➣ ब्राह्मण धर्म के जटिल कर्मकाण्ड एवं यज्ञीय व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिक्रिया स्वरूप उदय होने वाला पहला सम्प्रदाय भागवत सम्प्रदाय था।
➣ भागवत धर्म का उद्भव मौर्योत्तर काल में हुआ। इस धर्म के विषय में प्रारम्भिक जानकारी उपनिषदों में मिलती है।
➣ छांदोग्य उपनिषद में श्री कृष्ण का उल्लेख सर्वप्रथम मिलता है। उसमें कृष्ण को देवकी पुत्र व ऋषि घोर अंगिरस का शिष्य बताया गया है।
➣ भागवत धर्म से वैष्णव धर्म का विकास हुआ। भागवत धर्म के प्रवर्तक शप्तवंशी कृष्ण थे। जो बृष्णि कबीले के थे और उनका निवास स्थान मथुरा था।
वासुदेव कृष्ण का प्रारंभिक अभिलेखीय उल्लेख बेसनगर स्थित गरुड़ स्तम्भ अभिलेख में पाया जाता है।
➣ इनके अनुयायियों को भगवत कहते हैं। इसी के आधार पर इस धर्म का नाम भागवत धर्म पड़ा।
➣ ऋग्वेद में विष्णु का उल्लेख आकाश के देवता के रूप में हुआ है। उत्तर वैदिक काल में तीन प्रमुख देवता-प्रजापति, रुद्र एवं विष्णु थे। विष्णु को लोग पालक एवं रक्षक मानने लगे। पतंजलि ने वासुदेव को विष्णु का रूप बताया है।
➣ विष्णु पुराण में भी वासुदेव को विष्णु का एक नाम बताया गया है। इस प्रकार जब कृष्ण-विष्णु का तादात्म्य नारायण से स्थापित हुआ, तब वैष्णव धर्म की एक संज्ञा पांचरात्र धर्म हो गया।
➣ कृष्ण का सम्बन्ध साल्व वंश से था। इसलिए इसे साल्व धर्म भी कहते हैं।
➣ भागवत धर्म तथा वासुदेव की पूजा का उल्लेख महर्षि पाणिनि ने किया है। उन्होंने वासुदेव के उपासकों को वासुदेवक कहा है।
➣ एक मानवीय नायक के रूप में वासुदेव के दैवीकरण का सबसे प्राचीन (सर्वप्रथम) उल्लेख पाणिनी की अष्टाध्यायी से प्राप्त होता है।
➣ भागवत सम्प्रदाय के प्रमुख तत्व भक्ति एवंअहिंसा है। भक्ति का अर्थ प्रेममय निष्ठा निवेदन है जबकि अहिंसा का अर्थ किसी जीव का वध न करना है।
➣ महाभारत काल में वासुदेव कृष्ण का तादात्म्य विष्णु से स्थापित किया गया। महाभारत में इनका एक और नाम गोविंद भी मिलता है।
➣ जैन धर्म ग्रन्थ उत्तराध्ययन सूत्र में वासुदेव को केशव नाम से पुकारा गया तथा वासुदेव को 22वें तीर्थंकर अरिष्टनेमि का समकालीन बताया गया है।
➣ विष्णु का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में प्राप्त होता है। तदनुसार इन्होंने वामन अवतार में 3 पगों से समस्त लोकों को नाप लिया था।
➣ विष्णु के दस अवतारों का उल्लेख मत्स्य पुराण में मिलता है। ये दस अवतार हैं-मत्स्य, कूर्म, वराह, (शूकर), नरसिंह, वामन, परशुराम (भृगुपति), राम, बलराम (कृष्ण), बुद्ध एवं कल्कि।
➣ यह धर्म प्रारंभ में मथुरा एवं उसके आस-पास के क्षेत्रों में प्रचलित था। मथुरा से इस धर्म का प्रसार धीरे-धीरे भारत के अन्य भागों में हुआ।
➣ मेगस्थनीज ने अपने इंडिका में शूरसेन (मथुरा) के लोगों को कृष्ण का उपासक होना बताया है तथा कृष्ण को हेराक्लीज (कृष्ण का रूपांतरण) कहा।
➣ भागवत धर्म से संबद्ध प्रथम उपलब्ध प्रस्तर स्मारक विदिशा (बेसनगर) का गरुड़ स्तंभ है। इससे पता चलता है कि तक्षशिला के यवन राजदूत हेलियोडोरस ने भागवत धर्म ग्रहण किया तथा इस स्तंभ की स्थापना करवाकर उसकी पूजा की थी।
➣ इस पर उत्कीर्ण लेख में हेलियोडोरस को भागवत तथा वासुदेव को देवदेवस अर्थात देवताओं का देवता कहा गया था। अपोलोडोटस के सिक्कों पर सबसे पहले भागवत धर्म के चिह्न मिलते हैं।
➣ महाक्षत्रप शोडासकालीन मोरा (मथुरा) पाषाण लेख में पंचवीरों (संकर्षण,वासुदेव, प्रद्युम्न, साम्ब तथा अनिरुद्ध) की पाषाण प्रतिमाओं को मंदिर में स्थापित किए जाने का उल्लेख मिलता है।
➣ गुप्तकाल में वैष्णव धर्म की उत्कर्ष पर था। गुप्त शासक परमभागवत् नामक उपाधि धारण करते थे तथा विष्णु का वाहन गरुड़ गुप्तशासकों का राजचिन्ह भी था।
➣ मेहरौली स्तंभ लेख में उल्लेख मिलता है कि चंद्रगुप्त द्वितीय ने विष्णुपद पर्वत पर विष्णु ध्वज की स्थापना करवाई थी।
➣ स्कंदगुप्त के भितरी स्तंभ लेख (गाजीपुर) में विष्णु की मूर्ति स्थापित किए जाने का उल्लेख है। जूनागढ़ लेख से ज्ञात होता है कि चक्रपालित ने सुदर्शन झील के तट पर विष्णु की मूर्ति स्थापित करवाई थी।
➣ देवगढ़ की मूर्ति में विष्णु को शेषशायी पर विश्राम करते हुए दिखाया गया है। गुप्तकाल में अमरसिंह ने अपने ग्रंथ अमरकोश में विष्णु के 42 नामों का वर्णन किया है।
➣ वेंगी के पूर्वी चालुक्य शासक वैष्णव मतानुयाई थे। गुप्तों के समान ही उनका राजचिह्न गरुड़ था।
➣ राष्ट्रकूट नरेश दंतिदुर्ग ने एलोरा में दशावतार का प्रसिद्ध मंदिर बनवाया था। इस मंदिर में विष्णु के दस अवतारों की कथा मूर्तियों में अंकित है। क्षेमेंद्र रचित दशावतार चरित में भी विष्णु के दस अवतारों का वर्णन मिलता है।
➣ दक्षिण भारत (तमिल भूमि) में भागवत आंदोलन का प्रसार अलवारों द्वारा किया गया। अलवार शब्द का अर्थ होता है-ज्ञानी व्यक्ति।
➣ अलवार संतों की संख्या 12 बताई गई है। इनमें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं- पोयगई, पूडम, पेय, तिरुमंगई, आण्डाल, नम्मालवार आदि। अलवार संतों में एकमात्र महिला साध्वी आण्डाल थी। जिसे ‘दक्षिण की मीरा’ कहा जाता है।
➣ चोल काल में वैष्णव धर्म के प्रचार का कार्य अलवारों के स्थान पर आचार्यों ने किया। आचार्य परंपरा में प्रथम नाम नाथमुनि का लिया जाता है। इन्हें मधुरकवि का शिष्य बताया जाता है। इन्होंने न्यायतत्व की रचना की।
श्रीकृष्ण: भागवत सम्प्रदाय के प्रमुख देवता
| देवकी-वसुदेव | माता-पिता |
| यशोदा-नन्द | पालनकर्ता माता-पिता |
| बलराम | नन्द का पुत्र (उपनाम-हलधर) |
| कंस | मामा |
| जरासंध | मामा का श्वसुर |
| संदीपनी व उपमन्यु | गुरु |
| घोरा अंगिरस | गुरु (छान्दोग्य उपनिषद्) |
| कुब्जा | कंस की दासी व कृष्णभक्त |
| राधा | प्रेमिका |
| रुक्मिणी | पटरानी व प्रद्युम्न की माता |
| जाबंती | रानी व साम्ब की माता |
| प्रद्युम्न,साम्ब | पुत्र |
| अनिरुद्ध | पौत्र |
| द्वारका | राजधानी |
| पांचजन्य | शंख |
भगवान विष्णु के 10 अवतार और उनका महत्व
➣ भागवत धर्म की महत्त्वपूर्ण विशेषता अवतारवाद का प्रथम उल्लेख भगवद्गीता में है। भगवद्गीता महाभारत के भीष्म पर्व का अंश है।
➣ यद्दपि अमरकोश में विष्णु के 39 अवतारों का उल्लेख मिलता है, परंतु वास्तविक रूप में 10 अवतार सर्वाधिक प्रचलित है।
➣ पुराणों में भी विष्णु के दस अवतारों का विवरण प्राप्त होता है। ये हैं-मत्स्य, कूर्म अथवा कच्छप, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध एवं कल्कि (कलि)।
➣ मत्स्य पुराण में विष्णु के अवतारों की सूची में कृष्ण के स्थान पर बुद्ध को स्थान दिया गया है। मत्स्य पुराण के अलावा क्षेमेन्द्र कृत दशावतार चरित एवं जयदेव कृत गीत गोविन्द में भी विष्णु के दस अवतारों का वर्णन है।
➣ नारायण, नृसिंह एवं वामन दैवीय अवतार माने जाते हैं और शेष सात मानवीय अवतार माने जाते हैं। विष्णु अवतारों में वराह, राम एवं कृष्ण अधिक लोकप्रिय हैं।
1. मत्स्य : विष्णु के प्रथम अवतार की कथा
➣ इसका उल्लेख सर्वप्रथम शतपथ ब्राहाण में मिलता है जब पृथ्वी विश्वव्यापी जल प्रलय से भयभीत हुई तो विष्णु ने मत्स्य (मछली) के रूप में अवतार लिया और मनु को इस आसन्न भय से सावधान किया।
➣ पृथ्वी के जलमग्न हो जाने पर सृष्टि के क्रम को पुनर्स्थापित करने के लिए मत्स्य अवतार ने मनु, उनके परिवार और सप्त ऋषियों व वेदों को एक जलपोत द्वारा (जो मत्स्य के सिर पर निकले सींग से रस्सी द्वारा आबद्ध था) सुरक्षित बचाकर ले जाए।
2. कूर्म : समुद्र मंथन में विष्णु की भूमिका
➣ पृथ्वी के जलमग्न होने के कारण पृथ्वी की कई अमूल्य वस्तुएं विश्व सिंधु के तल में समुद्र के गर्भ में) समा गये थे जिसमें अमृत भी एक था।
➣ इन वस्तुओं का प्राप्त करने हेतु देवताओं (सुरों) व दानवों (असुरो) ने समुद्र मंथन की योजना बनाई।
➣ समुद्र-मंथन की योजना को कार्यान्वित करने हेतु विष्णु ने एक वृहदाकार कूर्म (कछुआ) के रूप में अवतार लिया।
➣ देवताओं ने कूर्म के पीठ पर मंदराचल पर्वत को रखकर नागराज वासुकि को मंदराचल में लपेट कर समुद्र-मंथन किया।
➣ समुद्र-मंथन के फलस्वरूप देवताओं ने अमृत व अन्य वस्तुओं के साथ-साथ देवी लक्ष्मी को भी प्राप्त किया। अमृत के बंटवारे को लेकर देवताओं व दानवों में युद्ध (सुरासुर युद्ध) हुआ जिसमें देवताओं की जीत हुई।
➣ परन्तु छल वश एक राक्षस ने अमृत पान कर लिया तब विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से गला काट दिया परन्तु अमृत पान के कारण वह मृत्यु को प्राप्त नहीं हो सका और राहू व केतु दो भागों में बंट गया।
3. वराह : पृथ्वी की रक्षा की पौराणिक कथा
➣ विष्णु के अवतारों में वराह अवतार सर्वाधिक लोकप्रिय है। इसमें वराह समुद्र से पृथ्वी का उद्धार करते हैं। वराह का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद में है तथा नृसिंह अवतार का उल्लेख तैत्तिरीय आरण्यक में है।
➣ दानव हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को विश्व सिंधु में डुबोकर पृथ्वीवासियों पर अत्याचार करने लगा। देवताओं ने उसे मारने के लिए भगवान विष्णु से प्रार्थना किये।
➣ अब हिरण्याक्ष विष्ठा (मल) का कोट बनाकर उसकी आड़ में रहने लगा। विष्ठा की कोट ढाहने के लिए भगवान विष्णु ने एक वृहदाकार वराह/वाराह (शूकर/सूअर) के रूप में अवतार लिया और हिरण्याक्ष को मारकर पृथ्वी को अपने दांतों से उठाकर उसे यथास्थान रख दिया।
ऐसी मान्यता है कि हिरण्याक्ष अपने अगले जन्म रावण का भाई कुम्भकरण हुआ।
4. नरसिंह : हिरण्यकश्यप वध की कथा
➣ विष्णु ने अपने भक्त प्रहलाद को बचाने हेतु नरसिंह के रूप में अवतार लिया।
➣ प्रहलाद के पिता हिरण्यकशिपु को वरदान प्राप्त था कि वह किसी देवता या दानव से,पशु या मानव से, दिन या रात में, भीतर या बाहर में, धरती या आकाश में, अस्त्र या शस्त्र से मारा नही जा सकता।
➣ वरदान प्राप्ति के बाद हिरण्यकशिपु पृथ्वीलोक में अत्याचार करने लगा।
➣ भगवान विष्णु नरसिंह अर्थात नर का शरीर और सिंह का मुख धारण करके प्रकट हो गये। उन्होंने संध्या समय में अपनी जांघों पर हिरण्यकशिपु के शरीर को रखकर अपने नाखुनों से फाड़ कर वध किया।
ऐसा कहा जाता है कि हिरण्यकशिपु ही अगले जन्म में रावण हुआ।
5. वामन : राजा बलि और तीन पग भूमि की कथा
➣ राक्षसराज बलि ने संसार पर आधिपत्य कर लिया और अत्यधिक तप-दान के सहारे उसके अलौकिक शक्ति की ऐसी वृद्धि हुई कि उसने देवताओं तक को पीड़ित करना शुरू कर दिया।
➣ जब देवताओं ने अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना की तब विष्णु ने वामन के रूप में अवतार लिया और बलि के सम्मुख प्रकट होकर उससे 3 पग भूमि की याचना की थी।
➣ बलि द्वारा दान की याचना स्वीकारने पर वामन (बौना) ने अपना विशाल रूप धारण कर पहले पग में पृथ्वी, दूसरे पग में आकाश और तीसरे पग में महाबलि के पूरे शरीर को मापकर उसे पाताल लोक भेज दिया।
➣ विष्णु के 3 पग के बारे में ऋग्वेद में भी दिया गया है।
द्वापर युग में कंश द्वारा मारे गए 6 पुत्र मृत्यु पश्चात् बलि के पास आये थे। जिन्हे आगे कृष्ण ने मुक्त कर दिया था।
6. परशुराम : विष्णु के क्रोध और न्याय का प्रतीक
➣ विष्णु में मानव रूप में जमदग्नि नामक ब्राह्मण के पुत्र परशुराम के रूप में अवतार लिये। वे पराक्रमी किंतु क्रोधी स्वाभाव के थे।
➣ परशुराम ने कार्तवीर्य नामक क्षत्रिय राजा की हत्या इसलिए कर दी कि उसने जमदग्नि से कामधेनु गाय बलात् छीन लिया था एवं उनके आश्रम को नष्ट कर दिया था।
➣ प्रत्युत्तर में कार्तवीर्य के पुत्रों ने जमदग्नि की हत्या कर दी।
➣ तभी से परशुराम ने पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन करने की प्रतिज्ञा की और 21 बार कार्तवीर्य के वंशजों को परास्त किया।
7. राम : मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जीवन
➣ श्रीलंका के राजा रावण के अत्याचारों से मानव जाति को बचाने के लिए विष्णु ने अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र राम के रूप में अवतार लिया।
➣ उपास्यदेव व अवतार के रूप में मान्यता का स्पष्ट वर्णन कालिदास (4वीं सदी ई. के अंत में) के रघुवंशम में मिलती है।
8. कृष्ण : श्रीकृष्ण और भगवद्गीता का महत्व
➣ यह अवतार विष्णु के सभी अवतारों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। मथुरा नरेश कंस जैसे दानवों का वध करने, मानवता व लोक कल्याण की रक्षा हेतु विष्णु ने कृष्ण के रूप में अवतार लिया।
➣ एक बहेलिये द्वारा चलाये गये बाण पैर के तलुए में लगने के कारण कृष्ण के जीवन का अंत हो गया।
ये बहेलिये ही अपने पिछले जन्म में वानर राज बाली था जिसे छिपकर राम ने मारा इसलिए कर्म सिंद्धांत के अनुसार इस जन्म में बहेलिये के रूप में उसने कृष्ण को मारा।
9. बुद्ध : भगवान बुद्ध को विष्णु अवतार माना जाना
➣ ऐतिहासिक रूप से विष्णु का यह अंतिम अवतार है। वैदिक कर्मकांडों व यज्ञों से होने वाली बलि हिंसक कृत्यों को दूर करने के लिए विष्णु ने बुद्ध के रूप में अवतार लिया।
➣ बुद्ध ने मध्य मार्ग के अनुसरण पर बल दिया तथा प्रेम और अहिंसा का प्रचार-प्रसार किया।
10. कल्कि अवतार : विष्णु के अंतिम अवतार की भविष्यवाणी
➣ कल्कि अवतार का होना अभी शेष है।
➣ ऐसी कल्पना की गई है कि कलियुग के अंतिम चरण में भगवान विष्णु हाथ में तलवार लेकर श्वेत अश्व पर सवार होकर पृथ्वी पर अवतरित होंगे और कलियुग का अंत कर नये युग की स्थापना करेंगे।
➣ विष्णु के इन अवतारों को जीव विकास क्रमानुसार भी बताया गया है –
युग और अवतारों का जैव विकास क्रम
| युग | जैव विकास का क्रम |
|---|---|
| सतयुग |
1. मत्स्य अवतार – मछली (जलीय जीव) 2. कूर्म अवतार – कछुआ (उभयचर: जल व स्थल) 3. वराह अवतार – सूअर (स्थल का पशु) 4. नरसिंह अवतार – अर्द्धमानव-अर्द्धपशु (मानव व पशु के बीच का रूप) |
| त्रेतायुग |
5. वामन अवतार – बौना मानव (लघु मानव) 6. परशुराम अवतार – शस्त्रधारी मानव (परशु/फरसा का प्रयोगकर्ता) 7. राम अवतार – मर्यादित समाज में रहने वाला मानव |
| द्वापर युग |
8. कृष्ण अवतार – पशुपालन आधारित मानव 9. बुद्ध अवतार – कृषि एवं शांति को बढ़ावा देने वाला मानव |
| कलियुग | 10. कल्कि अवतार – भविष्य का संहारक मानव रूप |
भागवत में वासुदेव (कृष्ण) की उपासना के साथ ही तीन अन्य व्यक्तियों की उपासना भी की जाती थी:
- संकर्षण (बलराम) – वसुदेव और रोहिणी से उत्पन्न पुत्र
- प्रद्युम्न – कृष्ण और रुक्मिणी से उत्पन्न पुत्र
- अनिरुद्ध – प्रद्युम्न के पुत्र
➣ इन चारों (वासुदेव सहित) को चतुर्व्यूह की संज्ञा दी जाती है। चतुर्व्यूह पूजा का प्रथम उल्लेख विष्णु संहिता में मिलता है।
➣ राजा सर्वतात के दूसरी सदी ई.पू. के घोसुण्डी शिलालेख (चित्तौड़गढ़, राजस्थान) में वासुदेव एवं संकर्षण की पूजा का उल्लेख है।
➣ पहली सदी ई.पू. के सातवाहनों के नानाघाट अभिलेख में संकर्षण (बलराम) और वासुदेव की पूजा का उल्लेख है।
➣ वायु पुराण में इन चारों के साथ साम्ब’ (कृष्ण और जाग्बवंती से उत्पन्न पुत्र) को मिलाकर पंचवीर कहा गया है।
➣ भागवत धर्म में नवधा भक्ति का विशेष महत्त्व है। श्रवण (परीक्षित), कीर्तन (शुकदेव), स्मरण (प्रह्लाद), पादसेवन (लक्ष्मी), अर्चन (पृथुराजा), वंदन (अक्रूर), दास्य (हनुमान), सख्य (अर्जुन) और आत्मनिवेदन (बलि राजा) – इन्हें नवधा भक्ति कहते हैं।
➣ वैष्णव धर्म के प्रमुख आचार्य हैं-रामानुज, मध्व, बल्लभ, चैतन्य आदि।
➣ पांचरात्र व्यूह के प्रमुख देवता :- 1. वासुदेव, 2. लक्ष्मी, 3. संकर्षण 4. प्रद्युम्न , 5. अनिरूद्ध
➣ मथुरा के पास मोरा नामक स्थान से प्रथम शताब्दी ई. के एक लेख में तोस नामक विदेशी स्त्री द्वारा वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, साम्ब एवं अनिरूद्ध (पाँच वृष्णि वीरों की पूजा का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य) की मूर्तियों की उपासना का उल्लेख है।
➣ साम्ब सूर्यपूजा से संबंधित थे। साम्ब पांचरात्र व्यूह में नहीं आते जबकि पाँच वृष्णि वीरों में आते हैं।
➣ पांचरात्र वैष्णव धर्म का प्रधान मत था। इसका विकास तीसरी शताब्दी ई.पू. के आस-पास हुआ। पांचरात्र का प्रथम उल्लेख महाभारत के नाराणीय खण्ड में मिलता है।
➣ पांचरात्र के प्रमुख देवता नारायण विष्णु थे। नारायण का प्रथम उल्लेख शतपथ ब्राह्मण में मिलता है।
➣ पांचरात्र में पाँच पदार्थ हैं – 1. परमतत्व 2. मुक्ति, 3. युक्ति 4. योग 5. विषय। अतः यह पांचरात्र कहलाता है।
प्रमुख मंदिर
| जगन्नाथ मंदिर | पुरी (ओडिशा) |
| दशावतार मंदिर | देवगढ़ (उत्तर प्रदेश) |
| विष्णु मंदिर | तिगवां (म.प्र.) |
| विष्णु मंदिर | एरण (म.प्र.) |
| द्वारिकाधीश मंदिर | मथुरा (उत्तर प्रदेश) |
| द्वारिकाधीश मंदिर | द्वारका (गुजरात) |
➣ भागवत संप्रदाय के विकास में गुप्तों का योगदान अत्यधिक था।
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