अकबर : मुग़ल वंश का महानतम शासक
➣ अकबर, मुग़ल वंश का महानतम शासक था, जिसने धर्मनिरपेक्ष नीति एवं राजपूतों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर साम्राज्य का विस्तार किया। उसका शासनकाल इतिहास में मुग़ल साम्राज्य के स्थिरीकरण के रूप में जाना जाता है।
➣ यह पहला मुग़ल शासक था, जिसने दक्षिण अभियान छेड़ा। दक्षिण अभियान के पश्चात ही अकबर ने सम्राट की उपाधि धारण की थी।
प्रारंभिक जानकारी
➣ अकबर का जन्म 15 अक्टूबर, 1542 ई. को हमीदा बानू बेगम के गर्भ से अमरकोट (वर्तमान सिंध, पाकिस्तान) में राणा वीरसाल के महल में हुआ था। यह समय हुमायूँ के निर्वासन का था।
➣ जब हुमायूँ ईरान की ओर गया, तब उसके पुत्र अकबर को उसके चाचा कामरान ने अपने अधिकार में ले लिया था। उसने अकबर का भली-भाँति पालन-पोषण किया।
➣ कन्धार पर हुमायूँ का पुनः अधिकार हो जाने पर अकबर फिर अपने माता-पिता से मिला।
➣ अकबर को बचपन में सर्वप्रथम 1551 ई. में गजनी का सूबेदार नियुक्त किया गया था। उसके बाद उसे लाहौर (पंजाब) का सूबेदार बनाया गया।
➣ हुमायूँ की मृत्यु के समय अकबर पंजाब में था। अकबर का राज्याभिषेक कलानौर (गुरदासपुर, पंजाब) नामक स्थान पर ईंटों के सिंहासन पर 14 फ़रवरी, 1556 ई. को बैरम खाँ की देखरेख में मिर्जा अबुल कासिम ने किया।
➣ पिता की मृत्यु के पश्चात 1556 ई. में कलानौर (गुरदासपुर) में बैरम खाँ के संरक्षण में अकबर की ताजपोशी हुई। उस समय वह तेरह वर्ष चार महीने का था।
➣ दिल्ली में उसके नाम का खुतबा पढ़ा गया और अकबर ने शाहंशाह की उपाधि धारण की। उसने बैरम खाँ को खान-ए-खाना की उपाधि प्रदान कर, उसे अपना प्रधानमंत्री(वकील-ए-सल्तनत) नियुक्त किया।
➣ अकबर के राज्याभिषेक में शाह अबुल माली (कामरान का पुत्र) शामिल नहीं हुआ। उसने अकबर के राज्याभिषेक का विरोध किया।
➣ शासक बनने के बाद 1556 से 1560 ई. तक अकबर बैरम खाँ के संरक्षण में रहा। बैरम खाँ फारस के शिया सम्प्रदाय से सम्बन्धित था।
➣ अकबर के लिए सर्वप्रथम संकट मुहम्मद आदिलशाह सूर ने उत्पन्न किया था। हेमू (हेमचन्द्र) आदिलशाह का ही प्रधानमंत्री था।
दिल्ली की स्थिति
➣ हेमू ने हुमायूँ की मृत्यु के बाद सूबेदार इस्कन्दर खाँ को पराजित कर आगरा पर तथा सूबेदार तार्दी बेग खाँ को पराजित कर 7 अक्टूबर, 1556 ई. को दिल्ली पर अधिकार कर लिया था।
➣ हेमू ने स्वयं को दिल्ली का स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया तथा बदायूँनी के अनुसार विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। उसके बारे में कहा जाता है कि उसने 24 लड़ाइयाँ लड़ीं, जिनमें से वह 22 में विजयी रहा।
हेमू, विक्रमादित्य की उपाधि धारण करने वाला भारत का 14वाँ एवं अंतिम शासक था। सबसे प्रसिद्ध विक्रमादित्य गुप्त शासक चन्द्रगुप्त द्वितीय, समुद्रगुप्त का पुत्र, था।
➣ बैरम खाँ ने परिस्थिति का कुशलतापूर्वक सामना किया। उसने हेमू को अपनी स्थिति मज़बूत करने का अवसर दिए बिना दिल्ली पर चढ़ाई कर दी।
➣ हेमू के नेतृत्व में अफ़ग़ान फ़ौज और मुग़लों के बीच पानीपत के मैदान में एक बार फिर लड़ाई हुई, जिसे पानीपत की दूसरी लड़ाई कहा जाता है।
➣ हेमू की ओर से उत्पन्न ख़तरे को सबसे गम्भीर समझा गया। उस समय चुनार से लेकर बंगाल की सीमा तक का प्रदेश शेरशाह के एक भतीजे आदिलशाह के शासन में था।
पानीपत की दूसरी लड़ाई (1556)
➣ 5 नवम्बर, 1556 ई. को हेमू के नेतृत्व में अफ़ग़ान सेना एवं बैरम ख़ाँ के नेतृत्व में मुग़ल सेना के मध्य युद्ध लड़ा गया।
➣ ऐसा माना जाता है कि युद्ध का प्रारम्भिक चरण हेमू के पक्ष में जा रहा था, लेकिन तभी एक तीर हेमू की आँख में लगा और वह बेहोश हो गया।
➣ नेतृत्वविहीन सेना में भगदड़ मच गई। अफ़ग़ान सेना पराजित हो गई। हेमू को पकड़कर मार डाला गया। इस प्रकार अकबर को साम्राज्य प्राप्त हो गया।
➣ डॉ. आर.पी. त्रिपाठी ने पानीपत के द्वितीय युद्ध के परिणाम के बारे में लिखा है कि “हेमू की पराजय एक दुर्घटना थी, जबकि अकबर की विजय एक दैवी संयोग था।”
❑ समय-समय पर हुई पानीपत की तीनों लड़ाईयां इस प्रकार है-
|
| प्रदेश | पराजित शासक | नेतृत्व |
|---|---|---|
| मालवा (1561 ई.) |
बाज बहादुर | अधम ख़ाँ, पीर मुहम्मद तथा अब्दुल्ला ख़ाँ उज़बेग |
| गोंडवाना (1564 ई.) |
वीर नारायण (संरक्षिका – रानी दुर्गावती) | आसफ़ ख़ाँ |
| आमेर (1562 ई.) |
कछवाहा शासक भारमल (बिहारीमल) | स्वेच्छा से अधीन |
| मेड़ता (1562 ई.) |
जयमल | शर्फुद्दीन हुसैन |
| मेवाड़ (1567 ई.) |
उदयसिंह | अकबर |
| रणथम्भौर (1569 ई.) |
सूरजन राय | स्वेच्छा से अधीन |
| कालिंजर (1569 ई.) |
राजा रामचन्द्र | मजनूँ ख़ाँ |
| मारवाड़ (1570 ई.) |
चन्द्रसेन (मालदेव का पुत्र) | स्वेच्छा से अधीन |
| बीकानेर (1570 ई.) |
राय कल्याणमल | स्वेच्छा से अधीन |
| जैसलमेर (1570 ई.) |
हरराय | स्वेच्छा से अधीन |
| गुजरात (1572 ई.) |
मुज़फ़्फ़र ख़ाँ तृतीय | मिर्ज़ा अज़ीज़ कोका |
| गुजरात (1573 ई.) |
मुहम्मद हुसैन ख़ाँ | अकबर |
| बंगाल व बिहार (1574–1576 ई.) |
दाऊद ख़ाँ | मुनिम ख़ाँ |
| काबुल (1581 ई.) |
मिर्ज़ा हकीम | मान सिंह एवं अकबर |
| कश्मीर (1586 ई.) |
यूसुफ़ ख़ाँ | भगवान दास तथा क़ासिम ख़ाँ |
| सिंध (1591 ई.) |
जानी बेग | अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना |
| उड़ीसा (1592 ई.) |
निसार ख़ाँ | मान सिंह |
| बलूचिस्तान (1595 ई.) |
पन्नी अफ़गान | मीर मासूम |
| कंधार (1595 ई.) |
मुज़फ़्फ़र हुसैन मिर्ज़ा | मुग़ल सूबेदार शाह बेग को स्वेच्छा से किला सौंपा |
| अहमदनगर (1600 ई.) |
बहादुर निज़ामशाह (संरक्षिका – चाँद बीबी) | शहज़ादा मुराद एवं अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना |
| खानदेश (1591 ई.) |
अली ख़ाँ | स्वेच्छा से अधीन |
| असीरगढ़ (1601 ई.) |
मीर बहादुर | अकबर |
मालवा (1561–1562 ई.) : बाजबहादुर
➣ साम्राज्य विस्तार के उद्देश्य से अकबर का पहला अभियान 1561 ई. में आधम खाँ के नेतृत्व में मालवा पर हुआ। उस समय मालवा की राजधानी सारंगपुर थी।
➣ मालवा का शासक बाजबहादुर युद्ध क्षेत्र से भागकर मेवाड़ के राणा की शरण में चला गया, जबकि उसकी रानी रूपमती ने आत्महत्या कर ली। दोनों की मजार माण्डू (धार, मध्य प्रदेश) में स्थित है।
➣ 1562 ई. में आधम खाँ के स्थान पर पीर मुहम्मद खाँ को मालवा का नया सूबेदार नियुक्त किया गया। इसके बाद बाजबहादुर ने पुनः मालवा पर आक्रमण किया। इस संघर्ष के दौरान भागते समय पीर मुहम्मद खाँ की नर्मदा नदी में डूबने से मृत्यु हो गई।
➣ इसके बाद अब्दुल्ला खाँ उज़बेग के नेतृत्व में मुग़ल सेना ने बाजबहादुर को पुनः पराजित कर मालवा पर अधिकार स्थापित कर लिया।
➣ कालांतर में बाजबहादुर ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली और उसे मुग़ल मनसबदार बना दिया गया। अकबर ने उसे 2000 का मनसब प्रदान किया।
➣ कहा जाता है कि अकबर ने नक्कारा (नगाड़ा) बजाने की कला बाजबहादुर से सीखी थी।
आमेर(1562 ई.) : भारमल (कछवाहा वंश)
➣ आमेर के राजा भारमल (बिहारीमल) कछवाहा वंश के शासक थे। वे राजपूत शासकों में सबसे पहले मुगल अधीनता स्वीकार करने वाले शासक थे।
➣ 1562 ई. में जब अकबर अजमेर (ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह) की यात्रा पर जा रहा था, तब भारमल ने सांभर के स्थान पर अकबर से भेंट कर अधीनता स्वीकार की।
➣ भारमल ने अपनी पुत्री हरखा बाई (जिन्हें बाद में मरियम-उज़-ज़मानी की उपाधि मिली) का विवाह अकबर से किया। यह विवाह 1562 ई. में सांभर में ही संपन्न हुआ था।
➣ यह अकबर का प्रथम राजपूत राजकुमारी से विवाह था। इसी विवाह से आगे चलकर सलीम (जहाँगीर) का जन्म हुआ।
➣ इस विवाह अकबर को राजपूतों का सैन्य सहयोग और प्रशासनिक सहयोग प्राप्त हुआ, वहीं आमेर के कछवाहा वंश को मुगल दरबार में सम्मानजनक स्थान मिला। इसे मुगल-राजपूत संधि नीति की शुरुआत माना जाता है।
➣ कालांतर में अकबर ने भारमल के पुत्र भगवान दास को मुगल सेवा में उच्च मनसबदार का पद प्रदान किया। भगवान दास को पंचहजारी मनसब तक प्राप्त हुआ और वे मुगल सेना में महत्वपूर्ण सैन्य अभियानों में सम्मिलित रहे।
➣ भगवान दास के पुत्र (दत्तक) मानसिंह आगे चलकर अकबर के नवरत्नों में से एक तथा सबसे प्रतिष्ठित मुगल सेनापतियों में गिने गए। इस प्रकार आमेर-मुगल संबंध आगे की पीढ़ियों तक प्रगाढ़ बने रहे।
मेड़ता (1562 ई.) : जयमल राठौर
➣ 1562 ई. में ही अकबर ने मेड़ता दुर्ग पर अधिकार कर लिया, जो मारवाड़ (जोधपुर) की सीमा पर स्थित एक रणनीतिक महत्व का दुर्ग था। उस समय यह दुर्ग जयमल राठौर (राव वीरमदेव के पुत्र) के अधिकार में था।
➣ मेड़ता पर मुगल आक्रमण के समय जयमल राठौर ने प्रारंभ में प्रतिरोध करने का प्रयास किया, परंतु मुगल सेना की शक्ति के समक्ष टिक न सकने के कारण उन्हें दुर्ग छोड़ना पड़ा।
➣ 1562 ई. में मेड़ता पर मुगलों का अधिकार होने के बाद जयमल राठौर मेवाड़ के राणा उदय सिंह द्वितीय की शरण में चला गया। राणा उदय सिंह ने उन्हें आश्रय देकर मेवाड़ की सेना में महत्वपूर्ण स्थान दिया।
➣ बाद में 1567–68 ई. में जब अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग पर आक्रमण किया, तब उस समय राणा उदय सिंह दुर्ग छोड़कर पहाड़ों की ओर चले गए थे, और दुर्ग की रक्षा का दायित्व मुख्यतः जयमल राठौर तथा पत्ता (फत्ता) सिसोदिया पर था।
गढ़कटंगा या गोंडवाना (1564 ई.) : रानी दुर्गावती
➣ मध्य भारत में गढ़कटंगा अथवा गोंडवाना एक अन्य स्वतंत्र एवं समृद्ध राज्य था। यह क्षेत्र वर्तमान मध्य प्रदेश के जबलपुर के आसपास फैला हुआ था तथा अपनी सम्पन्नता एवं वन-संपदा के लिए प्रसिद्ध था।
➣ इस राज्य पर दलपत शाह की विधवा रानी दुर्गावती के संरक्षण में उनके अल्पायु पुत्र वीर नारायण का शासन था।
➣ रानी दुर्गावती चंदेल वंश की राजकुमारी थीं तथा अत्यंत वीर, कुशल प्रशासक और निपुण योद्धा के रूप में जानी जाती थीं। पति की मृत्यु के पश्चात उन्होंने स्वयं राज्य की बागडोर संभाली और राज्य का सुशासन किया।
➣ गढ़कटंगा पर विजय अभियान आसफ खाँ (कड़ा-मानिकपुर का सूबेदार) के नेतृत्व में शुरू किया गया, क्योंकि उस समय अकबर स्वयं उज़बेकों के विद्रोह का सामना कर रहा था और उत्तर-पश्चिमी मोर्चे पर व्यस्त था, अतः उसने यह अभियान अपने सेनापति को सौंपा।
➣ आसफ खाँ की सेना का सामना करने हेतु रानी दुर्गावती ने स्वयं युद्ध-क्षेत्र में उतरकर अपनी सेना का नेतृत्व किया। उन्होंने नरही दर्रे के निकट मुगल सेना से डटकर मुकाबला किया तथा अपनी वीरता का परिचय दिया।
➣ 1564 ई. में युद्ध के दौरान रानी दुर्गावती घायल हो गईं और अंततः युद्ध में पराजित हुईं। पराजय निश्चित जानकर तथा शत्रु के हाथों बंदी बनने के अपमान से बचने के लिए उन्होंने स्वयं अपनी कटार से आत्महत्या कर ली। उनका पुत्र वीर नारायण भी इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ।
➣ इस विजय के परिणामस्वरूप मुगलों को गढ़कटंगा से अपार धन-संपत्ति प्राप्त हुई। इसके बाद अकबर ने इस राज्य का एक भाग उसी राजवंश के चन्द्रशाह (दलपत शाह के भाई) को सौंप दिया, जबकि शेष भाग को मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया गया।
मेवाड़ (1567-68 ई.) : उदय सिंह
➣ 1567 ई. में अकबर ने स्वयं मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ पर अभियान किया। मेवाड़ राजपूताना का सबसे शक्तिशाली एवं स्वाभिमानी राज्य था, जिसने अब तक मुगल अधीनता स्वीकार नहीं की थी। कई महीनों तक यह घेराबंदी जारी रही।
➣ युद्ध के दौरान राणा उदय सिंह द्वितीय ने रणनीतिक दृष्टि से किले को छोड़कर पहाड़ी क्षेत्र की ओर प्रस्थान किया तथा दुर्ग की रक्षा का दायित्व अपने वीर सेनानायकों जयमल राठौर व फत्ता (फतेहसिंह सिसोदिया) को सौंप दिया।
➣ जयमल व फत्ता ने सीमित संसाधनों के बावजूद मुगल सेना का दीर्घकाल तक डटकर सामना किया। अंततः 1568 ई. में चित्तौड़ दुर्ग पर मुगलों का अधिकार हो गया।
➣ हालाँकि चित्तौड़ के पतन के पश्चात भी राणा उदय सिंह ने हार नहीं मानी। उन्होंने अरावली की पहाड़ियों में अपनी नई राजधानी उदयपुर (पिछोला झील के समीप) स्थापित की तथा वहाँ से मुगलों के विरुद्ध प्रतिरोध जारी रखा।
➣ मेवाड़ की भौगोलिक दुर्गमता एवं वहाँ के राजपूतों के अदम्य साहस के कारण मुगलों को यहाँ अत्यंत कठिन संघर्ष करना पड़ा। स्थिति इतनी जटिल हो गई कि स्वयं अकबर को सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए जेहाद (धर्मयुद्ध) का नारा देना पड़ा।
➣ अकबर उदयसिंह के दोनों सेनानायकों जयमल व फत्ता की असाधारण वीरता से इतना प्रभावित हुआ कि उसने सम्मानस्वरूप जयमल व फत्ता की हाथी पर सवार प्रतिमाएँ आगरा के किले के मुख्य द्वार पर स्थापित करवाईं। कालांतर में मुगल बादशाह औरंगजेब ने धार्मिक कट्टरता के चलते इन प्रतिमाओं को हटवा दिया था।
➣ चित्तौड़ का किला जीतने के पश्चात अकबर ने दुर्ग में भीषण कत्लेआम कराया, जिसमें हजारों निर्दोष नागरिक मारे गए। यह घटना अकबर के संपूर्ण जीवन पर एक कलंक के समान मानी जाती है।
➣ उल्लेखनीय है कि यह पहला व आखिरी अवसर था जब अकबर ने इस प्रकार निर्दोष नागरिकों की सामूहिक हत्या करवाई – आगे चलकर अकबर की नीति में सहिष्णुता एवं उदारता स्पष्ट रूप से देखी गई।
➣ चित्तौड़ विजय के उपलक्ष्य में अकबर ने फतहनामा (विजय-पत्र) जारी किया, जिसमें उसने इस विजय का विवरण तथा अपनी सफलता की घोषणा की। यह घटना मुगल-राजपूत संघर्ष के इतिहास की एक महत्वपूर्ण एवं निर्णायक घटना मानी जाती है।
रणथंभौर विजय (1569 ई.) : सुरजनराय
➣ रणथंभौर दुर्ग राजपूताना के सबसे सुदृढ़ एवं अभेद्य दुर्गों में से एक माना जाता था। उस समय इस दुर्ग पर सुरजनराय (हाड़ा राजपूत) का शासन था।
➣ अकबर ने स्वयं रणथंभौर अभियान का नेतृत्व किया तथा दुर्ग की घेराबंदी की। दुर्ग की सुदृढ़ता को देखते हुए अकबर ने सैन्य बल के साथ-साथ समझौते का मार्ग भी अपनाया और इस हेतु मानसिंह को सूरजन राय के पास समझौता-वार्ता के लिए भेजा।
➣ दीर्घ वार्ता के पश्चात सूरजन राय ने अकबर की सर्वोच्चता स्वीकार कर ली, किंतु इसके लिए उन्होंने कुछ शर्तें रखीं, जिन्हें अकबर ने स्वीकार किया –
1. मुगलों से वैवाहिक संबंध नहीं रखेंगे (अर्थात आमेर की भांति अपनी कन्या का विवाह मुगल दरबार में नहीं करेंगे)।
2. दरबार में बादशाह के समक्ष सिजदा (झुककर अभिवादन) नहीं करेंगे, अपितु राजपूत परंपरानुसार ही अभिवादन करेंगे।
3. दरबार में सशस्त्र प्रवेश की अनुमति होगी, अर्थात उन्हें हथियार उतारकर दरबार में जाने की बाध्यता नहीं होगी।
➣ इस प्रकार रणथंभौर की संधि अन्य राजपूत राज्यों की संधियों से भिन्न तथा विशिष्ट थी, क्योंकि इसमें सूरजन राय ने अपनी शर्तों पर अधीनता स्वीकार की, जो उनके आत्मसम्मान एवं कूटनीतिक कुशलता को दर्शाती है।
➣ संधि के पश्चात अकबर ने सूरजन राय को सम्मानित कर उच्च मनसब प्रदान किया तथा उन्हें मुगल साम्राज्य के अन्य क्षेत्रों में भी प्रशासनिक दायित्व सौंपे गए।
मारवाड़, बीकानेर एवं जैसलमेर (1570 ई.)
➣ 1570 ई. राजपूत-मुगल संबंधों के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण वर्ष रहा, जब एक साथ कई राजपूत राज्यों के शासकों ने अकबर की अधीनता स्वीकार की।
➣ मारवाड़ (जोधपुर), बीकानेर एवं जैसलमेर के शासक क्रमशः चंद्रसेन (राठौर), कल्याणमल (राठौर) एवं हरराय (भाटी) ने इस वर्ष अकबर की अधीनता स्वीकार कर मुगल साम्राज्य से मधुर संबंध स्थापित किए।
➣ इनमें से कल्याणमल के पुत्र रायसिंह को आगे चलकर मुगल दरबार में उच्च मनसब प्राप्त हुआ तथा वे अकबर के विश्वस्त सेनानायकों में गिने गए।
➣ कालांतर में मारवाड़ के शासक चंद्रसेन ने मुगल अधीनता के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। वे राजपूत शासकों में अपवादस्वरूप थे, जिन्होंने मुगल अधीनता स्वीकार करने के पश्चात भी निरंतर स्वतंत्रता हेतु संघर्ष जारी रखा, जिस कारण उन्हें “मारवाड़ का प्रताप” भी कहा जाता है।
➣ चंद्रसेन के इस विद्रोह के कारण अकबर ने थोड़े समय के लिये मारवाड़ को सीधे मुगल साम्राज्य में मिला लिया तथा वहाँ मुगल प्रशासन स्थापित किया। चंद्रसेन ने आजीवन संघर्ष करते हुए पहाड़ों एवं जंगलों में शरण लेकर मुगलों का प्रतिरोध जारी रखा।
1570 ई. के अंत तक मेवाड़ के अतिरिक्त अकबर के प्रभुत्व को न स्वीकार करने वाली तीन प्रमुख रियासतें थीं — बाँसवाड़ा, डूंगरपुर एवं प्रतापगढ़। ये तीनों ही राज्य भौगोलिक दृष्टि से दुर्गम पहाड़ी एवं वन क्षेत्रों में स्थित होने के कारण अब तक मुगल प्रभाव से दूर बने हुए थे।गुजरात की विजय (1572-73 ई.)
➣ अकबर ने मध्य भारत तथा राजपूताना में अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने के पश्चात 1572 ई. में अपना ध्यान गुजरात की ओर केंद्रित किया, जो आर्थिक एवं सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र था।
➣ गुजरात जहाँ एक ओर कृषि की दृष्टि से अत्यंत उपजाऊ था, वहीं दूसरी ओर वहाँ अनेक व्यस्त बंदरगाह (जैसे सूरत, खंभात, भड़ौच) स्थित थे, जिससे यह व्यापारिक केंद्रों के रूप में तीव्र गति से विकास कर रहा था। यह क्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय समुद्री व्यापार का प्रमुख केंद्र भी था।
➣ अकबर के गुजरात अभियान के समय सुल्तान मुज़फ्फर शाह तृतीय यहाँ का शासक था, परंतु उस समय गुजरात में आंतरिक कलह एवं अव्यवस्था व्याप्त थी, जिससे केंद्रीय सत्ता दुर्बल हो चुकी थी।
➣ इसी आंतरिक अव्यवस्था का लाभ उठाते हुए गुजरात आक्रमण के लिये अकबर को वहाँ के वजीर इतमाद खाँ द्वारा स्वयं आमंत्रित किया गया था, जो स्थानीय सत्ता-संघर्ष से त्रस्त थे।
➣ गुजरात विजय के बाद अकबर ने उसे मुगल साम्राज्य के एक प्रांत के रूप में संगठित किया तथा उसका प्रशासन मिर्जा अजीज कोका (अकबर के धाय-भाई) के अधीन कर स्वयं राजधानी की ओर वापस लौट गया।
➣ अकबर ने गुजरात विजय की स्मृति में सीकरी का नाम बदलकर फतेहपुर सीकरी (विजय का नगर) रखा। आगे चलकर 1602 ई. में इसी स्मृति में राजधानी फतेहपुर सीकरी में विशाल एवं भव्य बुलन्द दरवाजा का निर्माण करवाया गया, जो आज भी मुगल स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
➣ गुजरात अभियान का अकबर के जीवन में विशेष महत्व रहा, क्योंकि इसी अभियान के दौरान अकबर ने पहली बार कैम्बे (खंभात) में समुद्र को देखा। यहीं उसकी पुर्तगाली व्यापारियों से भी पहली प्रत्यक्ष मुलाकात हुई, जिससे मुगल-यूरोपीय संबंधों की नींव पड़ी।
➣ इसी समय अकबर ने पुर्तगाली वायसराय दोम एंटोनियो दे नोरोन्हा के दूत एंटोनियो काब्राल से भेंट कर कार्टाज (समुद्री यात्रा हेतु अनुमति-पत्र/लाइसेंस) प्राप्त किया, जो उस समय भारतीय जलक्षेत्र में पुर्तगालियों के नौसैनिक प्रभुत्व को दर्शाता है।
➣ गुजरात विजय के पश्चात साम्राज्य की भूमि-व्यवस्था एवं लगान प्रणाली को सुव्यवस्थित करने हेतु राजा टोडरमल को इसका उत्तरदायित्व सौंपा गया, जिन्होंने आगे चलकर समस्त मुगल साम्राज्य में एक सुनियोजित भू-राजस्व व्यवस्था लागू की।
➣ किंतु अकबर के अहमदाबाद से वापस लौटने के मात्र छह माह के भीतर ही मिर्ज़ा बंधुओं (इब्राहीम हुसैन मिर्ज़ा आदि) के नेतृत्व में एक शक्तिशाली विद्रोही गुट पुनः संगठित हो गया तथा उन्होंने मुगल शासन के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।
➣ इस विद्रोह की सूचना मिलते ही अकबर ने अद्भुत साहस एवं तीव्रता का परिचय देते हुए फतेहपुर सीकरी से अहमदाबाद तक की लंबी दूरी मात्र 9 दिनों में तय की और अचानक पहुँचकर समस्त विद्रोहियों को बुरी तरह परास्त किया।
➣ अकबर की इस अद्भुत द्रुतगति एवं युद्ध-कौशल से प्रभावित होकर प्रसिद्ध इतिहासकार विंसेंट स्मिथ (स्मिथ महोदय) ने 1573 ई. के इस गुजरात के द्वितीय अभियान को “ऐतिहासिक द्रुतगामी आक्रमण” की संज्ञा दी है, जो सैन्य इतिहास में अद्वितीय माना जाता है।
बिहार एवं बंगाल की विजय
➣ 1564 ई. में बिहार के गवर्नर सुलेमान किरानी ने बंगाल को अपने अधीन कर लिया, परंतु अकबर के शासनकाल के दौरान भी उन्होंने रणनीतिक दूरदर्शिता का परिचय देते हुए स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित नहीं किया तथा सदैव अकबर के नाम से ही खुत्बा पढ़ा जाता था, जिससे प्रत्यक्ष संघर्ष टलता रहा।
➣ सुलेमान किरानी की मृत्यु के पश्चात 1572 ई. में उनके पुत्र दाऊद खाँ किरानी ने मुगल अधीनता को अस्वीकार करते हुए स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया तथा मुगलों के विरुद्ध विद्रोह का झंडा बुलंद किया।
➣ इस विद्रोह को दबाने हेतु अकबर ने अपने सेनापति मुनीम खाँ “खान-ए-खाना” के नेतृत्व में एक विशाल शाही सेना भेजी। मुगल सेना ने तीव्र आक्रमण करते हुए पटना व हाजीपुर जैसे महत्वपूर्ण नगरों पर अधिकार कर लिया।
➣ पराजय के पश्चात दाऊद खाँ अपनी सेना सहित गौड़ प्रदेश (बंगाल) की ओर भाग गया। कुछ समय शांति रहने के पश्चात उसने पुनः संगठित होकर मुगलों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।
➣ इस बार मुनीम खाँ के नेतृत्व में मुगल सेना ने निर्णायक संघर्ष किया, जो इतिहास में तुकारोई का युद्ध (1575 ई.) के नाम से प्रसिद्ध है। यह युद्ध मुगल साम्राज्य के लिए अत्यंत निर्णायक सिद्ध हुआ, जिसके परिणामस्वरूप बंगाल व बिहार दोनों ही क्षेत्रों पर मुगल साम्राज्य का आधिपत्य स्थापित हो गया।
➣ इस पराजय के बावजूद दाऊद खाँ ने हार नहीं मानी तथा पुनः शक्ति संचय कर विद्रोह किया, परंतु 1576 ई. में हुए एक अन्य निर्णायक संघर्ष में दाऊद भी मारा गया तथा गौड़ प्रदेश भी अंततः मुगलों के अधीन हो गया।
➣ दाऊद खाँ किरानी की मृत्यु के साथ ही अफगान सत्ता के अंतिम अवशेष का भी अंत हो गया। इसी कारण इतिहास में दाऊद को उत्तर भारत का अंतिम स्वतंत्र अफगान शासक माना जाता है, जिसके पतन के साथ ही उत्तर भारत में अफगान शक्ति का पूर्णतः समापन हो गया तथा संपूर्ण क्षेत्र मुगल साम्राज्य में सम्मिलित हो गया।
काबुल (1581 ई.) : हकीम मिर्जा
➣ हकीम मिर्जा, अकबर का सौतेला भाई (हुमायूँ का पुत्र) था, जो काबुल पर शासन करता था। आरंभ से ही हकीम मिर्जा की महत्वाकांक्षाएँ मुगल सिंहासन को लेकर रही थीं तथा वह अकबर के विरुद्ध विद्रोही गतिविधियों में संलिप्त रहता था।
➣ 1581 ई. में हकीम मिर्जा ने पंजाब पर आक्रमण कर लाहौर को घेर लिया, जिससे क्रुद्ध होकर अकबर ने स्वयं काबुल पर सैन्य अभियान करने का निर्णय लिया।
➣ अकबर के इस सुनियोजित एवं सशक्त अभियान के समक्ष हकीम मिर्जा टिक न सका और उसे पराजय का सामना करना पड़ा। काबुल विजय के पश्चात अकबर ने हकीम मिर्जा को सत्ता से हटाकर उसकी बहन बख्तुन्निशा बेगम को वहाँ का सूबेदार नियुक्त किया।
➣ हालाँकि यह व्यवस्था अधिक समय तक कायम न रह सकी, क्योंकि अकबर के भारत लौटते ही हकीम मिर्जा पुनः काबुल में प्रभावशाली होकर सत्ता पर काबिज हो गया।
➣ कालांतर में हकीम मिर्जा की मृत्यु के पश्चात अकबर ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए काबुल को स्थायी रूप से मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया तथा वहाँ का सूबेदार राजा मानसिंह को नियुक्त किया, जो अकबर के सर्वाधिक विश्वस्त एवं योग्य सेनानायकों में गिने जाते थे।
➣ इस संदर्भ में एक उल्लेखनीय तथ्य यह भी मिलता है कि प्रसिद्ध पुर्तगाली विद्वान एवं जेसुइट पादरी मॉन्सरेट (एंटोनियो मॉन्सेरात) भी इसी काबुल अभियान के दौरान अकबर के साथ गया था।
➣ मॉन्सरेट ने इस यात्रा एवं अकबर के दरबार से संबंधित अपने संस्मरणों में महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत किए, जो आज भी अकबरकालीन इतिहास के अध्ययन हेतु एक मूल्यवान स्रोत माने जाते हैं।
कश्मीर विजय (1585-86 ई.) : राजा युसूफ खाँ
➣ कश्मीर अपनी प्राकृतिक सुंदरता, सामरिक स्थिति एवं स्वतंत्र अस्तित्व के कारण मुगल साम्राज्य के विस्तार हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता था।
➣ 1585-86 ई. में अकबर ने कश्मीर को विजित करने के लिये राजा भगवानदास तथा कासिम खाँ के नेतृत्व में एक विशाल मुगल सेना भेजी।
➣ कश्मीर के तत्कालीन शासक राजा युसूफ खाँ (चक वंश) ने प्रारंभ में मुगल सेना का प्रतिरोध करने का प्रयास किया, परंतु मुगल सेना की श्रेष्ठ सैन्य शक्ति के समक्ष वह पराजित हुआ तथा अंततः उसने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली।
➣ किंतु यह अधीनता स्थायी सिद्ध नहीं हुई, क्योंकि कुछ समय पश्चात राजा युसूफ खाँ के पुत्र याकूब (याकूब खाँ चक) ने मुगल सत्ता के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और स्वतंत्रता हेतु संघर्ष आरंभ किया।
➣ मुगल सेना ने इस विद्रोह को बलपूर्वक कुचल दिया, जिसके पश्चात कश्मीर को स्थायी रूप से मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया गया तथा वहाँ मुगल प्रशासनिक व्यवस्था लागू की गई।
कश्मीर क्षेत्र के युसूफजाई कबीले (पठान कबीला) के विद्रोह को दबाने के क्रम में ही अकबर के प्रसिद्ध नवरत्न एवं घनिष्ठ मित्र बीरबल मारे गए थे। यह घटना अकबर के लिए व्यक्तिगत रूप से अत्यंत दुखद एवं क्षतिकारक सिद्ध हुई, क्योंकि बीरबल अकबर के सर्वाधिक विश्वस्त सलाहकारों में से एक थे।
➣ उल्लेखनीय है कि बीरबल (मूल नाम महेशदास) कालपी (उत्तर प्रदेश) के निवासी थे तथा अपनी बुद्धिमत्ता, हाजिरजवाबी एवं विद्वता के लिए संपूर्ण मुगल दरबार में विख्यात थे।
थट्टा (सिंध) की विजय (1591 ई.) : जानीबेग
➣ थट्टा सहित संपूर्ण सिंध प्रदेश उत्तर-पश्चिम क्षेत्र का एक स्वतंत्र एवं सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्य था।
➣ सबसे पहले अकबर ने अब्दुर्रहीम खानखाना (बैरम खाँ के पुत्र) को मुल्तान का गवर्नर नियुक्त किया तथा उन्हें सिंध विजय करने एवं उपद्रवी बलूचियों का दमन करने का आदेश प्रदान किया।
➣ अब्दुर्रहीम खानखाना ने सिंध पर आक्रमण किया। सिंध के तत्कालीन शासक जानीबेग (अरगुन वंश) ने मुगल सेना के विरुद्ध दृढ़ता से संघर्ष किया, परंतु अंततः वह पराजित हुआ और उसे विवश होकर मुगल अधीनता स्वीकार करनी पड़ी।
➣ इस विजय के फलस्वरूप थट्टा तथा सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सेहवान के किले सहित संपूर्ण सिंध प्रदेश पर मुगलों का अधिकार स्थापित हो गया।
➣ इसके पश्चात 1595 ई. में मुगल साम्राज्य का विस्तार और आगे बढ़ा तथा काठियावाड़, बलूचिस्तान एवं मकरान जैसे क्षेत्रों पर भी मुगलों का अधिकार हो गया।
➣ इस प्रकार पश्चिमोत्तर क्षेत्र में उत्तर में हिंदुकुश पर्वतमाला से लेकर दक्षिण में अरब सागर तक मुगल साम्राज्य का व्यापक विस्तार हुआ।
➣ परिणामस्वरूप मुगल साम्राज्य को प्राकृतिक रूप से सुरक्षित एवं सुदृढ़ “वैज्ञानिक सीमा” (Scientific Frontier) की प्राप्ति हुई, जिसने आगे चलकर बाहरी आक्रमणों से साम्राज्य की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
दक्षिण भारत का अभियान
➣ दक्षिण अभियान करने वाला पहला मुस्लिम शासक अल्लाउद्दीन खिलजी (1296-1316 ई.) था। जबकि दक्षिणी राज्यों पर शासन करने वाला गयासुद्दीन मुहम्मद तुगलक (1320-25 ई.) था।
➣ दखिलजी ने केवल उनसे वार्षिक कर वसूला था जबकि तुगलक ने उन्हें दिल्ली सल्तनत में शामिल कर प्रत्यक्ष रूप से शासन किया।
➣ हालाँकि मुबारक खिलजी (1216-1320 ई.) ने भी दक्षिणी राज्यों को दिल्ली सल्तनत में मिलाया था किन्तु उसका शासकाल अल्प रहा।
➣ अकबर के दक्षिण अभियान के उद्देश्य एक अखिल भारतीय साम्राज्य की स्थापना करना व पुर्तगालियों को समुद्र तक वापस धकेलना था।
➣ अकबर के समकालीन दक्षिण भारत में चार राज्य थे-खानदेश, अहमदनगर, बीजापुर तथा गोलकुंडा।
➣ अकबर ने 1591 ई. में दक्कन के राज्यों को मुगल साम्राज्य की सर्वोच्चता स्वीकार करने के लिये दूतों को भेजा।
➣ खानदेश को छोड़कर अन्य राज्यों ने अकबर की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया।
खानदेश (1591 ई.) : अली खाँ
➣ खानदेश भौगोलिक एवं सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र था, क्योंकि यह उत्तर भारत एवं दक्षिण भारत (दक्कन) के मध्य स्थित था। इसी कारण इसे “दक्षिण का प्रवेश द्वार” माना जाता था।
➣ खानदेश पर विजय के बिना दक्षिण भारत में मुगल साम्राज्य का विस्तार करना अत्यंत कठिन था, अतः अकबर की दक्कन-नीति में इस प्रदेश का विशेष महत्व था।
➣ 1591 ई. में खानदेश के शासक अली खाँ (राजा अली खाँ फारूकी) ने अकबर के नवरत्नों में से एक प्रसिद्ध विद्वान एवं कवि फैजी के कूटनीतिक प्रयासों एवं समझाने पर बिना किसी युद्ध के स्वेच्छा से मुगल अधीनता स्वीकार कर ली।
➣ इस प्रकार अली खाँ दक्षिण भारत का वह प्रथम शासक था, जिसने बिना संघर्ष किए स्वेच्छा से अकबर की अधीनता स्वीकार की, जिससे आगे चलकर अन्य दक्कनी राज्यों पर मुगल प्रभाव स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
अहमदनगर (1593 ई.) : चांदबीबी
➣ राजपूताना, गुजरात, बंगाल आदि क्षेत्रों में अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के पश्चात अकबर ने दक्कन की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया।
➣ उसने अपना पहला दक्षिण अभियान 1593 ई. में अपने पुत्र शाहजादा मुराद तथा सेनापति अब्दुर्रहीम खानखाना के नेतृत्व में अहमदनगर पर भेजा।
➣ 1595 ई. में मुगल सेनाओं ने अहमदनगर दुर्ग की घेराबंदी कर दी। उस समय अहमदनगर का संपूर्ण नेतृत्व वीरांगना शासिका चांदबीबी (मूलतः बीजापुर की रानी थीं) के हाथों में था, जो अपनी कूटनीतिक एवं सैन्य कुशलता के लिए प्रसिद्ध थीं।
➣ अहमदनगर के अल्पवयस्क शासक सुल्तान बहादुर निजाम शाह की संरक्षिका के रूप में चाँद बीबी ने मुगल सेना का अत्यंत कड़ा प्रतिरोध किया तथा अपने सैनिकों एवं नगरवासियों में अद्भुत साहस का संचार किया, परंतु अंततः वे पराजित हुईं।
➣ अंततः चाँद बीबी ने 1596 ई. में मुगलों के साथ संधि की, जिसके अनुसार बरार का प्रदेश मुगलों को सौंप दिया गया तथा बदले में मुगलों ने बहादुर निजाम शाह को अहमदनगर का वैध शासक स्वीकार कर लिया।
➣ कुछ ही समय पश्चात जब अहमदनगर की ओर से संधि की शर्तों का उल्लंघन किया गया, तो अकबर ने पुनः खान-खाना एवं मुराद को आक्रमण हेतु भेजा।
➣ किंतु अभियान के दौरान दोनों सेनानायकों के मध्य गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए, जिस कारण अकबर ने खानखाना के स्थान पर विद्वान एवं नवरत्न अबुल फज़ल को भेजा। साथ ही अकबर ने अपने एक अन्य पुत्र दानियाल को भी खान-खाना के साथ इस अभियान पर भेजा।
➣ इसी क्रम में चांद बीबी के कुशल नेतृत्व में अहमदनगर, बीजापुर एवं गोलकुण्डा की संयुक्त दक्कनी सेना तथा अब्दुर्रहीम खान-खाना के नेतृत्व वाली मुगल सेना के मध्य 1597 ई. में ऐतिहासिक सूपा (सोमपथ) का युद्ध हुआ, जो दक्कन के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है।
➣ इस भीषण युद्ध में चांद बीबी की संयुक्त सेना पराजित हुई। इसके पश्चात 1599 ई. में आंतरिक षड्यंत्र के तहत चीताखां नामक व्यक्ति द्वारा स्वयं चांद बीबी की भी निर्ममता से हत्या कर दी गई, जो दक्कन के प्रतिरोध के लिए एक बड़ी क्षति सिद्ध हुई।
➣ चांद बीबी की मृत्यु के पश्चात नये सुल्तान मुर्तजा निजामशाह द्वितीय ने मुगलों के समक्ष आत्मसमर्पण करते हुए दौलताबाद, बालाघाट एवं अहमदनगर दुर्ग मुगलों को सौंप दिए।
➣ इस प्रकार 1600 ई. तक मुगलों को बरार, दौलताबाद, बालाघाट एवं अहमदनगर दुर्ग जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र तो प्राप्त हो गए, परंतु इसके बावजूद अहमदनगर राज्य का पूर्ण रूप से अस्तित्व समाप्त नहीं हुआ तथा वहाँ निजामशाही वंश का शासन किसी न किसी रूप में आगे भी जारी रहा।
अहमदनगर का मुगल साम्राज्य में पूर्ण विलय कालांतर में मुगल बादशाह शाहजहाँ ने 1633 ई. में किया था, जिसके साथ ही निजामशाही वंश का अंतिम रूप से अंत हो गया।
असीरगढ़ का किला (1601 ई.) : मीरन बहादुर
➣ असीरगढ़ की विजय को अकबर की अन्तिम विजय माना जाता है, जो उसने 1601 ई. में प्राप्त की।
➣ असीरगढ़ का दुर्ग खानदेश क्षेत्र में स्थित था तथा अपनी सुदृढ़ता एवं दुर्गमता के कारण “दक्कन की कुंजी” भी कहलाता था। उस समय यहाँ का शासक मीरन बहादुर था।
➣ इससे पूर्व अहमदनगर के विरूद्ध हुए युद्ध में खानदेश का तत्कालीन शासक अली खाँ मुगलों की ओर से ही लड़ा था, परंतु इसी युद्ध के दौरान वह वीरगति को प्राप्त हुआ अर्थात युद्ध करते हुए मारा गया।
➣ अली खाँ की मृत्यु के पश्चात उसके पुत्र मीरन बहादुर ने मुगल अधीनता को नकारते हुए स्वयं को असीरगढ़ में स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया, जिससे मुगलों के साथ पुनः संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई।
➣ असीरगढ़ का दुर्ग इतना सुदृढ़ एवं अभेद्य था कि उसे प्रत्यक्ष युद्ध में जीतना अत्यंत कठिन था, अतः अकबर ने कूटनीति का सहारा लिया।
➣ कहा जाता है कि अकबर ने असीरगढ़ का किला “सोने की कुंजियों” से खोला, अर्थात दुर्ग के किलेदार को भारी रिश्वत देकर अपनी ओर मिला लिया गया, जिसके फलस्वरूप बिना अधिक संघर्ष के ही दुर्ग पर मुगलों का अधिकार हो गया।
➣ इस विजय के पश्चात अकबर ने अपने पुत्र दानियाल के सम्मान में असीरगढ़ (खानदेश) क्षेत्र का नाम बदलकर धनदेश (दाँदेश) रख दिया, जो दानियाल के नाम पर आधारित था।
➣ असीरगढ़ की इस ऐतिहासिक विजय के उपलक्ष्य में अकबर ने बाज (श्येन पक्षी) के अंकन वाला स्वर्ण सिक्का चलवाया, जो इस विजय की स्मृति में जारी किया गया एक विशेष सिक्का था।
➣ साथ ही इस विजय के पश्चात अकबर ने स्वयं को दक्षिण के सम्राट की उपाधि से विभूषित किया, जो दक्कन क्षेत्र में मुगल साम्राज्य की सर्वोच्च सत्ता स्थापित होने का प्रतीक था।
महाराणा राणा प्रताप से संघर्ष
➣ सिसोदिया वंश के बारे में मध्यकालीन भारत > “उत्तर-दक्षिण के स्वतंत्र प्रांतीय राज्य” में दिया गया है।
➣ महाराणा राणा प्रताप भारत के प्रतापी शासक हुए। वे राणा सांगा के पौत्र व राणा उदय सिंह के पुत्र थे।
➣ महाराणा प्रताप का प्रथम राज्याभिषेक 28 फरवरी 1572 में गोगुन्दा में हुआ जबकि विधिवत रूप से द्वितीय राज्याभिषेक मार्च 1572 ई. में ही कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ।
| शासक | राजधानी |
|---|---|
| हम्मीर देव | चित्तौड़ |
| राणा उदय सिंह | चित्तौड़, तत्पश्चात उदयपुर |
| महाराणा प्रताप सिंह | कुम्भलगढ़, तत्पश्चात चावंड |
➣ महाराणा प्रताप एंव अकबर के मध्य तीन युद्धों का वर्णन मिलता है-हल्दीघाटी का युद्ध (1576 ई.), कुम्भलगढ़ का युद्ध (1578 ई.) एंव दिवेर का युद्ध (1582 ई.)।
➣ हल्दीघाटी के ऐतिहासिक युद्ध का आखों देखा वर्णन अब्दुल कादिर बदायुनी ने किया है।
हल्दीघाटी का युद्ध (1576 ई.)
➣ हल्दीघाटी युद्ध के पीछे अकबर का मुख्य उद्देश्य संपूर्ण राजपूताना पर अपना आधिपत्य स्थापित करते हुए राणा प्रताप को अधीन लाना था, क्योंकि राणा प्रताप अब तक मुगल सत्ता को स्वीकार करने वाले एकमात्र प्रमुख राजपूत शासक नहीं थे।
➣ इसके लिए अकबर ने युद्ध से पूर्व कूटनीतिक प्रयास करते हुए महाराणा प्रताप को चार बार समझाने हेतु अपने दूत भेजे — क्रमशः जलाल खान (1572 ई.), मानसिंह (1573 ई.), भगवानदास (1573 ई.) तथा राजा टोडरमल (1573 ई.), परंतु स्वाभिमानी राणा प्रताप ने मुगल अधीनता संबंधी सभी संदेशों को दृढ़तापूर्वक ठुकरा दिया।
➣ समस्त शांति-प्रयास विफल होने के पश्चात अकबर ने मेवाड़ को सैन्य बल से जीतने का निर्णय लिया तथा 18 जून, 1576 ई. को आमेर के राजा मानसिंह एवं आसफ ख़ाँ के संयुक्त नेतृत्व में एक विशाल मुगल सेना मेवाड़ की ओर आक्रमण हेतु भेजी।
➣ दूसरी ओर महाराणा प्रताप की सेना में राजपूत योद्धाओं के अतिरिक्त एक अफगान टुकड़ी भी सम्मिलित थी, जिसका नेतृत्व हकीम खान सूर कर रहे थे, जो स्वामिभक्ति का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते हुए राणा की सेना के अग्रभाग में युद्धरत थे। इसके साथ ही राणा की सेना में भीलों की भी एक छोटी, परंतु समर्पित टुकड़ी सम्मिलित थी, जिन्होंने स्थानीय भौगोलिक ज्ञान से सेना की महत्वपूर्ण सहायता की।
➣ दोनों सेनाओं के मध्य भीषण युद्ध गोगुंदा के निकट अरावली पहाड़ियों की हल्दीघाटी नामक संकरी घाटी में हुआ, जो अत्यंत दुर्गम एवं संकरा मार्ग होने के कारण रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था।
➣ इसी युद्ध के दौरान एक अत्यंत प्रसिद्ध एवं रोमांचक ऐतिहासिक घटना घटित हुई – महाराणा प्रताप ने अद्भुत वीरता एवं अतुलनीय बल का प्रदर्शन करते हुए मुगल सेनापति बहलोल खान को उसके घोड़े सहित एक ही वार में दो हिस्सों में चीर दिया था, जो उनकी असाधारण युद्ध-कुशलता का प्रमाण माना जाता है।
➣ युद्ध अत्यंत भीषण रूप धारण कर चुका था और राणा प्रताप स्वयं घायल हो गए, जिस कारण उन्हें युद्ध-क्षेत्र से पीछे हटना पड़ा।
➣ ऐसी कठिन परिस्थिति में बींदा (झाला) के झालामान सिंह ने अद्वितीय स्वामिभक्ति का परिचय देते हुए राणा का राजसी पोशाक एवं छत्र धारण कर उनका स्थान ले लिया, ताकि राणा सुरक्षित निकल सकें।
➣ इसी कठिन घड़ी में राणा प्रताप के स्वामिभक्त घोड़े चेतक ने भी अद्भुत बलिदान देते हुए राणा को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाया और अंततः वीरगति को प्राप्त हुआ।
➣ युद्धभूमि से निकलकर राणा प्रताप ने अरावली की दुर्गम पहाड़ियों में शरण ली तथा वहीं से उन्होंने छापामार (गुरिल्ला) युद्ध पद्धति को अपनाते हुए दीर्घकाल तक मुगलों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा।
➣ इस अभिनव युद्ध-नीति का सफलतापूर्वक प्रयोग कर उन्होंने मुगलों को कई बार करारी मात दी तथा कभी भी मुगल अधीनता स्वीकार नहीं की।
कालान्तर में इसी छापामार युद्ध पद्धति को दक्षिण भारत में दो अन्य प्रमुख सेनानायकों — मलिक अम्बर एवं शिवाजी ने भी अपनाया और इसे और अधिक विकसित किया।
मलिक अम्बर का संबंध अहमदनगर राज्य से था, जिन्होंने मुगल बादशाह जहाँगीर के शासनकाल के दौरान छापामार युद्ध तकनीक का प्रभावी प्रयोग करते हुए दीर्घकाल तक मुगलों से संघर्ष किया।
➣ वहीं शिवाजी, जो मराठा साम्राज्य के संस्थापक थे, मुगल बादशाह औरंगजेब के शासनकाल के समकालीन थे और उन्होंने भी इसी पद्धति को अपनाकर मुगलों के विरुद्ध सफल संघर्ष किया।
दिवेर का युद्ध (1582 ई.)
➣ हल्दीघाटी के युद्ध के पश्चात भी संघर्ष थमा नहीं, और अक्टूबर 1582 ई. में दिवेर का युद्ध हुआ, जो मेवाड़ के स्वतंत्रता संग्राम का अत्यंत निर्णायक युद्ध सिद्ध हुआ।
➣इस युद्ध में महाराणा प्रताप ने अद्भुत रणनीतिक कुशलता का परिचय देते हुए एक साथ मुगलों की लगभग 36 छावनियों को नष्ट कर दिया।
➣ इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व अकबर के चाचा सुल्तान खां कर रहे थे, जबकि राजपूती सेना दो भागों में विभाजित थी – एक टुकड़ी की कमान स्वयं महाराणा प्रताप के हाथों में थी, तो दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके वीर पुत्र अमर सिंह कर रहे थे।
➣ इस युद्ध में राणा अमर सिंह ने अद्भुत एवं अथाह पराक्रम का प्रदर्शन किया। उन्होंने अपने भाले से सुल्तान खां को उसके घोड़े सहित एक ही वार में मार गिराया, जो उनकी असाधारण शक्ति एवं युद्ध-कौशल का प्रमाण है।
➣ इस अद्भुत वीरतापूर्ण घटना के पश्चात ही यह प्रसिद्ध कहावत प्रचलित हुई कि “मेवाड़ के योद्धा सवार को एक ही वार में घोड़े समेत काट दिया करते हैं”, जो मेवाड़ी राजपूतों की अद्वितीय शौर्य-गाथा को दर्शाती है।
➣ अपने प्रमुख सेनापति की इस दुर्गति को देखकर मुगल सेना में भय एवं भगदड़ मच गई, जिसका लाभ उठाते हुए राजपूत सेना ने मुगलों को खदेड़ते हुए अजमेर तक खदेड़ दिया। अंततः बुरी तरह पराजित मुगल सेना को आत्मसमर्पण करना पड़ा।
➣ दिवेर के इस ऐतिहासिक युद्ध के पश्चात राणा प्रताप ने एक के बाद एक मेवाड़ के अनेक महत्वपूर्ण ठिकानों — गोगुंदा, कुम्भलगढ़, बस्सी, चावंड, जावर, मदारिया, मोही, माण्डलगढ़ आदि पर पुनः अधिकार कर लिया। इस प्रकार लगातार संघर्षरत रहते हुए 1585 ई. तक राणा प्रताप ने मेवाड़ के अधिकांश भाग को मुगलों से पूर्णतः स्वतंत्र करा लिया।
➣ हालाँकि अपने अथक प्रयासों के बावजूद वे अपनी पैतृक राजधानी चित्तौड़ को पुनः प्राप्त नहीं कर सके। इसी कारण उन्होंने आधुनिक डूंगरपुर के निकट चावंड नामक स्थान पर अपनी नई राजधानी स्थापित की, जहाँ से उन्होंने शासन संचालन जारी रखा।
➣ कालांतर में एक अत्यंत सशक्त धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाते समय राणा प्रताप को आंतरिक चोट लग गई, जिसके कारण उनकी स्वास्थ्य स्थिति बिगड़ती चली गई।
➣अंततः अपनी राजधानी चावंड में 19 जनवरी, 1597 ई. को मात्र 51 वर्ष की आयु में महाराणा प्रताप का निधन हो गया। इस समय मुगल सम्राट अकबर लाहौर में था।
प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल टॉड ने अपनी विख्यात कृति में जहाँ हल्दीघाटी के युद्ध को “मेवाड़ का थर्मोपल्ली” की संज्ञा दी, वहीं दिवेर के युद्ध को इसकी निर्णायकता एवं महत्व को देखते हुए “मेवाड़ का मैराथन” कहकर सम्मानित किया है।
➣ यह उल्लेखनीय तथ्य है कि मेवाड़ राजपूताना का एकमात्र ऐसा राज्य था, जिसने संपूर्ण अकबर के शासनकाल में कभी भी स्वेच्छा से मुगल संप्रभुता स्वीकार नहीं की।
➣ राणा प्रताप की मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र राणा अमर सिंह ने अपने पिता की भांति ही स्वाभिमान बनाए रखते हुए तत्कालीन मुगल बादशाह जहाँगीर के विरुद्ध कई वर्षों तक संघर्ष जारी रखा तथा मेवाड़ की स्वतंत्रता बनाए रखने में सफल रहे।
➣ किंतु दीर्घकाल तक निरंतर युद्ध करने के पश्चात मुगलों के बढ़ते सैन्य दबाव तथा अपने सामंतों एवं सलाहकारों की सम्मति को देखते हुए 1614-15 ई. में राणा अमर सिंह ने अंततः जहाँगीर के साथ एक सम्मानजनक संधि कर ली, जिसमें मेवाड़ के स्वाभिमान एवं प्रतिष्ठा को पूर्णतः सुरक्षित रखा गया।
➣ मेवाड़ के अतिरिक्त मारवाड़ की ओर से भी अकबर को निरंतर विरोध एवं प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था, जो दर्शाता है कि राजपूताना के कुछ राज्यों ने अंत तक मुगल अधीनता के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा।
अकबर के समय के विद्रोह
➣ अकबर के विशाल साम्राज्य में समय-समय पर विभिन्न क्षेत्रों में विद्रोह होते रहे। इनमें सर्वप्रथम 1564 ई. में मालवा के गवर्नर अब्दुल्ला उजबेग ने केंद्रीय सत्ता के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजाया।
➣ 1564 से 1567 ई. के मध्य कई शक्तिशाली उजबेग सरदारों ने एक साथ विद्रोह कर दिया, जिसे सामूहिक रूप से “उजबेग विद्रोह” कहा जाता है।
➣ इनमें जौनपुर के गवर्नर खानजमाँ (अली कुली खाँ) तथा अवध के गवर्नर खान आलम प्रमुख नेता थे, जिन्होंने मिलकर मुगल सत्ता को गंभीर चुनौती दी।
➣ इस गंभीर संकट से निपटने हेतु अकबर को स्वयं युद्ध-क्षेत्र में सक्रिय रहना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप 1567 ई. में अकबर ने कुछ समय के लिए जौनपुर को अपनी अस्थायी राजधानी बनाया, ताकि विद्रोह का निकटता से दमन किया जा सके।
➣ उजबेग विद्रोहियों की सफलताओं से उत्साहित होकर अकबर के सौतेले भाई एवं काबुल के गवर्नर मिर्जा हाकिम ने भी 1566-67 ई. में पंजाब पर आक्रमण कर दिया, जिससे साम्राज्य की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर भी संकट उत्पन्न हो गया।
➣ इस विद्रोह को धार्मिक स्वरूप देने हेतु जौनपुर के काजी मुल्ला मुहम्मद याजदी ने अकबर के विरुद्ध एक फतवा जारी किया। विद्रोहियों का उद्देश्य अकबर को सिंहासन से हटाकर उसके स्थान पर हकीम मिर्जा को दिल्ली के तख्त पर बैठाना था, जिससे यह संकट मुगल सत्ता के लिए अत्यंत गंभीर बन गया था।
➣ कुछ वर्षों पश्चात 1580 ई. में पुनः एक बड़ा विद्रोह संगठित हुआ, जिसमें बंगाल में बाबू खाँ काकझल तथा बिहार में मुहम्मद मासूम काबली एवं बहादुर खाँ ने विद्रोहियों का नेतृत्व किया।।
➣ इसी विद्रोह काल के दौरान, जब अकबर का ध्यान पूर्वी क्षेत्रों में उलझा हुआ था, तब महाराणा प्रताप ने मेवाड़ में अपनी स्थिति को पुनः सुदृढ़ करने का अवसर प्राप्त किया।
➣ इसी दौरान मध्य एशिया के शक्तिशाली शासक अब्दुल्ला उजबेग ने भी पश्चिमोत्तर सीमा पर आक्रमण की आशंका उत्पन्न कर दी, जिससे साम्राज्य की सुरक्षा को लेकर अकबर सदैव सतर्क रहता था।
➣ उत्तर-पश्चिम में युसूफजई कबीले के विद्रोह को दबाने का दायित्व जैना खाँ एवं बीरबल को सौंपा गया। हालाँकि इसी अभियान के दौरान 1586 ई. में अकबर के घनिष्ठ मित्र एवं नवरत्न बीरबल की दुखद मृत्यु हो गई, जो अकबर के लिए एक व्यक्तिगत क्षति सिद्ध हुई।
➣ पश्चिमोत्तर सीमा पर निरंतर बने रहने वाले विद्रोहों एवं बाह्य आक्रमणों के खतरे के दमन तथा सीमा सुदृढ़ीकरण हेतु 1585-98 ई. की लंबी अवधि के दौरान अकबर ने अपनी राजधानी अस्थायी रूप से लाहौर स्थानांतरित कर दी। इस संपूर्ण काल में अकबर स्वयं लाहौर में रहकर साम्राज्य की उत्तर-पश्चिमी सीमाओं की सुरक्षा एवं प्रशासन की देखरेख करता रहा।
➣ कन्धार प्रथम बार 1595 ई. में अकबर के शासनकाल में मुगल साम्राज्य में सम्मिलित हुआ। उत्तर-पश्चिम दिशा में प्राप्त अकबर की विजयों में कंधार विजय को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसने मुगल साम्राज्य की सीमाओं को अत्यंत सुदृढ़ बनाया।
➣ अकबर द्वारा कंधार पर विजय प्राप्त करने के पीछे दो प्रमुख कारण थे – प्रथम, उत्तर-पश्चिम सीमा को उजबेगों के संभावित आक्रमण से सुरक्षित रखने हेतु कन्धार पर मुगल नियंत्रण आवश्यक था।
➣ द्वितीय, चूँकि खुरासान क्षेत्र उजबेगों के अधिकार में जा चुका था, जिससे कन्धार का फारस (ईरान) से भौगोलिक एवं व्यापारिक संपर्क पूर्णतः कट गया था, अतः इसे मुगल साम्राज्य में सम्मिलित करना रणनीतिक दृष्टि से अनिवार्य हो गया था।
➣ अकबर के संपूर्ण शासनकाल में फारस (ईरान) की ओर से एकमात्र विद्रोह अब्दुल मजीद आसफ खाँ द्वारा किया गया था, जो अन्यथा सामान्यतः मुगल-फारसी संबंध मैत्रीपूर्ण ही रहे।
➣ अकबर के जीवन के अंतिम वर्षों में सर्वाधिक गंभीर विद्रोह उसके अपने पुत्र की ओर से हुआ। 1599 ई. में शाहजादा सलीम ने पुर्तगालियों के साथ गुप्त षड्यंत्र रचकर विद्रोह कर दिया तथा इलाहाबाद में स्वयं को स्वतंत्र बादशाह घोषित कर दिया।
➣ इस पारिवारिक संकट को सुलझाने में अकबर की माता-तुल्य सलीमा बेगम (गुलबदन बेगम) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए अंततः पिता-पुत्र में समझौता करवाया।
➣ इसी कलहपूर्ण काल में सलीम के ही गुप्त इशारे पर ओरछा के बुन्देला सरदार वीरसिंह देव ने 1602 ई. में अकबर के विद्वान एवं विश्वस्त सलाहकार अबुल फज़ल की निर्ममता से हत्या कर दी, जो अकबर के दरबार के लिए एक अपूरणीय क्षति सिद्ध हुई।
उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध झाँसी का किला वीर सिंह देव बुन्देला द्वारा ही बनवाया गया था।
➣ इसके अतिरिक्त वीर सिंह देव ने मथुरा में स्थित अत्यंत भव्य एवं प्रसिद्ध केशवराय (केशवदेव) मन्दिर का निर्माण भी करवाया था, जो बुन्देला स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
अकबर की मृत्यु
➣ 25 अक्टूबर, 1605 ई. को पेचिश (अतिसार) नामक रोग के कारण भारतीय इतिहास के महानतम सम्राटों में से एक अकबर की मृत्यु हो गई।
➣ उनके निधन के पश्चात उनके पुत्र एवं उत्तराधिकारी जहांगीर ने श्रद्धास्वरूप उन्हें “अर्श-आशियानी” (अर्थात स्वर्ग में निवास करने वाला) की उपाधि से सम्मानित किया।
➣ अकबर की स्मृति में जहांगीर ने सिकन्दरा (आगरा) में उनका भव्य एवं अद्वितीय मकबरा बनवाया। स्थापत्य कला की दृष्टि से यह मकबरा अत्यंत विशिष्ट है, क्योंकि इसकी बनावट परंपरागत मुगल मकबरों से भिन्न होकर बौद्ध विहार शैली से प्रेरित प्रतीत होती है।
➣ इस मकबरे की एक विशेष बात यह भी है कि इसमें परंपरागत मुगल स्थापत्य में प्रयुक्त होने वाले गुम्बद का प्रयोग नहीं किया गया है, जो इसे अन्य मुगल मकबरों से अलग एवं विशिष्ट बनाता है।
औरंगजेब के शासनकाल में 1685 ई. में जाट नेता राजाराम ने अकबर के मक़बरे में लूट-पाट की थी और अकबर की हड्डियों को खोद कर जला दी।
➣ अकबर के तीन पुत्र थे। सलीम (जहाँगीर), मुराद और दानियाल। मुराद और दानियाल पिता के जीवनकाल में शराब पीने की वजह से मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे।
➣ सलीम अकबर की मृत्यु 8वें दिन पश्चात नूरुद्दीन मोहम्मद जहाँगीर के उपनाम से तख्त पर बैठा।
अकबर का व्यक्तित्व
➣ अकबर के शासनकाल (1556–1605 ई.) में मुग़ल साम्राज्य का विस्तार उत्तर-पश्चिम में काबुल और कंधार से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी के उत्तर तक तथा पूर्व में बंगाल से लेकर पश्चिम में गुजरात तक हो गया था।
➣ अकबर एक शक्तिशाली केंद्रीकृत सम्राट था। शासन की समस्त सर्वोच्च सत्ता उसी में निहित थी। यद्यपि वह निरंकुश शासक था, फिर भी उसने प्रशासन में योग्यता, धार्मिक सहिष्णुता तथा न्याय को महत्व दिया।
➣ इसी कारण कुछ आधुनिक इतिहासकार उसकी तुलना यूरोप के प्रबुद्ध निरंकुश (Enlightened Despot) शासकों से करते हैं।
➣ अकबर ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई। उसने 1563 ई. में तीर्थ-कर तथा 1564 ई. में जज़िया कर समाप्त किया, विभिन्न धर्मों के विद्वानों को इबादतखाना में आमंत्रित किया तथा सुलह-ए-कुल (सर्वधर्म समभाव) की नीति को प्रोत्साहित किया।
➣ बाद के इतिहासकारों ने जिन मुस्लिम शासकों ने धार्मिक उदारता और सहिष्णुता की नीति अपनाई, उनकी तुलना कभी-कभी अकबर से की। उदाहरण के लिए ज़ैन-उल-आबिदीन को ‘कश्मीर का अकबर’ कहा जाता है।
➣ प्रसिद्ध इतिहासकार स्टेनली लेन-पूल ने औरंगज़ेब के ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह को उसकी धार्मिक उदारता, सूफ़ी विचारधारा तथा हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक समन्वय के प्रयासों के कारण ‘लघु अकबर’ की संज्ञा दी है।
➣ अकबर की साम्राज्य-विस्तार नीति पूरी तरह शांतिपूर्ण नहीं थी। 1568 ई. में चित्तौड़गढ़ विजय के बाद उसके आदेश पर बड़ी संख्या में रक्षकों एवं किले में शरण लिए लोगों की हत्या कराई गई।
➣ समकालीन स्रोतों, विशेषकर अबुल फ़ज़ल, के अनुसार लगभग 30,000 लोगों का नरसंहार हुआ। इस घटना की इतिहासकारों ने अकबर के शासनकाल की सबसे विवादास्पद घटनाओं में गणना की है।
➣ इस प्रकार अकबर का व्यक्तित्व विरोधाभासों से युक्त था। एक ओर उसने धार्मिक सहिष्णुता, प्रशासनिक सुधार एवं सांस्कृतिक समन्वय को बढ़ावा दिया, वहीं दूसरी ओर साम्राज्य विस्तार के लिए कई कठोर सैन्य अभियान और नरसंहार भी कराए। इसलिए उसके शासन का मूल्यांकन उसकी उपलब्धियों और सीमाओं,दोनों के आधार पर किया जाता है।
➣ अकबर के दरबारी इतिहासकार एवं घनिष्ठ विद्वान मित्र अबुल फज़ल ने अपनी रचनाओं में अकबर के व्यक्तित्व की प्रशंसा करते हुए उन्हें “इंसान-ए-कामिल” (अर्थात पूर्ण मानव) की उपाधि से विभूषित किया, जो अकबर के प्रति उनके अगाध श्रद्धाभाव को दर्शाता है।
➣ प्रसिद्ध पाश्चात्य इतिहासकार विंसेंट ए. स्मिथ (लेनपूल) ने अकबर के प्रशासनिक, सैन्य एवं सांस्कृतिक योगदान का गहन अध्ययन करते हुए उन्हें केवल एक उत्तराधिकारी शासक न मानकर मुगल साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक स्वीकार किया है, क्योंकि अकबर ने ही मुगल सत्ता को एक सुदृढ़, संगठित एवं स्थायी साम्राज्य का रूप प्रदान किया था।
अकबर की राजपूत नीति
➣ अकबर की राजपूत नीति- दमन और समझौते की नीति पर आधारित थी। अकबर की राजपूत नीति का उद्देश्य साम्राज्य के स्थायित्व के लिए राजपूतों की सहानुभूति प्राप्त करना था।
➣ अकबर की राजपूत नीति के मुख्य तत्व थे-
1. राजपूतों के साथ वैवाहिक संबंध।
2. राजपूत रियासतों को पूर्ण आन्तरिक स्वतंत्रता व सुरक्षा
3. राजपूत प्रमुखों की मनसबदारों तथा गवर्नरों के रूप में नियुक्ति।
➣ अकबर ने राजपूत राजाओं को बादशाह द्वारा प्रदत्त जागीर के अलावा अपनी पैतृक जागीर (वतन जागीर) पर भी शासन करने का अधिकार दिया था, जबकि राजपूतों के अलावा अन्य अमीरों के साथ ऐसा नहीं होता था।
➣ अकबर ने एकमात्र राजपूत राजा सुरजन राय हाड़ा (रणथम्भौर) ‘ को तव्वरा (वाद्ययंत्र) बजाने की छूट दी थी।
➣ अकबर ने अपनी राजपूत नीति के परिणामस्वरूप 1562 ई. में दासप्रथा, 1563 ई. में तीर्थ यात्रा कर तथा 1564 ई. में जजिया कर को समाप्त कर दिया था।
➣ अकबर ने सभी राजपूत राजाओं से स्वयं के सिक्के चलाने का अधिकार छीन लिया था तथा उनके क्षेत्रों में शाही सिक्कों का प्रचलन कराया।
राजपूतों से वैवाहिक संबंध
➣ मुस्लिम शासकों और हिन्दू अधिपतियों की कन्याओं के मध्य विवाह असाधारण बात नहीं थी। परन्तु अकबर ने वैवाहिक सम्बन्धों को शर्त के तौर पर नहीं रखा।
➣ अन्य मुस्लिम शासकों के विपरीत उसने अपनी हिन्दू पत्नियों को पूरी धार्मिक स्वतन्त्रता दी और उनके पिताओं और सम्बन्धियों को सरदारों में सम्माननीय पद प्रदान किए।
➣ आमेर के भगवानवास को लाहौर का संयुक्त गवर्नर बनाया गया जबकि उसका पुत्र मानसिंह काबुल में नियुक्त हुआ। कालान्तर में मानसिंह विहार और बंगाल का गवर्नर बना।
➣ अन्य राजपूत राजाओं को बागरा, बजमेर और गुजरात जैसे सैनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थानों का सर्वोच्च अधिकारी नियुक्त किया गया।
➣ अकबर ने सर्वप्रथम कछवाहा राजपूतों से वैवाहिक संबंध स्थापित किए थे। जिस समय अकबर ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की यात्रा हेतु जा रहा था, तो सांगानेर नामक स्थान पर 1562 ई. में आमेर का राजा बिहारीमल (भारमल) बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ,
➣ उसने अकबर की अधीनता स्वीकार की तथा उससे अपनी ज्येष्ठ पुत्री हरखा बाई का विवाह करने की इच्छा भी व्यक्त की।
➣ अकबर ने राजा का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया तथा अजमेर से लौटते समय सांभर में उसने राजा बिहारीमल की पुत्री से विवाह किया, यह अकबर का प्रथम राजपूत कन्या से विवाह था।
इस प्रकार बिहारीमल (भारमल) पहला राजपूत राजा था, जिसने स्वेच्छा से अकबर की अधीनता स्वीकार की। इसी राजपूत राजकुमारी से शहजादे सलीम (जहांगीर) का जन्म हुआ।
➣ जैसलमेर और बीकानेर के शासकों ने भी अकबर के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए जबकि रणथम्भौर के हाड़ाओं के साथ अकबर के वैवाहिक सम्बन्ध नहीं थे। फिर भी वे अकबर के कृपा के पात्र बने रहे।
➣ अकबर की राजपूत नीति का अनुसरण उसके उत्तराधिकारियों जहाँगीर और शाहजहाँ ने भी किया। जहाँगीर एक राजपूत राजकुमारी का पुत्र था।
➣ उसने भी कछवाहा राजकुमारी, जोधपुर, जैसलमेर और बीकानेर की राजकुमारियों के साथ भी विवाह किया।
अकबर की धार्मिक नीति
➣ अकबर की धार्मिक नीति का मूल उद्देश्य- सार्वभौमिक सहिष्णुता थी। इसे सुलहकुल की नीति अर्थात् सभी के साथ शान्तिपूर्ण व्यवहार का सिद्धांत भी कहा जाता था।
➣ अकबर के प्रारंभिक धार्मिक विचारों पर उसके शिक्षक अब्दुल लतीफ तथा सूफी विचारधारा का काफी प्रभाव पड़ा था।
इबादत खाने की स्थापना (1575 ई.)
➣ अकबर ने दार्शनिक एवं धर्मशास्त्रीय विषयों पर वाद-विवाद के लिए अपनी राजधानी फतेहपुर सीकरी में एक इबादतखाना (प्रार्थना-भवन) स्थापना 1575 ई. में करवाया।
➣ अकबर द्वारा इबादतखाना बनवाने के पीछे इस्लाम धर्म के बारे में अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करने की लालसा थी।
➣ प्रारंभ में अकबर ने केवल सुन्नी मुसलमान विद्वानों को ही चर्चा हेतु आमंत्रित किया, किंतु उनके बीच विवादों ने अकबर को असंतुष्ट कर दिया और वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि सत्य सभी धर्मों में है”
➣ अत: 1578 ई. में उसने सभी धर्मावलंबियों के लिए इबादतखाना का द्वार खोल दिया था और समस्त धार्मिक मामलों को अपने हाथों में लेने के लिए महजरनामा की घोषणा की।
महजर की घोषणा (1579 ई.)
➣ अकबर ने महजर की संकल्पना के द्वारा यह अधिकार प्राप्त किया कि यदि किसी धार्मिक विषय पर धार्मिक गुरुओं के बीच मतभेद की स्थिति बनती है तो उसकी अंतिम व्याख्या का अधिकार शासक के पास रहेगा।
➣ इस घोषणा के द्वारा वह सर्वाधिक विवेकशील प्राणी इंसान-ए-कामिल बनना चाहता था।
➣ अकबर ने अपने आप को अमीर-उल-मोमिनीन कहा। वह 1258- के बाद संभवतः प्रथम व्यक्ति था जिसने यह पदवी धारण की। ध्यातव्य है कि सामान्यतः यह पदवी ख़लीफ़ा धारण करते थे।
➣ इस घोषणा के द्वारा उलेमाओं ने अकवर को इमाम-ए-आदिल घोषित किया।
➣ सीकरी की जामा मस्जिद में उसने स्वयं खुत्वा पढ़ा जो एक क्रांतिकारी कदम था।
➣ महजर का मसौदा/प्रारूप शेख मुवारक ने तैयार किया था और सबसे पहले इन्होंने ही अकवर को इस हेतु प्रोत्साहित किया था। शेख फैजी व अबुल फज़ल के पिता थे।
➣ मजहर को स्मिथ और वूल्जले हेग ने अचूक आज्ञा-पत्र कहा है।
➣ इस धार्मिक चर्चा में किसी बौद्ध भिक्षु ने भाग नहीं लिया था।
➣ इबादत खाने की बहस-मुबाहिसों से विभिन्न धर्मो के बीच सदभाव पैदा नहीं हो पाया। क्योंकि हरेक अपने धर्म को दुसरे के धर्म से सर्वश्रेष्ठ बताते। अत: 1582 में इबादतखाने की चर्चाएँ बन्द कर दी गई।
➣ लेकिन उसने सत्य की तलाश नहीं छोड़ी। वह कई धर्म गुरुओं से भेंट करता रहा।
दीन-ए-इलाही (1582 ई.)
➣ अकबर ने 1582 ई. में तौहीद-ए-इलाही या दीन-ए-इलाही की स्थापना की। जिसका शाब्दिक अर्थ है दैवी एकेश्वरवाद ।
➣ जो व्यक्ति इच्छुक थे और जिन्हें अकवर मन्जूर करता था वह इसके सदस्य वन सकते थे। इस मार्ग में आने के लिए इतवार का दिन निश्चित था।
➣ दीन-ए-इलाही के अंतर्गत अकबर ने सभी धर्मों के मूल सिद्धांतों को सम्मिलित कर इसे सर्वमान्य बनाने का प्रयास किया। लेकिन यह भी असफल रहा।
➣ दीन-ए-इलाही वास्तव में सूफी सर्वेश्वरवाद पर आधारित एक विचार पद्धति थी। इस नवीन संप्रदाय का प्रधान पुरोहित अबुल फजल था।
➣ हिंदुओं में केवल बीरबल (महेश दास) ने इसे स्वीकार किया था। इसके अनुयायियों की संख्या केवल 18 थी।
➣ विन्सेन्ट स्मिथ के अनुसार दीन-ए-इलाही अकबर की मूर्खता का प्रतीक था, बुद्धिमानी का नहीं। जबकि बदायूंनी, मॉन्सरेट एवं बारटोली ने इसे धर्म बताया है।
➣ जहांगीर के समकालीन मोहसिन फानी ने अपनी रचना दबिस्तान- ए-मजाहिब में पहली बार दीन-ए-इलाही को एक स्वतंत्र धर्म के रूप में उल्लेख किया था।
➣ अकबर के दरबार में तीन ईसाई मिशनरी (जैसूट मिशनरी) आये।
➣ प्रथम ईसाई मिशन में रूडोल्फ बार एक्वाबीवा, एन्टोनी मान्सेरेट तथा एनरिक्वेज शामिल थे। यह 1580 से 1582 ई. तक फतेहपुर सीकरी रहे।
➣ गोवा से आये इस मिशन का नेतृत्व एक्वाबीवा ने किया। दूसरा ईसाई मिशन 1591- 92 ई. में आया। इसमें एडवर्ड लैटोन व क्रिस्टोफर-डि-वागा शामिल थे।
➣ तीसरा मिशन 1595 ई. में लाहौर आया। इसमें जैरोम, जैवियर, पिनहैरो और बेनेडिक्ट-दि-गोएज शामिल थे।
अन्य धर्मो के प्रति नीति
➣ अकबर ने अपने शासनकाल में सभी धर्मों का सम्मान किया था, सभी जाति-वर्गों के लोगों को एक समान माना और उनसे अपने मित्रता के सम्बन्ध स्थापित किये। जिसमें वह काफ़ी हद तक सफल भी रहा।
➣ अकबर पहला मुस्लिम शासक था, जिसने इस बात का अनुभव किया कि मुगल साम्राज्य की सुदृढ़ता के लिए भारत की बहुसंख्यक हिंदू जनता का सहयोग प्राप्त करना नितांत आवश्यक है।
➣ बदायूंनी अकबर की धार्मिक नीति का कट्टर विरोधी था। उसने अकबर को इस्लाम का दुश्मन कहा है। नक्शबन्दी सिलसिले के शेख अहमद सरहिन्दी ने भी अकबर की उदारवादी धार्मिक नीतियों का विरोध किया है।
➣ अकबर ने सर्वप्रथम हिंदू-मुस्लिम समुदायों को राष्ट्रीय एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास किया। उसके सिक्कों पर सीता राम का चित्रण एंव सिया राम लिखा रहता था।
➣ अकबर हिन्दू धर्म से सर्वाधिक प्रभावित था। हिन्दू धर्म के कर्म व पुनर्जन्म के सिद्धान्तों से अकबर बहुत प्रभावित था।
➣ उसने बल्लभाचार्य के पुत्र बिट्ठलनाथ को गोकुल और जैतपुर की जागीरें प्रदान की।
➣ उसने हिन्दु धर्म के सिद्धान्तों को जानने के लिए पुरुषोतम और देवी को आमन्त्रित किया और जरायुष्ट्र धर्म के सिद्धान्तों की व्याख्या के लिए मेहरजी राणा को बुलवाया।
➣ 1583 ई. से पूर्व अकबर की मुद्राओं पर कलमा व खलीफाओं का विवरण अंकित होता था किन्तु बाद में सिक्कों पर सूर्य व चन्द्रमा की महिमा वाले पद्य अंकित किए जाने लगे।
➣ अकबर ने झरोखा दर्शन, तुलादान, सिजदा व पायबोस जैसी पारसी परम्पराओं को आरम्भ किया। ये परम्पराएँ शुरू करने वाला अकबर प्रथम मुगल शासक था।
➣ अकबर ने कश्मीर विजय के बाद एक बार श्रीनगर में भी दीपावली मनाई। इसका उल्लेख अबुल फजल के अकबरनामा में मिलता है।
➣ अकबर ने 1563 ई. में प्रयाग, मथुरा और बनारस में लगने वाले तीर्थ यात्रा कर को समाप्त कर दिया। अकबर ने गौहत्या पर प्रतिबंध लगाया।
➣ अकबर ने 1564 ई. में नरहरि के अनुरोध पर जजिया हटाया, बाद में अब्दुनबी के कहने पर 1575 ई. में वापस जजिया लागू कर दिया। बदायूंनी के अनुसार जजिया अन्तिम रूप से 1579 ई. में हटाया।
➣ अकबर ने पारसी पुरोहित दस्तूर मेहर जी राणा को 200 बीघा जमीन प्रदान की तथा 24 घंटे दरबार में अग्नि प्रज्वलित करने की आज्ञा दी एवं सूर्य पूजा प्रारम्भ की।
➣ अकबर ने तीसरे सिख गुरु अमरदास से भेंट कर उसकी पुत्री को कई गांवों की जागीर प्रदान की तथा गुरू रामदास को प्राकृतिक तालाब वाली 500 बीघा जमीन प्रदान की, जहां कालांतर में अमृतसर नगर बसा।
➣ अकबर जैनियों के सम्पर्क में भी आया और उनके कहने पर काठियावाढ़ के प्रमुख जैन सन्त हीरविजय सूरी ने उसके दरवार में दो वर्ष विताए।
➣ अकबर ने तपगच्छ जैन आचार्य हीर विजय सूरी को जगतगुरु तथा खरतरगच्छ जैन जिनचन्द्र सूरी को युग प्रधान एवं विजयसेन सूरी को काली सरस्वती की उपाधि दी थी।
➣ हीर विजय सूरी के प्रभाव में आकर पशु वध निषेध कर दिया। इसका उल्लेख हीर विजय सूरी रचित हीराकाव्यम् में मिलता है।
➣ ईसाई धर्म के सिद्धान्तों को और अधिक समझने के लिए उसने कुछ पुर्तगाली पादरियों से भी भेंट की और गोआ से पुर्तगालियों से दो विद्वान धर्म प्रचारकों को अपने दरवार में भेजने को कहा।
➣ अकबर ने सूफी मत में अपनी आस्था जताते हुए चिश्तिया संप्रदाय को समर्थन दिया था। वह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की अजमेर स्थित दरगाह पर दर्शन हेतु अक्सर जाता था।
➣ कालांतर में शेख सलीम चिश्ती के आशीर्वाद से अकबर को पुत्र (सलीम) की प्राप्ति हुई थी।
➣ ध्यातव्य है कि प्रारंभ में अकबर शेख अंब्दुल नबी का परम भक्त था और यहाँ तक कि उसने उनकी चरणपादुका अपने सिर पर उठा ली थी।
सामाजिक कार्य
➣ अपने सामाजिक सुधार के अंतर्गत उसने बाल विवाह एवं सती प्रथा को रोकने का प्रयत्न किया। सत्ती प्रथा स्वेच्छिक थी पूर्ण प्रतिबंधित नहीं।
➣ 1593 में जब बीकानेर के रायसिंह का दामाद की मृत्यु हुई तो वह स्वंय मातपुरसी के लिए उसके घर गया और उसकी लड़की को सती होने से रोका।
➣ उसने यह आज्ञा दी थी कि आदमी को एक ही स्त्री से विवाह करना चाहिए और वह तभी दूसरा विवाह कर सकता है, जब उसकी पहली पत्नी बन्ध्या हो।
➣ विवाह की आयु भी बढ़ाकर लड़कियों के लिए चौदह वर्ष और लड़कों के लिए सोलह वर्ष कर दी गयी थी। बाल विवाह रोकने के लिए तुरबंग नामक अधिकारियों की नियुक्ति की।
➣ अकबर ने सती प्रथा एवं शिशु वध को रोकने का प्रयास किया व 1587 ई. में विधवा विवाह को कानूनी मान्यता दी। मंदिरा की बिक्री को सीमित किया गया।
➣ अकबर स्वंय अनपढ़ था किन्तु शैक्षिक पाठ्यक्रम में भी काफी संशोधन किया। उसने नैतिक शिक्षा, गणित तथा धर्म निरपेक्ष विषयों जैसे कृषि, ज्यामिति, खगोल शास्त्र, प्रशासन के सिद्धान्त, तर्क-शास्त्र, इतिहास आदि पर अधिक बल दिया।
➣ अकाल के दौरान पीड़ितों को सहायता पहुंचाने वाला प्रमुख मुगल शासक अकबर था। 1594-98 ई. के अकाल के दौरान पहली बार अकबर ने इस प्रकार की व्यवस्था की थी।
➣ उसने कलाकारों, कवियों, चित्रकारों और संगीतकारों को भी संरक्षण दिया। उसका दरवार प्रसिद्ध व्यक्तियों अर्थात् नवरत्नों की उपस्थिति के कारण प्रसिद्ध हो गया।
➣ इस प्रकार अकबर के शासनकाल में राज्य अनिवार्य रूप से धर्मनिरपेक्ष, सामाजिक विषयों में उदार और चेतना तथा सांस्कृतिक एकता को प्रोत्साहन देने वाला बन गया।
➣ लेकिन इनमें से प्रत्येक क़दम सफल नहीं रहा। अकबर का युग अन्धविश्वासों का युग था उसके सामाजिक सुधारों को सीमित सफलता ही मिल सकी।
अकबर के कुछ महत्वपूर्ण कार्य
| युद्धबंदियों के लिए दासप्रथा की समाप्ति | 1562 |
| अकबर को हरमदल से मुक्ति | 1562 |
| तीर्थयात्रा कर समाप्त | 1563 |
| जज़िया कर समाप्त | 1564 |
| फतेहपुर सीकरी की स्थापना एवं राजधानी का आगरा से फतेहपुर सीकरी स्थानांतरण | 1571 |
| घोड़ों को दागने की प्रथा प्रारम्भ | 1574 |
| इबादतखाने की स्थापना | 1575 |
| मनसबदारी व्यवस्था प्रारम्भ | 1575 |
| इबादतखाने में सभी धर्मों के लोगों के प्रवेश की अनुमति | 1578 |
| मजहर की घोषणा | 1579 |
| पूर्ण रूप से दासप्रथा समाप्त | 1582 |
| दीन-ए-इलाही की स्थापना | 1582 |
| इलाही संवत् की शुरुआत | 1584 |
| गुजरात अभियान में सफलता के उपरान्त अब्दुर्रहीम को खान-ए-खाना की उपाधि | 1584 |
| राजधानी को लाहौर स्थानांतरित किया | 1585 |
अकबर कालीन विदेशी यात्री
➣ अकबर के शासनकाल (1556–1605 ई.) में अनेक यूरोपीय, फ़ारसी तथा अन्य विदेशी यात्री भारत आए। इनमें से कुछ व्यापारिक उद्देश्य से आए, जबकि कुछ धार्मिक मिशन या राजनयिक कार्यों के लिए आए थे।
➣ इनके यात्रा-वृत्तांतों से अकबरकालीन भारत की राजनीति, प्रशासन, समाज, व्यापार तथा संस्कृति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
➣ फादर थॉमस स्टीफेन्स भारत आने वाला पहला अंग्रेज था। वह 1579 ई. में एक जेसुइट पादरी के रूप में गोवा पहुँचा। यद्यपि वह अकबर के दरबार में नहीं गया, फिर भी वह अकबरकालीन भारत का समकालीन विदेशी यात्री था।
➣ राल्फ फिंच अकबर के समय भारत आने वाला पहला प्रसिद्ध अंग्रेज व्यापारी एवं यात्री था। वह 1583–1591 ई. के बीच भारत में रहा तथा फतेहपुर सीकरी, आगरा, बनारस, पटना और बंगाल सहित अनेक स्थानों की यात्रा की। उसके विवरण से अकबरकालीन व्यापार, नगरों और आर्थिक व्यवस्था की जानकारी मिलती है।
➣ जान मिल्डेनहॉल 1599 ई. में भारत आया और अकबर के दरबार तक पहुँचा। वह ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक हितों को स्थापित करना चाहता था, किन्तु पुर्तगालियों के विरोध तथा अन्य कारणों से उसे विशेष सफलता नहीं मिली।
➣ फादर एंटोनियो मोनसेर्राते प्रथम जेसुइट मिशन के सदस्य के रूप में 1580 ई. में अकबर के दरबार पहुँचा। उसने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Commentarius में अकबर के दरबार, प्रशासन, धार्मिक विचारों तथा फतेहपुर सीकरी का विस्तृत वर्णन किया है।
➣ रुडोल्फ एक्वाविवा भी प्रथम जेसुइट मिशन का सदस्य था। उसने अकबर के धार्मिक विचार-विमर्श तथा इबादतखाना की गतिविधियों का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त किया।
➣ फ़ारसी व्यापारी रफ़ीउद्दीन इब्राहीम शिराज़ी ने अपनी कृति तज़किरात-अल-मुलूक में भारत यात्रा के दौरान अकबरकालीन प्रशासन, व्यापार तथा तत्कालीन परिस्थितियों का उल्लेख किया है।
➣ अकबर के शासनकाल में आने वाले विदेशी यात्रियों के विवरण इतिहासकारों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत हैं, क्योंकि इनके माध्यम से तत्कालीन भारत के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन का प्रत्यक्ष चित्र प्राप्त होता है।
अकबर कालीन प्रमुख विदेशी यात्री
| विदेशी यात्री | देश | मुख्य उद्देश्य | भारत आगमन |
|---|---|---|---|
| थॉमस स्टीफेन्स | इंग्लैंड | जेसुइट पादरी | 1579 ई. |
| राल्फ फिंच | इंग्लैंड | व्यापारी एवं यात्री | 1583 ई. |
| जान मिल्डेनहॉल | इंग्लैंड | व्यापारिक मिशन | 1599 ई. |
| एंटोनियो मोनसेर्राते | स्पेन | जेसुइट मिशन | 1580 ई. |
| रुडोल्फ एक्वाविवा | इटली | जेसुइट मिशन | 1580 ई. |
| रफ़ीउद्दीन इब्राहीम शिराज़ी | फ़ारस | व्यापारी | अकबर काल |
हिन्दी एवं फ़ारसी साहित्य का स्वर्णकाल
➣ सम्राट अकबर का शासनकाल हिन्दी एवं फ़ारसी साहित्य के उत्कर्ष का काल माना जाता है। उसके संरक्षण में अनेक विद्वानों, कवियों एवं लेखकों ने साहित्य की विभिन्न विधाओं में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
➣ अकबर के दरबार में फ़ारसी राजभाषा थी, इसलिए फ़ारसी साहित्य का विशेष विकास हुआ। साथ ही हिन्दी, संस्कृत तथा अन्य भारतीय भाषाओं के विद्वानों को भी समान रूप से संरक्षण प्रदान किया गया।
➣ अकबर के नवरत्नों में अबुल फ़ज़ल एवं उसके बड़े भाई फ़ैज़ी फ़ारसी साहित्य के प्रमुख विद्वान थे।
➣ अबुल फ़ज़ल ने अकबरनामा तथा आइने-अकबरी जैसे प्रसिद्ध ग्रन्थों की रचना की, जो अकबर के शासनकाल के सबसे प्रामाणिक ऐतिहासिक स्रोत माने जाते हैं।
➣ फ़ैज़ी अकबर के दरबार का राजकवि (मलिक-उश-शोअरा) था। वह फ़ारसी का महान कवि एवं विद्वान था तथा अकबर के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का प्रमुख सहयोगी था।
➣ अकबर के शासनकाल में हिन्दी साहित्य को भी पर्याप्त संरक्षण मिला। इस काल में तुलसीदास, सूरदास, अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना तथा रसखान जैसे महान कवियों ने हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाया।
➣ अकबर का दरबार मध्यकालीन भारत का प्रमुख साहित्यिक एवं सांस्कृतिक केन्द्र था, जहाँ फ़ारसी, हिन्दी एवं संस्कृत—तीनों भाषाओं के विद्वानों को संरक्षण प्राप्त था।
अनुवाद विभाग (मकतबखाना)
➣ सम्राट अकबर ने विभिन्न धर्मों एवं संस्कृतियों के ज्ञान के आदान-प्रदान के उद्देश्य से अपने राजकवि फ़ैज़ी की अध्यक्षता में अनुवाद विभाग (मकतबखाना) की स्थापना की।
➣ इस विभाग में संस्कृत, अरबी, तुर्की तथा यूनानी (ग्रीक) आदि भाषाओं के प्रमुख ग्रन्थों का फ़ारसी में अनुवाद कराया गया।
| मूल ग्रन्थ | फ़ारसी नाम / अनुवाद | प्रमुख अनुवादक |
|---|---|---|
| महाभारत | रज़्मनामा | नकीब ख़ाँ, बदायूँनी, फ़ैज़ी एवं अन्य विद्वान |
| रामायण | फ़ारसी अनुवाद | अब्दुल कादिर बदायूँनी |
| अथर्ववेद | फ़ारसी अनुवाद | हाजी इब्राहीम सरहिन्दी |
| राजतरंगिणी | फ़ारसी अनुवाद | मुल्ला शाह मुहम्मद |
| तुज़ुक-ए-बाबरी (बाबरनामा) | तुर्की से फ़ारसी अनुवाद | अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना |
| लीलावती | फ़ारसी अनुवाद | फ़ैज़ी |
| पंचतंत्र | अनवार-ए-सुहैली (प्रचलित फ़ारसी रूप) | हुसैन वाइज़ काशिफ़ी (पूर्ववर्ती फ़ारसी परम्परा) |
अकबर के दरबार के प्रमुख विद्वान
| विद्वान | परिचय / योगदान | उपाधि / विशेष तथ्य |
|---|---|---|
| अबुल फ़ज़ल | अकबर का प्रमुख दरबारी इतिहासकार एवं नवरत्न। अकबरनामा तथा आइने-अकबरी की रचना की। | अकबर का मुख्य सलाहकार एवं इतिहासकार |
| फ़ैज़ी | अबुल फ़ज़ल का बड़ा भाई, प्रसिद्ध फ़ारसी कवि एवं अकबर का राजकवि। | मलिक-उश-शोअरा (राजकवि) |
| अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना | हिन्दी एवं फ़ारसी के प्रसिद्ध विद्वान। दोहों के लिए प्रसिद्ध तथा तुज़ुक-ए-बाबरी का फ़ारसी अनुवाद किया। | अकबर के नवरत्नों में प्रमुख |
| मुहम्मद हुसैन | कश्मीर का प्रसिद्ध सुलेखकार (Calligrapher)। | ज़री कलम की उपाधि |
| हरिविजय सूरी | प्रसिद्ध जैन आचार्य, जिन्होंने अकबर को जैन धर्म से परिचित कराया। | जगद्गुरु की उपाधि |
| जिनचन्द्र सूरी | प्रसिद्ध जैन विद्वान एवं आचार्य। | युगप्रधान की उपाधि |
➣ अकबर के दरबार में विभिन्न धर्मों एवं भाषाओं के विद्वानों को समान रूप से संरक्षण प्राप्त था। इसी कारण उसका दरबार मध्यकालीन भारत का प्रमुख सांस्कृतिक एवं बौद्धिक केन्द्र बन गया।
➣ हरिविजय सूरी तथा जिनचन्द्र सूरी जैसे जैन आचार्यों को सम्मानित कर अकबर ने अपनी धार्मिक सहिष्णुता एवं विद्वानों के प्रति सम्मान का परिचय दिया।अकबर के नवरत्न
| नवरत्न | परिचय / प्रमुख योगदान |
|---|---|
| राजा मानसिंह | आमेर के राजा भगवानदास के पुत्र तथा राजा भारमल के पौत्र। अकबर के प्रमुख सेनापति। 1576 ई. के हल्दीघाटी युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व किया। मृत्यु: 1614 ई. |
| बीरबल | बचपन का नाम महेशदास। अकबर के सबसे बुद्धिमान दरबारियों में से एक। जन्म: 1528 ई. उपाधियाँ: राजा एवं कविराय। जागीर: कालिंजर एवं कांगड़ा। मृत्यु: 1586 ई. (यूसुफजई अभियान में)। |
| अबुल फ़ज़ल | शेख मुबारक का पुत्र। जन्म: 1551 ई. अकबर का प्रमुख इतिहासकार। प्रमुख रचनाएँ—अकबरनामा एवं आइने-अकबरी। दीन-ए-इलाही का प्रमुख प्रवक्ता। मृत्यु: 1602 ई. |
| मियाँ तानसेन | वास्तविक नाम रामतनु पाण्डेय। जन्म ग्वालियर के निकट। गुरु—स्वामी हरिदास। भारतीय संगीत के महान गायक। उपाधि: कण्ठाभरणवाणी विलास। उपनाम: संगीत सम्राट। |
| अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना | बैरम ख़ाँ के पुत्र। प्रसिद्ध सेनापति, विद्वान एवं हिन्दी कवि। जन्म: 1556 ई. बाबरनामा का तुर्की से फ़ारसी में अनुवाद कराया। उपाधि: ख़ान-ए-ख़ाना। |
| राजा टोडरमल | अकबर के वित्त मंत्री। दहसाला (टोडरमल) बन्दोबस्त के प्रवर्तक। प्रधान दीवान: 1582 ई. मृत्यु: 1589 ई. |
| फ़ैज़ी | अबुल फ़ज़ल के बड़े भाई एवं अकबर के राजकवि (मलिक-उश-शोअरा)। लीलावती का फ़ारसी अनुवाद किया। संस्कृत ग्रन्थों के अनुवाद विभाग के प्रमुख विद्वानों में से एक। मृत्यु: 1595 ई. |
| हकीम हुमाम | अकबर के विश्वस्त मित्र एवं सलाहकार। शाही रसोई विभाग तथा शाही प्रबन्ध से सम्बद्ध प्रमुख अधिकारी। |
| मुल्ला दो प्याज़ा | लोकप्रिय परम्परा के अनुसार अकबर का बुद्धिमान सलाहकार। नोट: आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार इसके ऐतिहासिक अस्तित्व के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। |
➣ परम्परा के अनुसार गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) (लगभग 380–415 ई.) के दरबार में भी नवरत्न थे। इनमें कालिदास, वराहमिहिर, अमरसिंह, धन्वंतरि, क्षपणक, वररुचि, घटकर्पर, शंकु तथा वेतालभट्ट के नाम प्रमुख रूप से लिए जाते हैं।
➣ हालाँकि आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार इन सभी विद्वानों का एक ही समय में चन्द्रगुप्त द्वितीय के दरबार में होना निश्चित रूप से सिद्ध नहीं है; इसे मुख्यतः परम्परागत मान्यता माना जाता है।
परीक्षोपयोगी तथ्य
➣ अकबर के शासनकाल को हिन्दी एवं फ़ारसी साहित्य के उत्कर्ष का काल माना जाता है। उसके संरक्षण में विभिन्न भाषाओं एवं धर्मों के विद्वानों को समान रूप से सम्मान प्राप्त हुआ।
➣ अकबर द्वारा स्थापित अनुवाद विभाग (मकतबखाना) मध्यकालीन भारत का पहला संगठित राजकीय अनुवाद केन्द्र माना जाता है, जहाँ अनेक संस्कृत ग्रन्थों का फ़ारसी में अनुवाद कराया गया।
➣ महाभारत का फ़ारसी अनुवाद रज़्मनामा अकबर की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक परियोजना थी।
➣ अकबर के दरबार में अबुल फ़ज़ल, फ़ैज़ी, अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना, मुहम्मद हुसैन ‘ज़री कलम’, हरिविजय सूरी तथा जिनचन्द्र सूरी जैसे विद्वानों ने साहित्य एवं संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
➣ अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना हिन्दी और फ़ारसी दोनों भाषाओं के महान विद्वान थे। उनके हिन्दी दोहे आज भी अत्यन्त लोकप्रिय हैं।
➣ अकबर की साहित्यिक नीति का मुख्य उद्देश्य भारतीय एवं इस्लामी सांस्कृतिक परम्पराओं में समन्वय स्थापित करना तथा विभिन्न धर्मों के ग्रन्थों को एक-दूसरे के लिए सुलभ बनाना था।
➣ अनुवाद विभाग (मकतबखाना) की स्थापना – अकबर
➣ अकबर का राजकवि – फ़ैज़ी
➣ अकबर का प्रमुख इतिहासकार – अबुल फ़ज़ल
➣ महाभारत का फ़ारसी अनुवाद – रज़्मनामा
➣ ‘ज़री कलम’ की उपाधि – मुहम्मद हुसैन
➣ ‘जगद्गुरु’ की उपाधि – हरिविजय सूरी
➣ ‘युगप्रधान’ की उपाधि – जिनचन्द्र सूरी
अकबरकालीन स्थापत्य कला
➣ अकबर के शासनकाल में मुगल स्थापत्य कला का वास्तविक विकास प्रारम्भ हुआ। उसकी इमारतों में भारतीय (विशेषकर राजपूत) एवं फ़ारसी स्थापत्य शैली का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। अकबर ने अनेक दुर्ग, महल, मस्जिदें तथा प्रशासनिक भवनों का निर्माण कराया, जिनमें निम्नलिखित प्रमुख हैं।
| स्मारक / इमारत | स्थान | विशेषता |
|---|---|---|
| फतेहपुर सीकरी | आगरा (उ.प्र.) | अकबर की नई राजधानी; मुगल स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण। |
| बुलंद दरवाज़ा | फतेहपुर सीकरी | गुजरात विजय की स्मृति में निर्मित भव्य प्रवेश द्वार। |
| आगरा का लाल किला | आगरा | अकबर द्वारा लाल बलुआ पत्थर से निर्मित दुर्ग। |
| इलाहाबाद का किला | प्रयागराज | गंगा-यमुना संगम पर निर्मित सामरिक दुर्ग। |
| लाहौर का किला | लाहौर | अकबर द्वारा विस्तारित एवं सुदृढ़ किया गया। |
| अकबर का मकबरा | सिकंदरा (आगरा) | योजना अकबर की; निर्माण जहाँगीर ने पूरा कराया। |
| हुमायूँ का मकबरा | दिल्ली | निर्माण अकबर के शासनकाल में पूर्ण हुआ। |
➣ अकबरकालीन स्थापत्य की सबसे प्रमुख विशेषता हिन्दू एवं इस्लामी स्थापत्य शैलियों का समन्वय तथा लाल बलुआ पत्थर का व्यापक प्रयोग था।
समकालीन विदेशी शासक
➣ अकबर (1556–1605 ई.) के शासनकाल में विश्व के अनेक शक्तिशाली शासक शासन कर रहे थे। प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से उनके प्रमुख समकालीन शासक निम्नलिखित हैं।
➣ इंग्लैंड में रानी एलिजाबेथ प्रथम (1558–1603 ई.) अकबर की समकालीन थीं। उनके शासनकाल को इंग्लैंड का स्वर्ण युग (Elizabethan Age) कहा जाता है।
➣ 31 दिसंबर 1600 ई. को ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना इंग्लैंड की रानी एलिजाबेथ प्रथम द्वारा प्रदत्त शाही चार्टर के माध्यम से हुई। उस समय भारत में अकबर (1556–1605 ई.) का शासन था।
➣ स्पेन में फिलिप द्वितीय (1556–1598 ई.) अकबर का समकालीन शासक था। उसके शासनकाल में स्पेन यूरोप की सबसे शक्तिशाली साम्राज्यवादी शक्ति बन गया।
➣ उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य में सुलेमान महान (1520–1566 ई.) तथा उसके बाद सेलिम द्वितीय (1566–1574 ई.) और मुराद तृतीय (1574–1595 ई.) अकबर के समकालीन शासक थे।
➣ ईरान (सफ़वीद साम्राज्य) में शाह तहमास्प प्रथम (1524–1576 ई.), इस्माइल द्वितीय (1576–1577 ई.), मोहम्मद खुदाबंदा (1578–1587 ई.) तथा शाह अब्बास प्रथम (1588–1629 ई.) अकबर के समकालीन शासक थे।
➣ पुर्तगाल में सेबास्टियन प्रथम (1557–1578 ई.) तथा फिलिप प्रथम (1581–1598 ई.) अकबर के समकालीन शासक थे। इसी काल में भारत में पुर्तगालियों का प्रभाव गोवा सहित पश्चिमी तट पर बना रहा।
➣ अकबर के शासनकाल में मुग़ल साम्राज्य, उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य, सफ़वीद साम्राज्य तथा स्पेन विश्व की प्रमुख राजनीतिक शक्तियों में गिने जाते थे।
➣ ध्यान रहे कि प्रशा के फ्रेडरिक महान (1712–1786 ई.) और अकबर (1542–1605 ई.) समकालीन नहीं थे। अतः केवल उनके शासन की प्रकृति की तुलना की जाती है, न कि उनके समकालीन होने की।
अकबर के समकालीन विदेशी शासक
| देश / साम्राज्य | समकालीन शासक | शासनकाल |
|---|---|---|
| इंग्लैंड | रानी एलिजाबेथ प्रथम | 1558–1603 ई. |
| स्पेन | फिलिप द्वितीय | 1556–1598 ई. |
| उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य | सुलेमान महान, सेलिम द्वितीय, मुराद तृतीय | 1520–1595 ई. |
| सफ़वीद (ईरान) | शाह तहमास्प प्रथम, शाह अब्बास प्रथम | 1524–1629 ई. |
| पुर्तगाल | सेबास्टियन प्रथम, फिलिप प्रथम | 1557–1598 ई. |
अकबर एंव अन्य मुस्लिम शासक
➣ मध्यकालीन उत्तर-भारत में मुस्लिम साम्राज्यों को दो भागों में बांटा जा सकता है पहला दिल्ली सल्तनत (तुर्की +अफगान), दूसरा मुग़ल वंश।
➣ अकबर को ही केवल उदार शासक एंव धर्म निरपेक्ष शासक कहना पूर्णत: गलत होगा। दिल्ली तख़्त पर बैठ चुके कई मुस्लिम शासकों ने पहले इस नीति को अपनाया था। यद्दपि उनकी यह नीति पूरी तरह से क्रियान्वित नहीं हो पायी।
➣ क्योंकि सल्तनत कालीन प्रशासन में उलेमाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी। इस्लामी कानूनों की व्याख्या उलेमा करते थे एवं इनका पालन राजा और जनता दोनों के लिए ही आवश्यक था।
➣ दिल्ली के सुल्तान अपने आपको खलीफा का नायब (सहयोगी) ही मानते थे। समस्त इस्लामी राज्य का सांविधानिक प्रधान खलीफा ही माना जाता था।
➣ कालांतर में दिल्ली सल्तनत के तुर्क सुल्तानों ने ख़लीफ़ा को नाममात्र का ही प्रधान माना और अधिकांश शासकों ने उलेमा वर्ग के प्रभाव को कम किया।
➣ हिन्दु जनता के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाया गया एंव अपनी शासन व्यवस्था में धर्म निरपेक्ष नीति का अनुसरण भी किया।
➣ जलालुद्दीन फ़िरोज ख़िलजी ने हिन्दू जनता के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाया, शेरशाह सूरी ने अपने शासनकाल में कई सरायों का निर्माण किया था जिसमे उसने हिन्दू एंव मुस्लिमों के लिए अलग-अलग उचित व्यवस्था की थी।
➣ इब्नबतूता ने इल्तुतमिश को न्यायप्रिय शासक कहा है, हेनरी इलिएट और एलफिन्सटन ने फ़िरोज़ तुग़लक़ को प्रशासनिक उपलब्धियों के कारण “सल्तनत युग का अकबर” कहा है।
➣ अफगान शासक बहलोल लोदी धार्मिक रूप से सहिष्णु था। उसके सरदारों में कई प्रतिष्ठित सरदार हिन्दू थे। इनमें रायप्रताप सिंह, रायकरन सिंह, रायनर सिंह, राय त्रिलोकचकचन्द्र और राय दांदू प्रमुख हैं।
➣ यद्दपि इन्होने जजिया कर नहीं हटाया था। यहाँ तक कि फ़िरोज़ तुग़लक़ ने पहली बार ब्राम्हणों पर भी जजिया कर लगा दिया था लेकिन साथ ही मुस्लिम जनता से जकात कर भी वसूला जाता था।
➣ अकबर ने अपनी कूटनीति का प्रयोग कर राजपूतों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किया। इन वैवाहिक संबंधो को बिना किसी शर्त के अधीन रखा गया। स्त्रियों को अपने धर्म की स्वतंत्रता प्राप्त थी।
➣ स्त्रियों के सम्बन्धियों को उच्च पद प्राप्त हुए। उन्हें उचित सम्मान दिया गया। जिसने भारत में मुग़ल वंश की नींव को मजबूत करने में सहायता की।
➣ अकबर की अध्यात्मिक रूचि भी इसका एक विशेष कारण था उसने इबादतखाने सभी धर्मों के लिया खोला था जिसमे जैन, हिन्दू, ईसाई धर्मों के उपदेशक भी थे। मुग़ल वंश का स्थिरीकरण का श्रेय अकबर को ही दिया जाता है।
➣ इस प्रकार मुग़ल वंश भारत का पहला और अंतिम मुस्लिम साम्राज्य था जिसने सबसे शक्तिशाली साम्राज्य को बनाया।
➣ ऐसी साम्राज्य की नींव स्थापित करने के कारण अकबर को मध्यकालीन इतिहास में अन्य शासकों से अधिक ख्याति प्राप्त हुई और उसकी इन उपलब्धियों के कारण उसे अकबर महान कहकर संबोधित किया गया है।
➣ उत्तराधिकारी जहाँगीर शराबी प्रवृति का था। वह अयोग्ग्य साबित हुआ। उसके समय शासनकाल का कार्यभार उसकी पत्नी नूरजहां के हाथो में था।
➣ संभवत: अकबर ने मुग़ल वंश की नींव को इतना मजबूत किया था कि जहाँगीर के शासनकाल में साम्राज्य को कुछ ज्यादा नुकसान नहीं हुआ।
➣ जहाँगीर एंव शाहजहाँ दोनों ने अकबर की नीति का अनुसरण किया जबकि औरंगजेब कट्टर मुस्लिम था उसके शासनकाल में हिन्दू मंदिरों का तोडा गया। साथ ही जजिया कर को पुन: लागू कर दिया गया। साथ ही गौ-वध कुलेआम हुआ।
भारत के महान शासक
❑ भारतीय इतिहास में तीन शासकों को महान कहकर संबोधित किया गया है –
(i) सिकंदर महान (विश्व विजेता, अपराजित योद्धा)
(ii)चक्रवती सम्राट अशोक महान (अहिंसा नीति)
(iii)अकबर महान (धर्म निरपेक्ष नीति)
❑ सिकंदर विश्व विजेता के उद्देश्य से लगभग 29 वर्ष की आयु में 335 ई.पू . के आसपास विश्वे विजयी अभियान पर निकला था। इस विजय अभियान में उसने कई साम्राज्यों को अपने अधीन किया।
❑ उसकी यह विजय यात्रा 326 ई.पू. भारत में रूक गयी। जब उसके सैनकों ने सिंध नदी से आगे बढ़ने से मना कर दिया। इस समय उसने पंजाब तक कई राज्यों को जीत लिया था।
❑ फलत: भारत वह वापस स्वदेश चला गया और 33 वर्ष की अवस्था में 323 ई.पू. में उसकी मृत्यु हो गयी।
❑ उल्लेखनीय है जिस समय सिकंदर का भारत पर आक्रमण हुआ था उस समय मगध पर धनान्द (नन्द वंश) का शासन था जिसका अंत चन्द्रगुप्त मौर्य (मौर्य वंश ) ने किया था।
❑ सम्राट अशोक इकलौता भारतीय शासक था जिसने दुनिया को जीयो और जीनो दो का सन्देश दिया उसने शास्त्र त्याग कर अहिंसा की नीति अपनाई।
❑ अशोक ने अपने जीवनकाल में मात्र एक कलिंग का युद्ध ( (361ई.पू. ) लड़ा इस युद्ध में हुए नरसंहार के पश्चात वह शेव धर्मावलम्बी त्यागकर बौद्ध मतानुयायी हो गया। उसके समय बौद्ध धर्म अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया था।
❑ उसने धम्म यात्रा शुरू करवाई। उसके धम्म में अहिंसा, बड़ों का सम्मान, पशु वध पर रोक, सभी सम्प्रदायों में सहिष्णुता,खीले उत्सवों एवं कर्मकांडों पर रोक, ब्राह्मणों एवं श्रमणों के प्रति उदारता आदि शामिल थे।
❑ अशोक को चक्रवती सम्राट भी कहा गया है। चाणक्य के अनुसार, हिमालय से लेकर समुद्र तक हजार योजन विस्तार वाला भू-भाग चक्रवर्ती राजा का शासन होता है। भरत, भारत के पहले चक्रवर्ती सम्राट थे।
❑ अकबर एक मुस्लिम शासक था। मध्यकालीन भारत में जहाँ मुस्लिम साम्राज्य का प्रशासन कुरान एंव उलेमा वर्ग के अनुसार चलता था वहीँ अकबर ने धर्म निरपेक्ष नीति को अपने साम्राज्य का आधार बनाया
❑ अकबर ने कूटनीति का प्रयोग कर राजपूतों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये। यह पहला मुस्लिम शासक था जिसने अपनी हिन्दू बेगमों को धर्म की स्वतंत्रता दे रखी थी और गौ-हत्या पर प्रतिबन्ध था।
❑ उसका साम्राज्य मध्यकालीन भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली साम्राज्य था। उसकी मृत्यु के पश्चात भी जहाँगीर जैसे अयोग्य उत्तराधिकारी के समय साम्राज्य को नुकसान नहीं हुआ।
❑ अपने मेवाड़ अभियान में चितोड़ का किला जीतने के बाद अकबर ने किले में कत्लेआम कराया था जो अकबर के जीवन पर एक कलंक है। यह पहला व आखिरी अवसर था जब अकबर ने निर्दोष नागरिकों की हत्या करवाई थी।
➣ महाराणा प्रताप द्वारा अन्य राजपूत रियासतों की सहायता के बिना अकेले ही शक्तिशाली मुग़ल साम्राज्य का विरोध, राजपूती वीरता और सिद्धांतों के लिए बलिदान देने की गौरव गाथा है।
अकबर के शासनकाल की प्रमुख घटनाएँ (1556–1605 ई.)
| वर्ष | प्रमुख घटना |
|---|---|
| 1556 ई. | 14 फरवरी को कलानौर में राज्याभिषेक; 5 नवम्बर को द्वितीय पानीपत के युद्ध में हेमू पर विजय। |
| 1560 ई. | बैरम ख़ाँ को पदच्युत कर स्वयं शासन की बागडोर संभाली। |
| 1561 ई. | मालवा विजय; बाज बहादुर पर विजय। |
| 1562 ई. | आमेर के राजवंश से वैवाहिक सम्बन्ध; युद्धबंदियों को दास बनाने की प्रथा समाप्त। |
| 1563 ई. | तीर्थयात्रा कर समाप्त किया। |
| 1564 ई. | जज़िया कर समाप्त किया; गोंडवाना विजय। |
| 1568 ई. | चित्तौड़गढ़ पर विजय। |
| 1569 ई. | रणथम्भौर विजय; शहज़ादा सलीम (जहाँगीर) का जन्म। |
| 1571 ई. | फ़तेहपुर सीकरी को नई राजधानी बनाया। |
| 1572–1573 ई. | गुजरात विजय। |
| 1575 ई. | इबादतखाना की स्थापना। |
| 1576 ई. | हल्दीघाटी का युद्ध; महाराणा प्रताप एवं मानसिंह आमने-सामने हुए। |
| 1579 ई. | महज़रनामा जारी किया। |
| 1580 ई. | दहसाला (ज़ब्त) भू-राजस्व व्यवस्था लागू; सूबों का पुनर्गठन। |
| 1581 ई. | काबुल पर पुनः अधिकार। |
| 1582 ई. | दीन-ए-इलाही की स्थापना। |
| 1586 ई. | कश्मीर मुगल साम्राज्य में सम्मिलित। |
| 1591 ई. | सिंध पर अधिकार। |
| 1592 ई. | उड़ीसा विजय। |
| 1595 ई. | कंधार पर पुनः अधिकार। |
| 1596 ई. | अहमदनगर पर प्रथम मुगल अभियान। |
| 1599 ई. | शहज़ादा सलीम का विद्रोह। |
| 1601 ई. | असीरगढ़ विजय; खानदेश का मुगल साम्राज्य में विलय। |
| 1602 ई. | अबुल फ़ज़ल की वीरसिंह बुन्देला द्वारा हत्या। |
| 1605 ई. | 27 अक्टूबर को अकबर की मृत्यु; सिकंदरा (आगरा) में दफनाया गया। |
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