प्रथम विश्व युद्ध और भारत (1914-1918) : भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन, अर्थव्यवस्था एवं समाज पर प्रभाव

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प्रथम विश्व युद्ध : परिचय

प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) आधुनिक विश्व इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी, जिसने यूरोप के साथ-साथ एशिया, अफ्रीका और विश्व के अन्य क्षेत्रों की राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज को गहराई से प्रभावित किया।

➣ युद्ध की शुरुआत यूरोप में हुई, लेकिन ब्रिटिश, फ्रांसीसी और अन्य औपनिवेशिक शक्तियों के विशाल साम्राज्यों के कारण यह शीघ्र ही एक वैश्विक युद्ध बन गया।

➣ भारत भी इस युद्ध से सीधे प्रभावित हुआ, क्योंकि उस समय भारत ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा था। भारतीय सैनिकों, धन, कच्चे माल और अन्य संसाधनों का बड़े पैमाने पर युद्ध के लिए उपयोग किया गया।

➣ युद्ध के दौरान भारत में आर्थिक दबाव, महँगाई, औद्योगिक परिवर्तन, सामाजिक संकट और राजनीतिक असंतोष बढ़ा।

➣ प्रथम विश्व युद्ध का भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। युद्ध के प्रारंभ में भारतीय नेताओं ने ब्रिटिश सरकार को सहयोग दिया और इसके बदले राजनीतिक सुधार तथा स्वशासन की अपेक्षा की।

➣ लेकिन युद्ध के दौरान होमरूल आंदोलन, क्रांतिकारी गतिविधियों और स्वशासन की मांग के विस्तार ने भारतीय राजनीति को नए चरण में पहुँचा दिया।

पृष्ठभूमि

➣ प्रथम विश्व युद्ध किसी एक घटना का परिणाम नहीं था। इसके पीछे लंबे समय से विकसित हो रहे साम्राज्यवाद, उग्र राष्ट्रवाद, सैन्यवाद, हथियारों की होड़ और यूरोप की गुटबंदी जैसे कई कारण थे।

➣ 1904 से 1914 के बीच मोरक्को संकट, बोस्निया संकट और बाल्कन युद्धों जैसी घटनाओं ने यूरोपीय शक्तियों के बीच अविश्वास और तनाव को लगातार बढ़ाया।

साम्राज्यवाद और औपनिवेशिक प्रतिद्वंद्विता

➣ 19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में यूरोपीय शक्तियों के बीच एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशों तथा प्रभाव-क्षेत्रों को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ गई।

➣ ब्रिटेन और फ्रांस के पास पहले से विशाल साम्राज्य थे, जबकि जर्मनी अपेक्षाकृत बाद में एकीकृत होकर औपनिवेशिक विस्तार की दौड़ में शामिल हुआ। इससे यूरोपीय शक्तियों के बीच आर्थिक और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज हुई।

मोरक्को संकट (1905–06 और 1911) जैसे विवादों ने विशेष रूप से जर्मनी और फ्रांस के बीच तनाव बढ़ाया। इन संकटों के दौरान ब्रिटेन का झुकाव फ्रांस की ओर बढ़ा और यूरोप की शक्ति-राजनीति अधिक स्पष्ट रूप से दो बड़े गुटों में बँटने लगी।

सैन्यवाद और हथियारों की होड़

➣ युद्ध से पहले यूरोप की प्रमुख शक्तियों ने अपनी सेनाओं और नौसेनाओं का तेजी से विस्तार किया। औद्योगिक क्रांति के कारण नई सैन्य तकनीक और अधिक विनाशकारी हथियार विकसित हो रहे थे।

➣ विशेष रूप से जर्मनी और ब्रिटेन के बीच नौसैनिक हथियारों की होड़ ने दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ाया।

➣ हथियारों की इस बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने सुरक्षा की भावना मजबूत करने के बजाय आपसी भय बढ़ाया। जर्मनी को रूस की बढ़ती सैन्य शक्ति की चिंता थी, जबकि ब्रिटेन जर्मन नौसेना के विस्तार को अपने साम्राज्य और समुद्री प्रभुत्व के लिए खतरे के रूप में देख रहा था।

➣ इस प्रकार सैन्यवाद और हथियारों की होड़ ने यूरोप को किसी बड़े संकट की स्थिति में युद्ध की ओर जाने के लिए अधिक तैयार बना दिया।

उग्र राष्ट्रवाद और बाल्कन संकट

➣ यूरोप में राष्ट्रवाद भी तेजी से उग्र रूप ले रहा था। विशेष रूप से बाल्कन क्षेत्र में विभिन्न जातीय समूह अपने लिए स्वतंत्र या विस्तृत राष्ट्रीय राज्य की मांग कर रहे थे।

सर्बिया का प्रभाव बढ़ रहा था, जबकि ऑस्ट्रिया-हंगरी अपने बहु-राष्ट्रीय साम्राज्य की एकता बनाए रखना चाहता था। इस कारण सर्बिया और ऑस्ट्रिया-हंगरी के बीच तनाव लगातार बढ़ता गया।

1908–09 का बोस्निया संकट और 1912–13 के बाल्कन युद्धों ने इस क्षेत्र को यूरोपीय शक्ति-संघर्ष का सबसे संवेदनशील केंद्र बना दिया।

➣ रूस सर्बिया और व्यापक स्लाव हितों का समर्थन कर रहा था, जबकि जर्मनी ऑस्ट्रिया-हंगरी के साथ खड़ा था। इस प्रकार बाल्कन का कोई स्थानीय विवाद भी बड़ी यूरोपीय शक्तियों के बीच संघर्ष में बदल सकने की स्थिति पैदा हो गई।

यूरोप की गुटबंदी

➣ युद्ध से पहले यूरोप की प्रमुख शक्तियाँ दो बड़े राजनीतिक-सैन्य गुटों में संगठित हो चुकी थीं। एक ओर ट्रिपल एलायंस में जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और इटली शामिल थे।

➣ दूसरी ओर ट्रिपल एंतांते के अंतर्गत ब्रिटेन, फ्रांस और रूस के बीच समझ विकसित हुई। हालांकि दोनों व्यवस्थाएँ हर स्थिति में एक जैसी औपचारिक सैन्य संधियाँ नहीं थीं, लेकिन उन्होंने यूरोप में शक्ति-संतुलन को स्पष्ट रूप से दो पक्षों में बाँट दिया था।

➣ गुटबंदी का प्रभाव यह हुआ कि किसी एक देश का संकट कई देशों के हितों से जुड़ सकता था। इसलिए स्थानीय संघर्ष के व्यापक युद्ध में बदलने का खतरा बढ़ गया।

➣ हालांकि केवल गुटबंदी को युद्ध का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता। यह साम्राज्यवाद, सैन्यवाद, राष्ट्रवाद और शक्ति-संघर्ष के साथ मिलकर अधिक खतरनाक बनी।

साराजेवो की घटना और युद्ध का तत्काल कारण

➣ इन सभी तनावों के बीच 28 जून 1914 को बोस्निया के साराजेवो में ऑस्ट्रिया-हंगरी के युवराज आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड और उनकी पत्नी सोफी की हत्या कर दी गई।

➣ हत्यारा गैवरिलो प्रिंसिप था, जो बोस्नियाई सर्ब राष्ट्रवादी था। इस घटना ने पहले से मौजूद यूरोपीय तनाव को तत्काल राजनीतिक संकट में बदल दिया।

➣ ऑस्ट्रिया-हंगरी ने हत्या के लिए सर्बिया को जिम्मेदार ठहराते हुए कठोर कदम उठाए। जर्मनी ने ऑस्ट्रिया-हंगरी को समर्थन दिया, जबकि रूस सर्बिया के पक्ष में खड़ा हुआ।

➣ इसके बाद जुलाई 1914 में कूटनीतिक संकट तेजी से बढ़ा और विभिन्न देशों की लामबंदी तथा युद्ध घोषणाओं ने इसे व्यापक युद्ध में बदल दिया।

28 जुलाई 1914 को ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की। इसके बाद रूस, जर्मनी, फ्रांस और अंततः ब्रिटेन के शामिल होने के साथ युद्ध तेजी से यूरोप के बड़े हिस्से में फैल गया।

➣ इस प्रकार साराजेवो की हत्या तत्काल कारण बनी, जबकि युद्ध की वास्तविक पृष्ठभूमि कई वर्षों से विकसित हो रहे अंतरराष्ट्रीय तनाव में थी।

तथ्यविवरण
युद्ध की अवधि 1914–1918
तत्काल कारण साराजेवो में फ्रांज फर्डिनेंड की हत्या
हत्या 28 जून 1914
हत्यारा गैवरिलो प्रिंसिप
ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया पर युद्ध घोषित किया 28 जुलाई 1914
ट्रिपल एलायंस जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, इटली
ट्रिपल एंतांते ब्रिटेन, फ्रांस, रूस
प्रमुख दीर्घकालिक कारण साम्राज्यवाद, राष्ट्रवाद, सैन्यवाद, हथियारों की होड़ और गुटबंदी
महत्वपूर्ण पूर्ववर्ती संकट मोरक्को संकट, बोस्निया संकट, बाल्कन युद्ध

प्रथम विश्व युद्ध में भारत की भागीदारी

प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) में भारत ने ब्रिटिश साम्राज्य के हिस्से के रूप में व्यापक स्तर पर भाग लिया। भारत ने केवल सैनिक ही उपलब्ध नहीं कराए, बल्कि धन, युद्ध सामग्री, श्रमिक और अन्य संसाधन भी ब्रिटिश युद्ध-प्रयास में लगाए।

भारतीय सैनिकों का युद्ध में योगदान

1914 में भारत की सैन्य व्यवस्था में भारतीय सैनिकों के साथ ब्रिटिश सैनिक और देशी रियासतों की Imperial Service Troops भी शामिल थीं। युद्ध बढ़ने के साथ भारतीय सेना में बड़े पैमाने पर नई भर्ती की गई।

अगस्त 1914 से दिसंबर 1919 के बीच भारत से लगभग 8,77,068 combatants और 5,63,369 non-combatants की भर्ती हुई, अर्थात कुल लगभग 14,40,437 लोग युद्ध-सेवा से जुड़े। इनमें से 10 लाख से अधिक भारतीय सैनिक और सैन्य कर्मी विदेशों में तैनात किए गए।

➣ कुल मिलाकर भारतीय उपमहाद्वीप से लगभग 12.7 से 14 लाख लोगों की युद्धकालीन सेवा का उल्लेख मिलता है, जिसमें अलग-अलग स्रोत लड़ाकू एवं गैर-लड़ाकू कर्मियों को अलग-अलग तरीके से गिनते हैं।

➣ भारतीय सेना की भागीदारी युद्ध के आरंभ से ही दिखाई देने लगी थी। 1914 में भारतीय सेना की लाहौर और मेरठ डिवीजनों की टुकड़ियाँ पश्चिमी मोर्चे पर भेजी गईं और भारतीय सैनिकों ने फ्रांस तथा बेल्जियम के मोर्चों पर लड़ाई लड़ी।

➣ पश्चिमी मोर्चे पर भारतीय सैनिकों की पहली बड़ी तैनाती सितंबर 1914 से शुरू हुई और 1914 के अंत तक भारतीय पैदल तथा घुड़सवार डिवीजनों ने यूरोपीय मोर्चे पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ भारतीय सैनिकों ने युद्ध के लगभग सभी प्रमुख मोर्चों पर सेवा की। उन्हें फ्रांस और बेल्जियम के पश्चिमी मोर्चे, मेसोपोटामिया, पूर्वी अफ्रीका, मिस्र, फिलिस्तीन, गैलीपोली और मैसेडोनिया जैसे क्षेत्रों में भेजा गया। इस प्रकार भारतीय सेना की भूमिका किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रही।

➣ पश्चिमी मोर्चे पर भारतीय सैनिकों ने Ypres, La Bassée, Festubert, Neuve Chapelle, Loos, Somme और Cambrai जैसी प्रमुख लड़ाइयों में भाग लिया। लगभग 1,38,600 भारतीय सैनिक पश्चिमी मोर्चे पर पहुँचे थे।

➣ भारतीय सैनिकों ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में युद्ध किया। आधुनिक औद्योगिक युद्ध, मशीनगन, तोपखाने और खाइयों में लड़ाई उनके लिए बिल्कुल नया अनुभव था। युद्ध के दौरान भारतीय सेना को भारी जनहानि भी हुई।

➣ विभिन्न स्रोतों के अनुसार 1.2 लाख से अधिक भारतीय सैनिक मारे गए, घायल हुए या लापता हुए, जबकि बड़ी संख्या में सैनिकों को युद्धबंदी भी बनाया गया।

➣ भारतीय सैनिकों की बहादुरी को ब्रिटिश सरकार ने विभिन्न सैन्य सम्मानों से मान्यता दी। लगभग 12,000 से अधिक सैन्य अलंकरण भारतीय सैनिकों को मिले और 12 भारतीय सैनिकों को Victoria Cross प्राप्त हुआ, जो ब्रिटिश साम्राज्य का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार था।

रियासतों और अन्य भारतीय संसाधनों का योगदान

➣ प्रथम विश्व युद्ध में देशी रियासतों ने भी ब्रिटिश युद्ध-प्रयास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। लगभग 29 रियासतें युद्ध से पहले Imperial Service Troops व्यवस्था के अंतर्गत सैनिक उपलब्ध करा रही थीं।

➣ युद्ध के दौरान लगभग 18,000 Imperial Service सैनिकों ने मेसोपोटामिया, मिस्र, फिलिस्तीन और पूर्वी अफ्रीका जैसे मोर्चों पर सेवा की।

➣ भारतीय रियासतों के शासकों ने सैनिकों के अतिरिक्त धन, अस्पताल, एम्बुलेंस, परिवहन और अन्य सुविधाओं के लिए भी सहायता दी। अनेक शासकों ने व्यक्तिगत रूप से ब्रिटिश युद्ध-प्रयास के प्रति अपनी निष्ठा प्रदर्शित की।

➣ भारत ने युद्ध के लिए बड़ी मात्रा में अनाज, कपास, जूट, ऊन, चमड़ा, खनिज, सैन्य सामग्री और परिवहन संसाधन उपलब्ध कराए। लगभग 1,85,000 पशु– जिनमें घोड़े, ऊँट और खच्चर शामिल थे- भी युद्ध-प्रयास के लिए उपलब्ध कराए गए।

➣ भारत ने युद्ध के लिए केवल वस्तुओं और सैनिकों के रूप में ही योगदान नहीं दिया, बल्कि प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता भी प्रदान की। भारत सरकार ने ब्रिटिश युद्ध-व्यय में योगदान के लिए £100 million की विशेष राशि दी। युद्ध के पाँच वर्षों में भारत का कुल शुद्ध सैन्य व्यय भी बहुत बड़ा था।

युद्ध के समय भारत का प्रारंभिक राजनीतिक रुख एव गाँधी

➣ युद्ध के आरंभ में भारतीय राजनीतिक नेतृत्व का एक बड़ा वर्ग ब्रिटिश सरकार के युद्ध-प्रयासों के प्रति अपेक्षाकृत सहयोगी था।

➣ कांग्रेस के कई नेताओं और उदारवादियों को आशा थी कि युद्ध में भारतीय सहयोग के बदले ब्रिटिश सरकार युद्ध के बाद संवैधानिक सुधार और स्वशासन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाएगी।

➣ इसी व्यापक राजनीतिक वातावरण में महात्मा गांधी का युद्ध के प्रति रुख भी सहयोग का था। वे 1914 में गांधी भारत लौटे थे और ब्रिटिश सरकार के प्रति सहयोग के माध्यम से भारतीयों के राजनीतिक दावों को मजबूत करने की संभावना देखते थे।

➣ गांधी का मानना था कि भारतीयों को ब्रिटिश साम्राज्य के संकट के समय सहयोग देकर यह दिखाना चाहिए कि वे राजनीतिक जिम्मेदारी और भविष्य के स्वशासन के योग्य हैं।

➣ युद्ध के दौरान गांधी ने पहले भी ब्रिटिश साम्राज्य के लिए Ambulance Corps जैसी मानवीय सेवाओं में सहयोग किया था। लेकिन 1918 में उनका रुख एक नए रूप में सामने आया, जब उन्होंने सीधे भारतीय सैनिकों की भर्ती का समर्थन किया।

अप्रैल 1918 में वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड ने दिल्ली में वॉर कांफ्रेंस आयोजित की, जिसका उद्देश्य भारत से ब्रिटिश युद्ध-प्रयास के लिए अधिक समर्थन प्राप्त करना था। गांधी को भी इसमें आमंत्रित किया गया।

➣ गांधी प्रारंभ में सम्मेलन में जाने को लेकर हिचकिचा रहे थे, क्योंकि बाल गंगाधर तिलक, एनी बेसेंट और अली बंधुओं जैसे प्रभावशाली नेताओं को सम्मेलन में शामिल नहीं किया गया था। फिर भी बाद में वे सम्मेलन में गए और भारतीयों की सैनिक भर्ती के प्रस्ताव का समर्थन किया।

➣ गांधी का यह रुख विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि वे स्वयं अहिंसा के सिद्धांत पर जोर देते थे। उन्होंने इस विरोधाभास को इस विचार के माध्यम से समझाया कि भारतीयों में पहले बलिदान और साहस के साथ हथियार उठाने की क्षमता होनी चाहिए। तभी उनकी अहिंसा कमजोरी नहीं बल्कि सचेत नैतिक चुनाव होगी।

गांधी का सैनिक भर्ती अभियान और Recruiting Sergeant

➣ वॉर कांफ्रेंस के बाद गांधी ने केवल भाषणों में समर्थन नहीं दिया, बल्कि 1918 में सैनिक भर्ती अभियान में सक्रिय भूमिका निभाई।

➣ उन्होंने विशेष रूप से खेड़ा और गुजरात के क्षेत्रों में लोगों को ब्रिटिश सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने गाँव-गाँव जाकर लोगों से सेना में शामिल होने की अपील की।

गांधी के इस सक्रिय भर्ती अभियान के कारण उन्हें आलोचनात्मक अथवा व्यंग्यात्मक रूप से Recruiting Sergeant (भर्ती करने वाला सार्जेंट) कहा गया।

➣ गांधी ने 22 जून 1918 को नडियाद में अपने भर्ती अभियान के लिए अपील भी की। उन्होंने भारतीयों से सेना में शामिल होकर युद्ध में ब्रिटिश साम्राज्य की सहायता करने का आग्रह किया।

➣ हालांकि व्यवहार में उन्हें अपेक्षित संख्या में भर्ती कराने में सफलता नहीं मिली। जुलाई 1918 में उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि वे अभी तक एक भी व्यक्ति को भर्ती कराने में सफल नहीं हुए थे।

➣ गांधी का विश्वास था कि भारतीयों द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य के संकट में सहयोग करने से भविष्य में ब्रिटिश सरकार भारतीयों को स्वराज और राजनीतिक अधिकार देने के लिए अधिक तैयार होगी। लेकिन युद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार का वास्तविक व्यवहार उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहा।

गांधी को मिली “उपाधि” और उससे जुड़ा तथ्य

➣ गांधी के 1918 के भर्ती अभियान को लेकर बाद में उनके लिए Recruiting Sergeant की पहचान प्रसिद्ध हुई।

➣ ध्यान रखना चाहिए कि यह सरकारी पद या आधिकारिक उपाधि नहीं थी, बल्कि उनके भर्ती अभियान के संदर्भ में प्रयुक्त एक राजनीतिक/व्यंग्यात्मक संबोधन था। इसलिए परीक्षा में इसे गांधी को ब्रिटिश सरकार ने सार्जेंट की उपाधि दी लिखना गलत होगा।

➣ इसी प्रकार प्रथम विश्व युद्ध के संदर्भ में गांधी की भूमिका को केवल ब्रिटिश समर्थक कहकर छोड़ना भी सही नहीं होगा। उनका उद्देश्य उस समय ब्रिटिश साम्राज्य के संकट में सहयोग के माध्यम से भारतीय राजनीतिक दावों को मजबूत करना था।

➣ युद्ध के बाद की घटनाओं- विशेषकर मोंटेग्यू घोषणा, रॉलेट एक्ट और पंजाब में दमन– ने उनके राजनीतिक रुख में बड़ा परिवर्तन पैदा किया।

तथ्य विवरण
युद्ध 1914–1918
कुल भारतीय भर्ती (1914–19) लगभग 14,40,437 combatants + non-combatants
विदेशों में सेवा 10 लाख से अधिक
प्रमुख मोर्चे फ्रांस-बेल्जियम, मेसोपोटामिया, पूर्वी अफ्रीका, मिस्र, फिलिस्तीन, गैलीपोली, मैसेडोनिया
पश्चिमी मोर्चे पर लगभग 1,38,600 भारतीय सैनिक
Victoria Cross 12 भारतीय सैनिकों को
Imperial Service Troops लगभग 18,000 ने विदेशी मोर्चों पर सेवा की
भारतीय विशेष आर्थिक योगदान £100 million की विशेष राशि
War Conference अप्रैल 1918, दिल्ली
अध्यक्षता/आयोजन वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड
गांधी की भूमिका सैनिक भर्ती का समर्थन
भर्ती अभियान विशेष रूप से खेड़ा/गुजरात में
प्रसिद्ध संबोधन Recruiting Sergeant

युद्ध का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव डाला। ब्रिटिश साम्राज्य के लिए भारत सैनिकों, कच्चे माल, खाद्यान्न, पशुओं और धन का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गया।

➣ युद्ध के कारण एक ओर सरकार का सैन्य एवं वित्तीय खर्च तेजी से बढ़ा और आम जनता पर कर एवं महँगाई का बोझ पड़ा, वहीं दूसरी ओर आयात में कमी तथा युद्धकालीन मांग के कारण कुछ भारतीय उद्योगों को तेजी से विस्तार का अवसर मिला।

युद्ध व्यय, करों में वृद्धि और युद्ध ऋण

➣ युद्ध के दौरान भारत सरकार का रक्षा व्यय तेजी से बढ़ा। यह 1913–14 में लगभग £20 मिलियन से बढ़कर 1918–19 तक £41 मिलियन से अधिक हो गया।

➣ भारतीय सैनिकों की तैनाती, युद्ध सामग्री, परिवहन और अन्य सैन्य आवश्यकताओं पर होने वाला खर्च इसका प्रमुख कारण था।

➣ इस बढ़ते खर्च को पूरा करने के लिए सरकार ने युद्ध ऋण उठाए और करों में वृद्धि की। आयकर का महत्व भी तेजी से बढ़ा।

➣ जहाँ 1911–12 में आयकर सरकारी सकल राजस्व का लगभग 2% देता था, वहीं 1917–18 में इसका हिस्सा लगभग 11.75% हो गया। 1916 में आयकर व्यवस्था में बदलाव करके व्यक्तिगत आय और व्यावसायिक लाभ को अधिक प्रभावी ढंग से कराधान के दायरे में लाया गया।

➣ युद्धकालीन असाधारण मुनाफे पर नियंत्रण के लिए 1917 में Excess Profits Duty लागू की गई। इसका उद्देश्य युद्ध से असामान्य रूप से अधिक लाभ कमाने वाले व्यवसायों पर अतिरिक्त कर लगाना था।

➣ इसी दौर में Super-tax की व्यवस्था भी लागू की गई, जिससे ऊँची आय और कॉर्पोरेट लाभ पर कर का बोझ बढ़ा।

आयात शुल्क में भी वृद्धि हुई। सामान्य आयात शुल्क को 1916 में 5% से बढ़ाकर 7.5% किया गया। 1917 में सूती वस्त्रों पर आयात शुल्क भी 7.5% तक बढ़ाया गया। इससे भारतीय उद्योगों को विदेशी वस्तुओं से कुछ अतिरिक्त सुरक्षा मिली।

➣ दूसरी ओर, भारतीय मिलों में बने सूती कपड़े पर लगाया जाने वाला प्रतिकारी उत्पादन शुल्क आयात शुल्क की तुलना में कम बना रहा। इस अंतर से भारतीय सूती वस्त्र उद्योग को घरेलू बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिला और युद्धकालीन औद्योगिक विस्तार को प्रोत्साहन मिला।

➣ ब्रिटिश युद्ध-प्रयास में भारत ने प्रत्यक्ष आर्थिक योगदान भी दिया। 1917 में भारत सरकार ने £100 मिलियन की राशि ब्रिटिश युद्ध कोष को दी। इस योगदान को बड़े पैमाने पर सार्वजनिक ऋण से वित्तपोषित किया गया, जिससे भारतीय राजकोष पर युद्धोत्तर वर्षों में भी वित्तीय बोझ बना रहा।

महँगाई और जनता पर आर्थिक दबाव

➣ युद्ध के कारण महँगाई तेजी से बढ़ी। समुद्री परिवहन में बाधा, आयात में कमी, सेना की मांग और वस्तुओं की आपूर्ति में कठिनाई के कारण खाद्यान्न, नमक, मिट्टी का तेल, कपड़ा और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। 1914 से 1918 के बीच अनेक वस्तुओं की कीमतें लगभग दोगुनी हो गईं।

➣ महँगाई का सबसे अधिक प्रभाव शहरी मजदूरों, निम्न आय वाले परिवारों और कृषि मजदूरों पर पड़ा। मजदूरी में वृद्धि कीमतों की वृद्धि के अनुपात में नहीं हुई, जिससे वास्तविक क्रय-शक्ति कम हुई और जीवन-यापन कठिन हो गया।

➣ युद्ध के अंतिम वर्षों में खाद्यान्न संकट की स्थिति और खराब हुई। 1918–19 तथा 1920–21 के आसपास फसल संबंधी कठिनाइयों और खाद्यान्न उपलब्धता की समस्या ने ग्रामीण संकट को बढ़ाया।

इसी दौर में 1918 के इन्फ्लुएंज़ा महामारी ने भी आर्थिक गतिविधियों को बुरी तरह प्रभावित किया, जिससे महँगाई और खाद्य संकट और गहरा गया।

विदेशी व्यापार, आयात में कमी और व्यापार अधिशेष

➣ युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय व्यापार और समुद्री जहाजरानी बुरी तरह प्रभावित हुई। जर्मनी के साथ व्यापार लगभग समाप्त हो गया, जबकि ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों के साथ व्यापार भी जहाजों की कमी और युद्धकालीन परिवहन संकट से प्रभावित हुआ। परिणामस्वरूप भारत में विदेशी निर्मित वस्तुओं का आयात घटने लगा।

➣ आयात में गिरावट के साथ भारत का व्यापार अधिशेष बढ़ा। भारत से ब्रिटेन और अन्य क्षेत्रों को वस्तुओं का निर्यात जारी रहा, लेकिन औपनिवेशिक वित्तीय व्यवस्था के कारण इस व्यापार से उत्पन्न स्टर्लिंग शेष का बड़ा हिस्सा लंदन में ही जमा रहा।

➣ इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को उस पूंजी का पूरा लाभ नहीं मिल पाया जो सामान्य परिस्थितियों में घरेलू निवेश के लिए उपलब्ध हो सकती थी।

➣ आयात में कमी का एक दूसरा प्रभाव यह हुआ कि भारत में पहले विदेशों से आने वाली कई वस्तुओं की घरेलू मांग को पूरा करने के लिए देशी उद्योगों को आगे बढ़ने का अवसर मिला। इस प्रकार युद्ध ने भारत में आयात-प्रतिस्थापन की प्रक्रिया को तेज किया।

भारतीय उद्योगों का विस्तार

➣ युद्ध के दौरान ब्रिटिश और यूरोपीय उद्योग स्वयं युद्ध सामग्री बनाने में व्यस्त थे और भारत में तैयार माल का आयात घट गया। इससे भारतीय उद्योगों के लिए घरेलू बाजार का विस्तार हुआ।

➣ विशेष रूप से सूती वस्त्र, जूट, चमड़ा, इस्पात और कुछ रासायनिक उद्योगों को युद्धकालीन मांग से लाभ मिला।

सूती वस्त्र उद्योग को विशेष लाभ हुआ क्योंकि लैंकाशायर से आने वाले कपड़ों का आयात कम हो गया। बंबई और अहमदाबाद की मिलों को घरेलू बाजार में अधिक अवसर मिले तथा सेना के लिए वर्दी, कपड़ा, टेंट और अन्य सामग्री की मांग भी बढ़ी।

1917–18 में भारतीय cotton piece-goods का उत्पादन युद्ध-पूर्व वर्षों की तुलना में लगभग 50% अधिक था।

जूट उद्योग को भी युद्धकालीन मांग से लाभ मिला। बंगाल की जूट मिलों ने सेना के लिए बड़ी मात्रा में बोरे और sandbags बनाए।

➣ हालांकि यूरोपीय बाजार, विशेषकर जर्मनी के साथ व्यापार के बंद होने और समुद्री परिवहन की कठिनाइयों के कारण जूट व्यापार का सामान्य निर्यात ढाँचा प्रभावित हुआ।

चमड़ा उद्योग को सैन्य आवश्यकताओं से विशेष बढ़ावा मिला। सेना के लिए जूते, बेल्ट, टेंट सामग्री और घोड़ों तथा खच्चरों के लिए चमड़े के सामान की मांग बढ़ी, जिससे कानपुर और आगरा जैसे केंद्रों की टेनरियों को विस्तार का अवसर मिला।

TISCO और भारतीय इस्पात उद्योग

➣ युद्धकाल में टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO) को महत्वपूर्ण सरकारी आदेश मिले।

➣ मेसोपोटामिया में ब्रिटिश सेना की आवश्यकताओं के लिए लगभग 1,500 मील लंबी सैन्य रेलवे बिछाई जा रही थी और इसके लिए TISCO को बड़ी मात्रा में रेल की पटरियाँ उपलब्ध कराने का आदेश मिला।

➣ युद्धकालीन मांग के कारण TISCO का उत्पादन लगभग पूरी तरह सरकारी सैन्य आदेशों की ओर चला गया। इससे TISCO को आर्थिक संकट से बाहर निकलने में मदद मिली और भारतीय इस्पात उद्योग को दीर्घकालिक मजबूती मिली।

➣ इस प्रकार युद्ध ने भारतीय औद्योगिक पूंजी के विकास के लिए ऐसा अवसर पैदा किया जो सामान्य परिस्थितियों में उपलब्ध नहीं था।

UPSC की दृष्टि से- युद्ध → विदेशी आयात में कमी → घरेलू मांग में वृद्धि → भारतीय उद्योगों का विस्तार → TISCO को युद्धकालीन सरकारी आदेश

जूट और नकदी फसलों पर मिश्रित प्रभाव

➣ युद्ध का प्रभाव सभी फसलों पर एक जैसा नहीं था। जिन कृषि उत्पादों की मांग सेना और युद्ध अर्थव्यवस्था के कारण बढ़ी, जैसे कपास, गेहूँ और जूट, उनके बाजार मूल्य में वृद्धि हो सकती थी। इससे कुछ किसानों और व्यापारियों को लाभ मिला।

➣ लेकिन दूसरी ओर, जर्मन बाजार के समाप्त होने और समुद्री परिवहन में बाधा के कारण जूट के सामान्य निर्यात को नुकसान पहुँचा।

➣ सैन्य मांग ने इसका कुछ हिस्सा संभाला, लेकिन व्यापारिक अस्थिरता बनी रही। इससे स्पष्ट होता है कि युद्ध का प्रभाव फसल, क्षेत्र और बाजार के अनुसार अलग-अलग था।

➣ मूल्य वृद्धि का पूरा लाभ किसानों को हमेशा नहीं मिला। व्यापारियों, बिचौलियों और निर्यातकों को भी बढ़ती कीमतों से लाभ हुआ, जबकि किसानों पर भू-राजस्व और कृषि लागत का दबाव बना रहा। इसलिए युद्धकालीन कृषि समृद्धि का लाभ समान रूप से वितरित नहीं हुआ।

कृषि, ग्रामीण अर्थव्यस्था एवं मजदूर वर्ग

➣ युद्ध के लिए खाद्यान्न, पशु और अन्य कृषि संसाधनों की मांग बढ़ी। सेना की आवश्यकताओं के कारण कई क्षेत्रों से अनाज और पशुओं की खरीद की गई।

➣ इससे कुछ कृषि उत्पादों के बाजार मूल्य बढ़े, लेकिन गरीब किसानों और खेतिहर मजदूरों को महँगाई के कारण वास्तविक लाभ सीमित रहा।

➣ ग्रामीण परिवारों की आय का बड़ा हिस्सा भोजन और आवश्यक वस्तुओं पर खर्च होता था। इसलिए कीमतों में तेज वृद्धि ने उनकी वास्तविक क्रय-शक्ति को प्रभावित किया। युद्ध के बाद फसल खराब होने और खाद्यान्न संकट ने इस समस्या को और गहरा किया।

➣ दूसरी ओर, युद्धकालीन उत्पादन की बढ़ती मांग से कारखानों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों में रोजगार के अवसर बढ़े। औद्योगिक श्रमिकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और भारत का औद्योगिक आधार युद्ध के दौरान पहले की तुलना में मजबूत हुआ।

➣ लेकिन मजदूरों की वास्तविक स्थिति उतनी तेजी से नहीं सुधरी। महँगाई, लंबे कार्य घंटे, खराब कार्य दशाएँ और वास्तविक मजदूरी में कमी से श्रमिक असंतोष बढ़ा। यही परिस्थितियाँ आगे चलकर ट्रेड यूनियन आंदोलन और श्रमिक राजनीति के विस्तार की आर्थिक पृष्ठभूमि बनीं।

युद्धकालीन औद्योगिक संस्थाएँ और सरकारी पहल

➣ युद्ध के दौरान भारतीय उद्योगों की क्षमता बढ़ाने और युद्ध सामग्री की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने दो महत्वपूर्ण संस्थाएँ विकसित कीं, दोनों की अध्यक्षता सर थॉमस हॉलैंड ने की।

➣ सबसे पहले, 19 मई 1916 को Indian Industrial Commission गठित की गई, जिसका उद्देश्य भारत की औद्योगिक क्षमता का आकलन करना था। इसकी रिपोर्ट 1918 में प्रस्तुत हुई। इसने तकनीकी शिक्षा तथा प्रमुख उद्योगों को राजकीय प्रोत्साहन देने की सिफारिश की।

➣ इसके बाद, 1917 में यूरोप से युद्ध-सामग्री मंगाने की बढ़ती कठिनाइयों को देखते हुए Indian Munitions Board स्थापित किया गया, जिसकी अध्यक्षता भी हॉलैंड ने 1917 से 1919 तक की।

➣ अर्थात यह बोर्ड, चल रहे Industrial Commission के साथ-साथ कार्य करता रहा। बोर्ड ने युद्ध-सामग्री की खरीद को केंद्रीकृत किया और सैन्य उपकरण, चमड़े व वस्त्र के घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित किया।

➣ इन पहलों से यह संकेत मिला कि युद्ध की आवश्यकताओं ने ब्रिटिश सरकार को पहली बार भारतीय औद्योगिक क्षमता का अधिक व्यवस्थित उपयोग करने के लिए मजबूर किया। हालांकि इसका मूल उद्देश्य भारतीय औद्योगीकरण नहीं, बल्कि युद्ध की आवश्यकताओं को पूरा करना था।

युद्ध से उत्पन्न संरचनात्मक परिवर्तन

➣ प्रथम विश्व युद्ध ने भारतीय अर्थव्यवस्था में एक गहरा विरोधाभास पैदा किया। एक ओर कर, युद्ध ऋण, महँगाई, खाद्य संकट और वास्तविक आय में कमी ने आम जनता पर भारी दबाव डाला।

➣ दूसरी ओर आयात में कमी, शुल्क-अंतर और युद्धकालीन सरकारी मांग ने भारतीय उद्योगों को तेजी से विस्तार का अवसर दिया। इसी कारण प्रथम विश्व युद्ध को भारतीय औद्योगीकरण के इतिहास में एक महत्वपूर्ण निर्णायक मोड़ माना जाता है।

➣ युद्धकालीन सरकारी आदेशों और विदेशी प्रतिस्पर्धा के अस्थायी रूप से कम होने से भारतीय औद्योगिक पूंजी को विस्तार मिला। साथ ही भारतीय व्यापारिक और औद्योगिक वर्गों ने औद्योगिक संरक्षण, सरकारी खरीद और देशी उद्योगों के विकास की मांग अधिक संगठित रूप से उठानी शुरू की।

तथ्य / विषय महत्वपूर्ण तथ्य
रक्षा व्यय 1913–14 में लगभग £20 मिलियन से बढ़कर 1918–19 में £41 मिलियन से अधिक हो गया।
आयकर का महत्व सकल सरकारी राजस्व में आयकर का हिस्सा लगभग 2% (1911–12) से बढ़कर 11.75% (1917–18) हो गया।
Excess Profits Duty 1917 में युद्ध से असाधारण लाभ कमाने वाले व्यवसायों पर अतिरिक्त कर लगाया गया।
Super-tax 1917 में उच्च आय एवं लाभ पर अतिरिक्त कराधान की व्यवस्था लागू हुई।
सामान्य आयात शुल्क 1916 में 5% से बढ़ाकर 7.5% किया गया।
कपास वस्त्र आयात शुल्क 1917 में 7.5% तक बढ़ाया गया।
ब्रिटिश युद्ध को प्रत्यक्ष नकद योगदान 1917 में £100 million का प्रत्यक्ष आर्थिक योगदान दिया गया।
मुख्य औद्योगिक लाभार्थी सूती वस्त्र, जूट, चमड़ा, इस्पात और रासायनिक उद्योग को युद्धकालीन मांग से लाभ मिला।
भारतीय इस्पात उद्योग TISCO को युद्धकालीन सरकारी आदेश मिले, जिनमें सैन्य रेलवे के लिए रेल की पटरियों की आपूर्ति महत्वपूर्ण थी।
जूट उद्योग बंगाल की जूट मिलों ने युद्ध के लिए Sandbags और सैन्य पैकिंग सामग्री का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया।
औद्योगिक संस्थाएँ Indian Industrial Commission (1916–18) तथा Indian Munitions Board (1917) युद्धकालीन औद्योगिक विकास से जुड़ी महत्वपूर्ण संस्थाएँ थीं।
महँगाई का प्रभाव आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि से वास्तविक मजदूरी और आम जनता की क्रय-शक्ति पर दबाव पड़ा।
विदेशी व्यापार आयात में कमी और निर्यात मांग के कारण भारत के व्यापार अधिशेष में वृद्धि हुई।
आयात-प्रतिस्थापन विदेशी वस्तुओं के आयात में कमी से भारतीय घरेलू उद्योगों को विस्तार का अवसर मिला।
दीर्घकालिक परिणाम युद्ध ने भारतीय औद्योगिक पूंजी, औद्योगीकरण और आर्थिक राष्ट्रवाद को गति दी।

युद्ध का भारतीय समाज पर प्रभाव

प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) का प्रभाव केवल भारत की अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों के जीवन में भी गहरा परिवर्तन आया।

➣ बड़े पैमाने पर सैनिक एवं श्रमिक भर्ती,महिलाओं पर बढ़ी जिम्मेदारियाँ, युद्ध में मृत्यु और घायल सैनिकों की वापसी तथा युद्ध के अंतिम चरण में फैली 1918 की इन्फ्लुएंजा महामारी ने भारतीय सामाजिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया।

सैनिक भर्ती और ग्रामीण समाज में परिवर्तन

➣ युद्ध के लिए भारत से बड़े पैमाने पर सैनिकों और गैर-लड़ाकू कर्मियों की भर्ती की गई। दिसंबर 1919 तक भारत से कुल 8,77,068 लड़ाकू और 5,63,369 गैर-लड़ाकू जुटाए गए

➣ इसका सबसे अधिक प्रभाव पंजाब जैसे प्रमुख सैन्य भर्ती क्षेत्रों पर पड़ा। युद्ध के दौरान लगभग आधे भारतीय लड़ाकू और गैर-लड़ाकू पंजाब से आए। जेलम और रावलपिंडी जैसे जिलों में सैन्य आयु के पुरुषों का लगभग 40 प्रतिशत तक सेना में भर्ती हुआ।

➣ युद्ध के अंत तक पंजाब से लगभग 3,70,609 लड़ाकू भर्ती लिए गए। इनमें लगभग 1,90,078 मुस्लिम, 97,016 सिख और 83,515 हिंदू थे। इससे पंजाब के ग्रामीण समाज में पुरुष श्रम की उपलब्धता, पारिवारिक संरचना और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव पड़ा।

➣ बड़ी संख्या में युवकों के लंबे समय तक गाँवों से बाहर रहने के कारण खेती, पशुपालन और घरेलू कार्यों का अतिरिक्त बोझ परिवारों पर पड़ा।

➣ विशेषकर महिलाओं को खेती, पशुपालन और घरेलू आर्थिक गतिविधियों में पहले की तुलना में अधिक जिम्मेदारी उठानी पड़ी। पुरुषों की अनुपस्थिति ने कुछ स्थानों पर संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े विवादों को भी जन्म दिया।

भर्ती अभियान और सामाजिक दबाव

➣ युद्ध के प्रारंभिक वर्षों में भर्ती अपेक्षाकृत सीमित थी, लेकिन युद्ध बढ़ने और हताहतियों की संख्या बढ़ने के साथ ब्रिटिश सरकार ने भर्ती तेज कर दी।

1917–18 में विशेष रूप से पंजाब में जिला, तहसील और गाँव स्तर तक भर्ती के लक्ष्य तय किए गए। स्थानीय अधिकारियों, जमींदारों और प्रभावशाली ग्रामीण नेताओं को भर्ती अभियान में लगाया गया।

➣ ब्रिटिश सरकार ने औपचारिक रूप से भारत में अनिवार्य सैन्य भर्ती लागू नहीं की, लेकिन अंतिम युद्ध-वर्ष में भर्ती अभियान कई क्षेत्रों में अत्यधिक दबावपूर्ण हो गया।

➣ कुछ स्थानों पर विरोध करने वालों पर जुर्माने तथा कानूनी कार्रवाई तक की गई। इसलिए स्वैच्छिक भर्ती की आधिकारिक धारणा और वास्तविक ग्रामीण अनुभवों के बीच अंतर दिखाई देता है।

➣ भर्ती का विरोध भी हुआ। विशेष रूप से पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं ने अपने पति, पुत्रों और परिवार के पुरुष सदस्यों को सेना में जाने से रोकने का प्रयास किया। इससे स्पष्ट होता है कि युद्ध का प्रभाव सैनिकों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि उनके पूरे परिवार तक पहुँचा था।

महिलाओं की स्थिति और सामाजिक भूमिका

➣ प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय महिलाओं की भूमिका यूरोप की महिलाओं जैसी व्यापक प्रत्यक्ष युद्ध-सेवा वाली नहीं थी, लेकिन युद्ध ने उनके सामाजिक और आर्थिक जीवन को प्रभावित किया।

पति या पुत्र की अनुपस्थिति, सैनिकों की मृत्यु, घायल सैनिकों की वापसी, महँगाई और परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों ने महिलाओं पर अतिरिक्त दबाव डाला।

➣ ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुषों के लंबे समय तक बाहर रहने के कारण महिलाओं ने खेती, पशुपालन और घरेलू उत्पादन में अधिक जिम्मेदारियाँ संभालीं। युद्ध और बाद की महामारी से उत्पन्न विधवापन ने भी महिलाओं की आर्थिक जिम्मेदारियाँ बढ़ाईं।

1918 की इन्फ्लुएंजा महामारी के बाद सबसे अधिक प्रभावित जिलों में महिलाओं की श्रम भागीदारी में अस्थायी वृद्धि के प्रमाण मिले हैं।

➣ आधुनिक आर्थिक इतिहास के अध्ययन के अनुसार 1921 की जनगणना में महामारी से अधिक प्रभावित क्षेत्रों में महिलाओं की श्रम भागीदारी में वृद्धि हुई, विशेषकर सेवा क्षेत्र में। यह प्रभाव बाद में स्थायी नहीं रहा।

➣ महिलाओं की स्थिति को समझने के लिए लोकगीत और मौखिक परंपराएँ भी महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इनमें सैनिक पति के युद्ध में जाने, मृत्यु की खबर, लंबे समय तक अलगाव और परिवार की आर्थिक कठिनाइयों का उल्लेख मिलता है।

श्रमिक और आदिवासी समुदायों पर प्रभाव

➣ युद्ध के लिए केवल लड़ाकू सैनिकों की ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में गैर-लड़ाकू श्रमिकों की भी भर्ती की गई। इनमें रसोइए, पानी पहुँचाने वाले, धोबी, नाई, मोची, बढ़ई, लोहार, पशुओं की देखभाल करने वाले तथा अन्य कुशल और अकुशल श्रमिक शामिल थे।

➣ युद्ध के दौरान इन्हें अधिक औपचारिक रूप से भारतीय श्रम दल (ILC) और वाहक दल (Porter Corps) के रूप में संगठित किया गया तथा भारतीय सेना अधिनियम के तहत भर्ती किया गया।

➣ इन श्रमिकों ने केवल शिविरों में सहायक कार्य नहीं किए। उन्होंने पोर्टरेज, सड़क और रेलवे निर्माण, लकड़ी काटने, सैन्य सामग्री ढोने और युद्धक्षेत्रों से सामग्री हटाने जैसे कठिन और कई बार खतरनाक कार्य किए। फ्रांस में Indian Labour Corps (ILC) ने युद्धक्षेत्रों से उपयोगी सामग्री हटाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ लगभग 50,000 भारतीय श्रमिक पश्चिमी मोर्चे पर भेजे गए। व्यापक गैर लड़ाकू भर्तियों में पूर्वोत्तर भारत के नागा और मिजो क्षेत्रों जैसे इलाकों से भी बड़ी संख्या में लोग आए।

➣ इस प्रकार युद्ध ने ऐसे क्षेत्रों को भी औपनिवेशिक सैन्य और श्रम व्यवस्था से सीधे जोड़ दिया जो पहले प्रमुख सैनिक भर्ती क्षेत्र नहीं थे।

➣ युद्धकालीन श्रमिक भर्ती के कारण कुछ आदिवासी क्षेत्रों में गंभीर असंतोष पैदा हुआ। विशेष रूप से कूकी-चिन क्षेत्रों में जबरन श्रमिक लामबंदी और युद्ध संबंधी दबाव ने बड़े विरोध को जन्म दिया, जो आगे चलकर कूकी विद्रोह (1917–1919) से जुड़ गया।

➣ इस प्रकार युद्धकालीन मानव-संसाधन की मांग ने भारत के कुछ आदिवासी क्षेत्रों में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध प्रतिरोध को भी बढ़ाया।

युद्ध में मृत्यु, घायल सैनिक और सामाजिक आघात

➣ प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय सैनिकों को भारी जनहानि हुई। उपलब्ध सैन्य अभिलेखों के अनुसार लगभग 53,486 भारतीय सैनिक मारे गए और लगभग 64,350 घायल हुए। इसके अलावा अनेक सैनिक युद्धबंदी बने या लापता हुए।

➣ किसी परिवार के कमाने वाले सदस्य की मृत्यु या गंभीर रूप से घायल होकर लौटने से उसकी आर्थिक और सामाजिक संरचना बदल जाती थी। विधवापन, अनाथ बच्चों और परिवार की आय में कमी जैसी समस्याएँ युद्ध के सामाजिक प्रभाव का हिस्सा बनीं।

➣ सैनिकों के पत्रों और ग्रामीण मौखिक परंपराओं से युद्ध के भय, अकेलेपन, मृत्यु और शोक के सामाजिक प्रभाव का पता चलता है। इससे स्पष्ट होता है कि युद्ध केवल विदेशी युद्धक्षेत्रों में लड़ा जाने वाला सैन्य संघर्ष नहीं था। उसकी मानवीय कीमत भारत के गाँवों और परिवारों ने भी चुकाई।

1918 की इन्फ्लुएंजा महामारी और सामाजिक संकट

➣ युद्ध के अंतिम चरण में 1918 की इन्फ्लुएंजा महामारी भारत पहुँची और 1918–19 में देश के बड़े हिस्से में फैल गई। भारत में महामारी से हुई मौतों के अनुमान अलग-अलग हैं।

➣ आधुनिक अध्ययनों में लगभग 1.2 से 2 करोड़ के बीच अनुमान मिलते हैं, जबकि कई अध्ययनों में लगभग 1.7–1.8 करोड़ मौतों का अनुमान दिया गया है।

➣ महामारी ने केवल बहुत छोटे बच्चों या वृद्धों को ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में युवा वयस्कों को भी प्रभावित किया। कुछ जिलों में महामारी से मृत्यु दर 15 प्रतिशत तक पहुँची।

➣ बड़ी संख्या में परिवारों ने थोड़े समय में कई सदस्यों को खोया, जिससे श्रम की कमी, विधवापन, अनाथ बच्चों और परिवारों के विघटन जैसी समस्याएँ पैदा हुईं।

युद्धकालीन महँगाई, खाद्यान्न संकट और पुरुषों की अनुपस्थिति से पहले से कमजोर परिवार महामारी की अतिरिक्त मार झेल रहे थे। इस प्रकार युद्ध और महामारी ने एक-दूसरे के सामाजिक प्रभाव को और गंभीर बनाया।

युद्ध से लौटे सैनिक और बदलती सामाजिक चेतना

➣ युद्ध समाप्त होने के बाद बड़ी संख्या में भारतीय सैनिक अपने गाँवों और कस्बों में लौटे। उन्होंने यूरोप, मध्य-पूर्व और अन्य क्षेत्रों को देखा था और औपनिवेशिक शासन के बाहर की सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों से परिचित हुए थे।

➣ सभी सैनिकों का अनुभव एक जैसा नहीं था, लेकिन युद्ध ने कुछ भारतीयों को साम्राज्यवाद, नस्लीय भेदभाव और राजनीतिक अधिकारों के प्रश्नों से नए रूप में परिचित कराया।

➣ सैन्य सेवा का एक दिलचस्प सामाजिक परिणाम शिक्षा और साक्षरता से जुड़ा था। पंजाब के 1931 के जनगणना विवरण में यह माना गया कि कुछ जिलों में साक्षरता में वृद्धि का संबंध युद्ध से लौटे सैनिकों से था, जिन्होंने सैन्य सेवा के दौरान रोमन या स्थानीय भाषाओं में पढ़ना-लिखना सीखा था।

➣ आधुनिक शोध भी 1911–1921 के बीच भारी सैन्य भर्ती वाले पंजाबी समुदायों में साक्षरता वृद्धि और सैन्य सेवा के बीच महत्वपूर्ण संबंध दिखाता है।

➣ इसलिए भारत में प्रथम विश्व युद्ध का सामाजिक प्रभाव केवल भारतीय सैनिकों ने युद्ध लड़ा तक सीमित नहीं था। युद्ध ने भारतीय समाज के गाँव, परिवार, श्रम व्यवस्था, आदिवासी समाज, लैंगिक भूमिकाओं, साक्षरता और राजनीतिक चेतना को प्रभावित किया।

➣ यही सामाजिक परिवर्तन आगे चलकर युद्धोत्तर भारत में बढ़ते असंतोष और राष्ट्रीय आंदोलन के नए चरण की पृष्ठभूमि बने।

तथ्यविवरण
मुख्य भर्ती क्षेत्र विशेषकर पंजाब
पंजाब से combatant recruits लगभग 3,70,609
पंजाब के recruits में मुस्लिम 1,90,078; सिख 97,016; हिंदू 83,515
भर्ती अभियान 1917–18 में अत्यधिक तेज और कुछ क्षेत्रों में दबावपूर्ण
गैर-लड़ाकू श्रमिक रसोइए, मोची, नाई, पशु-परिचालक, लोहार आदि
पश्चिमी मोर्चे के श्रमिक लगभग 50,000
महिलाओं पर प्रभाव पुरुषों की अनुपस्थिति, खेती/घरेलू जिम्मेदारियों में वृद्धि, शोक और आर्थिक दबाव
महामारी 1918 इन्फ्लुएंजा
भारत में महामारी से अनुमानित मौतें लगभग 1.7–1.8 करोड़
युद्धोत्तर प्रभाव लौटे सैनिकों की नई राजनीतिक एवं सामाजिक चेतना
महत्वपूर्ण क्षेत्रीय उदाहरण पंजाब और पूर्वोत्तर के आदिवासी क्षेत्र

प्रथम विश्व युद्ध और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन

➣ युद्ध के प्रारंभिक वर्षों में भारतीय राजनीतिक नेतृत्व का एक बड़ा हिस्सा ब्रिटिश सरकार के युद्ध-प्रयासों में सहयोग की नीति अपना रहा था। इसके पीछे यह आशा थी कि युद्ध में भारतीय सहयोग के बदले ब्रिटिश सरकार संवैधानिक सुधार और स्वशासन की दिशा में आगे बढ़ेगी।

➣ लेकिन जैसे-जैसे युद्ध लंबा होता गया, भारतीय नेताओं की राजनीतिक मांगें अधिक स्पष्ट और सक्रिय होती गईं।

युद्ध के प्रारंभ में कांग्रेस का रुख

1914 में युद्ध शुरू होने के समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का तत्काल रुख ब्रिटिश सरकार के प्रति खुला विरोध नहीं था। कई भारतीय नेताओं ने युद्ध के लिए सैनिक, धन और अन्य सहायता जुटाने में सहयोग दिया।

➣ कांग्रेस के उदारवादी नेताओं को आशा थी कि भारतीयों द्वारा साम्राज्य की संकट की स्थिति में सहयोग करने से ब्रिटिश सरकार भारतीयों की संवैधानिक आकांक्षाओं को मान्यता देगी।

➣ इस समय कांग्रेस के भीतर अभी भी उदारवादी और उग्रवादी धाराओं के बीच पहले जैसी तीव्र दूरी मौजूद थी। लेकिन युद्ध के कारण राजनीतिक परिस्थितियाँ तेजी से बदल रही थीं।

बाल गंगाधर तिलक की 1914 में जेल से वापसी और 1916 में कांग्रेस में उनकी पुनः सक्रिय भूमिका ने राष्ट्रीय आंदोलन में नई ऊर्जा पैदा की।

➣ युद्ध ने भारतीय नेताओं को यह समझने का अवसर भी दिया कि ब्रिटिश साम्राज्य स्वयं यूरोप के बाहर की अपनी उपनिवेशों की सैन्य और आर्थिक शक्ति पर निर्भर है।

➣ इससे भारतीय राजनीतिक वर्ग में यह विचार मजबूत हुआ कि भारत को केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि स्वशासन की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

तिलक, एनी बेसेंट और होमरूल आंदोलन

➣ प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन होमरूल आंदोलन का उदय था। इसका उद्देश्य तत्काल पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा करना नहीं, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर भारत के लिए स्वशासन (Home Rule) की मांग को व्यापक जनसमर्थन देना था।

बाल गंगाधर तिलक ने अप्रैल 1916 में अपनी इंडियन होमरूल लीग स्थापित की जबकि एनी बेसेंट ने सितंबर 1916 में ऑल इंडिया होमरूल लीग की स्थापना की।

➣ होमरूल आंदोलन की विशेषता यह थी कि इसने युद्धकालीन राजनीतिक वातावरण का उपयोग करते हुए स्वशासन की मांग को जनसाधारण के बीच राजनीतिक प्रश्न बना दिया।

➣ आंदोलन ने कांग्रेस की निष्क्रिय प्रतीक्षा वाली राजनीति को अधिक सक्रिय राजनीतिक प्रचार और संगठन की दिशा में आगे बढ़ाया।

1917 में एनी बेसेंट की गिरफ्तारी ने होमरूल आंदोलन को और अधिक लोकप्रिय बना दिया। उनकी नजरबंदी के विरोध में देश के विभिन्न हिस्सों में राजनीतिक गतिविधियाँ तेज हुईं।

➣ अंततः ब्रिटिश सरकार को उन्हें रिहा करना पड़ा। इस घटना ने स्वशासन की मांग को और व्यापक राजनीतिक समर्थन दिया।

लखनऊ समझौता और राष्ट्रीय एकता

➣ युद्ध के दौरान भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में एक अन्य महत्वपूर्ण परिवर्तन कांग्रेस के भीतर पुनः एकता और कांग्रेस–मुस्लिम लीग के बीच समझौते के रूप में सामने आया।

दिसंबर 1916 के लखनऊ अधिवेशन में कांग्रेस के उदारवादी और उग्रवादी नेता एक मंच पर आए। इस प्रकार 1907 के सूरत विभाजन के बाद कांग्रेस की दोनों प्रमुख धाराओं के बीच पुनः समझौता हुआ।

➣ इसी लखनऊ अधिवेशन के दौरान कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ समझौता (Lucknow Pact) हुआ।

➣ इसमें दोनों संगठनों ने संवैधानिक सुधारों और भारत में अधिक प्रतिनिधिक शासन की मांगों पर संयुक्त रुख अपनाया। मुस्लिम प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर कांग्रेस ने मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था को भी स्वीकार कर लिया।

➣ लखनऊ समझौते का महत्व इस बात में था कि इसने कुछ समय के लिए हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक सहयोग को मजबूत किया और ब्रिटिश सरकार के सामने भारतीय राजनीतिक नेतृत्व की संयुक्त मांग प्रस्तुत की। युद्धकालीन परिस्थितियों में यह राष्ट्रीय आंदोलन के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि थी।

स्वशासन की मांग का तेज होना

➣ 1916–17 तक युद्ध के कारण भारतीय राजनीतिक परिस्थितियाँ काफी बदल चुकी थीं। होमरूल आंदोलन, लखनऊ समझौता और युद्ध में भारत के विशाल सैनिक एवं आर्थिक योगदान ने यह प्रश्न अधिक तीव्र बना दिया कि भारतीयों को अपने शासन में वास्तविक भागीदारी कब मिलेगी

➣ इसी राजनीतिक वातावरण में राष्ट्रीय आंदोलन का स्वरूप धीरे-धीरे बदलने लगा। कांग्रेस अब केवल याचिकाओं और सीमित संवैधानिक सुधारों तक सीमित रहने के बजाय स्वशासन को स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य के रूप में सामने रखने लगी। होमरूल आंदोलन ने इस मांग को जनता के बीच लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ इस दौर में महात्मा गांधी भी भारतीय राजनीति में धीरे-धीरे महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर रहे थे। हालांकि युद्ध के दौरान गांधी ने ब्रिटिश युद्ध-प्रयास में सहयोग किया और 1918 में सैनिक भर्ती का समर्थन किया,

➣ लेकिन युद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार की नीतियों और भारत में दमनकारी कदमों ने उनके राजनीतिक दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण परिवर्तन पैदा किया। यह परिवर्तन आगे चलकर असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि बना।

युद्ध और क्रांतिकारी/राष्ट्रवादी गतिविधियाँ

➣ भारतीय क्रांतिकारियों ने प्रथम विश्व युद्ध को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष के लिए एक अवसर के रूप में देखा। उनका आकलन था कि युद्ध के कारण ब्रिटिश साम्राज्य की सैन्य शक्ति यूरोप और अन्य मोर्चों पर व्यस्त है तथा भारत में ब्रिटिश सैनिकों की संख्या भी अपेक्षाकृत कम हो गई है।

➣ इसलिए यदि भारतीय सैनिकों और जनता को संगठित कर विद्रोह कराया जाए, तो ब्रिटिश शासन को गंभीर चुनौती दी जा सकती है। इसी परिस्थिति में गदर आंदोलन, हिंद-जर्मन षड्यंत्र, काबुल मिशन और रेशमी रुमाल आंदोलन जैसी गतिविधियाँ तेज हुईं।

गदर आंदोलन और प्रथम विश्व युद्ध

गदर आंदोलन की शुरुआत प्रथम विश्व युद्ध से पहले विदेशों में बसे भारतीयों के बीच हुई थी। 1913 में उत्तरी अमेरिका में गठित गदर संगठन का उद्देश्य भारत को ब्रिटिश शासन से सशस्त्र क्रांति के माध्यम से मुक्त कराना था।

➣ प्रथम विश्व युद्ध शुरू होते ही गदर नेताओं ने इसे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह का अवसर माना। विदेशों में रहने वाले भारतीयों से भारत लौटकर क्रांति में शामिल होने की अपील की गई।

‘ऐलान-ए-जंग’ के माध्यम से लोगों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह के लिए प्रेरित किया गया। बड़ी संख्या में गदर कार्यकर्ता भारत लौटने लगे।

➣उनका मुख्य लक्ष्य पंजाब में ग्रामीण जनता और विशेष रूप से भारतीय सैनिकों को विद्रोह के लिए प्रेरित करना था। इस आंदोलन को सफल बनाने के लिए हथियार जुटाने, बम बनाने और सैन्य छावनियों में संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया गया।

कोमागाटा मारू घटना (1914) ने गदर आंदोलन को और गति दी। विदेशों में बसे भारतीयों के बीच ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष को और बढ़ाया तथा अनेक लोगों को गदर आंदोलन की ओर प्रेरित किया।

हिंद-जर्मन षड्यंत्र और बर्लिन कमेटी

➣ प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी और ब्रिटेन एक-दूसरे के विरोधी थे। भारतीय क्रांतिकारियों ने इस स्थिति का लाभ उठाने का प्रयास किया।

1914 में जर्मनी में भारतीय क्रांतिकारियों ने बर्लिन इंडियन कमेटी का गठन किया, जिसे बाद में Indian Independence Committee के नाम से जाना गया। इसमें वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय, चंपकरमन पिल्लै और भूपेंद्रनाथ दत्त जैसे राष्ट्रवादी जुड़े थे।

➣ इस संगठन का उद्देश्य जर्मन सरकार से सहायता प्राप्त करके भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध क्रांतिकारी गतिविधियों को मजबूत करना था।

➣ बर्लिन कमेटी ने गदर कार्यकर्ताओं और अन्य भारतीय क्रांतिकारियों के साथ संपर्क स्थापित किया तथा हथियारों की आपूर्ति, भारतीय युद्धबंदियों को क्रांतिकारी गतिविधियों से जोड़ने और भारत में विद्रोह की योजना पर काम किया।

➣ गदर आंदोलन और बर्लिन कमेटी की गतिविधियाँ आगे चलकर व्यापक हिंद-जर्मन षड्यंत्र से जुड़ीं। इसका उद्देश्य जर्मनी तथा अन्य ब्रिटिश-विरोधी शक्तियों की सहायता से भारत में हथियार पहुँचाना और ब्रिटिश भारतीय सेना में विद्रोह कराना था।

➣ हालांकि हथियारों की आपूर्ति और संगठनात्मक समन्वय की समस्याओं के कारण इन योजनाओं को अपेक्षित सफलता नहीं मिली।

काबुल मिशन और भारत की अस्थायी सरकार (1915)

➣ युद्ध के दौरान क्रांतिकारियों का एक अन्य प्रयास अफगानिस्तान के माध्यम से ब्रिटिश भारत पर दबाव बनाने का था।

➣ बर्लिन कमेटी और अन्य क्रांतिकारियों के संपर्क से एक इंडो-जर्मन-तुर्की मिशन काबुल भेजा गया। इसका उद्देश्य अफगान अमीर को ब्रिटिश भारत के विरुद्ध सहयोग के लिए तैयार करना तथा अफगानिस्तान को भारत में क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए आधार बनाना था।

दिसंबर 1915 में राजा महेंद्र प्रताप के नेतृत्व में काबुल पहुँचे दल में मौलाना बरकतुल्लाह और अन्य राष्ट्रवादी शामिल थे। वहाँ मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी भी उनसे जुड़े।

1 दिसंबर 1915 को काबुल में भारत की अस्थायी सरकार की घोषणा की गई। राजा महेंद्र प्रताप इसके राष्ट्रपति और मौलाना बरकतुल्लाह प्रधानमंत्री बने।

➣ भारत की इस अस्थायी सरकार का उद्देश्य ब्रिटिश शासन को हटाकर स्वतंत्र भारतीय सरकार की स्थापना करना और इसके लिए अफगानिस्तान, जर्मनी तथा तुर्की से सहयोग प्राप्त करना था।

➣ हालांकि अफगान अमीर ने ब्रिटिश दबाव और अपनी राजनीतिक परिस्थितियों के कारण इस योजना को पूर्ण समर्थन नहीं दिया। इसलिए काबुल की अस्थायी सरकार भारत में वास्तविक सत्ता स्थापित नहीं कर सकी।

➣ इसी अवधि में मौलाना महमूद हसन और उनके सहयोगियों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक विद्रोह की योजना बनाई। इसका उद्देश्य अफगानिस्तान, तुर्की और अन्य ब्रिटिश-विरोधी शक्तियों से सहायता प्राप्त करना तथा भारत में विद्रोह का वातावरण तैयार करना था। इस योजना को बाद में रेशमी रुमाल आंदोलन के नाम से जाना गया।

क्रांतिकारी गतिविधियों पर ब्रिटिश दमन

➣ युद्धकालीन क्रांतिकारी गतिविधियों से चिंतित ब्रिटिश सरकार ने रक्षा अधिनियम, 1915 (Defence of India Act, 1915) जैसे कठोर कानूनों का उपयोग किया।

➣ सरकार ने बिना सामान्य न्यायिक प्रक्रिया के गिरफ्तारी, नजरबंदी और विशेष न्यायाधिकरणों के माध्यम से मुकदमों की व्यवस्था की। इसका उद्देश्य गदर और अन्य युद्धकालीन षड्यंत्रों को दबाना था।

गदर षड्यंत्र के बाद बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ, नजरबंदी और मुकदमे हुए। क्रांतिकारी नेटवर्क को तोड़ने के लिए ब्रिटिश खुफिया तंत्र ने विदेशों में भी भारतीय क्रांतिकारियों की गतिविधियों पर निगरानी बढ़ाई।

➣ इस दमन ने तत्काल सशस्त्र विद्रोह की योजनाओं को रोक दिया, लेकिन इससे ब्रिटिश सरकार के प्रति क्रांतिकारियों का विरोध समाप्त नहीं हुआ।

➣ युद्धकालीन क्रांतिकारी गतिविधियों ने ब्रिटिश सरकार को यह विश्वास दिलाया कि भारत में सशस्त्र विद्रोह, विदेशी सहायता और सेना में असंतोष एक साथ जुड़ सकते हैं। युद्ध के बाद इसी भय ने औपनिवेशिक सरकार की सुरक्षा नीति और दमनकारी कानूनों को प्रभावित किया।

➣ यद्दपि इन प्रयासों में से कोई भी तत्काल ब्रिटिश शासन को उखाड़ नहीं सका, लेकिन इन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के अंतरराष्ट्रीय स्वरूप और सशस्त्र क्रांतिकारी धारा को नई दिशा दी।

युद्ध के बाद की राजनीतिक प्रतिक्रिया

11 नवंबर 1918 को प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हुआ। युद्ध के दौरान भारत ने सैनिकों, धन और संसाधनों के रूप में ब्रिटिश साम्राज्य को व्यापक सहयोग दिया था।

➣ इसलिए युद्ध समाप्त होने के बाद भारतीय राजनीतिक नेतृत्व में यह अपेक्षा बढ़ गई कि ब्रिटिश सरकार अब भारत को अधिक राजनीतिक अधिकार और स्वशासन की दिशा में ठोस कदम उठाएगी।

➣ युद्ध के दौरान विकसित होमरूल आंदोलन, लखनऊ समझौता और स्वशासन की बढ़ती मांग ने इस राजनीतिक दबाव को और मजबूत किया।

➣ दूसरी ओर युद्धकालीन आर्थिक कठिनाइयों, महँगाई और सैनिकों के व्यापक योगदान ने भी भारतीय समाज में ब्रिटिश शासन से अधिक अधिकारों की अपेक्षा पैदा की।

मोंटेग्यू घोषणा से भारत शासन अधिनियम, 1919 तक

➣ इसी राजनीतिक दबाव की पृष्ठभूमि में ब्रिटिश सरकार ने 20 अगस्त 1917 की मोंटेग्यू घोषणा के माध्यम से भारत में क्रमिक रूप से उत्तरदायी शासन विकसित करने को अपनी नीति का लक्ष्य घोषित किया।

इसके बाद मोंटेग्यू–चेम्सफोर्ड सुधारों की योजना तैयार हुई और अंततः भारत शासन अधिनियम, 1919 पारित किया गया। इस अधिनियम ने प्रांतों में द्वैध शासन जैसी नई व्यवस्था लागू की।

➣ प्रथम विश्व युद्ध के संदर्भ में इनका महत्व इतना था कि युद्धकालीन भारतीय सहयोग और बढ़ते राष्ट्रीय राजनीतिक दबाव ने ब्रिटिश सरकार को संवैधानिक सुधारों की दिशा में आगे बढ़ने के लिए मजबूर किया

➣ लेकिन संवैधानिक सुधारों की घोषणा के साथ ही ब्रिटिश सरकार ने क्रांतिकारी गतिविधियों और युद्धकालीन राजनीतिक असंतोष को नियंत्रित करने के लिए दमनकारी नीति भी जारी रखी।

➣ युद्ध समाप्त होने के बावजूद सरकार ने ऐसी शक्तियाँ बनाए रखने का प्रयास किया जिनसे वह राजनीतिक कार्यकर्ताओं और संदिग्ध क्रांतिकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई कर सके।

➣ इसी उद्देश्य से रॉलेट समिति ने युद्धकालीन दमनकारी कानूनों की समीक्षा की और उसकी सिफारिशों के आधार पर रॉलेट एक्ट, 1919 पारित किया गया।

➣ इस कानून ने सरकार को बिना सामान्य न्यायिक प्रक्रिया के गिरफ्तारी, नजरबंदी और राजनीतिक गतिविधियों पर कठोर नियंत्रण की शक्तियाँ दीं। भारतीयों ने इसे काला कानून कहा।

➣ रॉलेट एक्ट ने भारतीय राजनीतिक नेतृत्व को यह अनुभव कराया कि ब्रिटिश सरकार एक ओर उत्तरदायी शासन की बात कर रही है, लेकिन दूसरी ओर नागरिक स्वतंत्रताओं को सीमित करने वाले कानून लागू कर रही है। इस विरोधाभास ने युद्धोत्तर भारतीय राजनीति में असंतोष को तेजी से बढ़ाया।

महत्वपूर्ण तथ्य

प्रथम विश्व युद्ध 1914 से 1918 तक चला। इसका तत्काल कारण 28 जून 1914 को साराजेवो में ऑस्ट्रिया-हंगरी के युवराज आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड की हत्या थी।

➣ युद्ध के दीर्घकालिक कारणों में साम्राज्यवाद, उग्र राष्ट्रवाद, सैन्यवाद, हथियारों की होड़ और यूरोपीय गुटबंदी प्रमुख थे।

➣ युद्ध से पहले यूरोप की प्रमुख शक्तियाँ दो बड़े गुटों में विभाजित थीं- ट्रिपल एलायंस और ट्रिपल एंतांते

28 जुलाई 1914 को ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की, जिसके बाद संकट तेजी से व्यापक यूरोपीय युद्ध में बदल गया।

➣ प्रथम विश्व युद्ध में भारत ने ब्रिटिश साम्राज्य के हिस्से के रूप में लगभग 14.4 लाख लड़ाकू और गैर-लड़ाकू उपलब्ध कराए, जिनमें से 10 लाख से अधिक लोगों ने विदेशों में सेवा की।

➣ भारतीय सैनिकों ने फ्रांस और बेल्जियम के पश्चिमी मोर्चे, मेसोपोटामिया, पूर्वी अफ्रीका, मिस्र, फिलिस्तीन, गैलीपोली और मैसेडोनिया सहित विभिन्न युद्धक्षेत्रों में भाग लिया।

➣ युद्ध के दौरान पंजाब भारतीय सेना के प्रमुख भर्ती क्षेत्रों में से एक था। पंजाब से लगभग 3,70,609 लड़ाकू भर्ती लिए गए।

➣ भारतीय सैनिकों को उनकी युद्ध सेवा के लिए बड़ी संख्या में सैन्य सम्मान मिले और 12 भारतीय सैनिकों को विक्टोरिया क्रॉस प्रदान किया गया।

➣ भारतीय रियासतों ने भी युद्ध में सैनिक, धन, अस्पताल, एम्बुलेंस और अन्य संसाधन उपलब्ध कराकर ब्रिटिश युद्ध-प्रयास में सहयोग किया।

➣ युद्धकाल में भारत का रक्षा व्यय तेजी से बढ़ा और सरकार ने युद्ध खर्च पूरा करने के लिए युद्ध ऋण तथा विभिन्न करों का सहारा लिया।

➣ 1917 में भारत सरकार ने ब्रिटिश युद्ध कोष में लगभग £100 मिलियन (आज लगभग £8–10 अरब के बराबर) का प्रत्यक्ष आर्थिक योगदान दिया, जो उस दौर के लिए बहुत बड़ी रकम थी।

➣ युद्धकाल में आयकर सरकारी राजस्व का अधिक महत्वपूर्ण स्रोत बना और 1917 में अतिरिक्त लाभ कर (Excess Profits Duty) लागू की गई, ताकि युद्ध से असाधारण लाभ कमाने वाले व्यवसायों पर अतिरिक्त कर लगाया जा सके।

➣ युद्ध के कारण विदेशी आयात में कमी आई, जिससे भारतीय उद्योगों को आयात-प्रतिस्थापन का अवसर मिला। विशेष रूप से सूती वस्त्र, जूट, चमड़ा और इस्पात उद्योग का विस्तार हुआ।

टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO) को युद्धकालीन सरकारी आदेश मिले और मेसोपोटामिया के सैन्य रेलवे के लिए रेल की पटरियाँ उपलब्ध कराने का महत्वपूर्ण काम मिला।

➣ युद्धकालीन औद्योगिक नीति से संबंधित महत्वपूर्ण संस्थाओं में Indian Industrial Commission (1916–18) और Indian Munitions Board (1917) शामिल थे। दोनों से सर थॉमस हॉलैंड जुड़े थे।

➣ युद्ध के दौरान महँगाई तेजी से बढ़ी और खाद्यान्न, कपड़ा, मिट्टी का तेल तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इसका सबसे अधिक प्रभाव मजदूरों, गरीब परिवारों और कृषि श्रमिकों पर पड़ा।

➣ युद्धकाल में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने प्रारंभ में ब्रिटिश सरकार के युद्ध-प्रयास में सहयोग किया, क्योंकि भारतीय नेताओं को युद्ध के बाद संवैधानिक सुधार और स्वशासन मिलने की आशा थी।

1916 में बाल गंगाधर तिलक ने इंडियन होमरूल लीग और एनी बेसेंट ने ऑल इंडिया होमरूल लीग की स्थापना की।

दिसंबर 1916 का लखनऊ अधिवेशन कांग्रेस के उदारवादी और उग्रवादी नेताओं के पुनर्मिलन तथा कांग्रेस–मुस्लिम लीग लखनऊ समझौते के लिए महत्वपूर्ण था।

1917 में एनी बेसेंट की नजरबंदी ने होमरूल आंदोलन को और अधिक लोकप्रिय बनाया तथा स्वशासन की मांग को व्यापक राजनीतिक समर्थन मिला।

➣ प्रथम विश्व युद्ध के दौरान महात्मा गांधी ने ब्रिटिश युद्ध-प्रयास का समर्थन किया। 1918 के War Conference में उन्होंने भारतीय सैनिक भर्ती का समर्थन किया और गुजरात में भर्ती अभियान चलाया।

➣ गांधी के 1918 के सक्रिय सैनिक भर्ती अभियान के कारण उन्हें Recruiting Sergeant के रूप में संबोधित किया गया। यह कोई आधिकारिक सरकारी पद या उपाधि नहीं, बल्कि उनके भर्ती अभियान के संदर्भ में प्रयुक्त संबोधन था।

➣ युद्धकालीन क्रांतिकारी गतिविधियों में गदर आंदोलन, हिंद-जर्मन षड्यंत्र, बर्लिन इंडियन कमेटी, काबुल मिशन और रेशमी रुमाल आंदोलन प्रमुख थे।

1914 की कोमागाटा मारू घटना ने विदेशों में बसे भारतीयों और गदर क्रांतिकारियों के बीच ब्रिटिश-विरोधी भावना को और मजबूत किया।

1915 में गदर क्रांतिकारियों ने भारतीय सेना की विभिन्न छावनियों में सैनिक विद्रोह की योजना बनाई, लेकिन ब्रिटिश खुफिया तंत्र को इसकी जानकारी मिल जाने के कारण यह योजना असफल हो गई।

1 दिसंबर 1915 को काबुल में भारत की अस्थायी सरकार की घोषणा की गई। राजा महेंद्र प्रताप इसके राष्ट्रपति और मौलाना बरकतुल्लाह प्रधानमंत्री बने।

रेशमी रुमाल आंदोलन में मौलाना महमूद हसन, मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी तथा अन्य राष्ट्रवादियों ने अफगानिस्तान और तुर्की की सहायता से ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह की योजना बनाई।

➣ युद्धकालीन क्रांतिकारी गतिविधियों को दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने Defence of India Act, 1915 जैसे कठोर कानूनों का प्रयोग किया।

➣ युद्ध के दौरान सैनिकों के साथ बड़ी संख्या में भारतीय श्रम दल और वाहक दल के गैर-लड़ाकू श्रमिक भी विदेश भेजे गए। इनमें विभिन्न कुशल और अकुशल श्रमिक शामिल थे।

➣ युद्धकालीन भर्ती ने विशेष रूप से पंजाब के ग्रामीण समाज को प्रभावित किया। पुरुषों की बड़ी संख्या में भर्ती के कारण परिवारों में महिलाओं पर खेती, पशुपालन और घरेलू आर्थिक जिम्मेदारियाँ बढ़ीं।

➣ युद्धकालीन श्रमिक भर्ती ने कूकी-चिन क्षेत्रों में गंभीर असंतोष पैदा किया, जो आगे चलकर कूकी विद्रोह (1917–1919) से जुड़ा।

➣ युद्ध के अंतिम चरण में 1918 की इन्फ्लुएंजा महामारी ने भारत में भारी जनहानि की। विभिन्न अध्ययनों में भारत में महामारी से लगभग 1.2–2 करोड़ मौतों के अनुमान मिलते हैं।

➣ युद्ध के बाद लौटे सैनिक अपने साथ विदेशों के अनुभव लेकर आए। विशेषकर पंजाब में सैन्य सेवा और युद्ध से लौटे सैनिकों का साक्षरता तथा सामाजिक चेतना पर प्रभाव पड़ा।

11 नवंबर 1918 को प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हुआ। युद्ध के बाद भारतीय राजनीतिक नेतृत्व की स्वशासन और संवैधानिक सुधारों की अपेक्षाएँ और अधिक बढ़ गईं।

प्रथम विश्व युद्ध में शामिल प्रमुख देश एवं उनके गुट

गुट प्रमुख देश मुख्य जानकारी
मित्र राष्ट्र (Allied Powers) ब्रिटेन, फ्रांस, रूस ये युद्ध के प्रारंभिक चरण में मित्र राष्ट्रों के प्रमुख सदस्य थे।
मित्र राष्ट्र सर्बिया, बेल्जियम, जापान सर्बिया पर ऑस्ट्रिया-हंगरी के आक्रमण के बाद युद्ध में सक्रिय हुआ। बेल्जियम पर जर्मनी के आक्रमण के बाद ब्रिटेन युद्ध में शामिल हुआ। जापान ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध में भाग लिया।
मित्र राष्ट्र इटली इटली Triple Alliance का सदस्य था, लेकिन 1914 में तटस्थ रहा और 1915 में मित्र राष्ट्रों की ओर से युद्ध में शामिल हुआ।
मित्र राष्ट्र संयुक्त राज्य अमेरिका 1917 में जर्मनी के विरुद्ध युद्ध में शामिल हुआ। इसके बाद मित्र राष्ट्रों की स्थिति मजबूत हुई।
मित्र राष्ट्र रोमानिया, पुर्तगाल, ग्रीस युद्ध के दौरान अलग-अलग चरणों में मित्र राष्ट्रों के पक्ष में शामिल हुए।
मित्र राष्ट्र चीन 1917 में जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की।
केंद्रीय शक्तियाँ (Central Powers) जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी केंद्रीय शक्तियों के प्रमुख यूरोपीय देश।
केंद्रीय शक्तियाँ ऑटोमन साम्राज्य 1914 में केंद्रीय शक्तियों के साथ युद्ध में शामिल हुआ।
केंद्रीय शक्तियाँ बुल्गारिया 1915 में केंद्रीय शक्तियों की ओर से युद्ध में शामिल हुआ।

Triple Alliance और प्रथम विश्व युद्ध के Central Powers को एक ही समझना सही नहीं होगा। 1882 में Triple Alliance में जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और इटली शामिल थे।

➣ लेकिन प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने पर इटली ने तटस्थ रहने का फैसला किया और 1915 में वह मित्र राष्ट्रों की ओर से युद्ध में शामिल हो गया।

➣ इसी प्रकार Triple Entente में मुख्यतः ब्रिटेन, फ्रांस और रूस थे, लेकिन युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों के पक्ष में कई अन्य देश भी शामिल हुए, जिनमें इटली और अमेरिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण थे।

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