भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (1925): कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र मामला एवं मेरठ षड्यंत्र मामला

भारतीय इतिहास आधुनिक भारत भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (1925)
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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI)

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (Communist Party of India – CPI) भारत की सबसे पुरानी साम्यवादी राजनीतिक पार्टी है। इसकी स्थापना 17 अक्टूबर 1920 ई. को ताशकंद (वर्तमान उज्बेकिस्तान) में मानवेन्द्र नाथ रॉय (एम. एन. रॉय) तथा उनके सहयोगियों द्वारा की गई।

➣ बाद में दिसंबर 1925 ई. में कानपुर सम्मेलन के माध्यम से भारत में इसके संगठनात्मक विकास को नई दिशा मिली।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का उदय ऐसे समय में हुआ, जब विश्वभर में साम्यवाद का प्रभाव बढ़ रहा था। 1917 ई. की रूसी बोल्शेविक क्रांति ने उपनिवेशों में रहने वाले अनेक राष्ट्रवादियों और मजदूर नेताओं को प्रभावित किया।

➣ भारत में भी कुछ नेताओं ने यह विचार रखा कि राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक समानता भी आवश्यक है।

➣ प्रारम्भिक वर्षों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने मजदूरों, किसानों तथा श्रमिक वर्ग को संगठित करने का प्रयास किया। पार्टी ने ट्रेड यूनियन आंदोलन, किसान आंदोलनों तथा श्रमिक अधिकारों के प्रश्नों को प्रमुखता से उठाया।

➣ इसके कारण ब्रिटिश सरकार ने इसे अपने लिए चुनौती माना और समय-समय पर इसके नेताओं के विरुद्ध अनेक मुकदमे चलाए।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान CPI की भूमिका कई चरणों में बदलती रही। विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुसार पार्टी की नीतियों में परिवर्तन हुआ, जिसके कारण इसे कभी स्वतंत्रता आंदोलन का सहयोगी तो कभी आलोचना का विषय भी माना गया।

➣ आधुनिक भारत के इतिहास में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का महत्व केवल एक राजनीतिक दल के रूप में ही नहीं, बल्कि भारतीय मजदूर आंदोलन, किसान आंदोलन तथा वामपंथी विचारधारा के विकास में उसके योगदान के कारण भी है।

पृष्ठभूमि

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की स्थापना अचानक नहीं हुई थी। इसके पीछे साम्यवादी विचारधारा का विकास, 1917 ई. की रूसी बोल्शेविक क्रांति का प्रभाव तथा भारत में साम्यवादी विचारों का क्रमिक प्रसार जैसी अनेक महत्वपूर्ण घटनाएँ थीं। इन्हीं परिस्थितियों ने भारत में एक संगठित साम्यवादी राजनीतिक दल के गठन की पृष्ठभूमि तैयार की।

साम्यवाद की विचारधारा

साम्यवाद एक ऐसी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विचारधारा है, जिसका उद्देश्य समाज में वर्गहीन और शोषणमुक्त व्यवस्था की स्थापना करना है।

➣ इस विचारधारा के अनुसार समाज में उत्पादन के प्रमुख साधनों—जैसे भूमि, उद्योग, खदानें और बड़े कारखानों पर किसी एक व्यक्ति या निजी संस्था का नहीं, बल्कि पूरे समाज अथवा राज्य का नियंत्रण होना चाहिए।

साम्यवाद की वैचारिक नींव कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने रखी। 1848 ई. में दोनों ने मिलकर प्रसिद्ध कम्युनिस्ट घोषणापत्र प्रकाशित किया, जिसमें उन्होंने पूँजीवादी व्यवस्था की आलोचना करते हुए मजदूर वर्ग के संगठन और सामाजिक परिवर्तन का आह्वान किया।

➣ बाद में कार्ल मार्क्स ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक दास कैपिटल में पूँजीवादी व्यवस्था का विस्तृत विश्लेषण किया।

➣ मार्क्स के अनुसार इतिहास का विकास मुख्यतः वर्ग संघर्ष के माध्यम से होता है। उनका मानना था कि समाज में पूँजीपति वर्ग और मजदूर वर्ग के हित एक-दूसरे के विपरीत होते हैं। इसलिए मजदूर वर्ग को संगठित होकर ऐसी व्यवस्था स्थापित करनी चाहिए, जिसमें आर्थिक और सामाजिक असमानता समाप्त हो सके।

समाजवाद (Socialism) और साम्यवाद (Communism) एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, लेकिन दोनों समान नहीं हैं। सामान्यतः समाजवाद को साम्यवाद की ओर बढ़ने का एक चरण माना जाता है।

समाजवाद में राज्य की भूमिका अधिक होती है, जबकि साम्यवाद का अंतिम लक्ष्य ऐसा समाज स्थापित करना है, जहाँ वर्गभेद और शोषण समाप्त हो जाए तथा राज्य की आवश्यकता भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाए। 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में यूरोप और एशिया के अनेक देशों में साम्यवादी विचार तेजी से फैलने लगे।

➣ विशेष रूप से 1917 ई. की रूसी बोल्शेविक क्रांति के बाद इस विचारधारा का प्रभाव उपनिवेशों, विशेषकर भारत जैसे देशों के शिक्षित युवाओं, मजदूर नेताओं और राष्ट्रवादियों पर भी पड़ा।

रूसी क्रांति (1917) का प्रभाव

1917 ई. में रूस में हुई बोल्शेविक क्रांति विश्व इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक मानी जाती है। इस क्रांति के नेतृत्व में व्लादिमीर इलिच लेनिन और बोल्शेविक पार्टी ने रूस की जारशाही का अंत कर विश्व का पहला साम्यवादी राज्य स्थापित किया। इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति तथा विश्वभर में साम्यवादी विचारधारा के प्रसार को नई दिशा दी।

➣ रूसी क्रांति ने यह सिद्ध किया कि संगठित जनशक्ति के माध्यम से लंबे समय से चली आ रही निरंकुश शासन व्यवस्था को भी समाप्त किया जा सकता है। इसके बाद विश्व के अनेक देशों में मजदूरों, किसानों और श्रमिक संगठनों का मनोबल बढ़ा तथा सामाजिक और आर्थिक समानता की माँग अधिक संगठित रूप में उठने लगी।

➣ इस क्रांति का प्रभाव केवल यूरोप तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के उपनिवेशों तक भी पहुँचा। साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष कर रहे अनेक राष्ट्रवादी नेताओं ने इसे एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना के रूप में देखा।

➣ इसके परिणामस्वरूप अनेक देशों में साम्यवादी दलों, मजदूर संगठनों तथा ट्रेड यूनियनों का गठन प्रारम्भ हुआ।

➣ रूसी क्रांति के बाद 1919 ई. में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य विश्वभर में साम्यवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करना तथा विभिन्न देशों के साम्यवादी संगठनों के बीच सहयोग स्थापित करना था।

➣ रूसी क्रांति और उसके बाद हुए अंतरराष्ट्रीय परिवर्तनों का प्रभाव भारत सहित अनेक उपनिवेशों पर भी पड़ा। इससे भारत में भी साम्यवादी विचारधारा के प्रति रुचि बढ़ी और आगे चलकर इन विचारों का प्रसार संगठित रूप से होने लगा।

भारत में साम्यवादी विचारधारा का प्रसार

रूसी बोल्शेविक क्रांति (1917) के बाद साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव धीरे-धीरे भारत तक भी पहुँचा।

➣ उस समय अनेक भारतीय छात्र, क्रांतिकारी तथा राजनीतिक कार्यकर्ता विदेशों में रहकर अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक घटनाओं का अध्ययन कर रहे थे। उनमें से कई लोग साम्यवाद के सिद्धांतों से प्रभावित हुए और उन्होंने भारत में इन विचारों के प्रचार-प्रसार का प्रयास प्रारम्भ किया।

➣ उधर प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारत में महँगाई, बेरोज़गारी, औद्योगिक श्रमिकों की खराब स्थिति, अत्यधिक लगान तथा किसानों की आर्थिक समस्याओं के कारण असंतोष बढ़ने लगा।

➣ ऐसे वातावरण में अनेक लोगों का मानना था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक समानता भी आवश्यक है। इसी कारण साम्यवादी विचारधारा को धीरे-धीरे मजदूरों, किसानों और शिक्षित युवाओं के बीच समर्थन मिलने लगा।

➣ भारत में साम्यवादी विचारधारा के प्रारम्भिक प्रचार में मानवेन्द्र नाथ रॉय (एम. एन. रॉय) की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे प्रारम्भ में एक क्रांतिकारी राष्ट्रवादी थे, लेकिन विदेश प्रवास के दौरान साम्यवाद से प्रभावित होकर अंतरराष्ट्रीय साम्यवादी आंदोलन से जुड़ गए।

एम. एन. रॉय के अतिरिक्त अवनी मुखर्जी, एवलिन ट्रेंट रॉय, मोहम्मद शफीक तथा अन्य भारतीय क्रांतिकारियों ने भी विदेशों में रहकर साम्यवादी विचारधारा के प्रचार-प्रसार में योगदान दिया। इन नेताओं का संपर्क कम्युनिस्ट इंटरनेशनल से भी स्थापित हुआ, जिससे भारतीय साम्यवादी आंदोलन को वैचारिक समर्थन मिला।

➣ दूसरी ओर भारत के भीतर श्रीपाद अमृत डांगे (एस. ए. डांगे), मुज़फ्फर अहमद, सिंगारवेलु चेट्टियार, गुलाम हुसैन तथा अन्य नेताओं ने मजदूरों, श्रमिक संगठनों और युवाओं के बीच साम्यवादी विचारों का प्रचार प्रारम्भ किया। बॉम्बे (मुंबई), कलकत्ता, मद्रास, कानपुर तथा अन्य औद्योगिक नगरों में साम्यवादी विचारों से प्रभावित छोटे-छोटे समूह बनने लगे।

➣ यद्यपि ये समूह अलग-अलग क्षेत्रों में कार्य कर रहे थे, फिर भी उनका उद्देश्य मजदूरों और किसानों को संगठित करना तथा साम्यवादी विचारधारा का प्रसार करना था।

➣ धीरे-धीरे एक ऐसे अखिल भारतीय संगठन की आवश्यकता महसूस की गई, जो इन बिखरे हुए साम्यवादी समूहों को एक मंच पर ला सके। यही आवश्यकता आगे चलकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की स्थापना का आधार बनी।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना (1920)

➣ रूसी क्रांति के बाद भारत में साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव लगातार बढ़ने लगा। इसके साथ ही एक ऐसे संगठित राजनीतिक दल की आवश्यकता महसूस होने लगी, जो मजदूरों, किसानों तथा वंचित वर्गों के हितों का प्रतिनिधित्व कर सके और साम्यवादी विचारधारा के आधार पर कार्य करे।

➣ इसी आवश्यकता के परिणामस्वरूप 17 अक्टूबर 1920 ई. को ताशकंद (वर्तमान उज्बेकिस्तान) में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की स्थापना की गई। उस समय ताशकंद सोवियत रूस के प्रभाव क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण केंद्र था।

➣ यह भारत के बाहर स्थापित होने वाला पहला भारतीय राजनीतिक संगठन था, जिसने स्वयं को साम्यवादी विचारधारा पर आधारित बताया।

➣ ताशकंद को स्थापना स्थल इसलिए चुना गया क्योंकि उस समय यह सोवियत रूस के प्रभाव क्षेत्र में था और एशियाई क्रांतिकारियों की गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका था।

➣ इसके विपरीत ब्रिटिश सरकार भारत में साम्यवादी गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखती थी, इसलिए प्रारम्भिक संगठनात्मक कार्य विदेश से संचालित करना अपेक्षाकृत सुरक्षित माना गया।

➣ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका मानवेन्द्र नाथ रॉय (एम. एन. रॉय) ने निभाई। वे प्रारम्भ में एक राष्ट्रवादी क्रांतिकारी थे, लेकिन बाद में साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित होकर अंतरराष्ट्रीय साम्यवादी आंदोलन से जुड़ गए।

➣ उन्होंने अपनी पत्नी एवलिन रॉय तथा अन्य भारतीय क्रांतिकारियों के सहयोग से ताशकंद में पार्टी की स्थापना की।

➣ पार्टी के प्रारम्भिक सदस्यों में एम. एन. रॉय, एवलिन रॉय, अबनी मुखर्जी, रोज़ा फितिंगोफ़, एम. पी. टी. आचार्य, मोहम्मद अली, मोहम्मद शफीक तथा कुछ अन्य भारतीय क्रांतिकारी शामिल थे।

➣ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना पर कम्युनिस्ट इंटरनेशनल का भी प्रभाव था। इस संगठन का उद्देश्य विश्व के विभिन्न देशों में साम्यवादी आंदोलनों को संगठित करना तथा उपनिवेशों में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलनों को वैचारिक सहयोग प्रदान करना था। एम. एन. रॉय कोमिन्टर्न से जुड़े प्रमुख भारतीय नेताओं में से एक थे।

➣ स्थापना के बाद पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती भारत के भीतर अपना संगठन विकसित करना था। ब्रिटिश सरकार साम्यवादी गतिविधियों को अपने शासन के लिए खतरा मानती थी, इसलिए प्रारम्भिक वर्षों में पार्टी को गुप्त रूप से कार्य करना पड़ा।

➣ आगे चलकर दिसंबर 1925 ई. में आयोजित कानपुर सम्मेलन ने भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन को अधिक संगठित और व्यापक स्वरूप प्रदान किया।

उद्देश्य

➣ यद्यपि पार्टी की स्थापना भारत के बाहर हुई थी, फिर भी उसका मुख्य उद्देश्य भारत में एक संगठित साम्यवादी आंदोलन का निर्माण करना और स्वतंत्रता आंदोलन के साथ श्रमिक एवं किसान वर्ग की समस्याओं को जोड़ना था।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की स्थापना निम्नलिखित प्रमुख उद्देश्यों को ध्यान में रखकर की गई थी-

  • भारत में साम्यवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करना।
  • मजदूरों, किसानों तथा अन्य श्रमिक वर्गों को संगठित कर उनके अधिकारों की रक्षा करना।
  • ब्रिटिश साम्राज्यवाद एवं औपनिवेशिक शासन का विरोध करना।
  • समाज में व्याप्त आर्थिक और सामाजिक असमानता को समाप्त कर समानता पर आधारित व्यवस्था स्थापित करना।
  • ट्रेड यूनियनों, किसान संगठनों तथा श्रमिक आंदोलनों को संगठित एवं सशक्त बनाना।
  • उत्पादन के साधनों पर कुछ लोगों के एकाधिकार का विरोध करते हुए समाज के सभी वर्गों के हितों की रक्षा करना।
  • भारत में एक संगठित साम्यवादी राजनीतिक आंदोलन का विकास करना तथा मजदूर-किसान वर्ग को राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावी स्थान दिलाना।

प्रारम्भिक चुनौतियाँ

➣ स्थापना के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि पार्टी का गठन भारत के बाहर हुआ था, जबकि उसका मुख्य कार्यक्षेत्र भारत था। इसलिए पार्टी के नेताओं के लिए भारत में एक मजबूत संगठन तैयार करना आसान नहीं था।

ब्रिटिश सरकार साम्यवादी विचारधारा को अपने शासन के लिए संभावित खतरा मानती थी। परिणामस्वरूप पार्टी की गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखी गई तथा साम्यवादी नेताओं और कार्यकर्ताओं पर अनेक मुकदमे चलाए गए। कई स्थानों पर उन्हें गुप्त रूप से कार्य करना पड़ा।

➣ एक अन्य चुनौती यह थी कि उस समय भारत के विभिन्न क्षेत्रों में साम्यवादी विचारों से प्रभावित छोटे-छोटे समूह सक्रिय थे, लेकिन उनके बीच कोई केंद्रीय संगठन नहीं था। इन सभी समूहों को एक मंच पर लाना और पूरे देश में एक समान संगठनात्मक ढाँचा विकसित करना कठिन कार्य था।

➣ इन चुनौतियों के बावजूद साम्यवादी आंदोलन धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा। अंततः दिसंबर 1925 ई. में आयोजित कानपुर सम्मेलन ने भारत के भीतर कम्युनिस्ट आंदोलन को अधिक संगठित स्वरूप प्रदान किया और पार्टी के विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया।

कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र मामला (1924)

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत में बढ़ती साम्यवादी गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखनी शुरू कर दी। सरकार को आशंका थी कि साम्यवादी विचारधारा के प्रसार से मजदूरों, किसानों और युवाओं में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध असंतोष बढ़ सकता है।

➣ इसी कारण 1924 ई. में ब्रिटिश सरकार ने कई प्रमुख साम्यवादी नेताओं के विरुद्ध कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र मामला दर्ज किया। यह भारत में साम्यवाद से संबंधित पहला प्रमुख षड्यंत्र मुकदमा था।

➣ इस मुकदमे में मानवेन्द्र नाथ रॉय (एम. एन. रॉय), श्रीपाद अमृत डांगे (एस. ए. डांगे), मुज़फ्फर अहमद, शौकत उस्मानी तथा नलिनी गुप्ता सहित कई साम्यवादी नेताओं को आरोपी बनाया गया।

➣ इनमें से एम. एन. रॉय उस समय भारत से बाहर थे, इसलिए वे ब्रिटिश अधिकारियों के हाथ नहीं लगे, जबकि अन्य कई नेताओं को गिरफ्तार कर उनके विरुद्ध मुकदमा चलाया गया।

➣ ब्रिटिश सरकार का आरोप था कि ये नेता रूस की बोल्शेविक क्रांति से प्रेरित होकर भारत में ब्रिटिश शासन को हिंसक क्रांति के माध्यम से समाप्त करना चाहते थे।

➣ सरकार ने यह भी आरोप लगाया कि इनका संबंध कम्युनिस्ट इंटरनेशनल से है और वे भारत में साम्यवादी शासन स्थापित करने के उद्देश्य से कार्य कर रहे हैं।

➣ मुकदमे की सुनवाई कानपुर में हुई और अभियुक्तों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 121A (ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध षड्यंत्र) के अंतर्गत आरोप लगाए गए।

➣ मुकदमे के दौरान साम्यवादी विचारधारा, रूसी क्रांति और भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन की व्यापक चर्चा हुई। परिणामस्वरूप पहली बार भारतीय जनता का ध्यान साम्यवाद और उसके नेताओं की ओर आकर्षित हुआ।

➣ न्यायालय ने एस. ए. डांगे, मुज़फ्फर अहमद, शौकत उस्मानी तथा नलिनी गुप्ता को चार-चार वर्ष के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई।

➣ बाद में अपील के पश्चात उनकी सज़ा में कुछ कमी कर दी गई और वे निर्धारित अवधि से पहले ही रिहा हो गए।

➣ यद्यपि ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य साम्यवादी आंदोलन को दबाना था, लेकिन इसका परिणाम उल्टा हुआ। इस मुकदमे के कारण पूरे देश में साम्यवादी विचारधारा और उसके नेताओं की व्यापक चर्चा होने लगी।

➣ इससे भारत के विभिन्न भागों में सक्रिय साम्यवादी समूहों के बीच संपर्क बढ़ा और एक संगठित कम्युनिस्ट संगठन की आवश्यकता अधिक स्पष्ट होकर सामने आई।

➣ यही कारण था कि इसके अगले वर्ष दिसंबर 1925 ई. में कानपुर सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसने भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन को संगठित स्वरूप प्रदान किया।

कानपुर सम्मेलन (1925)

कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र मामला (1924) के बाद भारत में साम्यवादी आंदोलन पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया। यद्यपि ताशकंद में 17 अक्टूबर 1920 ई. को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हो चुकी थी,

➣ फिर भी भारत के भीतर उसका संगठन पूरी तरह विकसित नहीं हो पाया था। उस समय विभिन्न शहरों में साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित छोटे-छोटे समूह कार्य कर रहे थे, लेकिन उनके बीच कोई मजबूत केंद्रीय संगठन नहीं था।

➣ इसलिए इन सभी समूहों को एक मंच पर लाने तथा कम्युनिस्ट आंदोलन को संगठित स्वरूप देने के उद्देश्य से दिसंबर 1925 ई. में कानपुर में एक सम्मेलन आयोजित किया गया। यह सम्मेलन 25 से 28 दिसंबर 1925 ई. तक आयोजित हुआ, जिसकी अध्यक्षता सिंगारवेलु चेट्टियार ने की।

➣ इसमें मुज़फ्फर अहमद, श्रीपाद अमृत डांगे (एस. ए. डांगे), शौकत उस्मानी, नलिनी गुप्ता, हसरत मोहानी तथा देश के विभिन्न भागों से आए अनेक साम्यवादी नेताओं और श्रमिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

➣ सम्मेलन में भारत के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय साम्यवादी समूहों को एक साझा मंच पर लाने का प्रयास किया गया। साथ ही यह निर्णय लिया गया कि मजदूरों, किसानों और श्रमिक संगठनों के बीच पार्टी का आधार मजबूत किया जाए तथा पूरे भारत में एक संगठित कम्युनिस्ट संगठन का विस्तार किया जाए।

➣ कानपुर सम्मेलन के बाद भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन को भारत के भीतर एक स्पष्ट संगठनात्मक पहचान मिली। इसके परिणामस्वरूप विभिन्न प्रांतों में पार्टी की गतिविधियाँ बढ़ने लगीं और मजदूर तथा किसान आंदोलनों में उसकी भागीदारी भी धीरे-धीरे मजबूत हुई।

➣ इतिहासकारों के बीच इस बात को लेकर मतभेद है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की वास्तविक स्थापना 1920 ई. में मानी जाए या 1925 ई. में।

➣ अधिकांश आधुनिक इतिहासकार तथा प्रामाणिक इतिहास ग्रंथ 17 अक्टूबर 1920 ई. को ताशकंद में पार्टी की स्थापना स्वीकार करते हैं, जबकि कानपुर सम्मेलन (1925) को भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के संगठनात्मक विकास तथा विस्तार का एक महत्वपूर्ण चरण माना जाता है।

संगठन का विकास एवं प्रमुख गतिविधियाँ

AITUC एवं मजदूर आंदोलन में भूमिका

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के विकास में मजदूर आंदोलन की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही। पार्टी का मानना था कि भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब मजदूरों और श्रमिक वर्ग को आर्थिक एवं सामाजिक न्याय भी प्राप्त हो।

➣ इसी कारण स्थापना के प्रारम्भिक वर्षों से ही CPI ने औद्योगिक श्रमिकों को संगठित करने तथा उनके अधिकारों की रक्षा के लिए सक्रिय रूप से कार्य करना प्रारम्भ किया।

➣ उस समय अधिकांश औद्योगिक श्रमिक अत्यंत कठिन परिस्थितियों में कार्य कर रहे थे। उन्हें कम वेतन, लंबे कार्य घंटे, असुरक्षित कार्यस्थल, बाल श्रम तथा श्रम कानूनों के अभाव जैसी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता था।

➣ कम्युनिस्ट नेताओं ने इन समस्याओं को प्रमुखता से उठाया और मजदूरों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक बनाना प्रारम्भ किया।

अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की स्थापना 31 अक्टूबर 1920 ई. को बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) में हुई थी। इसके प्रथम अध्यक्ष लाला लाजपत राय तथा प्रथम महासचिव दिवान चमन लाल थे।

➣ प्रारम्भिक वर्षों में इसमें विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के नेता सक्रिय थे, किन्तु 1920 के दशक के उत्तरार्ध से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रभाव इसमें लगातार बढ़ने लगा।

एस. ए. डांगे, मुज़फ्फर अहमद, शौकत उस्मानी, पी. सी. जोशी तथा अन्य कम्युनिस्ट नेताओं ने AITUC के माध्यम से कपड़ा मिलों, रेलवे, बंदरगाहों, कोयला खदानों तथा अन्य औद्योगिक प्रतिष्ठानों के श्रमिकों को संगठित किया।

➣ उन्होंने वेतन वृद्धि, कार्य के निश्चित घंटे, सुरक्षित कार्य परिस्थितियों, श्रमिक अधिकारों तथा ट्रेड यूनियनों की मान्यता जैसी माँगों को लेकर अनेक आंदोलनों और हड़तालों का नेतृत्व किया।

➣ धीरे-धीरे AITUC केवल आर्थिक मांगों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने औपनिवेशिक शासन की श्रमिक-विरोधी नीतियों का भी विरोध करना प्रारम्भ किया।

CPI ने मजदूर आंदोलन को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ते हुए यह तर्क दिया कि राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक समानता एक-दूसरे की पूरक हैं।

➣ इन आंदोलनों और हड़तालों के परिणामस्वरूप श्रमिकों की समस्याएँ राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनने लगीं। ब्रिटिश सरकार और उद्योगपतियों पर श्रमिकों की कार्य परिस्थितियों में सुधार करने का दबाव बढ़ा, जिससे वेतन, कार्य के घंटे, सुरक्षा तथा संगठन के अधिकार जैसे मुद्दों को गंभीरता से लिया जाने लगा।

मजदूर आंदोलनों और ट्रेड यूनियनों की बढ़ती सक्रियता के दबाव में ब्रिटिश सरकार ने ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 (Trade Unions Act, 1926) पारित किया, जिसके माध्यम से ट्रेड यूनियनों को पहली बार कानूनी मान्यता प्राप्त हुई।

➣ इससे श्रमिक संगठन अधिक व्यवस्थित ढंग से कार्य करने लगे और मजदूर अपने अधिकारों के लिए वैधानिक रूप से संघर्ष करने में सक्षम हुए। यद्यपि CPI की सभी माँगें तत्काल स्वीकार नहीं की गईं, फिर भी भारतीय मजदूर आंदोलन को सशक्त आधार प्रदान करने में CPI और AITUC की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।

मेरठ षड्यंत्र मामला (1929–1933)

1920 के दशक के उत्तरार्ध तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) तथा उससे जुड़े मजदूर संगठनों का प्रभाव तेजी से बढ़ने लगा था। AITUC के माध्यम से देश के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिक आंदोलनों और हड़तालों का विस्तार हो रहा था।

➣ इससे ब्रिटिश सरकार को आशंका हुई कि साम्यवादी नेता मजदूरों और किसानों को संगठित कर औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध व्यापक आंदोलन खड़ा कर सकते हैं।

➣ सरकार विशेष रूप से इस बात से चिंतित थी कि भारतीय कम्युनिस्ट नेताओं के कम्युनिस्ट इंटरनेशनल तथा अन्य विदेशी साम्यवादी संगठनों से संपर्क थे।

➣ उसका आरोप था कि इनके माध्यम से भारत में ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने तथा साम्यवादी शासन स्थापित करने की योजना बनाई जा रही है। इसी पृष्ठभूमि में सरकार ने भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन को कमजोर करने के उद्देश्य से एक बड़े षड्यंत्र मुकदमे की तैयारी की।


20 मार्च 1929 ई. को ब्रिटिश सरकार ने देश के विभिन्न भागों में एक साथ छापेमारी कर अनेक कम्युनिस्ट नेताओं, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं तथा श्रमिक नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।

➣ इन गिरफ्तारियों के आधार पर मेरठ षड्यंत्र मामला दर्ज किया गया, जो भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के विरुद्ध चलाया गया सबसे चर्चित और व्यापक मुकदमा था।

➣ इस मुकदमे में कुल 31 व्यक्तियों को अभियुक्त बनाया गया। इनमें भारतीय कम्युनिस्ट नेताओं के साथ कुछ ब्रिटिश साम्यवादी कार्यकर्ता भी शामिल थे।

➣ प्रमुख अभियुक्तों में एस. ए. डांगे, मुज़फ्फर अहमद, शौकत उस्मानी, एस. वी. घाटे, फिलिप स्प्रैट, बेन ब्रैडली, के. एन. जोगलेकर, आर. एस. निम्बकर तथा अन्य ट्रेड यूनियन नेता शामिल थे।

ब्रिटिश सरकार ने इन सभी पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 121A के अंतर्गत ब्रिटिश सम्राट के विरुद्ध षड्यंत्र, हिंसक क्रांति द्वारा सरकार को उखाड़ फेंकने तथा साम्यवादी शासन स्थापित करने का आरोप लगाया। सरकार का दावा था कि अभियुक्त कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के निर्देशों पर कार्य कर रहे थे।

मेरठ षड्यंत्र मामले की सुनवाई मेरठ सेशन न्यायालय में प्रारम्भ हुई। यह मुकदमा लगभग चार वर्षों (1929–1933) तक चला और उस समय के सबसे लंबे तथा चर्चित राजनीतिक मुकदमों में से एक माना गया।

अभियोजन पक्ष ने अभियुक्तों के भाषणों, पत्रों, दस्तावेजों, ट्रेड यूनियन गतिविधियों तथा कम्युनिस्ट इंटरनेशनल से जुड़े कथित संबंधों को न्यायालय में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया।

➣ दूसरी ओर बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि मजदूरों और किसानों के अधिकारों के लिए कार्य करना कोई अपराध नहीं है तथा अभियुक्त केवल वैचारिक और संगठनात्मक गतिविधियों में संलग्न थे।

➣ लंबी सुनवाई के बाद 16 जनवरी 1933 ई. को सेशन न्यायालय ने अपना निर्णय सुनाया। न्यायालय ने कई अभियुक्तों को दोषी ठहराते हुए अलग-अलग अवधियों के कारावास की सज़ा सुनाई।

मुज़फ्फर अहमद को सबसे कठोर सज़ाओं में से एक मिली, जबकि एस. ए. डांगे, शौकत उस्मानी, एस. वी. घाटे, फिलिप स्प्रैट, बेन ब्रैडली तथा अन्य अभियुक्तों को भी विभिन्न अवधियों के कठोर कारावास का दंड दिया गया।

➣ बाद में अभियुक्तों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील की। उच्च न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों की पुनः समीक्षा कर कई अभियुक्तों की सज़ाओं में कमी कर दी, जिसके परिणामस्वरूप अनेक कम्युनिस्ट नेता निर्धारित अवधि से पहले ही रिहा हो गए।

मेरठ षड्यंत्र मामला भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना सिद्ध हुआ। इस मुकदमे के कारण भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, मजदूर आंदोलन, ट्रेड यूनियनों तथा साम्यवादी विचारधारा को पूरे देश में व्यापक पहचान मिली।

➣ साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ब्रिटिश सरकार की आलोचना हुई और भारत में चल रहे श्रमिक आंदोलनों के प्रति सहानुभूति बढ़ी।

कांग्रेस एवं अन्य राजनीतिक दलों से संबंध

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तथा अन्य राजनीतिक दलों के साथ संबंध समय-समय पर बदलते रहे।

➣ पार्टी का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्यवाद का विरोध करना था, लेकिन राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुसार उसकी राजनीतिक रणनीति में परिवर्तन होता रहा। इसी कारण कभी उसने कांग्रेस के साथ सहयोग किया, तो कभी उसकी नीतियों की आलोचना भी की।

➣ प्रारम्भिक वर्षों में CPI ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को देश का सबसे बड़ा राष्ट्रीय संगठन माना, किंतु उसका मत था कि कांग्रेस का नेतृत्व मुख्यतः शिक्षित मध्यम वर्ग और पूँजीपति वर्ग के प्रभाव में है।

➣ इसलिए कम्युनिस्ट नेताओं ने मजदूरों, किसानों तथा श्रमिक वर्ग की समस्याओं को कांग्रेस के भीतर अधिक महत्व दिए जाने की आवश्यकता पर बल दिया।

1930 के दशक में जब किसान और मजदूर आंदोलन तेज़ हुए, तब अनेक कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस के विभिन्न जनआंदोलनों में भी भाग लिया।

➣ इसी अवधि में कांग्रेस के भीतर समाजवादी विचारधारा का प्रभाव बढ़ने लगा और 1934 ई. में कांग्रेस समाजवादी पार्टी (Congress Socialist Party – CSP) की स्थापना हुई।

➣ यद्यपि CPI और कांग्रेस समाजवादी पार्टी (CSP) दोनों सामाजिक एवं आर्थिक समानता की पक्षधर थीं, फिर भी उनकी विचारधाराओं और कार्यप्रणाली में महत्वपूर्ण अंतर था।

1935 ई. में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल द्वारा लोक मोर्चा (Popular Front) की नीति अपनाए जाने के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने फासीवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध अन्य लोकतांत्रिक एवं राष्ट्रवादी शक्तियों के साथ सहयोग की नीति अपनाई। इसके परिणामस्वरूप कांग्रेस तथा अन्य वामपंथी संगठनों के साथ CPI का सहयोग पहले की तुलना में अधिक बढ़ा।

➣ हालाँकि सभी राजनीतिक दलों के साथ CPI के संबंध समान नहीं रहे। मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा तथा अन्य दलों के साथ उसके वैचारिक मतभेद समय-समय पर सामने आते रहे।

➣ विशेषकर वर्ग संघर्ष, समाजवाद, राष्ट्रवाद तथा स्वतंत्रता आंदोलन की रणनीति जैसे प्रश्नों पर विभिन्न दलों के विचार एक-दूसरे से भिन्न थे।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राजनीतिक संबंधों में सबसे बड़ा परिवर्तन द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) के दौरान देखने को मिला। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण पार्टी की नीतियों में महत्वपूर्ण बदलाव आया, जिसका प्रभाव उसके कांग्रेस के साथ संबंधों पर भी पड़ा। यही परिवर्तन आगे चलकर भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के समय स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।

द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की नीति

सितंबर 1939 ई. में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ होने पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की नीति में समय के साथ महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिला।

➣ यह परिवर्तन केवल भारत की परिस्थितियों के कारण नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय साम्यवादी राजनीति तथा सोवियत संघ की विदेश नीति से भी प्रभावित था। युद्ध के प्रारम्भिक चरण (1939–1941) में CPI ने इस युद्ध को साम्राज्यवादी युद्ध बताया।

➣ पार्टी का तर्क था कि यह युद्ध मुख्यतः ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसी साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच अपने-अपने राजनीतिक एवं आर्थिक हितों की रक्षा के लिए लड़ा जा रहा है। इसलिए भारतीय जनता का इस युद्ध से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है और ब्रिटिश सरकार को भारत को उसकी इच्छा के विरुद्ध युद्ध में शामिल करने का अधिकार नहीं है।

➣ इस दौरान CPI ने ब्रिटिश सरकार की युद्ध नीति का विरोध किया तथा भारतीय जनता से राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष जारी रखने का आह्वान किया। ब्रिटिश सरकार ने पार्टी की गतिविधियों को संदेह की दृष्टि से देखा और कई स्थानों पर उसके नेताओं एवं कार्यकर्ताओं पर प्रतिबंध लगाए।

➣ किन्तु 22 जून 1941 ई. को स्थिति में बड़ा परिवर्तन आया, जब जर्मनी ने ऑपरेशन बारबारोसा (Operation Barbarossa) के अंतर्गत सोवियत संघ पर आक्रमण कर दिया। इसके बाद सोवियत संघ मित्र राष्ट्रों के पक्ष में युद्ध में शामिल हो गया। चूँकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी वैचारिक रूप से सोवियत संघ के प्रति सहानुभूति रखती थी, इसलिए उसने भी अपनी नीति में परिवर्तन किया।

1941 ई. के बाद CPI ने द्वितीय विश्व युद्ध को जनयुद्ध घोषित किया। पार्टी का मत था कि अब यह युद्ध केवल साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि फासीवाद और नाज़ीवाद के विरुद्ध लोकतांत्रिक शक्तियों की लड़ाई बन चुका है। इसलिए फासीवादी शक्तियों की पराजय को मानवता और विश्व शांति के लिए आवश्यक माना गया।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की इस बदली हुई नीति ने उसके ब्रिटिश सरकार तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ संबंधों को भी प्रभावित किया। विशेष रूप से भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के समय CPI का रुख कांग्रेस से बिल्कुल अलग दिखाई दिया, जो आगे चलकर भारतीय राजनीति में व्यापक बहस का विषय बना।

भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के प्रति रुख

8 अगस्त 1942 ई. को मुंबई में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (AICC) के अधिवेशन में महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन प्रारम्भ करने का निर्णय लिया गया।

कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन से तत्काल भारत छोड़ने की मांग की और महात्मा गांधी ने “करो या मरो” (Do or Die) का प्रसिद्ध नारा दिया।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने इस आंदोलन का समर्थन नहीं किया। इसका प्रमुख कारण द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पार्टी की बदली हुई नीति थी। 1941 ई. में जर्मनी द्वारा सोवियत संघ पर आक्रमण के बाद CPI ने युद्ध को जनयुद्ध घोषित कर दिया था और फासीवाद के विरुद्ध मित्र राष्ट्रों के संघर्ष का समर्थन करने लगी थी।

➣ चूँकि ब्रिटेन भी मित्र राष्ट्रों का प्रमुख सदस्य था, इसलिए CPI का मत था कि इस समय ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक आंदोलन चलाने से फासीवादी शक्तियों को अप्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है।

CPI का तर्क था कि उस समय सबसे बड़ा खतरा फासीवाद और नाज़ीवाद से था। इसलिए पहले इन शक्तियों की पराजय आवश्यक है और उसके बाद भारत की स्वतंत्रता के प्रश्न का समाधान अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है। इसी कारण पार्टी ने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग नहीं लिया।

➣ इसके विपरीत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का मत था कि बिना स्वतंत्रता के भारत से युद्ध में सहयोग की अपेक्षा नहीं की जा सकती। कांग्रेस ने तत्काल स्वतंत्रता की मांग करते हुए जनआंदोलन प्रारम्भ किया, जबकि CPI ने आंदोलन से दूरी बनाए रखी और युद्ध प्रयासों में बाधा न डालने की नीति अपनाई।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के इस रुख की व्यापक आलोचना हुई। अनेक राष्ट्रवादी नेताओं ने आरोप लगाया कि CPI ने राष्ट्रीय आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण चरण में कांग्रेस का साथ नहीं दिया।

➣ दूसरी ओर, CPI का कहना था कि उसका निर्णय अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों तथा फासीवाद-विरोधी संघर्ष को ध्यान में रखकर लिया गया था।

ध्यान दें: भारत छोड़ो आंदोलन के प्रति CPI का रुख भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का सबसे विवादास्पद विषय माना जाता है। इस घटना ने पार्टी की राजनीतिक छवि को प्रभावित किया और लंबे समय तक उसके आलोचकों द्वारा इसे प्रमुख मुद्दे के रूप में उठाया जाता रहा.

CPI ने भारत छोड़ो आंदोलन का समर्थन नहीं किया। इसका प्रमुख कारण 1941 ई. के बाद द्वितीय विश्व युद्ध को जनयुद्ध मानना था। CPI का मत था कि पहले फासीवाद और नाज़ीवाद की पराजय आवश्यक है।

किसान आंदोलनों में भूमिका

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने केवल मजदूरों के बीच ही नहीं, बल्कि किसानों के बीच भी अपना संगठन विकसित करने पर विशेष ध्यान दिया।

➣ उस समय अधिकांश किसान अत्यधिक लगान, जमींदारों के शोषण, बेदखली, ऋणग्रस्तता, भूमिहीनता तथा बटाईदारी व्यवस्था जैसी समस्याओं से जूझ रहे थे।

➣ कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने गाँव-गाँव जाकर किसानों को संगठित किया, उन्हें उनके भूमि अधिकारों तथा कृषक अधिकारों के प्रति जागरूक बनाया और स्थानीय स्तर पर किसान समितियों का गठन किया। इसके परिणामस्वरूप अनेक क्षेत्रों में किसान पहली बार संगठित होकर अपनी समस्याओं को सामूहिक रूप से उठाने लगे।

अखिल भारतीय किसान सभा में भूमिका

1936 ई. में अखिल भारतीय किसान सभा (All India Kisan Sabha – AIKS) की स्थापना के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के अनेक नेता और कार्यकर्ता उससे सक्रिय रूप से जुड़ गए। किसान सभा किसानों की समस्याओं को संगठित रूप से उठाने वाला प्रमुख राष्ट्रीय संगठन बन गई।

CPI ने विभिन्न प्रांतों में किसान सभाओं का विस्तार किया तथा किसानों की समस्याओं को स्थानीय स्तर से उठाकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाने का प्रयास किया। पार्टी ने विशेष रूप से भूमि सुधार, लगान में कमी, बटाईदार किसानों के अधिकार, बेदखली पर रोक तथा जमींदारों के अत्याचार जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। आगे चलकर AIKS और CPI ने अनेक किसान आंदोलनों में मिलकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रमुख किसान आंदोलनों में योगदान

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने तेभागा आंदोलन (1946–47) तथा तेलंगाना किसान आंदोलन (1946–51) जैसे महत्वपूर्ण किसान आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। इन आंदोलनों ने भारतीय किसान आंदोलन को नई दिशा प्रदान की।

तेभागा आंदोलन में पार्टी ने बटाईदार किसानों की उस मांग का समर्थन किया, जिसमें खेती करने वाले किसान को उपज का दो-तिहाई (2/3) हिस्सा देने की मांग की गई थी।

➣ वहीं तेलंगाना किसान आंदोलन में कम्युनिस्ट नेताओं ने किसानों को जमींदारों तथा निज़ाम शासन के शोषण के विरुद्ध संगठित किया और भूमि अधिकारों के लिए संघर्ष का नेतृत्व किया। इन आंदोलनों का विस्तृत अध्ययन संबंधित अध्यायों में किया जाएगा।

परिणाम

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रयासों से किसान आंदोलन पहले की अपेक्षा अधिक संगठित हुआ। किसानों की समस्याएँ राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनने लगीं और सरकारों पर कृषि सुधारों तथा भूमि सुधारों के लिए दबाव बढ़ा।

➣ यद्यपि किसानों की सभी मांगें तत्काल पूरी नहीं हुईं, फिर भी इन आंदोलनों ने भूमि सुधार, जमींदारी उन्मूलन, बटाईदार किसानों के अधिकार, किरायेदार किसानों की सुरक्षा तथा कृषक अधिकारों जैसे विषयों को राष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा बना दिया।

स्वतंत्रता के बाद विभिन्न राज्यों में भूमि सुधार संबंधी कानूनों के निर्माण तथा किसानों के अधिकारों के प्रति जनचेतना विकसित करने में भी इन आंदोलनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

सामाजिक एवं आर्थिक समानता के लिए योगदान

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) का मानना था कि भारत में सामाजिक और आर्थिक समानता तब तक स्थापित नहीं हो सकती, जब तक किसानों को भूमि पर अधिकार तथा मजदूरों को उनके श्रम का उचित प्रतिफल नहीं मिलेगा। इसी कारण पार्टी ने समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के अधिकारों को अपने राजनीतिक कार्यक्रम का महत्वपूर्ण भाग बनाया।

➣ पार्टी ने बड़े भू-स्वामित्व और जमींदारी प्रथा का विरोध किया तथा भूमिहीन किसानों को भूमि देने, बटाईदार किसानों के अधिकारों की रक्षा करने तथा भूमि सुधार लागू करने की मांग की। स्वतंत्रता से पहले और उसके बाद भी CPI ने विभिन्न किसान आंदोलनों के माध्यम से इन मांगों को लगातार उठाया।

श्रमिक एवं किसान अधिकारों की वकालत

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने मजदूरों और किसानों दोनों के अधिकारों को समान रूप से महत्व दिया। पार्टी ने उचित वेतन, आठ घंटे का कार्यदिवस, सुरक्षित कार्यस्थल, ट्रेड यूनियनों के अधिकार, लगान में कमी, बटाईदार किसानों की सुरक्षा तथा सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों को लगातार उठाया। इन प्रयासों से श्रमिक और किसान वर्ग अपने अधिकारों के प्रति पहले की अपेक्षा अधिक जागरूक हुआ।

आर्थिक असमानता के विरुद्ध आवाज़

CPI ने आर्थिक असमानता को देश की प्रमुख समस्याओं में से एक माना। पार्टी का मत था कि कुछ लोगों के हाथों में भूमि, संपत्ति तथा उत्पादन के साधनों का अत्यधिक केंद्रीकरण सामाजिक न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध है।

➣ इसलिए उसने संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण, गरीब एवं वंचित वर्गों के उत्थान, श्रमिक कल्याण तथा शोषणमुक्त समाज की स्थापना की वकालत की।

परिणाम

➣ यद्यपि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अपनी सभी मांगों को पूरी तरह लागू नहीं करा सकी, फिर भी उसके प्रयासों का भारतीय राजनीति और सामाजिक-आर्थिक नीतियों पर व्यापक प्रभाव पड़ा।

भूमि सुधार, जमींदारी उन्मूलन, श्रमिक अधिकार, किसानों के अधिकार, आर्थिक समानता तथा सामाजिक न्याय जैसे विषय राष्ट्रीय बहस के महत्वपूर्ण मुद्दे बन गए।

स्वतंत्रता के बाद केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों ने भूमि सुधार, जमींदारी उन्मूलन तथा श्रमिक कल्याण से संबंधित अनेक कानून बनाए, जिनके पीछे किसान और मजदूर आंदोलनों द्वारा निर्मित जनदबाव की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

स्वतंत्रता के बाद विकास

15 अगस्त 1947 ई. को भारत की स्वतंत्रता के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के सामने नई परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं। अब उसका संघर्ष ब्रिटिश शासन के विरुद्ध न होकर स्वतंत्र भारत की राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक नीतियों को प्रभावित करने की दिशा में केंद्रित हो गया।

➣ पार्टी ने लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर रहकर अपने संगठन का विस्तार करना प्रारम्भ किया तथा मजदूरों, किसानों और श्रमिक वर्ग के हितों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता दी।

➣ स्वतंत्रता के प्रारम्भिक वर्षों में CPI के भीतर इस बात को लेकर मतभेद थे कि नई भारतीय सरकार के प्रति पार्टी की नीति क्या होनी चाहिए।

➣ कुछ नेताओं का मत था कि संसदीय लोकतंत्र के माध्यम से परिवर्तन लाया जाए, जबकि अन्य नेताओं का विचार था कि क्रांतिकारी संघर्ष जारी रखा जाए। इन मतभेदों के कारण पार्टी की रणनीति में समय-समय पर परिवर्तन होता रहा।

1951 ई. में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने संसदीय लोकतंत्र में सक्रिय रूप से भाग लेने की नीति अपनाई। इसके बाद उसने लोकसभा और विभिन्न राज्य विधानसभाओं के चुनावों में भाग लेना प्रारम्भ किया तथा धीरे-धीरे एक प्रमुख विपक्षी राजनीतिक दल के रूप में अपनी पहचान बनाई।

➣ भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन की एक ऐतिहासिक उपलब्धि 1957 ई. में सामने आई, जब ई. एम. एस. नंबूदरीपाद के नेतृत्व में केरल में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की सरकार बनी।

यह विश्व के इतिहास में पहली ऐसी कम्युनिस्ट सरकार मानी जाती है, जो लोकतांत्रिक चुनावों के माध्यम से सत्ता में आई थी।

1962 ई. के भारत-चीन युद्ध के बाद पार्टी के भीतर वैचारिक मतभेद और अधिक बढ़ गए। चीन तथा सोवियत संघ के प्रति दृष्टिकोण, राष्ट्रीय राजनीति तथा अंतरराष्ट्रीय साम्यवादी आंदोलन जैसे मुद्दों पर नेताओं के बीच गंभीर असहमति उत्पन्न हुई।

➣ इन मतभेदों के परिणामस्वरूप 1964 ई. में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) दो भागों में विभाजित हो गई। एक धड़ा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के रूप में कार्य करता रहा, जबकि दूसरे धड़े ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [CPI(M)] की स्थापना की। इसके बाद दोनों दलों ने स्वतंत्र रूप से भारतीय राजनीति में अपनी-अपनी भूमिका निभाई।

➣ यद्यपि समय के साथ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का जनाधार विभिन्न राज्यों में अलग-अलग स्तर पर रहा, फिर भी भारतीय राजनीति, मजदूर आंदोलन, किसान आंदोलन तथा वामपंथी विचारधारा के विकास में उसका योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है।

प्रमुख व्यक्तित्व

व्यक्तित्व योगदान
मानवेन्द्र नाथ रॉय (एम. एन. रॉय) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख संस्थापक, ताशकंद (1920) में CPI की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका तथा अंतरराष्ट्रीय साम्यवादी आंदोलन (Comintern) से जुड़े प्रमुख भारतीय नेता।
एवलिन रॉय एम. एन. रॉय की सहयोगी एवं ताशकंद में CPI की स्थापना के प्रारम्भिक सदस्यों में शामिल।
अबनी मुखर्जी CPI के प्रारम्भिक संस्थापकों में से एक तथा ताशकंद समूह के प्रमुख सदस्य।
एम. पी. टी. आचार्य विदेशों में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारी, प्रारम्भिक साम्यवादी आंदोलन से जुड़े प्रमुख नेता।
श्रीपाद अमृत डांगे (एस. ए. डांगे) भारतीय मजदूर आंदोलन के प्रमुख नेता, AITUC में सक्रिय भूमिका, कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र मामला (1924) तथा मेरठ षड्यंत्र मामला (1929–33) के प्रमुख अभियुक्त।
मुज़फ्फर अहमद बंगाल में साम्यवादी आंदोलन के अग्रणी नेता, CPI के प्रमुख संस्थापकों में से एक तथा मेरठ षड्यंत्र मामले के प्रमुख अभियुक्त।
सिंगारवेलु चेट्टियार कानपुर सम्मेलन (1925) के अध्यक्ष तथा दक्षिण भारत में साम्यवादी एवं मजदूर आंदोलन के प्रमुख नेता।
शौकत उस्मानी प्रमुख कम्युनिस्ट नेता, कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र मामला एवं मेरठ षड्यंत्र मामले के प्रमुख अभियुक्तों में शामिल।
पी. सी. जोशी CPI के प्रमुख महासचिवों में से एक। उनके नेतृत्व में पार्टी का संगठनात्मक विस्तार हुआ तथा विभिन्न जनसंगठनों में पार्टी की सक्रियता बढ़ी।
ई. एम. एस. नंबूदरीपाद 1957 ई. में केरल की पहली लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार के मुख्यमंत्री बने।
अजय घोष स्वतंत्रता के बाद CPI के प्रमुख नेताओं में से एक। पार्टी को संसदीय लोकतंत्र की दिशा में आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

समयरेखा

वर्ष घटना
1917 ई. रूसी बोल्शेविक क्रांति हुई, जिसने भारतीय साम्यवादी आंदोलन को वैचारिक प्रेरणा प्रदान की।
17 अक्टूबर 1920 ई. ताशकंद (वर्तमान उज्बेकिस्तान) में मानवेन्द्र नाथ रॉय (एम. एन. रॉय) के नेतृत्व में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की स्थापना हुई।
31 अक्टूबर 1920 ई. अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की स्थापना बॉम्बे (मुंबई) में हुई। बाद में CPI ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1924 ई. कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र मामला चलाया गया। यह भारत में साम्यवाद से संबंधित पहला प्रमुख षड्यंत्र मुकदमा था।
25–28 दिसंबर 1925 ई. कानपुर सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसने भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन को संगठित स्वरूप प्रदान किया।
1926 ई. ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 पारित हुआ, जिससे ट्रेड यूनियनों को कानूनी मान्यता प्राप्त हुई।
20 मार्च 1929 ई. मेरठ षड्यंत्र मामला के अंतर्गत कम्युनिस्ट नेताओं एवं ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियाँ हुईं।
16 जनवरी 1933 ई. मेरठ षड्यंत्र मामले में सेशन न्यायालय ने अपना निर्णय सुनाया।
1935 ई. कम्युनिस्ट इंटरनेशनल (Comintern) की Popular Front नीति के बाद CPI ने अन्य राष्ट्रवादी शक्तियों के साथ सहयोग की नीति अपनाई।
1939–1941 ई. CPI ने द्वितीय विश्व युद्ध को साम्राज्यवादी युद्ध (Imperialist War) बताया।
22 जून 1941 ई. जर्मनी ने सोवियत संघ पर आक्रमण (ऑपरेशन बारबारोसा) किया, जिसके बाद CPI ने अपनी नीति बदल दी।
1941–1945 ई. CPI ने द्वितीय विश्व युद्ध को जनयुद्ध (People’s War) घोषित कर मित्र राष्ट्रों का समर्थन किया।
1942 ई. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान CPI ने आंदोलन का समर्थन नहीं किया।
1951 ई. CPI ने संसदीय लोकतंत्र के अंतर्गत चुनावी राजनीति में सक्रिय भागीदारी की नीति अपनाई।
1957 ई. ई. एम. एस. नंबूदरीपाद के नेतृत्व में केरल में विश्व की पहली लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार बनी।
1962 ई. भारत-चीन युद्ध के बाद पार्टी के भीतर वैचारिक मतभेद तीव्र हो गए।
1964 ई. वैचारिक मतभेदों के कारण भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) का विभाजन हुआ और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [CPI(M)] का गठन हुआ।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) बनाम कांग्रेस समाजवादी पार्टी (CSP)

आधार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) कांग्रेस समाजवादी पार्टी (CSP)
स्थापना 17 अक्टूबर 1920 ई. (ताशकंद), भारत में संगठनात्मक विकास 1925 के कानपुर सम्मेलन से। 1934 ई., पटना में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर समाजवादी धारा के रूप में।
प्रमुख संस्थापक एम. एन. रॉय, अबनी मुखर्जी, एवलिन रॉय आदि। जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव, राममनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन आदि।
विचारधारा मार्क्सवाद एवं साम्यवाद (Communism) लोकतांत्रिक समाजवाद (Democratic Socialism)
मुख्य उद्देश्य मजदूरों और किसानों को संगठित कर सामाजिक एवं आर्थिक समानता स्थापित करना। कांग्रेस के भीतर रहकर समाजवादी नीतियों के माध्यम से स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय प्राप्त करना।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से संबंध समय-समय पर सहयोग एवं मतभेद दोनों रहे। कांग्रेस का ही एक समाजवादी गुट था।
भारत छोड़ो आंदोलन (1942) समर्थन नहीं किया। सक्रिय रूप से भाग लिया तथा भूमिगत आंदोलन का नेतृत्व किया।
अंतरराष्ट्रीय प्रभाव सोवियत संघ एवं कम्युनिस्ट इंटरनेशनल (Comintern) से प्रभावित। मुख्यतः भारतीय परिस्थितियों पर आधारित समाजवादी विचारधारा।
स्वतंत्रता के बाद एक स्वतंत्र राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप में कार्य करता रहा। बाद में समाजवादी दलों में विलय एवं पुनर्गठन होता रहा।

कुछ महत्वपूर्ण भ्रम-बिंदु

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की स्थापना 1925 ई. में नहीं हुई थी। इसकी स्थापना 17 अक्टूबर 1920 ई. को ताशकंद में हुई थी। 1925 का कानपुर सम्मेलन भारत में पार्टी के संगठनात्मक विकास का महत्वपूर्ण चरण था।

ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की स्थापना CPI ने नहीं की थी। इसकी स्थापना 31 अक्टूबर 1920 ई. को हुई थी तथा इसके प्रथम अध्यक्ष लाला लाजपत राय थे। बाद में CPI ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

एम. एन. रॉय ने 1925 के कानपुर सम्मेलन में CPI की स्थापना नहीं की थी। उन्होंने 1920 ई. में ताशकंद में CPI की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभाई थी।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की स्थापना भारत में नहीं, बल्कि ताशकंद (वर्तमान उज्बेकिस्तान) में हुई थी।

कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र मामला (1924) और मेरठ षड्यंत्र मामला (1929–1933) एक ही मुकदमा नहीं थे। ये दोनों अलग-अलग षड्यंत्र मामले थे।

मेरठ षड्यंत्र मामला केवल भारतीय नेताओं के विरुद्ध नहीं चलाया गया था। इस मुकदमे में भारतीय नेताओं के साथ फिलिप स्प्रैट और बेन ब्रैडली जैसे ब्रिटिश साम्यवादी कार्यकर्ताओं को भी अभियुक्त बनाया गया था।

CPI और कांग्रेस समाजवादी पार्टी (CSP) एक ही संगठन नहीं थे। CPI एक स्वतंत्र साम्यवादी राजनीतिक दल था, जबकि CSP भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर गठित समाजवादी धारा थी।

कांग्रेस समाजवादी पार्टी (CSP) एक स्वतंत्र राजनीतिक दल नहीं थी। इसका गठन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर समाजवादी विचारधारा को संगठित करने के उद्देश्य से किया गया था।

CPI ने भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में भाग नहीं लिया था। 1941 ई. के बाद उसने द्वितीय विश्व युद्ध को जनयुद्ध (People’s War) मानते हुए मित्र राष्ट्रों का समर्थन किया।

➣ भारत की पहली लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार केंद्र में नहीं बनी थी। 1957 ई. में ई. एम. एस. नंबूदरीपाद के नेतृत्व में केरल में विश्व की पहली लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार बनी थी।

CPI और CPI(M) प्रारम्भ से अलग-अलग दल नहीं थे। 1964 ई. में वैचारिक मतभेदों के कारण CPI का विभाजन हुआ, जिसके बाद CPI(M) का गठन हुआ।

CPI(M) और CPI (ML) एक ही संगठन नहीं हैं। CPI(M) का गठन 1964 ई. में हुआ, जबकि CPI (ML) का गठन 1969 ई. में नक्सलबाड़ी आंदोलन की पृष्ठभूमि में हुआ।

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