अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस
➣ अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (All India Trade Union Congress – AITUC) भारत का पहला प्रमुख अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन संगठन था, जिसकी स्थापना 31 अक्टूबर 1920 को बंबई में हुई। इसका गठन भारत के विभिन्न क्षेत्रों और उद्योगों में काम कर रहे श्रमिकों को एक साझा मंच पर लाने तथा उनके आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक हितों को संगठित रूप से सामने रखने के लिए किया गया था।
➣ AITUC का उदय ऐसे समय हुआ जब औद्योगीकरण, कम मजदूरी, लंबे कार्य घंटे, खराब कार्य परिस्थितियाँ और श्रमिकों के प्रति भेदभाव के कारण भारत में श्रमिक असंतोष बढ़ रहा था। विभिन्न शहरों और उद्योगों में अलग-अलग श्रमिक संगठन और हड़तालें तो हो रही थीं, लेकिन उन्हें एक साथ जोड़ने वाला कोई मजबूत अखिल भारतीय संगठन नहीं था। AITUC ने इस कमी को दूर करते हुए भारतीय श्रमिक आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर का संगठित स्वरूप प्रदान किया।
➣ प्रारंभिक दौर में AITUC का मुख्य जोर मजदूरी में सुधार, कार्य के घंटे कम करने, सुरक्षित कार्य वातावरण, ट्रेड यूनियन के अधिकार और श्रमिक कल्याण पर था।
➣ आगे चलकर इसका संबंध भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन, समाजवादी एवं कम्युनिस्ट विचारधाराओं और औपनिवेशिक शासन के विरोध से भी जुड़ता गया।
➣ इस प्रकार AITUC केवल एक ट्रेड यूनियन संगठन नहीं था, बल्कि इसने भारत में श्रमिक वर्ग की राजनीतिक चेतना और संगठन को विकसित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1920 से लेकर स्वतंत्रता तक इसकी गतिविधियाँ भारतीय श्रमिक आंदोलन और राष्ट्रीय राजनीति के विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा रहीं।
पृष्ठभूमि
भारत में प्रारंभिक श्रमिक संगठन और आंदोलन
➣ 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में कपड़ा, जूट, रेलवे, कोयला खनन, चाय-बागान और बंदरगाह जैसे उद्योगों का विस्तार होने लगा। औद्योगिक क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मजदूर काम करने लगे, लेकिन उनके लिए काम की परिस्थितियाँ बेहद कठिन थीं।
➣ कई कारखानों में लंबे कार्य घंटे, कम मजदूरी और असुरक्षित काम का वातावरण सामान्य बात थी। महिलाओं और बच्चों से भी लंबे समय तक काम कराया जाता था। ऐसी परिस्थितियों ने धीरे-धीरे श्रमिक असंतोष को जन्म दिया।
➣ भारत में संगठित ट्रेड यूनियन आंदोलन से पहले भी मजदूरों के बीच हड़ताल और सामूहिक विरोध की घटनाएँ देखने को मिलती थीं। मजदूरों ने वेतन और काम की परिस्थितियों को लेकर कई बार काम भी बंद किया था।
➣ किन्तु उस समय अधिकांश आंदोलनों के पीछे कोई स्थायी अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन संगठन नहीं था। प्रारंभिक श्रमिक संगठन के विकास में नारायण मेघाजी लोखंडे का महत्वपूर्ण योगदान था।
➣उन्होंने बंबई के मिल मजदूरों को संगठित करने का प्रयास किया और Bombay Mill Hands Association के माध्यम से श्रमिकों की समस्याओं को सामने रखा। इस प्रारंभिक श्रमिक संगठन ने आगे चलकर भारत में ट्रेड यूनियन आंदोलन के विकास की पृष्ठभूमि तैयार की।
➣ इसी अवधि में विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में अलग-अलग श्रमिक संगठन बनने लगे। रेलवे, कपड़ा मिलों, जूट मिलों और बंदरगाहों में मजदूरों ने अपने हितों के लिए संगठन बनाना शुरू किया। लेकिन ये संगठन मुख्यतः क्षेत्रीय या उद्योग-विशेष तक सीमित थे। राष्ट्रीय स्तर पर इन सभी को एक साथ लाने वाली कोई केंद्रीय संस्था अभी नहीं थी।
प्रथम विश्व युद्ध और श्रमिक आंदोलन का विस्तार
➣ प्रथम विश्व युद्ध (1914–18) के दौरान भारत में औद्योगिक गतिविधियों का विस्तार हुआ, लेकिन बढ़ती कीमतों और महँगाई के कारण मजदूरों की वास्तविक स्थिति कठिन होती गई। मजदूरी और जीवन-यापन की लागत के बीच बढ़ते अंतर ने श्रमिक असंतोष को और बढ़ाया। युद्ध के बाद यह असंतोष कई क्षेत्रों में हड़तालों और सामूहिक आंदोलनों के रूप में सामने आया।
➣ 1918 में मद्रास लेबर यूनियन जैसी महत्वपूर्ण ट्रेड यूनियन संस्थाएँ सामने आईं। इसी दौर में बंबई, अहमदाबाद, कलकत्ता और अन्य औद्योगिक केंद्रों में भी मजदूर संगठन बनने लगे। 1918–19 के श्रमिक आंदोलनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत में मजदूर वर्ग अब केवल बिखरे हुए विरोध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संगठित शक्ति के रूप में उभर रहा था।
➣ 1918–19 की बड़ी हड़तालों ने श्रमिक आंदोलन को नया बल दिया। बंबई के कपड़ा मजदूरों तथा अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर काम बंद हुआ। युद्ध के बाद महँगाई भत्ता, मजदूरी में वृद्धि और कार्य घंटे कम करने जैसी मांगें प्रमुख होने लगीं।
➣ 1920 तक भारत में श्रमिक गतिविधियों में उल्लेखनीय वृद्धि हो चुकी थी। इससे यह आवश्यकता स्पष्ट हुई कि अलग-अलग शहरों और उद्योगों में काम कर रहे श्रमिक संगठनों के लिए एक केंद्रीय अखिल भारतीय मंच होना चाहिए।
किसी एक उद्योग या क्षेत्र में होने वाली हड़ताल का प्रभाव अन्य क्षेत्रों तक आसानी से नहीं पहुँचता था। इसके अलावा मजदूरों की समस्याओं को सरकार और ब्रिटिश प्रशासन के सामने एक संयुक्त राष्ट्रीय आवाज में रखने वाला संगठन भी नहीं था।➣ इसी पृष्ठभूमि में श्रमिक नेताओं ने एक ऐसे संगठन की आवश्यकता महसूस की जो विभिन्न ट्रेड यूनियनों को एक मंच पर ला सके और श्रमिकों के आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक हितों को राष्ट्रीय स्तर पर सामने रख सके। यही विचार आगे चलकर AITUC की स्थापना का आधार बना।
AITUC की स्थापना (1920)
➣ 16 जुलाई 1920 को बंबई में आयोजित एक सम्मेलन/बैठक में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस आयोजित करने की दिशा में निर्णय लिया गया। इसके लिए एक रिसेप्शन कमेटी बनाई गई, जिसके अध्यक्ष जोसेफ बैपटिस्टा बने।
➣ इसके बाद 31 अक्टूबर 1920 को बंबई के एम्पायर थिएटर में पहला अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन सम्मेलन आयोजित किया गया। इसी सम्मेलन में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की स्थापना हुई। सम्मेलन के अध्यक्ष लाला लाजपत राय थे। उन्हें AITUC का प्रथम अध्यक्ष चुना गया।
➣ AITUC के प्रथम अधिवेशन में 64 ट्रेड यूनियनों के 101 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इन यूनियनों की कुल सदस्यता लगभग 1,40,854 बताई गई थी। इससे स्पष्ट होता है कि AITUC की स्थापना किसी एक उद्योग या शहर तक सीमित न रहकर अखिल भारतीय श्रमिक संगठन के रूप में हुई थी।
| तथ्यविवरण | विवरण |
|---|---|
| AITUC की स्थापना | 31 अक्टूबर 1920, बंबई |
| स्थापना स्थल | Empire Theatre, Bombay |
| प्रथम अध्यक्ष | लाला लाजपत राय |
| प्रथम उपाध्यक्ष | जोसेफ बैपटिस्टा |
| प्रथम अधिवेशन | 64 यूनियन, 101 प्रतिनिधि |
| कुल सदस्यता (प्रतिनिधित्व वाली यूनियन) | लगभग 1,40,854 |
| प्रारंभिक प्रमुख नेता | एन. एम. जोशी, दीवान चमन लाल, बी. पी. वाडिया आदि |
| तैयारी की प्रमुख बैठक | 16 जुलाई 1920, बंबई |
| प्रारंभिक संगठन | Standing Committee |
| Standing Committee की पहली बैठक | 2 नवंबर 1920 |
नेतृत्व एवं संगठन
➣ AITUC के प्रारंभिक नेतृत्व में अलग-अलग राजनीतिक विचारों वाले नेता शामिल थे। मोतीलाल नेहरू, मुहम्मद अली जिन्ना, एनी बेसेंट, विट्ठलभाई पटेल, बी. पी. वाडिया, एन. एम. जोशी और जोसेफ बैपटिस्टा जैसे नेताओं की उपस्थित थे।
➣ AITUC के प्रारंभिक नेतृत्व में जोसेफ बैपटिस्टा को उपाध्यक्ष चुना गया। एन. एम. जोशी भी इसके प्रमुख नेताओं में शामिल थे और प्रारंभिक संगठनात्मक तथा श्रमिक प्रतिनिधित्व संबंधी कार्यों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
➣ संगठन की प्रारंभिक कार्यकारी व्यवस्था में वी. एम. पवार महासचिव के रूप में कार्यरत रहे। बाद में दीवान चमन लाल को महासचिव बनाया गया और उन्होंने संगठन के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ AITUC की स्थापना के साथ एक Standing Committee बनाई गई, जिसे संगठन के दैनिक कार्यों और आगे की गतिविधियों को संचालित करने की जिम्मेदारी दी गई। 2 नवंबर 1920 को इसकी पहली बैठक हुई।
➣ AITUC के प्रारंभिक दौर में किसी एक राजनीतिक विचारधारा का पूर्ण प्रभुत्व नहीं था। इसमें राष्ट्रवादी, उदारवादी और श्रमिक हितों पर केंद्रित विभिन्न धाराएँ साथ-साथ मौजूद थीं। बाद के वर्षों में समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारों का प्रभाव बढ़ा, लेकिन 1920 में AITUC का मूल स्वरूप एक व्यापक अखिल भारतीय श्रमिक मंच का था।
➣ AITUC की स्थापना का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में चल रहे श्रमिक आंदोलनों को पहली बार एक केंद्रीय राष्ट्रीय संगठन मिला। अब मजदूरों के वेतन, काम के घंटे, कार्य की परिस्थितियों और श्रमिक अधिकारों से जुड़े प्रश्नों को केवल स्थानीय स्तर पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर उठाया जा सकता था।
AITUC के उद्देश्य एवं प्रारंभिक कार्यक्रम
➣ अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) का मुख्य उद्देश्य भारत के अलग-अलग क्षेत्रों और उद्योगों में काम कर रहे श्रमिकों को एक संगठित मंच पर लाना तथा उनके आर्थिक, सामाजिक और रोजगार संबंधी हितों की रक्षा करना था।
➣ AITUC ने ट्रेड यूनियनों के बीच समन्वय को महत्वपूर्ण माना। अलग-अलग मिलों, रेलवे, बंदरगाहों, खदानों और अन्य उद्योगों के श्रमिक संगठनों को एक केंद्रीय मंच से जोड़ने का उद्देश्य यह था कि मजदूरों की सामूहिक शक्ति बढ़े और किसी एक क्षेत्र में होने वाले संघर्ष को राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन मिल सके।
➣ AITUC के प्रारंभिक कार्यक्रम में मजदूरी में सुधार, काम के घंटे कम करना, काम की परिस्थितियों में सुधार, श्रमिकों की सुरक्षा और ट्रेड यूनियन के अधिकार जैसे प्रश्न प्रमुख थे। संगठन का मानना था कि मजदूरों को अपने हितों के लिए संगठित होने और सामूहिक रूप से अपनी मांग रखने का अधिकार मिलना चाहिए।
➣ AITUC ने श्रमिकों के लिए संगठन बनाने और श्रमिक विवादों में सामूहिक कार्रवाई के अधिकार पर भी जोर दिया। इसके साथ ही मजदूरों को अपने रोजगार से जुड़े मामलों में पर्याप्त कानूनी सुरक्षा देने की मांग की गई।
➣ AITUC की मांगो में श्रमिक विवादों में पुलिस के अनावश्यक हस्तक्षेप से सुरक्षा की मांग प्रमुख थी। उस समय हड़ताल या श्रमिक विवादों के दौरान प्रशासन का हस्तक्षेप अक्सर मजदूरों के आंदोलन को प्रभावित करता था। AITUC ने ऐसी कार्रवाई के विरुद्ध श्रमिकों को संरक्षण देने की मांग की।
➣ AITUC ने बेरोजगारी का पंजीकरण करने की व्यवस्था की मांग भी की। इसका उद्देश्य बेरोजगार श्रमिकों की स्थिति का सरकारी स्तर पर रिकॉर्ड तैयार करना और उनके लिए रोजगार तथा सहायता संबंधी नीतियाँ विकसित करना था।
➣ श्रमिकों की आर्थिक सुरक्षा के लिए काम के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं में मुआवजा देने तथा श्रमिकों के लिए स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाओं की मांग की गई। इस प्रकार प्रारंभिक AITUC ने श्रमिकों के व्यापक सामाजिक कल्याण को भी महत्व दिया था।
➣ उस समय महँगाई और खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि भी मजदूरों के लिए बड़ी समस्या थी। इसलिए AITUC ने खाद्य सुरक्षा और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता से जुड़े प्रश्नों को भी अपने प्रारंभिक कार्यक्रम में महत्व दिया। कुछ प्रस्तावों में खाद्य पदार्थों के निर्यात पर नियंत्रण की मांग भी उठाई गई थी, ताकि देश के भीतर आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता प्रभावित न हो।
➣ AITUC ने यह भी मांग की कि सरकार और विधानमंडलों में जिस प्रकार उद्योगपतियों और अन्य हित समूहों को प्रतिनिधित्व मिलता था, उसी प्रकार श्रमिकों को भी राजनीतिक एवं प्रशासनिक प्रतिनिधित्व दिया जाए। इसका उद्देश्य यह था कि श्रमिकों से संबंधित कानून बनाते समय मजदूरों की आवाज भी सीधे सरकार तक पहुँचे।
➣ काम के घंटे कम करना भी प्रारंभिक श्रमिक आंदोलन की प्रमुख मांग थी। लंबे कार्य घंटों और खराब काम की परिस्थितियों के कारण AITUC ने श्रमिकों के लिए निश्चित एवं सीमित कार्य समय की मांग को प्रमुखता दी। आगे चलकर आठ घंटे के कार्यदिवस की मांग भारतीय श्रमिक आंदोलन की प्रमुख मांगों में शामिल हो गई।
➣ संक्षेप में, AITUC की प्रारंभिक मांगों को बेहतर मजदूरी, कम कार्य घंटे, सुरक्षित कार्यस्थल, दुर्घटना मुआवजा, स्वास्थ्य सुरक्षा, बेरोजगार श्रमिकों की सहायता, पुलिस हस्तक्षेप से सुरक्षा, श्रमिकों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व, ट्रेड यूनियनों का राष्ट्रीय समन्वय के रूप में समझा जा सकता है।
राष्ट्रीय आंदोलन और AITUC
➣ अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) का गठन ऐसे समय हुआ जब भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन तेजी से व्यापक जनआंदोलन का रूप ले रहा था। इसलिए AITUC का विकास केवल मजदूरों की आर्थिक मांगों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि धीरे-धीरे औपनिवेशिक शासन के विरोध और राष्ट्रीय स्वतंत्रता के प्रश्न से भी जुड़ गया।
➣ हालांकि AITUC अपने प्रारंभिक दौर में किसी एक राजनीतिक दल का संगठन नहीं था, फिर भी उसके अनेक नेता राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े हुए थे।
असहयोग आंदोलन और AITUC
➣ 1920–22 के असहयोग आंदोलन के दौर में देश के विभिन्न हिस्सों में मजदूरों के बीच राजनीतिक जागरूकता बढ़ी। जलियांवाला बाग हत्याकांड और औपनिवेशिक दमन के बाद ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष और मजबूत हुआ। इसी वातावरण में श्रमिक संगठनों ने अपने आर्थिक संघर्षों के साथ राष्ट्रीय प्रश्नों पर भी सक्रियता दिखाई।
➣ AITUC के प्रारंभिक नेतृत्व में लाला लाजपत राय जैसे राष्ट्रवादी नेता महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। AITUC के मंच से मजदूरों को केवल बेहतर मजदूरी और काम की परिस्थितियों के लिए संगठित करने के साथ-साथ औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राजनीतिक चेतना विकसित करने पर भी जोर दिया गया।
➣ AITUC का राष्ट्रीय आंदोलन से संबंध हालांकि कांग्रेस के साथ पूर्ण संगठनात्मक एकता का नहीं था। AITUC में अलग-अलग राजनीतिक विचारों वाले नेता और श्रमिक संगठन शामिल थे।
➣ इसलिए संगठन का अपना स्वतंत्र ट्रेड यूनियन चरित्र बना रहा, लेकिन ब्रिटिश शासन के विरोध और राष्ट्रीय स्वतंत्रता के प्रश्न पर उसके अनेक नेता कांग्रेस तथा अन्य राष्ट्रवादी शक्तियों के साथ सहयोग करते रहे।
1921 के जमशेदपुर अधिवेशन में स्वराज का समर्थन
➣ राष्ट्रीय आंदोलन के साथ AITUC के संबंध का सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक उदाहरण 1921 के जमशेदपुर अधिवेशन में देखने को मिलता है। इस अधिवेशन में AITUC ने स्वराज के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया।
यह महत्वपूर्ण था क्योंकि AITUC ने श्रमिक आंदोलन के आर्थिक प्रश्नों को भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता के प्रश्न से स्पष्ट रूप से जोड़ दिया।➣ AITUC की इस स्थिति का महत्व इसलिए भी था क्योंकि उस समय तक संगठन में राष्ट्रवादी, उदारवादी और अन्य राजनीतिक विचारधाराओं के लोग साथ काम कर रहे थे। स्वराज के समर्थन ने ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था के प्रति श्रमिक संगठन के राजनीतिक रुख को अधिक स्पष्ट किया।
➣ इस प्रकार AITUC के लिए श्रमिक अधिकार और राष्ट्रीय स्वतंत्रता एक-दूसरे से जुड़े प्रश्न बनने लगे। संगठन का तर्क था कि औपनिवेशिक शासन की आर्थिक नीतियों के कारण भारतीय श्रमिकों की स्थिति भी प्रभावित होती है, इसलिए राजनीतिक स्वतंत्रता का प्रश्न श्रमिकों के हितों से अलग नहीं किया जा सकता।
राष्ट्रीय नेताओं का AITUC से संबंध
➣ AITUC के प्रारंभिक वर्षों में कई प्रमुख राष्ट्रीय नेता इसके अधिवेशनों और गतिविधियों से जुड़े रहे। लाला लाजपत राय इसके प्रथम अध्यक्ष थे।
➣ बाद के वर्षों में जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, वल्लभभाई पटेल, सरोजिनी नायडू और सी. आर. दास जैसे नेता भी इसके विभिन्न अधिवेशनों और कार्यों से जुड़े। इससे श्रमिक आंदोलन और राष्ट्रीय आंदोलन के बीच संबंध और मजबूत हुआ।
➣ इन नेताओं की भागीदारी से AITUC को राष्ट्रीय राजनीतिक मंच पर पहचान मिली, लेकिन साथ ही संगठन में विभिन्न राजनीतिक धाराओं का प्रभाव भी बढ़ता गया।
➣ आगे चलकर यही विविधता AITUC के भीतर राष्ट्रवादी, समाजवादी और कम्युनिस्ट धाराओं के बीच मतभेद का एक कारण बनी।
श्रमिक आंदोलन और राष्ट्रीय राजनीति का बढ़ता संबंध
➣ 1920 के दशक में औद्योगिक क्षेत्रों में हड़तालों और श्रमिक आंदोलनों की संख्या बढ़ी। AITUC ने इन आंदोलनों को व्यापक श्रमिक संगठन से जोड़ने का प्रयास किया।
➣ कई बार आर्थिक मांगों के साथ औपनिवेशिक नीतियों का विरोध भी आंदोलनों का हिस्सा बना। AITUC के अपने इतिहास के अनुसार 1920 के प्रथम छह महीनों में ही लगभग 200 हड़तालों में करीब 15 लाख श्रमिकों की भागीदारी हुई थी।
➣ इस प्रकार श्रमिक वर्ग राष्ट्रीय आंदोलन का केवल दर्शक नहीं रहा। औद्योगिक केंद्रों में मजदूरों की सामूहिक शक्ति ने ब्रिटिश प्रशासन और भारतीय उद्योगपतियों दोनों पर दबाव बनाने की क्षमता विकसित की। AITUC ने इसी श्रमिक शक्ति को राष्ट्रीय स्तर पर संगठित करने का प्रयास किया।
सविनय अवज्ञा आंदोलन और AITUC
➣ 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू होने के समय तक AITUC के भीतर राजनीतिक मतभेद पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट हो चुके थे। फिर भी श्रमिक आंदोलन के अनेक कार्यकर्ता और संगठन ब्रिटिश-विरोधी राष्ट्रीय संघर्ष से जुड़े रहे। इस दौर में मजदूरों के आर्थिक संघर्षों के साथ राष्ट्रीय राजनीतिक प्रश्न भी जुड़े हुए थे।
➣ इसी अवधि में AITUC के भीतर समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारों का प्रभाव बढ़ने लगा। इसका परिणाम यह हुआ कि संगठन के कुछ नेता राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक वर्ग संघर्ष और औपनिवेशिक-विरोधी आंदोलन के रूप में देखने लगे। आगे चलकर यही वैचारिक अंतर AITUC के भीतर विभाजन का कारण बना।
AITUC और राष्ट्रीय स्वतंत्रता की व्यापक भूमिका
➣ AITUC ने भारतीय श्रमिकों को यह समझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि उनकी समस्याएँ केवल कारखाने या मजदूरी तक सीमित नहीं हैं। औपनिवेशिक शासन, आर्थिक शोषण, श्रमिक अधिकार और राजनीतिक स्वतंत्रता एक-दूसरे से जुड़े हुए प्रश्न हैं।
➣ इसी कारण AITUC ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान श्रमिक वर्ग की राजनीतिक चेतना विकसित करने में योगदान दिया। इसके अधिवेशनों में स्वराज और औपनिवेशिक शासन के विरोध जैसे प्रश्न उठाए गए और मजदूरों को राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका समझने का अवसर मिला।
➣ हालांकि AITUC को कांग्रेस का श्रमिक संगठन मानना सही नहीं होगा। यह एक स्वतंत्र ट्रेड यूनियन संगठन था और इसके भीतर कांग्रेस समर्थक, समाजवादी तथा बाद में कम्युनिस्ट विचारों वाले नेता मौजूद रहे।
➣ इसलिए राष्ट्रीय आंदोलन के साथ इसका संबंध सहयोग और समानांतर श्रमिक राजनीति दोनों का मिश्रण था।
ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 और श्रमिक आंदोलन
➣ भारत में 1920 के दशक तक ट्रेड यूनियनों और श्रमिक आंदोलनों की संख्या तेजी से बढ़ रही थी, लेकिन उन्हें कानूनी रूप से स्पष्ट पहचान और पर्याप्त सुरक्षा प्राप्त नहीं थी।
➣ श्रमिक संगठनों को अपने सदस्यों की ओर से सामूहिक रूप से कार्रवाई करने में कानूनी जोखिमों का सामना करना पड़ सकता था। इसी पृष्ठभूमि में ट्रेड यूनियनों के पंजीकरण और उनके अधिकारों को कानूनी रूप देने की मांग तेज हुई।
➣ 1 मार्च 1924 को भारतीय विधान सभा ने ट्रेड यूनियनों के पंजीकरण के लिए कानून बनाने की दिशा में एक प्रस्ताव पारित किया। इसके बाद सरकार ने सितंबर 1924 में ट्रेड यूनियन विधेयक का प्रारूप प्रकाशित किया।
➣ विभिन्न विचार-विमर्श और बहस के बाद 25 मार्च 1926 को Trade Unions Act, 1926 को स्वीकृति मिली। यह अधिनियम 1 जून 1927 से लागू हुआ।
ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 की प्रमुख विशेषताएँ
➣ अधिनियम का मुख्य उद्देश्य ट्रेड यूनियनों का पंजीकरण करना और पंजीकृत यूनियनों के अधिकारों एवं दायित्वों को कानूनी रूप देना था।
➣ इसके तहत यूनियन को अपने नियमों के साथ पंजीकरण के लिए आवेदन करना होता था और पंजीकरण के बाद उसे एक कानूनी पहचान प्राप्त होती थी। मूल व्यवस्था में सात या अधिक सदस्य पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकते थे।
➣ पंजीकृत ट्रेड यूनियन को अपने सामान्य कोष (General Fund) को निर्धारित श्रमिक उद्देश्यों पर खर्च करने की अनुमति दी गई।
➣ अधिनियम ने यूनियनों को अलग राजनीतिक कोष बनाने की भी अनुमति दी, जिससे राजनीतिक गतिविधियों के लिए धन एकत्र किया जा सकता था। राजनीतिक कोष में योगदान देना सदस्य के लिए अनिवार्य नहीं था।
➣ अधिनियम की एक महत्वपूर्ण विशेषता धारा 17 के अंतर्गत कुछ परिस्थितियों में आपराधिक षड्यंत्र से सुरक्षा थी।
➣ पंजीकृत ट्रेड यूनियन के पदाधिकारी या सदस्य किसी वैध ट्रेड यूनियन उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए किए गए समझौते के कारण भारतीय दंड संहिता की आपराधिक षड्यंत्र संबंधी धारा के तहत दंडित नहीं किए जा सकते थे, जब तक कि समझौता किसी अपराध को करने के लिए न हो।
➣ इसी प्रकार धारा 18 के तहत पंजीकृत ट्रेड यूनियन को ट्रेड विवाद के संदर्भ में किए गए कुछ कार्यों के लिए दीवानी मुकदमों से सीमित सुरक्षा दी गई।
➣ इसका उद्देश्य यह था कि ट्रेड यूनियन द्वारा सामूहिक श्रमिक कार्रवाई करने पर केवल इस आधार पर उस पर दीवानी मुकदमा न चलाया जाए कि उसने किसी अन्य व्यक्ति के रोजगार या व्यवसाय में हस्तक्षेप किया।
➣ अधिनियम ने ट्रेड यूनियनों में लेखा-जोखा, सदस्य सूची और वार्षिक विवरण रखने की व्यवस्था भी की। इससे यूनियनों के कामकाज में कुछ प्रशासनिक व्यवस्था और पारदर्शिता आई। पंजीकृत यूनियनों के सदस्यों को निर्धारित नियमों के अनुसार खातों और सदस्य सूची का निरीक्षण करने का अधिकार भी दिया गया।
श्रमिक आंदोलन पर अधिनियम का प्रभाव
➣ ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 भारतीय श्रमिक आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण था क्योंकि पहली बार ट्रेड यूनियनों के कामकाज को एक स्पष्ट कानूनी ढाँचा मिला। इससे श्रमिक संगठनों को पंजीकरण कराकर संगठित एवं वैधानिक रूप में काम करने का अवसर मिला।
➣ कानूनी मान्यता मिलने से श्रमिकों को अपनी समस्याएँ सामूहिक रूप से उठाने और यूनियनों को अधिक स्थायी संगठन के रूप में विकसित करने में सहायता मिली। इससे AITUC और उससे जुड़े विभिन्न श्रमिक संगठनों की संगठनात्मक क्षमता को भी मजबूती मिली।
➣ इस कानून का एक महत्वपूर्ण प्रभाव यह था कि ट्रेड यूनियन अब केवल अस्थायी हड़ताल या विरोध करने वाले समूह नहीं रहे। पंजीकरण, नियम, पदाधिकारी, कोष और वार्षिक विवरण जैसी व्यवस्थाओं के कारण यूनियनों के लिए नियमित संगठनात्मक ढाँचा विकसित करना संभव हुआ।
➣ हालांकि अधिनियम ने श्रमिक संगठनों को कानूनी सुरक्षा दी, लेकिन इसने हड़ताल के अधिकार को पूर्ण या असीमित कानूनी अधिकार के रूप में मान्यता नहीं दी।
कानून मुख्यतः ट्रेड यूनियनों के पंजीकरण और पंजीकृत यूनियनों के कुछ अधिकारों तथा दायित्वों को निर्धारित करता था। इसलिए इसे आधुनिक अर्थों में व्यापक औद्योगिक संबंध कानून मानना उचित नहीं होगा।AITUC और ट्रेड यूनियन आंदोलन पर प्रभाव
➣ 1926 के अधिनियम ने ऐसे समय में ट्रेड यूनियन आंदोलन को कानूनी आधार दिया जब AITUC पहले से ही अखिल भारतीय स्तर पर श्रमिकों को संगठित कर रहा था। इसलिए AITUC और अन्य यूनियनों के लिए पंजीकरण और कानूनी मान्यता का महत्व बढ़ गया।
➣ कानून के बाद विभिन्न उद्योगों में ट्रेड यूनियनों के पंजीकरण को प्रोत्साहन मिला और श्रमिक संगठन अपने सदस्यता आधार, कोष और संगठनात्मक व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित करने लगे। इससे आगे चलकर ट्रेड यूनियन आंदोलन के भीतर अलग-अलग राजनीतिक धाराओं के लिए भी संगठित आधार तैयार हुआ।
➣ यही कारण है कि 1926 का कानून केवल एक श्रम कानून नहीं था। इसने भारत में संगठित श्रमिक राजनीति के विकास के लिए भी आधार तैयार किया।
आगे चलकर AITUC के भीतर राष्ट्रवादी, समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारों के बीच जो संघर्ष और विभाजन हुआ, उसके लिए भी मजबूत ट्रेड यूनियन संगठन महत्वपूर्ण आधार बने।AITUC में वामपंथ और कम्युनिस्ट प्रभाव
➣ 1920 में AITUC की स्थापना के समय संगठन में किसी एक विचारधारा का प्रभुत्व नहीं था। इसमें राष्ट्रवादी, उदारवादी और श्रमिक हितों पर जोर देने वाले विभिन्न नेता शामिल थे।
➣ लेकिन 1920 के दशक के मध्य से समाजवादी और मार्क्सवादी विचारों का प्रभाव भारतीय श्रमिक आंदोलन में तेजी से बढ़ने लगा। इससे AITUC की राजनीति भी पहले की तुलना में अधिक उग्र और वर्ग-आधारित होती गई।
➣ रूसी क्रांति (1917) और उसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समाजवाद तथा साम्यवाद के बढ़ते प्रभाव ने भारत के शिक्षित युवाओं और श्रमिक नेताओं को भी प्रभावित किया।
➣ भारतीय कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने मजदूरों को केवल बेहतर मजदूरी की मांग तक सीमित रखने के बजाय पूंजीवादी शोषण और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध वर्ग संघर्ष के रूप में संगठित करने का प्रयास किया।
एम. एन. रॉय और अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट प्रभाव
➣ एम. एन. रॉय भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के शुरुआती प्रमुख नेताओं में थे। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन और कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के साथ संपर्क स्थापित किया तथा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, श्रमिक संगठनों और किसान आंदोलनों को एक व्यापक औपनिवेशिक-विरोधी संघर्ष से जोड़ने की रणनीति पर जोर दिया।
➣ रॉय के विचारों का प्रभाव भारत में सीधे AITUC के पूरे संगठन पर एक साथ नहीं पड़ा, लेकिन उनके द्वारा प्रचारित मार्क्सवादी विचार, वर्ग-संघर्ष और श्रमिक-किसान एकता ने उभरते हुए कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं को वैचारिक आधार दिया।
➣ उनके लेखन और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों के माध्यम से भारत के वामपंथी कार्यकर्ता वैश्विक श्रमिक आंदोलन से जुड़ने लगे।
एस. ए. डांगे और बंबई का श्रमिक आंदोलन
➣ भारत में कम्युनिस्ट विचारों को श्रमिक आंदोलन से जोड़ने वाले प्रमुख नेताओं में एस. ए. डांगे का विशेष स्थान था।
➣ उन्होंने 1922 में ‘Socialist’ नामक अंग्रेजी पत्र शुरू किया, जिसके माध्यम से समाजवाद और श्रमिक वर्ग से संबंधित विचारों का प्रचार किया गया।
➣ डांगे ने विशेष रूप से बंबई के कपड़ा मजदूरों के बीच संगठन निर्माण पर ध्यान दिया। इस दौर में बंबई का कपड़ा उद्योग भारतीय श्रमिक आंदोलन का प्रमुख केंद्र बन रहा था।
➣ डांगे और अन्य वामपंथी कार्यकर्ताओं ने मजदूरों को उनकी आर्थिक मांगों के साथ-साथ वर्गीय हितों के आधार पर संगठित करने का प्रयास किया।
➣ 1924 की बंबई कपड़ा मजदूर हड़ताल ने श्रमिक आंदोलन में उग्रवादी प्रवृत्ति के बढ़ने को दिखाया। आगे चलकर इसी क्षेत्र में विकसित संगठनात्मक गतिविधियों ने 1928 की गिरणी कामगार हड़ताल जैसे अधिक व्यापक संघर्षों के लिए आधार तैयार किया।
कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं का AITUC में प्रवेश
➣ 1920 के दशक के मध्य तक कम्युनिस्ट और समाजवादी कार्यकर्ता धीरे-धीरे AITUC की गतिविधियों में अधिक सक्रिय होने लगे। उनका प्रयास था कि ट्रेड यूनियन आंदोलन को केवल याचिका, समझौते और सीमित श्रम सुधारों तक न रखा जाए, बल्कि मजदूरों को सामूहिक संघर्ष के लिए तैयार किया जाए।
➣ इस समय कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में कपड़ा, रेलवे, जूट, खदान और अन्य उद्योगों के मजदूरों के बीच संगठन बनाने की कोशिश की। इससे AITUC के भीतर ऐसे नेताओं और कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ी जो मजदूर आंदोलन को अधिक संघर्षशील दृष्टिकोण से देखते थे।
➣ 1926–28 के दौरान बंगाल, बंबई, पंजाब और संयुक्त प्रांतों में Workers’ and Peasants’ Parties जैसी संस्थाएँ भी विकसित हुईं। इन संगठनों में कम्युनिस्ट और अन्य वामपंथी कार्यकर्ता सक्रिय थे। इनके माध्यम से मजदूरों और किसानों को व्यापक राजनीतिक आंदोलन से जोड़ने का प्रयास किया गया।
➣ 1927 के AITUC अधिवेशन तक संगठन के भीतर वामपंथी प्रभाव पहले की तुलना में स्पष्ट हो चुका था। इसी समय AITUC के सामने अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संगठनों से संबंध का प्रश्न भी उठा।
➣ एक ओर ब्रिटिश ट्रेड यूनियन आंदोलन से जुड़े Amsterdam International के साथ संबंध बनाने का विचार था, जबकि वामपंथी नेता अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी श्रमिक आंदोलन और Red International of Labour Unions (Profintern) के साथ निकटता चाहते थे। दोनों प्रस्तावों को उस समय निर्णायक समर्थन नहीं मिला।
➣ इसी अधिवेशन में कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं को AITUC की कार्यकारिणी में कुछ महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुए। एस. ए. डांगे सहायक महासचिव के रूप में उभरे, जबकि अन्य वामपंथी नेताओं ने भी संगठनात्मक जिम्मेदारियाँ संभालीं। इससे AITUC में वामपंथी प्रभाव के संस्थागत रूप से बढ़ने का संकेत मिला।
श्रमिक आंदोलन का अधिक संघर्षशील रूप
➣ कम्युनिस्ट प्रभाव बढ़ने के साथ श्रमिक आंदोलनों में हड़ताल, सामूहिक सौदेबाजी और वर्गीय संगठन पर अधिक जोर दिया जाने लगा। मजदूरों को यह समझाने का प्रयास किया गया कि उनकी समस्याओं का कारण केवल किसी एक कारखाने का खराब प्रबंधन नहीं, बल्कि व्यापक औपनिवेशिक और पूंजीवादी व्यवस्था भी है।
➣ 1928 में बंबई के कपड़ा मजदूरों का बड़ा आंदोलन इस बढ़ते वामपंथी प्रभाव का महत्वपूर्ण उदाहरण बना। कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं से जुड़े गिरणी कामगार संगठन ने बड़ी संख्या में कपड़ा मजदूरों को संगठित किया। इससे श्रमिक आंदोलन का आकार और राजनीतिक प्रभाव दोनों बढ़े।
➣ इस दौर में AITUC का श्रमिक आंदोलन पहले की तुलना में अधिक राजनीतिक और संघर्षशील होने लगा। मजदूरी, काम के घंटे और सेवा शर्तों के साथ-साथ औपनिवेशिक शासन, ट्रेड डिस्प्यूट्स कानून और श्रमिक अधिकारों से जुड़े व्यापक प्रश्न भी आंदोलनों का हिस्सा बनने लगे।
कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र मामला और कम्युनिस्ट नेतृत्व पर दमन
➣ कम्युनिस्ट प्रभाव के बढ़ने से ब्रिटिश सरकार चिंतित थी। 1924 के कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र मामले में एस. ए. डांगे, मुजफ्फर अहमद, शौकत उस्मानी और अन्य कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर उन पर ब्रिटिश भारत में कम्युनिस्ट क्रांति फैलाने का आरोप लगाया गया। मुकदमे ने कम्युनिस्ट आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया।
➣ दमन के बावजूद इस मुकदमे का एक अप्रत्याशित प्रभाव यह हुआ कि कम्युनिस्ट विचार और श्रमिक राजनीति अधिक व्यापक चर्चा का विषय बन गए। विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में सक्रिय कार्यकर्ताओं के बीच भी वर्ग-संघर्ष और समाजवाद से जुड़े विचारों का प्रसार हुआ।
➣ इस प्रकार 1920 के दशक के मध्य तक AITUC के भीतर एक स्पष्ट वामपंथी धारा विकसित हो चुकी थी। हालांकि इस समय तक AITUC पर कम्युनिस्टों का पूर्ण नियंत्रण नहीं था, लेकिन 1927–28 तक उनका संगठनात्मक और वैचारिक प्रभाव इतना बढ़ गया था कि वे AITUC की आगे की दिशा को प्रभावित करने की स्थिति में आ गए थे।
1929 का AITUC विभाजन और ट्रेड यूनियन राजनीति
➣ 1920 के दशक के उत्तरार्ध तक AITUC के भीतर अलग-अलग राजनीतिक धाराएँ अधिक स्पष्ट हो चुकी थीं। एक ओर एन. एम. जोशी, दीवान चमन लाल, वी. वी. गिरि जैसे नेता श्रमिक आंदोलन को मुख्यतः ट्रेड यूनियन अधिकारों, सुधारों और संवैधानिक तरीकों के माध्यम से आगे बढ़ाना चाहते थे।
➣ दूसरी ओर कम्युनिस्ट और वामपंथी नेता श्रमिकों के अधिक संघर्षशील संगठन, वर्गीय राजनीति और राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय राजनीतिक भागीदारी पर जोर दे रहे थे।
➣ इस वैचारिक अंतर के साथ AITUC के भीतर कुछ महत्वपूर्ण व्यावहारिक प्रश्न भी सामने आए। इनमें रॉयल कमीशन ऑन लेबर (व्हिटली कमीशन) का बहिष्कार करना या नहीं, अंतरराष्ट्रीय ट्रेड यूनियन संगठनों से संबंध, ILO में भागीदारी तथा श्रमिक आंदोलन को राष्ट्रीय राजनीति से किस सीमा तक जोड़ना जैसे प्रश्न शामिल थे।
1928 के बाद वामपंथी प्रभाव और बढ़ता मतभेद
➣ 1928 तक AITUC में कम्युनिस्ट और वामपंथी कार्यकर्ताओं का प्रभाव काफी बढ़ चुका था। बंबई के कपड़ा मजदूरों की बड़ी हड़ताल तथा अन्य औद्योगिक आंदोलनों ने श्रमिक राजनीति को अधिक संघर्षशील बनाया।
➣ इससे उन नेताओं की चिंता बढ़ी जो ट्रेड यूनियन आंदोलन को मुख्यतः श्रमिक कल्याण और संवैधानिक सुधारों के माध्यम से आगे बढ़ाना चाहते थे।
➣ दूसरी ओर वामपंथी धारा का तर्क था कि मजदूरों के आर्थिक अधिकारों को औपनिवेशिक शासन और पूंजीवादी व्यवस्था से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
➣ इसलिए श्रमिक आंदोलन को औपनिवेशिक-विरोधी संघर्ष और वर्ग-संघर्ष से जोड़ना आवश्यक है। यही वैचारिक अंतर आगे चलकर AITUC के विभाजन का मुख्य आधार बना।
जवाहरलाल नेहरू का AITUC अध्यक्ष बनना
➣ 1928 के झरिया अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू को AITUC का अध्यक्ष चुना गया। इससे श्रमिक आंदोलन और राष्ट्रीय आंदोलन के बीच संबंध और मजबूत हुए। नेहरू स्वयं समाजवादी विचारों से प्रभावित थे और मजदूरों की राजनीतिक भागीदारी के समर्थक थे।
➣ नेहरू ने AITUC के भीतर मौजूद विभिन्न धाराओं को साथ रखने का प्रयास किया। लेकिन 1929 तक संगठन में वैचारिक मतभेद इतने गहरे हो चुके थे कि उनका प्रयास स्थायी एकता बनाए रखने में सफल नहीं हुआ।
➣ बाद में नेहरू ने स्वयं स्वीकार किया कि AITUC में विभाजन की संभावना पहले से दिखाई दे रही थी।
नागपुर अधिवेशन और AITUC का विभाजन (1929)
➣ 28–29 नवंबर 1929 को नागपुर में AITUC का दसवाँ अधिवेशन आयोजित हुआ। यहीं संगठन के भीतर पहले से चले आ रहे मतभेद निर्णायक रूप से सामने आए।
➣ इस अधिवेशन में AITUC ने रॉयल कमीशन ऑन लेबर के बहिष्कार का निर्णय लिया और आयोग के समक्ष भारतीय श्रमिकों की ओर से प्रतिनिधित्व न करने की नीति अपनाई।
➣ इस निर्णय का एन. एम. जोशी और उनके समर्थक नेताओं ने विरोध किया। उनका मानना था कि श्रमिकों के हितों को सरकारी आयोगों और संवैधानिक संस्थाओं के सामने सीधे प्रस्तुत करने के अवसर का उपयोग किया जाना चाहिए।
➣ दूसरी ओर वामपंथी नेतृत्व का तर्क था कि ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त आयोग औपनिवेशिक व्यवस्था का हिस्सा है और उसका बहिष्कार करके ही श्रमिक आंदोलन की स्वतंत्रता बनाए रखी जा सकती है।
➣ इसी प्रकार अंतरराष्ट्रीय ट्रेड यूनियन संगठनों से संबंध का प्रश्न भी विवाद का विषय था। सुधारवादी धारा अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संस्थाओं के साथ सहयोग और वैधानिक माध्यमों को महत्व देती थी, जबकि वामपंथी धारा का झुकाव अधिक क्रांतिकारी अंतरराष्ट्रीय श्रमिक आंदोलन की ओर था। इन प्रश्नों ने AITUC के भीतर वैचारिक दूरी और बढ़ा दी।
➣ अंततः 1929 के नागपुर अधिवेशन में AITUC में पहला बड़ा विभाजन हुआ। एन. एम. जोशी, दीवान चमन लाल, वी. वी. गिरि, आर. आर. बाखले और अन्य मध्यमार्गी/सुधारवादी नेताओं ने अलग होकर एक नए केंद्रीय ट्रेड यूनियन संगठन के गठन की दिशा में कदम बढ़ाया।
इंडियन ट्रेड यूनियन फेडरेशन (ITUF) का गठन
➣ AITUC से अलग हुए नेताओं ने इंडियन ट्रेड यूनियन फेडरेशन (Indian Trade Union Federation – ITUF) का गठन किया। इसका नेतृत्व एन. एम. जोशी की सुधारवादी ट्रेड यूनियन धारा से जुड़ा रहा।
बाद में 1933 में ITUF का नाम बदलकर नेशनल ट्रेड यूनियन फेडरेशन (NTUF) कर दिया गया।➣ विभाजन के बाद AITUC की संगठनात्मक शक्ति पर भी असर पड़ा। जवाहरलाल नेहरू के समकालीन विवरण के अनुसार अलग हुए समूह में 30 यूनियनें और लगभग 36,639 सदस्य थे,
➣ जबकि नागपुर अधिवेशन में बने रहने वाले समूह से 20 यूनियनें और लगभग 91,787 सदस्य जुड़े थे। इससे स्पष्ट होता है कि विभाजन के बावजूद AITUC के मूल संगठन के पास बड़ी सदस्यता बनी रही।
AITUC विभाजन का श्रमिक आंदोलन पर प्रभाव
➣ 1929 के विभाजन ने भारतीय श्रमिक आंदोलन की एकता को कमजोर कर दिया। अब राष्ट्रीय स्तर पर श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक केंद्रीय संगठन के स्थान पर अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोण वाले संगठन सामने आने लगे। इससे श्रमिक आंदोलनों में समन्वय की समस्या बढ़ी।
➣ दूसरी ओर इस विभाजन ने भारतीय ट्रेड यूनियन आंदोलन में राजनीतिक विचारधाराओं की स्पष्ट पहचान भी पैदा की। अब सुधारवादी ट्रेड यूनियनवाद और वामपंथी/कम्युनिस्ट ट्रेड यूनियनवाद के बीच अंतर अधिक स्पष्ट हो गया।
➣ आगे चलकर यही प्रक्रिया 1931 के दूसरे विभाजन और Red Trade Union Congress के गठन की पृष्ठभूमि बनी।
➣ जवाहरलाल नेहरू ने स्वयं 30 नवंबर 1929 को कहा कि विभाजन से वे निराश थे और श्रमिक आंदोलन की एकता आवश्यक थी। उन्होंने यह भी आशा व्यक्त की कि दोनों धाराएँ भविष्य में फिर एक साथ आकर साझा मुद्दों पर काम करेंगी।
| तथ्यविवरण | विवरण |
|---|---|
| 1928 | झरिया अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू AITUC के अध्यक्ष बने |
| 1929 | नागपुर अधिवेशन में पहला बड़ा विभाजन |
| प्रमुख विवाद | रॉयल कमीशन ऑन लेबर, अंतरराष्ट्रीय ट्रेड यूनियन संबंध और श्रमिक आंदोलन की राजनीतिक दिशा |
| सुधारवादी धड़ा | एन. एम. जोशी आदि |
| नया संगठन | Indian Trade Union Federation (ITUF) |
| 1933 | ITUF का नाम National Trade Union Federation (NTUF) हुआ |
| अगला चरण | 1931 में AITUC का दूसरा विभाजन और RTUC का गठन |
1931 का विभाजन और रेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस
➣ 1929 के AITUC विभाजन के बाद भारतीय श्रमिक आंदोलन में एक ओर AITUC और दूसरी ओर इंडियन ट्रेड यूनियन फेडरेशन (ITUF) मौजूद थे।
➣ लेकिन AITUC के भीतर भी राष्ट्रवादी और कम्युनिस्ट वामपंथी धड़ों के बीच मतभेद बने रहे। 1930–31 तक ये मतभेद इतने गहरे हो गए कि AITUC के अंदर एक और विभाजन की स्थिति पैदा हो गई।
➣ 1931 का विवाद मुख्य रूप से इस प्रश्न से जुड़ा था कि श्रमिक आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन के साथ किस प्रकार जोड़ा जाए और ब्रिटिश शासन के प्रति ट्रेड यूनियनों की नीति क्या हो।
➣ कम्युनिस्ट धड़ा कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली राष्ट्रीय राजनीति की आलोचना करते हुए श्रमिक आंदोलन को अधिक स्पष्ट रूप से वर्ग-संघर्ष और औपनिवेशिक-विरोधी संघर्ष से जोड़ना चाहता था। दूसरी ओर AITUC के राष्ट्रवादी वामपंथी नेता राष्ट्रीय आंदोलन के साथ सहयोग को अधिक महत्व देते थे।
कम्युनिस्ट और राष्ट्रवादी धड़े के बीच मतभेद
➣ 1931 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन और द्वितीय गोलमेज सम्मेलन का प्रश्न भी AITUC के भीतर विवाद का कारण बना। कम्युनिस्ट नेतृत्व गांधी की समझौतावादी नीति और गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस की भागीदारी का विरोध कर रहा था।
➣उनका मानना था कि श्रमिक आंदोलन को कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति से स्वतंत्र रखते हुए वर्गीय संघर्ष को आगे बढ़ाना चाहिए। दूसरी ओर AITUC के राष्ट्रवादी धड़े के नेता राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के साथ श्रमिक आंदोलन के सहयोग को महत्वपूर्ण मानते थे।
➣ इससे संगठन के भीतर यह प्रश्न सामने आया कि AITUC का मुख्य स्वरूप एक व्यापक राष्ट्रीय श्रमिक मंच रहेगा या वह स्पष्ट रूप से कम्युनिस्ट विचारधारा पर आधारित ट्रेड यूनियन संगठन बनेगा।
➣ यही मतभेद 1931 के कलकत्ता अधिवेशन में निर्णायक रूप से सामने आए। कम्युनिस्ट धड़े ने कांग्रेस और गांधी की नीति की आलोचना करने वाला प्रस्ताव पारित कराने का प्रयास किया, लेकिन उसे अपेक्षित समर्थन नहीं मिला।
➣ इसके बाद कम्युनिस्ट और उनके समर्थक वामपंथी ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं ने AITUC से अलग होने का निर्णय लिया।
रेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस का गठन (1931)
➣ 1931 के कलकत्ता अधिवेशन के बाद अलग हुए कम्युनिस्ट धड़े ने Red Trade Union Congress (RTUC) का गठन किया। इसका नेतृत्व प्रमुख कम्युनिस्ट ट्रेड यूनियन नेताओं बी. टी. रणदिवे और एस. वी. देशपांडे के हाथों में था।
➣ RTUC का उद्देश्य मजदूरों को अधिक संघर्षशील तरीके से संगठित करना तथा ट्रेड यूनियन आंदोलन को कम्युनिस्ट विचारधारा, वर्ग-संघर्ष और औपनिवेशिक-विरोधी संघर्ष से जोड़ना था।
➣ इस धड़े का मानना था कि मजदूरों की आर्थिक समस्याओं का स्थायी समाधान केवल श्रम सुधारों से नहीं, बल्कि उस व्यापक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन से संभव है जिसमें श्रमिकों का शोषण होता है।
➣ RTUC के गठन के साथ कम्युनिस्ट ट्रेड यूनियन धारा ने AITUC से स्वतंत्र संगठनात्मक आधार बना लिया। इससे भारतीय श्रमिक आंदोलन में राजनीतिक विचारधारा के आधार पर ट्रेड यूनियनों का विभाजन और स्पष्ट हो गया।
1931 के बाद तीन केंद्रीय ट्रेड यूनियन धाराएँ
➣ 1931 के विभाजन के बाद भारत में तीन प्रमुख केंद्रीय ट्रेड यूनियन संगठन दिखाई देने लगे- AITUC, Indian Trade Union Federation (ITUF) और Red Trade Union Congress (RTUC)। इनमें से प्रत्येक की राजनीतिक दिशा और श्रमिक आंदोलन को देखने का तरीका अलग था।
| संगठन | मुख्य राजनीतिक धारा | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| AITUC | राष्ट्रवादी एवं वामपंथी राष्ट्रवादी | श्रमिक आंदोलन को राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष से जोड़ने पर जोर। |
| ITUF | मध्यमार्गी/सुधारवादी | संवैधानिक तरीकों, श्रम सुधारों और संस्थागत वार्ता पर जोर। |
| RTUC | कम्युनिस्ट | वर्ग-संघर्ष, उग्र श्रमिक आंदोलन और औपनिवेशिक-विरोधी संघर्ष पर जोर। |
➣ इसके अलावा कुछ महत्वपूर्ण स्वतंत्र श्रमिक संगठन भी थे, जैसे All India Railwaymen’s Federation (AIRF) और Ahmedabad Textile Labour Association (ATLA)। ये केंद्रीय ट्रेड यूनियन संगठनों की राजनीति से अलग अपनी स्वतंत्र संगठनात्मक स्थिति बनाए हुए थे।
विभाजन का श्रमिक आंदोलन पर प्रभाव
➣ 1931 के विभाजन का सबसे बड़ा प्रभाव भारतीय श्रमिक आंदोलन की एकता पर पड़ा। एक ही राष्ट्रीय श्रमिक आंदोलन के भीतर अलग-अलग राजनीतिक संगठनों के बनने से मजदूरों की सामूहिक शक्ति कमजोर हुई और विभिन्न उद्योगों में अलग-अलग ट्रेड यूनियनें एक-दूसरे के समानांतर काम करने लगीं।
➣ हालांकि दूसरी ओर इस विभाजन ने भारतीय ट्रेड यूनियन आंदोलन में विचारधारात्मक स्पष्टता भी पैदा की। अब यह अधिक स्पष्ट हो गया कि श्रमिक आंदोलन में राष्ट्रवादी, सुधारवादी और कम्युनिस्ट धाराएँ किस प्रकार अलग-अलग राजनीतिक लक्ष्य और कार्य-पद्धति अपनाती हैं।
AITUC का पुनः एकीकरण (1935–40)
➣ 1931 के विभाजन के बाद भारतीय श्रमिक आंदोलन तीन प्रमुख केंद्रीय संगठनों में बँट गया था- AITUC, Indian Trade Union Federation (AITUF/बाद में NTUF) और Red Trade Union Congress (RTUC)। इस विभाजन से विभिन्न संगठनों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ गई।
➣ अन्तंत: 1932 से विभिन्न ट्रेड यूनियन नेताओं ने फिर से एकता स्थापित करने के प्रयास शुरू किए। ऑल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन (AIRF) ने इस दिशा में विशेष भूमिका निभाई।
➣ बंबई में आयोजित एक सम्मेलन में Trade Union Unity Committee बनाई गई, जिसका उद्देश्य अलग-अलग केंद्रीय ट्रेड यूनियन संगठनों के बीच समान मुद्दों पर समझौता कराना था।
➣ इन प्रयासों के पीछे केवल संगठनात्मक हित नहीं थे। महामंदी के कारण 1930 के दशक के आरंभ में औद्योगिक क्षेत्र गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहे थे।
➣ मजदूरी घट रही थी और बड़ी संख्या में मजदूर बेरोजगार हो रहे थे। ऐसी स्थिति में अलग-अलग ट्रेड यूनियनों में बँटे रहने के बजाय संयुक्त श्रमिक संघर्ष की आवश्यकता अधिक महसूस हुई।
1933 में National Federation of Labour (NFL) और NTUF
➣ एकता के प्रयासों के परिणामस्वरूप 1933 में NFL नामक नया संगठन बनाया गया। इसमें AITUF तथा कुछ रेलवे यूनियनों का विलय हुआ। इसके बाद इस संगठन को Indian Trade Union Federation (NTUF) के रूप में विकसित किया गया।
➣ हालांकि AITUC और Red Trade Union Congress (RTUC) इस व्यवस्था में शामिल नहीं हुए। इसलिए 1933 के बाद भी भारतीय ट्रेड यूनियन आंदोलन पूरी तरह एकजुट नहीं हुआ। फिर भी एकता की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम था।
1935 में AITUC और RTUC का पुनः एकीकरण
➣ 1935 भारतीय ट्रेड यूनियन आंदोलन के इतिहास में निर्णायक वर्ष बना। AITUC और Red Trade Union Congress (RTUC) के बीच लंबे समय से चले आ रहे मतभेद कम हुए और दोनों संगठनों का पुनः विलय हो गया। विलय के बाद संयुक्त संगठन ने AITUC का नाम ही बनाए रखा।
➣ इस एकीकरण का महत्व इसलिए अधिक था क्योंकि 1929 और 1931 के विभाजनों के बाद पहली बार AITUC और उसके अलग हुए कम्युनिस्ट धड़े का एक केंद्रीय संगठन के भीतर पुनर्मिलन हुआ। इससे श्रमिक आंदोलन में एकता और सामूहिक कार्रवाई की संभावना मजबूत हुई।
➣ 1935 के बाद AITUC में राष्ट्रवादी, समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारों वाले श्रमिक नेता फिर एक ही केंद्रीय मंच पर काम करने लगे। इसका अर्थ यह नहीं था कि उनके सभी वैचारिक मतभेद समाप्त हो गए थे।
➣ बल्कि उन्होंने श्रमिक हितों और औपनिवेशिक शासन के विरोध जैसे साझा मुद्दों पर संगठनात्मक एकता को प्राथमिकता दी।
1938 में NTUF का AITUC से जुड़ना
➣ 1938 में ट्रेड यूनियन एकता की प्रक्रिया को एक और महत्वपूर्ण सफलता मिली। वी. वी. गिरि के प्रयासों से नागपुर में AITUC के विशेष अधिवेशन में National Trade Union Federation (NTUF) को AITUC से संबद्ध करने का निर्णय हुआ। हालांकि उस समय NTUF पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। वह एक अलग इकाई के रूप में AITUC से जुड़ा।
➣ 1938 का यह समझौता इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि 1929 के विभाजन के बाद अलग हुई सुधारवादी ट्रेड यूनियन धारा पहली बार फिर AITUC के केंद्रीय मंच के निकट आई। इससे भारत में एक व्यापक ट्रेड यूनियन एकता की संभावना और मजबूत हुई।
➣ इसी दौर में श्रमिक आंदोलनों का विस्तार भी हो रहा था। 1937–39 के बीच हड़तालों की संख्या बढ़ी और श्रमिकों की भागीदारी में भी वृद्धि हुई। विभिन्न औद्योगिक शहरों में मजदूर अपने वेतन, कार्य परिस्थितियों और रोजगार सुरक्षा के प्रश्नों पर अधिक संगठित होकर संघर्ष करने लगे।
1940 में ट्रेड यूनियन एकता की पूर्णता
➣ 1940 में NTUF को समाप्त कर उसका AITUC में पूर्ण विलय कर दिया गया। इस प्रकार 1929 में शुरू हुई ट्रेड यूनियन की विभाजन प्रक्रिया को लगभग एक दशक बाद महत्वपूर्ण रूप से समाप्त किया गया।
➣ नागपुर, जहाँ 1929 में AITUC का पहला बड़ा विभाजन हुआ था, वही 1940 में ट्रेड यूनियन एकता का प्रतीक बना।
➣ इस पुनः एकीकरण से AITUC एक बार फिर भारत का प्रमुख केंद्रीय ट्रेड यूनियन संगठन बन गया। विभिन्न राजनीतिक विचारों वाले श्रमिक संगठनों के एक साथ आने से श्रमिकों की सामूहिक सौदेबाजी और राष्ट्रीय स्तर के आंदोलनों की क्षमता मजबूत हुई।
➣ हालांकि 1940 तक एकता स्थापित हो जाने के बावजूद AITUC के भीतर राजनीतिक और वैचारिक मतभेद पूरी तरह समाप्त नहीं हुए थे। द्वितीय विश्व युद्ध और उसके संबंध में अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोणों ने आगे चलकर फिर नए मतभेद पैदा किए।
➣ इसलिए 1935–40 की एकता को स्थायी राजनीतिक एकरूपता के बजाय साझा श्रमिक हितों के आधार पर बनी संगठनात्मक एकता के रूप में समझना अधिक उचित है।
| वर्ष/घटना | विवरण |
|---|---|
| 1932 | ट्रेड यूनियन एकता के लिए Trade Union Unity Committee के प्रयास |
| 1933 | National Federation of Labour (NFL) का गठन; आगे NTUF का विकास |
| 1935 | RTUC का AITUC में विलय |
| 1938 | NTUF का AITUC से संबद्ध होना; वी. वी. गिरि की महत्वपूर्ण भूमिका |
| 1940 | NTUF का AITUC में पूर्ण विलय |
| महत्व | 1929–31 के विभाजन के बाद केंद्रीय ट्रेड यूनियन आंदोलन में पुनः एकता |
द्वितीय विश्व युद्ध और AITUC
➣ सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के बाद भारतीय राजनीति और श्रमिक आंदोलन दोनों में नई परिस्थितियाँ पैदा हुईं। AITUC के भीतर भी यह प्रश्न उठने लगा कि ब्रिटिश सरकार द्वारा लड़े जा रहे युद्ध के प्रति भारतीय श्रमिक आंदोलन का रुख क्या होना चाहिए।
➣ एक ओर भारत स्वयं औपनिवेशिक शासन के अधीन था और राष्ट्रीय स्वतंत्रता का प्रश्न महत्वपूर्ण था, वहीं दूसरी ओर यूरोप में फासीवाद और नाजीवाद के बढ़ते प्रभाव ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित किया।
➣ युद्ध शुरू होने पर AITUC के भीतर मौजूद विभिन्न राजनीतिक धाराओं में इस प्रश्न पर पूरी सहमति नहीं थी। राष्ट्रवादी और वामपंथी नेताओं का एक हिस्सा इस बात पर जोर देता था कि ब्रिटिश सरकार से भारत की स्वतंत्रता प्राप्त किए बिना भारतीय जनता से युद्ध में सहयोग की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
➣ दूसरी ओर कुछ नेता फासीवाद के खतरे को प्राथमिकता देते हुए युद्ध के प्रति अलग दृष्टिकोण रखते थे।
युद्ध और AITUC के भीतर नया वैचारिक मतभेद
➣ 1940–41 के दौरान युद्ध के प्रश्न ने AITUC के भीतर एक नया विवाद पैदा कर दिया। इसका एक कारण यह था कि AITUC ने 1935–40 के बीच पुनः एकता स्थापित की थी, लेकिन विभिन्न राजनीतिक धाराओं के बीच वैचारिक अंतर पूरी तरह समाप्त नहीं हुए थे। अब युद्ध के प्रश्न ने इन पुराने मतभेदों को फिर सामने ला दिया।
➣ 1941 में जब जर्मनी ने सोवियत संघ पर आक्रमण किया, तब अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन की युद्ध संबंधी नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया। अब युद्ध को फासीवाद के विरुद्ध जनयुद्ध (People’s War) के रूप में देखा जाने लगा।
➣ भारत में कम्युनिस्टों ने भी ब्रिटेन और उसके सहयोगियों की युद्ध-प्रयासों में समर्थन की नीति अपनाई, हालांकि वे औपनिवेशिक शासन की समाप्ति और भारत की स्वतंत्रता की मांग को बनाए रखते थे।
➣ इस परिवर्तन का AITUC पर सीधा प्रभाव पड़ा। अब कम्युनिस्ट धड़ा युद्ध को केवल साम्राज्यवादी युद्ध मानने के बजाय फासीवाद-विरोधी संघर्ष के रूप में देखने लगा। इससे AITUC के भीतर उन नेताओं से मतभेद पैदा हुए जो ब्रिटिश सरकार के युद्ध-प्रयासों के समर्थन को भारत की स्वतंत्रता के प्रश्न से असंगत मानते थे।
Indian Federation of Labour का गठन (1941)
➣ युद्ध के प्रश्न पर बढ़ते मतभेदों का एक परिणाम 1941 में Indian Federation of Labour (IFL) का गठन था।
एम. एन. रॉय और उनके समर्थकों ने युद्ध को फासीवाद के विरुद्ध व्यापक संघर्ष के रूप में देखते हुए एक अलग श्रमिक संगठन बनाने की दिशा में कदम उठाया। इससे 1935–40 की ट्रेड यूनियन एकता फिर कमजोर हुई। नवंबर 1941 में इस नए संगठन के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ी।➣ इस प्रकार द्वितीय विश्व युद्ध ने केवल AITUC की बाहरी गतिविधियों को प्रभावित नहीं किया, बल्कि श्रमिक आंदोलन के भीतर राजनीतिक विभाजन को भी पुनर्जीवित किया।
➣ अब विवाद केवल मजदूरों की मांगों का नहीं था, बल्कि यह भी था कि भारतीय ट्रेड यूनियन आंदोलन अंतरराष्ट्रीय युद्ध और भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के बीच संतुलन कैसे बनाए।
1942 का कानपुर अधिवेशन और युद्धकालीन श्रमिक नीति
➣ 8 फरवरी 1942 को कानपुर में AITUC का अधिवेशन हुआ। जवाहरलाल नेहरू ने इसके उद्घाटन सत्र को संबोधित किया। इस समय तक युद्ध भारतीय राजनीति और श्रमिक आंदोलन दोनों का प्रमुख प्रश्न बन चुका था। अधिवेशन में युद्ध, श्रमिक अधिकारों और राष्ट्रीय स्वतंत्रता के प्रश्नों पर व्यापक चर्चा हुई।
➣ AITUC के सामने मुख्य समस्या यह थी कि युद्ध के दौरान औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि होने के बावजूद मजदूरों पर काम का दबाव, महँगाई और जीवन-यापन की कठिनाइयाँ बढ़ रही थीं।
➣ इसलिए AITUC ने श्रमिकों के वेतन, काम की परिस्थितियों, जीवन-यापन की लागत और नागरिक स्वतंत्रताओं से जुड़े प्रश्नों को महत्वपूर्ण बनाए रखा।
➣ युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने Defence of India Rules और अन्य आपातकालीन शक्तियों का उपयोग करके राजनीतिक एवं श्रमिक गतिविधियों पर नियंत्रण बढ़ाया।
➣ कई ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं और राजनीतिक नेताओं को गिरफ्तार या नजरबंद किया गया। इससे AITUC ने श्रमिकों की नागरिक स्वतंत्रताओं और संगठन की स्वतंत्रता की रक्षा का प्रश्न भी उठाया।
1942 का भारत छोड़ो आंदोलन और AITUC
➣ 8 अगस्त 1942 को कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया। इसके बाद कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी हुई और देशभर में व्यापक आंदोलन शुरू हुआ। लेकिन उस समय कम्युनिस्ट पार्टी की युद्ध संबंधी नीति बदल चुकी थी और वह युद्ध को फासीवाद-विरोधी जनयुद्ध के रूप में देख रही थी।
इसलिए कम्युनिस्ट नेतृत्व ने भारत छोड़ो आंदोलन का समर्थन नहीं किया था।
➣ इसका प्रभाव AITUC पर भी पड़ा, क्योंकि इस समय संगठन में कम्युनिस्ट प्रभाव काफी मजबूत था। इसलिए AITUC का रुख कांग्रेस के भारत छोड़ो आंदोलन से पूरी तरह समान नहीं रहा।
➣ यही कारण है कि 1942 का राष्ट्रीय आंदोलन और श्रमिक आंदोलन पहले के दशक की तुलना में अलग राजनीतिक संबंध में दिखाई देते हैं।
➣ हालांकि इसका अर्थ यह नहीं था कि युद्धकाल में AITUC ने श्रमिकों के आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों को छोड़ दिया। उसने मजदूरों के वेतन, महँगाई, काम की परिस्थितियों, ट्रेड यूनियन अधिकार और दमन के विरोध जैसे मुद्दों को लगातार उठाया।
➣ युद्ध उत्पादन बढ़ने के साथ श्रमिकों की संख्या और औद्योगिक महत्व भी बढ़ रहा था, इसलिए श्रमिक प्रश्न राष्ट्रीय राजनीति में और महत्वपूर्ण हो गया।
युद्धकालीन औद्योगिक विस्तार और श्रमिक आंदोलन
➣ द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सैन्य आवश्यकताओं के कारण भारत में कपड़ा, इस्पात, कोयला, रेलवे, इंजीनियरिंग और अन्य युद्ध-संबंधी उद्योगों में उत्पादन बढ़ा। इससे कई औद्योगिक क्षेत्रों में रोजगार और उत्पादन दोनों बढ़े, लेकिन इसके साथ श्रमिकों पर काम का दबाव और महँगाई भी बढ़ी।
➣ युद्धकालीन परिस्थितियों में श्रमिक आंदोलन के सामने दोहरी चुनौती थी- एक ओर युद्ध उत्पादन के कारण काम का दबाव बढ़ रहा था और दूसरी ओर आवश्यक वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ रही थीं। AITUC ने श्रमिकों के जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए मजदूरी तथा अन्य सुविधाओं में सुधार की मांग की।
➣ इस समय सरकार और उद्योगपतियों को भी युद्ध उत्पादन बनाए रखने के लिए श्रमिकों के सहयोग की आवश्यकता थी। परिणामस्वरूप कुछ क्षेत्रों में श्रम-कल्याण संबंधी उपायों और श्रमिकों के साथ समझौते की आवश्यकता बढ़ी। इससे ट्रेड यूनियन संगठनों को अपनी सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति बढ़ाने का अवसर मिला।
1945 के बाद AITUC और श्रमिक आंदोलन का नया उभार
➣ 1945 में युद्ध की समाप्ति के बाद भारत में राजनीतिक और श्रमिक आंदोलनों में तेज बदलाव आया। युद्धकाल की महँगाई, बेरोजगारी की आशंका, वेतन संबंधी समस्याएँ और स्वतंत्रता की बढ़ती मांग ने श्रमिकों के बीच असंतोष को फिर तेज किया।
➣ युद्ध समाप्त होने के बाद AITUC की गतिविधियाँ और अधिक व्यापक हुईं। 1945–46 में हड़तालों और श्रमिक आंदोलनों की संख्या बढ़ी और आर्थिक मांगों के साथ राजनीतिक स्वतंत्रता का प्रश्न भी फिर अधिक स्पष्ट रूप से जुड़ने लगा।
➣ AITUC ने मजदूरों को राष्ट्रीय राजनीतिक परिस्थितियों से जोड़ते हुए उनके आर्थिक अधिकारों के लिए भी संघर्ष जारी रखा।
➣ इस दौर में श्रमिक आंदोलन का राजनीतिक स्वरूप और स्पष्ट हो गया। मजदूरों की आर्थिक मांगें अब औपनिवेशिक शासन के अंत, लोकतांत्रिक अधिकार और स्वतंत्र भारत में श्रमिकों की स्थिति से जुड़ रही थीं।
➣ इस प्रकार द्वितीय विश्व युद्ध का अंतिम चरण AITUC को स्वतंत्रता के निर्णायक वर्षों के बड़े श्रमिक आंदोलनों की ओर ले गया।
स्वतंत्रता आंदोलन में AITUC की भूमिका
➣ अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में श्रमिक वर्ग को संगठित करने और उसकी राजनीतिक चेतना विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ AITUC ने मजदूरों के आर्थिक हितों को राष्ट्रीय स्वतंत्रता के प्रश्न से जोड़ते हुए श्रमिकों को औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध व्यापक राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बनाया।
➣ AITUC का महत्व केवल इस बात में नहीं था कि उसने मजदूरों की मजदूरी, काम के घंटे और कार्य-स्थितियों जैसे प्रश्न उठाए। उसने श्रमिकों में यह चेतना भी विकसित की कि वे देश की राजनीतिक व्यवस्था और आर्थिक नीतियों से सीधे प्रभावित होते हैं और इसलिए राष्ट्रीय जीवन में उनकी भी महत्वपूर्ण भूमिका है।
राष्ट्रीय आंदोलन में श्रमिक वर्ग की भागीदारी
➣ AITUC के शुरुआती वर्षों में ही राष्ट्रीय स्वतंत्रता और श्रमिक हितों के बीच संबंध स्पष्ट होने लगा था। 1921 के जमशेदपुर अधिवेशन में AITUC ने स्वराज के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया। इससे स्पष्ट हुआ कि संगठन श्रमिक प्रश्न को केवल कारखानों और मजदूरी तक सीमित नहीं रखना चाहता था।
➣ AITUC से जुड़े अनेक श्रमिक संगठनों और नेताओं ने विभिन्न राष्ट्रीय आंदोलनों के दौरान ब्रिटिश शासन के विरोध में सक्रिय भूमिका निभाई। हड़ताल, जुलूस, सभाएँ और सामूहिक विरोध श्रमिकों के राजनीतिक सक्रियता के प्रमुख माध्यम बने। इस तरह मजदूरों की संगठनात्मक शक्ति राष्ट्रीय आंदोलन के लिए भी महत्वपूर्ण बनी।
➣ AITUC के अनेक अधिवेशनों की अध्यक्षता लाला लाजपत राय, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और वी. वी. गिरि जैसे राष्ट्रीय नेताओं ने की। इससे श्रमिक आंदोलन और राष्ट्रीय राजनीति के बीच संपर्क मजबूत हुआ, हालांकि AITUC स्वयं कांग्रेस का संगठन नहीं था।
श्रमिकों में राजनीतिक और वर्गीय चेतना
➣ AITUC ने श्रमिकों को केवल अपने कारखाने या रोजगार से जुड़े प्रश्नों तक सीमित न रखकर राजनीतिक अधिकार, सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता जैसे व्यापक प्रश्नों से जोड़ा।
1920 के दशक के उत्तरार्ध में कम्युनिस्ट और समाजवादी विचारों के प्रभाव से श्रमिक आंदोलन में वर्ग-चेतना और सामूहिक संघर्ष का महत्व और बढ़ा।➣ इसी प्रक्रिया के कारण AITUC भारतीय समाज में मजदूर वर्ग को एक संगठित राजनीतिक शक्ति के रूप में विकसित करने वाले प्रमुख मंचों में शामिल हो गया।
➣ हालांकि इसके भीतर राष्ट्रवादी, समाजवादी और कम्युनिस्ट धाराओं के बीच मतभेद भी रहे, लेकिन श्रमिक संगठन के माध्यम से मजदूरों की राजनीतिक भागीदारी लगातार बढ़ती गई।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद श्रमिक आंदोलन का उभार
➣ 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद भारत में राजनीतिक संघर्ष निर्णायक चरण में पहुँच गया। युद्धकालीन महँगाई, वेतन संबंधी समस्याओं, रोजगार की अनिश्चितता और स्वतंत्रता की बढ़ती मांग ने श्रमिक वर्ग में असंतोष को फिर तेज किया।
➣ AITUC ने इस दौर में श्रमिकों की आर्थिक मांगों के साथ औपनिवेशिक शासन के अंत और राजनीतिक स्वतंत्रता के प्रश्न को भी जोड़े रखा।
➣ 1945–47 के बीच भारत में श्रमिक हड़तालों और औद्योगिक आंदोलनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। AITUC के अभिलेखों के अनुसार 1945 में 220 हड़तालें, 1946 में 1,629 और 1947 में 1,811 हड़तालें दर्ज की गईं।
➣ इन आंदोलनों में मजदूरी, काम की परिस्थितियों और रोजगार संबंधी मांगों के साथ-साथ व्यापक राजनीतिक असंतोष भी दिखाई दिया।
➣ 1946 के नौसैनिक विद्रोह (RIN Mutiny) के दौरान बंबई के मजदूरों की व्यापक हड़ताल और समर्थन ने भी उस समय के राजनीतिक वातावरण को प्रभावित किया।
➣ AITUC के इतिहास में बंबई के श्रमिकों की इस भूमिका को औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध व्यापक श्रमिक लामबंदी के महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में दर्ज किया गया है।
➣ इसी अवधि में विभिन्न क्षेत्रों के मजदूरों ने INA से जुड़े आंदोलनों और अन्य राष्ट्रवादी मांगों के समर्थन में भी हड़तालें और प्रदर्शन किए। इससे स्पष्ट हुआ कि युद्ध के बाद श्रमिक आंदोलन और स्वतंत्रता की अंतिम राजनीतिक लड़ाई के बीच संबंध पहले की तुलना में अधिक मजबूत हो गया था।
अंतरराष्ट्रीय श्रमिक आंदोलन में AITUC की भूमिका
➣ AITUC ने भारतीय श्रमिकों को अंतरराष्ट्रीय श्रमिक आंदोलन से भी जोड़ा। 1921 से AITUC भारत के श्रमिकों के प्रतिनिधि के रूप में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) से जुड़ी गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगा।
➣ एन. एम. जोशी लंबे समय तक ILO के Governing Body में श्रमिक प्रतिनिधि के रूप में सक्रिय रहे।
➣ 1945 में AITUC ने World Federation of Trade Unions (WFTU) की स्थापना की प्रक्रिया में भी भाग लिया। इससे भारतीय श्रमिक आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक व्यापक श्रमिक मंच प्राप्त हुआ और भारतीय मजदूरों के प्रश्नों को विश्व श्रमिक आंदोलन से जोड़ने में मदद मिली।
स्वतंत्र भारत की श्रमिक राजनीति पर प्रभाव
➣ स्वतंत्रता के समय तक AITUC भारत का एक महत्वपूर्ण केंद्रीय ट्रेड यूनियन संगठन बन चुका था। उसके लंबे संघर्षों के कारण श्रमिक संगठन की स्वतंत्रता, सामूहिक संगठन, उचित मजदूरी, समान व्यवहार, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिक कल्याण जैसे मुद्दे भारतीय सार्वजनिक जीवन और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुके थे।
➣ स्वतंत्र भारत के संविधान और बाद के श्रम कानूनों में संघ बनाने की स्वतंत्रता, समानता, काम की मानवीय परिस्थितियाँ, जीवन-यापन योग्य मजदूरी और श्रमिक कल्याण जैसे विचारों को स्थान मिला।
➣ AITUC के अपने अभिलेख भी बताते हैं कि उसके विभिन्न अधिवेशनों में उठाए गए श्रमिक अधिकारों के प्रश्न स्वतंत्र भारत की संवैधानिक बहसों से जुड़े।
AITUC का ऐतिहासिक महत्व
➣ AITUC की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उसने भारत के अलग-अलग औद्योगिक क्षेत्रों में बिखरे हुए श्रमिक संगठनों को अखिल भारतीय मंच प्रदान किया। इससे मजदूरों की समस्याओं को पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर संगठित रूप से उठाने की क्षमता विकसित हुई।
➣ AITUC ने भारतीय श्रमिक वर्ग में संगठन, राजनीतिक चेतना और सामूहिक संघर्ष की भावना विकसित करने में योगदान दिया। इसके माध्यम से मजदूरों ने हड़ताल, सामूहिक सौदेबाजी और ट्रेड यूनियन संगठन जैसे साधनों का व्यापक उपयोग करना सीखा।
➣ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में AITUC का महत्व इस बात में था कि उसने श्रमिक आंदोलन और औपनिवेशिक-विरोधी संघर्ष के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध बनाया।
➣ हालांकि उसके भीतर राजनीतिक मतभेद और विभाजन होते रहे, फिर भी स्वतंत्रता के अंतिम चरण में श्रमिक वर्ग की बड़ी संख्या राष्ट्रीय राजनीतिक घटनाओं से सक्रिय रूप से जुड़ी हुई थी।
➣ AITUC की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विशेषता यह भी थी कि यह शुरुआत में किसी एक राजनीतिक दल से औपचारिक रूप से जुड़ा संगठन नहीं था। इसके भीतर अलग-अलग विचारधाराओं के नेता और श्रमिक संगठन साथ आए।
➣ बाद में इसी विविधता के कारण विभाजन हुए, लेकिन यही व्यापक आधार इसे शुरुआती दौर में भारत का प्रमुख अखिल भारतीय श्रमिक मंच बनाने में सहायक भी रहा।
AITUC की सीमाएँ
➣ AITUC की सबसे बड़ी सीमा उसके भीतर रहने वाले वैचारिक मतभेद और संगठनात्मक विभाजन रहे। 1929 और 1931 के विभाजनों ने श्रमिक आंदोलन की एकता को कमजोर किया, हालांकि 1935–40 के बीच पुनः एकीकरण के प्रयास हुए। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी युद्ध और राष्ट्रीय आंदोलन के प्रश्न पर मतभेद सामने आए।
➣ दूसरी सीमा यह थी कि औद्योगिक मजदूरों के अतिरिक्त भारत के विशाल कृषि और असंगठित श्रमिक वर्ग को शुरुआती दौर में उसी स्तर पर संगठित करना संभव नहीं था। इसलिए AITUC का प्रारंभिक प्रभाव मुख्यतः औद्योगिक क्षेत्रों और संगठित श्रमिकों के बीच अधिक दिखाई देता है।
➣ इसके बावजूद AITUC ने भारत में श्रमिक आंदोलन को स्थायी संगठनात्मक और राजनीतिक आधार दिया। 1920 में 64 संबद्ध यूनियनों और लगभग 1.40 लाख सदस्यों से शुरू हुआ संगठन स्वतंत्रता के समय तक भारत के सबसे बड़े केंद्रीय श्रमिक संगठनों में शामिल हो चुका था।
महत्वपूर्ण तथ्य एक नजर में
| वर्ष / तिथि | महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|
| 1918 | मद्रास लेबर यूनियन जैसी प्रारंभिक ट्रेड यूनियनों का विकास; भारत में संगठित श्रमिक आंदोलन की पृष्ठभूमि मजबूत हुई। |
| 16 जुलाई 1920 | बंबई में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन संगठन के गठन की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण बैठक; रिसेप्शन कमेटी के अध्यक्ष जोसेफ बैपटिस्टा बने। |
| 31 अक्टूबर 1920 | बंबई के एम्पायर थिएटर में AITUC की स्थापना। |
| प्रथम अध्यक्ष | लाला लाजपत राय AITUC के प्रथम अध्यक्ष बने। |
| प्रथम अधिवेशन | 64 ट्रेड यूनियन और 101 प्रतिनिधि शामिल हुए; संबद्ध यूनियनों की कुल सदस्यता लगभग 1,40,854 बताई गई। |
| 1921 | जमशेदपुर अधिवेशन में AITUC ने स्वराज के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया। |
| 1922 | एस. ए. डांगे ने ‘Socialist’ पत्र शुरू किया; भारतीय श्रमिक आंदोलन में समाजवादी विचारों के प्रचार को बल मिला। |
| 1924 | कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र मामला; एस. ए. डांगे, मुजफ्फर अहमद, शौकत उस्मानी आदि कम्युनिस्ट नेताओं पर कार्रवाई। |
| 25 मार्च 1926 | ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 को स्वीकृति मिली। |
| 1 जून 1927 | Trade Unions Act, 1926 प्रभावी हुआ। |
| 1927 | AITUC में वामपंथी और कम्युनिस्ट प्रभाव अधिक स्पष्ट हुआ; एस. ए. डांगे जैसे नेताओं की संगठनात्मक भूमिका बढ़ी। |
| 1928 | बंबई में गिरणी कामगार आंदोलन और बड़े पैमाने पर कपड़ा मजदूर संघर्ष; कम्युनिस्ट प्रभाव में वृद्धि। |
| 1928 | जवाहरलाल नेहरू AITUC के अध्यक्ष बने; AITUC और राष्ट्रीय आंदोलन के संबंध और मजबूत हुए। |
| 1929 | नागपुर अधिवेशन में AITUC का पहला बड़ा विभाजन। |
| 1929 | एन. एम. जोशी के नेतृत्व वाला सुधारवादी धड़ा अलग होकर Indian Trade Union Federation (ITUF) की दिशा में गया। |
| 1931 | AITUC में दूसरा बड़ा विभाजन; कम्युनिस्ट धड़ा अलग हुआ। |
| 1931 | कम्युनिस्ट धड़े द्वारा Red Trade Union Congress (RTUC) का गठन। |
| 1931 के बाद | तीन प्रमुख केंद्रीय ट्रेड यूनियन धाराएँ—AITUC, ITUF और RTUC—सामने आईं। |
| 1933 | ITUF धारा का पुनर्गठन; National Trade Union Federation (NTUF) का विकास। |
| 1935 | Red Trade Union Congress (RTUC) का AITUC में पुनः विलय। |
| 1937–39 | प्रांतीय स्वायत्तता के दौर में श्रमिक आंदोलनों और हड़तालों का विस्तार; ट्रेड यूनियन राजनीति का प्रभाव बढ़ा। |
| 1938 | National Trade Union Federation (NTUF) AITUC से संबद्ध हुआ; वी. वी. गिरि ने ट्रेड यूनियन एकता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। |
| 1939 | द्वितीय विश्व युद्ध शुरू; युद्ध के प्रश्न पर AITUC के भीतर नए राजनीतिक मतभेद उभरे। |
| 1940 | NTUF का AITUC में पूर्ण विलय; 1929 के बाद चली ट्रेड यूनियन एकता की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण चरण पूरा हुआ। |
| 1941 | जर्मनी द्वारा सोवियत संघ पर आक्रमण; कम्युनिस्टों की युद्ध संबंधी नीति में परिवर्तन और युद्ध को जनयुद्ध (People’s War) के रूप में देखने की शुरुआत। |
| 1941 | Indian Federation of Labour (IFL) की स्थापना; एम. एन. रॉय से जुड़ी श्रमिक धारा का उभार। |
| 8 फरवरी 1942 | कानपुर में AITUC अधिवेशन; युद्ध, श्रमिक अधिकार और राष्ट्रीय राजनीति पर चर्चा। |
| 8 अगस्त 1942 | भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव; कम्युनिस्टों की People’s War नीति के कारण AITUC का रुख कांग्रेस से अलग रहा। |
| 1945 | द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त; इसके बाद भारत में श्रमिक हड़तालों और औद्योगिक आंदोलनों में तेज वृद्धि। |
| 1945 | World Federation of Trade Unions (WFTU) के गठन की प्रक्रिया में AITUC की भागीदारी। |
| 1945–47 | श्रमिक हड़तालों और आंदोलनों में तेज वृद्धि; आर्थिक मांगों के साथ राजनीतिक स्वतंत्रता का प्रश्न भी अधिक स्पष्ट हुआ। |
AITUC से जुड़े प्रमुख व्यक्तित्व
| व्यक्तित्व | मुख्य भूमिका / संबंध |
|---|---|
| लाला लाजपत राय | AITUC के प्रथम अध्यक्ष। |
| जोसेफ बैपटिस्टा | 1920 की स्थापना प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका; प्रथम अधिवेशन में उपाध्यक्ष। |
| एन. एम. जोशी | प्रारंभिक ट्रेड यूनियन आंदोलन के प्रमुख नेता; सुधारवादी धड़े के प्रमुख नेताओं में शामिल। |
| एस. ए. डांगे | भारतीय कम्युनिस्ट और श्रमिक आंदोलन के प्रमुख नेता; AITUC में वामपंथी प्रभाव बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका। |
| एम. एन. रॉय | अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़े प्रमुख भारतीय नेता; भारत में मार्क्सवादी विचारों के प्रारंभिक प्रसार में योगदान। |
| जवाहरलाल नेहरू | 1928 में AITUC के अध्यक्ष; श्रमिक आंदोलन और राष्ट्रीय आंदोलन के बीच संबंध मजबूत करने में भूमिका। |
| वी. वी. गिरि | ट्रेड यूनियन एकता और बाद के केंद्रीय श्रमिक आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका। |
| दीवान चमन लाल | AITUC के प्रारंभिक नेतृत्व और संगठनात्मक विकास से जुड़े प्रमुख नेता। |
प्रारंभिक ट्रेड यूनियन आंदोलन → 31 अक्टूबर 1920 AITUC की स्थापना → 1921 स्वराज का समर्थन → 1926 ट्रेड यूनियन अधिनियम → 1927–28 वामपंथी प्रभाव → 1929 AITUC विभाजन और ITUF → 1931 RTUC का गठन → 1935 AITUC-RTUC पुनः एकीकरण → 1938 NTUF का AITUC से जुड़ना → 1940 NTUF का AITUC में विलय → 1941 युद्ध पर कम्युनिस्ट नीति में परिवर्तन → 1942 युद्ध और भारत छोड़ो आंदोलन का दौर → 1945 के बाद श्रमिक आंदोलनों का उभार।
Leave a Reply