1857 की क्रांति (विद्रोह) : कारण, घटनाएँ, प्रमुख नेता, परिणाम एवं महत्व

भारतीय इतिहास आधुनिक भारत 1857 की क्रांति (विद्रोह)
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क्रांति का पूर्वाभ्यास (वेल्लोर विद्रोह,1806)

10 जुलाई, 1806 को हुआ वेल्लोर विद्रोह अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भारतीय सैनिकों का प्रथम संगठित सैन्य विद्रोह था। इतिहासकार इसे 1857 की महान क्रांति का पूर्वाभ्यास भी कहते हैं, क्योंकि इसके कारण, स्वरूप तथा उद्देश्य बाद में हुए 1857 के विद्रोह से काफी समान थे।

➣ इस विद्रोह का प्रमुख कारण अंग्रेजों द्वारा भारतीय सैनिकों की धार्मिक एवं सामाजिक भावनाओं की उपेक्षा करना था। सैनिकों को नई वर्दी पहनने, धार्मिक प्रतीकों के प्रयोग पर रोक लगाने तथा परंपरागत रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप करने के आदेश दिए गए, जिससे उनमें व्यापक असंतोष फैल गया।

10 जुलाई, 1806 को वेल्लोर किले में तैनात भारतीय सिपाहियों ने अचानक विद्रोह कर अंग्रेज अधिकारियों एवं सैनिकों पर हमला कर दिया। उन्होंने वेल्लोर दुर्ग पर अधिकार कर मैसूर राज्य का ध्वज फहरा दिया तथा अंग्रेजी शासन को समाप्त करने का प्रयास किया।

➣ हालांकि विद्रोह की पूर्व योजना पर्याप्त मजबूत नहीं थी और सिपाहियों के पास आवश्यक संसाधनों एवं समन्वय का अभाव था। परिणामस्वरूप अंग्रेजी सेना ने शीघ्र ही इस विद्रोह को कठोरता से दबा दिया तथा अनेक भारतीय सैनिकों को मृत्युदंड एवं अन्य कठोर दंड दिए गए।

➣ यद्यपि वेल्लोर विद्रोह तत्काल सफल नहीं हो सका, फिर भी इसने भारतीयों में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध की भावना को बल दिया। यही कारण है कि इसे 1857 की क्रांति की प्रथम कड़ी तथा महान विद्रोह का पूर्वाभ्यास माना जाता है।

अंग्रेजों के विरुद्ध प्रथम प्रमुख सशस्त्र विद्रोह सन्यासी-फकीर विद्रोह (1763–1800) माना जाता है। इस आंदोलन की पृष्ठभूमि पर बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपना प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ लिखा, जिससे प्रेरित होकर वंदे मातरम् गीत राष्ट्रीय आंदोलन का प्रतीक बना।

1857 से पूर्व हुए प्रमुख विद्रोह
कोली विद्रोह (1820)खासी विद्रोह (1829–1833)
रमोसी विद्रोह (1822)कोल्हापुर विद्रोह (1844)
बैरकपुर विद्रोह (1824)खोंड विद्रोह (1846–1855)
पागलपंथी विद्रोह (1825)संथाल विद्रोह (1855–56)
कच्छ विद्रोह (1825)नील विद्रोह (1859–60)

1857 के विद्रोह के कारण एवं प्रसार

➣ 1857 का विद्रोह किसी एक कारण का परिणाम नहीं था, बल्कि राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक-धार्मिक, सैन्य तथा तात्कालिक कारणों से उत्पन्न व्यापक असंतोष का विस्फोट था।

➣ अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों से शासक वर्ग, किसान, सैनिक, जमींदार, कारीगर तथा सामान्य जनता सभी किसी न किसी रूप में प्रभावित थे। इसी कारण यह विद्रोह शीघ्र ही उत्तर एवं मध्य भारत के अनेक क्षेत्रों में फैल गया।

सामाजिक-धार्मिक कारण

1813 ई. के चार्टर अधिनियम के बाद ईसाई मिशनरियों को भारत में धर्म-प्रचार की अनुमति मिल गई। मिशनरियों की बढ़ती गतिविधियों तथा सरकारी संरक्षण के कारण भारतीयों में यह आशंका फैल गई कि अंग्रेज उनका धर्म परिवर्तन कराना चाहते हैं।

1850 ई. के धार्मिक अयोग्यता निवारण अधिनियम के अनुसार धर्म परिवर्तन करने पर भी व्यक्ति अपने पैतृक संपत्ति के अधिकार से वंचित नहीं होगा। भारतीय समाज के एक बड़े वर्ग ने इसे धर्म परिवर्तन को प्रोत्साहन देने वाला कानून माना।

➣ अंग्रेजों द्वारा सामाजिक सुधारों, पाश्चात्य शिक्षा तथा नई व्यवस्थाओं को लागू करने से समाज के रूढ़िवादी वर्ग में यह भय उत्पन्न हो गया कि सरकार भारतीयों के धर्म एवं सामाजिक परम्पराओं में हस्तक्षेप कर रही है।

सरकारी सेवाओं, न्याय व्यवस्था, सार्वजनिक जीवन तथा शिक्षण संस्थानों में भारतीयों के साथ नस्लीय एवं भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता था, जिससे असंतोष निरंतर बढ़ता गया।

सेना में भी धार्मिक भावनाओं की उपेक्षा की गई। 1806 ई. के वेल्लोर विद्रोह का प्रमुख कारण सैनिकों को तिलक लगाने, दाढ़ी रखने तथा पारंपरिक पगड़ी पहनने पर प्रतिबंध लगाना था। इससे भारतीय सैनिकों में अंग्रेजों के प्रति अविश्वास और अधिक बढ़ गया।

राजनीतिक कारण

➣ अंग्रेजों की विस्तारवादी नीति ने अनेक भारतीय राज्यों को समाप्त कर दिया। लॉर्ड वेलेजली की सहायक संधि तथा लॉर्ड डलहौजी की व्यपगतनीति के माध्यम से सतारा, झाँसी, नागपुर आदि राज्यों का विलय कर लिया गया।

अवध को 1856 ई. में कुशासन का आरोप लगाकर ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया। इससे वहाँ के सैनिकों, ताल्लुकेदारों, किसानों तथा जनता में गहरा असंतोष फैल गया।

➣ अंग्रेजों ने मुगल सम्राट की प्रतिष्ठा समाप्त करने का प्रयास किया। लॉर्ड डलहौजी ने घोषणा की कि बहादुरशाह ज़फ़र की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी बादशाह की उपाधि धारण नहीं करेंगे तथा उन्हें लाल किला छोड़कर कुतुब (मेहरौली) क्षेत्र में रहना होगा।

पेशवा बाजीराव द्वितीय की मृत्यु के बाद उनके दत्तक पुत्र नाना साहेब को पेंशन देने से अंग्रेजों ने इंकार कर दिया, जिससे वे अंग्रेजों के कट्टर विरोधी बन गए।

आर्थिक कारण

➣ अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों का मुख्य उद्देश्य भारत का आर्थिक शोषण करना था। स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी तथा महालवाड़ी व्यवस्था के कारण किसानों पर भारी भू-राजस्व का बोझ पड़ा और उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई।

➣ अंग्रेजी औद्योगिक नीति के कारण भारतीय कुटीर एवं वस्त्र उद्योग नष्ट होने लगे। सस्ते ब्रिटिश निर्मित वस्त्रों के आगमन से लाखों बुनकर एवं कारीगर बेरोजगार हो गए।

जमींदारों, किसानों तथा परंपरागत शिल्पकारों की आय में भारी गिरावट आई। आर्थिक संकट का प्रभाव सैनिकों पर भी पड़ा, क्योंकि अधिकांश सैनिक किसान परिवारों से आते थे।

सैन्य कारण

➣ भारतीय सैनिकों के साथ अंग्रेज सैनिकों की तुलना में स्पष्ट भेदभाव किया जाता था। उन्हें कम वेतन, सीमित सुविधाएँ तथा उच्च सैन्य पदों पर पदोन्नति के अवसर नहीं दिए जाते थे।

1856 ई. के सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम के अनुसार भारतीय सैनिकों को आवश्यकता पड़ने पर समुद्र पार भी सेवा देनी पड़ सकती थी। समुद्र यात्रा को अनेक हिंदू सैनिक धार्मिक दृष्टि से अनुचित मानते थे, जिससे उनमें असंतोष बढ़ गया।

➣ सेना में नस्लीय भेदभाव, कठोर अनुशासन तथा भारतीय सैनिकों की धार्मिक भावनाओं की उपेक्षा ने विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार कर दी।

तात्कालिक कारण

➣ 1857 के विद्रोह का तात्कालिक कारण एनफील्ड राइफल के चर्बी युक्त कारतूस थे। इन कारतूसों का प्रयोग करने से पहले सैनिकों को उन्हें दाँतों से काटना पड़ता था।

➣ ऐसी अफवाह फैल गई कि इन कारतूसों पर गाय एवं सूअर की चर्बी लगी हुई है। इससे हिंदू तथा मुस्लिम दोनों सैनिकों की धार्मिक भावनाएँ आहत हुईं और सेना में व्यापक असंतोष फैल गया।

29 मार्च, 1857 को मंगल पांडे द्वारा बैरकपुर छावनी में अंग्रेज अधिकारी पर गोली चलाने की घटना तथा 10 मई, 1857 को मेरठ में सैनिक विद्रोह ने इस असंतोष को व्यापक क्रांति का रूप दे दिया।

1857 के विद्रोह का प्रारम्भ

➣ 1857 के विद्रोह का तात्कालिक कारण पैटर्न 1853 एनफील्ड राइफल के लिए प्रयुक्त चर्बी युक्त कारतूस थे। इन कारतूसों का प्रयोग करने से पहले सैनिकों को उन्हें दाँतों से काटना पड़ता था।

जनवरी 1857 में दमदम शस्त्रागार (कोलकाता) से यह अफवाह फैली कि इन कारतूसों पर गाय एवं सूअर की चर्बी लगी हुई है। इससे हिंदू तथा मुस्लिम दोनों सैनिकों की धार्मिक भावनाएँ आहत हुईं और सेना में व्यापक असंतोष फैल गया।

➣ सैनिकों को यह भी आशंका थी कि अंग्रेज उन्हें धर्म-भ्रष्ट कर ईसाई बनाने का प्रयास कर रहे हैं। अंग्रेज अधिकारियों ने कारतूसों को हाथ से खोलने की अनुमति भी दी, किन्तु तब तक सैनिकों का विश्वास पूरी तरह समाप्त हो चुका था।

26 फरवरी, 1857 को बहरामपुर में 19वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के सैनिकों ने नए कारतूसों का प्रयोग करने से इंकार कर दिया। परिणामस्वरूप इस रेजिमेंट को बाद में भंग कर दिया गया।

29 मार्च, 1857 को बैरकपुर छावनी में 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के सिपाही मंगल पांडे ने अंग्रेज अधिकारियों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। उन्होंने सार्जेंट मेजर जेम्स ह्यूसन तथा लेफ्टिनेंट हेनरी बाग (Baugh) पर हमला किया। यह घटना 1857 की क्रांति की पहली प्रमुख सैन्य घटना मानी जाती है।

➣ मंगल पांडे का जन्म वर्तमान बलिया (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उन्हें गिरफ्तार कर सैन्य न्यायालय (कोर्ट मार्शल) में मुकदमा चलाया गया तथा 8 अप्रैल, 1857 को फाँसी दे दी गई। बाद में 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री को भी भंग कर दिया गया।

कई इतिहास पुस्तकों एवं प्रतियोगी परीक्षा संबंधी स्रोतों में मंगल पांडे को 1857 की क्रांति का प्रथम शहीद भी कहा गया है। मंगल पांडे के साथ जमादार ईश्वरी प्रसाद (ईश्वरी पांडे) को भी विद्रोह में सहयोग के आरोप में मृत्युदंड दिया गया।

24 अप्रैल, 1857 को मेरठ में 3rd Bengal Light Cavalry के 85 सैनिकों ने चर्बी युक्त कारतूसों का प्रयोग करने से इंकार कर दिया। उन्हें कोर्ट मार्शल कर 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई तथा सार्वजनिक रूप से उनकी वर्दी उतरवाकर बेड़ियाँ पहनाई गईं।

➣ इस अपमानजनक दंड से मेरठ छावनी के सैनिकों में तीव्र आक्रोश फैल गया। अंततः 10 मई, 1857 को मेरठ में खुले विद्रोह की शुरुआत हुई, जिसने आगे चलकर समूचे उत्तर भारत को अपनी चपेट में ले लिया।

दिल्ली (बहादुरशाह ज़फ़र)

10 मई, 1857 को मेरठ में विद्रोह प्रारम्भ होने के बाद विद्रोही सैनिक उसी रात दिल्ली की ओर बढ़े और 11 मई, 1857 को दिल्ली पहुँच गए।

➣ दिल्ली मुगल साम्राज्य की पूर्व राजधानी होने के कारण राजनीतिक, प्रशासनिक तथा प्रतीकात्मक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थी। इसलिए विद्रोहियों ने सबसे पहले दिल्ली पर अधिकार स्थापित कर विद्रोह को व्यापक स्वरूप देने का प्रयास किया।

➣ विद्रोही सैनिकों ने मुगल सम्राट बहादुरशाह द्वितीय (ज़फ़र) से विद्रोह का नेतृत्व स्वीकार करने का अनुरोध किया। प्रारम्भ में उन्होंने अपनी वृद्धावस्था एवं सीमित संसाधनों का हवाला देकर संकोच व्यक्त किया, किन्तु सैनिकों एवं दिल्ली की जनता के आग्रह पर उन्होंने विद्रोह का नेतृत्व स्वीकार कर लिया।

12 मई, 1857 को बहादुरशाह ज़फ़र को भारत का सम्राट एवं विद्रोह का सर्वोच्च नेता घोषित किया गया। इससे विद्रोह को वैधानिक एवं राजनीतिक आधार प्राप्त हुआ।

➣ विद्रोहियों ने उनके नाम से फरमान जारी किए, कुछ स्थानों पर उनके नाम के सिक्के भी प्रचलित किए तथा अनेक भारतीय शासकों एवं जनता से अंग्रेजों के विरुद्ध एकजुट होने का आह्वान किया।

➣ प्रारम्भ में बहादुरशाह ज़फ़र ने अपने पुत्र मिर्ज़ा मुगल को सैन्य व्यवस्था का दायित्व सौंपा, किन्तु बाद में बरेली से आए अनुभवी सैनिक नेता बख्त ख़ाँ दिल्ली पहुँचे। उन्हें विद्रोही सेना का प्रधान सेनापति तथा सैन्य परिषद् का अध्यक्ष बनाया गया।

➣ बख्त ख़ाँ ने सेना के पुनर्गठन, अनुशासन तथा प्रशासन को संगठित करने का प्रयास किया, किन्तु विभिन्न विद्रोही नेताओं के बीच समन्वय के अभाव तथा संसाधनों की कमी के कारण अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी।

➣ दिल्ली में विद्रोह की सफलता का समाचार शीघ्र ही पूरे उत्तर भारत में फैल गया। इसके परिणामस्वरूप कानपुर, लखनऊ, बरेली, झाँसी, जगदीशपुर (बिहार), रोहिलखंड, इलाहाबाद, अलीगढ़ तथा ग्वालियर सहित अनेक क्षेत्रों में विद्रोह फैल गया। इस प्रकार दिल्ली 1857 की क्रांति का राजनीतिक एवं प्रेरणात्मक केन्द्र बन गई।

दिल्ली पर अंग्रेजों का पुनः अधिकार एवं दमन

➣ अंग्रेजों ने पंजाब से बड़ी संख्या में यूरोपीय सैनिक, सिख एवं गोरखा टुकड़ियाँ तथा भारी तोपखाना मंगाकर दिल्ली को चारों ओर से घेर लिया। दिल्ली रिज क्षेत्र से जून से सितम्बर 1857 तक अंग्रेजी सेना ने लगातार घेराबंदी बनाए रखी। लगभग चार माह तक भीषण संघर्ष चलता रहा।

14 सितम्बर, 1857 को अंग्रेजों ने कश्मीरी गेट की ओर से निर्णायक आक्रमण प्रारम्भ किया। इस अभियान में जनरल जॉन निकलसन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, किन्तु युद्ध के दौरान गंभीर रूप से घायल होने के कारण बाद में उनकी मृत्यु हो गई।

20 सितम्बर, 1857 को अंग्रेजों ने दिल्ली पर पुनः अधिकार कर लिया। इसके साथ ही विद्रोह का सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया। यद्यपि अन्य क्षेत्रों में संघर्ष कुछ समय तक जारी रहा, किन्तु दिल्ली के पतन से विद्रोह को गहरा राजनीतिक एवं मनोवैज्ञानिक आघात पहुँचा।

➣ दिल्ली पर अधिकार के बाद बहादुरशाह ज़फ़र ने हुमायूँ के मकबरे में शरण ली, जहाँ से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। अनेक स्रोतों के अनुसार उनके संबंधी इलाही बख्श ने अंग्रेजों को सूचना देकर उनकी गिरफ्तारी में सहायता की।

मेजर विलियम हडसन ने बहादुरशाह ज़फ़र के पुत्र मिर्ज़ा मुगल, मिर्ज़ा ख़िज़र सुल्तान तथा पौत्र मिर्ज़ा अबू बकर को खूनी दरवाज़ा के निकट बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया के गोली मार दी। यह घटना अंग्रेजी दमन की क्रूरता का प्रतीक मानी जाती है।

झाँसी (रानी लक्ष्मीबाई)

➣ दिल्ली, कानपुर तथा उत्तर भारत के अन्य क्षेत्रों में विद्रोह के फैलने का प्रभाव शीघ्र ही झाँसी पर भी पड़ा। 4 जून, 1857 को झाँसी की छावनी में भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।

➣ शीघ्र ही झाँसी 1857 की क्रांति का एक प्रमुख केन्द्र बन गया और इसका नेतृत्व रानी लक्ष्मीबाई ने संभाला।

रानी लक्ष्मीबाई का मूल नाम मणिकर्णिका (मनु) था। उनका जन्म प्रचलित मत के अनुसार 19 नवम्बर, 1828 को वाराणसी के भदैनी में हुआ।

➣ उनके पिता मोरोपन्त तांबे पेशवा बाजीराव द्वितीय के अधीन कार्यरत थे तथा माता का नाम भागीरथी बाई था। बचपन में उन्हें स्नेहपूर्वक ‘मनु’ तथा ‘छबीली’ कहा जाता था।

➣ माता के निधन के बाद मणिकर्णिका का पालन-पोषण बिठूर में पेशवा बाजीराव द्वितीय के संरक्षण में हुआ। वहीं उनकी मित्रता नाना साहेब (धुंधूपंत) तथा तात्या टोपे (रामचन्द्र पांडुरंग) से हुई। बचपन से ही उन्होंने घुड़सवारी, तलवारबाजी, धनुर्विद्या तथा युद्धकला का प्रशिक्षण प्राप्त किया, जिसने उन्हें एक कुशल योद्धा के रूप में विकसित किया।

1842 ई. में मणिकर्णिका का विवाह झाँसी के महाराजा गंगाधर राव नवलकर से हुआ। विवाह के पश्चात् उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। झाँसी की महारानी बनने के बाद भी उन्होंने प्रशासनिक कार्यों के साथ-साथ सैन्य प्रशिक्षण और युद्धाभ्यास जारी रखा।

1851 ई. में रानी लक्ष्मीबाई को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, किन्तु कुछ ही महीनों बाद उसका निधन हो गया। इसके पश्चात् 1853 ई. में महाराजा गंगाधर राव ने अपने निकट संबंधी के पुत्र आनन्द राव को गोद लेकर उसका नाम दामोदर राव रखा।

21 नवम्बर, 1853 को महाराजा गंगाधर राव का निधन हो गया। इसके बाद रानी लक्ष्मीबाई ने दामोदर राव की संरक्षिका के रूप में झाँसी का शासन सँभालने का प्रयास किया और अंग्रेजों से दत्तक उत्तराधिकारी को वैध शासक के रूप में मान्यता देने की मांग की। महाराजा की मृत्यु से ठीक पूर्व इस दत्तक ग्रहण की सूचना अंग्रेजी अधिकारियों को भी दे दी गई थी।

➣ तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी ने गोद-निषेध नीति लागू करते हुए दामोदर राव के उत्तराधिकार को अस्वीकार कर दिया तथा 1854 ई. में झाँसी राज्य का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर लिया। रानी को आजीवन पेंशन देकर झाँसी का किला खाली करने का आदेश दिया गया।

➣ झाँसी के विलय का रानी लक्ष्मीबाई ने दृढ़ता से विरोध किया। यद्यपि उन्होंने प्रारम्भ में कानूनी एवं शांतिपूर्ण उपायों से अपना पक्ष रखने का प्रयास किया, किन्तु अंग्रेजी सरकार ने उनकी किसी भी अपील को स्वीकार नहीं किया।

➣ इसी अन्यायपूर्ण नीति ने आगे चलकर रानी लक्ष्मीबाई को 1857 की क्रांति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में स्थान दिलाया।

रोचक तथ्य :- झांसी की रानी — 29 वर्ष (युद्ध लड़ रही थीं)
अब्राहम लिंकन — 48 वर्ष (अमेरिका में बड़े नेता थे)

झाँसी का विद्रोह एवं अंग्रेजों से संघर्ष

➣ उस समय झाँसी में 12वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री, 14वीं बंगाल अनियमित घुड़सवार सेना तथा अन्य भारतीय सैनिक तैनात थे। इन सैनिकों में चर्बी वाले कारतूस, वेतन संबंधी असंतोष तथा अंग्रेज अधिकारियों के भेदभावपूर्ण व्यवहार के कारण विद्रोह की भावना पहले से ही विद्यमान थी।

4 जून, 1857 को झाँसी की छावनी में भारतीय सैनिकों ने विद्रोह प्रारम्भ कर स्टार फोर्ट पर अधिकार कर लिया। अगले दिन 5 जून तक यह विद्रोह पूरी छावनी में फैल गया और वहाँ रखे शस्त्र एवं गोला-बारूद अपने नियंत्रण में ले लिए।

➣ अगले दो दिनों में विद्रोह और अधिक व्यापक हो गया। अंग्रेज अधिकारी, सैनिक तथा उनके परिवारजन झाँसी के किले में शरण लेने के लिए विवश हो गए। विद्रोहियों ने किले को चारों ओर से घेर लिया तथा अंग्रेजों के लिए झाँसी में टिके रहना कठिन हो गया।

8 जून, 1857 को अंग्रेज अधिकारियों तथा उनके परिवारों की हत्या कर दी गई। इस घटना को इतिहास में झाँसी नरसंहार के नाम से जाना जाता है। इसमें लगभग 60–70 अंग्रेज पुरुष, महिलाएँ एवं बच्चे मारे गए।

➣ यद्यपि कुछ ब्रिटिश अधिकारियों ने झाँसी में हुए प्रारम्भिक विद्रोह एवं अंग्रेज अधिकारियों की हत्या के लिए रानी लक्ष्मीबाई को उत्तरदायी ठहराया, किन्तु अनेक इतिहासकारों का मत है कि इस संबंध में प्रत्यक्ष एवं निर्णायक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

➣ अनेक आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि उस समय झाँसी में वास्तविक नियंत्रण विद्रोही सैनिकों के हाथ में था और रानी परिस्थितियों को नियंत्रित करने में असमर्थ थीं। कुछ इतिहासकारों के अनुसार उन्होंने अंग्रेज अधिकारियों की सुरक्षा का प्रयास भी किया, किन्तु विद्रोही सैनिकों ने उनकी बात नहीं मानी।

➣ अंग्रेज अधिकारियों की मृत्यु के बाद झाँसी में प्रशासनिक शून्यता उत्पन्न हो गई। ऐसी स्थिति में रानी लक्ष्मीबाई ने नगर में शांति एवं व्यवस्था बनाए रखने का दायित्व अपने हाथों में लिया। उन्होंने स्वयं को झाँसी राज्य की संरक्षिका घोषित करते हुए प्रशासन का संचालन प्रारम्भ किया।

➣ रानी ने नगर में कानून-व्यवस्था स्थापित की, राजस्व व्यवस्था को पुनः संगठित किया तथा न्यायिक कार्यों को नियमित रूप से संचालित कराया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य झाँसी की जनता की सुरक्षा तथा राज्य की स्वतंत्रता की रक्षा करना है।

➣ रानी ने अंग्रेज सरकार को पत्र लिखकर झाँसी की स्थिति से अवगत कराया और यह भी बताया कि उन्होंने विद्रोह नहीं कराया है, बल्कि परिस्थितियों के कारण प्रशासन संभालना पड़ा है। किन्तु अंग्रेज अधिकारियों ने उनके स्पष्टीकरण पर विश्वास नहीं किया।

➣ प्रारम्भ में रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेज अधिकारियों को यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया कि झाँसी में हुए सैनिक विद्रोह में उनका प्रत्यक्ष हाथ नहीं था और वे केवल राज्य में शांति एवं व्यवस्था बनाए रखने का प्रयास कर रही हैं। किन्तु अंग्रेजी सरकार ने उन पर विश्वास नहीं किया और उन्हें विद्रोह का प्रमुख नेता मान लिया।

➣ रानी लक्ष्मीबाई ने शीघ्र ही यह समझ लिया कि अंग्रेज भविष्य में झाँसी पर पुनः अधिकार करने का प्रयास करेंगे। इसलिए उन्होंने राज्य की सैन्य शक्ति को संगठित करना प्रारम्भ किया। उन्होंने पुराने सैनिकों को पुनः संगठित किया तथा नई भर्तियाँ भी कराईं।

➣ रानी ने झाँसी के दुर्ग की किलेबंदी को मजबूत कराया। किले की प्राचीरों की मरम्मत कराई गई, तोपों को रणनीतिक स्थानों पर स्थापित किया गया तथा पर्याप्त मात्रा में बारूद एवं हथियार एकत्र किए गए। नगर के चारों ओर सुरक्षा व्यवस्था को भी सुदृढ़ बनाया गया।

➣ रानी के प्रमुख सैन्य अधिकारियों में गुलाम गौस खाँ, खुदा बख्श, दोस्त खाँ, लाला भाऊ बख्शी, रघुनाथ सिंह तथा जवाहर सिंह प्रमुख थे। इन सभी ने झाँसी की रक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। विशेष रूप से गुलाम गौस खाँ झाँसी के तोपखाने के अत्यंत कुशल अधिकारी माने जाते थे।

➣ रानी लक्ष्मीबाई ने महिलाओं को भी युद्ध संबंधी प्रशिक्षण देने के प्रयास किए। लोक परंपराओं एवं क्षेत्रीय स्रोतों में झलकारी बाई, सुन्दर-मुंदर, मोतीबाई तथा अन्य वीरांगनाओं का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने संकट के समय रानी का सहयोग किया।

➣ विशेष रूप से झलकारी बाई ने रानी के समान वेश धारण कर अंग्रेजों को भ्रमित करने का साहसिक कार्य किया, यद्यपि इस घटना के विवरण विभिन्न स्रोतों में भिन्न-भिन्न मिलते हैं।

➣ 1857 के उत्तरार्ध में झाँसी अंग्रेजी शासन से लगभग स्वतंत्र हो चुका था। रानी लक्ष्मीबाई ने राज्य का संचालन करते हुए प्रशासन, सेना और जनता—तीनों को एकजुट रखा। उनकी लोकप्रियता निरंतर बढ़ती गई और वे बुन्देलखण्ड में अंग्रेज विरोधी संघर्ष का सबसे बड़ा प्रतीक बन गईं।

➣ इस बीच ओरछा तथा दतिया के शासकों ने झाँसी की कमजोर स्थिति का लाभ उठाकर उस पर आक्रमण कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई ने अत्यंत साहस एवं कुशल नेतृत्व का परिचय देते हुए दोनों आक्रमणों का सफलतापूर्वक सामना किया और झाँसी की रक्षा की। इससे उनकी सैन्य क्षमता एवं नेतृत्व का व्यापक प्रभाव पड़ा।

➣ दूसरी ओर अंग्रेज सरकार ने झाँसी को पुनः अपने अधिकार में लेने का निश्चय कर लिया था। मध्य भारत में ब्रिटिश अभियान का नेतृत्व मेजर जनरल सर ह्यू रोज को सौंपा गया। 1858 के प्रारम्भ में अंग्रेजी सेना झाँसी की ओर बढ़ी।

➣ सर ह्यू रोज ने पहले मार्ग में स्थित विद्रोही केन्द्रों को पराजित करते हुए सागर, राहतगढ़, गढ़ाकोटा आदि क्षेत्रों पर पुनः अधिकार स्थापित किया। इसके बाद उसकी सेना मार्च 1858 के अंत तक झाँसी पहुँच गई और किले को चारों ओर से घेर लिया।

23 मार्च, 1858 को अंग्रेजी सेना ने झाँसी दुर्ग की औपचारिक घेराबंदी प्रारम्भ की। लगभग दो सप्ताह तक अंग्रेज सेना किले की दीवारों को भेदने में सफल नहीं हो सकी।

➣ झाँसी की घेराबंदी की सूचना मिलने पर तात्या टोपे लगभग 20,000 सैनिकों के साथ झाँसी की सहायता के लिए आगे बढ़े। उनका उद्देश्य अंग्रेजी सेना को पीछे से घेरकर रानी लक्ष्मीबाई को राहत पहुँचाना था।

1 अप्रैल, 1858 को बेतवा नदी के निकट तात्या टोपे और सर ह्यू रोज की सेनाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ। आधुनिक तोपखाने और बेहतर सैन्य संगठन के कारण अंग्रेजों ने इस युद्ध में विजय प्राप्त की। तात्या टोपे को पीछे हटना पड़ा और झाँसी को अपेक्षित सहायता नहीं मिल सकी।

➣ बेतवा के युद्ध में तात्या टोपे की पराजय के बाद झाँसी पूर्णतः अंग्रेजी सेना से घिर गई। इससे रानी लक्ष्मीबाई की स्थिति अत्यंत कठिन हो गई, फिर भी उन्होंने आत्मसमर्पण करने से स्पष्ट इनकार कर दिया।

➣ निरन्तर संघर्ष के बाद अंग्रेजी सेना ने 3 अप्रैल, 1858 को झाँसी के किले पर अधिकार कर लिया। इसके पश्चात् नगर में व्यापक नरसंहार एवं लूटपाट हुई।

➣ कठिन परिस्थितियों में भी रानी लक्ष्मीबाई ने अद्भुत साहस का परिचय देते हुए

➣ अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को पीठ पर बाँधकर कुछ विश्वस्त सैनिकों के साथ किले से निकलने में सफलता प्राप्त की। यह घटना भारतीय इतिहास की सबसे प्रसिद्ध वीरगाथाओं में गिनी जाती है।

➣ झाँसी से निकलने के बाद रानी लक्ष्मीबाई कालपी पहुँचीं, जहाँ उनकी भेंट तात्या टोपे, राव साहब तथा अन्य क्रांतिकारी नेताओं से हुई।

कालपी, ग्वालियर एवं रानी लक्ष्मीबाई की वीरगति

➣ झाँसी से निकलने के बाद रानी लक्ष्मीबाई कालपी पहुँचीं, जहाँ उनकी भेंट तात्या टोपे, राव साहब (नाना साहेब के प्रतिनिधि) तथा अन्य क्रांतिकारी नेताओं से हुई। यहाँ उन्होंने पुनः सेना का संगठन किया और अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखने का निर्णय लिया।

➣ कालपी में क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों का डटकर सामना किया, किन्तु सर ह्यू रोज़ के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने 22 मई, 1858 को कालपी पर भी अधिकार कर लिया। इसके बाद रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे एवं अन्य क्रांतिकारी ग्वालियर की ओर बढ़ गए।

➣ उस समय ग्वालियर का शासक महाराजा जयाजीराव सिंधिया अंग्रेजों का समर्थक था, किन्तु उसकी सेना और अनेक अधिकारी क्रांतिकारियों के प्रति सहानुभूति रखते थे।

➣ जून 1858 के प्रारम्भ में रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे तथा राव साहब की संयुक्त सेना ग्वालियर पहुँची। सिंधिया की सेना के अनेक सैनिक क्रांतिकारियों के पक्ष में आ गए, जिसके परिणामस्वरूप जयाजीराव सिंधिया को आगरा की ओर भागना पड़ा।

➣ क्रांतिकारियों ने बिना अधिक प्रतिरोध के ग्वालियर दुर्ग पर अधिकार कर लिया। ग्वालियर की विजय 1857 की क्रांति की अंतिम बड़ी सफलताओं में से एक मानी जाती है। यहाँ राव साहब को मराठा शासन का प्रतिनिधि घोषित किया गया तथा अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखने की योजना बनाई गई।

➣ ग्वालियर पर अधिकार के बाद क्रांतिकारियों के पास मध्य भारत में पुनः संगठित होकर संघर्ष जारी रखने का अवसर था, किन्तु अंग्रेजों ने शीघ्र ही प्रतिआक्रमण प्रारम्भ कर दिया। सर ह्यू रोज़ के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ग्वालियर की ओर बढ़ी और दोनों पक्षों के बीच निर्णायक युद्ध हुआ।

17 जून, 1858 को कोटा-की-सराय (ग्वालियर के निकट) में रानी लक्ष्मीबाई ने पुरुष वेश धारण कर अग्रिम मोर्चे पर युद्ध का नेतृत्व किया। युद्ध के दौरान रानी गंभीर रूप से घायल हो गईं।

➣ रानी के विश्वस्त सहयोगियों ने उन्हें समीप स्थित गंगादास बाबा की कुटिया तक पहुँचाया, जहाँ 17 जून, 1858 को उन्होंने अंतिम सांस ली। कुछ स्रोत उनकी मृत्यु की तिथि 18 जून, 1858 भी बताते हैं, किन्तु अधिकांश आधुनिक इतिहासकार 18 जून को अधिक स्वीकार्य मानते हैं।

➣ रानी की अंतिम इच्छा के अनुसार उनके पार्थिव शरीर का तत्काल दाह संस्कार कर दिया गया, जिससे अंग्रेज उनके शरीर को अपने अधिकार में न ले सकें। इस प्रकार उन्होंने मृत्यु के बाद भी अपनी स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा की।

➣ रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु के बाद भी तात्या टोपे तथा अन्य क्रांतिकारियों ने संघर्ष जारी रखा, किन्तु मध्य भारत में 1857 की क्रांति को भारी आघात पहुँचा। ग्वालियर पर पुनः अंग्रेजों का अधिकार हो गया और क्रांति का एक प्रमुख केन्द्र समाप्त हो गया।

स्रोत / व्यक्तित्व कथन
सर ह्यू रोज रानी लक्ष्मीबाई को विद्रोहियों की सबसे साहसी एवं सर्वश्रेष्ठ सैन्य नेता बताया।
सर ह्यू रोज़
(लोकप्रिय रूप से प्रचलित कथन)
भारतीय इतिहास की पुस्तकों में उनसे संबद्ध एक लोकप्रिय कथन उद्धृत किया जाता है—

भारतीय क्रान्तिकारियों में यहाँ सोयी हुई औरत अकेली मर्द है।
वीर सावरकर उन्हें 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की महानतम वीरांगनाओं में स्थान दिया।
डॉ. एस. एन. सेन रानी को भारतीय इतिहास की सर्वाधिक साहसी एवं कुशल सेनानायिकाओं में से एक माना।
जवाहरलाल नेहरू उन्हें भारतीय स्वतंत्रता एवं राष्ट्रीय चेतना का प्रेरणास्रोत बताया।
सुभद्रा कुमारी चौहान अपनी प्रसिद्ध कविता द्वारा रानी लक्ष्मीबाई को भारतीय वीरता का अमर प्रतीक बनाया।

तांत्या टोपे ( ग्वालियर )

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में मध्य भारत एवं राजस्थान के क्षेत्र में सबसे लंबा, सबसे साहसिक तथा सबसे प्रभावशाली गुरिल्ला अभियान चलाने का श्रेय तांत्या टोपे को दिया जाता है।

➣ ग्वालियर पर अंग्रेजों के पुनः अधिकार (जून 1858) के बाद भी उन्होंने लगभग एक वर्ष तक अंग्रेजी सेना को छकाते हुए मध्य भारत, राजस्थान, मालवा तथा बुंदेलखंड के विस्तृत क्षेत्रों में संघर्ष जारी रखा।

➣ अपनी अद्भुत सैन्य रणनीति, तीव्र गति से संचालित अभियानों एवं असाधारण नेतृत्व क्षमता के कारण वे 1857 की क्रांति के सबसे कुशल सेनानायकों में गिने जाते हैं।

तांत्या टोपे का वास्तविक नाम रामचन्द्र पाण्डुरंग यवलकर (या यवलेकर) था। उनका जन्म सामान्यतः 1814 ई. में महाराष्ट्र के नासिक जिले के येवला (यवला) ग्राम में माना जाता है।

➣ उनके पिता पाण्डुरंग राव पेशवा बाजीराव द्वितीय के प्रशासनिक विभाग से जुड़े हुए थे। मराठा साम्राज्य के पतन के बाद जब पेशवा बाजीराव द्वितीय को अंग्रेजों ने बिठूर (कानपुर) में रहने के लिए बाध्य किया, तब तांत्या टोपे का परिवार भी उनके साथ बिठूर आकर बस गया।

➣ बिठूर में तांत्या टोपे का बचपन धोंडूपंत (नाना साहब) के साथ बीता। दोनों के बीच घनिष्ठ मित्रता थी। यहीं उन्होंने घुड़सवारी, तलवारबाजी, तोप संचालन तथा पारंपरिक मराठा युद्धकला का प्रशिक्षण प्राप्त किया। यही सैन्य शिक्षा आगे चलकर 1857 की क्रांति में उनकी सबसे बड़ी शक्ति सिद्ध हुई।

➣ 1857 के विद्रोह के समय तांत्या टोपे नाना साहब के प्रमुख सेनापति एवं विश्वसनीय सहयोगी थे। कानपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध हुए संघर्ष में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई तथा विद्रोही सेना के संगठन और संचालन का दायित्व संभाला। उनकी सैन्य दक्षता के कारण नाना साहब का प्रभाव उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों तक फैल सका।

कानपुर के पुनः अंग्रेजों के अधिकार में चले जाने के बाद तांत्या टोपे ने हार स्वीकार नहीं की। वे कालपी पहुँचे, जहाँ उन्होंने नाना साहब के प्रतिनिधि राव साहब, रानी लक्ष्मीबाई तथा अन्य क्रांतिकारी नेताओं के साथ मिलकर विद्रोह को पुनर्गठित किया।

➣ कालपी शीघ्र ही मध्य भारत में क्रांतिकारियों का प्रमुख सैन्य केन्द्र बन गया। 22 मई, 1858 को कालपी अंग्रेजों के अधिकार में चला गया, किन्तु तांत्या टोपे, रानी लक्ष्मीबाई एवं राव साहब ने संघर्ष जारी रखा।

➣ उन्होंने रणनीति बदलते हुए ग्वालियर की ओर बढ़ने का निर्णय लिया, क्योंकि वहाँ की विशाल सेना और सुदृढ़ किला विद्रोह को नई शक्ति प्रदान कर सकते थे।

➣ उस समय ग्वालियर के शासक महाराजा जयाजीराव सिंधिया अंग्रेजों के सहयोगी थे, किन्तु उनकी सेना के अधिकांश भारतीय सैनिक अंग्रेजों के प्रति सहानुभूति नहीं रखते थे।

➣ तांत्या टोपे ने अपनी राजनीतिक सूझबूझ एवं सैन्य नेतृत्व के बल पर सिंधिया की सेना के अनेक सैनिकों को क्रांतिकारियों के पक्ष में कर लिया। परिणामस्वरूप बिना किसी बड़े प्रतिरोध के 1 जून, 1858 को क्रांतिकारियों ने ग्वालियर पर अधिकार कर लिया।

➣ ग्वालियर पर अधिकार के बाद नाना साहब को पुनः पेशवा घोषित किया गया तथा ग्वालियर को विद्रोह का नया केन्द्र बनाने का प्रयास किया गया। यह 1857 की क्रांति की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक थी, क्योंकि इससे क्रांतिकारियों को मध्य भारत में पुनः संगठित होने का अवसर मिला।

➣ ग्वालियर पर क्रांतिकारियों का अधिकार अधिक समय तक नहीं रह सका। अंग्रेज सरकार ने इस विजय को अत्यंत गंभीर चुनौती माना और सर ह्यू रोज़ के नेतृत्व में विशाल सेना ग्वालियर की ओर भेजी।

➣ जून 1858 में हुए भीषण युद्ध में अंग्रेजों ने पुनः ग्वालियर पर अधिकार कर लिया। इसी अभियान के दौरान 17 जून, 1858 को कोटा-की-सराय के युद्ध में रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं।

➣ ग्वालियर के पतन के बाद अधिकांश विद्रोही नेता बिखर गए, किन्तु तांत्या टोपे ने आत्मसमर्पण नहीं किया। उन्होंने खुली लड़ाई के स्थान पर गुरिल्ला युद्ध की नीति अपनाई और मध्य भारत एवं राजस्थान में अंग्रेजों के विरुद्ध अपने ऐतिहासिक अभियान का आरम्भ किया, जिसने लगभग एक वर्ष तक अंग्रेजी शासन को निरंतर चुनौती दी।

इतिहासकार दृष्टिकोण
वी. डी. सावरकर तांत्या टोपे को 1857 की क्रांति का सबसे कुशल सैन्य रणनीतिकार माना, जिसने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी संघर्ष जारी रखा।
एस. एन. सेन ग्वालियर के पतन के बाद तांत्या टोपे द्वारा चलाया गया गुरिल्ला युद्ध 1857 के विद्रोह के सबसे उल्लेखनीय सैन्य अभियानों में से एक था।
जी. बी. मल्लेसन
(अंग्रेज इतिहासकार)
तांत्या टोपे की तीव्र गति, लगातार स्थान परिवर्तन तथा अप्रत्याशित हमलों के कारण उन्हें पकड़ना अंग्रेजी सेना के लिए अत्यंत कठिन सिद्ध हुआ।

राजस्थान एवं मध्य भारत में तांत्या टोपे का गुरिल्ला अभियान

ग्वालियर पर अंग्रेजों के पुनः अधिकार (जून 1858) के बाद अधिकांश क्रांतिकारी नेता बिखर गए, किन्तु तांत्या टोपे ने संघर्ष समाप्त नहीं किया।

➣ उन्होंने खुली लड़ाई के स्थान पर गुरिल्ला युद्ध की नीति अपनाई। वे अपनी छोटी-छोटी टुकड़ियों के साथ निरंतर स्थान बदलते, अचानक आक्रमण करते और अंग्रेजों के पहुँचने से पहले ही दूसरे क्षेत्र की ओर बढ़ जाते थे। इसी कारण अंग्रेजी सेना लगभग एक वर्ष तक उन्हें पकड़ने में असफल रही।

➣ तांत्या टोपे का उद्देश्य केवल अंग्रेजों से बचना नहीं था, बल्कि विभिन्न रियासतों में विद्रोह की भावना को जीवित रखना, नई सेनाओं का संगठन करना तथा स्थानीय शासकों एवं सामंतों का सहयोग प्राप्त करना भी था।

➣ उन्होंने मध्य भारत, मालवा तथा राजस्थान के विस्तृत क्षेत्रों में लगातार अभियान चलाकर अंग्रेजों को अनेक मोर्चों पर व्यस्त रखा।

➣ ग्वालियर से निकलने के बाद तांत्या टोपे माण्डलगढ़ होते हुए राजस्थान की ओर बढ़े। उनकी यह यात्रा राजस्थान में क्रांतिकारी गतिविधियों के विस्तार का महत्वपूर्ण चरण थी।

➣ विभिन्न स्रोतों में उनकी पहली राजस्थान यात्रा की तिथि में मतभेद मिलता है, किन्तु सामान्यतः अगस्त 1858 का समय स्वीकार किया जाता है।

9 अगस्त, 1858 को कोठारी नदी के तट पर स्थित कुआड़ा (भीलवाड़ा) में जनरल रॉबर्ट्स के नेतृत्व वाली अंग्रेजी सेना से उनका भीषण संघर्ष हुआ। इस युद्ध में तांत्या टोपे को पीछे हटना पड़ा, किन्तु उन्होंने अपनी सेना को सुरक्षित निकाल लिया और अभियान जारी रखा।

➣ इसके कुछ ही दिनों बाद 13 अगस्त, 1858 को रुकमगढ़ (वर्तमान राजसमंद क्षेत्र) में अंग्रेजों से पुनः युद्ध हुआ। यहाँ भी अंग्रेजों ने बढ़त बनाई, किन्तु तांत्या टोपे ने अपनी गुरिल्ला नीति के अनुसार निर्णायक पराजय से बचते हुए शीघ्र ही अपना मार्ग बदल लिया।

➣ रुकमगढ़ से आगे बढ़ते हुए वे आकोला, चित्तौड़ तथा झालरापाटन (झालावाड़) पहुँचे। यहाँ उन्होंने राणा पृथ्वीसिंह की सेना को पराजित किया तथा झालावाड़ की सेना और युद्ध सामग्री का एक भाग अपने साथ मिला लिया। इससे उनके अभियान को नई शक्ति प्राप्त हुई।

➣ इसके बाद तांत्या टोपे ने पुनः दक्षिणी राजस्थान की ओर प्रस्थान किया। 11 दिसम्बर, 1858 को उन्होंने बाँसवाड़ा पर अधिकार स्थापित कर लिया। इस समय तक उनका अभियान राजस्थान, मालवा और मध्य भारत के विशाल भूभाग में फैल चुका था।

➣ राजस्थान के अनेक स्थानीय सामंतों एवं शासकों ने प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से तांत्या टोपे की सहायता की। सलूम्बर के सामंत केसरीसिंह तथा कोठारिया के सामंत जोधसिंह ने उन्हें शरण प्रदान की।

➣ वहीं बीकानेर के महाराजा सरदारसिंह ने भी सीमित सैन्य सहायता उपलब्ध कराई। इन सहयोगों के कारण अंग्रेजों के लिए उनका पीछा करना और भी कठिन हो गया।

➣ तांत्या टोपे का उद्देश्य जयपुर तथा उदयपुर जैसे प्रमुख राज्यों को भी क्रांति में सम्मिलित करना था, किन्तु अंग्रेज अधिकारियों ने समय रहते इन क्षेत्रों की सुरक्षा बढ़ा दी।

मेजर जनरल रॉबर्ट्स के सक्रिय होने के कारण तांत्या टोपे को जयपुर से लगभग 60 मील पूर्व ही अपनी योजना बदलनी पड़ी और वे पुनः दिशा परिवर्तित करने के लिए विवश हुए।

➣ अपने पूरे अभियान के दौरान तांत्या टोपे ने किसी एक स्थान पर अधिक समय तक रुकने के स्थान पर निरंतर गतिशील रहने की नीति अपनाई। वे स्थानीय जनता से सहयोग प्राप्त करते, आवश्यक रसद जुटाते, छोटी टुकड़ियों में आगे बढ़ते और

➣ अवसर मिलते ही अंग्रेजी चौकियों तथा संचार व्यवस्था पर आक्रमण कर देते थे।

➣ इस नीति ने अंग्रेजी सेना को लंबे समय तक परेशान रखा और विद्रोह की भावना को जीवित बनाए रखा।

➣ अनेक इतिहासकार तांत्या टोपे को 1857 की क्रांति का सर्वश्रेष्ठ गुरिल्ला सेनानायक मानते हैं, जिसने सीमित संसाधनों के बावजूद लंबे समय तक अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी।

अंतिम संघर्ष एवं गिरफ्तारी

➣ राजस्थान एवं मध्य भारत में लगभग एक वर्ष तक अंग्रेजों को लगातार चुनौती देने के बाद भी तांत्या टोपे ने आत्मसमर्पण नहीं किया। अंग्रेजी सेना उनकी गतिविधियों पर निरंतर निगरानी रख रही थी, किन्तु उनकी गुरिल्ला रणनीति के कारण वे बार-बार अंग्रेजों की पकड़ से निकल जाते थे।

जनवरी, 1859 में तांत्या टोपे ने सीकर (राजस्थान) के निकट अंग्रेजी सेना का अंतिम बार सामना किया। इस युद्ध में अंग्रेजी सेना का नेतृत्व कर्नल होम्स कर रहा था। विभिन्न स्रोतों में इस युद्ध की तिथि 21 जनवरी अथवा 31 जनवरी, 1859 भी मिलती है, किन्तु यह निर्विवाद है कि सीकर का युद्ध उनके सक्रिय सैन्य अभियान का अंतिम प्रमुख संघर्ष था।

➣ सीकर के युद्ध के बाद तांत्या टोपे ने अपनी सेना को सुरक्षित निकाल लिया और मध्य प्रदेश के नरवर के सामंत मानसिंह के पास शरण ली। मानसिंह पहले उनके सहयोगी एवं मित्र थे, इसलिए तांत्या टोपे को उन पर पूर्ण विश्वास था।

➣ अंग्रेज अधिकारियों ने तांत्या टोपे को पकड़ने के लिए सैन्य शक्ति के साथ-साथ कूटनीति का भी सहारा लिया। उन्होंने नरवर के सामंत मानसिंह को क्षमा, जागीर एवं अन्य सुविधाओं का प्रलोभन दिया। अंततः मानसिंह अंग्रेजों के प्रभाव में आ गया और उसने तांत्या टोपे के साथ विश्वासघात कर दिया।

7 अप्रैल, 1859 को मानसिंह की सूचना के आधार पर अंग्रेजों ने तांत्या टोपे को गिरफ्तार कर लिया। उनकी गिरफ्तारी 1857 की क्रांति के अंतिम प्रमुख सैन्य नेताओं में से एक की गिरफ्तारी थी। इसके साथ ही मध्य भारत में संगठित सशस्त्र प्रतिरोध लगभग समाप्त हो गया।

➣ गिरफ्तारी के बाद तांत्या टोपे को शिवपुरी (वर्तमान मध्य प्रदेश) लाया गया, जहाँ उन पर अंग्रेजी सैन्य न्यायालय में मुकदमा चलाया गया। उन पर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह, सैनिक अभियानों का नेतृत्व तथा अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध युद्ध छेड़ने के आरोप लगाए गए।

➣ न्यायालय ने उन्हें मृत्युदण्ड का आदेश दिया और 18 अप्रैल, 1859 को शिवपुरी में फाँसी दे दी गई। इस प्रकार 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे महान सेनानायकों में से एक का जीवन समाप्त हुआ, किन्तु उनका संघर्ष भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया।

➣ तांत्या टोपे की मृत्यु को लेकर कुछ आधुनिक शोधकर्ताओं ने वैकल्पिक मत भी प्रस्तुत किए हैं- पराग टोपे ने अपनी पुस्तक Operation Red Lotus में यह मत व्यक्त किया है कि शिवपुरी में फाँसी पर चढ़ाया गया व्यक्ति वास्तविक तांत्या टोपे नहीं था।

हालांकि मुख्यधारा के अधिकांश इतिहासकार इस मत को स्वीकार नहीं करते तथा 18 अप्रैल, 1859 को शिवपुरी में दी गई फाँसी को ही ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित मानते हैं।

➣ अपनी असाधारण सैन्य प्रतिभा, तीव्र गति से संचालित अभियानों तथा सफल गुरिल्ला रणनीति के कारण तांत्या टोपे को भारत का गैरीबाल्डी कहा जाता है। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने लगभग एक वर्ष तक अंग्रेजी साम्राज्य को चुनौती दी और 1857 की क्रांति की ज्योति को जीवित रखा।

नाना साहब(कानपुर)

कानपुर 1857 की क्रांति का सबसे महत्वपूर्ण एवं सबसे रक्तरंजित केन्द्रों में से एक था। यह नगर गंगा नदी के तट पर स्थित होने के कारण उत्तर भारत में अंग्रेजों का एक प्रमुख सैनिक एवं प्रशासनिक केन्द्र था। इलाहाबाद, लखनऊ तथा दिल्ली को जोड़ने वाले मार्ग पर स्थित होने के कारण इसका सामरिक महत्व अत्यधिक था। अतः कानपुर में विद्रोह का सफल होना अंग्रेजी शासन के लिए गंभीर चुनौती बन गया।

➣ कानपुर के विद्रोह का नेतृत्व नाना साहब (धोंडूपंत) ने किया। वे पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र थे। उनका वास्तविक नाम धोंडूपंत था। उनका जन्म सामान्यतः 1824 ई. में माना जाता है। मराठा साम्राज्य के पतन के बाद उनका पालन-पोषण बिठूर (कानपुर) में हुआ, जहाँ अंग्रेजों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय को निर्वासन के रूप में रहने की अनुमति दी थी।

➣ बिठूर में नाना साहब का बचपन मराठा परंपराओं एवं सैन्य वातावरण में बीता। उनके निकटतम साथियों में तात्या टोपे (रामचन्द्र पाण्डुरंग) तथा अजीमुल्ला ख़ाँ प्रमुख थे।

28 जनवरी, 1851 को पेशवा बाजीराव द्वितीय की मृत्यु हो गई। इसके बाद नाना साहब ने स्वयं को उनके उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता देने तथा अंग्रेजों द्वारा दी जा रही 8 लाख रुपये वार्षिक पेंशन को जारी रखने की माँग की।

➣ तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी ने यह कहते हुए उनकी माँग अस्वीकार कर दी कि दत्तक पुत्र को पेंशन का अधिकार प्राप्त नहीं है। यद्यपि व्यपगत सिद्धांत सीधे तौर पर पेंशन पर लागू नहीं होता था, फिर भी डलहौजी की विस्तारवादी नीति और दत्तक उत्तराधिकार को अस्वीकार करने की प्रवृत्ति के कारण नाना साहब की माँग ठुकरा दी गई। इस निर्णय ने अंग्रेजों के प्रति उनके मन में गहरा असंतोष उत्पन्न कर दिया।

➣ अपनी पेंशन बहाल कराने के उद्देश्य से नाना साहब ने अपने विश्वस्त सचिव एवं सलाहकार अजीमुल्ला ख़ाँ को इंग्लैंड भेजा। उन्होंने 1853–1855 के बीच लंदन में ईस्ट इंडिया कंपनी तथा ब्रिटिश सरकार के समक्ष नाना साहब का पक्ष रखा, किन्तु उनकी सभी अपीलें अस्वीकार कर दी गईं।

➣ इंग्लैंड प्रवास के दौरान अजीमुल्ला ख़ाँ ने यूरोप की राजनीतिक परिस्थितियों का भी अध्ययन किया। उसी समय क्रीमिया युद्ध (1853–1856) चल रहा था, जिसमें ब्रिटेन को अपेक्षा से अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

➣ इस अनुभव से अजीमुल्ला ख़ाँ इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि अंग्रेजी शक्ति अजेय नहीं है और यदि भारत में व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हो जाए तो अंग्रेजों को चुनौती दी जा सकती है।

➣ भारत लौटने के बाद अजीमुल्ला ख़ाँ ने नाना साहब को ब्रिटेन की वास्तविक स्थिति से अवगत कराया। इसके बाद बिठूर में विद्रोह की तैयारियाँ तेज हो गईं। नाना साहब, तात्या टोपे, अजीमुल्ला ख़ाँ तथा उनके सहयोगियों ने सैनिकों एवं स्थानीय समर्थकों से संपर्क स्थापित करना प्रारम्भ किया।

10 मई, 1857 को मेरठ में विद्रोह प्रारम्भ होने तथा शीघ्र ही दिल्ली पर क्रांतिकारियों के अधिकार की सूचना कानपुर पहुँची। इससे नाना साहब को विश्वास हो गया कि अंग्रेजी शासन के विरुद्ध व्यापक संघर्ष प्रारम्भ हो चुका है। उन्होंने भी इस अवसर का लाभ उठाकर अंग्रेजों के विरुद्ध खुलकर नेतृत्व करने का निर्णय लिया।

➣ इस प्रकार 1857 के व्यापक विद्रोह का वातावरण ने नाना साहब को कानपुर के विद्रोह का प्रमुख नेता बना दिया। 5 जून, 1857 को कानपुर में आरम्भ हुआ विद्रोह शीघ्र ही 1857 की क्रांति का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय बन गया।

कानपुर का विद्रोह एवं अंग्रेजों का पुनः अधिकार

5 जून, 1857 को कानपुर की सैनिक छावनी में भारतीय सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया। विद्रोही सैनिकों ने अंग्रेजी खजाने तथा शस्त्रागार पर अधिकार कर लिया और शीघ्र ही नाना साहब के नेतृत्व में कानपुर नगर का अधिकांश भाग क्रांतिकारियों के नियंत्रण में आ गया। इसके साथ ही नाना साहब ने स्वयं को पेशवा घोषित किया और मराठा सत्ता की पुनर्स्थापना का प्रयास किया।

➣ उस समय कानपुर में अंग्रेजी सेना का नेतृत्व मेजर जनरल सर ह्यूज व्हीलर के हाथों में था। विद्रोह प्रारम्भ होते ही उन्होंने लगभग 900 अंग्रेज सैनिकों, महिलाओं तथा बच्चों के साथ एक अस्थायी किलेबंदी में शरण ली।

➣ भीषण गर्मी, भोजन एवं पानी की कमी तथा लगातार गोलाबारी के कारण अंग्रेजों की स्थिति दिन-प्रतिदिन कमजोर होती गई। लगभग 22 दिनों तक चली घेराबंदी के बाद अंग्रेजों की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई। अंततः नाना साहब की ओर से उन्हें सुरक्षित रूप से इलाहाबाद जाने का प्रस्ताव दिया गया। समझौते के अनुसार 27 जून, 1857 को अंग्रेज सैनिक, महिलाएँ एवं बच्चे सतीचौरा घाट से नावों द्वारा इलाहाबाद के लिए रवाना होने लगे।

➣ सतीचौरा घाट पर नावों के चलने के दौरान अचानक गोलीबारी और अफरा-तफरी मच गई। अनेक नावों में आग लग गई तथा दोनों पक्षों के बीच भीषण संघर्ष छिड़ गया। इस घटना में सर ह्यूज व्हीलर सहित अधिकांश अंग्रेज सैनिक मारे गए। इस घटना को भारतीय इतिहास में सतीचौरा घाट की घटना के नाम से जाना जाता है।

➣ सतीचौरा घाट की घटना के संबंध में इतिहासकारों में मतभेद है। कुछ अंग्रेज इतिहासकार इसे नाना साहब द्वारा पूर्व नियोजित षड्यंत्र मानते हैं, जबकि अनेक भारतीय इतिहासकारों का मत है कि नाविकों के भाग जाने, किसी पक्ष द्वारा अचानक गोली चलने तथा उत्पन्न अफरा-तफरी के कारण यह घटना नियंत्रण से बाहर हो गई। आज तक यह निश्चित रूप से सिद्ध नहीं हो सका है कि गोली सबसे पहले किसने चलाई थी।

➣ सतीचौरा घाट से बची हुई अंग्रेज महिलाओं एवं बच्चों को बीबीघर नामक भवन में बंदी बनाकर रखा गया। कुछ दिनों बाद जब अंग्रेजी सेना कानपुर की ओर बढ़ने लगी, तब 15–16 जुलाई, 1857 को वहाँ बंदी बनाए गए अधिकांश महिलाओं एवं बच्चों की हत्या कर दी गई। इस घटना ने अंग्रेजी शासन को अत्यंत क्रोधित कर दिया।

बीबीघर हत्याकांड के आदेश को लेकर भी इतिहासकारों में मतभेद है। किसी समकालीन प्रमाण से यह स्पष्ट नहीं होता कि नाना साहब ने स्वयं इस घटना का आदेश दिया था।

➣ कुछ इतिहासकार इसके लिए स्थानीय विद्रोहियों अथवा परिस्थितिजन्य निर्णय को उत्तरदायी मानते हैं, जबकि अंग्रेजी लेखकों ने इसका उत्तरदायित्व सीधे नाना साहब पर आरोपित किया।

➣ इस बीच जनरल हैवलॉक तथा जनरल जेम्स जॉर्ज नील के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना इलाहाबाद से आगे बढ़ी। 16–17 जुलाई, 1857 को उन्होंने कानपुर पर पुनः अधिकार कर लिया। नाना साहब एवं उनके सहयोगी बिठूर की ओर हट गए और वहाँ से संघर्ष जारी रखने का निर्णय लिया।

➣ कानपुर पर पुनः अधिकार प्राप्त करने के बाद अंग्रेजों ने अत्यंत कठोर दमन-चक्र चलाया। जनरल नील ने विद्रोहियों एवं संदिग्ध व्यक्तियों को बिना उचित सुनवाई के मृत्युदण्ड दिया।

➣ अनेक बंदियों को बीबीघर के रक्तरंजित फर्श को साफ करने के लिए विवश किया गया तथा बाद में उन्हें फाँसी दे दी गई या तोप के मुँह से बाँधकर उड़ा दिया गया। अंग्रेजी प्रतिशोध की यह कार्रवाई 1857 की क्रांति के सबसे क्रूर अध्यायों में गिनी जाती है।

इतिहासकार दृष्टिकोण
जॉन विलियम के एवं जी. बी. मल्लेसन सतीचौरा घाट एवं बीबीघर की घटनाओं का विस्तृत वर्णन किया, किन्तु इन घटनाओं के लिए नाना साहब की प्रत्यक्ष भूमिका पर इतिहासकारों में पूर्ण सहमति नहीं है।
एस. एन. सेन सतीचौरा घाट की घटना की परिस्थितियाँ अत्यंत जटिल थीं तथा उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर इसे पूर्णतः पूर्व नियोजित षड्यंत्र सिद्ध नहीं किया जा सकता।
आर. सी. मजूमदार सतीचौरा घाट तथा बीबीघर की घटनाओं के संबंध में समकालीन स्रोत एकमत नहीं हैं, इसलिए इन घटनाओं का मूल्यांकन सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए।

पुनः संघर्ष एवं नाना साहब का रहस्यमय अंत

➣ कानपुर पर अंग्रेजों के पुनः अधिकार के बाद भी नाना साहब ने संघर्ष समाप्त नहीं किया। वे बिठूर से हटकर अपने विश्वस्त सेनापति तांत्या टोपे, सलाहकार अजीमुल्ला ख़ाँ तथा अन्य क्रांतिकारियों के साथ पुनः सेना संगठित करने में जुट गए।

➣ नाना साहब की सेना का वास्तविक सैन्य संचालन तांत्या टोपे के हाथों में था। अपनी संगठन क्षमता और युद्ध-कौशल के बल पर तांत्या टोपे ने शीघ्र ही नई सेना तैयार कर ली और अंग्रेजों के विरुद्ध पुनः अभियान प्रारम्भ किया।

नवंबर, 1857 में तांत्या टोपे के नेतृत्व में विद्रोही सेना ने कानपुर की ओर बढ़कर अंग्रेज सेनापति जनरल चार्ल्स विंडहम को पराजित कर दिया। इस विजय से कुछ समय के लिए कानपुर का अधिकांश भाग पुनः क्रांतिकारियों के नियंत्रण में आ गया।

➣ यह 1857 की क्रांति के उत्तरार्द्ध की महत्वपूर्ण सफलताओं में से एक थी। कानपुर की स्थिति को संभालने के लिए भारत के तत्कालीन कमांडर-इन-चीफ सर कॉलिन कैम्पबेल स्वयं सेना लेकर पहुँचे।

6 दिसंबर, 1857 को हुए निर्णायक युद्ध में अंग्रेजों ने विद्रोही सेना को पराजित कर कानपुर पर पुनः अधिकार स्थापित कर लिया। इसके बाद नाना साहब और तांत्या टोपे को कानपुर छोड़ना पड़ा।

➣ कानपुर से हटने के बाद नाना साहब ने तांत्या टोपे, राव साहब तथा अन्य क्रांतिकारी नेताओं के साथ मध्य भारत में संघर्ष जारी रखा। बाद में जून, 1858 में जब क्रांतिकारियों ने ग्वालियर पर अधिकार किया, तब नाना साहब को पुनः पेशवा घोषित किया गया। यद्यपि यह सफलता अधिक समय तक नहीं टिक सकी, फिर भी इससे विद्रोहियों का मनोबल बढ़ा।

➣ ग्वालियर के पतन के बाद नाना साहब का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगा। दूसरी ओर तांत्या टोपे ने मध्य भारत एवं राजस्थान में अपना प्रसिद्ध गुरिल्ला अभियान जारी रखा। नाना साहब स्वयं अंग्रेजों की पकड़ से बचते हुए उत्तर की ओर निकल गए।

➣ अंततः नाना साहब अपने परिवार एवं कुछ विश्वस्त सहयोगियों के साथ नेपाल की तराई में चले गए। इसके बाद उनके जीवन के संबंध में कोई प्रमाणिक ऐतिहासिक विवरण उपलब्ध नहीं मिलता। यही कारण है कि उनके अंतिम जीवन एवं मृत्यु को लेकर इतिहासकारों में मतभेद पाया जाता है।

➣ कुछ कथाओं के अनुसार नाना साहब ने नेपाल अथवा उसके आसपास के क्षेत्रों में गुप्त रूप से जीवन व्यतीत किया, जबकि कुछ अन्य परंपराओं में उन्हें साधु के वेश में भारत के विभिन्न भागों में रहने की बात कही गई है।

➣ किन्तु इन कथाओं के समर्थन में पर्याप्त ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए मुख्यधारा के इतिहासकार उनके अंतिम जीवन को रहस्यमय मानते हैं।

➣ यद्यपि नाना साहब का अंतिम जीवन इतिहास के लिए रहस्य बना हुआ है, फिर भी 1857 की क्रांति में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

➣ उन्होंने कानपुर में अंग्रेजी सत्ता को गंभीर चुनौती दी, मराठा स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में नेतृत्व किया तथा क्रांति के प्रमुख राजनीतिक नेताओं में अपना स्थान स्थापित किया।

बाबू कुंवर सिंह (बिहार)

बिहार में 1857 की क्रांति का नेतृत्व बाबू कुंवर सिंह ने किया। लगभग 80 वर्ष की आयु में भी उन्होंने जिस साहस, नेतृत्व क्षमता और छापामार युद्ध-कौशल का परिचय दिया, वह भारतीय इतिहास में अद्वितीय माना जाता है। उन्होंने लगभग एक वर्ष तक अंग्रेजी सेना को निरंतर चुनौती दी।

इसी कारण उन्हें बिहार का सिंह कहा जाता है।

➣ बाबू कुंवर सिंह का जन्म 13 नवम्बर, 1777 को बिहार के वर्तमान भोजपुर जिले के जगदीशपुर में उज्जैनिया राजपूत परिवार में हुआ था।

➣ उनके पिता बाबू शाहबज़ादा सिंह (सामान्यतः शाहबज़ादा सिंह) जगदीशपुर रियासत के जमींदार थे। 1826 ई. में पिता की मृत्यु के बाद कुंवर सिंह जगदीशपुर रियासत के उत्तराधिकारी बने।

➣ अंग्रेजी शासन की कठोर भू-राजस्व नीति, प्रशासनिक हस्तक्षेप तथा स्थानीय जमींदारों के अधिकारों में लगातार हो रहे हस्तक्षेप के कारण कुंवर सिंह अंग्रेजों से असंतुष्ट थे। जब 1857 में उत्तर भारत में विद्रोह की ज्वाला फैली, तब उन्होंने भी अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष का नेतृत्व करने का निर्णय लिया।

➣ बिहार में 1857 की क्रांति का प्रारम्भ 25 जुलाई, 1857 को दानापुर की सैनिक छावनी से हुआ। यहाँ तैनात तीन देशी पैदल बटालियनों के भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।

➣ विद्रोह के बाद ये सैनिक सोन नदी पार करके जगदीशपुर पहुँचे और बाबू कुंवर सिंह के नेतृत्व में संगठित हो गए।

➣ विद्रोही सैनिकों एवं स्थानीय समर्थकों के सहयोग से कुंवर सिंह ने शीघ्र ही आरा की ओर कूच किया। उन्होंने आरा नगर पर अधिकार स्थापित कर लिया तथा अंग्रेजी प्रशासन को गंभीर चुनौती दी।

➣ बिहार में यह विद्रोह अंग्रेजों के लिए अत्यंत चिंताजनक था, क्योंकि आरा एवं दानापुर का क्षेत्र सैन्य तथा प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता था।

➣ आरा में कुछ अंग्रेज अधिकारी एवं यूरोपीय नागरिक आरा हाउस नामक भवन में शरण लेकर कई दिनों तक विद्रोहियों का सामना करते रहे। कुंवर सिंह की सेना ने इस भवन की घेराबंदी कर दी। यह घटना आरा की घेराबंदी के नाम से प्रसिद्ध है और 1857 की क्रांति की महत्वपूर्ण घटनाओं में गिनी जाती है।

➣ आरा में फँसे अंग्रेजों को बचाने के लिए भेजी गई कैप्टन डनबर के नेतृत्व वाली पहली अंग्रेजी टुकड़ी विद्रोहियों के घात लगाकर किए गए आक्रमण में पराजित हो गई। इस सफलता ने बिहार में क्रांतिकारियों का उत्साह बढ़ा दिया और अंग्रेजी प्रशासन को अतिरिक्त सेना भेजने के लिए विवश होना पड़ा।

➣ इसके बाद अंग्रेजों ने मेजर विंसेंट आयर के नेतृत्व में एक सशक्त सैन्य अभियान चलाया। बीबीगंज के निकट हुए युद्ध में अंग्रेजी सेना ने विद्रोहियों पर दबाव बनाया।

➣ परिस्थितियाँ प्रतिकूल होने पर कुंवर सिंह ने अपनी सेना को सुरक्षित निकाल लिया और अपने छोटे भाई अमर सिंह के साथ जगदीशपुर की ओर लौट गए।

➣ अंग्रेजों ने शीघ्र ही जगदीशपुर पर भी अधिकार कर लिया। ऐसी स्थिति में कुंवर सिंह ने खुली लड़ाई के स्थान पर छापामार (गुरिल्ला) युद्ध की नीति अपनाई।

➣ उन्होंने अपनी सेना को सुरक्षित रखते हुए बिहार से बाहर विभिन्न क्षेत्रों में विद्रोह का विस्तार करने का निर्णय लिया। यही रणनीति आगे चलकर अंग्रेजों के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिद्ध हुई।

छापामार अभियान, जगदीशपुर की विजय एवं वीरगति

जगदीशपुर से पीछे हटने के बाद बाबू कुंवर सिंह ने संघर्ष समाप्त नहीं किया। उन्होंने अपने छोटे भाई अमर सिंह के सहयोग से छापामार (गुरिल्ला) युद्ध की नीति अपना।

➣ अमर सिंह भोजपुर एवं आसपास के क्षेत्रों में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करते रहे, जबकि कुंवर सिंह ने व्यापक सैन्य अभियान का नेतृत्व किया।

➣ इस दौरान कुंवर सिंह ने रोहतास, मिर्जापुर, रीवा, बाँदा, आज़मगढ़, बनारस, बलिया, गाज़ीपुर, गोरखपुर तथा लखनऊ सहित अनेक क्षेत्रों में विद्रोहियों को संगठित किया। उनके अभियानों ने अंग्रेजों को एक साथ कई मोर्चों पर सेना लगाने के लिए विवश कर दिया।

मार्च, 1858 में बाबू कुंवर सिंह ने आज़मगढ़ पर अधिकार स्थापित कर अंग्रेजी शासन को गंभीर चुनौती दी। यह विजय पूर्वी उत्तर प्रदेश में क्रांतिकारियों की एक महत्वपूर्ण सफलता थी।

➣ यद्यपि अंग्रेजों ने शीघ्र ही अतिरिक्त सेना भेजकर स्थिति पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया, फिर भी कुंवर सिंह अपनी सेना को सुरक्षित निकालने में सफल रहे।

➣ आज़मगढ़ से वापस बिहार लौटते समय अंग्रेजी सेना ने उनका लगातार पीछा किया। गंगा नदी पार करते समय अंग्रेजों की एक गोली उनकी बाईं भुजा में लगी, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गई।

➣ संक्रमण पूरे शरीर में फैलने की आशंका को देखते हुए उन्होंने अद्भुत साहस का परिचय देते हुए अपनी घायल भुजा स्वयं तलवार से काट दी और उसे माँ गंगा को समर्पित कर दिया। यह घटना भारतीय इतिहास में उनके अदम्य साहस एवं आत्मबलिदान का प्रतीक मानी जाती है।

➣ गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद बाबू कुंवर सिंह ने अपना अभियान नहीं रोका। वे पुनः जगदीशपुर पहुँचे और अपनी सेना को संगठित किया। अंग्रेजों को यह सूचना मिलते ही ब्रिगेडियर ले ग्रांड के नेतृत्व में एक सैन्य दल जगदीशपुर भेजा गया।

23 अप्रैल, 1858 को जगदीशपुर के निकट दोनों सेनाओं के बीच निर्णायक युद्ध हुआ। इस युद्ध में बाबू कुंवर सिंह की सेना ने अंग्रेजों को पराजित कर जगदीशपुर पर पुनः अधिकार स्थापित कर लिया।

➣ यह 1857 की क्रांति के अंतिम चरण की सबसे उल्लेखनीय विजयों में से एक थी और इससे अंग्रेजों की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचा।

➣ युद्ध में पहले से घायल होने तथा उचित उपचार न मिल पाने के कारण उनकी स्थिति लगातार बिगड़ती गई। अंततः 26 अप्रैल, 1858 को लगभग 80 वर्ष की आयु में जगदीशपुर में उनका निधन हो गया।

➣ उनकी मृत्यु के बाद भी उनके भाई अमर सिंह ने कुछ समय तक बिहार में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा।

➣ बाबू कुंवर सिंह का योगदान केवल बिहार तक सीमित नहीं था। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सीमित संसाधनों एवं अत्यधिक आयु में भी प्रभावी नेतृत्व, जनसमर्थन और गुरिल्ला युद्ध-नीति के बल पर शक्तिशाली साम्राज्य को चुनौती दी जा सकती है। इसी कारण उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानतम सेनानायकों में स्थान दिया जाता है।

एस. एन. सेन के अनुसार, बाबू कुंवर सिंह ने अत्यंत वृद्धावस्था में भी जिस साहस और नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया, वह 1857 की क्रांति की सबसे प्रेरणादायक घटनाओं में से एक है।

▪ ब्रिटिश इतिहासकार टी. राइस होम्स ने स्वीकार किया कि यदि बाबू कुंवर सिंह युवा होते, तो बिहार में अंग्रेजों के लिए विद्रोह को दबाना कहीं अधिक कठिन हो सकता था।

मौलवी अहमदुल्ला शाह ( फैजाबाद )

मौलवी अहमदुल्ला शाह फैजाबादी 1857 की क्रांति के सबसे प्रभावशाली, दूरदर्शी एवं कुशल सैन्य नेताओं में से एक थे। उन्होंने विद्रोह प्रारम्भ होने से पहले ही अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जनमत तैयार करना आरम्भ कर दिया था।

➣उनकी संगठन क्षमता, ओजस्वी वाणी तथा युद्ध-कौशल के कारण अंग्रेज अधिकारी भी उनसे अत्यधिक भयभीत रहते थे। अनेक इतिहासकारों ने उन्हें 1857 के विद्रोह का प्रकाशस्तंभ कहा है।

➣ मौलवी अहमदुल्ला शाह का जन्म सामान्यतः 1787 ई. के आसपास माना जाता है। उनके प्रारम्भिक जीवन के संबंध में इतिहासकारों में मतभेद हैं, किन्तु वे आगे चलकर फैजाबाद के प्रमुख धार्मिक नेता एवं जननेता के रूप में प्रसिद्ध हुए।

➣जनता के बीच वे डंका शाह अथवा नक्कार शाह के नाम से भी विख्यात थे। कहा जाता है कि उनके आगमन की सूचना डंका (नगाड़ा) बजाकर दी जाती थी, जिससे बड़ी संख्या में लोग उनके प्रवचनों एवं सभाओं में एकत्रित हो जाते थे।

➣ विद्रोह से पूर्व मौलवी अहमदुल्ला शाह ने दक्षिण भारत के मद्रास सहित अनेक क्षेत्रों की यात्राएँ कीं। इस दौरान उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी की नीतियों तथा भारतीय समाज पर उसके बढ़ते प्रभाव का निकट से अध्ययन किया।

➣इसके बाद उन्होंने अरब, ईरान एवं इराक की यात्रा की और हज भी किया। भारत लौटने के बाद उन्होंने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जनजागरण को अपना प्रमुख उद्देश्य बना लिया।

फरवरी, 1857 में, अर्थात् मेरठ के विद्रोह से कई महीने पहले ही, मौलवी अहमदुल्ला शाह ने फैजाबाद में अपने समर्थकों का संगठन प्रारम्भ कर दिया।

वे नगर-नगर जाकर लोगों को अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संगठित होने का आह्वान करते थे। उनकी बढ़ती लोकप्रियता और सशस्त्र समर्थकों की संख्या को देखकर अंग्रेज अधिकारी चिंतित हो उठे।

➣ अंग्रेज प्रशासन ने उनसे अपने हथियार जमा कराने का आदेश दिया, किन्तु उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। परिणामस्वरूप अंग्रेज अधिकारियों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उस समय कर्नल लेनॉक्स के आदेश पर उन पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें मृत्युदंड देने का निर्णय लिया गया।

➣ मौलवी अहमदुल्ला शाह की गिरफ्तारी से फैजाबाद तथा आसपास के क्षेत्रों में भारी असंतोष फैल गया। 22वीं नेटिव इन्फैंट्री के भारतीय सैनिकों ने विद्रोह कर दिया, जेल पर धावा बोला और मौलवी अहमदुल्ला शाह को मुक्त करा लिया। इस घटना ने अवध में विद्रोह को नई दिशा प्रदान की।

➣ जेल से मुक्त होने के बाद मौलवी अहमदुल्ला शाह ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष को और अधिक संगठित किया। उन्होंने लोगों से विदेशी शासन का विरोध करने का आह्वान किया तथा धार्मिक एवं सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर संयुक्त रूप से संघर्ष करने पर बल दिया।

➣ उनके नेतृत्व में बड़ी संख्या में सैनिक, जमींदार, धार्मिक नेता एवं सामान्य जनता विद्रोह से जुड़ने लगी। मौलवी अहमदुल्ला शाह ने अंग्रेजों के विरुद्ध जिहाद का आह्वान किया, किन्तु उनका संघर्ष केवल धार्मिक आधार तक सीमित नहीं था।

➣ उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता को विद्रोह की सफलता के लिए आवश्यक माना और अनेक हिन्दू तथा मुस्लिम नेताओं के साथ मिलकर अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा तैयार किया।

अवध अभियान, शाहजहाँपुर में संघर्ष एवं हत्या

➣ फैजाबाद से मुक्त होने के बाद मौलवी अहमदुल्ला शाह ने अवध में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह को संगठित करने का कार्य तेज कर दिया। वे शीघ्र ही 1857 की क्रांति के सबसे प्रभावशाली सैन्य नेताओं में गिने जाने लगे।

➣ अवध में उन्होंने बेगम हजरत महल तथा उनके पुत्र बिरजिस क़द्र का समर्थन किया। जब वाजिद अली शाह के निर्वासन के बाद अवध में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध व्यापक विद्रोह हुआ, तब मौलवी अहमदुल्ला शाह ने विद्रोही सेनाओं को संगठित करने तथा विभिन्न क्रांतिकारी दलों के बीच समन्वय स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ मौलवी अहमदुल्ला शाह ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष के दौरान नाना साहब, खान बहादुर खाँ तथा अन्य प्रमुख क्रांतिकारी नेताओं के साथ भी सहयोग स्थापित किया। उनका उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों में चल रहे विद्रोहों को एक साझा संघर्ष के रूप में आगे बढ़ाना था।

➣ अवध में लगातार मिल रही चुनौतियों के बावजूद अंग्रेज मौलवी अहमदुल्ला शाह को कभी जीवित पकड़ नहीं सके। उनकी सैन्य गतिविधियों और बढ़ते प्रभाव से चिंतित होकर अंग्रेज सरकार ने उन्हें पकड़ने अथवा उनकी सूचना देने वाले के लिए 50,000 रुपये के इनाम की घोषणा की। उस समय यह अत्यंत बड़ी धनराशि थी।

➣ 1858 में मौलवी अहमदुल्ला शाह शाहजहाँपुर क्षेत्र में सक्रिय थे। उन्होंने यहाँ भी अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा और विद्रोहियों को संगठित किया। अंग्रेजों ने प्रत्यक्ष युद्ध में उन्हें पराजित करने के साथ-साथ स्थानीय शासकों की सहायता से उन्हें समाप्त करने की योजना बनाई।

➣ अंग्रेजों द्वारा घोषित इनाम के लालच में पुवायाँ रियासत के राजा जगन्नाथ सिंह ने मौलवी अहमदुल्ला शाह को सहायता और वार्ता के बहाने अपने यहाँ बुलाया।

➣ जब वे वहाँ पहुँचे, तब 5 जून, 1858 को विश्वासघातपूर्वक उन पर गोली चलवाकर उनकी हत्या कर दी गई। इसके बाद उनका सिर काटकर अंग्रेज अधिकारियों को सौंप दिया गया।

➣ अंग्रेजों ने जनता में भय उत्पन्न करने के उद्देश्य से मौलवी अहमदुल्ला शाह का कटा हुआ सिर शाहजहाँपुर कोतवाली के फाटक पर प्रदर्शित कराया।

➣ इस अमानवीय कृत्य के माध्यम से अंग्रेज अन्य क्रांतिकारियों को भयभीत करना चाहते थे, किन्तु इससे मौलवी अहमदुल्ला शाह का बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर हो गया।

जी. बी. मल्लेसन ने अपनी प्रसिद्ध कृति History of the Indian Mutiny में मौलवी अहमदुल्ला शाह को 1857 की क्रांति के सबसे योग्य एवं प्रभावशाली नेताओं में से एक बताते हुए उन्हें सच्चा देशभक्त कहा है।

खान बहादुर खान (रूहेलखण्ड)

रूहेलखण्ड (वर्तमान उत्तर प्रदेश का बरेली, रामपुर, बदायूँ, शाहजहाँपुर, पीलीभीत आदि क्षेत्र) 1857 की क्रांति का एक प्रमुख केन्द्र था। यहाँ विद्रोह का राजनीतिक नेतृत्व खान बहादुर खान ने किया, जबकि सैन्य नेतृत्व में बख्त खाँ की महत्वपूर्ण भूमिका रही। दोनों की भूमिकाएँ अलग-अलग थीं।

खान बहादुर खान का जन्म लगभग 1791 ई. में रूहेला शासक परिवार में हुआ था। वे प्रसिद्ध रूहेला सरदार हाफिज रहमत खाँ के पौत्र थे।

➣ 18वीं शताब्दी में हाफिज रहमत खाँ रूहेलखण्ड के प्रमुख शासकों में गिने जाते थे, किन्तु 1774 ई. के रोहिला युद्ध के बाद अंग्रेजों एवं अवध के नवाब की संयुक्त सेना ने रूहेला सत्ता का अंत कर दिया।

➣ इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ने खान बहादुर खान के मन में अंग्रेजी शासन के प्रति असंतोष की भावना को और गहरा किया।

➣ विद्रोह से पूर्व खान बहादुर खान अंग्रेजी प्रशासन में न्यायिक मजिस्ट्रेट के पद पर कार्य कर चुके थे। सेवा से निवृत्त होने के बाद उन्हें अंग्रेजी सरकार से पेंशन भी प्राप्त होती थी।

➣ प्रशासनिक अनुभव होने के कारण वे शासन व्यवस्था और अंग्रेजों की नीतियों से भली-भाँति परिचित थे।

➣ 1857 की क्रांति का समाचार जब उत्तर भारत में फैलने लगा, तब रूहेलखण्ड में भी अंग्रेजी शासन के विरुद्ध असंतोष तीव्र हो गया। स्थानीय सैनिकों, जमींदारों तथा आम जनता ने खान बहादुर खान के नेतृत्व में संगठित होकर विद्रोह की तैयारी प्रारम्भ कर दी।

31 मई, 1857 को बरेली छावनी में विद्रोह भड़क उठा। भारतीय सैनिकों ने अंग्रेज अधिकारियों पर आक्रमण कर दिया और देखते ही देखते अंग्रेजी प्रशासन का नियंत्रण समाप्त हो गया। बरेली में विद्रोह की सफलता के बाद अंग्रेज अधिकारी अपने परिवारों सहित नैनीताल की ओर भाग गए।

➣ विद्रोह के सफल होने के बाद खान बहादुर खान ने रूहेलखण्ड में स्वतंत्र शासन की स्थापना की और स्वयं को रूहेलखण्ड का नवाब घोषित किया। उन्होंने मुगल सम्राट बहादुरशाह द्वितीय के नाम पर शासन चलाने की घोषणा की, जिससे विद्रोह को वैध राजनीतिक आधार प्राप्त हुआ।

➣ शासन व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए खान बहादुर खान ने अपने विश्वस्त सहयोगी मुंशी शोभाराम को प्रशासनिक कार्यों में महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा।

➣उन्होंने राजस्व वसूली, न्याय व्यवस्था तथा कानून-व्यवस्था को पुनर्गठित करने का प्रयास किया। यह दर्शाता है कि उनका उद्देश्य केवल अंग्रेजों को हटाना नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित प्रशासन स्थापित करना भी था।

➣ खान बहादुर खान ने लगभग 40,000 सैनिकों की सेना संगठित की। इस सेना में नियमित सैनिकों के अतिरिक्त स्थानीय जमींदारों, स्वयंसेवकों तथा ग्रामीण युवकों ने भी भाग लिया। उन्होंने हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों को साथ लेकर अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष को व्यापक जनआंदोलन का स्वरूप देने का प्रयास किया।

➣ कुछ ही समय में बरेली सहित अधिकांश रूहेलखण्ड अंग्रेजी शासन से मुक्त हो गया। यह क्षेत्र उत्तर भारत में विद्रोहियों का एक महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया, जहाँ से आगे की सैन्य एवं राजनीतिक गतिविधियों का संचालन किया जाने लगा।

➣ इसी दौरान बरेली के तोपखाने के सूबेदार बख्त खाँ ने भी सैन्य नेतृत्व संभाला और आगे चलकर दिल्ली की ओर प्रस्थान किया।

बख्त खाँ का नेतृत्व एवं दिल्ली अभियान

बख्त खाँ 1857 की क्रांति के सबसे कुशल सैन्य नेताओं में से एक थे। यद्यपि उनका नाम प्रायः खान बहादुर खान के साथ लिया जाता है, किन्तु दोनों की भूमिकाएँ भिन्न थीं।

➣ जहाँ खान बहादुर खान ने रूहेलखण्ड में राजनीतिक एवं प्रशासनिक नेतृत्व संभाला, वहीं बख्त खाँ ने विद्रोही सेना के प्रमुख सैन्य सेनानायक के रूप में कार्य किया।

➣ बख्त खाँ विद्रोह से पूर्व बरेली के तोपखाने में सूबेदार के पद पर कार्यरत थे। वे एक अनुभवी सैनिक थे और प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध सहित अनेक सैन्य अभियानों में भाग ले चुके थे। लंबे सैन्य अनुभव के कारण उन्हें तोपखाने, सैन्य अनुशासन तथा युद्ध संचालन का गहरा ज्ञान था।

31 मई, 1857 को जब बरेली छावनी में विद्रोह प्रारम्भ हुआ, तब बख्त खाँ ने तोपखाने तथा भारतीय सैनिकों का नेतृत्व किया।

18वीं एवं 68वीं नेटिव इन्फैंट्री के सैनिकों ने उनके नेतृत्व में अंग्रेज अधिकारियों पर आक्रमण किया। विद्रोह की सफलता के बाद बरेली अंग्रेजी शासन से मुक्त हो गया और रूहेलखण्ड में खान बहादुर खान की सरकार स्थापित हुई।

➣ रूहेलखण्ड में व्यवस्था स्थापित होने के बाद बख्त खाँ ने यह समझा कि यदि दिल्ली में विद्रोह को सुदृढ़ नहीं किया गया, तो अंग्रेजों को पराजित करना कठिन होगा। इसलिए उन्होंने अपनी सेना तथा लगभग चार हजार स्वयंसेवकों के साथ दिल्ली की ओर प्रस्थान किया।

1 जुलाई, 1857 को बख्त खाँ अपनी सेना सहित दिल्ली पहुँचे। उनकी सैन्य योग्यता से प्रभावित होकर मुगल सम्राट बहादुरशाह द्वितीय ने उन्हें विद्रोही सेना का सर्वोच्च सैन्य नेतृत्व सौंप दिया। उन्हें साहब-ए-आलम बहादुर की उपाधि प्रदान की गई तथा वे विद्रोही सेना के कमांडर-इन-चीफ बन गए।

➣ दिल्ली पहुँचने के बाद बख्त खाँ ने विद्रोही सेना में अनुशासन स्थापित करने, रसद व्यवस्था सुधारने तथा विभिन्न क्रांतिकारी दलों के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया।

➣ उन्होंने सैनिकों को नियमित वेतन देने, हथियारों के समुचित उपयोग तथा युद्ध संचालन को अधिक व्यवस्थित बनाने पर विशेष बल दिया।

➣ प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए बख्त खाँ ने कोर्ट ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस परिषद् का उद्देश्य विद्रोही प्रशासन को संगठित करना, सैन्य एवं नागरिक मामलों का संचालन करना तथा सम्राट बहादुरशाह द्वितीय को प्रशासनिक सहयोग प्रदान करना था।

➣ दिल्ली में बख्त खाँ का प्रभाव बढ़ने के साथ ही शाही परिवार के कुछ सदस्यों, विशेषकर मिर्जा मुगल, के साथ उनके मतभेद भी सामने आए।

➣ बख्त खाँ सैन्य निर्णयों में अनुशासन और व्यावहारिक रणनीति के पक्षधर थे, जबकि दरबार के कुछ लोग परंपरागत अधिकार बनाए रखना चाहते थे। इन मतभेदों का विद्रोह की एकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

सितम्बर, 1857 में अंग्रेजों ने दिल्ली पर निर्णायक आक्रमण किया। लंबे संघर्ष के बाद 20 सितम्बर, 1857 को दिल्ली पर पुनः अंग्रेजों का अधिकार हो गया। इसके बाद भी बख्त खाँ ने आत्मसमर्पण नहीं किया।

➣ वे दिल्ली से निकलकर अवध, लखनऊ तथा शाहजहाँपुर क्षेत्र में अन्य क्रांतिकारी नेताओं के साथ संघर्ष जारी रखते रहे।

इतिहासकारों की दृष्टि में

एस. एन. सेन के अनुसार, बख्त खाँ 1857 की क्रांति के सबसे सक्षम सैन्य नेताओं में से एक थे, जिन्होंने दिल्ली में विद्रोही सेना को संगठित करने का गंभीर प्रयास किया।

जी. बी. मल्लेसन ने बख्त खाँ को अनुभवी सैनिक बताते हुए लिखा है कि यदि उन्हें पर्याप्त सहयोग मिला होता, तो दिल्ली में विद्रोह अधिक समय तक टिक सकता था।

आर. सी. मजूमदार के अनुसार, बख्त खाँ ने विद्रोही सेना में अनुशासन एवं संगठन स्थापित करने का उल्लेखनीय प्रयास किया, किन्तु आंतरिक मतभेदों और संसाधनों की कमी के कारण उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी।

बेगम हजरत महल (अवध)

लखनऊ, जो तत्कालीन अवध की राजधानी था। अवध के विलय के कारण यहाँ अंग्रेजों के प्रति असंतोष अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक था। इसी असंतोष का नेतृत्व बेगम हजरत महल ने किया, जिन्होंने नेतृत्व क्षमता का परिचय देते हुए अंग्रेजी शासन को कड़ी चुनौती दी।

➣ बेगम हजरत महल का मूल नाम मुहम्मदी खानम था। प्रारम्भिक जीवन में उन्हें महकपरी की उपाधि प्राप्त हुई और बाद में अवध के नवाब वाजिद अली शाह से विवाह के उपरांत वे बेगम हजरत महल के नाम से प्रसिद्ध हुईं।

➣ यद्यपि वे शाही परिवार में जन्मी नहीं थीं, फिर भी अपनी बुद्धिमत्ता, नेतृत्व क्षमता और राजनीतिक कौशल के बल पर उन्होंने अवध की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया।

1856 ई. में गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने कुशासन का आरोप लगाकर अवध का अंग्रेजी साम्राज्य में विलय कर लिया।

➣ इसके बाद नवाब वाजिद अली शाह को कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) निर्वासित कर दिया गया। इस घटना से अवध के सैनिकों, तालुकेदारों, जमींदारों तथा सामान्य जनता में अंग्रेजों के प्रति गहरा असंतोष उत्पन्न हो गया।

➣ वाजिद अली शाह के निर्वासन के बाद बेगम हजरत महल ने लखनऊ में रहकर अंग्रेजों के विरुद्ध प्रतिरोध का नेतृत्व अपने हाथों में लिया। उन्होंने अवध के असंतुष्ट सैनिकों, तालुकेदारों, धार्मिक नेताओं तथा स्थानीय जनता को संगठित कर अंग्रेजी शासन के विरुद्ध व्यापक आंदोलन प्रारम्भ किया।

4 जून, 1857 को लखनऊ में विद्रोह प्रारम्भ हुआ। शीघ्र ही अवध के अनेक भागों में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध क्रांतिकारी गतिविधियाँ फैल गईं।

➣ विद्रोहियों ने बेगम हजरत महल को अपना नेता स्वीकार किया और उन्होंने अवध के राजनीतिक तथा सैन्य नेतृत्व की बागडोर अपने हाथों में संभाल ली।

➣ बेगम हजरत महल ने अपने अल्पायु पुत्र बिरजिस क़द्र को अवध का शासक (वली/नवाब) घोषित किया तथा स्वयं उसकी संरक्षिकाबनकर शासन का संचालन किया।

➣ उन्होंने मुगल सम्राट बहादुरशाह द्वितीय की सर्वोच्चता को स्वीकार करते हुए उनके नाम पर शासन चलाया, जिससे विद्रोह को वैध राजनीतिक आधार प्राप्त हुआ।

➣ शासन व्यवस्था को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए बेगम हजरत महल ने अपने विश्वस्त सहयोगियों तथा अवध के प्रमुख सरदारों को प्रशासनिक दायित्व सौंपे।

➣ उनके शासन में राजा बालकृष्ण जैसे हिन्दू अधिकारियों को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ दी गईं, जिससे स्पष्ट होता है कि उनका आंदोलन धार्मिक नहीं, बल्कि अंग्रेजी शासन के विरुद्ध व्यापक राजनीतिक संघर्ष था।

➣ बेगम हजरत महल हिन्दू-मुस्लिम एकता की प्रबल समर्थक थीं। उन्होंने अपने घोषणापत्रों और सार्वजनिक संदेशों में दोनों समुदायों से अंग्रेजों के विरुद्ध मिलकर संघर्ष करने का आह्वान किया।

➣ उनका मानना था कि अंग्रेज भारतीय समाज में फूट डालकर शासन करना चाहते हैं और उनकी इस नीति का संयुक्त रूप से विरोध किया जाना चाहिए।

➣ समकालीन विवरणों के अनुसार बेगम हजरत महल अनेक अवसरों पर स्वयं युद्ध क्षेत्र में पहुँचकर सैनिकों का उत्साहवर्धन करती थीं। वे हाथी पर सवार होकर सेना का निरीक्षण करती थीं तथा संकट की परिस्थितियों में भी अपने सैनिकों का मनोबल बनाए रखती थीं।

लखनऊ रेजीडेन्सी की घेराबंदी एवं द्वितीय राहत

➣ लखनऊ में विद्रोह के प्रारम्भ के बाद अंग्रेज अधिकारियों तथा यूरोपीय नागरिकों ने ब्रिटिश रेजीडेन्सी में शरण ली। यह भवन अंग्रेजी प्रशासन का प्रमुख केन्द्र था। शीघ्र ही विद्रोही सैनिकों ने रेजीडेन्सी को चारों ओर से घेर लिया।

➣ यह घेराबंदी लगभग पाँच महीने तक चली और 1857 की क्रांति की सबसे लंबी एवं सबसे प्रसिद्ध सैन्य घटनाओं में गिनी जाती है।

➣ उस समय अवध के मुख्य आयुक्त सर हेनरी लॉरेन्स रेजीडेन्सी की सुरक्षा का नेतृत्व कर रहे थे। 2 जुलाई, 1857 को विद्रोहियों द्वारा दागे गए एक तोप के गोले से वे गंभीर रूप से घायल हो गए।

दो दिन बाद, 4 जुलाई, 1857 को उनकी मृत्यु हो गई।

➣ हेनरी लॉरेन्स की मृत्यु के बाद ब्रिगेडियर जॉन इंग्लिस ने रेजीडेन्सी की रक्षा की कमान संभाली। सीमित सैनिकों, भोजन तथा गोला-बारूद के बावजूद उन्होंने घिरे हुए अंग्रेजों का नेतृत्व किया।

➣ दूसरी ओर बेगम हजरत महल के नेतृत्व में विद्रोही सेनाएँ लगातार रेजीडेन्सी पर आक्रमण करती रहीं और अंग्रेजों को आत्मसमर्पण के लिए विवश करने का प्रयास करती रहीं।

➣ इस संघर्ष में मौलवी अहमदुल्ला शाह, अवध के अनेक तालुकेदारों तथा स्थानीय क्रांतिकारी नेताओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विद्रोहियों ने रेजीडेन्सी तक पहुँचने वाले मार्गों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर अंग्रेजों की रसद एवं संचार व्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित कर दिया।

➣ रेजीडेन्सी में फँसे अंग्रेजों को बचाने के लिए जनरल हेनरी हैवलॉक तथा सर जेम्स आउट्रम कानपुर से सेना लेकर लखनऊ की ओर बढ़े।

➣ अनेक संघर्षों के बाद वे 25 सितम्बर, 1857 को रेजीडेन्सी तक पहुँचने में सफल तो हो गए, किन्तु वे वहाँ फँसे अंग्रेजों को सुरक्षित बाहर निकालने में असफल रहे। परिणामस्वरूप वे स्वयं भी घिरी हुई सेना का हिस्सा बन गए। इस घटना को लखनऊ की प्रथम राहत कहा जाता है।

➣ लखनऊ की स्थिति लगातार गंभीर बनी रही। अंग्रेज सैनिक अभी भी विद्रोहियों से घिरे हुए थे और उन्हें बाहर निकालने के लिए एक बड़े सैन्य अभियान की आवश्यकता थी। इस उद्देश्य से भारत के कमांडर-इन-चीफ सर कॉलिन कैम्पबेल ने नई सेना संगठित कर लखनऊ की ओर प्रस्थान किया।

नवंबर, 1857 में सर कॉलिन कैम्पबेल लखनऊ पहुँचे और कठिन युद्ध के बाद रेजीडेन्सी में फँसे अंग्रेज अधिकारियों, सैनिकों तथा नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकालने में सफल रहे। इस अभियान को लखनऊ की द्वितीय राहत कहा जाता है।

➣ यद्यपि अंग्रेजों ने अपने लोगों को बचा लिया, लेकिन उस समय उन्होंने पूरे लखनऊ पर पुनः अधिकार स्थापित नहीं किया था और नगर का अधिकांश भाग अब भी विद्रोहियों के नियंत्रण में रहा।

➣ बेगम हजरत महल, बिरजिस क़द्र, मौलवी अहमदुल्ला शाह तथा अन्य क्रांतिकारी नेताओं ने अवध के विभिन्न क्षेत्रों में संघर्ष जारी रखा और अंग्रेजों के विरुद्ध प्रतिरोध को जीवित रखा।

➣ लखनऊ अभियान के दौरान अंग्रेजों को भी भारी क्षति उठानी पड़ी। जनरल जेम्स जॉर्ज स्मिथ नील की 25 सितम्बर, 1857 को लखनऊ में युद्ध के दौरान मृत्यु हो गई, जबकि जनरल हैवलॉक की 24 नवम्बर, 1857 को लखनऊ में पेचिश से मृत्यु हो गई। इससे स्पष्ट होता है कि लखनऊ का अभियान अंग्रेजों के लिए भी अत्यंत कठिन सिद्ध हुआ।

एस. एन. सेन के अनुसार, लखनऊ की घेराबंदी 1857 की क्रांति का सबसे लंबा एवं सबसे संगठित सैन्य अभियान थी, जिसमें विद्रोहियों ने अंग्रेजों को कई महीनों तक रक्षात्मक स्थिति में बनाए रखा।

विद्रोह का दमन एवं लखनऊ का पतन

➣ विद्रोह को पूरी तरह समाप्त करने के उद्देश्य से भारत के कमांडर-इन-चीफ सर कॉलिन कैम्पबेल ने 1858 के प्रारम्भ में एक व्यापक सैन्य अभियान चलाया। इस अभियान में नेपाल के प्रधानमंत्री जंग बहादुर राणा के नेतृत्व में आई गोरखा सेना ने भी अंग्रेजों का साथ दिया।

➣ लंबे और भीषण संघर्ष के बाद 21 मार्च, 1858 को अंग्रेजों ने लखनऊ पर पुनः पूर्ण अधिकार स्थापित कर लिया। इसके साथ ही अवध में संगठित विद्रोह का प्रमुख केन्द्र अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया, यद्यपि ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक स्थानों पर प्रतिरोध कुछ समय तक जारी रहा।

➣ लखनऊ के पतन के बाद भी बेगम हजरत महल ने आत्मसमर्पण स्वीकार नहीं किया। वे अपने पुत्र बिरजिस क़द्र तथा कुछ विश्वस्त सहयोगियों के साथ अवध के विभिन्न भागों में संघर्ष करती रहीं। बाद में परिस्थितियाँ अत्यंत प्रतिकूल हो जाने पर उन्हें नेपाल की ओर प्रस्थान करना पड़ा।

➣ प्रारम्भ में नेपाल के शासक जंग बहादुर राणा ने उन्हें शरण देने से इनकार कर दिया, क्योंकि वे अंग्रेजों से अपने संबंधों को खराब नहीं करना चाहते थे। बाद में मानवीय आधार पर उन्हें नेपाल में रहने की अनुमति प्रदान कर दी गई।

➣ बेगम हजरत महल ने अपना शेष जीवन काठमांडू में अपेक्षाकृत गुमनामी में बिताया। 7 अप्रैल, 1879 को काठमांडू में ही बेगम हजरत महल का निधन हो गया। उन्हें वहाँ की जामा मस्जिद के परिसर में दफनाया गया।

1 नवम्बर, 1858 को महारानी विक्टोरिया की घोषणा के बाद बेगम हजरत महल ने उसका सार्वजनिक रूप से विरोध किया। उन्होंने अपने प्रतिघोषणापत्र में अंग्रेजी सरकार के वादों पर अविश्वास व्यक्त करते हुए भारतीय जनता से विदेशी शासन के वास्तविक स्वरूप को पहचानने का आग्रह किया।

➣ 1857 की क्रांति में भाग लेने वाले सैनिकों की सबसे बड़ी संख्या अवध से थी। बंगाल सेना में अवध के सैनिकों की अधिक भर्ती होने के कारण अंग्रेज स्वयं इस क्षेत्र को सैनिकों की पौधशाला कहा करते थे। यही कारण था कि अवध का विद्रोह अंग्रेजों के लिए सबसे कठिन चुनौतियों में से एक सिद्ध हुआ।

1856 — अवध का अंग्रेजी साम्राज्य में विलय; वाजिद अली शाह का निर्वासन।
4 जून, 1857 — लखनऊ में विद्रोह का प्रारम्भ।

बिरजिस क़द्र — अवध के नवाब (वली) घोषित किए गए।
> ▪ 21 मार्च, 1858 — अंग्रेजों ने लखनऊ पर पुनः अधिकार किया।
अवध की प्रसिद्ध उपाधिसैनिकों की पौधशाला

अन्य प्रमुख विद्रोह

1857 के विद्रोह की आग केवल उत्तर भारत के बड़े केन्द्रों तक सीमित नहीं रही, बल्कि असम से लेकर राजस्थान, पंजाब, उड़ीसा और दक्षिण भारत तक इसकी चिंगारियां फैलीं, यद्यपि इनमें से अधिकांश विद्रोह शीघ्र ही कुचल दिये गये।

रोहतक (हरियाणा) में राव तुलाराम तथा गोपाल देव ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष का नेतृत्व किया। राव तुलाराम ने नसीबपुर (नारनौल) के युद्ध (16 नवम्बर, 1857) में अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया। पराजय के बाद वे अफगानिस्तान और ईरान की ओर चले गए, जहाँ 1863 ई. में उनका निधन हो गया।

नसीराबाद (राजस्थान) की सैन्य छावनी में 28 मई, 1857 को भारतीय सैनिकों ने विद्रोह कर दिल्ली की ओर कूच किया। यह राजस्थान में 1857 की क्रांति का पहला प्रमुख सैनिक विद्रोह माना जाता है।

नीमच (राजस्थान) की छावनी में 3 जून, 1857 को सैनिकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया। विद्रोही सैनिक चित्तौड़, शाहपुरा तथा निम्बाहेड़ा होते हुए दिल्ली पहुँचे और वहाँ की क्रांतिकारी सेना में सम्मिलित हो गए।

झेलम (पंजाब) में 7 जुलाई, 1857 को भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह किया। यहाँ अंग्रेजों और भारतीय सैनिकों के बीच भीषण संघर्ष हुआ, जिसमें दोनों पक्षों को भारी क्षति उठानी पड़ी।

सियालकोट (पंजाब) में 9 जुलाई, 1857 को भारतीय सैनिकों ने विद्रोह कर अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी। बाद में अंग्रेजों ने इस विद्रोह को कठोर सैन्य कार्रवाई द्वारा दबा दिया।

धार (मध्य भारत) में स्थानीय शासक परिवार तथा क्रांतिकारी सैनिकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया। धार का किला कुछ समय तक विद्रोहियों के नियंत्रण में रहा, किन्तु बाद में अंग्रेजों ने उसे पुनः अपने अधिकार में ले लिया।

सागर एवं दमोह (मध्य प्रदेश) में भी 1857 के दौरान सैनिकों तथा स्थानीय सरदारों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया। बुन्देलखण्ड के क्रांतिकारियों के सहयोग से यह क्षेत्र कई महीनों तक अशांत बना रहा।

नरगुन्द (कर्नाटक) के शासक बाबासाहेब भावे (भास्करराव भावे) ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया। उन्होंने अंग्रेज अधिकारी मैनसन (Manson) की हत्या कर दी, किन्तु बाद में अंग्रेजों ने उन्हें पकड़कर 1858 ई. में फाँसी दे दी।

शोरापुर (वर्तमान कर्नाटक) के राजा वेंकटप्पा नायक ने भी 1857 के विद्रोह का समर्थन किया। अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद उन्होंने आत्मसमर्पण के स्थान पर आत्महत्या करना अधिक उचित समझा।

त्रिपुरा तथा छोटानागपुर के कुछ क्षेत्रों में भी स्थानीय स्तर पर अंग्रेज-विरोधी गतिविधियाँ हुईं, किन्तु संसाधनों एवं व्यापक संगठन के अभाव में ये आंदोलन शीघ्र ही समाप्त हो गए।

1857 की क्रांति के प्रमुख विद्रोह केन्द्र, नेतृत्वकर्ता एवं दमनकर्ता

विद्रोह का केन्द्र प्रमुख नेतृत्वकर्ता मुख्य अवधि (कालक्रम) प्रमुख दमनकर्ता / अंग्रेज सेनापति
मेरठ विद्रोही सैनिक (3rd लाइट कैवेलरी) 10 मई, 1857 जनरल हेविट
दिल्ली बहादुरशाह द्वितीय, बख्त खाँ 11 मई – 20 सितम्बर, 1857 आर्चडेल विल्सन, जॉन निकल्सन, विलियम हडसन
कानपुर नाना साहब, तात्या टोपे 5 जून – 6 दिसम्बर, 1857 हेवलॉक, नील, कॉलिन कैम्पबेल
लखनऊ बेगम हजरत महल, बिरजिस क़द्र 4 जून, 1857 – 21 मार्च, 1858 हेवलॉक, आउट्रम, कॉलिन कैम्पबेल
झाँसी रानी लक्ष्मीबाई जून, 1857 – अप्रैल, 1858 सर ह्यू रोज़
ग्वालियर रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, राव साहब जून, 1858 सर ह्यू रोज़
कालपी रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, राव साहब मई, 1858 सर ह्यू रोज़
बिहार (जगदीशपुर) बाबू कुंवर सिंह, अमर सिंह जुलाई, 1857 – अप्रैल, 1858 मेजर विंसेंट आयर, ले ग्रांड
आज़मगढ़ बाबू कुंवर सिंह मार्च – अप्रैल, 1858 ब्रिटिश सेना
बरेली (रूहेलखण्ड) खान बहादुर खान 31 मई, 1857 – मई, 1858 कॉलिन कैम्पबेल
दिल्ली अभियान बख्त खाँ जुलाई – सितम्बर, 1857 अंग्रेजी सेना
फैजाबाद मौलवी अहमदुल्ला शाह 1857 – जून, 1858 राजा जगन्नाथ सिंह के विश्वासघात से अंग्रेज सफल हुए
शाहजहाँपुर मौलवी अहमदुल्ला शाह, नाना साहब 1858 कॉलिन कैम्पबेल
इलाहाबाद लियाकत अली जून, 1857 कर्नल नील
बनारस स्थानीय विद्रोही सैनिक जून, 1857 कर्नल नील
फतेहपुर अजीमुल्ला खाँ 1857 हेवलॉक
फर्रुखाबाद तफ़ज्जुल हुसैन खाँ 1857–58 कॉलिन कैम्पबेल
बिजनौर नवाब महमूद खाँ 1857–58 अंग्रेजी सेना
इटावा राजा निरंजन सिंह 1857 अंग्रेजी सेना
अलीगढ़ स्थानीय विद्रोही सैनिक 1857 अंग्रेजी सेना
मथुरा देवी सिंह 1857 अंग्रेजी सेना
नसीराबाद (राजस्थान) भारतीय सैनिक 28 मई, 1857 अंग्रेजी सेना
नीमच (मध्य भारत) भारतीय सैनिक 3 जून, 1857 अंग्रेजी सेना
कोटा मेहराब खाँ, लाला जयदयाल अक्टूबर, 1857 – मार्च, 1858 जनरल रॉबर्ट्स
आरा बाबू कुंवर सिंह जुलाई–अगस्त, 1857 मेजर विंसेंट आयर

1857 ई. की क्रांति : महत्त्वपूर्ण तिथियाँ

तिथि घटना
29 मार्च, 1857 बैरकपुर में मंगल पांडे द्वारा विद्रोह का प्रथम प्रयास।
8 अप्रैल, 1857 मंगल पांडे को फाँसी दी गई।
24 अप्रैल, 1857 मेरठ में 85 भारतीय सैनिकों ने चर्बीयुक्त कारतूस प्रयोग करने से इंकार किया।
9 मई, 1857 मेरठ के 85 सैनिकों को कठोर कारावास एवं सार्वजनिक अपमान का दण्ड दिया गया।
10 मई, 1857 मेरठ से 1857 की क्रांति का वास्तविक प्रारम्भ।
11 मई, 1857 विद्रोही सैनिक दिल्ली पहुँचे तथा बहादुरशाह द्वितीय को भारत का सम्राट घोषित किया।
30 मई, 1857 लखनऊ में व्यापक विद्रोह प्रारम्भ।
31 मई, 1857 बरेली (रूहेलखण्ड) में खान बहादुर खान के नेतृत्व में विद्रोह।
5 जून, 1857 कानपुर में नाना साहब के नेतृत्व में विद्रोह।
6 जून, 1857 झाँसी में विद्रोह प्रारम्भ।
25 जुलाई, 1857 दानापुर छावनी के सैनिकों ने विद्रोह कर कुँवर सिंह का साथ दिया।
2 जुलाई, 1857 लखनऊ में हेनरी लॉरेन्स घायल हुए।
4 जुलाई, 1857 हेनरी लॉरेन्स की मृत्यु।
1 जुलाई, 1857 बख्त खाँ बरेली से दिल्ली पहुँचे।
25 सितम्बर, 1857 हेवलॉक एवं आउट्रम द्वारा लखनऊ की प्रथम राहत।
20 सितम्बर, 1857 दिल्ली पर अंग्रेजों का पुनः अधिकार।
21 सितम्बर, 1857 बहादुरशाह द्वितीय ने आत्मसमर्पण किया; बाद में गिरफ्तार किए गए।
22 सितम्बर, 1857 हडसन ने मुगल शहजादों की हत्या की।
25 सितम्बर, 1857 जनरल नील की लखनऊ में मृत्यु।
24 नवम्बर, 1857 जनरल हैवलॉक की लखनऊ में पेचिश से मृत्यु।
6 दिसम्बर, 1857 कॉलिन कैम्पबेल ने कानपुर पर पुनः अधिकार किया।
मार्च, 1858 सर कॉलिन कैम्पबेल का अंतिम लखनऊ अभियान।
21 मार्च, 1858 लखनऊ पर अंग्रेजों का पूर्ण अधिकार।
3 अप्रैल, 1858 झाँसी पर अंग्रेजों का अधिकार।
23 अप्रैल, 1858 कुँवर सिंह ने जगदीशपुर में अंग्रेजों को पराजित किया।
26 अप्रैल, 1858 बाबू कुँवर सिंह का निधन।
22 मई, 1858 कालपी पर अंग्रेजों का अधिकार।
1 जून, 1858 क्रांतिकारियों ने ग्वालियर पर अधिकार किया।
5 जून, 1858 मौलवी अहमदुल्ला शाह की हत्या।
17 जून, 1858 कोटा-की-सराय के युद्ध में रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं।
20 जून, 1858 ग्वालियर पर अंग्रेजों का पुनः अधिकार।
1 नवम्बर, 1858 महारानी विक्टोरिया की घोषणा
18 अप्रैल, 1859 तात्या टोपे को शिवपुरी में फाँसी दी गई।

अंग्रेजों का साथ देने वाली रियासतें एवं शासक

1857 का विद्रोह एक अखिल भारतीय जनक्रांति नहीं बन सका, इसका एक बड़ा कारण यह भी था कि अनेक बड़ी देशी रियासतों व सामंतों ने विद्रोह का दमन करने में अंग्रेजों को सक्रिय सैन्य व आर्थिक सहयोग दिया।

ग्वालियर के महाराजा जयाजीराव सिंधिया ने विद्रोह के दौरान अंग्रेजों के प्रति निष्ठा बनाए रखी। उनके योग्य दीवान सर दिनकर राव ने अपनी प्रशासनिक क्षमता एवं कूटनीतिक सूझबूझ से ग्वालियर राज्य को विद्रोह से दूर रखा।

➣ यद्यपि ग्वालियर की सेना का एक बड़ा भाग बाद में तात्या टोपे और रानी लक्ष्मीबाई से जा मिला, फिर भी सिंधिया स्वयं अंग्रेजों के पक्ष में बने रहे और अंततः अंग्रेजों ने उन्हीं की सहायता से ग्वालियर पर पुनः अधिकार स्थापित किया।

पंजाब की प्रमुख सिख रियासतों-पटियाला, नाभा और जींद—ने भी अंग्रेजों को सैनिक तथा रसद संबंधी सहायता प्रदान की। इन रियासतों के सहयोग से अंग्रेजों ने दिल्ली की ओर सेना, हथियार और आपूर्ति भेजी। इसी प्रकार कपूरथला के शासक ने भी अंग्रेजी सरकार का समर्थन किया।

➣ पंजाब के मुख्य आयुक्त सर जॉन लॉरेन्स ने भी अंग्रेजों की विजय में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने पंजाब को शांत बनाए रखा तथा वहाँ से बड़ी संख्या में सैनिक, घोड़े, हथियार और रसद दिल्ली भेजी। इन्हीं संसाधनों के बल पर अंग्रेज दिल्ली पर पुनः अधिकार स्थापित करने में सफल हुए।

इंदौर के तुकोजीराव होल्कर द्वितीय ने भी अंग्रेजों का साथ दिया। यद्यपि इंदौर में सैनिक विद्रोह हुआ, किन्तु होल्कर ने खुलकर विद्रोहियों का समर्थन नहीं किया और अंततः अंग्रेजी सत्ता के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी।

हैदराबाद के निज़ाम के प्रधानमंत्री सर सालारजंग प्रथम (मीर तुराब अली ख़ाँ) ने अंग्रेजों के सबसे महत्वपूर्ण सहयोगियों में स्थान प्राप्त किया।

➣ इतिहासकारों का मत है कि यदि हैदराबाद अंग्रेजों के विरुद्ध हो जाता, तो दक्षिण भारत की स्थिति अंग्रेजों के लिए अत्यंत संकटपूर्ण हो सकती थी।

भोपाल की शासिका सिकंदर बेगम ने भी अंग्रेजों का सक्रिय समर्थन किया। उन्होंने विद्रोहियों को किसी प्रकार की सहायता नहीं दी तथा अंग्रेजी प्रशासन के साथ सहयोग बनाए रखा। इसी प्रकार रामपुर के नवाब यूसुफ अली ख़ाँ ने भी अंग्रेजों को सैनिक एवं प्रशासनिक सहायता प्रदान की।

कश्मीर के महाराजा गुलाब सिंह तथा जोधपुर के महाराजा तख्त सिंह ने भी अंग्रेजों के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी।

➣ इनके अतिरिक्त जयपुर, बीकानेर, अलवर, भरतपुर, सिरोही, मेवाड़ (उदयपुर), बूंदी, रीवा, अजयगढ़, बिजावर तथा अनेक अन्य रियासतों ने प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से अंग्रेजों का सहयोग किया।

नेपाल के प्रधानमंत्री सर जंग बहादुर राणा ने अंग्रेजों को सबसे महत्वपूर्ण सैन्य सहायता प्रदान की। उन्होंने गोरखा सैनिकों की टुकड़ियाँ अंग्रेजों की सहायता के लिए भेजीं।

➣ इन्हीं गोरखा सैनिकों ने मार्च 1858 में सर कॉलिन कैम्पबेल के नेतृत्व में लखनऊ पर पुनः अधिकार स्थापित करने के अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पटियाला, नाभा तथा जींद जैसी सिख रियासतों ने भी अंग्रेजों को सैनिक सहायता, रसद, घोड़े तथा संचार सुविधाएँ उपलब्ध कराईं।

➣ पंजाब के तत्कालीन मुख्य आयुक्त सर जॉन लॉरेन्स ने इन रियासतों के सहयोग से बड़ी संख्या में सैनिक एवं युद्ध सामग्री दिल्ली भेजी, जिससे अंग्रेजों को दिल्ली पर पुनः अधिकार स्थापित करने में सहायता मिली।

➣ ➣ गवर्नर जनरल कैनिंग ने बाद में टिप्पणी की कि इन शासकों तथा सरदारों ने तूफान के आगे बांध (तरंगरोधक/breakwater) की तरह कार्य किया, वरना यह तूफान एक ही लहर में अंग्रेजी शासन को बहा ले जाता।

रियासत / क्षेत्र प्रमुख शासक / नेता अंग्रेजों को सहायता
ग्वालियर जयाजीराव सिंधिया, सर दिनकर राव राजनीतिक एवं प्रशासनिक सहयोग
हैदराबाद निज़ाम, सर सालारजंग प्रथम दक्षिण भारत को विद्रोह से दूर रखा
नेपाल सर जंग बहादुर राणा गोरखा सेना भेजी
कश्मीर महाराजा गुलाब सिंह राजनीतिक समर्थन
भोपाल सिकंदर बेगम अंग्रेजी प्रशासन का सहयोग
रामपुर यूसुफ अली ख़ाँ सैनिक एवं प्रशासनिक सहायता
पटियाला, नाभा, जींद सिख शासक सेना, रसद एवं संचार सहायता
इंदौर तुकोजीराव होल्कर द्वितीय विद्रोह का समर्थन नहीं किया
जोधपुर महाराजा तख्त सिंह अंग्रेजों के प्रति निष्ठा बनाए रखी

1857 विद्रोह से अप्रभावित क्षेत्र

➣ 1857 का विद्रोह मुख्यतः उत्तर एवं मध्य भारत तक सीमित रहा। यद्यपि इसकी चिंगारियाँ देश के अनेक भागों तक पहुँचीं, फिर भी यह सम्पूर्ण भारत में एक साथ व्यापक जनआंदोलन का रूप नहीं ले सका। अनेक प्रदेश ऐसे रहे जहाँ विद्रोह या तो बिल्कुल नहीं हुआ अथवा उसका प्रभाव अत्यन्त सीमित रहा।

पंजाब का अधिकांश भाग विद्रोह से लगभग अछूता रहा। इसका प्रमुख कारण यह था कि द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध (1849) के बाद पंजाब पर अंग्रेजों का अधिकार तो हो गया था,

➣ किन्तु सिख सरदारों और रियासतों ने 1857 में विद्रोहियों का साथ नहीं दिया। अनेक सिख नेताओं को आशंका थी कि यदि विद्रोह सफल हो गया तो मुगल सत्ता का पुनरुत्थान हो सकता है।

➣ पंजाब के मुख्य आयुक्त सर जॉन लॉरेन्स ने इसी क्षेत्र से हजारों सैनिक एवं भारी मात्रा में रसद दिल्ली भेजकर अंग्रेजों की स्थिति को मजबूत बनाया।

दक्षिण भारत भी 1857 के विद्रोह से लगभग अप्रभावित रहा। हैदराबाद, मैसूर, त्रावणकोर, कोचीन तथा मद्रास प्रेसीडेंसी के अधिकांश भागों में कोई व्यापक सैनिक विद्रोह नहीं हुआ। इन क्षेत्रों में स्थानीय शासकों ने भी अंग्रेजों का साथ दिया था।

बंगाल में भी संगठित स्तर पर व्यापक सैनिक विद्रोह नहीं हुआ। यद्यपि 1857 की क्रांति की पहली चिंगारी बैरकपुर में मंगल पांडे की घटना से भड़की थी, फिर भी बाद में सम्पूर्ण बंगाल किसी बड़े विद्रोह का केन्द्र नहीं बन सका। अंग्रेजों ने समय रहते वहाँ की सैन्य व्यवस्था को अपने नियंत्रण में बनाए रखा।

राजस्थान तथा गुजरात में विद्रोह का प्रभाव सीमित और बिखरा हुआ रहा। यद्यपि नसीराबाद, नीमच, कोटा, एरिनपुरा तथा कुछ अन्य स्थानों पर विद्रोह हुए, किन्तु अधिकांश देशी रियासतों ने अंग्रेजों का समर्थन किया।

बम्बई (मुंबई) प्रेसीडेंसी में भी कुछ स्थानों पर असंतोष अवश्य दिखाई दिया, किन्तु वह संगठित सैनिक क्रांति में परिवर्तित नहीं हो सका। सतारा, कोल्हापुर तथा नरगुन्द जैसे क्षेत्रों में विद्रोह हुए, परन्तु अंग्रेजों ने शीघ्र ही उन्हें दबा दिया।

➣ 1857 के विद्रोह के दौरान शिक्षित भारतीय मध्यम वर्ग ने भी व्यापक रूप से विद्रोह का समर्थन नहीं किया। उस समय आधुनिक शिक्षा प्राप्त लोगों का एक वर्ग मानता था कि अंग्रेजी शासन के माध्यम से शिक्षा, न्याय व्यवस्था तथा प्रशासन में कुछ आधुनिक सुधार हुए हैं।

व्यापारी वर्ग तथा बड़े साहूकारों का भी अधिकांश भाग विद्रोह से दूर रहा। व्यापारियों को आशंका थी कि लंबे युद्ध और राजनीतिक अस्थिरता से उनके व्यापार एवं संपत्ति को भारी नुकसान होगा। अनेक व्यापारियों ने तटस्थ रहना ही उचित समझा।

➣ दूसरी ओर अनेक क्षेत्रों में किसानों, तालुकेदारों और सैनिकों ने विद्रोह में सक्रिय भाग लिया, किन्तु पूरे देश में एक समान नेतृत्व, संगठन तथा समन्वय का अभाव था। इस कारण वे अंग्रेजों के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्रीय मोर्चा नहीं बना सके।

➣ इस प्रकार 1857 का विद्रोह भौगोलिक दृष्टि से सीमित, नेतृत्व की दृष्टि से बिखरा हुआ तथा विभिन्न सामाजिक वर्गों के असमान समर्थन वाला आंदोलन सिद्ध हुआ।

क्षेत्र / वर्ग स्थिति
दिल्ली, अवध, कानपुर, झाँसी, बिहार विद्रोह का प्रमुख केन्द्र
पंजाब सीमित प्रभाव
दक्षिण भारत लगभग अप्रभावित
बंगाल सीमित सैनिक गतिविधियाँ
राजस्थान एवं गुजरात आंशिक प्रभाव
शिक्षित वर्ग व्यापक समर्थन नहीं
व्यापारी वर्ग अधिकांशतः तटस्थ या अंग्रेज समर्थक

विद्रोह के प्रमुख केन्द्र — दिल्ली, अवध, कानपुर, झाँसी एवं बिहार।

लगभग अप्रभावित क्षेत्र — दक्षिण भारत का अधिकांश भाग।

सीमित प्रभाव वाले क्षेत्र — पंजाब, बंगाल, राजस्थान एवं गुजरात।

विद्रोह समर्थक रियासतें एवं शासक

उत्तर भारत एवं मध्य भारत की क्रांतिकारी रियासतें

➣ 1857 की क्रांति में जहाँ अनेक बड़ी देशी रियासतों ने अंग्रेजों का साथ दिया, वहीं कुछ छोटी रियासतों तथा स्थानीय शासकों ने सीमित संसाधनों के बावजूद अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष का मार्ग अपनाया।

➣ यद्यपि इन रियासतों का विद्रोह दिल्ली, कानपुर अथवा झाँसी जितना व्यापक नहीं था, फिर भी इन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में अंग्रेजी सत्ता को गंभीर चुनौती दी और क्रांतिकारियों को सैन्य, राजनीतिक तथा नैतिक सहयोग प्रदान किया।

झज्जर, फर्रुखनगर, बहादुरगढ़ तथा दादरी (वर्तमान हरियाणा) की छोटी रियासतों ने मुगल सम्राट बहादुरशाह द्वितीय तथा दिल्ली के विद्रोहियों का समर्थन किया। इन रियासतों के शासकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध सैनिक सहायता उपलब्ध कराई।

झज्जर के नवाब अब्दुर्रहमान खाँ 1857 की क्रांति के प्रमुख समर्थकों में थे। दिल्ली पर अंग्रेजों के पुनः अधिकार के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और देशद्रोह के आरोप में 23 जनवरी, 1858 को दिल्ली के चाँदनी चौक में फाँसी दे दी गई।

फर्रुखनगर के नवाब अहमद अली खाँ ने भी विद्रोहियों का समर्थन किया और दिल्ली के क्रांतिकारियों से संपर्क बनाए रखा। बाद में अंग्रेज अधिकारी जनरल शावर्स के सैन्य अभियान के दौरान उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया, किन्तु उन्हें भी अंग्रेजी सरकार ने दंडित किया तथा उनकी रियासत पर अधिकार कर लिया।

बल्लभगढ़ के अंतिम जाट शासक राजा नाहर सिंह ने भी बहादुरशाह द्वितीय तथा दिल्ली के विद्रोहियों का सक्रिय साथ दिया। उन्होंने सैनिकों, रसद तथा आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई और दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

दिल्ली के पतन के बाद अंग्रेजों ने उन्हें बंदी बना लिया तथा 9 जनवरी, 1858 को दिल्ली के चाँदनी चौक में फाँसी दे दी। आज राजा नाहर सिंह हरियाणा के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में गिने जाते हैं।

अमझेरा (वर्तमान मध्य प्रदेश के धार क्षेत्र) के शासक राजा बख्तावर सिंह ने प्रारम्भ में अंग्रेजों से मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखे थे, किन्तु 1857 की क्रांति के दौरान उन्होंने विद्रोहियों का साथ देने का निर्णय लिया।

➣ उन्होंने अंग्रेजों के महत्वपूर्ण प्रशासनिक केन्द्र भोपावर एजेंसी पर आक्रमण कर अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी। बाद में अंग्रेजों ने उन्हें बंदी बनाकर मृत्युदंड दे दिया तथा उनकी रियासत जब्त कर ली।

शाहगढ़ (बुन्देलखण्ड) के शासक राजा बख्तबली शाह, जो महाराजा छत्रसाल के वंशज माने जाते हैं, ने रानी लक्ष्मीबाई तथा अन्य क्रांतिकारी नेताओं के साथ मिलकर अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया। अंग्रेजों की विजय के बाद उन्हें गिरफ्तार कर उनकी रियासत पर अधिकार कर लिया गया।

बानपुर के शासक राजा मर्दन सिंह ने भी बुन्देलखण्ड में क्रांति को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने प्रारम्भ में अंग्रेजों से समझौते का प्रयास किया, किन्तु बाद में रानी लक्ष्मीबाई तथा तात्या टोपे के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया।

राधौगढ़ तथा मध्य भारत की अन्य छोटी रियासतों के अनेक स्थानीय शासकों एवं सामंतों ने भी झाँसी-ग्वालियर क्षेत्र में विद्रोहियों को शरण, रसद तथा स्थानीय सहयोग प्रदान किया।।

रियासत प्रमुख शासक / नेता विद्रोह में योगदान परिणाम
झज्जर नवाब अब्दुर्रहमान खाँ दिल्ली के विद्रोहियों एवं बहादुरशाह द्वितीय का समर्थन 23 जनवरी 1858 को फाँसी; रियासत जब्त
फर्रुखनगर नवाब अहमद अली खाँ दिल्ली के विद्रोहियों का समर्थन आत्मसमर्पण; रियासत पर अंग्रेजों का अधिकार
बल्लभगढ़ राजा नाहर सिंह दिल्ली को सैनिक एवं रसद सहायता 9 जनवरी 1858 को फाँसी
अमझेरा राजा बख्तावर सिंह भोपावर एजेंसी पर आक्रमण गिरफ्तारी के बाद मृत्युदंड
शाहगढ़ राजा बख्तबली शाह रानी लक्ष्मीबाई के सहयोगी गिरफ्तारी; रियासत जब्त
बानपुर राजा मर्दन सिंह झाँसी-कालपी अभियान में सहयोग अंग्रेजों द्वारा पराजित

पूर्वी एवं दक्षिण भारत की क्रांतिकारी रियासतें

➣ 1857 की क्रांति का प्रभाव केवल उत्तर एवं मध्य भारत तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि इसकी गूँज पूर्वी तथा दक्षिण भारत की कुछ छोटी रियासतों और जनजातीय क्षेत्रों तक भी पहुँची।

सिंहभूम (पोड़ाहाट) (वर्तमान झारखण्ड) के राजा अर्जुन सिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का नेतृत्व किया। उन्हें कोल्हान क्षेत्र के हो समुदाय तथा अनेक स्थानीय मानकी-मुंडा सरदारों का समर्थन प्राप्त हुआ। सिंहभूम क्षेत्र में लंबे समय तक अंग्रेजों को कड़ा प्रतिरोध झेलना पड़ा।

➣ सिंहभूम क्षेत्र में ही भगवान सिंह तथा रामनाथ सिंह के नेतृत्व में भी अंग्रेज-विरोधी गतिविधियाँ संचालित हुईं। स्थानीय सैनिकों तथा ग्रामीण समुदायों ने मिलकर अंग्रेजी प्रशासन का विरोध किया, किन्तु पर्याप्त संसाधनों के अभाव में यह आंदोलन धीरे-धीरे दबा दिया गया।

नरगुंड (वर्तमान कर्नाटक) के शासक भास्करराव भावे, जिन्हें बाबासाहेब भावे के नाम से भी जाना जाता है, ने 1857-58 में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया।

➣ उन्होंने अंग्रेज अधिकारी मैनसन की हत्या कर अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी। बाद में अंग्रेजों ने नरगुंड पर अधिकार कर लिया और बाबासाहेब भावे को गिरफ्तार कर 1858 ई. में फाँसी दे दी।

शोरापुर (सुरपुर) (वर्तमान कर्नाटक) के राजा वेंकटप्पा नायक ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष का मार्ग अपनाया। कहा जाता है कि वे नाना साहब तथा अन्य क्रांतिकारी नेताओं से प्रेरित थे।

➣ उन्होंने अपनी सेना संगठित कर अंग्रेजों और हैदराबाद के निज़ाम की संयुक्त सेनाओं का सामना किया। अंततः पराजित होकर वे अंग्रेजों के हाथों बंदी बना लिए गए। कारावास के दौरान उन्होंने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए आत्महत्या कर ली।

रियासत / क्षेत्र प्रमुख शासक / नेता विद्रोह में योगदान परिणाम
सिंहभूम (पोड़ाहाट) राजा अर्जुन सिंह कोल्हान क्षेत्र में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष विद्रोह का दमन
सिंहभूम भगवान सिंह एवं रामनाथ सिंह स्थानीय सैनिक एवं जनजातीय विद्रोह अंग्रेजों द्वारा दमन
नरगुंड भास्करराव (बाबासाहेब) भावे अंग्रेज अधिकारी मैनसन की हत्या; विद्रोह 1858 में फाँसी
शोरापुर (सुरपुर) वेंकटप्पा नायक अंग्रेज एवं निज़ाम की संयुक्त सेना से संघर्ष गिरफ्तारी के बाद आत्महत्या
अंग्रेजों की मददगार रियासतें क्रान्ति में शामिल रियासतें
ग्वालियर (मध्य भारत में अंग्रेजी सत्ता का प्रमुख आधार) झाँसी (रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में सबसे वीरतापूर्ण संघर्ष)
हैदराबाद (दक्षिण भारत में विद्रोह फैलने से रोका) अवध/लखनऊ (बेगम हजरत महल के नेतृत्व में सबसे लंबा घेरा)
नेपाल (गोरखा सेना भेजकर लखनऊ विजय में सहायता) जगदीशपुर (कुँवर सिंह के नेतृत्व में बिहार का प्रमुख केन्द्र)
कश्मीर (राजनीतिक समर्थन एवं शांति बनाए रखी) झज्जर (दिल्ली के विद्रोहियों का सक्रिय समर्थन)
पटियाला (सेना एवं रसद सहायता) बल्लभगढ़ (राजा नाहर सिंह ने दिल्ली का साथ दिया)
नाभा (अंग्रेजी सेना को सैन्य सहायता) फर्रुखनगर (मुगल सम्राट एवं विद्रोहियों का समर्थन)
जींद (दिल्ली अभियान में सैनिक सहयोग) बहादुरगढ़ (दिल्ली विद्रोह में सहयोग)
कपूरथला (पंजाब में अंग्रेजों का सहयोगी) दादरी (स्थानीय स्तर पर विद्रोह का समर्थन)
रामपुर (अंग्रेजों के प्रति निष्ठावान रहा) अमझेरा (भोपावर एजेंसी पर आक्रमण)
भोपाल (सिकंदर बेगम ने अंग्रेजों का साथ दिया) शाहगढ़ (बख्तबली शाह ने रानी लक्ष्मीबाई का साथ दिया)
इंदौर/होल्कर (विद्रोह को व्यापक समर्थन नहीं दिया) बानपुर (राजा मर्दन सिंह ने झाँसी-कालपी अभियान में सहयोग दिया)
जोधपुर (राज्य अंग्रेजों के पक्ष में रहा) सिंहभूम (राजा अर्जुन सिंह के नेतृत्व में जनजातीय प्रतिरोध)
जयपुर (अंग्रेजों को राजनीतिक समर्थन) नरगुंड (बाबासाहेब भावे का सशस्त्र विद्रोह)
अलवर (विद्रोह का समर्थन नहीं किया) शोरापुर (वेंकटप्पा नायक का अंग्रेजों से संघर्ष)
भरतपुर (अंग्रेजों के प्रति तटस्थ-समर्थक नीति) कोटा (लाला जयदयाल एवं मेहराब खाँ के नेतृत्व में विद्रोह)
बीकानेर (सैनिक एवं रसद सहायता) मन्दसौर (शहजादा फिरोजशाह का नेतृत्व)
सिरमौर (पंजाब में अंग्रेजों का सहयोग) सम्भलपुर (सुरेन्द्रशाही के नेतृत्व में विद्रोह)
सिरोही (राजस्थान में अंग्रेज समर्थक) असम (मनीराम दीवान का आंदोलन)
मेवाड़/उदयपुर (राज्य में शांति बनाए रखी) सतारा (रंगो बापूजी द्वारा विद्रोह का संगठन)
बूंदी (अंग्रेजों के प्रति निष्ठा) धार (स्थानीय शासकों द्वारा अंग्रेज-विरोध)
रीवा (अंग्रेजों को सहायता प्रदान की) नसीराबाद (राजस्थान का प्रथम सैनिक विद्रोह)
अजयगढ़ (अंग्रेज समर्थक नीति) नीमच (छावनी का प्रमुख सैनिक विद्रोह)
जौरा (अंग्रेजी पक्ष में रहा) झेलम (पंजाब का महत्वपूर्ण सैनिक विद्रोह)
बिजावर (अंग्रेजों के प्रति निष्ठावान) सियालकोट (पंजाब में सैनिक विद्रोह)
क्योंझर (उड़ीसा में अंग्रेज समर्थक रुख) रोहतक–रेवाड़ी (राव तुलाराम के नेतृत्व में संघर्ष)

क्रांति के परिणाम एवं शासन व्यवस्था में परिवर्तन

1857 की क्रांति को अंग्रेजों ने अंततः दबा दिया, किन्तु इस विद्रोह ने ब्रिटिश सरकार को यह स्पष्ट कर दिया कि ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से भारत पर शासन चलाना अब सुरक्षित एवं प्रभावी नहीं रहा।

➣ कंपनी की प्रशासनिक नीतियों, सैन्य व्यवस्था तथा भारतीय जनता के प्रति उसके व्यवहार को इस विद्रोह का प्रमुख कारण माना गया। फलस्वरूप ब्रिटिश संसद ने भारत की शासन व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन करने का निर्णय लिया।

भारत शासन अधिनियम, 1858

➣ विद्रोह के तत्काल बाद ब्रिटिश संसद ने भारत शासन अधिनियम, 1858 पारित किया। इस अधिनियम द्वारा लगभग एक शताब्दी से अधिक समय से भारत पर शासन कर रही ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सभी प्रशासनिक अधिकार समाप्त कर दिए गए तथा भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन (ब्रिटिश सम्राट) के अधीन कर दिया गया।

इस प्रकार भारत में कंपनी शासन का अंत तथा क्राउन शासन का प्रारम्भ हुआ।

➣ इस अधिनियम के लागू होने के साथ ही बोर्ड ऑफ कंट्रोल तथा बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स दोनों संस्थाओं को समाप्त कर दिया गया। अब भारत से संबंधित समस्त प्रशासनिक, राजनीतिक एवं वित्तीय अधिकार ब्रिटिश मंत्रिमंडल के एक नए पदाधिकारी भारत सचिव को सौंप दिए गए।

➣ भारत सचिव सीधे ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी था, जिससे भारत पर ब्रिटिश संसद का नियंत्रण पहले की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ हो गया।

➣ भारत सचिव की सहायता के लिए 15 सदस्यीय भारतीय परिषद की स्थापना की गई। इस परिषद का मुख्य कार्य भारत सचिव को प्रशासनिक एवं वित्तीय मामलों में परामर्श देना था।

➣ यद्यपि परिषद एक सलाहकार संस्था थी, फिर भी भारत के शासन संबंधी अनेक महत्वपूर्ण निर्णय इसके माध्यम से लिए जाते थे।

चार्ल्स वुड स्वतंत्र भारत सचिव के पद पर नियुक्त होने वाले प्रथम व्यक्ति थे। उन्होंने लंदन स्थित इंडिया ऑफिस से भारत के प्रशासन का संचालन किया। इस प्रकार भारत के शासन का वास्तविक नियंत्रण भारत से हटकर ब्रिटेन में केंद्रित हो गया।

भारत शासन अधिनियम, 1858 लागू होने के साथ ही 1784 ई. के पिट्स इंडिया एक्ट द्वारा स्थापित द्वैध शासन भी पूर्णतः समाप्त हो गया।

➣ अब भारत के प्रशासन में ईस्ट इंडिया कंपनी की कोई भूमिका शेष नहीं रही और संपूर्ण अधिकार ब्रिटिश सरकार के हाथों में केंद्रित हो गए।

➣ इस परिवर्तन के परिणामस्वरूप भारतीय प्रशासन में उत्तरदायित्व की नई व्यवस्था स्थापित हुई। अब भारत का शासन किसी व्यापारिक कंपनी के बजाय सीधे ब्रिटिश सम्राट के नाम पर संचालित होने लगा।

➣ यद्यपि इससे प्रशासन अधिक केंद्रीकृत हुआ, परन्तु भारतीय जनता को शासन में किसी प्रकार का प्रतिनिधित्व या उत्तरदायित्व प्रदान नहीं किया गया।

1858 से पूर्व 1858 के बाद
भारत पर ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन भारत पर ब्रिटिश क्राउन का प्रत्यक्ष शासन
बोर्ड ऑफ कंट्रोल एवं बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स कार्यरत दोनों संस्थाएँ समाप्त
कंपनी के माध्यम से प्रशासन भारत सचिव के माध्यम से प्रशासन
द्वैध शासन व्यवस्था लागू द्वैध शासन व्यवस्था समाप्त
भारत का नियंत्रण मुख्यतः कंपनी के हाथों में भारत का नियंत्रण सीधे ब्रिटिश संसद एवं क्राउन के अधीन

महारानी विक्टोरिया की घोषणा (1858)

भारत शासन अधिनियम, 1858 के लागू होने के पश्चात् ब्रिटिश सरकार ने भारतीय जनता, देशी रियासतों तथा प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष अपनी नई शासन-नीति स्पष्ट करने के लिए महारानी विक्टोरिया की घोषणा जारी की।

➣ इस घोषणा को 1 नवम्बर, 1858 को तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग ने इलाहाबाद में आयोजित एक भव्य दरबार में पढ़कर सुनाया। इसे भारतीय इतिहास में महारानी की उद्घोषणा अथवा 1858 की शाही घोषणा के नाम से भी जाना जाता है।

➣ इस घोषणा द्वारा औपचारिक रूप से यह घोषित किया गया कि भारत का शासन अब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के स्थान पर सीधे ब्रिटिश क्राउन द्वारा संचालित किया जाएगा। इसके साथ ही भारतीय प्रशासन में एक नए युग का प्रारम्भ हुआ, जिसे क्राउन शासन कहा जाता है।

➣ महारानी विक्टोरिया ने अपनी घोषणा में आश्वासन दिया कि ब्रिटिश सरकार भारतीयों के धार्मिक विश्वासों, सामाजिक परम्पराओं तथा रीति-रिवाजों में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करेगी। इस नीति का उद्देश्य 1857 की क्रांति के दौरान उत्पन्न धार्मिक असंतोष को कम करना तथा भारतीय जनता का विश्वास पुनः प्राप्त करना था।

➣ घोषणा में यह भी कहा गया कि भारतीय प्रजा के साथ कानून के समक्ष समान व्यवहार किया जाएगा तथा योग्यता के आधार पर उन्हें सरकारी सेवाओं में अवसर प्रदान किए जाएंगे।

➣ यद्यपि व्यवहार में उच्च प्रशासनिक पदों पर यूरोपीय अधिकारियों का ही प्रभुत्व बना रहा, फिर भी यह घोषणा भविष्य में भारतीयों द्वारा समान अधिकारों की माँग का आधार बनी।

लॉर्ड डलहौजी की राज्य हड़प नीति को प्रभावी रूप से समाप्त कर दिया गया तथा देशी शासकों को पुनः दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी बनाने का अधिकार स्वीकार किया गया।

➣ साथ ही यह आश्वासन दिया गया कि जो रियासतें ब्रिटिश शासन के प्रति निष्ठावान रहेंगी, उनके आंतरिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।

➣ प्रशासनिक व्यवस्था में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। भारत में गवर्नर जनरल के पद के साथ वायसराय की उपाधि जोड़ दी गई, जिससे वह भारत में ब्रिटिश सम्राट का आधिकारिक प्रतिनिधि बन गया।

इस प्रकार लॉर्ड कैनिंग भारत के अंतिम गवर्नर जनरल तथा प्रथम वायसराय बने।

➣ यद्यपि महारानी की घोषणा में न्याय, समानता, धार्मिक सहिष्णुता तथा भारतीयों के अधिकारों की रक्षा का आश्वासन दिया गया था, किन्तु व्यावहारिक रूप से ब्रिटिश सरकार की साम्राज्यवादी नीतियों में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं हुआ। प्रशासन का वास्तविक नियंत्रण अंग्रेजों के हाथों में ही रहा तथा भारतीयों की शासन में भागीदारी अत्यंत सीमित बनी रही।

महारानी विक्टोरिया की घोषणा (1858) की प्रमुख बातें प्रभाव
ब्रिटिश क्राउन द्वारा प्रत्यक्ष शासन कंपनी शासन का औपचारिक अंत
धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वचन भारतीयों का विश्वास पुनः प्राप्त करने का प्रयास
योग्यता के आधार पर सरकारी सेवाओं का आश्वासन समान अवसर का सिद्धांत घोषित
राज्य हड़प नीति का अंत देशी रियासतों की सुरक्षा बढ़ी
दत्तक उत्तराधिकारी का अधिकार स्वीकार देशी शासकों का समर्थन प्राप्त हुआ
गवर्नर जनरल को वायसराय की उपाधि ब्रिटिश सम्राट का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व स्थापित

सेना का पुनर्गठन

1857 की क्रांति ने ब्रिटिश सरकार को यह अनुभव करा दिया कि भारतीय सेना की तत्कालीन संरचना में अनेक गंभीर कमियाँ थीं। विशेष रूप से बंगाल सेना के अधिकांश भारतीय सैनिकों के विद्रोह में सम्मिलित हो जाने से अंग्रेजों का विश्वास भारतीय सैनिकों पर काफी कम हो गया।

➣ परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने भारतीय सेना का व्यापक पुनर्गठन किया ताकि भविष्य में इस प्रकार के किसी संगठित विद्रोह की पुनरावृत्ति न हो सके।

➣ 1857 से पूर्व ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में बंगाल, अवध तथा उत्तर भारत के उच्चवर्णीय हिन्दू सैनिकों की संख्या अधिक थी।

➣ विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने इन क्षेत्रों से भर्ती कम कर दी तथा पंजाब, नेपाल (गोरखा), उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रान्त तथा सिख, पठान एवं पंजाबी मुसलमान सैनिकों की भर्ती को प्रोत्साहन दिया।

➣ सेना के पुनर्गठन के लिए ब्रिटिश सरकार ने पील आयोग की सिफारिशों को अपनाया। आयोग ने सुझाव दिया कि भारतीय सैनिकों की तुलना में यूरोपीय सैनिकों की संख्या बढ़ाई जाए तथा सेना के सबसे महत्वपूर्ण अंग तोपखाने पर केवल अंग्रेजों का नियंत्रण रखा जाए। इसके बाद अधिकांश भारी तोपखाना यूरोपीय सैनिकों के अधीन कर दिया गया।

➣ सेना में यूरोपीय एवं भारतीय सैनिकों के अनुपात में भी परिवर्तन किया गया। 1857 से पूर्व यह अनुपात लगभग 1 : 5 था, जिसे घटाकर लगभग 1 : 2 कर दिया गया।

➣ इसके अतिरिक्त बंगाल प्रेसीडेन्सी में यूरोपीय एवं भारतीय सैनिकों का अनुपात 1 : 2 तथा मद्रास एवं बम्बई प्रेसीडेन्सी में 1 : 3 निर्धारित किया गया। इससे सेना में अंग्रेज सैनिकों की संख्या पहले की अपेक्षा काफी बढ़ गई।

रॉयल कमीशन की अनुशंसाओं के आधार पर सेना की विभिन्न रेजीमेंटों को जाति, धर्म, क्षेत्र तथा समुदाय के आधार पर संगठित किया गया। इसका उद्देश्य यह था कि विभिन्न समुदायों के सैनिकों के बीच व्यापक एकता विकसित न हो सके और भविष्य में वे संयुक्त रूप से विद्रोह न कर सकें।

➣ अंग्रेजों ने इसी नीति के अंतर्गत तथाकथित मार्शल रेस सिद्धांत को बढ़ावा दिया। उनके अनुसार सिख, गोरखा, पठान, डोगरा तथा राजपूत समुदाय स्वभाव से अधिक युद्धक थे, जबकि बंगाल एवं अवध के सैनिकों को अपेक्षाकृत कम विश्वसनीय माना गया।

➣ आधुनिक इतिहासकार इस सिद्धांत को अंग्रेजों की राजनीतिक एवं साम्राज्यवादी नीति का हिस्सा मानते हैं, न कि किसी वैज्ञानिक आधार पर निर्मित सिद्धांत।

1861 ई. की सेना सम्मिश्रण योजना के अंतर्गत ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना को औपचारिक रूप से ब्रिटिश सरकार की सेना में विलय कर दिया गया। इसके बाद भारतीय सेना का संचालन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन होने लगा।

➣ सेना के पुनर्गठन के साथ-साथ अंग्रेजों ने अपनी प्रसिद्ध ‘फूट डालो और राज करो’ (Divide and Rule) की नीति को भी अधिक संगठित रूप से अपनाया।

➣ सैनिकों की भर्ती, पदोन्नति तथा तैनाती में जातीय, धार्मिक एवं प्रादेशिक विभाजन को महत्व दिया गया, जिससे भारतीय सैनिकों में राष्ट्रीय एकता विकसित न हो सके। यही नीति आगे चलकर ब्रिटिश शासन की प्रमुख प्रशासनिक रणनीति बन गई।

1857 से पूर्व 1857 के बाद
बंगाल एवं अवध के सैनिकों की प्रधानता पंजाब, गोरखा एवं उत्तर-पश्चिमी सीमांत से भर्ती बढ़ाई गई
यूरोपीय : भारतीय सैनिक अनुपात लगभग 1 : 5 अनुपात लगभग 1 : 2 कर दिया गया
भारतीयों की तोपखाने में महत्वपूर्ण भागीदारी भारी तोपखाना लगभग पूर्णतः अंग्रेजों के नियंत्रण में
मिश्रित रेजीमेंटें जाति, धर्म एवं क्षेत्र के आधार पर रेजीमेंटों का गठन
कंपनी की सेना ब्रिटिश क्राउन की सेना

आर. सी. मजूमदार का मत है कि 1857 के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारतीय सेना को इस प्रकार संगठित किया कि उसकी निष्ठा ब्रिटिश शासन के प्रति बनी रहे और किसी एक क्षेत्र अथवा समुदाय का प्रभाव अधिक न हो।

अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

➣ 1857 की क्रांति का प्रतीक कमल का फूल और रोटी (चपाती) माने जाते हैं। कमल का प्रयोग मुख्यतः सैनिकों के बीच संदेश पहुँचाने के लिए तथा रोटी (चपाती) का प्रयोग ग्रामीण क्षेत्रों में गुप्त सूचना एवं संगठन के प्रतीक के रूप में किया जाता था।

➣ 1857 की क्रांति के दौरान विद्रोहियों का प्रमुख नारा ख़लक ख़ुदा का, मुल्क बादशाह का, हुक्म झाँसी की रानी (या बहादुरशाह का) जैसे विभिन्न स्थानीय रूपों में प्रचलित था, जो अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जनसमर्थन का प्रतीक माना जाता है।

1857 के विद्रोह के समय भारत का गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग (1856–1862 ई.) था। विद्रोह के दमन में उसने कठोर तथा उदार—दोनों प्रकार की नीतियाँ अपनाईं। बाद में भारत शासन अधिनियम, 1858 लागू होने पर वही भारत का प्रथम वायसराय भी बना।

➣ 1857 के विद्रोह के समय ईस्ट इंडिया कम्पनी का मुख्य सेनापति जनरल जॉर्ज एनिसन था। विद्रोह के प्रारम्भिक चरण में उसने दिल्ली की ओर अभियान चलाया, किन्तु 27 मई, 1857 को करनाल के निकट हैजे से उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद सर हेनरी बार्नार्ड ने सेना का नेतृत्व संभाला।

➣ विद्रोह के समय भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी की तीन प्रमुख सेनाएँ—बंगाल, मद्रास और बम्बई सेना—थीं। इनमें से बंगाल सेना ने सबसे व्यापक स्तर पर विद्रोह किया, जबकि मद्रास और बम्बई सेनाएँ अधिकांशतः अंग्रेजों के प्रति निष्ठावान रहीं।

➣ 1857 के समय ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधीन भारतीय सेना में लगभग 2.3 लाख भारतीय सैनिक तथा लगभग 45 हजार यूरोपीय सैनिक थे। इसी असंतुलन ने अंग्रेजों को बाद में सेना का पुनर्गठन करने के लिए प्रेरित किया।

➣ विद्रोह के दौरान हिंडन (हिण्डन) नदी के तट पर भारतीय क्रांतिकारियों और अंग्रेजी सेना के बीच पहली महत्वपूर्ण मुठभेड़ हुई। इस युद्ध के बाद विद्रोही सैनिक दिल्ली पहुँचने में सफल हुए और बहादुरशाह द्वितीय के नेतृत्व में संघर्ष को आगे बढ़ाया।

➣ 1857 के समय ब्रिटिश भारतीय सेना का मुख्यालय शिमला में था, जबकि तोपखाने का प्रमुख केन्द्र मेरठ था। मेरठ की सैनिक छावनी ही 10 मई, 1857 को प्रारम्भ हुए विद्रोह का पहला बड़ा केन्द्र बनी।

➣ 1857 की क्रांति का प्रभाव मुख्यतः उत्तर भारत एवं मध्य भारत तक सीमित रहा, जबकि पंजाब, बंगाल के अधिकांश भाग, दक्षिण भारत तथा अनेक देशी रियासतें अंग्रेजों के नियंत्रण में रहीं।

➣ विद्रोह के विस्तार के बाद लॉर्ड कैनिंग ने प्रशासनिक एवं सैन्य दृष्टि से इलाहाबाद को अपना आपातकालीन मुख्यालय बनाया। गंगा-यमुना के संगम पर स्थित होने के कारण यह अंग्रेजों के लिए रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण केन्द्र था।

लॉर्ड कैनिंग भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा नियुक्त अंतिम गवर्नर जनरल तथा ब्रिटिश क्राउन के अधीन नियुक्त भारत का प्रथम वायसराय था। इसलिए उसका कार्यकाल कंपनी शासन और क्राउन शासन के बीच संक्रमण काल का प्रतीक माना जाता है।

➣ भारत में 1857 की घटना को सामान्यतः प्रथम स्वतंत्रता संग्राम, 1857 की क्रांति अथवा सिपाही विद्रोह कहा जाता है, जबकि अधिकांश ब्रिटिश इतिहासकारों ने इसे Indian Mutiny (इंडियन म्यूटिनी) या Sepoy Mutiny कहा।

➣ विद्रोह के समय बैरकपुर छावनी के कमांडिंग अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल सर जॉन बेनेट हैरसे थे। मंगल पांडे की गिरफ्तारी एवं उनके विरुद्ध की गई कार्रवाई में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

➣ जिस समय भारत में 1857 की क्रांति हुई, उस समय विस्काउंट पामर्स्टन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे। उनके शासनकाल में ब्रिटिश सरकार ने भारत की घटनाओं पर निकट दृष्टि रखी तथा बाद में भारत शासन अधिनियम, 1858 के माध्यम से कंपनी शासन समाप्त करने का निर्णय लिया।

➣ 1857 से पूर्व मेरठ से प्रकाशित ‘द मुफसलाइट’ एक महत्वपूर्ण अंग्रेज़ी समाचार-पत्र था। इसके संपादक जॉन लैंग थे, जो भारतीयों के पक्ष में लिखने वाले प्रारम्भिक यूरोपीय पत्रकारों में गिने जाते हैं।

➣ 1857 की क्रांति के समय भारत के नाममात्र के सम्राट बहादुरशाह द्वितीय (बहादुरशाह ज़फ़र) थे। विद्रोहियों ने उन्हें भारत का सम्राट घोषित कर अपने आंदोलन को वैधता एवं राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करने का प्रयास किया।

➣ 1857 के प्रसिद्ध झण्डा-गीत की रचना अजीमुल्ला खाँ ने की थी। उन्होंने नाना साहब के प्रमुख सलाहकार के रूप में कार्य करते हुए क्रांतिकारियों में राष्ट्रभावना एवं उत्साह जगाने का प्रयास किया।

➣ विद्रोह के दौरान ‘आज़ाद-ए-पयाम’ नामक क्रांतिकारी समाचार-पत्र का प्रकाशन किया गया। इसके संपादक मियाँ बेदार बख्त थे, जिन्होंने अंग्रेज-विरोधी विचारों के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ प्रसिद्ध उर्दू कवि मिर्जा गालिब ने 1857 की घटनाओं को स्वयं अपनी आँखों से देखा था। उन्होंने अपने प्रसिद्ध फ़ारसी ग्रंथ ‘दास्तानबू’ में दिल्ली की तत्कालीन परिस्थितियों तथा विद्रोह के प्रभाव का सजीव वर्णन किया है।

विद्रोह की विफलता के कारण

➣ 1857 की क्रांति प्रारम्भिक चरण में अत्यन्त व्यापक एवं प्रभावशाली सिद्ध हुई, किन्तु अंततः यह अपने मुख्य उद्देश्य में सफल नहीं हो सकी। इसके पीछे अनेक राजनीतिक, सैन्य, सामाजिक एवं संगठनात्मक कारण उत्तरदायी थे।

1. एकीकृत विचारधारा एवं स्पष्ट उद्देश्य का अभाव

  • 1857 के विद्रोहियों के पास कोई साझी राष्ट्रीय विचारधारा या एक समान राजनीतिक लक्ष्य नहीं था।
  • विभिन्न क्षेत्रों के नेता अपने-अपने स्थानीय हितों एवं समस्याओं के कारण विद्रोह में शामिल हुए थे। किसी का उद्देश्य अपना राज्य वापस प्राप्त करना था, तो कोई अंग्रेजों की आर्थिक एवं प्रशासनिक नीतियों से असंतुष्ट था।
  • अधिकांश विद्रोही मुगल शासन या अपने पारंपरिक अधिकारों की पुनर्स्थापना चाहते थे, जबकि आधुनिक राष्ट्रवाद की भावना उस समय व्यापक रूप से विकसित नहीं हुई थी।
  • इस कारण विद्रोह एक साझा राष्ट्रीय आंदोलन का स्वरूप नहीं ले सका।

2. सुनियोजित योजना एवं संगठन का अभाव

  • विद्रोह के लिए कोई केंद्रीय संगठन, निश्चित रणनीति या समन्वित कार्ययोजना नहीं बनाई गई थी।
  • विद्रोह निर्धारित तिथि से पहले ही 10 मई 1857 को मेरठ में प्रारम्भ हो गया, जिससे अन्य क्षेत्रों को तैयारी का पर्याप्त समय नहीं मिल सका।
  • विभिन्न क्षेत्रों के विद्रोही एक-दूसरे से संपर्क बनाए रखने में असफल रहे तथा उनके बीच समन्वय का अभाव था।
  • परिणामस्वरूप अंग्रेजों ने अलग-अलग क्षेत्रों में विद्रोह को क्रमशः दबा दिया।

3. विद्रोह का सीमित भौगोलिक विस्तार

  • यह विद्रोह मुख्यतः उत्तर भारत एवं मध्य भारत तक सीमित रहा।
  • दक्षिण भारत, पंजाब के अधिकांश भाग, राजस्थान के कई क्षेत्र, बंगाल, असम तथा पूर्वोत्तर भारत इस आंदोलन से लगभग अछूते रहे।
  • अनेक महत्वपूर्ण रियासतों जैसे हैदराबाद, ग्वालियर के सिंधिया (प्रारम्भिक चरण में), पटियाला, कश्मीर तथा नेपाल ने अंग्रेजों का समर्थन किया।
  • विशेष रूप से सिखों एवं गोरखा सैनिकों ने अंग्रेजी सेना का साथ दिया, जिससे कंपनी को सैन्य शक्ति प्राप्त हुई।

4. भारतीयों में एकता का अभाव

  • विद्रोह में भारतीय समाज के सभी वर्ग समान रूप से शामिल नहीं हुए।
  • अनेक राजाओं, जमींदारों, व्यापारियों एवं सामंतों ने अपने हितों की रक्षा के लिए अंग्रेजों का साथ दिया।
  • जातीय, क्षेत्रीय एवं धार्मिक विभाजनों के कारण विद्रोहियों में व्यापक राष्ट्रीय एकता स्थापित नहीं हो सकी।
  • इस विभाजन का लाभ अंग्रेजों ने सफलतापूर्वक उठाया और “फूट डालो और शासन करो” की नीति को और अधिक प्रभावी बनाया।

5. शिक्षित भारतीयों का पर्याप्त समर्थन न मिलना

  • उस समय का शिक्षित मध्यम वर्ग बड़े पैमाने पर विद्रोह से जुड़ा नहीं।
  • अनेक शिक्षित भारतीयों का विश्वास था कि अंग्रेजी शासन के माध्यम से आधुनिक शिक्षा, न्याय व्यवस्था तथा सामाजिक सुधारों को बढ़ावा मिलेगा।
  • परिणामस्वरूप उन्होंने विद्रोह को व्यापक जनआंदोलन बनाने में सक्रिय भूमिका नहीं निभाई।

6. कुशल एवं प्रभावी नेतृत्व का अभाव

  • विद्रोह के अनेक नेता साहसी एवं लोकप्रिय अवश्य थे, किन्तु उनके बीच एक सर्वोच्च केंद्रीय नेतृत्व नहीं था।
  • बहादुर शाह द्वितीय, नाना साहेब, तात्या टोपे, रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हज़रत महल और कुँवर सिंह जैसे नेता अपने-अपने क्षेत्रों में संघर्ष कर रहे थे, परंतु उनके बीच प्रभावी समन्वय नहीं था।
  • इसके विपरीत अंग्रेजों के पास हेनरी हैवलॉक, कॉलिन कैंपबेल, जॉन निकोलसन, ह्यू रोज़ जैसे अनुभवी एवं प्रशिक्षित सेनापति थे, जिन्होंने योजनाबद्ध ढंग से विद्रोह का दमन किया।

7. आधुनिक हथियारों एवं संसाधनों की कमी

  • विद्रोहियों के पास आधुनिक हथियार, गोला-बारूद एवं सैन्य सामग्री का अभाव था।
  • अधिकांश विद्रोही पारंपरिक हथियारों पर निर्भर थे, जबकि अंग्रेजों के पास आधुनिक बंदूकें, तोपें तथा पर्याप्त सैन्य संसाधन उपलब्ध थे।
  • संसाधनों की कमी के कारण विद्रोही लंबे समय तक युद्ध जारी नहीं रख सके।

8. संचार एवं परिवहन के साधनों पर अंग्रेजों का नियंत्रण

  • अंग्रेजों ने रेलवे, टेलीग्राफ तथा डाक व्यवस्था का प्रभावी उपयोग किया।
  • टेलीग्राफ के माध्यम से वे विद्रोह की सूचना तुरंत विभिन्न सैन्य केंद्रों तक पहुँचाने में सफल रहे।
  • रेलमार्गों के कारण सैनिकों एवं हथियारों को शीघ्रता से एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजा जा सका, जबकि विद्रोहियों के पास ऐसी कोई सुविधा नहीं थी।

9. आर्थिक एवं सैन्य शक्ति में अंग्रेजों की श्रेष्ठता

  • ईस्ट इंडिया कंपनी के पास विशाल आर्थिक संसाधन एवं संगठित सेना थी।
  • उसे ब्रिटेन से निरंतर सैनिक, धन एवं हथियार प्राप्त होते रहे।
  • दूसरी ओर विद्रोहियों के पास धन, रसद एवं हथियारों की भारी कमी थी, जिससे उनका संघर्ष धीरे-धीरे कमजोर पड़ गया।

10. विद्रोह का समय से पूर्व प्रारम्भ होना

  • विद्रोह की व्यापक योजना के अनुसार इसे बाद में प्रारम्भ किया जाना था, किन्तु मेरठ में 10 मई 1857 को यह अचानक शुरू हो गया।
  • इससे अनेक क्षेत्रों के विद्रोहियों को तैयारी एवं संगठन का पर्याप्त अवसर नहीं मिला।
  • अंग्रेजों को विद्रोह को अलग-अलग क्षेत्रों में नियंत्रित करने का समय मिल गया, जिससे वे अंततः इसे दबाने में सफल रहे।

➣ यद्यपि 1857 का विद्रोह तत्कालीन परिस्थितियों में असफल रहा, फिर भी इसने अंग्रेजी शासन की नींव को हिला दिया। इसी कारण इसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम व्यापक प्रयास माना जाता है।

1857 की क्रांति : इतिहासकारों एवं समकालीन व्यक्तियों के मत

1857 की क्रांति भारतीय इतिहास की सबसे चर्चित घटनाओं में से एक है। इसकी प्रकृति को लेकर इतिहासकारों के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं।

➣ कुछ विद्वानों ने इसे केवल सैनिक विद्रोह माना, जबकि अन्य ने इसे राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम, जनविद्रोह अथवा धर्मयुद्ध की संज्ञा दी।

➣ 1857 की क्रांति का मूल्यांकन इतिहासकारों की वैचारिक पृष्ठभूमि, राष्ट्रीय दृष्टिकोण तथा उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर भिन्न-भिन्न रहा है। सामान्यतः इनके विचारों को राष्ट्रवादी इतिहासकारों तथा ब्रिटिश इतिहासकारों एवं अधिकारियों के मतों में विभाजित किया जाता है।

भारतीय इतिहासकारों एवं राष्ट्रवादी नेताओं के मत

➣ भारतीय राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने 1857 की क्रांति को केवल सैनिक विद्रोह न मानकर व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में देखा। उनके अनुसार इस संघर्ष में सैनिकों के साथ-साथ किसान, जमींदार, शासक, कारीगर तथा सामान्य जनता ने भी भाग लिया।

इतिहासकार / नेता मुख्य मत
वीर सावरकर 1857 की क्रांति भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम थी तथा यह अंग्रेजी शासन को समाप्त करने के उद्देश्य से लड़ा गया राष्ट्रीय युद्ध था।
पं. जवाहरलाल नेहरू यह सैनिक विद्रोह शीघ्र ही जनविद्रोह में परिवर्तित हो गया और अनेक वर्गों का समर्थन प्राप्त हुआ।
पट्टाभि सीतारमैया 1857 का महान आंदोलन भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम था।
अशोक मेहता यह एक राष्ट्रीय विद्रोह था, जिसने भारतीय जनता की स्वतंत्रता की भावना को व्यक्त किया।
डॉ. ईश्वरी प्रसाद उन्होंने भी इसे स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दी।
डॉ. रामविलास शर्मा उनके अनुसार यह एक व्यापक जनक्रांति थी, जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों ने भाग लिया।
पी. सी. जोशी यह राष्ट्रीय स्वरूप वाला ऐसा आंदोलन था, जो सैनिकों तक सीमित न रहकर सामान्य जनता तक फैल गया।
डॉ. एस. एन. सेन जो संघर्ष धर्म की रक्षा के उद्देश्य से प्रारम्भ हुआ, वह अंततः स्वतंत्रता के संघर्ष में परिवर्तित हो गया।
ब्रिटिश इतिहासकारों एवं अधिकारियों के मत

➣ अधिकांश ब्रिटिश इतिहासकारों एवं तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों ने 1857 की घटना को राष्ट्रीय आंदोलन स्वीकार नहीं किया। उनका उद्देश्य इसे सीमित सैनिक विद्रोह अथवा धार्मिक उन्माद सिद्ध करना था, जिससे ब्रिटिश शासन की वैधता पर प्रश्नचिह्न न लगे।

इतिहासकार / अधिकारी मुख्य मत
सर जॉन लॉरेंस यह पूर्णतः सिपाही विद्रोह था।
जॉन सीले यह केवल सैनिक विद्रोह था, जिसमें व्यापक राष्ट्रीय चेतना का अभाव था।
एल. ई. आर. रीज यह ईसाई धर्म के विरुद्ध धर्मयुद्ध था।
जेम्स आउट्रम एवं डब्ल्यू. टेलर यह अंग्रेजों के विरुद्ध हिन्दू-मुस्लिम षड्यंत्र था।
टी. आर. होम्स यह सभ्यता और बर्बरता के बीच संघर्ष था।
पी. रॉबर्ट्स उनके अनुसार विद्रोह का तत्कालिक कारण चर्बी लगे कारतूस थे।
मिस्टर के उन्होंने इसे मुख्यतः सैनिक विद्रोह माना।
लॉर्ड कैनिंग यद्यपि प्रारम्भ सैनिक विद्रोह के रूप में हुआ, किन्तु बाद में यह अनेक क्षेत्रों में जनविद्रोह का स्वरूप ग्रहण कर गया।
आर. सी. मजूमदार का मत

➣ प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. आर. सी. मजूमदार ने 1857 की क्रांति को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मानने से स्पष्ट रूप से असहमति व्यक्त की।

➣ उनके अनुसार 1857 की घटना न तो भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम थी, न ही पूर्णतः राष्ट्रीय आंदोलन और न ही सम्पूर्ण भारत की जनता का संगठित संघर्ष। उनका मत था कि यह विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग कारणों से उत्पन्न विद्रोहों का समूह था, जिसे बाद में राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया गया।

आधुनिक इतिहासकारों का दृष्टिकोण

➣ आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि 1857 की क्रांति को केवल सिपाही विद्रोह अथवा केवल राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम कहना उचित नहीं होगा।

इसमें सैनिक असंतोष, किसानों की नाराज़गी, अपदस्थ शासकों का विरोध, सामंतों के हित, धार्मिक आशंकाएँ तथा प्रारम्भिक राष्ट्रीय चेतना—सभी तत्व विभिन्न स्तरों पर विद्यमान थे।

➣ इसी कारण आज अधिकांश इतिहासकार 1857 की घटना को भारतीय इतिहास का बहुआयामी (Multi-dimensional) आंदोलन मानते हैं, जिसने आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के विकास की आधारशिला रखी।

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम — वीर सावरकर, पट्टाभि सीतारमैया, ईश्वरी प्रसाद।
राष्ट्रीय विद्रोह — अशोक मेहता, बेंजामिन डिजरायली।
जनविद्रोह — जवाहरलाल नेहरू, रामविलास शर्मा, पी. सी. जोशी।
सिपाही विद्रोह — जॉन लॉरेंस, सीले, जॉन विलियम के।
धर्मयुद्ध — एल. ई. आर. रीज।
हिन्दू-मुस्लिम षड्यंत्र — जेम्स आउट्रम एवं डब्ल्यू. टेलर।
सभ्यता एवं बर्बरता का संघर्ष — टी. आर. होम्स।
स्वतंत्रता संग्राम नहीं था — डॉ. आर. सी. मजूमदार।

1857 की क्रांति पर आधारित प्रमुख पुस्तकें

1857 की क्रांति पर भारतीय एवं विदेशी इतिहासकारों ने अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे हैं। इन पुस्तकों में विद्रोह की प्रकृति, कारण, घटनाक्रम तथा परिणामों का विभिन्न दृष्टिकोणों से विश्लेषण किया गया है। प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से निम्नलिखित पुस्तकें विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।

पुस्तक लेखक मुख्य दृष्टिकोण / विशेषता
The Indian War of Independence, 1857
(द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस, 1857)
वीर विनायक दामोदर सावरकर 1857 को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सिद्ध करने वाला सर्वाधिक प्रसिद्ध राष्ट्रवादी ग्रंथ।
Eighteen Fifty-Seven डॉ. एस. एन. सेन भारत सरकार द्वारा प्रकाशित संतुलित एवं प्रामाणिक अध्ययन।
The Great Rebellion अशोक मेहता 1857 को व्यापक राष्ट्रीय विद्रोह के रूप में प्रस्तुत किया।
The Sepoy Mutiny and the Revolt of 1857 डॉ. आर. सी. मजूमदार 1857 को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मानने का विरोध किया।
A History of the Indian Mutiny टी. आर. होम्स ब्रिटिश दृष्टिकोण से लिखा गया प्रमुख ग्रंथ।
Rebellion 1857 पी. सी. जोशी 1857 की सामाजिक एवं राष्ट्रीय पृष्ठभूमि का मार्क्सवादी दृष्टिकोण से विश्लेषण।
Asbab-e-Baghawat-e-Hind
(असबाब-ए-बगावत-ए-हिन्द)
सर सैय्यद अहमद खान 1857 के विद्रोह के कारणों का विश्लेषण तथा अंग्रेजी नीतियों की आलोचना।
The History of the Indian Mutiny जॉन विलियम के (John William Kaye) 1857 के घटनाक्रम पर ब्रिटिश अधिकारियों का प्रारम्भिक विस्तृत विवरण।
History of the Sepoy War in India जॉर्ज ब्रूस मैलेसन (G. B. Malleson) जॉन के के कार्य को आगे बढ़ाते हुए विद्रोह का विस्तृत सैन्य इतिहास प्रस्तुत किया।
The Causes of the Indian Revolt सर सैय्यद अहमद खान ब्रिटिश शासन की प्रशासनिक एवं राजनीतिक भूलों को विद्रोह का प्रमुख कारण बताया।*

वीर सावरकर ने सर्वप्रथम 1857 की घटना को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा।
एस. एन. सेन की Eighteen Fifty-Seven भारत सरकार द्वारा प्रकाशित एक महत्वपूर्ण आधिकारिक कृति मानी जाती है।
सर सैय्यद अहमद खान की असबाब-ए-बगावत-ए-हिन्द 1857 के कारणों पर लिखी गई सबसे महत्वपूर्ण समकालीन पुस्तकों में से एक है।
जॉन विलियम के तथा जी. बी. मैलेसन की पुस्तकें 1857 पर ब्रिटिश दृष्टिकोण की प्रमुख कृतियाँ मानी जाती हैं।

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