ब्रिटिश शासन से पूर्व महिला शिक्षा की स्थिति
वैदिक काल-अपेक्षाकृत उन्नत स्थिति
➣ ऋग्वैदिक काल (लगभग 1500-1000 ईसा पूर्व) में महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने की अपेक्षाकृत स्वतंत्रता प्राप्त थी। उन्हें यज्ञोपवीत संस्कार, वैदिक अध्ययन तथा वैदिक मंत्रोच्चार में भाग लेने का अधिकार था।
➣ इस काल में अनेक ऋषिकाओं (महिला ऋषियों) का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने ऋग्वेद के सूक्तों की रचना की। इनमें घोषा, लोपामुद्रा, अपाला, विश्ववारा, इंद्राणी तथा सावित्री प्रमुख थीं।
➣ उपनिषद काल में गार्गी एवं मैत्रेयी जैसी विदुषियों ने ब्रह्मविद्या एवं दर्शन के क्षेत्र में विशेष ख्याति प्राप्त की।
➣ इतिहासकार ए.एस. अल्तेकर ने वैदिक युग को महिला शिक्षा की दृष्टि से भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग कहा है।
उत्तर वैदिक एवं मध्यकाल – शिक्षा का क्रमिक ह्रास
➣ उत्तर वैदिक काल से महिलाओं की शैक्षिक स्थिति में धीरे-धीरे गिरावट आने लगी। स्मृति काल (विशेषकर मनुस्मृति) में महिलाओं पर सामाजिक एवं धार्मिक प्रतिबंध बढ़ने लगे।
➣ बाल विवाह के प्रचलन के कारण विवाह-पूर्व शिक्षा प्राप्त करने का अवसर सीमित हो गया, जिससे महिला शिक्षा का विकास बाधित हुआ।
➣ बौद्ध काल में भिक्षुणी संघ के माध्यम से कुछ महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला, किंतु यह सुविधा मुख्यतः सीमित वर्ग तक ही रही।
➣ मध्यकाल (विशेषतः सल्तनत एवं मुगल काल) में पर्दा प्रथा, बाल विवाह, जातिगत प्रतिबंध तथा निरंतर होने वाले आक्रमणों से उत्पन्न असुरक्षा के कारण महिला शिक्षा का और अधिक ह्रास हुआ। अधिकांश महिलाओं की भूमिका घरेलू कार्यों एवं परिवार के पालन-पोषण तक सीमित मानी जाने लगी।
➣ अपवादस्वरूप, राजघरानों एवं संपन्न परिवारों की कुछ महिलाओं को घर पर धार्मिक ग्रंथों, साहित्य, संगीत एवं काव्य की शिक्षा प्राप्त होती थी। इनमें रज़िया सुल्तान, गुलबदन बेगम, जहाँआरा बेगम तथा ज़ेबुन्निसा बेगम उल्लेखनीय हैं।
▪ वैदिक काल की प्रमुख विदुषियाँ: गार्गी, मैत्रेयी, घोषा, लोपामुद्रा, अपाला, विश्ववारा
▪ अल्तेकर के अनुसार: वैदिक युग महिला शिक्षा का स्वर्ण युग
▪ मध्यकालीन शिक्षित महिलाएँ (अपवाद): रज़िया सुल्तान, गुलबदन बेगम, जहाँआरा बेगम, ज़ेबुन्निसा बेगम
▪ ह्रास के कारण: बाल विवाह, पर्दा प्रथा, जातिगत प्रतिबंध, सामाजिक असुरक्षा
महिला शिक्षा में प्रमुख बाधाएँ
| बाधा | संक्षिप्त विवरण |
|---|---|
| सामाजिक रूढ़ियाँ एवं रूढ़िवादी सोच | महिलाओं को केवल घरेलू जीवन तक सीमित मानने के कारण बालिकाओं की शिक्षा को अनावश्यक समझा जाता था। |
| बाल विवाह | कम आयु में विवाह होने से अधिकांश बालिकाओं की शिक्षा बीच में ही रुक जाती थी। |
| पर्दा प्रथा एवं सामाजिक प्रतिबंध | पर्दा प्रथा के कारण लड़कियों का विद्यालय जाना सीमित था। |
| कन्या विद्यालयों एवं महिला शिक्षिकाओं का अभाव | अलग विद्यालयों एवं महिला शिक्षिकाओं की कमी से अभिभावक बेटियों को विद्यालय भेजने में संकोच करते थे। |
| आर्थिक कारण | निर्धन परिवार लड़कों की शिक्षा को प्राथमिकता देते थे, जबकि लड़कियों की शिक्षा की उपेक्षा करते थे। |
| सरकारी उपेक्षा | 1854 ई. के वुड के डिस्पैच से पहले महिला शिक्षा के लिए कोई व्यापक सरकारी नीति नहीं थी। |
परिणाम
➣ इस प्रकार प्राचीन काल की अपेक्षाकृत उदार स्थिति की तुलना में मध्यकाल तक महिला शिक्षा की परंपरा लगभग समाप्तप्राय हो चुकी थी।
➣ परिणामस्वरूप ब्रिटिश शासन के प्रारम्भ (18वीं शताब्दी उत्तरार्ध) तक भारत में महिला साक्षरता अत्यंत निम्न स्तर पर पहुँच चुकी थी, जिसे सुधारने का कार्य आगे चलकर मिशनरियों, समाज सुधारकों व औपनिवेशिक शिक्षा नीतियों (चार्टर एक्ट 1813, वुड डिस्पैच 1854) के माध्यम से हुआ।
अंग्रेजी शासन में महिला शिक्षा
➣ अंग्रेजी शासन के प्रारम्भिक वर्षों में ब्रिटिश सरकार ने महिला शिक्षा पर विशेष ध्यान नहीं दिया। उसका मुख्य उद्देश्य प्रशासनिक आवश्यकताओं (क्लर्क, दुभाषिये आदि) के अनुरूप पुरुष शिक्षा व्यवस्था का विकास करना था।
➣ चार्टर अधिनियम, 1813 ई. के बाद ईसाई मिशनरियों को शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने की औपचारिक अनुमति मिली, जिससे विभिन्न स्थानों पर बालिकाओं के लिए विद्यालय स्थापित होने लगे।
➣ 19वीं शताब्दी में ईसाई मिशनरियों, भारतीय समाज सुधारकों (राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, डेविड हेयर) तथा कुछ ब्रिटिश अधिकारियों (जॉन बेथून) के प्रयासों से महिला शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी। हालांकि इस समय तक सरकार की भूमिका सीमित थी और अधिकांश प्रयास निजी स्तर पर किए जा रहे थे।
➣ 1854 ई. के वुड डिस्पैच, जिसे भारतीय अंग्रेजी शिक्षा का मैग्ना कार्टा कहा जाता है, को सर चार्ल्स वुड ने तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौज़ी को भेजा था।
➣ इसमें पहली बार स्पष्ट रूप से कहा गया कि भारत में महिला शिक्षा के महत्व को अतिरंजित नहीं किया जा सकता तथा सरकार को इसके विकास में हार्दिक एवं सक्रिय सहयोग देना चाहिए।
➣ वुड डिस्पैच में कई सुझाओं के साथ बालिका विद्यालयों को सरकारी अनुदान देने, की भी अनुशंसा की गई। इसी अनुदान व्यवस्था के अंतर्गत बेथून स्कूल को भी सरकारी सहायता मिलने लगी।
➣ 1882 ई. में लॉर्ड रिपन द्वारा गठित हंटर आयोग (अध्यक्ष – विलियम हंटर) ने वुड डिस्पैच के क्रियान्वयन की समीक्षा की।
➣ आयोग ने पाया कि प्रेसिडेंसी नगरों के बाहर महिला शिक्षा की स्थिति अत्यंत कमजोर थी। इसलिए उसने महिला शिक्षा को विशेष प्रोत्साहन देने तथा निजी संस्थाओं एवं मिशनरियों को अधिक सरकारी सहायता प्रदान करने की सिफारिश की।
➣ इन प्रयासों के बावजूद बाल विवाह, पर्दा प्रथा, जातिगत बंधनों तथा रूढ़िवादी सामाजिक मान्यताओं के कारण महिला शिक्षा का विकास धीमी गति से हुआ और यह मुख्यतः शहरी उच्च एवं मध्यम वर्ग तक ही सीमित रही।
➣ इस प्रकार, अंग्रेजी शासनकाल में सामाजिक बाधाओं के बावजूद मिशनरियों, समाज सुधारकों तथा क्रमिक सरकारी नीतियों (विशेषकर 1854 ई. का वुड डिस्पैच एवं 1882 ई. का हंटर आयोग) के संयुक्त प्रयासों से भारत में आधुनिक महिला शिक्षा की आधारशिला रखी गई।
ईसाई मिशनरियों का योगदान
➣ चार्टर अधिनियम, 1813 ई. से पूर्व ईस्ट इंडिया कंपनी धार्मिक तटस्थता की नीति अपनाती थी तथा मिशनरियों की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाती थी।
➣ इस अधिनियम के बाद मिशनरियों को भारत में धर्म-प्रचार एवं शिक्षा कार्य की औपचारिक अनुमति मिली, जिससे बालिका शिक्षा को नया प्रोत्साहन प्राप्त हुआ।
➣ हालांकि इससे पहले भी श्रीरामपुर (सेरामपुर) के बैप्टिस्ट मिशनरियों– विलियम कैरी, जोशुआ मार्शमैन तथा हैना मार्शमैन ने लगभग 1800 ई. से ही बालिकाओं के लिए विद्यालय स्थापित करने प्रारम्भ कर दिए थे।
➣ 1819 ई. में हैना मार्शमैन ने सेरामपुर नेटिव फीमेल एजुकेशन सोसाइटी (तरुण स्त्री सभा) की स्थापना की।
➣ 1821 ई. में मिस मेरी ऐन कुक (बाद में मिसेज विल्सन) भारत भेजी गई पहली एकल महिला मिशनरी थीं। उन्होंने चर्च मिशनरी सोसाइटी के सहयोग से कलकत्ता एवं उसके आसपास 15 बालिका विद्यालय स्थापित किए, जिनमें लगभग 300 छात्राएँ अध्ययनरत थीं।
➣ बाद में 1828 ई. में इन विद्यालयों को एकीकृत कर कलकत्ता में एक केंद्रीय विद्यालय स्थापित किया गया।
➣ इस कार्य को प्रोत्साहन देने के लिए 1824 ई. में देशी बालिका शिक्षा हेतु महिला समिति (लेडीज़ सोसाइटी फॉर नेटिव फीमेल एजुकेशन) का गठन किया गया। इसकी अध्यक्षता तत्कालीन गवर्नर-जनरल की पत्नी लेडी एमहर्स्ट ने की।
➣ मिशनरियों का मुख्य उद्देश्य ईसाई धर्म का प्रचार था, किंतु उनके प्रयासों से भारत में आधुनिक महिला शिक्षा की नींव भी पड़ी।
➣ उन्होंने बालिकाओं को पढ़ना-लिखना, अंकगणित, सिलाई-कढ़ाई तथा गृह-प्रबंधन जैसे व्यावहारिक विषयों की शिक्षा दी।
➣ 1850 ई. तक ईसाई मिशनरी संस्थाएँ भारत में लगभग 354 दिवस-विद्यालय (लगभग 11,549 छात्र) तथा 91 आवासीय विद्यालय (लगभग 2,346 छात्र) संचालित कर रही थीं।
➣ प्रारम्भ में रूढ़िवादी हिंदू समाज ने इन विद्यालयों का कड़ा विरोध किया, क्योंकि लोगों को आशंका थी कि शिक्षित बालिकाओं का धर्मांतरण हो जाएगा।
➣ साथ ही यह अंधविश्वास भी प्रचलित था कि साक्षर कन्या शीघ्र विधवा हो जाती है। परिणामस्वरूप प्रारम्भिक वर्षों में इन विद्यालयों में छात्राओं की संख्या सीमित रही।
➣ धीरे-धीरे राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर तथा डेविड हेयर जैसे समाज सुधारकों के प्रयासों से समाज का दृष्टिकोण बदलने लगा।
➣ डेविड हेयर ने 1820 ई. में अपने व्यय से कलकत्ता में एक कन्या विद्यालय की स्थापना की। आगे चलकर इन्हीं प्रयासों ने जे.ई.डी. बेथून द्वारा 1849 ई. में स्थापित बेथून स्कूल जैसी संस्थाओं के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया।
प्रारम्भिक कन्या विद्यालय
➣ भारत में महिला शिक्षा के विकास के लिए विभिन्न मिशनरियों एवं समाज सुधारकों ने अनेक कन्या विद्यालयों की स्थापना की।
| वर्ष | विद्यालय / संस्था | संस्थापक / स्थान | महत्व |
|---|---|---|---|
| 1819 ई. | कलकत्ता फीमेल जुवेनाइल सोसायटी (तरुण स्त्री सभा) | बैपटिस्ट मिशनरी सोसायटी, कलकत्ता | भारत में संगठित रूप से बालिकाओं की शिक्षा के लिए स्थापित प्रथम मिशनरी संस्था; आगे चलकर इसका नाम Calcutta Baptist Female School Society रखा गया। |
| 1824 ई. | नेटिव फीमेल एजुकेशन सोसायटी | कलकत्ता | भारतीय बालिकाओं की शिक्षा के प्रसार हेतु स्थापित प्रमुख संस्था, जिसने बंगाल में अनेक कन्या विद्यालयों की स्थापना की। |
| 1848 ई. | प्रथम स्वदेशी कन्या विद्यालय | ज्योतिराव फुले एवं सावित्रीबाई फुले, पुणे | भारतीयों द्वारा स्थापित प्रथम स्वदेशी कन्या विद्यालय; सावित्रीबाई फुले इसकी प्रथम शिक्षिका बनीं। |
सावित्रीबाई फुले को भारत की प्रथम महिला शिक्षिका माना जाता है। उन्होंने 1848 ई. में ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर पुणे में प्रथम स्वदेशी कन्या विद्यालय की स्थापना की।
बेथून स्कूल (1849 ई.)
➣ बेथून स्कूल भारत में आधुनिक महिला शिक्षा के इतिहास का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है। यह भारत का पहला ऐसा विद्यालय था, जिसकी स्थापना विशेष रूप से लड़कियों को आधुनिक शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से की गई। इस संस्था ने न केवल बंगाल बल्कि पूरे भारत में महिला शिक्षा के प्रति नई जागरूकता उत्पन्न की।
➣ इस विद्यालय के संस्थापक जॉन इलियट ड्रिंकवाटर बेथून का जन्म 1801 ई. में इंग्लैंड के ईलिंग में हुआ था।
➣ उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त की और “फोर्थ रैंग्लर” के रूप में प्रतिष्ठा अर्जित की। बाद में वे बैरिस्टर बने तथा कानून एवं शिक्षा दोनों क्षेत्रों में अपनी विशेष पहचान बनाई।
➣ 1848 ई. में बेथून भारत आए और उन्हें गवर्नर-जनरल की परिषद में विधि सदस्य नियुक्त किया गया। इसके साथ ही वे शिक्षा परिषद के अध्यक्ष भी बने।
➣ भारत आने के बाद उन्होंने देखा कि महिलाओं की शिक्षा की स्थिति अत्यन्त दयनीय है और समाज में अधिकांश लड़कियाँ शिक्षा से पूरी तरह वंचित हैं। उनका विश्वास था कि जब तक महिलाओं को शिक्षा नहीं मिलेगी, तब तक समाज का वास्तविक विकास संभव नहीं है।
➣ इसी उद्देश्य से उन्होंने कलकत्ता में लड़कियों के लिए एक आधुनिक विद्यालय स्थापित करने का निश्चय किया। इस कार्य में तत्कालीन समाज सुधारकों ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, राजा दक्षिणारंजन मुखोपाध्याय, रामगोपाल घोष तथा मदनमोहन तर्कालंकार ने उनका भरपूर सहयोग किया। विशेष रूप से राजा दक्षिणारंजन मुखोपाध्याय ने विद्यालय की स्थापना के लिए भूमि उपलब्ध कराई।
➣ मई, 1849 ई. में कलकत्ता के बैठकखाना (बड़ाबाजार क्षेत्र) में मुखोपाध्याय के निवास पर इस विद्यालय की स्थापना की गई। प्रारम्भ में इसका नाम हिंदू फीमेल स्कूल रखा गया, जिसे कुछ अभिलेखों में कलकत्ता फीमेल स्कूल भी कहा गया है।
➣ विद्यालय की शुरुआत केवल दो छात्राओं – भुवनमाला तथा कुंदमाला (मदनमोहन तर्कालंकार की पुत्रियाँ) – से हुई थी।
7 मई, 1849 ई. को विद्यालय ने नियमित रूप से 21 छात्राओं के साथ कार्य प्रारम्भ किया और देखते ही देखते अगले वर्ष छात्राओं की संख्या बढ़कर लगभग 80 हो गई। यह उस समय के सामाजिक वातावरण को देखते हुए एक बड़ी उपलब्धि थी।➣ विद्यालय के बढ़ते महत्व को देखते हुए इसके लिए नए भवन का निर्माण करने का निर्णय लिया गया। 6 नवंबर, 1850 ई. को कॉर्नवालिस स्क्वायर के पश्चिमी भाग में नए भवन की आधारशिला तत्कालीन बंगाल के उप-गवर्नर सर जॉन लिटलर ने रखी।
➣ इसी वर्ष दिसंबर, 1850 ई. में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर को विद्यालय की प्रबंध समिति का सचिव नियुक्त किया गया। उन्होंने विद्यालय के संचालन, छात्राओं के प्रवेश तथा समाज में महिला शिक्षा के प्रचार-प्रसार में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ उस समय भारतीय समाज का एक बड़ा वर्ग लड़कियों की शिक्षा का विरोध करता था। रूढ़िवादी लोगों का मानना था कि महिलाओं को शिक्षा देना धर्म और परंपरा के विरुद्ध है।
➣ विद्यालय आने-जाने वाली छात्राओं का उपहास उड़ाया जाता था और उन पर कटाक्ष किए जाते थे। इन परिस्थितियों को देखते हुए बेथून ने छात्राओं के लिए विशेष बंद गाड़ियों की व्यवस्था करवाई, ताकि वे सुरक्षित वातावरण में विद्यालय आ-जा सकें।
➣ 12 अगस्त, 1851 ई. को जॉन इलियट ड्रिंकवाटर बेथून का निधन हो गया। अपने अंतिम समय में उन्होंने अपनी अधिकांश चल-अचल संपत्ति विद्यालय के नाम कर दी। उनके निधन के बाद तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौज़ी ने इस संस्था को संरक्षण प्रदान किया और इसके विकास का कार्य जारी रखा।
➣ 1856 ई. में ब्रिटिश सरकार ने विद्यालय का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया। इसके बाद संस्थापक के सम्मान में इसका नाम बदलकर बेथून स्कूल रखा गया। आज भी 12 अगस्त को उनकी स्मृति में “बेथून दिवस” मनाया जाता है।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| स्थापना | मई, 1849 ई. (नियमित प्रारम्भ – 7 मई, 1849) |
| संस्थापक | जॉन इलियट ड्रिंकवाटर बेथून |
| स्थापना स्थल | बैठकखाना, कलकत्ता |
| प्रारम्भिक नाम | हिंदू फीमेल स्कूल (कलकत्ता फीमेल स्कूल) |
| भूमि दाता | राजा दक्षिणारंजन मुखोपाध्याय |
| प्रथम सचिव | ईश्वरचन्द्र विद्यासागर (दिसंबर, 1850) |
| सरकारी प्रबंधन | 1856 ई. |
| विशेष महत्व | भारत में आधुनिक महिला शिक्षा का प्रथम संगठित विद्यालय |
बेथून कॉलेज की स्थापना
➣ बेथून स्कूल की सफलता ने यह सिद्ध कर दिया कि यदि अवसर मिले तो भारतीय महिलाएँ भी उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकती हैं। लेकिन उस समय विद्यालयी शिक्षा के बाद लड़कियों के लिए कॉलेज स्तर की पढ़ाई की कोई व्यवस्था नहीं थी। इसी आवश्यकता ने आगे चलकर भारत के प्रथम महिला कॉलेज की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।
➣ 1873 ई. में अंग्रेज़ शिक्षाविद् एनेट एक्रॉयड ने कलकत्ता में हिंदू महिला विद्यालय नामक एक बोर्डिंग स्कूल की स्थापना की। बाद में इसका नाम बंग महिला विद्यालय रखा गया। इस संस्था के विकास में प्रसिद्ध समाज सुधारक द्वारकानाथ गांगुली का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
➣ अगस्त, 1878 ई. में बेथून स्कूल और बंग महिला विद्यालय का विलय कर दिया गया। इस विलय में द्वारकानाथ गांगुली, दुर्गामोहन दास तथा आनन्दमोहन बसु ने सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद महिला शिक्षा को विद्यालय स्तर से आगे बढ़ाकर उच्च शिक्षा तक ले जाने का मार्ग खुल गया।
➣ 1879 ई. में इस संयुक्त संस्था को कॉलेज का दर्जा प्रदान किया गया और इसका नाम बेथून कॉलेज रखा गया। इसे भारत तथा एशिया का प्रथम महिला कॉलेज माना जाता है।
➣ यद्यपि लड़कियों के लिए पहला विद्यालय ज्योतिराव फुले द्वारा 1848 ई. में पुणे के भिड़े वाड़ा में स्थापित किया गया था, किन्तु कॉलेज स्तर पर यह उपलब्धि बेथून कॉलेज को प्राप्त हुई।
➣ 1878 ई. में कादम्बिनी गांगुली (नी बसु) कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। उनके लिए उच्च शिक्षा की व्यवस्था करने हेतु बेथून स्कूल में विशेष कॉलेज कक्षाएँ प्रारम्भ की गईं।
➣ 1881 ई. में चंद्रमुखी बसु भी इन कॉलेज कक्षाओं में शामिल हुईं। इसके बाद 1883 ई. में कादम्बिनी गांगुली और चंद्रमुखी बसु कलकत्ता विश्वविद्यालय ही नहीं, बल्कि पूरे ब्रिटिश साम्राज्य की पहली महिला स्नातक बनीं। यह उपलब्धि भारतीय महिला शिक्षा के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में गिनी जाती है।
➣ आगे चलकर कादम्बिनी गांगुली कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लेने वाली पहली भारतीय महिला बनीं और भारत की प्रथम व्यावसायिक महिला चिकित्सकों में भी उनका नाम शामिल हुआ।
➣ इस प्रकार बेथून कॉलेज ने केवल महिलाओं को उच्च शिक्षा ही नहीं दी, बल्कि उन्हें विभिन्न पेशेवर क्षेत्रों में आगे बढ़ने का अवसर भी प्रदान किया।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| हिंदू महिला विद्यालय | 1873 ई. (एनेट एक्रॉयड) |
| बाद का नाम | बंग महिला विद्यालय |
| बेथून स्कूल में विलय | अगस्त, 1878 ई. |
| बेथून कॉलेज | 1879 ई. (भारत एवं एशिया का प्रथम महिला कॉलेज) |
| प्रथम महिला प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण | कादम्बिनी गांगुली (1878 ई.) |
| प्रथम महिला स्नातक | कादम्बिनी गांगुली एवं चंद्रमुखी बसु (1883 ई.) |
प्रमुख समाज सुधारकों का योगदान
➣ भारत में महिला शिक्षा के विकास में समाज सुधारकों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही। उन्होंने समाज में प्रचलित बाल विवाह, पर्दा प्रथा, सती प्रथा, स्त्री अशिक्षा एवं रूढ़िवादी मान्यताओं का विरोध किया तथा महिलाओं को शिक्षा के अधिकार के प्रति जागरूक किया।
➣ राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले, महादेव गोविन्द रानाडे तथा डी.के. कर्वे जैसे समाज सुधारकों के प्रयासों से महिला शिक्षा को व्यापक सामाजिक समर्थन मिला तथा भारत में आधुनिक महिला शिक्षा के विकास को नई दिशा प्राप्त हुई।
| व्यक्तित्व / संस्था | महत्वपूर्ण योगदान |
|---|---|
| राजा राममोहन राय | महिला एवं आधुनिक शिक्षा का समर्थन किया तथा बालिका शिक्षा के प्रति समाज में सकारात्मक वातावरण तैयार किया। |
| ईश्वरचन्द्र विद्यासागर | बंगाल में अनेक कन्या विद्यालय स्थापित किए तथा बेथून स्कूल के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। |
| ज्योतिराव फुले | 1848 ई. में पुणे के भिड़े वाड़ा में सावित्रीबाई फुले के साथ भारत का पहला आधुनिक बालिका विद्यालय स्थापित किया तथा दलित एवं वंचित बालिकाओं की शिक्षा को प्रोत्साहित किया। |
| सावित्रीबाई फुले | भारत की प्रथम महिला शिक्षिका मानी जाती हैं। फातिमा शेख के साथ मिलकर महिला शिक्षा के प्रसार में ऐतिहासिक योगदान दिया। |
| महादेव गोविन्द रानाडे | रमाबाई रानाडे के माध्यम से महिला शिक्षा एवं सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया, विशेषकर महाराष्ट्र में। |
| धोंडो केशव कर्वे (महर्षि कर्वे) | 1896 ई. में हिन्दू विधवा गृह तथा 1916 ई. में SNDT महिला विश्वविद्यालय की स्थापना की। |
| कदम्बिनी गांगुली एवं चन्द्रमुखी बसु | 1883 ई. में कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक बनने वाली ब्रिटिश भारत की प्रथम भारतीय महिला स्नातक। |
| बेथून कॉलेज (1879 ई.) | भारत के प्रारम्भिक महिला महाविद्यालयों में से एक, जिसने महिला उच्च शिक्षा के विकास को नई दिशा दी। |
| SNDT महिला विश्वविद्यालय (1916 ई.) | महर्षि कर्वे द्वारा स्थापित, भारत का प्रथम महिला विश्वविद्यालय। |
महिला उच्च शिक्षा का विकास
➣ 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक भारत में महिला शिक्षा का विस्तार मुख्यतः प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तर तक ही सीमित था। समाज सुधारकों, ईसाई मिशनरियों तथा ब्रिटिश शिक्षा नीतियों के संयुक्त प्रयासों से धीरे-धीरे महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा के द्वार भी खुलने लगे।
➣ प्रारम्भ में महिलाओं का विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में प्रवेश अत्यंत सीमित था, किन्तु समय के साथ अनेक महिलाओं ने उच्च शिक्षा प्राप्त कर नई उपलब्धियाँ हासिल कीं।
➣ कदम्बिनी गांगुली, चन्द्रमुखी बसु जैसी अग्रणी महिलाओं ने इस दिशा में नए कीर्तिमान स्थापित किए, जबकि SNDT महिला विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों ने महिला उच्च शिक्षा को संगठित आधार प्रदान किया।
➣ ब्रिटिश काल के अंत तक महिला उच्च शिक्षा का दायरा पहले की अपेक्षा काफी विस्तृत हो चुका था। इसके परिणामस्वरूप शिक्षित महिलाओं की संख्या बढ़ी और उन्होंने शिक्षा, चिकित्सा, समाज सेवा तथा सार्वजनिक जीवन सहित विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान देना प्रारम्भ किया।
| विषय | कदम्बिनी गांगुली | चन्द्रमुखी बसु |
|---|---|---|
| जीवनकाल | 1861-1923 ई. | 1860-1944 ई. |
| प्रमुख पहचान | भारत की प्रारम्भिक महिला चिकित्सकों में से एक तथा महिला उच्च शिक्षा की अग्रणी हस्ती। | महिला उच्च शिक्षा की अग्रदूत तथा भारत की प्रथम भारतीय महिला स्नातकोत्तर एवं प्रथम भारतीय महिला महाविद्यालय प्राचार्या। |
| 1883 ई. की उपलब्धि | कदम्बिनी गांगुली एवं चन्द्रमुखी बसु कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक बनने वाली ब्रिटिश भारत की प्रथम भारतीय महिला स्नातक थीं। | |
| उच्च शिक्षा | कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से चिकित्सा शिक्षा प्राप्त की। | 1884 ई. में कलकत्ता विश्वविद्यालय से M.A. की उपाधि प्राप्त कर ब्रिटिश भारत की प्रथम भारतीय महिला स्नातकोत्तर बनीं। |
| विशेष उपलब्धि | भारत की प्रारम्भिक महिला चिकित्सकों में स्थान प्राप्त किया। | बेथून कॉलेज की प्रथम भारतीय महिला प्राचार्या बनीं। |
| महिला शिक्षा में योगदान | उनकी सफलता ने महिलाओं को उच्च शिक्षा एवं पेशेवर क्षेत्रों में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। | उनके नेतृत्व ने महिला उच्च शिक्षा एवं शैक्षणिक प्रशासन में महिलाओं की भागीदारी को नई दिशा दी। |
महिला विश्वविद्यालय (SNDT)
➣ भारत में आधुनिक महिला उच्च शिक्षा के विकास में श्रीमती नाथीबाई दामोदर ठाकर्से (SNDT) महिला विश्वविद्यालय की स्थापना एक ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जाती है।
➣ यह भारत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रथम महिला विश्वविद्यालय है। इसकी स्थापना का उद्देश्य महिलाओं को ऐसी उच्च शिक्षा उपलब्ध कराना था, जिससे वे सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें।
➣ इस विश्वविद्यालय के संस्थापक धोंडो केशव कर्वे थे, जिन्हें बाद में उनके समाज सुधार कार्यों के कारण “महर्षि कर्वे” की उपाधि प्राप्त हुई।
➣ उनका जन्म 18 अप्रैल, 1858 ई. को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के दापोली में हुआ था। वे पेशे से गणित के प्रोफेसर थे, किंतु उनका वास्तविक जीवन-कार्य महिला शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह और महिला सशक्तिकरण को समर्पित रहा।
➣ उस समय भारतीय समाज में बाल-विवाह, विधवा-जीवन और महिलाओं की अशिक्षा जैसी अनेक सामाजिक समस्याएँ व्याप्त थीं। विशेष रूप से विधवाओं की स्थिति अत्यन्त दयनीय थी।
➣ महर्षि कर्वे का मानना था कि समाज में महिलाओं का सम्मान तभी बढ़ेगा, जब उन्हें शिक्षा और आत्मनिर्भरता का अवसर मिलेगा। इसी विचार ने उन्हें सामाजिक सुधार के क्षेत्र में सक्रिय किया।
➣ 1893 ई. में उन्होंने “विधवा विवाहोत्तेजक मंडली” की स्थापना की, जिसका उद्देश्य विधवा-पुनर्विवाह को बढ़ावा देना था। उन्होंने केवल इसका प्रचार ही नहीं किया, बल्कि स्वयं भी एक विधवा से विवाह कर समाज के सामने एक साहसिक उदाहरण प्रस्तुत किया। उस समय यह कदम अत्यन्त क्रांतिकारी माना जाता था।
➣ 1896 ई. में महर्षि कर्वे ने पुणे के निकट हिंगणे में विधवाओं और असहाय महिलाओं के पुनर्वास तथा शिक्षा के लिए एक आश्रम की स्थापना की।
➣ आगे चलकर 1907 ई. में उन्होंने वहीं एक महिला विद्यालय भी प्रारम्भ किया। इस विद्यालय की पहली छात्रा उनकी विधवा साली पार्वतीबाई आठवले थीं, जिन्होंने आगे चलकर महिला शिक्षा के प्रसार में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
➣ महर्षि कर्वे जापान वीमेंस यूनिवर्सिटी से अत्यधिक प्रभावित थे। उनका विचार था कि भारत में भी महिलाओं के लिए एक स्वतंत्र विश्वविद्यालय होना चाहिए, जहाँ वे बिना किसी सामाजिक भेदभाव के उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें। इसी प्रेरणा ने उन्हें
➣ भारत के पहले महिला विश्वविद्यालय की स्थापना का संकल्प लेने के लिए प्रेरित किया।
➣ दिसंबर, 1915 ई. में बंबई में आयोजित राष्ट्रीय सामाजिक सुधार कांग्रेस के अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने भारत में महिला विश्वविद्यालय स्थापित करने की औपचारिक घोषणा की। यह घोषणा उस समय अत्यन्त साहसिक मानी गई, क्योंकि अधिकांश लोग महिलाओं की उच्च शिक्षा के पक्ष में नहीं थे।
➣ 1916 ई. में पुणे में इंडियन वीमेंस यूनिवर्सिटी की स्थापना की गई। इसकी शुरुआत केवल 5 छात्राओं के साथ हुई। उल्लेखनीय बात यह थी कि महर्षि कर्वे ने सरकारी सहायता या सरकारी अनुमति की प्रतीक्षा किए बिना ही
➣ इस विश्वविद्यालय की स्थापना कर दी। प्रारम्भिक वर्षों में उन्होंने स्वयं देशभर में घूम-घूमकर धन एकत्र किया और लोगों को महिला शिक्षा के महत्व के प्रति जागरूक किया।
➣ विश्वविद्यालय के विकास में बंबई के प्रसिद्ध उद्योगपति और समाजसेवी सर विठ्ठलदास ठाकर्से का महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने अपनी माता श्रीमती नाथीबाई दामोदर ठाकर्से की स्मृति में विश्वविद्यालय को 15 लाख रुपये का दान देने का वचन दिया। यह उस समय की दृष्टि से अत्यन्त बड़ी राशि थी।
➣ उनके इस योगदान के सम्मान में 1920 ई. में विश्वविद्यालय का नाम बदलकर “श्रीमती नाथीबाई दामोदर ठाकर्से (SNDT) महिला विश्वविद्यालय” कर दिया गया।
➣ 1921 ई. में इस विश्वविद्यालय की पहली पाँच छात्राओं ने स्नातक की डिग्री प्राप्त की। यह घटना भारतीय महिला शिक्षा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी, क्योंकि पहली बार किसी भारतीय महिला विश्वविद्यालय से छात्राएँ स्नातक बनकर निकली थीं।
➣ विश्वविद्यालय के विस्तार के साथ 1931 ई. में इसका पहला कॉलेज बंबई (मुंबई) में स्थापित किया गया। इसके बाद 1936 ई. में विश्वविद्यालय का मुख्यालय पुणे से मुंबई स्थानांतरित कर दिया गया।
➣ मुंबई आने के बाद विश्वविद्यालय का तेजी से विस्तार हुआ और देश के विभिन्न भागों की छात्राओं को यहाँ उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलने लगा।
➣ 1949 ई. में भारत सरकार ने इस विश्वविद्यालय को सांविधिक विश्वविद्यालय के रूप में मान्यता प्रदान की। इसके बाद यह भारत के प्रमुख महिला विश्वविद्यालयों में शामिल हो गया तथा शिक्षा, शोध और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में इसकी भूमिका लगातार बढ़ती गई।
➣ महर्षि कर्वे के असाधारण सामाजिक योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1955 ई. में पद्म विभूषण तथा उनकी जन्मशती के अवसर पर 1958 ई. में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया। 9 नवंबर, 1962 ई. को 104 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। उनका संपूर्ण जीवन महिला शिक्षा और समाज सुधार के लिए समर्पित रहा।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| विश्वविद्यालय | श्रीमती नाथीबाई दामोदर ठाकर्से (SNDT) महिला विश्वविद्यालय |
| संस्थापक | धोंडो केशव कर्वे (महर्षि कर्वे) |
| स्थापना | 1916 ई., पुणे (मूल नाम – इंडियन वीमेंस यूनिवर्सिटी) |
| प्रथम छात्राएँ | 5 छात्राओं के साथ शुरुआत |
| नाम परिवर्तन | 1920 ई. (श्रीमती नाथीबाई दामोदर ठाकर्से के नाम पर) |
| मुख्य दानदाता | सर विठ्ठलदास ठाकर्से (15 लाख रुपये) |
| प्रथम स्नातक | 1921 ई. (प्रथम पाँच छात्राएँ) |
| प्रथम कॉलेज | 1931 ई., बंबई (मुंबई) |
| मुख्यालय स्थानांतरण | पुणे से मुंबई – 1936 ई. |
| सांविधिक मान्यता | 1949 ई. |
| महर्षि कर्वे को पद्म विभूषण | 1955 ई. |
| महर्षि कर्वे को भारत रत्न | 1958 ई. |
| विशेष महत्व | भारत एवं दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रथम महिला विश्वविद्यालय |
महिला शिक्षा सम्बन्धी नीतियाँ एवं आयोग
➣ 19वीं शताब्दी के मध्य से ब्रिटिश सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न नीतियों, आयोगों एवं समितियों का गठन किया। यद्यपि इनका उद्देश्य सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था में सुधार करना था, किन्तु इनके माध्यम से महिला शिक्षा को भी धीरे-धीरे सरकारी मान्यता एवं प्रोत्साहन प्राप्त होने लगा।
➣ इन नीतियों एवं आयोगों के परिणामस्वरूप कन्या विद्यालयों, महिला महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालय स्तर पर महिलाओं की शिक्षा के अवसरों में धीरे-धीरे वृद्धि हुई। यद्यपि यह प्रगति सीमित थी, फिर भी इसने स्वतंत्र भारत में महिला शिक्षा के व्यापक विस्तार की आधारशिला रखी।
| आयोग / नीति | महिला शिक्षा में योगदान |
|---|---|
| वुड्स डिस्पैच (1854 ई.) | पहली बार महिला शिक्षा को सरकारी प्रोत्साहन देने, कन्या विद्यालयों की स्थापना, महिला शिक्षकों के प्रशिक्षण तथा अनुदान (Grant-in-Aid) की व्यवस्था पर बल दिया। |
| हंटर आयोग (1882 ई.) | महिला शिक्षा के विस्तार, कन्या विद्यालयों की संख्या बढ़ाने, स्थानीय निकायों की भागीदारी, महिला शिक्षकों के प्रशिक्षण तथा अनुदान प्रणाली को प्रोत्साहित करने की सिफारिश की। |
| भारतीय विश्वविद्यालय आयोग (1902 ई.) एवं विश्वविद्यालय अधिनियम (1904 ई.) | उच्च शिक्षा व्यवस्था में सुधार के परिणामस्वरूप महिलाओं के लिए विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा के अवसरों का विस्तार हुआ तथा महिला महाविद्यालयों को अप्रत्यक्ष लाभ मिला। |
| सैडलर आयोग (1917-1919 ई.) | महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा के अवसर बढ़ाने तथा विश्वविद्यालय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने पर बल दिया। |
| हार्टोग समिति (1929 ई.) | बालिका शिक्षा, प्रशिक्षित महिला शिक्षकों, शिक्षा की गुणवत्ता तथा ड्रॉपआउट कम करने पर विशेष बल दिया। |
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