➣ अरब आक्रमण के बाद भारतीय प्रायद्वीप एक लंबे समयांतराल तक विदेशी आक्रमणों से सुरक्षित रहा, लेकिन 1000 ई. के आसपास भारत में एक बार पुनः विकेंद्रीकरण और विभाजन की स्थितियाँ सक्रिय हो उठीं।
➣ परिणामतः इस बार तुकों ने भारत पर आक्रमण किया इसमें प्रसिद्ध आक्रमणकारी महमूद गज़नवी था जिसके नेतृत्व में भारत पर कुल 17 बार आक्रमण हुए।
➣ भारत में मुस्लिम शासन की स्थापना का श्रेय अरबों की अपेक्षा तुकों को दिया जाता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि अरबों का प्रारंभ किया गया कार्य तुर्कों ने पूरा किया।
अरबी भारत पर आक्रमण करने वाले पहले मुस्लिम आक्रमणकारी थे लेकिन अरबों के बजाय तुर्कों के आक्रमण ज्यादा प्रभावशाली रहे। तुर्की आक्रमणकारियों ने ही भारत में मुस्लिम वंश की स्थापना की थी।
➣ तुर्क, चीन की उत्तरी-पश्चिमी सीमाओं पर निवास करने वाली एक लड़ाकू एवं बर्बर जाति थी।
➣ तुर्क, उमैय्यावंशी शासकों के संपर्क में आने के बाद इस्लाम धर्म के संपर्क में आए। कालांतर में उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। उनका उद्देश्य एक विशाल मुस्लिम साम्राज्य स्थापित करना था।
गजनी/यामिनी वंश
अलप्तगीन
➣ यामिनी वंश का संस्थापक अलप्तगीन था।
➣ अलप्तगीन के सामानी वंश के शासक अब्दुल मलिक (954-961 ई.) का तुर्क दास था बाद में उसकी योग्यता और दूरदर्शिता के कारण 956 ई. में उसे खुरासान का गवर्नर नियुक्त किया गया।
➣ लगभग 961 ई. में अब्दुल मलिक की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के संघर्ष (अब्दुल मलिक के भाई और चाचा) में अलप्तगीन ने उसके चाचा की सहायता की, परंतु अब्दुल मलिक का भाई मंसूर सिंहासन पाने में सफल रहा।
➣ अलप्तगीन इन परिस्थितियों में अपने लगभग 800 वफादार सैनिकों के साथ अफगान प्रदेश के गज़नी नगर में बस गया और यहाँ स्वतंत्र गजनवी वंश की स्थापना की।
➣ अलप्तगीन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र इस्हाक और उसके बाद बलक्तगीन गद्दी पर बैठा। बलक्तगीन की मृत्यु के बाद पीराई ने गज़नी पर अधिकार कर लियाकी।
➣ पीराई एक अयोग्य शासक साबित हुआ, जिसे हटाकर सुबुक्तगीन गद्दी पर बैठा।
सुबुक्तगीन (977-997ई.)
➣ सुवुक्तगीन प्रारंभ में अलप्तगीन का गुलाम था। गुलाम की प्रतिभा से प्रभावित होकर उसने उसे अपना दामाद बना लिया और अमीर-उल-उमरा की उपाधि से सम्मानित किया।
➣ सुबुक्तगीन एक योग्य तथा महत्त्वाकांक्षी शासक सिद्ध हुआ। उसने अपनी शक्ति को बढ़ाया और साथ ही राज्य का विस्तार भी शुरू कर दिया।
सुबुक्तगीन (महमूद गजनवी का पिता) प्रथम मुस्लिम तुर्क शासक था, जिसने भारत पर आक्रमण किया।
➣ सुबुक्तगीन ने भारत पर विजय के उद्देश्य से 986 ई. में हिन्दूशाही वंश के राजा जयपाल के राज्य पर आक्रमण किया तथा उसे पराजित किया।
➣ इस युद्ध में जयपाल की सेना को भारी क्षति उठानी पड़ी, फलतः उसको संधि करने के लिए विवश होना पड़ा और सुबक्तगीन भारत के पश्चिमोत्तर सीमा के कुछ भाग देने पड़े।
➣ सुबुक्तगीन के दो पुत्र कासिम महमूद (जेष्ठ पुत्र) व इस्माइल (कनिष्ठ पुत्र) थे।
➣ 997 में सुबुक्तगीन की मृत्यु हो गयी। उसके निधन के बाद उसका छोटा पुत्र इस्माईल ग़ज़नी की गद्दी पर बैठा।
➣ सुबुक्तगीन ने अपना उत्तराधिकारी अपने प्रिय पुत्र इस्माईल को बनाया परन्तु महमूद ने इस्माईल को हटाकर गद्दी पर अपना अधिकार कर लिया।
महमूद गजनवी (998-1030 ई.)
➣ सुबुक्तगीन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र महमूद गजनवी उसके विशाल और सुगठित साम्राज्य का सुल्तान बना। जिसने 27 वर्ष की आयु में गद्दी संभाली और 1030ई. तक शासन किया।
➣ महमूद गजनवी का जन्म 971 ई. में हुआ था। गद्दी पर बैठने से पूर्व खुरासन का शासक था।
➣ यह सुल्तान की उपाधि धारण करने वाला पहला तुर्क शासक था। इतिहासकारों ने मुस्लिम इतिहास में महमूद गजनवी को सर्वप्रथम सुल्तान माना है। यद्यपि उसके सिक्कों पर सिर्फ अमीर महमूद अंकित किया गया है।
➣ बगदाद के खलीफा अल-आदिर बिल्लाह ने महमूद गजनवी को अमीन-उल-मिल्लत या मुस्लिमों का संरक्षक और यमीन-उद्-दौला की उपाधि दी।
➣ सुबुक्तगीन की विजयों से उत्साहित होकर महमूद गजनवी ने 1009 ई. से 1027 ई. तक भारत पर 17 बार आक्रमण किया। उसके इस आक्रमण का उल्लेख विद्वान हेनरी इलिएट ने किया है।
भारत पर आक्रमण
➣ महमूद ने 1001 से 1027 ई. तक भारत पर 17 बार हमला किया। उसके आक्रमणों का उद्देश्य केवल धन लूटना था, न कि भारत में स्थायी मुस्लिम शासन की स्थापना करना।
➣ महमूद के दरबारी इतिहासकार उत्बी ने उसके आक्रमणों को जिहाद माना है। जिसका मूल उद्देश्य इस्लाम का प्रसार और बुतपरश्ती (मूर्ति पूजा) को समाप्त करना था।
➣ गजनवी ने खैबर दर्रे को पार कर भारत पर आक्रमण किया था।
➣ 1000 ई.- गजनवी ने पहला आक्रमण भारत के समीपवर्ती नगरों पर किया, पर यहां उसे कोई विशेष सफलता नहीं मिली।
➣ 1001-1002 ई.- अपने दूसरे अभियान के तहत सीमांत प्रदेशों के शासक जयपाल के विरुद्ध युद्ध किया। उसकी राजधानी बैहिन्द पर अधिकार कर लिया। जयपाल इस पराजय के अपमान को सहन नहीं कर सका।
➣ जयपाल ने पुत्र आनंदपाल को गद्दी सौंप दी और स्वंय आत्मदाह कर लिया। कालांतर में त्रिलोचनपाल व भीमपाल उत्तराधिकारी हुये।
➣ 1004 ई – गजनवी ने उच्छ के शासक वाजिरा को दण्डित करने के लिए आक्रमण किया। बाद में वाजिरा ने आत्महत्या कर ली।
➣ 1005 ई.- गजनवी ने मुल्तान के शासक अब्दुल फतेह दाउद नामक करमाथी शिया सम्प्रदाय के विरुद्ध आक्रमण किया। इस समय सिन्ध व मुल्तान पर मुस्लिम शासन था। दाऊद को पराजित कर उसे अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया।
➣ 1007 ई.- गजनवी ने पंजाब के ओहिन्द पर जयपाल के पौत्र सुखपाल को नियुक्त किया था। सुखपाल ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया और उसे नौशाशाह कहा जाने लगा। बाद में सुखपाल ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। गजनवी ने ओहिन्द पर आक्रमण किया और नौशाशाह को बन्दी बना लिया।
➣ 1008 ई.- अपने छठे अभियान में उसने आनन्दपाल को पराजित किया। ये पंजाब पर दूसरी बार आक्रमण था, जिसमें पंजाब के शासक आनन्दपाल को छाछ के युद्ध में वैहन्द के मैदान में पराजित किया। इस युद्ध में प्रतिहार शासक राज्यपाल व चन्देल शासक गण्ड ने आनन्दपाल की मदद के लिए सेनायें भेजी।
➣ बाद में कांगड़ी पहाड़ी में स्थित नगरकोट पर आक्रमण किया। इस आक्रमण में उसको अपार धन की प्राप्ति हुई।
➣ पंजाब में महमूद ने प्रत्यक्ष शासन स्थापित करने का निर्णय लिया था। जिससे दूर स्थित प्रान्तों की विजय के लिए भारत में सैनिक की आवश्यकता पूरी हो सके।
➣ 1009 ई.- 7वाँ आक्रमण नारायपुर (अलवर) पर किया । फरिश्ता के अनुसार अजमेर, दिल्ली, उज्जैन, ग्वालियर, कालिन्जर, कन्नौज के शासकों ने आनन्दपाल की मदद की।
➣ 1010 ई.- गजनवी का आठवां आक्रमण मुल्तान पर था। वहां के शासक पुन: दाऊद को पराजित कर उसने मुल्तान के शासन को सदा के लिए अपने अधीन कर लिया।
➣ 1013 ई.- अपने नवे अभियान के तहत गजनवी ने थानेश्वर पर आक्रमण किया। उस समय शासक राजाराम थे।
➣ 1013 ई.- गजनवी ने अपना दसवां आक्रमण नन्दशाह पर किया। हिन्दूशाही शासक आनन्दपाल ने नन्दशाह को अपनी नयी राजधानी बनाया। वहां का शासक त्रिलोचनपाल था। त्रिलोचनपाल ने वहां से भागकर कश्मीर में शरण लिया। तुर्कों ने नन्दशाह में लूटपाट की।
➣ 1015 ई.- गजनवी का यह आक्रमण त्रिलोचनपाल के पुत्र भीमपाल के विरुद्ध था, जो कश्मीर पर शासन कर रहा था। युद्ध में भीमपाल पराजित हुआ।
➣ 1018 ई.- गजनवी ने कन्नौज पर आक्रमण किया। उसने बुलंदशहर के शासक हरदत्त को पराजित किया। 1019 ई. में उसने पुनः कन्नौज पर आक्रमण किया।
➣ वहां के शासक राज्यपाल ने बिना युद्ध किए ही आत्मसमर्पण कर दिया। कालांतर में इस आत्मसमर्पण के कारण चंदेल शासक विद्याधर ने राज्यपाल की हत्या कर दी।
➣ मार्ग में बरन (बुलंदशहर) के राजा हरदत्त ने आत्मसमर्पण किया तथा मथुरा का शासक कुलचंद युद्धभूमि में मारा गया। महमूद ने मथुरा तथा निकटवर्ती क्षेत्रों के लगभग 1000 मंदिरों में लूटपाट करके नष्ट कर दिया।
➣ 1019-20 ई. – महमूद गजनवी का चंदेलों पर प्रथम आक्रमण 1019-20 ई. में हुआ। उस समय चंदेल वंश का शासक विद्याधर (1019-1029) था, जो अपने वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। यह अकेला ऐसा हिंदू शासक था, जिसने मुसलमानों का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया।
➣ विद्याधर ने राजाओं का एक संघ बनाया था, जिसमें कन्नौज का प्रतिहार त्रिलोचनपाल एवं हिन्दूशाही त्रिलोचनपाल शामिल थे।
➣ 1920 ई. के आक्रमण में गजनवी ने बारी, बुंदेलखण्ड, किरात तथा लोहकोट आदि को जीत लिया।
➣ 1021 ई- अपने चौदहवें आक्रमण के दौरान महमूद गजनवी ने ग्वालियर तथा कालिंजर पर आक्रमण किया। कालिंजर के शासक गण्ड चंदेल ने विवश होकर संधि करली।
➣ 1021-22 में महमूद ने ग्वालियर के राजा कीर्तिराज को संधि के लिये विवश किया एवं कालिंजर के किले पर घेरा डाल दिया लेकिन जीत नहीं पाया। तत्पश्चात् विद्याधर के साथ महमूद ने संधि कर ली और विद्याधर को 15 किले उपहारस्वरूप दिये।
➣ 1024 ई. इस आक्रमण के तहत महमूद गजनवी ने लोदोर्ग (जैसलमेर), चिकलोदर तथा अन्हिलवाड़ (गुजरात) पर विजय प्राप्त की।
➣ 1025 ई.- इस अभियान में गजनवी ने सोमनाथ को अपना निशाना बनाया। उसके सभी अभियानों में यह अभियान सर्वाधिक महत्वपूर्ण था। सोमनाथ मंदिर पर विजय प्राप्त करने के बाद उसने वहां के प्रसिद्ध मंदिरों को तोड़ दिया तथा अपार धन प्राप्त किया।
➣ उस समय गुजरात का शासक भीम प्रथम शासक था। इस मंदिर को लूटते समय गजनवी ने करीब 50,000 ब्राह्मणों एवं हिन्दुओं का क़त्ल कर दिया।
➣ 1027 ई- यह महमूद गजनवी का अंतिम आक्रमण था। यह आक्रमण सिंध और मुल्तान के तटवर्ती क्षेत्रों के जाटों के विरुद्ध था। इसमें जाट पराजित हुए।
➣ महमूद गजनवी अपने अंतिम काल में असाध्य रोगों से पीड़ित हो गया । उसकी मृत्यु 30 अप्रैल 1030 ई.को गजनी में हुई।
| वर्ष | आक्रमण / स्थान |
|---|---|
| 1000–01 ई. | हिन्दुशाही राज्य की सीमावर्ती चौकियों पर प्रथम आक्रमण |
| 1001–02 ई. | हिन्दुशाही शासक जयपाल के विरुद्ध पेशावर क्षेत्र में आक्रमण |
| 1004 ई. | उच्छ (उच्छ) के शासक वाजिरा पर आक्रमण |
| 1005 ई. | मुल्तान पर आक्रमण तथा वहाँ के शासक को पराजित किया |
| 1007 ई. | औहिंद (पंजाब) पर आक्रमण |
| 1008 ई. | आनंदपाल के नेतृत्व वाले राजपूत संघ को पराजित कर पंजाब एवं नगरकोट पर अधिकार |
| 1009 ई. | नारायणपुर (वर्तमान अलवर क्षेत्र) पर आक्रमण |
| 1010 ई. | मुल्तान में विद्रोह का दमन |
| 1011 ई. | थानेश्वर के प्रसिद्ध चक्रस्वामी मंदिर पर आक्रमण |
| 1013 ई. | हिन्दुशाही राज्य पर पुनः आक्रमण एवं त्रिलोचनपाल को पराजित किया |
| 1015 ई. | कश्मीर पर आक्रमण, किन्तु सफलता प्राप्त नहीं हुई |
| 1018 ई. | मथुरा एवं कन्नौज के समृद्ध नगरों पर आक्रमण और लूट |
| 1019–20 ई. | बुंदेलखंड क्षेत्र पर आक्रमण |
| 1021 ई. | ग्वालियर एवं कालिंजर के शासकों को अधीनता स्वीकार करने पर विवश किया |
| 1024 ई. | अन्हिलवाड़ा (गुजरात) एवं लोद्रवा (जैसलमेर) की ओर अभियान |
| 1025 ई. | सोमनाथ मंदिर पर प्रसिद्ध आक्रमण और व्यापक लूट |
| 1027 ई. | सिंध के जाटों के विरुद्ध अंतिम अभियान |
➣ गजनवी हर बार गर्मियों में आक्रमण करता था और मानसून से पहले वापस लौट जाता था
➣ महमूद विद्वानों और कलाकारों का संरक्षक था। महान भवन निर्माताओं, कवियों और कलाकारों से उसका दरबार भरा रहता था। उसने अपने समय के महान विद्वानों को गजनी में एकत्रित किया था।
➣ उसका दरबारी इतिहासकार उत्बी था। उसने किताब-उल-यामिनी अथवा तारीख-ए-यामिनी नामक ग्रंथ की रचना की।
➣ इसके अतिरिक्त उसके दरबार में दर्शन, ज्योतिष और संस्कृत का उच्चकोटि का विद्वान अलबरूनी, ‘तारीख-ए-सुबुक्तगीन का लेखक बैहाकी, जिसे इतिहासकार लेनपूल ने पूर्वी पेप्स की उपाधि दी थी, फारस का कवि उजारी, खुरासानी विद्वान तुसी एवं उन्सुरी, विद्वान अस्जदी और फार्रुखी प्रमुख व्यक्ति थे।
➣ शाहनामा का लेखक फिरदौसी है। यह महमूद गजनवी के दरबार का प्रसिद्ध विद्वान कवि था। इसे पूर्व के होमर की उपाधि दी जाती है।
➣ फरिश्ता (1560-1620 ई.) ने तारीख-ए-फरिश्ता या गुलशन-ए-इब्राहिमी नामक किताब लिखी है। इसका पूरा नाम मुहम्मद कासिम हिंदू शाह था। इसकी किताब तारीख-ए-फरिश्ता बीजापुर के शासक इब्राहिम आदिल शाह को समर्पित थी।
➣ महमूद गजनी के साथ प्रसिद्ध इतिहासकार अलबरूनी 11वीं सदी में भारत आया था। उसकी पुस्तक किताब-उल-हिंद से तत्कालीन भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति की जानकारी मिलती है।
पुराणों का अध्ययन करने वाला प्रथम मुसलमान अलबरूनी था।
➣ महमूद गजनवी द्वारा जारी चांदी के सिक्कों के दोनों तरफ दो अलग-अलग भाषाओं में मुद्रालेख अंकित थे। ऊपरी भाग पर अंकित मुद्रालेख अरबी भाषा में था तथा दूसरी तरफ अंकित लेख संस्कृत भाषा (देवनागरी लिपि) में था। सिक्के के मध्य भाग में संस्कृत भाषा में लिखा था-अवयक्तमेकम मुहम्मद अवतार नुरूपति महमूद।
➣ लेनपूल के अनुसार, महमूद एक महान सेनानी, प्रशंसनीय, साहसी, अविजयी शासक, मानसिक व शारीरिक शक्ति रखने वाला व्यक्ति था। यह भी सत्य है कि महमूद नए शासन अथवा सिद्धांतों का निर्माण करने वाला और दूरदर्शी राजनीतिज्ञ नहीं था।
आक्रमण का भारत पर प्रभाव
➣ महमूद गजनवी के आक्रमण के परिणामस्वरूप उत्तर भारत राजनीतिक दृष्टि से असुरक्षित हो गया।
➣ महमूद के आक्रमण का राजनैतिक प्रभाव यह रहा कि उसने उत्तर-पश्चिम के रक्षक हिंदुशाही वंश को समाप्त कर अन्य आक्रमणकारियों के लिये भारत का मार्ग प्रशस्त किया और केवल पंजाब पर प्रत्यक्ष शासन स्थापित किया।
➣ महमूद के आक्रमणों का सीधा प्रभाव तो भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ा जो पूरी तरह जर्जर हो चुकी थी। महमूद अधिकांश संपत्ति लूटकर ले गया था।
➣ महमूद के आक्रमणों का अंतिम और महत्त्वपूर्ण प्रभाव यह हुआ कि भारत में अनेक हिंदू मुसलमान बन गए और यहाँ इस्लाम धर्म का विस्तार हुआ तथा भारत में मुसलमानों की जड़ें मजबूत हुई।
➣ महमूद व उसके उत्तराधिकारी मसूद ने हिन्दूओं को बड़ी संख्या में रोजगार दिया। इनमें सेवन्दराय और तिलक के नाम प्रमुख हैं जो उच्च पदों पर नियुक्त किये गये।
|
➣ महमूद गजनवी का अतिम आक्रमण 1027 ई. में जाटों के विरुद्ध था। यह आक्रमण एक दंडात्मक कार्यवाही थी। ➣ महमूद ने लाहौर का नाम बदलकर महमूदपुर रखा था। ➣ महमूद गजनवी ने अपने को इस्लाम का विस्तार करने वाला बुत शिकन अर्थात् मूर्तिभंजक के तौर पर पेश किया गया है। ➣ लाहौर में गजनवी वंश का अंतिम शासक खुसरव मलिक था जिसे मुहम्मद गौरी ने कैद कर 1192 ई. में मार दिया। |
सोमनाथ मंदिर
➣ यह एक महत्वपूर्ण हिन्दू मंदिर है जिसकी गणना 12 ज्जोतिलिगों में सर्वप्रथम ज्जोतिर्लिंग के रूप में होती है। यह गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह में प्रभास पटन में स्थित है।
➣ इसका निर्माण स्वयं चन्द्रदेव ने किया था। इसका उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है। यह मंदिर हिंदू धर्म के उत्थान पतन के इतिहास का प्रतीक रहा है।
➣ अत्यंत वैभवशाली होने के कारण इतिहास में कई बार यह मंदिर तोड़ा तथा पुनर्निर्मित किया गया। द्वितीय बार मंदिर का पुनर्निर्माण सदी में वल्लभी के मैत्रक राजाओं ने किया।
➣ 8वीं सदी के सिंध के अरबी गवर्नर जूनायद ने इसे नष्ट करने के लिए अपनी सेना भेजी। प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका तीसरा पुनर्निर्माण किया।
➣ अरब यात्री अलबेरूनी ने अपने यात्रा वृतान्त में इसका विवरण लिखा जिससे प्रभावित हो महमूद गजनवी ने सन 1025 ई. में कुछ 5,000 साथियों के साथ सोमनाथ मंदिर पर हमला किया,
➣ मंदिर की सम्पन्ति लूटी गई और उसे नष्ट कर दिया 50,000 लोग मंदिर के अंदर हाथ जोड़कर पूजा अर्चना कर रहे थे, प्राय: सभी कत्ल कर दिये गये।
➣ इसके बाद गुजरात के राजा भीम और मालवा के राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया। सन 1297 ई. में जब दिल्ली सल्तनत ने गुजरात पर कब्जा किया तो इसे 5वी बार गिराया गया।
➣ मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसे पुनः 1706 ई. में गिरा दिया।
➣ कालांतर में नया मंदिर बनाया गया। इस नए भव्य मंदिर का डिजाइन प्रसिद्ध आर्कीटेक्टर प्रभाशंकर ने तैयार किया था।
➣ इस समय जो मंदिर खड़ा है उसे भारत के गृह मन्त्री सरदार बल्लभ भाई पटेल (लौह पुरूष) ने बनवाया और 1 दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया।
मुहम्मद इब्न अहमद अलबरूनी
➣ अलबरूनी एक प्रसिद्ध फ़ारसी विद्वान, लेखक, वैज्ञानिक, धर्मशास्त्री और चिंतक थे। उन्हें अरबी, फ़ारसी, तुर्की और संस्कृत भाषाओं के साथ-साथ गणित और खगोलशास्त्र की गहरी समझ थी।
➣ संस्कृत भाषा पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि भारतीय विद्वानों ने उन्हें “विद्या सागर” (Ocean of Knowledge) की उपाधि से सम्मानित किया।
➣ उन्होंने प्राकृतिक विज्ञानों — खासकर खगोलशास्त्र, गणित, रसायन शास्त्र और खनिज विज्ञान — में कई महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे। माना जाता है कि उनके नाम कुल मिलाकर 140 से अधिक रचनाएँ दर्ज हैं, हालाँकि इनमें से बहुत-सी आज उपलब्ध नहीं हैं।
➣ उनका वास्तविक नाम अबू रैहान मुहम्मद था, परन्तु वे “अलबेरूनी” नाम से ज़्यादा प्रसिद्ध हुए, जिसका मतलब है “उस्ताद” या “बाहरी क्षेत्र से आया विद्वान”। उन्हें मुनज्जिम के नाम से भी पहचाना जाता था।
➣ अलबरूनी का जन्म सन् 973 ई. में ख़्वारिज़्म क्षेत्र में हुआ, जो उस दौर में तूरान और ईरान पर शासन करने वाले सामानी वंश (874-999) के अधीन था। सन् 1017 ई. में महमूद ग़ज़नवी ने ख़्वारिज़्म पर विजय प्राप्त कर ली।
➣ उनकी असाधारण विद्वत्ता से प्रभावित होकर महमूद ग़ज़नवी ने उन्हें अपने दरबार का राजज्योतिषी नियुक्त किया।
➣ वे सुल्तान महमूद की सेना के साथ भारत आए और लंबे समय तक पंजाब क्षेत्र में निवास करते हुए भारतीय समाज, धर्म और विज्ञान का गहन अध्ययन करते रहे।
➣ भारत से जुड़े विषयों पर उन्होंने लगभग 20 पुस्तकें लिखीं, जिनमें मूल रचनाएँ भी शामिल हैं और अनुवाद कार्य भी।
➣ भगवद्गीता और पुराणों का अध्ययन करने वाले वे संभवतः पहले मुस्लिम विद्वान थे, और मुस्लिम जगत को भगवद्गीता से परिचित कराने का श्रेय भी काफी हद तक उन्हीं को जाता है।
➣ इसके अतिरिक्त उन्होंने भारतीय खगोलशास्त्र, ब्रह्मगुप्त, वराहमिहिर, कपिल के सांख्य दर्शन, पतंजलि, भगवद्गीता, विष्णु पुराण और वायु पुराण जैसे ग्रंथों का बारीकी से अध्ययन किया, और इन सबका तुलनात्मक विवेचन अपनी प्रसिद्ध कृति “किताबुल हिन्द” (जिसे तहक़ीक़ मा लिल-हिन्द भी कहा जाता है) में प्रस्तुत किया।
➣ महमूद ग़ज़नवी के उत्तराधिकारी पुत्र मसूद के शासनकाल में अलबरूनी ने अरबी भाषा में “क़ानून-ए-मसूदी” नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें भारतीय ज्योतिष विद्या का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसका फारसी में अनुवाद बक्र ने किया था।
➣ अलबरूनी भारतीयों द्वारा पवित्र स्थलों पर बनाए गए जल संग्रहण ढाँचों और तालाबों के निर्माण कौशल की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते थे।
कुछ अतिरिक्त रोचक तथ्य
➣ अलबरूनी का निधन लगभग 1048 ई. में ग़ज़नी (वर्तमान अफ़ग़ानिस्तान) में हुआ माना जाता है।
➣ उन्हें अक्सर “भारतविद्या (Indology) के जनक” के रूप में भी याद किया जाता है, क्योंकि उन्होंने सबसे पहले भारतीय संस्कृति, विज्ञान और दर्शन का व्यवस्थित और तटस्थ अध्ययन पश्चिमी जगत के सामने प्रस्तुत किया।
➣ अलबरूनी ने एक पर्वत की ऊँचाई और क्षितिज के कोण की गणना के आधार पर पृथ्वी की त्रिज्या और परिधि का बेहद सटीक अनुमान लगाया था — उनकी गणना आधुनिक मापों के काफी करीब मानी जाती है।
➣ वे केवल खगोलशास्त्री ही नहीं, बल्कि एक कुशल भूगोलवेत्ता भी थे; उन्होंने विभिन्न पदार्थों के विशिष्ट घनत्व (specific gravity) की गणना करने की विधियाँ भी विकसित कीं।
➣ अलबरूनी की लेखन-शैली की विशेषता यह थी कि वे किसी भी विषय पर लिखते समय अपने पूर्वाग्रहों को परे रखकर तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर निष्कर्ष निकालने का प्रयास करते थे — यही गुण उन्हें अपने समय के अन्य लेखकों से अलग बनाता है।
किताब-उल-हिन्द
➣ इस ग्रंथ का पूरा नाम है किताब फ़ी तहक़ीक़ मा लिल हिन्द मिन मक़ूला मक़्बूला फ़िल अक़्ल अव मरज़ूला, हालांकि आम बोलचाल में इसे संक्षेप में किताब-उल-हिन्द कहकर ही पुकारा जाता है।
➣ अलबेरूनी ने अपने जीवनकाल में अनेक रचनाएँ लिखीं, परन्तु यही कृति उनकी सबसे चर्चित और सबसे अधिक उद्धृत रचना मानी जाती है। दक्षिण एशिया के मध्यकालीन इतिहास को समझने के लिए विद्वान आज भी इसे एक बुनियादी स्रोत के रूप में इस्तेमाल करते हैं।
➣ इसी ग्रंथ को तहक़ीक़-ए-हिन्द (भारत की खोज) के नाम से भी जाना जाता है। इसमें अलबेरूनी ने भारतीय समाज — हिन्दुओं के इतिहास, उनके स्वभाव, रहन-सहन, रीति-रिवाज़ और उस दौर के वैज्ञानिक चिंतन — का बहुत बारीकी से विवरण दर्ज किया है।
➣ इस पुस्तक का अंग्रेज़ी अनुवाद जर्मन प्राच्यविद् एडुआर्ड साखाउ (Eduard Sachau) ने किया, जिसे “Alberuni’s India” शीर्षक से प्रकाशित किया गया। बाद के वर्षों में इसका हिन्दी, उर्दू और बंगाली भाषाओं में भी अनुवाद हुआ, जिससे यह कृति भारतीय पाठकों तक भी पहुँच सकी।
➣ ध्यान देने योग्य तथ्य: अलबेरूनी ने यह ग्रंथ मूल रूप से अरबी भाषा में लिखा था, फ़ारसी में नहीं — फ़ारसी अनुवाद बाद के दौर में तैयार हुए।
किताबुल यामिनी (तारीख-ए-यामिनी)
➣ इस ग्रंथ की रचना उतबी ने की थी। इसमें सुबुक्तगीन और उसके पुत्र महमूद ग़ज़नवी के शासनकाल का विवरण सन् 1020 ई. तक मिलता है।
➣ ग्रंथ में महमूद ग़ज़नवी के भारत पर किए गए आक्रमणों का उल्लेख भी मिलता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि उतबी स्वयं कभी महमूद के साथ भारत नहीं आया था, इसलिए यह विवरण प्रत्यक्षदर्शी वृत्तांत नहीं, बल्कि दरबारी सूचनाओं पर आधारित है।
➣ उतबी महमूद ग़ज़नवी के दरबार से जुड़ा हुआ इतिहासकार था, और उसने यह ग्रंथ अत्यंत अलंकृत व काव्यात्मक अरबी शैली में लिखा। इस सजावटी भाषा-शैली के कारण कई आधुनिक इतिहासकार इसमें वर्णित घटनाओं की प्रामाणिकता को सावधानी से परखने की सलाह देते हैं।
ज़ैन-उल-अख़बार
➣ इस ग्रंथ के रचयिता अबू सईद (गर्दीज़ी) हैं। मूल रूप से यह रचना ईरान के इतिहास पर केंद्रित है, लेकिन इसमें महमूद ग़ज़नवी के जीवन और शासनकाल से जुड़ी जानकारी भी मिलती है।
➣ गर्दीज़ी का पूरा नाम अबू सईद अब्दुल हई इब्न ज़ह्हाक गर्दीज़ी था, और उसने यह ग्रंथ फ़ारसी भाषा में लिखा था।
➣ ख़ास बात यह है कि इसमें केवल ईरान का ही नहीं, बल्कि भारत के तत्कालीन रीति-रिवाज़ों और कैलेंडर-पद्धति पर भी एक संक्षिप्त किन्तु मूल्यवान अध्याय शामिल है, जो इसे भारतीय इतिहास के अध्ययन के लिए भी उपयोगी बनाता है।
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