्रतिबन्ध लगाया। अपने शासन काल के 11 वर्ष में झरोखा दर्शन (1669 ई.), 12वें वर्ष में तुलादान प्रथा प्रतिबन्ध लगा दिया।

1668 ई. में हिन्दू त्यौहारों एवं उत्सवों को प्रतिबन्धित करते हुए। औरंगज़ेब ने हिन्दुओं से तीर्थयात्रा कर (1663 ई.) पुनः वसूलना शुरू कर दिया।

12 अप्रैल, 1679 ई. को हिन्दुओं पर दोबारा जज़िया कर लगा दिया। सर्वप्रथम जज़िया कर मारवाड़ पर लागू किया गया। जिसे औरंगजेब ने दारूल हर्ब घोषित किया था।

➣ बड़ी संख्या में हिन्दू मंदिरों को तोड़वाने का आदेश देकर नवीन एवं पुराने मंदिरों के निर्माण पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया गया। 1669 ई. में बनारस का विश्वनाथ मंदिर, मथुरा का केशवदेव मंदिर (वीरसिंह बुन्देला द्वारा निर्मित) तथा गुजरात का सोमनाथ मंदिर तोड़ा गया।

सन 1706 ई. औरंगजेब ने प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर गिराया था। वर्तमान में जो मंदिर खड़ा है उसे भारत के गृह मन्त्री सरदार बल्लभ भाई पटेल (लौह पुरूष) ने बनवाया है।

➣ औरंगजेब ने गुरुवार की रात को पीरों की मजार तथा कब्रों पर दीपक जलाने की प्रथा पर रोक लगा दी।

➣ उसने अकबर द्वारा प्रारंभ हिंदू राजाओं के माथे पर अपने हाथ से तिलक लगाना बंद कर दिया। गोवध करने की खुली छूट दे दी गई।

➣ वेश्याओं को शादी करने अथवा देश छोड़ने का आदेश दिया। दरबार में बसंत, होली, दीवाली आदि त्योहार मनाने बंद कर दिए।

➣ उसने भांग की खेती करना, गाना-बजाना आदि पर रोक लगा दी। यद्दपि वह स्वंय कुशल वीणा वादक था।

➣ औरंगजेब हिन्दू बैरागी शिवमंगल दास महाराज का तत्व मीमांसा पर प्रवचन सुनने जाता था।

➣ 1669 में मुहर्रम बन्द करवा दिया तथा 1670 ई. में अपना जन्मदिवस मनाना भी बन्द करवा दिया। 1679 ई. में हिन्दू शासकों को टीका देने की प्रथा बन्द कर दी।

➣ औरंगजेब के शासन काल में हिन्दू मनसबदारों का प्रतिशत 33 प्रतिशत हो गया था। यह मुगलकाल में सर्वाधिक था। इनमें भी सबसे ज्यादा मराठा व दक्षिण के अमीर थे।

➣ अकबर के काल में यह अनुपात 22.5 प्रतिशत तथा शाहजहां के काल में 22.4 प्रतिशत था।

➣ औरंगजेब के शासनकाल के दौरान मुगल सेना में सर्वाधिक हिंदू सेनापति थे। उसके शासनकाल के उत्तरार्द्ध में कुल सेनापतियों में 31.6 प्रतिशत हिंदू थे, जिसमें मराठों की संख्या आधे से अधिक थी।

➣ औरंगज़ेब दारुल हर्ब (क़ाफिरों का देश भारत) को दारुल इस्लाम (इस्लाम का देश) में परिवर्तित करने को अपना महत्त्वपूर्ण लक्ष्य मानता था।

➣ औरंगजेब को सम्पूर्ण कुरान कण्ठस्थ था, इसलिए उसे हाफिज कहा गया है।

चिश्ती संत कलीमुल्ला ने सल्तनत एवं फकीरी एक साथ मिलाने के कारण औरंगजेब को पाखण्डी कहा।

➣ अकबर ने अपने साम्राज्य से जजिया कर की समाप्ति की घोषणा की थी, किंतु औरंगजेब ने उसे 1679 ई. में पुनर्जीवित कर दिया।

➣ इस कर के लिए हिंदुओं को तीन वर्गों में बांटा गया-
(i) जिनकी आय 200 दिरहम प्रतिवर्ष से कम थी, उनको 12 दिरहम प्रतिवर्ष देना था।
(ii) जिनकी आय 200 से 10,000 दिरहम प्रतिवर्ष थी, उनको 24 दिरहम प्रतिवर्ष देना था।
(iii) जिनकी आय 10,000 दिरहम प्रतिवर्ष के ऊपर थी, उनको 48 दिरहम प्रतिवर्ष देना पड़ता था।

➣ स्त्रियां, गुलाम, 14 वर्ष की आयु से कम के बच्चे, भिखारी और आय रहित व्यक्ति इस कर से मुक्त थे। अधीनस्थ हिंदू राजाओं एवं ब्राह्मणों को भी इसे देने के लिए बाध्य किया गया।

➣ औरंगजेब के जजिया कर लगाने का उद्देश्य धार्मिक न होकर राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित था क्योंकि वह राजपूतों व मराठों के विरुद्ध मुसलमानों को संगठित करना चाहता था।

स्थापत्य कला

➣ औरंगाबाद में स्थित बीबी का मकबरा का निर्माण 1678–1679 ई. के आसपास औरंगज़ेब के पुत्र शहज़ादा मुहम्मद आज़म शाह ने अपनी माता राबिया-उद्-दौरानी (दिलरास बानो बेगम) की स्मृति में कराया था।

➣ इसकी स्थापत्य शैली ताजमहल से अत्यधिक प्रभावित है। इसी कारण इसे “दक्कन का ताज” अथवा “द्वितीय ताजमहल” भी कहा जाता है।

➣ औरंगज़ेब ने दिल्ली के लाल किले में मोती मस्जिद का निर्माण करवाया।

➣ औरंगज़ेब की प्रमुख पुत्रियाँ ज़ेबुन्निसा, ज़ीनत-उन-निसा, बदर-उन-निसा, ज़ुबदत-उन-निसा तथा मेहर-उन-निसा थीं।

जहाँआरा बेगम, रोशनआरा बेगम तथा गौहरआरा बेगम औरंगज़ेब की बहनें तथा शाहजहाँ की पुत्रियाँ थीं। जहाँआरा बेगम को ‘पादशाह बेगम’ की उपाधि प्राप्त थी।

औरंगज़ेब के शासनकाल की प्रमुख घटनाएँ (1658–1707 ई.)

वर्ष प्रमुख घटना
1658 ई. सामूगढ़ के युद्ध में दारा शिकोह को पराजित कर प्रथम राज्याभिषेक; आलमगीर की उपाधि धारण की।
1659 ई. खाजवा एवं देवराई के युद्धों में क्रमशः शाह शूजा और दारा शिकोह की अंतिम पराजय; द्वितीय राज्याभिषेक।
1660 ई. मीर जुमला को बंगाल का सूबेदार तथा शाइस्ता ख़ाँ को शिवाजी के विरुद्ध दक्कन भेजा।
1661 ई. कूचबिहार पर मुगल अधिकार; बुन्देलों का विद्रोह (चंपतराय)।
1662 ई. मीर जुमला ने असम की राजधानी गढ़गाँव पर अधिकार किया।
1663 ई. घिलाजारिघाट की संधि; शिवाजी द्वारा शाइस्ता ख़ाँ पर आक्रमण; तीर्थयात्रा कर पुनः लगाया।
1665 ई. पुरन्दर की संधि; जयसिंह का बीजापुर अभियान; हिन्दू एवं मुस्लिम व्यापारियों के लिए पृथक सीमा शुल्क।
1666 ई. शिवाजी का आगरा आगमन एवं पलायन; शाइस्ता ख़ाँ द्वारा चटगाँव विजय।
1667 ई. अफ़गान (यूसुफज़ई) विद्रोह; मुस्लिम व्यापारियों को सीमा शुल्क से छूट।
1668 ई. दरबार में अनेक हिन्दू उत्सवों पर रोक तथा सामाजिक-धार्मिक प्रतिबंध।
1669 ई. जाट विद्रोह (गोकुला); मंदिरों एवं संस्कृत पाठशालाओं के विरुद्ध आदेश; काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त।
1670 ई. मथुरा का केशवदेव मंदिर ध्वस्त; मथुरा का नाम इस्लामाबाद रखा गया।
1671 ई. सरायघाट के युद्ध में अहोमों ने मुगलों को पराजित किया।
1672 ई. सतनामी विद्रोह; अफ़रीदी विद्रोह (अकमल ख़ाँ)।
1675 ई. गुरु तेगबहादुर को मृत्युदण्ड; अफ़गान विद्रोह का दमन।
1679 ई. जज़िया कर पुनः लगाया; मारवाड़ का विद्रोह; जज़िया की पुनर्स्थापना।
1680 ई. शिवाजी की मृत्यु; मराठा संघर्ष का नया चरण।
1681 ई. शाहज़ादा अकबर का विद्रोह; उदयपुर की संधि; औरंगज़ेब का दक्षिण अभियान प्रारम्भ।
1685–1690 ई. अंग्रेजों के साथ चाइल्ड का युद्ध।
1686 ई. बीजापुर का मुगल साम्राज्य में विलय।
1687 ई. गोलकुण्डा पर विजय; कुतुबशाही वंश का अंत।
1688 ई. जाट नेता राजाराम की मृत्यु।
1689 ई. शंभाजी को बंदी बनाकर मृत्युदण्ड; शाहू बंदी बनाए गए।
1699 ई. गुरु गोविन्द सिंह द्वारा खालसा पंथ की स्थापना।
1705 ई. वाजिन्गेरा (वागिनगेरा) दुर्ग पर मुगल अधिकार।
1706 ई. सोमनाथ मंदिर के विरुद्ध पुनः कार्रवाई का आदेश।
1707 ई. 3 मार्च 1707 को औरंगज़ेब की मृत्यु; दौलताबाद के निकट खुल्दाबाद में दफनाया गया।

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