अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन (1918)
➣ अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन भारत के प्रारंभिक संगठित श्रमिक आंदोलनों में से एक था। यह आंदोलन अहमदाबाद के कपड़ा मिल मजदूरों ने अपनी मजदूरी और जीवन-यापन की कठिनाइयों को लेकर चलाया।
➣ इसमें महात्मा गांधी ने पहली बार किसी औद्योगिक श्रमिक विवाद में सत्याग्रह और अहिंसा का महत्वपूर्ण प्रयोग किया।
➣ आंदोलन की पृष्ठभूमि में प्रथम विश्व युद्ध के कारण बढ़ी महँगाई, 1917–18 के प्लेग और मजदूरों को दिए जाने वाले प्लेग बोनस से जुड़ी परिस्थितियाँ थीं।
➣ जब मजदूरों और मिल मालिकों के बीच वेतन को लेकर विवाद बढ़ा, तब मजदूरों ने सामूहिक रूप से अपनी मांग रखी और गांधी ने उनके पक्ष में मध्यस्थता की।
➣ इस आंदोलन में अनसूया साराभाई ने मजदूरों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जबकि अंबालाल साराभाई प्रमुख मिल मालिकों में थे। गांधी, अनसूया साराभाई, शंकरलाल बैंकर और वल्लभभाई पटेल की भूमिका ने आंदोलन को संगठित रूप देने में सहायता की।
पृष्ठभूमि
अहमदाबाद का औद्योगिक विकास
➣ 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अहमदाबाद में सूती कपड़ा उद्योग तेजी से विकसित हुआ। शहर में कपास की उपलब्धता, गुजरात के कपास उत्पादक क्षेत्रों से निकटता और परिवहन सुविधाओं के विकास ने इसे एक महत्वपूर्ण औद्योगिक केंद्र बना दिया।
➣ 20वीं शताब्दी के प्रारंभ तक अहमदाबाद को पश्चिमी भारत के प्रमुख कपड़ा मिल केंद्रों में गिना जाने लगा था।
➣ मिलों के विस्तार के साथ शहर में बड़ी संख्या में मजदूरों की आवश्यकता पैदा हुई। आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों और गुजरात के विभिन्न हिस्सों से लोग रोजगार की तलाश में अहमदाबाद आने लगे।
➣ इस प्रकार धीरे-धीरे एक अलग शहरी औद्योगिक मजदूर वर्ग विकसित हुआ, जिसकी आय मुख्यतः मिलों में मिलने वाली मजदूरी पर निर्भर थी।
➣ अहमदाबाद के कपड़ा उद्योग में केवल पुरुष मजदूर ही नहीं, बल्कि महिलाएँ और बच्चे भी विभिन्न प्रकार के कामों में लगाए जाते थे।
➣ औद्योगिक श्रम व्यवस्था में काम के लंबे घंटे, अनुशासन और मिल मालिकों द्वारा निर्धारित मजदूरी सामान्य विशेषताएँ थीं। मजदूरों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति मिल मालिकों की तुलना में काफी कमजोर थी।
मिल मजदूरों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति
➣ उस समय औद्योगिक मजदूरों के लिए आज जैसी मजबूत ट्रेड यूनियन व्यवस्था या वैधानिक श्रम सुरक्षा विकसित नहीं हुई थी।
➣ इसलिए मजदूरों की मजदूरी, काम के घंटे और अन्य कार्य-शर्तों पर उनकी सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति सीमित थी। किसी विवाद की स्थिति में व्यक्तिगत मजदूर के पास मिल मालिक के सामने बहुत कम शक्ति होती थी।
➣ अहमदाबाद के मजदूरों का एक बड़ा वर्ग निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले परिवारों से आता था। उनकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन, कपड़े, आवास और अन्य दैनिक आवश्यकताओं पर खर्च होता था।
➣ इसलिए मजदूरी में थोड़ी सी कमी या आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि भी उनके जीवन पर सीधा प्रभाव डालती थी।
➣ इस समय मजदूरों के लिए आवास की समस्या, स्वच्छता की कमी और बीमारियों का खतरा भी महत्वपूर्ण था।
➣ तेजी से बढ़ती औद्योगिक आबादी के कारण शहर के कुछ हिस्सों में भीड़ और अस्वास्थ्यकर परिस्थितियाँ पैदा हुईं। यही परिस्थितियाँ बाद में प्लेग जैसी महामारी के प्रभाव को और गंभीर बनाती थीं।
प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव
➣ 1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने के बाद भारत की अर्थव्यवस्था में व्यापक परिवर्तन हुए।
➣ युद्धकालीन मांग के कारण कुछ उद्योगों में उत्पादन बढ़ा, लेकिन साथ ही खाद्यान्न, कपड़ा और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हुई। अहमदाबाद के मिल मजदूरों की वास्तविक आय पर भी इसका दबाव पड़ा।
➣ कपड़ा उद्योग को युद्धकालीन मांग से लाभ मिला और मिलों के उत्पादन तथा व्यावसायिक गतिविधियों में वृद्धि हुई। लेकिन मजदूरों की मजदूरी और जीवन-यापन की लागत के बीच संतुलन बिगड़ने लगा।
➣ इसलिए उद्योग के विस्तार का लाभ मजदूरों की वास्तविक आर्थिक स्थिति में उसी अनुपात में दिखाई नहीं दिया।
➣ इस प्रकार युद्ध ने अहमदाबाद के मिल मजदूरों के सामने एक विरोधाभासी स्थिति पैदा की – एक ओर कपड़ा उद्योग को अधिक काम और बाजार मिला, दूसरी ओर महँगाई ने मजदूरों की क्रय-शक्ति को प्रभावित किया। आगे चलकर यही आर्थिक दबाव वेतन संबंधी विवाद की महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि बना।
1917–18 का प्लेग और मिल मजदूर
➣ अहमदाबाद में 1917–18 के दौरान प्लेग का प्रकोप भी महत्वपूर्ण था। महामारी के कारण शहर और मिलों में काम करने वाले मजदूरों के सामने स्वास्थ्य और जीवन की गंभीर समस्या पैदा हुई।
➣ बीमारी के कारण अनेक मजदूर शहर छोड़कर अपने गाँवों की ओर चले जाते थे, जिससे मिलों के उत्पादन पर भी असर पड़ता था।
➣ मजदूरों को मिलों में बनाए रखने के लिए मिल मालिकों ने उन्हें अतिरिक्त भुगतान देना शुरू किया, जिसे बाद में प्लेग बोनस कहा गया।
➣ इस अतिरिक्त भुगतान से मजदूरों की आय बढ़ी और उन्हें कठिन परिस्थितियों के बावजूद मिलों में काम जारी रखने के लिए प्रोत्साहन मिला।
➣ हालांकि प्लेग की स्थिति में सुधार होने और मजदूरों की वापसी के बाद इस अतिरिक्त भुगतान के भविष्य को लेकर मिल मालिकों और मजदूरों के बीच मतभेद पैदा होने लगे। यही विवाद आगे चलकर 1918 के आंदोलन का तत्काल आधार बना।
अनसूया साराभाई की भूमिका और गांधी का प्रवेश
➣ अहमदाबाद के मिल मजदूरों में संगठित श्रमिक चेतना का विकास 1917–18 के विवाद से पहले ही शुरू हो चुका था।
अनसूया साराभाई ने मजदूरों, विशेषकर महिला श्रमिकों, की समस्याओं को समझने और उन्हें संगठित करने का कार्य किया। वे मजदूरों के वेतन, काम की परिस्थितियों और सामाजिक स्थिति से जुड़े प्रश्नों को सार्वजनिक रूप से उठाती थीं।➣ दूसरी ओर अंबालाल साराभाई अहमदाबाद के प्रमुख मिल मालिकों में से थे और अहमदाबाद मिल ओनर्स एसोसिएशन से जुड़े हुए थे। इस प्रकार अनसूया साराभाई और अंबालाल साराभाई एक ही परिवार से होते हुए भी श्रमिक प्रश्न पर अलग-अलग पक्षों से जुड़े थे।
➣ महात्मा गांधी के दोनों से व्यक्तिगत संबंध थे, जिससे बाद में विवाद में गांधी के हस्तक्षेप का एक महत्वपूर्ण सामाजिक आधार भी बना। गांधी के अपने विवरण में भी अहमदाबाद मिल विवाद में उनके हस्तक्षेप को अंबालाल और अनसूया साराभाई से उनके निकट संबंधों से जोड़ा गया है।
मजदूरों की सामूहिक संगठन-व्यवस्था
➣ 1917 के अंत तक अहमदाबाद में मजदूरों की सामूहिक संगठन क्षमता दिखाई देने लगी थी। 4 दिसंबर 1917 को अनसूया साराभाई ने स्पिनिंग विभाग के मजदूरों को संबोधित किया। यह घटना अहमदाबाद के संगठित श्रमिक आंदोलन के विकास में एक महत्वपूर्ण चरण मानी जाती है। उसी समय प्लेग बोनस से संबंधित विवाद ने मजदूरों को सामूहिक रूप से अपनी आर्थिक मांगें रखने के लिए प्रेरित किया।
➣ मजदूरों के बीच नियमित बैठकें आयोजित की जाने लगीं और उनकी शिकायतों को सामूहिक रूप से सामने रखा जाने लगा। अनसूया साराभाई तथा अन्य कार्यकर्ता मजदूरों के घरों तक जाकर उनकी समस्याएँ समझते थे।
➣ इस प्रक्रिया से मजदूरों में यह भावना मजबूत हुई कि व्यक्तिगत रूप से मिल मालिकों से बातचीत करने के बजाय सामूहिक रूप से अपनी मांग रखना अधिक प्रभावी होगा।
➣ इस संगठनात्मक प्रयास का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह था कि मजदूरों की समस्या केवल वेतन पाने वाले कर्मचारियों की व्यक्तिगत शिकायत नहीं रही, बल्कि सामूहिक श्रमिक अधिकार का प्रश्न बन गई।
यही परिवर्तन आगे चलकर अहमदाबाद मिल आंदोलन को एक संगठित हड़ताल में बदलने की आधारभूमि बना।गांधी का प्रवेश
➣ फरवरी 1918 तक मिल मालिकों और मजदूरों के बीच विवाद इतना गंभीर हो चुका था कि एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता महसूस हुई जो दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता कर सके।
➣ अनसूया साराभाई ने गांधी से इस विवाद में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया। गांधी का अंबालाल साराभाई से व्यक्तिगत संबंध था और वे अनसूया साराभाई के सामाजिक कार्य से भी परिचित थे। इसी कारण वे विवाद में मध्यस्थ के रूप में सामने आए।
➣ गांधी 6 फरवरी 1918 से लगभग लगातार अहमदाबाद में रहे और मजदूर विवाद को समझने तथा दोनों पक्षों के बीच समझौते का रास्ता निकालने का प्रयास किया।
उनके हस्तक्षेप का शुरुआती उद्देश्य सीधे हड़ताल कराना नहीं था, बल्कि मजदूरों और मिल मालिकों के बीच मध्यस्थता और पंच-निर्णय (arbitration) के माध्यम से विवाद सुलझाना था।➣ 14 फरवरी 1918 को एक पंचाट/Arbitration Board बनाने की सहमति बनी। मजदूरों की ओर से महात्मा गांधी, शंकरलाल बैंकर और वल्लभभाई पटेल को शामिल किया गया, जबकि मिल मालिकों की ओर से अंबालाल साराभाई, जगाभाई दलपतभाई और चंदुलाल प्रतिनिधि बने। तत्कालीन कलेक्टर को अध्यक्ष बनाया गया। इसका उद्देश्य प्लेग बोनस के स्थान पर मजदूरों को दी जाने वाली उचित वेतन-वृद्धि का निर्धारण करना था।
➣ इस समय गांधी का दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से समझौता और पंच-निर्णय के माध्यम से विवाद समाप्त करने का था। वे चाहते थे कि मजदूर अपनी शिकायतों को अनुशासित और शांतिपूर्ण तरीके से रखें तथा मिल मालिकों के साथ न्यायपूर्ण समझौते का प्रयास किया जाए।
| तिथि / तथ्य | विवरण |
|---|---|
| 1914 | अनसूया साराभाई की मजदूरों के बीच सक्रिय संगठनात्मक भूमिका |
| 4 दिसंबर 1917 | अनसूया साराभाई ने स्पिनिंग विभाग के मजदूरों को संबोधित किया |
| 6 फरवरी 1918 | गांधी अहमदाबाद में विवाद में सक्रिय रूप से जुड़े |
| 14 फरवरी 1918 | मजदूर–मिल मालिक विवाद के लिए पंचाट की व्यवस्था |
| मजदूर पक्ष | गांधी, शंकरलाल बैंकर, वल्लभभाई पटेल |
| मिल मालिक पक्ष | अंबालाल साराभाई, जगाभाई दलपतभाई, चंदुलाल |
| अध्यक्ष | तत्कालीन कलेक्टर |
| गांधी की भूमिका | प्रारंभ में मध्यस्थता/पंचाट, बाद में अहिंसक श्रमिक संघर्ष का नेतृत्व |
| अनसूया साराभाई | मजदूर संगठन की प्रमुख कार्यकर्ता |
| अंबालाल साराभाई | प्रमुख मिल मालिक और मिल मालिक पक्ष के प्रतिनिधि |
35% वेतन-वृद्धि की मांग और हड़ताल
➣ पंचाट बनने के बाद मजदूरों के कुछ समूह काम पर नहीं गए। मिल मालिकों ने इसे पंचाट के साथ हुई सहमति का उल्लंघन माना और अपने प्रतिनिधियों को पंचाट से वापस ले लिया।
➣ इसके बाद 22 फरवरी 1918 से मिलों में lock-out की स्थिति पैदा हो गई। गांधी और मजदूर प्रतिनिधियों के सामने अब पहले की तुलना में अधिक कठिन परिस्थिति थी।
➣ प्लेग के दौरान मिलों में काम जारी रखने के लिए मजदूरों को मिलने वाला प्लेग बोनस अब समाप्त किया जा रहा था, जबकि युद्धकालीन महँगाई के कारण मजदूरों के घरेलू खर्च पहले की तुलना में काफी बढ़ चुके थे।
➣ इसलिए मजदूरों के सामने प्रश्न केवल बोनस समाप्त होने का नहीं, बल्कि उनकी वास्तविक आय और जीवन-यापन का था।
➣ मजदूरों ने अपनी स्थिति को देखते हुए वेतन में 50 प्रतिशत वृद्धि की मांग रखी। दूसरी ओर मिल मालिक लगभग 20 प्रतिशत वृद्धि देने के लिए तैयार थे।
➣ गांधी ने मजदूरों की आर्थिक स्थिति और उनकी मांग का अध्ययन करने के बाद 35 प्रतिशत वेतन-वृद्धि को उचित समझा। यह 50 प्रतिशत की मांग और मालिकों की 20 प्रतिशत पेशकश के बीच एक व्यावहारिक समझौता था।
➣ गांधी ने मजदूरों को समझाया कि उनका संघर्ष केवल अधिक वेतन पाने के लिए नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण वेतन प्राप्त करने के लिए होना चाहिए।
हड़ताल का आरंभ
➣ गांधी ने मजदूरों को समझाया कि यदि वे हड़ताल करते हैं तो उन्हें अनुशासन, अहिंसा और एकता बनाए रखनी होगी। उन्होंने मजदूरों से प्रतिज्ञा लेने को कहा कि वे 35 प्रतिशत वेतन-वृद्धि की मांग पूरी होने या विवाद के पंचाट द्वारा समाधान होने तक काम पर वापस नहीं लौटेंगे। मजदूरों ने सामूहिक रूप से इस प्रतिज्ञा को स्वीकार किया।
➣ मिल मालिकों द्वारा 35 प्रतिशत वृद्धि स्वीकार नहीं किए जाने के बाद 26 फरवरी 1918 से मजदूरों ने काम बंद कर दिया।
➣ हजारों मजदूर हड़ताल में शामिल हुए और प्रतिदिन सभाएँ एवं शांतिपूर्ण जुलूस आयोजित किए जाने लगे। इस प्रकार सामान्य मजदूरी विवाद धीरे-धीरे गांधी के नेतृत्व वाले अहिंसक श्रमिक सत्याग्रह का रूप लेने लगा।
➣ हड़ताल के दौरान गांधी और उनके सहयोगी लगातार मजदूरों के संपर्क में रहे। मजदूरों को नियमित रूप से समझाया जाता था कि वे किसी प्रकार की हिंसा, तोड़फोड़ या जबरदस्ती न करें। दैनिक सभाएँ, प्रार्थनाएँ और संदेश मजदूरों की एकता बनाए रखने के महत्वपूर्ण साधन बने।
➣ हड़ताल लंबी खिंचने के कारण मजदूरों के सामने आर्थिक कठिनाइयाँ बढ़ने लगीं। नियमित मजदूरी बंद होने से उनके परिवारों पर दबाव पड़ा और कुछ मजदूरों का हड़ताल से पीछे हटने का विचार बनने लगा।
गांधी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती मजदूरों को उनकी सामूहिक प्रतिज्ञा पर कायम रखना था।गांधी का उपवास (15 मार्च 1918)
➣ 15 मार्च 1918 को गांधी ने मजदूरों के सामने घोषणा की कि जब तक उनकी 35 प्रतिशत वेतन-वृद्धि की मांग का समाधान नहीं होता, वे भोजन ग्रहण नहीं करेंगे और मोटरकार में भी नहीं बैठेंगे। यह गांधी का भारत में किसी सार्वजनिक आर्थिक प्रश्न पर पहला प्रमुख उपवास था।
गांधीजी का भारत में पहला राजनीतिक उपवास- अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन, 1918
➣ इस प्रकार उन्होंने मजदूरों की प्रतिज्ञा को बनाए रखने के लिए अनिश्चितकालीन उपवास शुरू किया। यह उपवास 15 से 17 मार्च 1918 तक चला।
➣ अनसूया साराभाई और कुछ अन्य सहयोगियों ने पहले दिन गांधी के साथ उपवास करने की इच्छा व्यक्त की, लेकिन गांधी ने उन्हें आगे उपवास न करने के लिए समझाया।
➣ गांधी के उपवास से मिल मालिकों पर नैतिक दबाव बढ़ा। मिल मालिकों का नेतृत्व अंबालाल साराभाई कर रहे थे। गांधी का उनके साथ व्यक्तिगत संबंध था, इसलिए स्थिति उनके लिए भी जटिल थी।
➣ गांधी स्वयं बाद में स्वीकार करते हैं कि उनके उपवास से मिल मालिकों पर दबाव पड़ा था और वे इस बात को लेकर चिंतित थे कि कहीं समझौता उनकी इच्छा के विरुद्ध दबाव में न हो जाए।
➣ समझौते का रास्ता निकालने में आनंदशंकर ध्रुव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंततः उन्हें मध्यस्थ के रूप में स्वीकार किया गया। मजदूरों और मिल मालिकों के बीच बातचीत आगे बढ़ी और आंदोलन समाप्त करने की शर्तों पर सहमति बनी।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| मजदूरों की प्रारंभिक मांग | 50% वेतन-वृद्धि |
| मिल मालिकों की पेशकश | 20% वेतन-वृद्धि |
| गांधी की मांग | 35% वेतन-वृद्धि |
| प्रारंभिक तरीका | वार्ता और पंचाट |
| मजदूरों की प्रतिज्ञा | 35% वृद्धि या पंचाट तक काम पर वापस नहीं लौटना |
| नियमित हड़ताल | 26 फरवरी 1918 |
| हड़ताल का स्वरूप | शांतिपूर्ण एवं अहिंसक |
| प्रमुख महिला नेता | अनसूया साराभाई |
| मिल मालिक पक्ष | अंबालाल साराभाई |
| गांधी की श्रमिक नीति | वर्ग-संघर्ष के बजाय वर्ग-सहयोग |
| दैनिक गतिविधियाँ | सभा, प्रार्थना, जुलूस और बुलेटिन |
| मजदूरों का मनोबल | लगभग दो सप्ताह बाद कमजोर पड़ने लगा |
| गांधी का उपवास | 15 मार्च 1918 |
| उपवास की अवधि | 3 दिन |
| मुख्य महिला नेता | अनसूया साराभाई |
| मुख्य मांग | उचित/न्यायपूर्ण वेतन-वृद्धि |
समझौता (18 मार्च 1918)
➣ 18 मार्च 1918 को मिल मालिकों और मजदूरों के बीच एक समझौता हुआ। समझौते के बाद गांधी ने अपना तीन दिन का उपवास समाप्त कर दिया।
➣ समझौते में मजदूरों को पहले दिन 35 प्रतिशत वेतन-वृद्धि, दूसरे दिन 20 प्रतिशत तथा इसके बाद अंतिम वृद्धि का निर्धारण मध्यस्थ द्वारा किए जाने की व्यवस्था थी।
➣ गांधी इस व्यवस्था से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे, क्योंकि वे चाहते थे कि मजदूरों के वेतन का अंतिम निर्णय किसी निष्पक्ष पंचाट द्वारा हो। फिर भी उन्होंने समझौते को स्वीकार किया, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उनके उपवास के कारण मिल मालिकों पर अनुचित दबाव पड़े।
➣ समझौते के बाद लगभग 21 दिनों से चल रही हड़ताल समाप्त हो गई। इस प्रकार समझौते के साथ मजदूरों का तत्काल संघर्ष समाप्त हुआ और आगे वेतन-वृद्धि का अंतिम निर्धारण मध्यस्थ पर छोड़ दिया गया।
➣ इसके बाद नियुक्त मध्यस्थ ने लगभग तीन महीने तक मामले की जाँच की। उसने मजदूरों की मांग तथा दोनों पक्षों के तर्कों का अध्ययन करने के बाद 35 प्रतिशत वेतन-वृद्धि की सिफारिश की। इस प्रकार अंततः मजदूरों की मूल मांग के अनुसार 35 प्रतिशत वेतन-वृद्धि कायम रही।
आंदोलन की विशेषताएँ एवं गांधी की श्रमिक नीति
➣ अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन (1918) की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि गांधी ने सामान्य औद्योगिक हड़ताल को सत्याग्रह के सिद्धांतों से जोड़ने का प्रयास किया।
➣ उनके लिए मजदूरों की मांग तभी नैतिक रूप से मजबूत हो सकती थी जब वे अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए भी अहिंसा, आत्मसंयम, अनुशासन और सत्य का पालन करें।
अहिंसा और अनुशासन
➣ गांधी ने मजदूरों को स्पष्ट रूप से समझाया कि हड़ताल का अर्थ मिल मालिकों के प्रति शत्रुता या हिंसा नहीं है। उन्होंने मजदूरों के सामने चार प्रमुख शर्तें रखीं-
- हिंसा नहीं करनी है,
- काम पर लौटने वाले मजदूरों को परेशान नहीं करना है,
- भिक्षा या दान पर निर्भर नहीं रहना है और हड़ताल कितनी भी लंबी चले,
- अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहना है तथा ईमानदार श्रम से जीवन-निर्वाह करना है।
➣ इन शर्तों से गांधी की श्रमिक राजनीति की मूल विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं। वे मजदूरों की सामूहिक शक्ति को स्वीकार करते थे, लेकिन उसे हिंसक वर्ग-संघर्ष में बदलने के पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि मजदूर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए भी प्रतिद्वंद्वी पक्ष के प्रति घृणा से बच सकते हैं।
➣ आंदोलन के दौरान एक टेक के बैनर के साथ अपनी प्रतिज्ञा पर कायम रहने का संदेश देते थे। इससे आंदोलन में सामूहिक अनुशासन मजबूत हुआ।
सत्याग्रह की पद्धति और गांधी की भूमिका
➣ गांधी ने अहमदाबाद विवाद में सीधे हड़ताल से शुरुआत नहीं की। उनका पहला प्रयास वार्ता और पंचाट के माध्यम से समझौता कराने का था।
➣ वे चाहते थे कि मजदूर और मिल मालिक किसी निष्पक्ष व्यवस्था के सामने अपना पक्ष रखें तथा विवाद का समाधान सहमति या पंचाट से हो। जब यह प्रयास विफल हुआ, तभी उन्होंने मजदूरों को हड़ताल का मार्ग अपनाने की सलाह दी।
➣ इस क्रम से गांधी की श्रमिक नीति की एक महत्वपूर्ण विशेषता सामने आती है – हड़ताल अंतिम उपाय होनी चाहिए, पहला नहीं। उनके लिए श्रमिक संघर्ष का उद्देश्य केवल आर्थिक दबाव बनाना नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण समझौता प्राप्त करना था। इसी कारण वे मजदूरों को अपनी मांग पर दृढ़ रहने के साथ-साथ मिल मालिकों से बातचीत का रास्ता खुला रखने की सलाह देते रहे।
➣ गांधी ने मजदूरों के बीच जाकर उनकी जीवन-परिस्थितियों और घरेलू बजट का अध्ययन भी कराया। वे यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि मजदूरों की मांग वास्तविक परिस्थितियों पर आधारित हो।
➣ इस जांच के बाद उन्होंने 35 प्रतिशत वेतन-वृद्धि को उचित माना। इस प्रकार उनका सत्याग्रह केवल भावनात्मक अपील पर नहीं, बल्कि तथ्य और आर्थिक न्याय के आधार पर खड़ा करने का प्रयास था।
अनसूया साराभाई की भूमिका
➣ अनसूया साराभाई अहमदाबाद के मजदूर आंदोलन में गांधी से पहले ही सक्रिय थीं। उन्होंने मजदूरों के बीच संगठन और जागरूकता का काम किया तथा 1918 के संघर्ष में गांधी के प्रमुख सहयोगियों में रहीं।
➣ उनका महत्व इसलिए भी विशेष था कि वे स्वयं एक प्रमुख मिल मालिक अंबालाल साराभाई की बहन थीं, फिर भी उन्होंने मजदूरों की मांग का समर्थन किया।
➣ अनसूया साराभाई ने इससे पहले भी मिल मजदूरों के बीच काम किया था और 1914 की मजदूर हड़ताल के दौरान श्रमिकों को संगठित करने में भूमिका निभाई थी। इस प्रारंभिक अनुभव ने आगे चलकर 1918 के आंदोलन के लिए संगठनात्मक आधार तैयार किया।
➣ अहमदाबाद म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के इतिहास के अनुसार, अनसूया ने 1914 की हड़ताल में मजदूरों को संगठित करने में मदद की थी और 1918 के आंदोलन में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
➣ इस कारण अहमदाबाद आंदोलन केवल गांधी के नेतृत्व का परिणाम नहीं था। इसमें स्थानीय महिला नेतृत्व और पहले से मौजूद श्रमिक संगठन की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
शंकरलाल बैंकर और वल्लभभाई पटेल की भूमिका
➣ शंकरलाल बैंकर गांधी के निकट सहयोगियों में थे और अहमदाबाद के मजदूर आंदोलन में संगठनात्मक कार्य तथा मजदूरों के बीच संपर्क बनाए रखने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ वे उस पंचाट में भी मजदूर पक्ष के प्रतिनिधि थे, जिसमें गांधी और वल्लभभाई पटेल भी शामिल थे।
➣ वल्लभभाई पटेल भी मजदूर पक्ष की ओर से पंचाट में शामिल हुए और गांधी के सहयोगी के रूप में आंदोलन को संगठित करने में योगदान दिया।
➣ हालांकि 1918 के अहमदाबाद मिल आंदोलन में उनका स्थान बाद के बारडोली सत्याग्रह (1928) जैसी व्यापक किसान राजनीति की तुलना में अपेक्षाकृत सीमित था।
➣ इस प्रकार गांधी का वैचारिक एवं सत्याग्रहात्मक नेतृत्व, अनसूया साराभाई का मजदूर संगठन, शंकरलाल बैंकर का संगठनात्मक सहयोग और वल्लभभाई पटेल की पंचाट में भूमिका मिलकर आंदोलन के नेतृत्व पक्ष को मजबूत बनाते थे।
मिल मालिकों के साथ गांधी के संबंध
➣ गांधी का मिल मालिकों के साथ संबंध भी इस आंदोलन की एक विशिष्ट विशेषता था। अंबालाल साराभाई गांधी के परिचित और उनके आश्रम को आर्थिक सहायता देने वाले प्रमुख व्यक्तियों में थे।
➣ दूसरी ओर अंबालाल की बहन अनसूया मजदूरों के पक्ष में खड़ी थीं। गांधी स्वयं इस स्थिति को कठिन मानते थे क्योंकि उन्हें अपने मित्र अंबालाल के विरुद्ध मजदूरों के पक्ष में संघर्ष करना पड़ रहा था।
➣ इसके बावजूद गांधी ने व्यक्तिगत संबंधों को श्रमिकों के न्यायसंगत दावे के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया। वे मिल मालिकों के प्रति व्यक्तिगत शत्रुता के बजाय निष्पक्ष समझौते पर जोर देते रहे। उनका प्रयास था कि पूँजीपति और मजदूर एक-दूसरे को दुश्मन मानने के बजाय सहयोगी संबंध विकसित करें।
अहमदाबाद मॉडल और आगे की श्रमिक राजनीति
➣ अहमदाबाद के अनुभव ने गांधी को यह समझने में मदद की कि श्रमिक संगठन और सत्याग्रह को एक-दूसरे से जोड़ा जा सकता है। मजदूरों को केवल हड़ताल के लिए तैयार करना पर्याप्त नहीं है।
➣ उन्हें संगठन, अनुशासन, वैकल्पिक आजीविका और दीर्घकालीन श्रमिक संस्था से जोड़ना भी आवश्यक है।
➣ स्वयं गांधी ने बाद में लिखा कि 1918 की हड़ताल के दौरान उन्हें मजदूरों के लिए वैकल्पिक रोजगार की आवश्यकता का विचार आया, ताकि वे हड़ताल के समय दान पर निर्भर न रहें।
➣ आगे चलकर 1920 में अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन (मजूर महाजन संघ) का गठन हुआ, जिसे गांधीवादी श्रमिक संगठन के एक महत्वपूर्ण मॉडल के रूप में विकसित किया गया।
➣ इसमें स्वैच्छिक पंचाट, अहिंसा और पूँजी–श्रम सहयोग को महत्व दिया गया। इससे स्पष्ट होता है कि 1918 का आंदोलन केवल तत्काल वेतन-विवाद नहीं था, बल्कि गांधी की संगठित श्रमिक नीति के विकास का भी महत्वपूर्ण प्रारंभिक चरण था।
➣ हालांकि अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन आंदोलन का विकास केवल अहमदाबाद आंदोलन का परिणाम नहीं था।
31 अक्टूबर 1920 को ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की स्थापना के साथ श्रमिक आंदोलन को अखिल भारतीय स्तर पर नया संगठनात्मक मंच मिला। अहमदाबाद का गांधीवादी मॉडल इसी व्यापक श्रमिक आंदोलन की एक अलग और विशिष्ट धारा था।| पहलू | मुख्य तथ्य |
|---|---|
| महत्व | मजदूर संघर्ष को सत्याग्रह और अहिंसा से जोड़ा |
| गांधी की नीति | वर्ग-संघर्ष के बजाय वर्ग-सहयोग |
| प्रमुख महिला कार्यकर्ता | अनसूया साराभाई |
| दीर्घकालीन परिणाम | 1920 में अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन / मजूर महाजन संघ |
| अखिल भारतीय संदर्भ | AITUC की स्थापना — 31 अक्टूबर 1920 |
| मुख्य सीमा | मुख्यतः अहमदाबाद कपड़ा मजदूरों तक सीमित |
| आंदोलन का केंद्रीय प्रश्न | वेतन और औद्योगिक संबंध |
| गांधीवादी साधन | सत्याग्रह, अहिंसा, प्रतिज्ञा, पंचाट और उपवास |
| ऐतिहासिक विरासत | गांधीवादी श्रमिक संगठन और औद्योगिक विवादों में अहिंसक संघर्ष का मॉडल |
आंदोलन की सीमाएँ
➣ अहमदाबाद आंदोलन की पहली सीमा यह थी कि इसका मुख्य आधार अहमदाबाद की कपड़ा मिलों के मजदूर थे। इसलिए इसका प्रभाव तत्काल रूप से पूरे भारत के औद्योगिक मजदूर वर्ग तक नहीं पहुँचा। इसे एक क्षेत्रीय औद्योगिक संघर्ष के रूप में देखना अधिक उचित है।
➣ दूसरी सीमा यह थी कि आंदोलन का मुख्य प्रश्न वेतन-वृद्धि था। इसमें काम के घंटे, श्रम सुरक्षा, आवास, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिकों के व्यापक औद्योगिक अधिकार जैसे प्रश्न अपेक्षाकृत पीछे रहे। इसलिए इसे आधुनिक अर्थ में श्रमिक अधिकारों के व्यापक कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जा सकता।
➣ तीसरी सीमा गांधी की वर्ग-सहयोग की नीति से संबंधित थी। गांधी मजदूरों के अधिकारों का समर्थन करते थे, लेकिन वे पूँजी और श्रम के बीच स्थायी संघर्ष के पक्षधर नहीं थे।
➣ इस कारण उनका मॉडल उन परिस्थितियों में सीमित हो सकता था जहाँ मिल मालिक और मजदूरों के हितों में बुनियादी टकराव अधिक गहरा हो।
➣ आंदोलन की एक महत्वपूर्ण सीमा यह भी थी कि मजदूरों की सफलता काफी हद तक गांधी के व्यक्तिगत नेतृत्व और नैतिक प्रभाव पर निर्भर रही। लंबे समय तक चलने वाले स्वतंत्र श्रमिक संगठन और व्यापक सामूहिक बहस की संस्थागत व्यवस्था उस समय अभी प्रारंभिक अवस्था में थी।
➣ इसके अलावा उपवास जैसी गांधीवादी पद्धति की अपनी सीमाएँ थीं। गांधी का उपवास मजदूरों का मनोबल बढ़ाने और मिल मालिकों पर नैतिक दबाव बनाने में प्रभावी रहा,
➣ लेकिन औद्योगिक विवादों के स्थायी समाधान के लिए केवल नैतिक दबाव पर्याप्त नहीं हो सकता। इसके लिए मजबूत श्रमिक संगठन, सामूहिक सौदेबाजी और स्थायी श्रम संस्थाओं की भी आवश्यकता होती है।
महत्वपूर्ण तथ्य
➣ अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन वर्ष 1918 में अहमदाबाद के कपड़ा मिल मजदूरों द्वारा वेतन संबंधी मांगों को लेकर चलाया गया एक महत्वपूर्ण श्रमिक आंदोलन था।
➣ अहमदाबाद उस समय बॉम्बे प्रेसीडेंसी का प्रमुख कपड़ा उद्योग केंद्र था और यहाँ बड़ी संख्या में मिल मजदूर कार्यरत थे।
➣ 1917–18 के प्लेग के दौरान मजदूरों को मिलों में काम करते रहने के लिए अतिरिक्त “प्लेग बोनस” दिया गया था। प्लेग की स्थिति में सुधार के बाद इस बोनस को समाप्त करने के प्रश्न ने मजदूरों और मिल मालिकों के बीच विवाद को जन्म दिया।
➣ अनसूया साराभाई ने अहमदाबाद के मजदूरों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे मजदूरों की समस्याओं के पक्ष में सक्रिय थीं, जबकि उनके भाई अंबालाल साराभाई प्रमुख मिल मालिकों में थे।
➣ फरवरी 1918 में महात्मा गांधी ने मिल मजदूरों और मिल मालिकों के विवाद में हस्तक्षेप किया। प्रारंभ में उन्होंने मध्यस्थता और पंचाट के माध्यम से विवाद सुलझाने का प्रयास किया।
➣ 14 फरवरी 1918 को मजदूरों और मिल मालिकों के विवाद को पंचाट के माध्यम से सुलझाने की व्यवस्था बनी। मजदूरों की ओर से महात्मा गांधी, शंकरलाल बैंकर और वल्लभभाई पटेल शामिल थे।
➣ मजदूरों ने प्रारंभ में 50 प्रतिशत वेतन-वृद्धि की मांग की, जबकि मिल मालिक लगभग 20 प्रतिशत वृद्धि देने के लिए तैयार थे। गांधी ने 35 प्रतिशत वेतन-वृद्धि को उचित मांग माना।
➣ 26 फरवरी 1918 से मजदूरों की हड़ताल का संगठित चरण शुरू हुआ। हड़ताल के दौरान मजदूरों ने सभाएँ, शांतिपूर्ण जुलूस और सामूहिक प्रार्थनाएँ आयोजित कीं।
➣ हड़ताल लंबी खिंचने पर मजदूरों का मनोबल कमजोर पड़ने लगा। इसी परिस्थिति में 15 मार्च 1918 को गांधी ने मजदूरों की मांग पूरी होने तक उपवास करने का निर्णय लिया।
➣ गांधी का यह तीन दिवसीय उपवास अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन की निर्णायक घटनाओं में से एक था और साथ ही यह भारत में गांधी का पहला सार्वजनिक उपवास माना जाता है।
➣ अहमदाबाद आंदोलन गांधी की श्रमिक नीति का प्रारंभिक उदाहरण था, जिसमें उन्होंने वर्ग-संघर्ष के बजाय वर्ग-सहयोग, पंचाट, नैतिक दबाव और अहिंसक संघर्ष पर जोर दिया।
➣ अंबालाल साराभाई के साथ गांधी के व्यक्तिगत संबंध होने के बावजूद गांधी ने मजदूरों की न्यायसंगत मांग का समर्थन किया। इससे उनके लिए व्यक्तिगत संबंध और सार्वजनिक न्याय के बीच संतुलन का प्रश्न भी सामने आया।
➣ अहमदाबाद आंदोलन ने आगे चलकर 1920 में अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन (मजूर महाजन संघ) जैसे स्थायी गांधीवादी श्रमिक संगठन की पृष्ठभूमि तैयार की।
➣ 31 अक्टूबर 1920 को ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की स्थापना हुई। अहमदाबाद का गांधीवादी श्रमिक मॉडल इसी दौर में विकसित हो रहे व्यापक भारतीय ट्रेड यूनियन आंदोलन की एक विशिष्ट धारा था।
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