बारडोली सत्याग्रह : परिचय
➣ बारडोली सत्याग्रह (1928) गुजरात के सूरत जिले के बारडोली तालुका के किसानों द्वारा ब्रिटिश सरकार की बढ़ी हुई भूमि-राजस्व मांग के विरोध में चलाया गया एक महत्वपूर्ण किसान आंदोलन था।
➣ इसका नेतृत्व वल्लभभाई पटेल ने किया और आंदोलन ने आगे चलकर उन्हें राष्ट्रीय स्तर के प्रमुख नेताओं में स्थापित किया।
➣ बारडोली उस समय बॉम्बे प्रेसीडेंसी का हिस्सा था। यहाँ की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित थी और किसानों की आय पर भूमि-राजस्व का सीधा प्रभाव पड़ता था।
➣ प्रथम विश्व युद्ध के बाद कृषि कीमतों में उतार-चढ़ाव, बढ़ता ऋण और ग्रामीण आर्थिक कठिनाइयों ने किसानों की स्थिति को प्रभावित किया। ऐसे समय में भूमि-राजस्व में वृद्धि ने उनकी समस्याओं को और गंभीर बना दिया।
➣ बारडोली के किसानों ने पहले सरकार के सामने अपनी शिकायतें रखकर समाधान प्राप्त करने का प्रयास किया, लेकिन जब उनकी मांगों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया तो उन्होंने संगठित रूप से बढ़े हुए लगान का विरोध करने का निर्णय लिया।
➣ आगे चलकर यह संघर्ष अहिंसा, सत्याग्रह, किसान एकता और सामूहिक असहयोग पर आधारित आंदोलन में बदल गया।
पृष्ठभूमि
बारडोली के कृषक समाज की स्थिति
➣ बारडोली में मुख्य रूप से पटेल, अनाविल ब्राह्मण और बनिया जैसे कृषक एवं भूमि-स्वामी समुदायों का प्रभाव था। इनके अलावा विभिन्न छोटे कृषक, खेतिहर मजदूर और अन्य ग्रामीण समुदाय भी यहाँ रहते थे।
➣ 1901 की जनगणना के अनुसार बारडोली तालुका की आबादी लगभग 56,980 थी, जिसमें पटेलों की संख्या लगभग 17 प्रतिशत थी।
➣ समय के साथ तालुका की आबादी और कृषि गतिविधियों में वृद्धि हुई, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि सभी किसानों की आर्थिक स्थिति समान रूप से मजबूत थी।
➣ प्रथम विश्व युद्ध के बाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कई बदलाव आए। कृषि वस्तुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव, विशेष रूप से कपास की कीमतों में गिरावट, कृषि लागत, ऋण और फसल संबंधी कठिनाइयों ने किसानों पर आर्थिक दबाव बढ़ाया।
➣ ऐसे समय में भूमि-राजस्व में वृद्धि किसानों के लिए अतिरिक्त बोझ बन गई। बाद के किसान नेताओं ने भी यही तर्क दिया कि सरकार द्वारा निर्धारित नई राजस्व दरें उस समय की वास्तविक कृषि स्थिति के अनुरूप नहीं थीं।
➣ बारडोली क्षेत्र में कृषि आय पर निर्भर किसानों के लिए समस्या यह थी कि सरकार राजस्व निर्धारण के समय भूमि के मूल्य, संचार व्यवस्था और क्षेत्र में दिखाई देने वाले आर्थिक विकास जैसे संकेतकों को महत्व दे रही थी,
➣ जबकि किसान अपनी वास्तविक आय, फसल की स्थिति और कृषि संकट को अधिक महत्वपूर्ण मानते थे। इसी अंतर ने आगे चलकर राजस्व-वृद्धि के विरुद्ध असंतोष को जन्म दिया।
भूमि-राजस्व के पुनर्मूल्यांकन की पृष्ठभूमि
➣ बारडोली तालुका में भूमि-राजस्व का निर्धारण बॉम्बे प्रेसीडेंसी की रैयतवाड़ी व्यवस्था के अंतर्गत किया जाता था। इस व्यवस्था में सरकार और किसान के बीच सीधे राजस्व का संबंध था।
➣ निश्चित अवधि के बाद भूमि की उत्पादकता, खेती की स्थिति और भूमि के मूल्य आदि का आकलन करके राजस्व की नई दरें निर्धारित की जाती थीं।
➣ बारडोली के पुराने राजस्व बंदोबस्त की अवधि समाप्त होने के बाद 1924–25 में नए राजस्व बंदोबस्त की प्रक्रिया शुरू की गई।
➣ 1924–25 के आसपास इस कार्य के लिए सरकार ने एक डिप्टी कलेक्टर जे. सी. जयकर को नियुक्त किया। उसकी रिपोर्ट जून 1925 में तैयार हुई और बाद में उच्च राजस्व अधिकारियों के पास भेजी गई।
➣ जयकर की रिपोर्ट में बारडोली की भूमि-राजस्व दरों में उल्लेखनीय वृद्धि का सुझाव दिया गया। प्रारंभिक सरकारी आकलन में पुराने भू-राजस्व की तुलना में औसतन लगभग 30 प्रतिशत वृद्धि का प्रस्ताव किया गया।
➣ प्रारंभिक सरकारी आकलन में पुराने भू-राजस्व की तुलना में औसतन लगभग 30 प्रतिशत वृद्धि का प्रस्ताव किया गया। इसके बाद बंदोबस्त अधिकारी द्वारा पुनर्विचार किया गया और वृद्धि को लगभग 29 प्रतिशत तक कम किया गया।
➣ सरकार ने राजस्व बढ़ाने के पीछे कई कारण बताए। इनमें सड़क एवं रेल संचार में सुधार, आबादी में वृद्धि, पशुधन और कृषि साधनों में वृद्धि, बेहतर मकानों का निर्माण तथा भूमि के मूल्य में वृद्धि जैसे तर्क शामिल थे।
➣ सरकार का मानना था कि इन परिवर्तनों से क्षेत्र की आर्थिक क्षमता बढ़ी है और उसके अनुसार भूमि-राजस्व में वृद्धि उचित है।
➣ किसानों और स्थानीय नेताओं ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया। उनका कहना था कि सरकार ने क्षेत्र की वास्तविक कृषि आय और किसानों की भुगतान क्षमता का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा।
➣ विशेष रूप से कपास की कीमतों में गिरावट और कृषि संबंधी कठिनाइयों के बीच राजस्व बढ़ाना किसानों के लिए अनुचित था।
22 प्रतिशत लगान वृद्धि एवं किसानों की आपत्तियाँ
➣ सरकारी स्तर पर पुनर्विचार के बाद जुलाई 1927 में बॉम्बे सरकार ने बारडोली के नए भू-राजस्व बंदोबस्त को अंतिम रूप दिया। मूल रूप से प्रस्तावित लगभग 30 प्रतिशत वृद्धि को घटाकर औसतन लगभग 22 प्रतिशत कर दिया गया।
➣ हालांकि कुछ गाँवों और भूमि-वर्गों में वृद्धि इससे काफी अधिक थी और कुछ मामलों में यह 50 से 60 प्रतिशत तक पहुँचती थी।
➣ इस प्रकार किसानों के सामने वास्तविक समस्या केवल औसत 22 प्रतिशत वृद्धि नहीं थी। अनेक क्षेत्रों में नई वर्गीकरण व्यवस्था के कारण कुछ किसानों पर बहुत अधिक अतिरिक्त भार पड़ने वाला था। इसलिए किसान नेताओं ने पूरे पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया और नई दरों की निष्पक्षता पर सवाल उठाए।
➣ उनका मुख्य आरोप था कि बंदोबस्त अधिकारी ने वास्तविक कृषि परिस्थितियों की पर्याप्त जाँच नहीं की और उसके आकलन में ऐसे आँकड़ों का इस्तेमाल किया गया जो किसानों की वास्तविक आय और भुगतान क्षमता को सही रूप में नहीं दिखाते थे।
➣ किसानों की ओर से यह भी कहा गया कि संबंधित अधिकारी ने कई मामलों में गाँवों का पर्याप्त प्रत्यक्ष निरीक्षण नहीं किया और भूमि के किराए तथा वास्तविक कृषि लाभ से संबंधित उपलब्ध सामग्री का पर्याप्त परीक्षण नहीं किया।
➣ इसलिए प्रस्तावित वृद्धि को वास्तविक कृषि स्थिति के बजाय अनुमानित भूमि-मूल्य के आधार पर अधिक बढ़ा हुआ बताया गया।
➣ स्थानीय किसानों ने यह प्रश्न भी उठाया कि यदि क्षेत्र की आर्थिक स्थिति वास्तव में इतनी मजबूत हुई है कि 22 प्रतिशत अतिरिक्त राजस्व उचित माना जाए, तो सरकार को स्वतंत्र जाँच से अपनी गणना की पुष्टि कराने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इसलिए किसानों की प्रमुख मांग थी कि नई राजस्व दरों की निष्पक्ष और स्वतंत्र समीक्षा की जाए।
किसानों का बढ़ता असंतोष
➣ वर्ष 1926–27 के दौरान किसानों ने नई राजस्व दरों के विरुद्ध लगातार आपत्तियाँ दर्ज कराईं। स्थानीय प्रतिनिधियों ने सरकार को ज्ञापन दिए और विधान परिषद के माध्यम से भी मामला उठाने का प्रयास किया।
➣ मार्च 1927 में बारडोली और निकटवर्ती क्षेत्रों के किसानों का एक प्रतिनिधिमंडल बॉम्बे सरकार के राजस्व विभाग के सदस्य से मिला।
➣ किसानों का कहना था कि वे पुरानी राजस्व दर का भुगतान करने को तैयार हैं, लेकिन नई बढ़ी हुई दर को स्वीकार करना उनके लिए उचित नहीं है। उनका आग्रह था कि जब तक राजस्व निर्धारण की निष्पक्ष जाँच नहीं होती, तब तक बढ़े हुए राजस्व की वसूली रोक दी जाए।
➣ सितंबर 1927 में बारडोली के किसानों के एक सम्मेलन में बढ़े हुए भू-राजस्व का भुगतान रोकने का प्रस्ताव पारित किया गया।
➣ हालांकि इस समय तक आंदोलन का कोई केंद्रीय नेतृत्व तय नहीं हुआ था और किसान अभी सरकार से समझौते तथा स्वतंत्र जाँच के माध्यम से समाधान निकालने की कोशिश कर रहे थे।
➣ इसलिए बारडोली सत्याग्रह को केवल सरकार द्वारा अचानक लगान बढ़ाने की प्रतिक्रिया के रूप में नहीं देखना चाहिए।
➣ इसके पीछे भूमि-राजस्व पुनर्मूल्यांकन, किसानों की आर्थिक कठिनाइयाँ, सरकार द्वारा लगभग 22 प्रतिशत बढ़ोतरी, राजस्व निर्धारण पर विवाद और स्वतंत्र जाँच की मांग की एक पूरी प्रक्रिया थी। यही परिस्थितियाँ 1928 संगठित बारडोली सत्याग्रह का आधार बनीं।
बारडोली के किसानों का संगठन और सत्याग्रह की तैयारी
➣ सितंबर 1927 में बारडोली में किसानों का एक बड़ा सम्मेलन आयोजित किया गया। दादुभाई देसाई ने इसकी अध्यक्षता की।
➣ सम्मेलन में किसानों ने बढ़े हुए भू-राजस्व का भुगतान न करने का निर्णय लिया और सरकार से निष्पक्ष जाँच कराने की मांग की। इस निर्णय से स्पष्ट हो गया कि किसान अब केवल ज्ञापन और अपील तक सीमित नहीं रहना चाहते थे।
➣ इस संगठन को मजबूत करने में स्थानीय नेताओं कल्याणजी विठ्ठलभाई मेहता और कुंवरजी मेहता की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
➣ उन्होंने पहले से ही बारडोली क्षेत्र में किसानों के बीच संगठन और जनजागरण का काम किया था। उनके साथ खुशालभाई, जो तालुका कांग्रेस कमेटी के सचिव थे, तथा अन्य स्थानीय कार्यकर्ता भी किसानों को संगठित करने में सक्रिय थे।
➣ किसानों के प्रतिनिधियों ने वल्लभभाई पटेल से आंदोलन का नेतृत्व करने का अनुरोध किया। पटेल ने तुरंत नेतृत्व स्वीकार नहीं किया।
➣ वे चाहते थे कि आंदोलन शुरू करने से पहले यह सुनिश्चित किया जाए कि बारडोली के किसान लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
➣ उन्होंने किसानों को स्पष्ट रूप से बताया कि लगान न देने पर जमीन और संपत्ति की कुर्की, नीलामी तथा जेल जाने जैसी गंभीर परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
➣ पटेल ने अपने सहयोगियों से गाँव-गाँव जाकर किसानों की राय जानने को कहा। कार्यकर्ताओं ने बारडोली तालुका के विभिन्न गाँवों का दौरा किया और किसानों से पूछा कि क्या वे सरकारी दमन और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद लंबे संघर्ष में टिके रहेंगे।
➣ लगभग आठ–दस दिनों के बाद कार्यकर्ताओं ने पटेल को बताया कि किसान संघर्ष के लिए तैयार हैं और संभावित कठिनाइयों को सहने के लिए भी तैयार हैं।
➣ इस बीच स्थानीय नेताओं ने महात्मा गांधी से भी संपर्क किया। गांधी ने आंदोलन को अपना समर्थन दिया, लेकिन बारडोली के संघर्ष का नेतृत्व सीधे अपने हाथ में नहीं लिया।
➣ किसानों को अहिंसा का पालन करने और अनुशासन बनाए रखने का आश्वासन देना आवश्यक माना गया। इस प्रकार बारडोली आंदोलन की तैयारी गांधीवादी सत्याग्रह के सिद्धांतों के अनुरूप की गई, जबकि प्रत्यक्ष नेतृत्व पटेल के हाथ में रहने वाला था।
➣ कुंवरजी मेहता और कल्याणजी मेहता के प्रयासों तथा किसानों की तैयारी से संतुष्ट होने के बाद वल्लभभाई पटेल ने आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार किया।
➣ उन्होंने पहले सरकार से बातचीत और पुनर्विचार का रास्ता आजमाने की कोशिश की, ताकि बिना संघर्ष के समस्या का समाधान निकल सके। लेकिन सरकार की ओर से कोई रियायत न मिलने के बाद किसानों का आंदोलन औपचारिक नो-टैक्स अभियान की ओर बढ़ा।
➣ 4 फरवरी 1928 को बारडोली में किसानों का एक महत्वपूर्ण सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसकी अध्यक्षता पटेल ने की। इस सम्मेलन के माध्यम से किसानों को संघर्ष के लिए तैयार किया गया और उन्हें स्पष्ट किया गया कि आंदोलन की सफलता उनके एकजुट रहने, अहिंसा बनाए रखने और सरकारी दबाव के सामने न झुकने पर निर्भर करेगी।
➣ इसके बाद किसानों के सामने स्पष्ट विकल्प रखा गया- वे बढ़े हुए राजस्व को स्वीकार कर दें या पुरानी दर को पूरा भुगतान मानते हुए नई बढ़ी हुई मांग का भुगतान रोक दें, जब तक सरकार स्वतंत्र जाँच के लिए तैयार न हो। किसानों ने दूसरे विकल्प को स्वीकार किया।
➣ 12 फरवरी 1928 को बारडोली तालुका के किसानों ने औपचारिक रूप से निर्णय लिया कि वे बढ़ा हुआ भू-राजस्व तब तक नहीं देंगे, जब तक सरकार पुरानी दर को स्वीकार नहीं करती या निष्पक्ष जाँच के लिए स्वतंत्र न्यायाधिकरण नियुक्त नहीं करती। इस प्रकार लगान नहीं देंगे का निर्णय संगठित और सामूहिक रूप से लिया गया।
➣ इस निर्णय से पहले किसानों के बीच सामूहिक प्रतिज्ञा, आपसी एकता और अहिंसा पर विशेष जोर दिया गया। किसानों को समझाया गया कि कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से लगान जमा करके आंदोलन को कमजोर न करे और किसी भी सरकारी उकसावे का हिंसक जवाब न दे।
➣ इस प्रकार सत्याग्रह शुरू होने से पहले ही उसके लिए अनुशासन और सामूहिक जिम्मेदारी की नींव तैयार कर दी गई।
| तथ्यविवरण | विवरण |
|---|---|
| व्यवस्था | बॉम्बे प्रेसीडेंसी की रैयतवाड़ी व्यवस्था |
| 1924–25 | नए राजस्व बंदोबस्त की प्रक्रिया शुरू |
| प्रारंभिक प्रस्ताव | लगभग 30% वृद्धि |
| Settlement Commissioner के बाद | लगभग 29% |
| जुलाई 1927 | अंतिम औसत वृद्धि लगभग 22% |
| कुछ क्षेत्रों में वृद्धि | लगभग 50–60% तक |
| मुख्य किसान आपत्ति | राजस्व आकलन वास्तविक कृषि स्थिति को नहीं दर्शाता |
| मुख्य मांग | पुरानी दर स्वीकार की जाए या निष्पक्ष जाँच कराई जाए |
| सितंबर 1927 | बढ़े हुए राजस्व का भुगतान रोकने का प्रस्ताव |
| दादुभाई देसाई | सितंबर 1927 के सम्मेलन के अध्यक्ष |
| स्थानीय प्रमुख कार्यकर्ता | कल्याणजी मेहता, कुंवरजी मेहता, खुशालभाई |
| जनवरी 1928 | किसानों ने वल्लभभाई पटेल से नेतृत्व का अनुरोध किया |
| 4 फरवरी 1928 | पटेल की अध्यक्षता में महत्वपूर्ण किसान सम्मेलन |
| 12 फरवरी 1928 | बढ़े हुए भू-राजस्व का भुगतान न करने का औपचारिक निर्णय |
बारडोली सत्याग्रह का आरंभ (1928)
➣ 12 फरवरी 1928 को बारडोली के किसानों ने बढ़े हुए भू-राजस्व का भुगतान न करने का औपचारिक निर्णय लिया। लगान नहीं देंगे निर्णय के साथ बारडोली सत्याग्रह का संगठित चरण शुरू हुआ।
➣ वल्लभभाई पटेल ने पूरे आंदोलन का नेतृत्व संभाला। उन्होंने किसानों को स्पष्ट निर्देश दिया कि किसी भी परिस्थिति में हिंसा का सहारा नहीं लेना है और सरकारी अधिकारियों की उकसावे की कार्रवाई का भी शांतिपूर्वक सामना करना है।
➣ पटेल के लिए आंदोलन की सफलता किसानों की संख्या से अधिक उनकी एकता, अनुशासन और त्याग की क्षमता पर निर्भर थी।
बारडोली तालुका का संगठन
➣ पटेल ने बारडोली तालुका को आंदोलन चलाने के लिए कई कार्यकर्ता शिविरों (छावनियों) में बाँटा। विभिन्न स्रोतों में इनकी संख्या 13 से 16 तक मिलती है, क्योंकि कुछ स्रोत स्थायी सामाजिक-सेवा केंद्रों सहित संगठन के अलग-अलग स्तरों की गणना करते हैं। इन शिविरों में अनुभवी कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी दी गई और स्थानीय स्वयंसेवकों को गाँव-गाँव भेजा गया।
➣ नरहरि पारिख, रविशंकर व्यास और मोहनलाल पंड्या जैसे प्रमुख कार्यकर्ताओं ने संगठन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके साथ अनेक स्थानीय और बाहरी स्वयंसेवक जुड़े।
➣ आंदोलन के अलग-अलग क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी तय की गई, ताकि किसी एक गाँव या किसान पर सरकारी दबाव पड़ने पर वह अकेला न रह जाए।
➣ आंदोलन की तैयारी के दौरान किसानों को लगातार समझाया गया कि यदि सरकार उनकी भूमि, पशु या अन्य संपत्ति जब्त करती है, तब भी उन्हें लगान नहीं देना है और हिंसा नहीं करनी है। इस प्रकार आर्थिक नुकसान सहने की तैयारी को सत्याग्रह की मूल शर्त बनाया गया।
➣ आंदोलन की संगठन व्यवस्था इतनी मजबूत थी कि सरकारी कार्रवाई की सूचना जल्दी-से-जल्दी संबंधित गाँवों तक पहुँच जाती थी। स्वयंसेवक और संदेशवाहक लगातार संपर्क में रहते थे। इस संगठनात्मक अनुशासन ने बारडोली के किसानों को लंबे समय तक एकजुट रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
संदेश-प्रणाली और प्रचार
➣ आंदोलन को पूरे तालुका में एकजुट रखने के लिए नियमित सभाएँ, भाषण, पर्चे और घर-घर संपर्क का उपयोग किया गया। स्वयंसेवक गाँवों में जाकर किसानों को नए निर्देशों और सरकारी गतिविधियों की जानकारी देते थे।
➣ इससे सरकारी अधिकारियों के लिए अलग-अलग गाँवों को दबाव में लेकर आंदोलन तोड़ना कठिन हो गया।
➣ आंदोलन के लिए गुजराती भाषा में बारडोली सत्याग्रह पत्रिका भी निकाली गई। इसमें आंदोलन की खबरें, नेताओं के भाषण, सरकारी कार्रवाई और जब्ती की घटनाओं की जानकारी प्रकाशित की जाती थी। स्वयंसेवक इसे दूर-दराज के गाँवों तक पहुँचाते थे।
➣ आंदोलन के केंद्रीय कार्यालय से दैनिक बुलेटिन भी जारी किए जाते थे। इनका उद्देश्य केवल प्रचार करना नहीं था, बल्कि स्वयंसेवकों को निर्देश देना और सरकारी अधिकारियों की गतिविधियों की जानकारी पूरे आंदोलन तक पहुँचाना भी था।
सरकारी दमन और किसानों का प्रतिरोध
➣ 12 फरवरी 1928 के बाद जब बारडोली के किसानों ने बढ़े हुए भू-राजस्व का भुगतान करने से इनकार कर दिया, तब बॉम्बे सरकार ने राजस्व वसूली के लिए कठोर प्रशासनिक कार्रवाई शुरू की।
➣ सरकार ने किसानों पर दबाव बनाने के लिए मांग नोटिस, चल संपत्ति की कुर्की, पशुओं की जब्ती, भूमि की कुर्की और बाद में भूमि को नए लोगों को देने जैसी कानूनी कार्रवाइयों का सहारा लिया।
➣ प्रारंभिक कार्रवाई में किसानों के बैल, भैंस, खेती के पशु और अन्य चल संपत्ति जब्त करने के प्रयास किए गए। इसके बाद सरकार ने भूमि-राजस्व न देने वाले किसानों की भूमि की कुर्की और जब्ती की प्रक्रिया शुरू की।
➣ जुलाई 1928 में ब्रिटिश संसद में दी गई सरकारी जानकारी के अनुसार मई 1928 के मध्य तक लगभग 1,600 एकड़ भूमि जब्त कर नए कब्जेदारों को देने की कार्रवाई की जा चुकी थी।
भूमि की कुर्की और नीलामी
➣ सरकार की कार्रवाई का उद्देश्य किसानों पर ऐसा आर्थिक दबाव बनाना था जिससे वे आंदोलन छोड़कर लगान जमा कर दें। कुछ किसानों की भूमि और संपत्ति की नीलामी की घोषणा की गई।
➣ सरकार ने जब्त भूमि को नए लोगों के नाम करने और राजस्व की वसूली के लिए कानूनी प्रावधानों का इस्तेमाल किया।
➣ लेकिन सत्याग्रहियों ने इस नीति का सामना अहिंसक सामूहिक प्रतिरोध से किया। किसानों ने जब्त या नीलाम की जा रही जमीनों को खरीदने से लोगों को रोकने का प्रयास किया।
➣ आंदोलन का उद्देश्य यह था कि कोई बाहरी व्यक्ति किसान की मजबूरी का लाभ उठाकर उसकी जमीन न खरीदे।
➣ कई किसानों ने अपनी चल संपत्ति और अन्य सामान को सरकारी अधिकारियों की नजर से बचाने के लिए छिपा दिया। कुछ स्थानों पर लोगों ने अपने कृषि उपकरण और बैलगाड़ियों के हिस्सों को अलग करके सुरक्षित रखने जैसे उपाय किए।
➣ इसका उद्देश्य हिंसा करना नहीं, बल्कि कुर्की की कार्रवाई को आर्थिक रूप से निष्प्रभावी बनाना था।
गिरफ्तारियाँ और सरकारी दबाव
➣ आंदोलन लंबा खिंचने के साथ सरकार ने केवल संपत्ति की कुर्की तक ही कार्रवाई सीमित नहीं रखी। गिरफ्तारियाँ, जुर्माने और न्यायिक कार्रवाई भी शुरू हुई।
➣ ब्रिटिश सरकार के आधिकारिक विवरण के अनुसार मई-जुलाई 1928 तक राजस्व न देने वालों की संपत्ति जब्त करने के साथ कानून तोड़ने के आरोप में गिरफ्तारियाँ और सजाएँ भी होने लगी थीं।
➣ सरकारी कार्रवाई का उद्देश्य किसानों के बीच भय पैदा करना था, लेकिन इससे आंदोलन समाप्त होने के बजाय कई जगह प्रतिरोध की भावना और मजबूत हुई। किसानों ने व्यक्तिगत रूप से सरकार से समझौता करने के बजाय सामूहिक निर्णय पर कायम रहने का प्रयास किया।
➣ वल्लभभाई पटेल लगातार किसानों को समझाते रहे कि सरकार की कार्रवाई चाहे जितनी कठोर हो, उन्हें हिंसा नहीं करनी है, अधिकारियों से झगड़ा नहीं करना है और बढ़ा हुआ लगान जमा नहीं करना है। इसी अनुशासन ने आंदोलन को टूटने से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
किसानों का शांतिपूर्ण प्रतिरोध
➣ बारडोली के किसानों ने सरकारी दबाव के सामने मुख्यतः सामूहिक असहयोग का रास्ता अपनाया। उन्होंने बढ़ा हुआ राजस्व जमा नहीं किया और जब्त संपत्ति की नीलामी में सहयोग नहीं किया। गाँवों में लोगों ने एक-दूसरे को आंदोलन पर कायम रहने के लिए प्रेरित किया।
➣ आंदोलन के स्वयंसेवक सरकारी अधिकारियों की गतिविधियों पर नजर रखते थे और किसी गाँव में कुर्की या नीलामी की कार्रवाई होने पर इसकी सूचना तुरंत दूसरे कार्यकर्ताओं तक पहुँचाते थे। इससे किसानों को अचानक सरकारी कार्रवाई का सामना अकेले नहीं करना पड़ता था।
➣ सत्याग्रह की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि किसानों ने सरकारी दमन का जवाब हिंसा से नहीं दिया। इससे सरकार के लिए आंदोलन को कानून-व्यवस्था की हिंसक समस्या के रूप में प्रस्तुत करना कठिन रहा और आंदोलन की नैतिक शक्ति बनी रही।
बारडोली की महिलाओं की भूमिका
➣ बारडोली सत्याग्रह में महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय थी। वे केवल घरों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि सभाओं, जनसंपर्क, स्वयंसेवी कार्य और आंदोलन के प्रचार में सक्रिय रूप से शामिल हुईं। गांधी के लेखन में भी बारडोली सत्याग्रह में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का उल्लेख मिलता है।
➣ मणिबेन पटेल, मिथुबेन पेटिट, भक्तिबा और शारदाबेन मेहता जैसी महिलाओं ने आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे गाँवों में जाकर महिलाओं को संगठित करती थीं और किसानों के परिवारों को समझाती थीं कि सरकारी दबाव के सामने एकता बनाए रखना जरूरी है।
➣ बारडोली की स्थानीय महिलाओं ने भी सत्याग्रह को मजबूत बनाए रखने में महत्वपूर्ण सहयोग दिया। वे आंदोलन के प्रति दृढ़ रहीं और सत्याग्रहियों को पीछे हटने से रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं।
➣ महिलाओं की सक्रियता का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह था कि आंदोलन केवल किसानों तक सीमित न रहकर पूरे ग्रामीण समाज का सामूहिक संघर्ष बन गया। परिवार और गाँव दोनों स्तरों पर सरकारी दबाव का सामना किया गया। इससे सत्याग्रह की सामाजिक एकता और मजबूत हुई।
| तथ्यविवरण | विवरण |
|---|---|
| सरकारी कार्रवाई | नोटिस, कुर्की, पशुओं की जब्ती, भूमि जब्ती और नीलामी |
| मई 1928 तक | लगभग 1,600 एकड़ भूमि जब्त कर नए कब्जेदारों को देने की कार्रवाई |
| अन्य कार्रवाई | गिरफ्तारियाँ, जुर्माने और न्यायिक मामले |
| किसानों की रणनीति | लगान न देना, नीलामी में सहयोग न करना और अहिंसक प्रतिरोध |
| प्रमुख महिला कार्यकर्ता | मणिबेन पटेल, मिथुबेन पेटिट, भक्तिबा, शारदाबेन मेहता |
| जुलाई 1928 तक सरकारी वसूली | लगभग ₹1.38 लाख |
| बकाया | लगभग ₹4.84 लाख |
| मुख्य शक्ति | किसान एकता, अनुशासन और अहिंसा |
➣ जुलाई 1928 तक सरकार स्वयं यह स्वीकार कर रही थी कि राजस्व वसूली के सामान्य उपाय अपेक्षित परिणाम नहीं दे रहे थे और बड़ी मात्रा में राजस्व अभी भी बकाया था। आधिकारिक ब्रिटिश विवरण के अनुसार उस समय तक लगभग ₹1.38 लाख राजस्व वसूल हुआ था, जबकि लगभग ₹4.84 लाख अभी बकाया था।
राष्ट्रीय समर्थन और आंदोलन का विस्तार
➣ बारडोली सत्याग्रह के बढ़ते प्रभाव के साथ यह आंदोलन केवल सूरत जिले या गुजरात तक सीमित नहीं रहा। किसानों की एकजुटता, वल्लभभाई पटेल का नेतृत्व और आंदोलन के अहिंसक अनुशासन ने देश के विभिन्न हिस्सों का ध्यान आकर्षित किया।
➣ धीरे-धीरे महात्मा गांधी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, बंबई विधान परिषद के सदस्यों और समाचार-पत्रों का समर्थन आंदोलन को मिलने लगा।
➣ इस प्रकार बारडोली सत्याग्रह धीरे-धीरे एक व्यापक किसान-आधारित जनआंदोलन का रूप लेने लगा। इसका आधार केवल किसी एक जाति या समुदाय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आंदोलन को व्यापक ग्रामीण और राष्ट्रीय समर्थन प्राप्त हुआ।
➣ आंदोलन के समर्थन में हिंदू, मुस्लिम, पारसी और विभिन्न सामाजिक समूहों से जुड़े स्वयंसेवक भी काम कर रहे थे। सत्याग्रह की संगठन व्यवस्था में लगभग 250 सक्रिय स्वयंसेवकों का उल्लेख मिलता है, जिनमें विभिन्न समुदायों के लोग शामिल थे।
➣ इसके अतिरिक्त बारडोली क्षेत्र के कालीपराज आदिवासी समुदाय के हजारों लोगों ने भी आंदोलन का सहयोग किया।
महात्मा गांधी का समर्थन
➣ महात्मा गांधी ने बारडोली आंदोलन को अपना स्पष्ट समर्थन दिया, लेकिन उन्होंने इसका प्रत्यक्ष नेतृत्व अपने हाथ में नहीं लिया।
➣ वल्लभभाई पटेल को आंदोलन का मुख्य नेता बनाए रखा गया और गांधी ने उनके नेतृत्व पर विश्वास किया। गांधी ने अपने लेखों और सार्वजनिक वक्तव्यों के माध्यम से बारडोली किसानों की स्थिति को देश के सामने रखा।
➣ गांधी के लिए बारडोली केवल लगान के प्रश्न का आंदोलन नहीं था। यह इस बात की भी परीक्षा था कि अहिंसा, अनुशासन और सामूहिक असहयोग के माध्यम से किसान सरकार की कठोर राजस्व नीति का सामना कर सकते हैं या नहीं।
➣ गांधी ने अपने पत्र यंग इंडिया के माध्यम से भी बारडोली के संघर्ष को राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित किया। इससे आंदोलन की घटनाएँ गुजरात के बाहर भी व्यापक रूप से लोगों तक पहुँचने लगीं।
कांग्रेस और बंबई विधान परिषद का समर्थन
➣ बारडोली आंदोलन को धीरे-धीरे कांग्रेस संगठन का व्यापक समर्थन मिलने लगा। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने आंदोलन की स्थिति को देश के दूसरे हिस्सों तक पहुँचाने और किसानों के पक्ष में जनमत तैयार करने का प्रयास किया।
➣ ब्रिटिश सरकार के अपने अभिलेखों में भी उल्लेख मिलता है कि पटेल और उनके सहयोगियों ने बाद में पूरे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस संगठन के संसाधनों को आंदोलन के समर्थन में जुटाने का प्रयास किया।
➣ आंदोलन का प्रभाव बंबई विधान परिषद तक भी पहुँचा। गुजरात से जुड़े कई निर्वाचित सदस्यों ने सरकार की राजस्व नीति के विरोध में किसानों के समर्थन में कदम उठाए।
➣ के. एम. मुंशी और लालजी नरांजी ने परिषद की सदस्यता से इस्तीफा देकर अपना विरोध दर्ज कराया। इससे बारडोली का प्रश्न केवल किसानों और स्थानीय प्रशासन के बीच का विवाद नहीं रहा, बल्कि प्रांतीय राजनीतिक मुद्दा बन गया।
➣ बंबई विधान परिषद में इस तरह के राजनीतिक दबाव और बाहर बढ़ते जनसमर्थन ने सरकार पर भी दबाव बढ़ाया। आंदोलन के समर्थन में कुछ अन्य निर्वाचित सदस्यों द्वारा इस्तीफा देने की प्रवृत्ति ने यह संकेत दिया कि सरकार की राजस्व नीति को सभी भारतीय प्रतिनिधि स्वीकार नहीं कर रहे थे।
वल्लभभाई पटेल को “सरदार” की उपाधि
➣ बारडोली सत्याग्रह के दौरान वल्लभभाई पटेल का नेतृत्व किसानों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हो गया। उन्होंने पूरे आंदोलन को अनुशासन, अहिंसा और संगठन के साथ चलाया और सरकारी दबाव के बावजूद किसानों को एकजुट बनाए रखा। इसी कारण बारडोली के लोगों में उनके प्रति सम्मान तेजी से बढ़ा।
➣ आंदोलन के दौरान बारडोली की महिलाओं ने पटेल को सरदार कहकर संबोधित किया। यह उपाधि किसी सरकारी या औपचारिक पद से नहीं मिली थी, बल्कि आंदोलन में उनके नेतृत्व के सम्मान में लोकप्रिय रूप से प्रचलित हुई।
➣ बाद में यही नाम पूरे देश में प्रसिद्ध हो गया और वे सरदार वल्लभभाई पटेल के नाम से जाने जाने लगे। भारत सरकार के अमृत महोत्सव स्रोत में भी बारडोली की महिलाओं द्वारा उन्हें सरदार कहे जाने का उल्लेख है।
| तथ्यविवरण | विवरण |
|---|---|
| महात्मा गांधी | आंदोलन का समर्थन किया, लेकिन प्रत्यक्ष नेतृत्व वल्लभभाई पटेल के पास रहा |
| Young India | गांधी ने बारडोली के पक्ष में लेखों के माध्यम से जनमत बनाया |
| कांग्रेस | राष्ट्रीय स्तर पर संगठनात्मक और राजनीतिक समर्थन |
| बंबई विधान परिषद | किसानों के समर्थन में निर्वाचित सदस्यों का विरोध |
| के. एम. मुंशी | परिषद की सदस्यता से इस्तीफा |
| लालजी नरांजी | परिषद की सदस्यता से इस्तीफा |
| अन्य समर्थन | हिंदू, मुस्लिम, पारसी तथा कालीपराज आदिवासियों का सहयोग |
| “सरदार” | बारडोली की महिलाओं ने वल्लभभाई पटेल को यह उपाधि दी |
| महिला नेता | भक्तिबा, शारदाबेन मेहता, मिथुबेन पेटिट |
सरकार से समझौता और सत्याग्रह की सफलता
➣ बारडोली सत्याग्रह के लगातार बढ़ते प्रभाव और किसानों की दृढ़ता के कारण अंततः बॉम्बे सरकार को अपने रुख पर पुनर्विचार करना पड़ा।
➣ जुलाई 1928 तक आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण बन चुका था। बंबई विधान परिषद के कुछ सदस्यों के इस्तीफे, राष्ट्रीय नेताओं के समर्थन और समाचार-पत्रों में लगातार हो रहे प्रचार ने सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ाया।
➣ किसानों की मुख्य मांग अब भी यही थी कि नई राजस्व दरों की निष्पक्ष, स्वतंत्र और खुली जाँच कराई जाए।
सरकार का जाँच के लिए तैयार होना
➣ सरकार ने प्रारंभ में स्वतंत्र जाँच की मांग स्वीकार करने से इनकार किया था। लेकिन आंदोलन के लगातार जारी रहने के बाद अगस्त 1928 में समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया।
➣ सरकार ने बढ़े हुए राजस्व के प्रश्न की स्वतंत्र जाँच कराने पर सहमति व्यक्त की। इसके साथ सत्याग्रह को समाप्त करने और जब्त संपत्तियों तथा बंदियों से संबंधित मामलों के समाधान की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
➣ सरकार के 18 अक्टूबर 1928 के प्रस्ताव के अनुसार जाँच को full, open and independent बनाया गया। किसानों और उनके प्रतिनिधियों को जाँच के सामने अपने प्रमाण और तर्क प्रस्तुत करने की अनुमति दी गई।
➣ इस प्रकार किसानों की मूल मांग- राजस्व निर्धारण की स्वतंत्र जाँच- को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया गया।
मैक्सवेल–ब्रूमफील्ड जाँच समिति
➣ सरकार ने बारडोली और निकटवर्ती चोरासी तालुका के राजस्व बंदोबस्त की जाँच के लिए आर. एस. ब्रूमफील्ड और आर. एम. मैक्सवेल की अध्यक्षता/सदस्यता वाली विशेष जाँच व्यवस्था बनाई।
➣ समिति ने राजस्व आकलन में इस्तेमाल किए गए आँकड़ों, कृषि लाभ, भूमि के मूल्य, किराए, फसलों, परिवहन सुविधाओं और अन्य परिस्थितियों की विस्तार से जाँच की।
➣ 1929 में प्रकाशित मैक्सवेल–ब्रूमफील्ड रिपोर्ट ने किसानों की कई प्रमुख आपत्तियों को सही माना। समिति ने पाया कि पूर्व के राजस्व आकलन में कृषि से होने वाले संभावित लाभ को अत्यधिक आशावादी ढंग से आँका गया था।
➣ समिति ने विशेष रूप से राजस्व निर्धारण के लिए इस्तेमाल किए गए कुछ आँकड़ों और उनके आकलन की आलोचना की।
22 प्रतिशत से लगभग 6.03 प्रतिशत तक की कमी
➣ मैक्सवेल–ब्रूमफील्ड जाँच का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम राजस्व-वृद्धि में भारी कमी के रूप में सामने आया। पहले स्वीकृत संशोधित बंदोबस्त के अनुसार बारडोली तालुका में कुल राजस्व-वृद्धि लगभग 22 प्रतिशत थी।
➣ जाँच के बाद प्रस्तावित वृद्धि केवल लगभग 6 प्रतिशत रह गई। विस्तृत गणना में यह वृद्धि लगभग ₹30,806 या पुराने आकलन की तुलना में लगभग 6 प्रतिशत थी।
➣ इसी कारण सामान्य इतिहास पुस्तकों और परीक्षा-सामग्री में इसे प्रायः 6.03 प्रतिशत की अंतिम वृद्धि के रूप में लिखा जाता है। इस प्रकार 22 प्रतिशत से लगभग 6.03 प्रतिशत का परिवर्तन बारडोली सत्याग्रह की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जाता है।
➣ समिति ने यह भी माना कि कुछ व्यक्तिगत गाँवों में की गई बहुत अधिक वृद्धि तथ्यों से पर्याप्त रूप से उचित नहीं थी। इसलिए किसानों की मूल शिकायत कि राजस्व-वृद्धि वास्तविक कृषि परिस्थितियों की तुलना में अत्यधिक थी, जाँच के परिणामों से काफी हद तक पुष्ट हुई।
किसानों की भूमि और संपत्ति की वापसी
➣ समझौते की एक महत्वपूर्ण शर्त यह थी कि आंदोलन के दौरान जिन किसानों की भूमि जब्त या कुर्क की गई थी, उसे वापस किया जाए।
➣ इसी प्रकार आंदोलन से संबंधित दंडात्मक कार्रवाइयों को समाप्त करने और गिरफ्तार सत्याग्रहियों को रिहा करने की दिशा में भी कदम उठाए गए। इससे किसानों को अपने आंदोलन के दौरान हुए आर्थिक नुकसान से काफी हद तक राहत मिली।
➣ जिन जमीनों को सरकारी कार्रवाई के बाद दूसरे लोगों को दे दिया गया था, उन्हें वापस दिलाने का प्रश्न भी महत्वपूर्ण था। किसानों के लिए जमीन केवल आर्थिक संपत्ति नहीं थी; वह उनकी आजीविका और सामाजिक स्थिति का आधार थी।
➣ इसलिए जमीन की वापसी सत्याग्रह की प्रमुख मांगों में शामिल थी और समझौते के बाद इसका समाधान किया गया।
| तथ्यविवरण | विवरण |
|---|---|
| सरकार की जाँच की स्वीकृति | 1928 में स्वतंत्र जाँच के लिए सहमति |
| औपचारिक जाँच | 18 अक्टूबर 1928 के सरकारी प्रस्ताव के बाद |
| जाँच समिति | आर. एस. ब्रूमफील्ड और आर. एम. मैक्सवेल |
| रिपोर्ट | 1929 |
| पूर्व संशोधित वृद्धि | लगभग 22% |
| जाँच के बाद वृद्धि | लगभग 6% / 6.03% |
| बारडोली में वास्तविक गणना | लगभग ₹30,806, लगभग 6% वृद्धि |
| मुख्य परिणाम | किसानों की आपत्तियों को काफी हद तक स्वीकार किया गया |
| भूमि | जब्त/कुर्क की गई भूमि वापस करने की प्रक्रिया |
| आंदोलन का स्वरूप | अहिंसक नो-टैक्स सत्याग्रह |
| मुख्य नेता | वल्लभभाई पटेल |
बारडोली सत्याग्रह की सफलता
➣ बारडोली सत्याग्रह को सफल बनाने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि किसानों ने लंबे समय तक एकजुट होकर बढ़ा हुआ लगान देने से इनकार किया।
➣ सरकारी कुर्की, नीलामी और दबाव के बावजूद आंदोलन में बड़े पैमाने पर हिंसा नहीं हुई। इस कारण सरकार के लिए आंदोलन को बलपूर्वक समाप्त करना राजनीतिक रूप से भी कठिन होता गया।
➣ आंदोलन की सफलता में वल्लभभाई पटेल का नेतृत्व, स्थानीय कार्यकर्ताओं का संगठन, महिलाओं की सक्रिय भागीदारी, गांधी और कांग्रेस का समर्थन तथा राष्ट्रीय जनमत का दबाव महत्वपूर्ण था। लेकिन सबसे मूल शक्ति स्वयं बारडोली के किसानों की सामूहिक दृढ़ता और अनुशासन थी।
➣ बारडोली आंदोलन की सफलता का अर्थ यह नहीं था कि किसानों को पूरी तरह कोई नया लगान नहीं देना पड़ा। वास्तव में अंतिम राजस्व-वृद्धि समाप्त नहीं हुई, बल्कि अत्यधिक बढ़ी हुई दर को घटाकर लगभग 6.03 प्रतिशत किया गया। इसलिए परीक्षा में बारडोली में लगान पूरी तरह माफ कर दिया गया लिखना गलत होगा।
➣ इस प्रकार बारडोली सत्याग्रह की मूल मांग- अनुचित राजस्व-वृद्धि की स्वतंत्र जाँच- स्वीकार हुई, 22 प्रतिशत की वृद्धि घटकर लगभग 6.03 प्रतिशत हुई, जब्त भूमि वापस की गई और आंदोलन से संबंधित दमनात्मक कार्रवाइयों को समाप्त करने की दिशा में कदम उठाए गए। यही इस सत्याग्रह की वास्तविक सफलता थी।
बारडोली सत्याग्रह : महत्वपूर्ण तथ्य
➣ बारडोली तालुका तत्कालीन बॉम्बे प्रेसीडेंसी के सूरत जिले का हिस्सा था और इसकी अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित थी।
➣ बारडोली में भूमि-राजस्व के नए बंदोबस्त के दौरान सरकार ने प्रारंभ में लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि का प्रस्ताव किया, जिसे बाद में घटाकर लगभग 22 प्रतिशत किया गया।
➣ सितंबर 1927 में बारडोली के किसानों ने बढ़े हुए भू-राजस्व के विरोध में आंदोलन की तैयारी शुरू की तथा निष्पक्ष जाँच की मांग उठाई।
➣ किसानों ने आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए वल्लभभाई पटेल से अनुरोध किया। पटेल ने किसानों की तैयारी और एकजुटता की जाँच करने के बाद नेतृत्व स्वीकार किया।
➣ 12 फरवरी, 1928 को बारडोली के किसानों ने बढ़े हुए भू-राजस्व का भुगतान न करने का औपचारिक निर्णय लिया। इसी के साथ बारडोली सत्याग्रह का संगठित चरण शुरू हुआ।
➣ बारडोली सत्याग्रह का मुख्य आधार अहिंसा, सामूहिक असहयोग, किसान एकता और अनुशासन था।
➣ सत्याग्रह के दौरान सरकार ने किसानों की भूमि, पशु एवं अन्य संपत्ति की कुर्की और जब्ती की तथा कुछ संपत्तियों की नीलामी की कार्रवाई भी की।
➣ बारडोली सत्याग्रह में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी रही। मणिबेन पटेल, मिथुबेन पेटिट, भक्तिबा और शारदाबेन मेहता जैसी महिलाओं ने आंदोलन के संगठन और प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ बारडोली सत्याग्रह को महात्मा गांधी का समर्थन प्राप्त था, लेकिन आंदोलन का प्रत्यक्ष नेतृत्व वल्लभभाई पटेल ने किया।
➣ के. एम. मुंशी और लालजी नरांजी जैसे बंबई विधान परिषद के सदस्यों ने किसानों के समर्थन में अपनी सदस्यता से इस्तीफा दिया।
➣ आंदोलन के प्रचार के लिए “बारडोली सत्याग्रह पत्रिका” प्रकाशित की गई, जिसके माध्यम से सरकारी कार्रवाई, सत्याग्रह की गतिविधियों और नेताओं के संदेशों को लोगों तक पहुँचाया गया।
➣ बारडोली सत्याग्रह के दौरान वल्लभभाई पटेल को बारडोली की महिलाओं ने “सरदार” की उपाधि से संबोधित किया। इसके बाद वे देशभर में “सरदार वल्लभभाई पटेल” के नाम से प्रसिद्ध हुए।
➣ सरकार ने अंततः स्वतंत्र और खुली जाँच के लिए सहमति दी। इसके बाद मैक्सवेल–ब्रूमफील्ड जाँच के माध्यम से बारडोली के राजस्व बंदोबस्त की समीक्षा की गई।
➣ मैक्सवेल–ब्रूमफील्ड जाँच के बाद बारडोली में पहले निर्धारित लगभग 22 प्रतिशत लगान-वृद्धि घटाकर लगभग 6.03 प्रतिशत कर दी गई।
➣ सत्याग्रह के बाद जब्त और कुर्क की गई किसानों की भूमि वापस करने की प्रक्रिया शुरू की गई तथा आंदोलन से जुड़े मामलों में भी राहत दी गई।
➣ बारडोली सत्याग्रह की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि किसानों ने बिना हिंसा किए, लंबे समय तक एकजुट रहकर सरकार को राजस्व नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया।
➣ बारडोली सत्याग्रह ने वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया और उन्हें आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल होने का आधार प्रदान किया।
➣ बारडोली सत्याग्रह को गांधीवादी किसान सत्याग्रह का एक सफल उदाहरण माना जाता है, जिसने आगे के राष्ट्रीय आंदोलनों में अहिंसक जनसंगठन और सामूहिक असहयोग की प्रभावशीलता को प्रदर्शित किया।
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