आधुनिक भारत में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के चरण

भारतीय इतिहास आधुनिक भारत आधुनिक भारत में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के चरण
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परिचय

➣ भारत की स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए अनेक राजनीतिक संस्थाओं, राजनीतिक दलों, क्रांतिकारी संगठनों तथा विभिन्न नेताओं ने अपनी-अपनी विचारधारा के अनुसार ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष किया।

➣ इन सभी राजनीतिक आंदोलनों, जनआंदोलनों एवं क्रांतिकारी गतिविधियों को सामूहिक रूप से भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन कहा जाता है।

➣ उन्नीसवीं शताब्दी में आधुनिक शिक्षा के प्रसार, पाश्चात्य विचारों के प्रभाव तथा समाचार-पत्रों के विकास से भारतीय समाज में एक शिक्षित मध्यम वर्ग का उदय हुआ। इसी वर्ग ने भारतीयों में राजनीतिक चेतना जागृत की और आगे चलकर राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व भी किया।

➣ इस आन्दोलन को एक संगठित स्वरूप भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद प्राप्त हुआ। इसके पश्चात स्वतंत्रता प्राप्ति तक यह आन्दोलन विभिन्न चरणों से गुजरता हुआ निरंतर आगे बढ़ता रहा।

➣ हालाँकि कांग्रेस की स्थापना से पहले भी लैंड होल्डर्स सोसाइटी, ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन, इंडियन एसोसिएशन, बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन तथा मद्रास महाजन सभा जैसी अनेक राजनीतिक संस्थाएँ भारतीयों के अधिकारों एवं प्रशासनिक सुधारों की मांग उठा रही थीं। इन संस्थाओं ने राष्ट्रीय आन्दोलन की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ अधिकांश इतिहासकार 1857 ई. की क्रांति को भारतीय राष्ट्रवाद के विकास का महत्वपूर्ण मोड़ मानते हैं। इसके बाद राष्ट्रीय चेतना का निरंतर विस्तार हुआ और आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन एक व्यापक राष्ट्रीय संघर्ष के रूप में विकसित हुआ।

➣ समय के साथ आन्दोलन के नेतृत्व, उद्देश्य एवं कार्यप्रणाली में परिवर्तन होता गया। इन्हीं परिवर्तनों के आधार पर भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को सामान्यतः तीन प्रमुख चरणों में विभाजित किया जाता है-

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन
उदारवादी चरण
(1885–1905)

प्रार्थना, याचिका एवं प्रतिवाद

फिरोजशाह मेहता
बदरुद्दीन तैयबजी
गोपाल कृष्ण गोखले
दादाभाई नौरोजी
उग्रवादी चरण
(1905–1919)

स्वदेशी, बहिष्कार,
राष्ट्रीय शिक्षा एवं निष्क्रिय प्रतिरोध


बाल गंगाधर तिलक
बिपिन चन्द्र पाल
लाला लाजपत राय
अरविन्द घोष
गांधीवादी चरण
(1919–1947)

सत्याग्रह एवं अहिंसा

महात्मा गांधी
जवाहरलाल नेहरू
सरदार वल्लभभाई पटेल
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद

उदारवादी चरण(1885–1905)

उदारवादी चरण भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का प्रथम चरण था, जो 1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से प्रारम्भ होकर 1905 ई. के बंगाल विभाजन तक चला।

➣ इस चरण का नेतृत्व मुख्यतः शिक्षित मध्यम वर्ग के नेताओं ने किया। इन नेताओं का विश्वास था कि ब्रिटिश शासन से टकराव के बजाय संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण उपायों द्वारा भारतीयों के अधिकार प्राप्त किए जा सकते हैं।

➣ उदारवादी नेताओं ने प्रार्थना, याचिका तथा प्रतिवादकी नीति अपनाई। उनका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार को भारतीयों की समस्याओं से अवगत कराकर प्रशासनिक एवं संवैधानिक सुधारों की मांग करना था।

➣ उदारवादी नेता ब्रिटिश न्यायप्रियता और उदार परम्पराओं में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि यदि भारतीय अपनी मांगों को तर्कपूर्ण एवं शांतिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करेंगे, तो ब्रिटिश सरकार उन्हें धीरे-धीरे स्वीकार करेगी।

➣ इसके विपरीत उग्रवादी नेताओं का मानना था कि केवल प्रार्थना-पत्रों और याचिकाओं से ब्रिटिश सरकार भारतीयों को अधिकार नहीं देगी। इसी कारण उन्होंने उदारवादियों की इस नीति को राजनीतिक भिक्षावृत्ति की संज्ञा दी।

उदारवादी चरण की प्रमुख उपलब्धियाँ

  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885) के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक नेतृत्व का विकास हुआ।
  • भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 उदारवादी नेताओं के प्रयासों का पहला प्रमुख संवैधानिक सुधार था।
  • दादाभाई नौरोजी ने धन-निष्कासन सिद्धांत (Drain Theory) प्रस्तुत कर ब्रिटिश आर्थिक शोषण को उजागर किया।
  • भारतीय सिविल सेवा (ICS) परीक्षा भारत में आयोजित करने तथा भारतीयों को उच्च प्रशासनिक सेवाओं में अवसर देने की मांग को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया गया।
  • भारतीयों की प्रशासन एवं विधायी परिषदों में भागीदारी की मांग को संगठित रूप से उठाया गया।
  • वेल्बी आयोग (Welby Commission), 1895 के समक्ष भारतीय आर्थिक शोषण से संबंधित साक्ष्य प्रस्तुत किए गए।
  • भारतीयों में राजनीतिक चेतना एवं राष्ट्रीय एकता की भावना का विकास हुआ।
  • आगे चलकर उग्रवादी चरण एवं गांधीवादी चरण के लिए राजनीतिक आधार तैयार हुआ।

उदारवादी चरण की सीमाएँ

  • उदारवादी नेताओं का ब्रिटिश न्यायप्रियता एवं उदारवाद में अत्यधिक विश्वास था। उनका मानना था कि ब्रिटिश सरकार भारतीयों की मांगों पर धीरे-धीरे सहानुभूतिपूर्वक विचार करेगी, किन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं हुआ।
  • इनकी कार्यप्रणाली मुख्यतः प्रार्थना, याचिका एवं प्रतिवाद तक सीमित रही। इस कारण ब्रिटिश सरकार पर प्रभावी राजनीतिक दबाव नहीं बन सका।
  • उदारवादी आन्दोलन का आधार मुख्यतः शिक्षित मध्यम वर्ग तक सीमित था। किसान, मजदूर तथा सामान्य जनता की सीमित भागीदारी के कारण यह व्यापक जनआन्दोलन का रूप नहीं ले सका।
  • उदारवादी नेताओं का प्रमुख उद्देश्य संवैधानिक सुधार एवं स्वशासन प्राप्त करना था। यद्यपि 1906 ई. के कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी ने स्वराज को कांग्रेस का लक्ष्य बताया, किन्तु पूर्ण स्वराज को कांग्रेस का आधिकारिक लक्ष्य बाद में 1929 ई. के लाहौर अधिवेशन में घोषित किया गया।
  • भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 उदारवादी नेताओं की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं था। इसमें परिषदों का विस्तार तो किया गया, लेकिन भारतीय सदस्यों को वास्तविक विधायी अधिकार नहीं मिले।
  • भारतीय सिविल सेवा (ICS) परीक्षा भारत में आयोजित करने तथा भारतीयों को उच्च प्रशासनिक सेवाओं में अधिक अवसर देने जैसी प्रमुख मांगों को ब्रिटिश सरकार ने लंबे समय तक स्वीकार नहीं किया।
  • वेल्बी आयोग, 1895 के समक्ष भारतीय नेताओं ने ब्रिटिश आर्थिक शोषण से संबंधित साक्ष्य प्रस्तुत किए, किन्तु इससे भारत की वित्तीय नीतियों में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं हुआ।
  • भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 1904 द्वारा विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ा दिया गया। उदारवादी नेताओं ने इसका विरोध किया, किन्तु सरकार ने उनकी आपत्तियों को महत्व नहीं दिया।
  • 1905 ई. के बंगाल विभाजन तथा उससे उत्पन्न जनआक्रोश ने स्पष्ट कर दिया कि केवल उदारवादी नीति से ब्रिटिश सरकार पर प्रभावी दबाव नहीं बनाया जा सकता। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय आन्दोलन में उग्रवादी विचारधारा का प्रभाव तेजी से बढ़ने लगा।

उग्रवादी चरण (1905–1919)

उग्रवादी चरण भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का दूसरा चरण था, जो सामान्यतः 1905 ई. के बंगाल विभाजन से प्रारम्भ होकर 1919 ई. के रॉलेट एक्ट एवं जलियाँवाला बाग हत्याकांड तक माना जाता है।

➣ उदारवादी नेताओं की सीमित उपलब्धियों तथा ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों से भारतीयों में असंतोष बढ़ने लगा। विशेष रूप से लॉर्ड कर्जन की नीतियाँ, भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम (1904), बंगाल विभाजन (1905) तथा भारतीयों की मांगों की लगातार उपेक्षा ने उग्रवादी विचारधारा को जन्म दिया।

➣ इस चरण का नेतृत्व मुख्यतः बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, बिपिन चन्द्र पाल तथा अरविन्द घोष ने किया। इनमें तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्र पाल को संयुक्त रूप से लाल-बाल-पाल कहा जाता है।

➣ उग्रवादी नेताओं का विश्वास था कि केवल प्रार्थना, याचिका एवं प्रतिवाद के माध्यम से स्वतंत्रता प्राप्त नहीं की जा सकती। उनका मानना था कि स्वावलम्बन, संगठन तथा संघर्ष के द्वारा ही अंग्रेजों पर प्रभावी दबाव बनाया जा सकता है। इसी विचारधारा को व्यक्त करते हुए लोकमान्य तिलक ने “अनुनय-विनय नहीं, अपितु युयुत्सा”(संघर्ष) को अपना आदर्श बताया।

➣ उग्रवादी नेताओं ने स्वदेशी, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा, निष्क्रिय प्रतिरोध तथा जनभागीदारी को आन्दोलन का प्रमुख माध्यम बनाया।

इन उपायों के माध्यम से भारतीयों में आत्मनिर्भरता, राष्ट्रीय गौरव तथा स्वराज्य की भावना विकसित करने का प्रयास किया गया।

➣ यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने उग्रवादी नेताओं पर कठोर दमनात्मक नीति अपनाई, फिर भी इस चरण ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को पहली बार व्यापक जनआन्दोलन का स्वरूप प्रदान किया तथा आगे चलकर गांधीवादी चरण के लिए मजबूत जनाधार तैयार किया।

उग्रवादी चरण की प्रमुख उपलब्धियाँ

  • स्वदेशी आन्दोलन (1905) के परिणामस्वरूप देशभर में स्वदेशी उद्योगों को प्रोत्साहन मिला। इस दौरान बंगाल केमिकल्स, बंगाल नेशनल बैंक, स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी तथा अनेक कुटीर एवं लघु उद्योगों की स्थापना हुई।
  • विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार आन्दोलन के कारण ब्रिटिश वस्तुओं की बिक्री पर प्रभाव पड़ा। अनेक स्थानों पर विदेशी कपड़ों की सार्वजनिक होली जलाई गई तथा स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग को राष्ट्रीय कर्तव्य के रूप में अपनाया गया।
  • राष्ट्रीय शिक्षा आन्दोलन के अंतर्गत सरकारी शिक्षण संस्थानों के विकल्प के रूप में बंगाल नेशनल कॉलेज, नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशन (1906) सहित अनेक राष्ट्रीय विद्यालयों एवं शिक्षण संस्थानों की स्थापना की गई।
  • बाल गंगाधर तिलक ने न्यू इंग्लिश स्कूल (1880), दक्कन एजुकेशन सोसाइटी (1884) तथा फर्ग्यूसन कॉलेज (1885) की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान देकर राष्ट्रीय शिक्षा के विकास को नई दिशा दी।
  • स्वराज्य को राष्ट्रीय आन्दोलन का प्रमुख लक्ष्य बनाने की दिशा में उग्रवादी नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे भारतीयों में आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान तथा राष्ट्रीय गौरव की भावना को बल मिला।
  • लोकमान्य तिलक ने गणपति उत्सव एवं शिवाजी उत्सव को सार्वजनिक रूप देकर राष्ट्रीय आन्दोलन को जनसाधारण तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • केसरी (मराठी), मराठा (अंग्रेज़ी), वन्दे मातरम् तथा युगांतर जैसे समाचार-पत्रों ने राष्ट्रवादी विचारों के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
  • 1905 ई. के बंगाल विभाजन के विरोध ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को पहली बार व्यापक जनआन्दोलन का स्वरूप प्रदान किया तथा विद्यार्थी, महिलाएँ, व्यापारी एवं अन्य वर्ग बड़ी संख्या में आन्दोलन से जुड़े।
  • उग्रवादी विचारधारा के प्रभाव से देश के विभिन्न भागों में क्रांतिकारी संगठनों एवं गुप्त समितियों का तेजी से विकास हुआ, जिसने आगे चलकर सशस्त्र क्रांतिकारी आन्दोलन को गति प्रदान की।
  • उग्रवादी चरण ने आगे चलकर होमरूल आन्दोलन, गांधीवादी आन्दोलन तथा व्यापक जनसंघर्षों के लिए मजबूत वैचारिक एवं जनाधार तैयार किया।

उग्रवादी चरण की सीमाएँ

  • 1907 ई. के सूरत विभाजन के कारण कांग्रेस नरम दल एवं गरम दल में विभाजित हो गई। इससे राष्ट्रीय आन्दोलन की एकता कमजोर हुई तथा उग्रवादी नेताओं को कांग्रेस से अलग होकर कार्य करना पड़ा।
  • ब्रिटिश सरकार ने उग्रवादी नेताओं के विरुद्ध कठोर दमनकारी नीति अपनाई। अनेक नेताओं को गिरफ्तार किया गया, समाचार-पत्रों पर प्रतिबंध लगाए गए तथा सार्वजनिक सभाओं एवं राजनीतिक गतिविधियों पर नियंत्रण स्थापित किया गया।
  • 1907 ई. में लाला लाजपत राय को माण्डले (बर्मा) निर्वासित किया गया, 1908 ई. में बाल गंगाधर तिलक को 6 वर्ष के लिए माण्डले (बर्मा) भेज दिया गया तथा अरविन्द घोष ने अलीपुर बम कांड (1908) के बाद सक्रिय राजनीति छोड़ दी।
  • इन घटनाओं के कारण उग्रवादी आन्दोलन अपने प्रमुख नेताओं से वंचित हो गया, जिससे उसके नेतृत्व की एकता कमजोर पड़ी और आन्दोलन की गति धीमी हो गई।
  • 1908 ई. में क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट तथा समाचार-पत्रों पर नियंत्रण संबंधी कानूनों के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने उग्रवादी एवं क्रांतिकारी गतिविधियों का कठोर दमन किया।
  • उग्रवादी आन्दोलन का कोई सुदृढ़ अखिल भारतीय संगठन या स्थायी कार्यक्रम विकसित नहीं हो सका। विभिन्न प्रांतों में आन्दोलन अलग-अलग नेताओं के नेतृत्व में चलता रहा, जिससे पूरे देश में एक समान गति बनाए रखना कठिन रहा।
  • स्वदेशी आन्दोलन एवं विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का प्रभाव मुख्यतः शिक्षित वर्ग एवं नगरों तक सीमित रहा। ग्रामीण क्षेत्रों तथा देश के अनेक भागों में इसकी पहुँच अपेक्षाकृत कम रही।
  • भारतीय प्रेस अधिनियम, 1910 के माध्यम से राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों पर कठोर नियंत्रण स्थापित किया गया, जिससे उग्रवादी विचारों के प्रचार-प्रसार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
  • प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) के दौरान ब्रिटिश सरकार ने राष्ट्रवादी गतिविधियों पर और अधिक नियंत्रण स्थापित कर दिया। इससे उग्रवादी आन्दोलन पुनः संगठित नहीं हो सका और आगे चलकर महात्मा गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आन्दोलन ने नया स्वरूप ग्रहण किया।

गांधीवादी चरण (1919–1947)

गांधीवादी चरण भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का तीसरा एवं अंतिम चरण था, जो सामान्यतः 1919 ई. के रॉलेट सत्याग्रह से प्रारम्भ होकर 15 अगस्त, 1947 ई. को भारत की स्वतंत्रता तक चला।

महात्मा गांधी जनवरी 1915 ई. में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। प्रारम्भिक वर्षों में उन्होंने भारतीय परिस्थितियों का अध्ययन किया तथा चम्पारण (1917), अहमदाबाद मिल मजदूर आन्दोलन (1918) एवं खेड़ा सत्याग्रह (1918) की सफलता के बाद राष्ट्रीय राजनीति में उनका प्रभाव तेजी से बढ़ा।

रॉलेट एक्ट (1919), जलियाँवाला बाग हत्याकांड तथा ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों ने भारतीयों में व्यापक असंतोष उत्पन्न किया। इन घटनाओं के बाद गांधीजी भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के निर्विवाद नेता के रूप में उभरे।

➣ गांधीजी ने राष्ट्रीय आन्दोलन को सत्याग्रह, अहिंसा, असहयोग, सविनय अवज्ञा, बहिष्कार तथा रचनात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से नई दिशा प्रदान की। उनका उद्देश्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करना नहीं था, बल्कि भारतीय समाज में स्वावलम्बन, सामाजिक एकता तथा नैतिक मूल्यों का विकास करना भी था।

➣ गांधीवादी चरण में पहली बार किसानों, मजदूरों, महिलाओं, विद्यार्थियों, व्यापारियों तथा ग्रामीण जनता ने बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लिया। परिणामस्वरूप भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन एक वास्तविक जनआन्दोलन बन गया।

➣ गांधीजी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन (1920–22), सविनय अवज्ञा आन्दोलन (1930–34) तथा भारत छोड़ो आन्दोलन (1942) जैसे व्यापक जनआन्दोलन संचालित हुए, जिन्होंने अंततः ब्रिटिश शासन की नींव को कमजोर कर भारत की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया।

गांधीवादी आन्दोलन की चुनौतियाँ

  • चौरी-चौरा कांड (1922) के बाद महात्मा गांधी ने असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया। इस निर्णय से अनेक राष्ट्रीय नेताओं एवं युवाओं में निराशा फैल गई तथा गांधीजी के निर्णय की व्यापक आलोचना हुई।
  • क्रांतिकारी नेताओं एवं कुछ उग्रवादी विचारधारा के समर्थकों का मत था कि केवल अहिंसा और सत्याग्रह के माध्यम से ब्रिटिश शासन को समाप्त करना कठिन होगा।
  • साइमन कमीशन, गोलमेज सम्मेलनों तथा विभिन्न संवैधानिक वार्ताओं के बावजूद ब्रिटिश सरकार भारतीयों की प्रमुख मांगों को लंबे समय तक स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुई।
  • सांप्रदायिकता एवं हिन्दू-मुस्लिम मतभेद समय के साथ बढ़ते गए। गांधीजी के निरंतर प्रयासों के बावजूद दोनों समुदायों के बीच स्थायी राजनीतिक एकता स्थापित नहीं हो सकी।
  • मुस्लिम लीग द्वारा पृथक राष्ट्र की मांग तथा बढ़ते सांप्रदायिक तनाव के कारण अंततः भारत का विभाजन (1947) हुआ, जिसे राष्ट्रीय आन्दोलन की सबसे बड़ी चुनौतियों में माना जाता है।
  • भारत छोड़ो आन्दोलन (1942) के दौरान गांधीजी सहित लगभग सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके कारण आन्दोलन का केंद्रीय नेतृत्व कुछ समय के लिए बाधित हो गया, यद्यपि आन्दोलन विभिन्न क्षेत्रों में स्वतः जारी रहा।
  • गांधीजी के अहिंसा एवं सत्याग्रह के सिद्धांतों को सभी राजनीतिक दलों एवं क्रांतिकारी संगठनों का समान समर्थन प्राप्त नहीं हुआ। अनेक नेताओं का मानना था कि परिस्थितियों के अनुसार अधिक कठोर संघर्ष की भी आवश्यकता थी।
  • स्वतंत्रता प्राप्त होने के बावजूद भारत को विभाजन, सांप्रदायिक दंगे, शरणार्थी समस्या तथा रियासतों के एकीकरण जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिससे स्पष्ट होता है कि स्वतंत्रता के साथ अनेक जटिल समस्याएँ भी सामने आईं।

क्रांतिकारी संगठनों का उदय

➣ भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान जहाँ एक ओर उदारवादी, उग्रवादी तथा गांधीवादी नेताओं ने अपने-अपने तरीकों से स्वतंत्रता संघर्ष को आगे बढ़ाया,

➣ वहीं कुछ युवाओं ने सशस्त्र क्रांति का मार्ग अपनाया। उनका विश्वास था कि अंग्रेजी शासन को केवल बलपूर्वक संघर्ष के माध्यम से ही समाप्त किया जा सकता है।

➣ भारत में संगठित क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रारम्भ सामान्यतः 1897 ई. में चापेकर बंधुओं द्वारा पुणे में प्लेग कमिश्नर डब्ल्यू. सी. रैण्ड तथा लेफ्टिनेंट एयर्स्ट की हत्या से माना जाता है।

➣ इसके बाद महाराष्ट्र, बंगाल, पंजाब तथा उत्तर भारत में अनेक गुप्त क्रांतिकारी संगठनों की स्थापना हुई।

➣ स्वदेशी आन्दोलन के बाद क्रांतिकारी गतिविधियों को नई गति मिली। महाराष्ट्र में मित्र मेला, बाद में अभिनव भारत तथा बंगाल में अनुशीलन समिति और युगांतर जैसे संगठनों ने सशस्त्र क्रांति को संगठित स्वरूप प्रदान किया।

➣ भारत के साथ-साथ लंदन, पेरिस, बर्लिन, उत्तरी अमेरिका, जापान तथा अन्य देशों में भी भारतीय क्रांतिकारियों ने अपने संगठन स्थापित किए, जिन्होंने विदेशों से भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन को वैचारिक, आर्थिक तथा सैन्य सहयोग प्रदान किया।

➣ भारत के भीतर शचीन्द्रनाथ सान्याल, पुलिन बिहारी दास, खुदीराम बोस, प्रफुल्ल चाकी, सतीश चन्द्र बसु, बारीन्द्र कुमार घोष, अरविन्द घोष, भूपेन्द्रनाथ दत्त, जतिन्द्रनाथ मुखर्जी (बाघा जतिन), सुनीति चौधरी, शांति घोष, बीना दास, भगत सिंह, राजगुरु, चन्द्रशेखर आजाद तथा अनेक अन्य क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व किया।

➣ इसी प्रकार विदेशों में मैडम भीकाजी कामा, श्यामजी कृष्ण वर्मा, लाला हरदयाल, रासबिहारी बोस, सोहन सिंह भाखना, वी. डी. सावरकर, एम. बरकतुल्ला, वी. वी. एस. अय्यर, उबैदुल्ला सिंधी तथा मानवेन्द्रनाथ राय (एम. एन. राय) जैसे क्रांतिकारियों ने विदेशों में रहकर भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन को नई दिशा प्रदान की।

➣ ब्रिटिश सरकार ने क्रांतिकारी गतिविधियों के विरुद्ध कठोर दमनकारी नीति अपनाई। अनेक क्रांतिकारियों को फाँसी दी गई, आजीवन कारावास या काला पानी की सजा सुनाई गई तथा अनेक संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

➣ परिणामस्वरूप 1932 ई. तक अधिकांश राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी संगठन निष्क्रिय अथवा बिखर चुके थे।

➣ यद्यपि इसके बाद भी बिनॉय-बादल-दिनेश, उधम सिंह (1940) आदि की क्रांतिकारी गतिविधियाँ जारी रहीं, किन्तु वे किसी सशक्त राष्ट्रीय अथवा अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी संगठन के नेतृत्व में नहीं थीं।

भारत के प्रमुख क्रांतिकारी संगठन

संगठन संस्थापक / प्रमुख व्यक्ति स्थान प्रमुख घटना / षड्यंत्र / मुकदमा
व्यायाम मंडल (1897) चापेकर बंधु पूना (महाराष्ट्र) रैण्ड-एयर्स्ट हत्याकांड (1897)
मित्र मेला (1899) विनायक दामोदर सावरकर नासिक (महाराष्ट्र) 1904 में अभिनव भारत में परिवर्तित
अनुशीलन समिति (1902) प्रमथनाथ मित्र कलकत्ता मुजफ्फरपुर बम कांड (1908)
अलीपुर बम षड्यंत्र केस (1908)
अभिनव भारत (1904) विनायक दामोदर सावरकर एवं गणेश सावरकर नासिक (महाराष्ट्र) नासिक षड्यंत्र केस (1909)
जैक्सन हत्याकांड (1909)
युगांतर दल (1906) बारीन्द्र कुमार घोष एवं भूपेन्द्रनाथ दत्त कलकत्ता अलीपुर बम षड्यंत्र केस (1908)
हावड़ा षड्यंत्र केस (1910)
रॉडा शस्त्र लूट (1914)
ढाका अनुशीलन समिति (1906) पुलिन बिहारी दास ढाका ढाका षड्यंत्र केस (1910)
बारीसाल षड्यंत्र केस
हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) (1924) शचीन्द्रनाथ सान्याल, रामप्रसाद बिस्मिल, योगेशचन्द्र चटर्जी आदि कानपुर काकोरी षड्यंत्र केस (1925)
काकोरी ट्रेन डकैती (1925)
हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) (1928) भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, सुखदेव, भगवतीचरण वोहरा आदि दिल्ली (फिरोजशाह कोटला) सॉन्डर्स वध (1928)
केंद्रीय विधानसभा बम कांड (1929)
लाहौर षड्यंत्र केस (1929–31)
इंडियन रिपब्लिकन आर्मी (1930) सूर्यसेन (मास्टर दा) चटगाँव चटगाँव शस्त्रागार कांड (1930)
जलालाबाद युद्ध (1930)

विदेशों में स्थापित प्रमुख क्रांतिकारी संगठन

संगठन संस्थापक / प्रमुख व्यक्ति स्थान प्रमुख घटना / षड्यंत्र / मुकदमा
इंडियन होमरूल सोसायटी (1905) श्यामजी कृष्ण वर्मा लंदन (इंग्लैंड) इंडिया हाउस (1905) की स्थापना
द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट पत्र का प्रकाशन
इंडिया हाउस (1905) श्यामजी कृष्ण वर्मा लंदन (इंग्लैंड) मदनलाल धींगरा द्वारा कर्जन वायली हत्याकांड (1909)
सावरकर की गिरफ्तारी (1910)
फ्री इंडिया सोसायटी (1906) वी. डी. सावरकर लंदन (इंग्लैंड) क्रांतिकारी साहित्य का प्रचार
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के स्वर्ण जयंती समारोह (1907)
पेरिस इंडियन सोसायटी (1905) मैडम भीकाजी कामा एवं एस. आर. राणा पेरिस (फ्रांस) स्टुटगार्ट सम्मेलन (1907) में भारतीय ध्वज फहराया
वन्दे मातरम् पत्र का प्रकाशन
गदर पार्टी (1913) सोहन सिंह भाखना सैन फ्रांसिस्को (अमेरिका) गदर समाचार-पत्र का प्रकाशन
लाहौर षड्यंत्र केस (1915)
1915 के सैनिक विद्रोह की योजना
बर्लिन समिति / इंडियन इंडिपेंडेंस कमेटी (1914) वीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय बर्लिन (जर्मनी) हिन्दू-जर्मन षड्यंत्र (1914–17)
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सशस्त्र विद्रोह की योजना
काबुल की अस्थायी भारत सरकार (1915) राजा महेन्द्र प्रताप, मौलाना बरकतुल्ला, उबैदुल्ला सिंधी काबुल (अफगानिस्तान) भारत की प्रथम निर्वासित सरकार
जर्मनी, तुर्की एवं अफगानिस्तान का समर्थन प्राप्त करने का प्रयास
इंडियन इंडिपेंडेंस लीग (पुनर्गठन 1942) रासबिहारी बोस (बाद में सुभाषचन्द्र बोस) सिंगापुर बैंकॉक सम्मेलन (1942)
आज़ाद हिन्द फौज (INA) के पुनर्गठन का आधार
फ्री इंडिया सेंटर (1941) सुभाषचन्द्र बोस बर्लिन (जर्मनी) आज़ाद हिन्द रेडियो की स्थापना
फ्री इंडिया आंदोलन का यूरोपीय केंद्र
इंडियन लीजन / फ्री इंडिया लीजन (1941) सुभाषचन्द्र बोस जर्मनी जर्मन सेना के सहयोग से भारतीय सैन्य टुकड़ी का गठन
आज़ाद हिन्द फौज का प्रारम्भिक यूरोपीय स्वरूप

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