ईस्लाम धर्म का उदय एवं भारत में विस्तार

भारतीय इतिहास मध्यकालीन भारत ईस्लाम धर्म का उदय एवं भारत में विस्तार
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ईस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद

ईस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद थे। इनका जन्म 570 ई. में मक्का (सऊदी अरब) में कुरैश कबीले के बनू हाशिम खानदान में हुआ था। मक्का आज भी मुस्लिमों का सबसे पवित्र तीर्थ स्थल है।

हजरत मुहम्मद के पिता अब्दुल्लाह का निधन जन्म से पहले ही हो गया था, और माता आमिना का निधन जब वे मात्र 6 वर्ष के थे।

उनका पालन-पोषण पहले दादी अब्दुल मुत्तलिब और बाद में चाचा अबू तालिब ने किया। ईमानदारी के कारण मक्कावासियों ने उन्हें अल-अमीन (भरोसेमंद) और अस-सादिक (सच्चे) की उपाधि दी।

25 वर्ष की आयु में उन्होंने हजरत खदीजा (र.अ.) से विवाह किया। खदीजा र.अ. ने ही सबसे पहले उन्हें पैगंबर के रूप में स्वीकार किया और जीवन भर उनका साथ दिया।

पैगंबरी का आरंभ

610 ई. में मक्का के पास जबल-ए-नूर की गार-ए-हीरा में हजरत मुहम्मद को हजरत जिब्रील (अ.स.) के माध्यम से पहला वह्य (ईश्वरीय संदेश) मिला। इस घटना के बाद वे 23 वर्ष तक पैगंबरी का कार्य करते रहे।

पहला वाक्य था: “इक़रा़” (पढ़ो)। इसी दौरान सूरह अल-अलक की आयतें नाज़िल हुईं।

हिजरत और हिजरी संवत्

24 सितंबर 622 ई. को उन्होंने मक्का से मदीना की यात्रा की, जिसे हिजरत कहा जाता है। इस घटना को इस्लामिक कैलेंडर की शुरुआत माना जाता है — हिजरी संवत्

हिजरी वर्ष चांद पर आधारित होता है और इसमें लगभग 354 दिन होते हैं।

ईस्लाम के पांच स्तंभ (अरकान-ए-इस्लाम)

ईस्लाम के पाँच स्तंभ विवरण
कलमा शहादत अल्लाह एक है और मुहम्मद उसके रसूल हैं।
नमाज़ दिन में पांच बार नमाज़ पढ़ना।
रोज़ा रमजान महीने में व्रत रखना।
जकात अपनी संपत्ति का 2.5% गरीबों को देना।
हज जीवन में कम से कम एक बार मक्का में हज करना (जो सामर्थ्य रखता हो)।

खलीफा व्यवस्था और सुन्नी-शिया विभाजन

➣ पैगम्बर मुहम्मद के उत्तराधिकारी को खलीफा कहा जाता है। खलीफा को ही समुदाय का प्रमुख माना जाता है।

➣ हजरत मुहम्मद की मृत्यु 8 जून 632 ई. को मदीना में हुई। उनके बाद खलीफा (उत्तराधिकारी) की व्यवस्था शुरू हुई।

➣ हजरत मुहम्मद की विसाल के बाद इस्लामी जगत में नेतृत्व का प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया। पैगंबर ने कोई स्पष्ट उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं किया था, जिसके कारण सहाबा किराम में खलीफा (उत्तराधिकारी) के चयन को लेकर मतभेद उत्पन्न हो गया।

➣ इस मतभेद ने अंततः ईस्लाम की दो प्रमुख शाखाओंसुन्नी और शिया — के विभाजन की नींव रख दी।

सुन्नी का मानना था कि पैगम्बर मुहम्मद का कोई भी उपयुक्त अनुयायी खलीफा बन सकता है, जबकि शिया मानते थे कि पैगम्बर मोहम्मद का कोई रिश्तेदार ही खलीफा होना चाहिए। उनकी नजर में खलीफा के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति पैगम्बर के दामाद हजरत अली थे। अंततः मदीना में सकीफ़ा-ए-बनी साएदा नामक स्थान पर सहाबा किराम की एक सभा हुई। इस सभा में हजरत अबू बक्र सिद्दीक रज़ि. को बहुमत (शूरा) से पहला खलीफा चुना गया।

➣ शुरुआती 29 वर्षों में चार चुनिंदा खलीफाओं का शासन हुआ, जिन्हें राशिदून खलीफा (सही मार्गदर्शक खलीफा) कहा जाता है। ये चार खलीफा इस्लामी इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

क्रमनामकाल
1हजरत अबू बक्र632–634
2हजरत उमर634–644
3हजरत उस्मान644–656
4हजरत अली656–661

सुन्नी और शिया दृष्टिकोण

➣ दोनों सम्प्रदाय ईस्लाम के मूल सिद्धांतों (तौहीद, रिसालत और कुरान) में एक हैं, लेकिन खलीफा/इमाम के चयन, उत्तराधिकार और शासन व्यवस्था को लेकर उनके दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण अंतर है।

➣ सुन्नी मुसलमान बहुमत, शूरा और सहाबा की सामूहिक सहमति पर जोर देते हैं, जबकि शिया मुसलमान ईश्वरीय नियुक्ति (नस्स) और अहले-बैत की वंशानुगत उत्तराधिकारिता को प्राथमिकता देते हैं।

सुन्नी दृष्टिकोण शिया दृष्टिकोण
हजरत अबू बक्र का चुनाव सकीफा में सहाबा किराम की शूरा (परामर्श) और इज्मा (सहमति) से हुआ, इसलिए पूरी तरह वैध और सही था। पैगंबर ने गदीर-ए-खुम में हजरत अली को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। अबू बक्र का चुनाव गलत और हक छीनने वाला था।
चारों राशिदून खलीफा (अबू बक्र, उमर, उस्मान और अली रज़ि.) सभी वैध खलीफा हैं। केवल हजरत अली और उनकी संतान ही खलीफा/इमाम होने के हकदार थे। पहले तीन खलीफाओं को usurper (हक हड़पने वाले) माना जाता है।
बहुमत और सहाबा की सामूहिक सहमति (इज्मा) शासन के फैसले में निर्णायक है। ईश्वरीय नियुक्ति (नस्स) और वंशानुगत उत्तराधिकार चुनाव से अधिक महत्वपूर्ण है।

➣ हजरत अली रज़ि. को 656 ई. में खलीफा चुना गया। उनके शासनकाल में इस्लामी राज्य में प्रथम फितना (आंतरिक गृहयुद्ध) शुरू हो गया।

➣ उन्होंने न्याय और भ्रष्टाचार के विरुद्ध सख्ती से कार्य किया, लेकिन मुहम्मद के चचेरे भाई और उमैयद परिवार के प्रमुख मुआविया बिन अबी सुफयान (सीरिया के गवर्नर) के साथ गंभीर मतभेद हो गया।

➣ 657 ई. में सिफ़्फ़ीन की लड़ाई हुई, जिसमें दोनों पक्ष आमने-सामने आए। युद्ध के दौरान मुआविया के पक्ष ने कुरान की आयतों को भालों पर लगाकर समझौते की माँग की, जिसके बाद मध्यस्थता (तहकीम) का फैसला हुआ। इस घटना से खारिजी नामक एक नया सम्प्रदाय भी उभरा।

➣ 661 ई. में एक खारिजी ने हजरत अली रज़ि. की शहादत (हत्या) कर दी। उनकी हत्या के बाद उनके प्रतिद्वंद्वी मुआविया ने सीरिया की राजधानी दमिश्क में उमैयद खलीफा की स्थापना कर दी।

उमैयद खलीफाओं ने 661-750 ई. तक शासन किया। उसके बाद अब्बासी खलीफाओं ने उमैयद खलीफाओं को सत्ता से हटाया था।

➣ उमैयद खलीफा के सेनापति मुहम्मद बिन कासिम (712-720 ई.) ने ही भारत (सिंध) पर आक्रमण किया था।

महत्वपूर्ण तथ्य

पवित्र ग्रंथकुरान शरीफ
हदीसपैगंबर के कथन, कार्य और आदतें
प्रथम मस्जिद भारत मेंकोडुंगल्लूर, केरल (629 ई.)
माइकल हार्ट की किताब“The 100” में हजरत मुहम्मद को नंबर 1 स्थान

ईस्लाम धर्म का विस्तार

7वीं शताब्दी में सऊदी अरब में इस्लाम नामक एक नए धर्म का उदय हुआ तथा शीघ्र ही इसका विस्तार उत्तरी अफ्रीका, अरब प्रायद्वीप, ईरान, सीरिया, मिस्र और भारत तक हुआ।

राशिदून खलीफाओं (अबू बक्र, उमर, उस्मान और अली रज़ि.) के समय ईस्लाम का तेज सैन्य विस्तार हुआ। हजरत उमर रज़ि. के शासन में सीरिया, इराक, मिस्र और फारस (ईरान) पर विजय प्राप्त की गई।

उमैयद खलीफा काल (661–750 ई.) में ईस्लाम का विस्तार सबसे अधिक हुआ। उत्तर में स्पेन (अंडलुस) और दक्षिण में समूचा उत्तरी अफ्रीका इस्लामी राज्य में शामिल हो गया।

712 ई. में सेनापति मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध (भारत) पर विजय प्राप्त की, जो भारतीय उपमहाद्वीप में ईस्लाम का पहला बड़ा प्रवेश था।

अब्बासी खलीफा काल (750–1258 ई.) में सैन्य विस्तार कम हुआ, लेकिन सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और व्यापारिक माध्यम से ईस्लाम का प्रसार हुआ। बगदाद ज्ञान का विश्व केंद्र बना। इस काल में ईस्लाम मध्य एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका के अंदरूनी हिस्सों तक पहुंचा।

भारत में ईस्लाम का प्रसार

➣ भारतीय उपमहाद्वीप में ईस्लाम का आगमन ७वीं शताब्दी में हुआ, लेकिन इसका व्यापक प्रसार ८वीं शताब्दी से शुरू होकर कई शताब्दियों तक चला।

➣ यह प्रसार केवल सैन्य विजय के माध्यम से नहीं, बल्कि सूफी संतों के शांतिपूर्ण प्रचार, सामाजिक समानता के संदेश और सांस्कृतिक मिश्रण के कारण हुआ।

➣ आज भारत में मुस्लिम आबादी विश्व की तीसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी है। भारत में ईस्लाम का सबसे प्रारंभिक और शांतिपूर्ण प्रसार दक्षिण भारत (केरल) के व्यापारिक तटों पर हुआ।

➣ परंपरा के अनुसार, चेरा राजा राम वर्मा कुलशेखर (चेरेमन पेरुमाल) के आदेश पर मलिक बिन दीनार ने **629 ई.** में कोडुंगल्लूर (केरल) में चेरेमन जुमा मस्जिद का निर्माण किया।

➣ यह भारत की प्रथम मस्जिद मानी जाती है, जो पैगंबर के जीवनकाल में बनी थी। इस मस्जिद में आज भी प्राचीन तेल का दीपक जलता रहता है और सभी धर्मों के लोग इसमें तेल चढ़ाते हैं।

➣ 712 ई. में उमैयद खलीफा के सेनापति मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध और मुल्तान पर विजय प्राप्त की। यह भारतीय उपमहाद्वीप में ईस्लाम का पहला संगठित प्रवेश था। इस काल में स्थानीय लोगों में धर्मांतरण शुरू हुआ, हालांकि यह सीमित था।

महमूद गजनवी (1001-1027 ई.) ने 17 बार भारत पर आक्रमण किए, जिनमें सोमनाथ मंदिर प्रसिद्ध है। 1192 ई. में मुहम्मद गोरी ने तराइन के दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को हराकर दिल्ली में इस्लामी शासन की नींव रखी।

➣ ईस्लाम का सबसे तेज प्रसार दिल्ली सल्तनत के समय हुआ। गुलाम वंश, खिलजी वंश, तुगलक वंश, सैयद वंश और लोदी वंश के शासकों ने बड़े क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित किया। इस काल में प्रशासनिक पदों पर मुसलमानों की नियुक्ति, मस्जिदों और मदरसों का निर्माण तथा जज़िया प्रथा लागू हुई।

बाबर (1526) के आगमन के साथ मुगल शासन शुरू हुआ। अकबर के शासन में धार्मिक सहिष्णुता (दीन-ए-इलाही, सुलेह-ए-कुल) के कारण बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक मिश्रण हुआ।

औरंगजेब के समय शरिया कानून पर अधिक जोर दिया गया। मुगलों ने पूरे उत्तर भारत, बंगाल, दक्कन और कश्मीर तक ईस्लाम को फैलाया।

➣ ईस्लाम के प्रसार में सूफी संतों का योगदान सबसे बड़ा और निर्णायक रहा। सूफी संतों ने तलवार के बजाय प्रेम, सेवा, भक्ति और सहिष्णुता के माध्यम से ईस्लाम का प्रचार किया। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया और जाति व्यवस्था से पीड़ित निचली जातियों एवं आम लोगों को आकर्षित किया।

प्रमुख सूफी सिलसिले:
चिश्ती सिलसिला — सबसे लोकप्रिय। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती (अजमेर), हजरत निजामुद्दीन औलिया (दिल्ली), बाबा फरीद गंज-ए-शकर (पंजाब)।
सुहरावर्दी सिलसिला — मुल्तान में प्रमुख।
कादरी सिलसिला — शेख अब्दुल कादिर जिलानी के अनुयायी।
नक्शबंदी सिलसिला — अधिक ध्यान और ज़िक्र पर जोर।

➣ सूफी संतों ने कव्वाली, उर्स, लंगर और लोक भाषा (हिंदी, अवधी, पंजाबी) में प्रचार किया। उनके संदेश ने हिंदू भक्ति आंदोलन से भी प्रेरणा ली, जिससे भारतीय ईस्लाम में गंगा-जमुनी तहजीब का विकास हुआ।

बंगाल और पंजाब में सूफी प्रभाव सबसे गहरा और व्यापक था। इन क्षेत्रों में सूफी संतों ने स्थानीय भाषा, संगीत और लोक परंपराओं को अपनाकर बड़े पैमाने पर लोगों को ईस्लाम की ओर आकर्षित किया।

दक्षिण भारत (केरल) में ईस्लाम का आगमन सबसे प्रारंभिक था। ७वीं शताब्दी से ही अरब व्यापारियों (मालाबार तट) के माध्यम से शांतिपूर्ण रूप से ईस्लाम पहुंचा। 629 ई. में कोडुंगल्लूर में चेरेमन जुमा मस्जिद का निर्माण इसी परंपरा का हिस्सा है।


• ईस्लाम द्वारा सिखाई गई सामाजिक समानता और एक ईश्वर की अवधारणा
• हिंदू जाति व्यवस्था से मुक्ति की चाहत
• सूफी संतों का प्रेम, सेवा और भक्ति पर आधारित संदेश
• कव्वाली, उर्स और लोक संगीत का आकर्षण
• राजनीतिक संरक्षण (सल्तनत और मुगल काल)
• वैवाहिक संबंध और सांस्कृतिक मिश्रण

➣ आज भारत में ईस्लाम मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और असम में मजबूत उपस्थिति रखता है।

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