मैसूर राज्य (1761-1799): हैदर अली, टीपू सुल्तान एवं आंग्ल-मैसूर युद्ध

भारतीय इतिहास आधुनिक भारत मैसूर राज्य (1761-1799)
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परिचय

23 जनवरी, 1565 ई. को हुए तालीकोटा के निर्णायक युद्ध में विजयनगर साम्राज्य की पराजय के बाद दक्षिण भारत में उसकी राजनीतिक शक्ति समाप्त हो गई।

➣ यद्यपि अरविदु वंश के शासकों ने कुछ समय तक शासन जारी रखा, किन्तु कालांतर में विजयनगर साम्राज्य अनेक स्वतंत्र राज्यों में विभाजित हो गया।

➣ इनमें मैसूर, तंजौर, मदुरा तथा इक्केरी (केलाड़ी) प्रमुख थे। आगे चलकर मैसूर दक्षिण भारत की सबसे शक्तिशाली रियासतों में से एक बन गया।

मैसूर राज्य का मानचित्र

वाडियार वंश

अरविदु वंश के शासक वेंकट द्वितीय के शासनकाल में लगभग 1612 ई. में वाडियार (ओडेयर) वंश की स्थापना हुई। इसी वर्ष वेंकट द्वितीय ने राजा वाडियार को मैसूर के राजा की उपाधि प्रदान की।

➣ प्रारम्भ में वाडियार शासक विजयनगर साम्राज्य के सामन्त थे, किन्तु विजयनगर की शक्ति के पतन के बाद वे स्वतंत्र शासक बन गए।

चिक्का देवराज वाडियार (1673-1704 ई.) वाडियार वंश का सबसे योग्य शासक माना जाता है। उसके शासनकाल में मैसूर राज्य का विस्तार हुआ तथा प्रशासन एवं राजस्व व्यवस्था को सुदृढ़ बनाया गया। 1704 ई. में उसने औरंगजेब की अधीनता स्वीकार कर ली थी। इसी कारण आगे चलकर हैदराबाद का निज़ाम मैसूर को पूर्व मुग़ल प्रदेश मानकर उस पर अपना अधिकार जताता था।

1719 ई. में सैय्यद बंधुओं और मराठा पेशवा बालाजी विश्वनाथ के बीच हुई दिल्ली की सन्धि के परिणामस्वरूप मराठा शासक शाहू को दक्षिण के छह मुग़ल सूबों से चौथ और सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार प्राप्त हुआ।

➣ इस व्यवस्था के अंतर्गत मैसूर भी मराठों के प्रभाव क्षेत्र में आ गया, जिससे उस पर मराठों का आर्थिक एवं राजनीतिक दबाव लगातार बढ़ता गया।

इस समय उत्तर भारत में मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह (रौशन अख्तर) (1719-1748 ई.) का शासन था। इसी काल में मुग़ल साम्राज्य की शक्ति निरन्तर कमजोर होती गई, जिससे दक्षिण भारत में मराठों, निज़ाम तथा अन्य क्षेत्रीय शक्तियों का प्रभाव बढ़ने लगा।

➣ वाडियार वंश के अन्तिम प्रभावहीन शासक चिक्का कृष्णराज वाडियार द्वितीय के समय राजा केवल नाममात्र का शासक रह गया था।

➣ शासन की वास्तविक शक्ति दो भाइयों-नंजराज दलवाई (सेनापति एवं सैन्य विभाग का प्रधान) तथा देवराज सर्वाधिकारी (नागरिक एवं राजस्व प्रशासन का प्रधान)-के हाथों में केंद्रित हो गई।

नंजराज और देवराज के मध्य सत्ता-संघर्ष तथा प्रशासनिक दुर्बलता के कारण मैसूर की स्थिति लगातार कमजोर होती गई।

➣ इस अवसर का लाभ उठाकर मराठों ने बार-बार मैसूर पर आक्रमण किए और उससे भारी चौथ एवं हर्जाना वसूला, जबकि निज़ाम भी उस पर अपना अधिकार स्थापित करने का प्रयास करता रहा।

➣ इसी राजनीतिक अस्थिरता और सैन्य संकट के वातावरण में मैसूर की सेना में एक साधारण सैनिक के रूप में हैदर अली का उदय हुआ।

➣ अपनी असाधारण सैन्य प्रतिभा, संगठन क्षमता और राजनीतिक कौशल के बल पर उसने शीघ्र ही सेना में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया तथा आगे चलकर मैसूर की वास्तविक सत्ता अपने हाथों में लेकर उसे दक्षिण भारत की सबसे शक्तिशाली शक्तियों में परिवर्तित कर दिया।

हैदर अली (1761-1782 ई.)

हैदर अली का जन्म लगभग 1722 ई. में बूदीकोट (वर्तमान कोलार जिला, कर्नाटक) में हुआ था। उसके पिता फ़तेह मोहम्मद मैसूर राज्य की सेना में एक अधिकारी (फ़ौजदार) थे।

➣ हैदर अली औपचारिक रूप से अधिक शिक्षित नहीं था, किन्तु वह असाधारण बुद्धिमत्ता, व्यावहारिक ज्ञान तथा संगठन क्षमता का धनी था। बचपन से ही हैदर अली का झुकाव सैन्य जीवन की ओर था।

➣ उसने युद्धनीति, कूटनीति एवं प्रशासन का ज्ञान अपने अनुभव तथा फ्रांसीसी सैन्य अधिकारियों के सम्पर्क से प्राप्त किया। इसी कारण वह आगे चलकर दक्षिण भारत का एक अत्यन्त सफल सेनानायक एवं शासक सिद्ध हुआ।

➣ युवावस्था में हैदर अली ने मैसूर के शक्तिशाली मंत्री नंजराज की सेना में एक साधारण सैनिक के रूप में सेवा प्रारम्भ की। अपनी वीरता, साहस और सैन्य कौशल के कारण उसने शीघ्र ही सेना में विशेष स्थान बना लिया।

1755 ई. में उसकी योग्यता से प्रभावित होकर नंजराज ने उसे डिंडीगुल के किले का फ़ौजदार नियुक्त किया। यही नियुक्ति उसके राजनीतिक एवं सैन्य जीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई।

➣ डिंडीगुल का फ़ौजदार बनने के बाद हैदर अली ने सेना के आधुनिकीकरण पर विशेष ध्यान दिया। उसने अपनी निरक्षरता की कमी को पूरा करने के लिए खांडेराव नामक एक विद्वान ब्राह्मण को अपना विश्वस्त सलाहकार नियुक्त किया। प्रशासनिक कार्यों एवं पत्र-व्यवहार में खांडेराव उसकी सहायता करता था।

➣ हैदर अली ने सेना को यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित करने के लिए फ्रांसीसी अधिकारियों की सेवाएँ प्राप्त कीं तथा 1755 ई. में डिंडीगुल में एक आधुनिक शस्त्रागार की स्थापना कराई। उसने तोपखाने को सुदृढ़ बनाया और सैनिकों को आधुनिक हथियारों के प्रयोग का प्रशिक्षण दिलाया।

यूरोपीय शैली में सेना के प्रशिक्षण का सूत्रपात करने वाला प्रथम भारतीय शासक हैदर अली माना जाता है।

सत्ता पर अधिकार (1761 ई.)

➣ इस समय मैसूर की राजनीति अत्यन्त अस्थिर थी। वाडियार वंश का राजा केवल नाममात्र का शासक रह गया था तथा शासन की वास्तविक शक्ति नंजराज और देवराज के हाथों में थी।

➣ दोनों के बीच बढ़ते सत्ता-संघर्ष ने राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को कमजोर कर दिया। इस स्थिति का लाभ उठाकर हैदर अली ने अपनी बढ़ती सैन्य प्रतिष्ठा तथा राजनीतिक सूझबूझ के बल पर धीरे-धीरे राज्य की वास्तविक सत्ता अपने हाथों में केन्द्रित कर ली।

1761 ई. तक वह मैसूर का वास्तविक शासक बन गया, जबकि वाडियार राजा केवल औपचारिक शासक बना रहा।

प्रारम्भिक विजय एवं प्रशासनिक सुधार

➣ सत्ता प्राप्त करने के बाद हैदर अली ने राज्य के विस्तार की नीति अपनाई। 1763 ई. में उसने वेदनूर (बेदनूर/नागर) पर अधिकार कर लिया।

➣ वहाँ उत्तराधिकार के विवाद का लाभ उठाकर उसने अपने समर्थक को शासन सौंपा तथा वेदनूर का नाम बदलकर हैदरनगर रख दिया। इस विजय से उसे अत्यधिक धन-संपत्ति तथा पश्चिमी तट के व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण प्राप्त हुआ।

➣ हैदर अली ने सेना का व्यापक पुनर्गठन किया, तोपखाने को मजबूत बनाया तथा सैनिकों को नियमित वेतन देने की व्यवस्था की। उसने जागीर बाँटने की प्रथा को सीमित किया और राज्य की आय बढ़ाने के लिए राजस्व व्यवस्था को अधिक संगठित बनाया।

➣ उसने कालीकट तथा मालाबार तट के बड़े भाग पर अधिकार स्थापित किया। इस क्षेत्र में पहली बार व्यवस्थित रूप से भूमि-कर लगाया गया। इसी दौरान उसका नायर सरदारों से संघर्ष भी हुआ। मालाबार पर अधिकार से मैसूर की आर्थिक स्थिति तथा समुद्री व्यापार दोनों सुदृढ़ हुए।

➣ हैदर अली के शासनकाल में मैसूर को तीन शक्तिशाली शत्रुओं-मराठों, हैदराबाद के निज़ाम तथा अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कम्पनी का सामना करना पड़ा। दूसरी ओर फ्रांसीसियों से उसके मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे, जिनसे उसे आधुनिक सैन्य तकनीक एवं हथियार प्राप्त हुए।

➣ मराठों ने 1764 ई., 1766 ई. तथा 1771 ई. में मैसूर पर आक्रमण किए। यद्यपि इन युद्धों में हैदर अली को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, फिर भी उसने अपनी सैन्य शक्ति को सुरक्षित रखा और शीघ्र ही राज्य को पुनः सुदृढ़ कर लिया।

➣ इसी समय अंग्रेज़ों ने दक्षिण भारत में अपना प्रभाव बढ़ाने के उद्देश्य से हैदराबाद के निज़ाम के साथ गठबंधन कर लिया। मैसूर की बढ़ती शक्ति, हैदर अली की फ्रांसीसी नीति तथा अंग्रेज़ों की विस्तारवादी महत्वाकांक्षा के कारण दोनों शक्तियों के बीच संघर्ष की परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं।

➣ यही परिस्थितियाँ आगे चलकर प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767-1769 ई.) का कारण बनीं।

प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767-1769 ई.)

प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767-1769 ई.) अंग्रेज़ों की विस्तारवादी नीति तथा दक्षिण भारत में राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने की महत्वाकांक्षा का परिणाम था। उस समय हैदर अली की बढ़ती शक्ति अंग्रेज़ों के लिए चुनौती बन चुकी थी।

➣ हैदर अली के फ्रांसीसियों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे, जबकि अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कम्पनी दक्षिण भारत में फ्रांसीसी प्रभाव को समाप्त करना चाहती थी। इसके अतिरिक्त कर्नाटक के नवाब अंग्रेज़ों के सहयोगी थे, जबकि हैदर अली उनके विरोधी थे।

1767 ई. में अंग्रेज़ों ने हैदर अली की बढ़ती शक्ति को रोकने के लिए हैदराबाद के निज़ाम अली ख़ाँ को अपने पक्ष में कर लिया, किन्तु हैदर अली ने अपनी कूटनीति से निज़ाम को अंग्रेज़ों का साथ छोड़ने के लिए तैयार कर लिया तथा मराठों से भी सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया।

➣ परिणामस्वरूप कुछ समय के लिए हैदर अली और निज़ाम ने संयुक्त रूप से अंग्रेज़ों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया तथा कर्नाटक पर आक्रमण कर प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध का सूत्रपात किया।

➣ संयुक्त सेना ने कर्नाटक पर आक्रमण कर दिया, किन्तु अंग्रेज़ सेनापति जनरल जोसेफ स्मिथ ने सितम्बर 1767 ई. में चंगामा तथा तिरुवन्नामलई (त्रिनोमली) के युद्धों में हैदर अली और निज़ाम की संयुक्त सेना को पराजित कर दिया।

विषय विवरण
अवधि 1767–1769 ई.
मैसूर का शासक हैदर अली
अंग्रेज़ी पक्ष मद्रास प्रेसिडेंसी एवं हैदराबाद का निज़ाम
प्रमुख अंग्रेज़ सेनापति जनरल जोसेफ स्मिथ
समाप्ति मद्रास की संधि (4 अप्रैल, 1769 ई.)

युद्ध की प्रमुख घटनाएँ

➣ अंग्रेज़ों ने अपनी कूटनीति जारी रखी और 1768 ई. में पुनः हैदराबाद के निज़ाम को अपनी ओर मिला लिया। निज़ाम के युद्ध से अलग हो जाने के बाद हैदर अली को अकेले ही अंग्रेज़ों का सामना करना पड़ा।

➣ दूसरी ओर मराठों ने भी उसे कोई प्रभावी सैन्य सहायता नहीं दी, जिससे उसकी स्थिति और कठिन हो गई। फिर भी उसने अपनी तीव्र गति, साहस तथा छापामार युद्धनीति के बल पर अंग्रेज़ों को लगातार चुनौती दी।

➣ उसने अंग्रेज़ों की सेनाओं को चकमा देते हुए तेज़ी से कूच किया और 1769 ई. में सीधे मद्रास (वर्तमान चेन्नई) की दीवारों तक पहुँच गया। अंग्रेज़ों के लिए यह अत्यन्त संकटपूर्ण स्थिति थी, क्योंकि मद्रास उस समय दक्षिण भारत में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण केन्द्र था।

➣ मद्रास पर हैदर अली के बढ़ते दबाव और उसकी सैन्य सफलता के कारण अंग्रेज़ों को अन्ततः शान्ति वार्ता के लिए विवश होना पड़ा। परिणामस्वरूप दोनों पक्षों के बीच मद्रास की संधि सम्पन्न हुई और प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध समाप्त हो गया।

मद्रास की संधि (4 अप्रैल, 1769 ई.)

4 अप्रैल, 1769 ई. को अंग्रेज़ों ने विवश होकर हैदर अली की शर्तों पर मद्रास की संधि स्वीकार की। यह संधि प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध का समापन बिन्दु थी।

➣ संधि के अनुसार दोनों पक्षों ने युद्ध के दौरान जीते गए अधिकांश प्रदेश एक-दूसरे को लौटा दिए। हालांकि करूर का क्षेत्र हैदर अली के अधिकार में ही बना रहा।

➣ अंग्रेज़ों ने यह वचन दिया कि यदि भविष्य में किसी अन्य शक्ति विशेषकर मराठों अथवा निज़ाम द्वारा हैदर अली पर आक्रमण किया जाता है, तो वे उसकी सहायता करेंगे।

➣ साथ ही हैदर अली ने भी आवश्यकता पड़ने पर अंग्रेज़ों की सहायता करने का आश्वासन दिया। युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में अंग्रेज़ों को हैदर अली को धनराशि भी देनी पड़ी।

➣ इस संधि की एक विशेष बात यह थी कि हैदर अली ने इसे ईस्ट इंडिया कम्पनी के बजाय सीधे ब्रिटेन के सम्राट जॉर्ज तृतीय के नाम पर सम्पन्न कराया।

➣ इससे उसने कम्पनी की स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता को स्वीकार करने से इंकार किया और यह स्पष्ट किया कि वह कम्पनी को केवल ब्रिटिश सम्राट का प्रतिनिधि मानता है।

मद्रास की संधि हैदर अली की एक बड़ी कूटनीतिक एवं सैन्य सफलता मानी जाती है। दक्षिण भारत में यह पहला अवसर था जब अंग्रेज़ों को किसी भारतीय शासक की शर्तों पर संधि करने के लिए विवश होना पड़ा।

चारों आंग्ल-मैसूर युद्ध : वर्ष, कारण एवं प्रमुख गठबंधन
युद्ध वर्ष मुख्य कारण अंग्रेज़ों के साथ मैसूर के साथ
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध 1767-1769 ई. दक्षिण भारत में अंग्रेज़ों एवं हैदर अली के बीच प्रभुत्व की प्रतिस्पर्धा तथा अंग्रेज़ों द्वारा मैसूर की शक्ति को रोकने का प्रयास। प्रारम्भ में हैदराबाद का निज़ाम एवं मराठे (बाद में निज़ाम हैदर अली से मिल गया) हैदर अली (बाद में निज़ाम भी)
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध 1780-1784 ई. अंग्रेज़ों द्वारा माहे पर अधिकार तथा मद्रास की संधि (1769) का उल्लंघन। युद्ध के दौरान मराठे एवं निज़ाम अंग्रेज़ों से मिल गए। प्रारम्भ में हैदर अली, मराठे एवं निज़ाम का संयुक्त मोर्चा (बाद में हैदर अली एवं टीपू सुल्तान)
तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध 1790-1792 ई. टीपू सुल्तान द्वारा त्रावणकोर पर आक्रमण, जो अंग्रेज़ों का मित्र राज्य था। मराठे एवं हैदराबाद का निज़ाम टीपू सुल्तान अकेला
चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध 1799 ई. टीपू सुल्तान के फ्रांस एवं अन्य विदेशी शक्तियों से सम्बन्ध तथा लॉर्ड वेलेजली की विस्तारवादी नीति। हैदराबाद का निज़ाम (सक्रिय सहयोग), मराठा नेतृत्व अंग्रेज़ों के प्रति मैत्रीपूर्ण रहा। टीपू सुल्तान अकेला

द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780-1784 ई.)

1769 ई. की मद्रास की संधि के अनुसार अंग्रेज़ों ने वचन दिया था कि यदि किसी अन्य शक्ति द्वारा हैदर अली पर आक्रमण किया जाता है, तो वे उसकी सहायता करेंगे।

➣ किन्तु 1770 ई. में जब मराठा पेशवा माधवराव ने मैसूर पर आक्रमण किया, तब अंग्रेज़ों ने संधि का पालन नहीं किया और हैदर अली को कोई सहायता नहीं दी। इससे हैदर अली अंग्रेज़ों से अत्यन्त असन्तुष्ट हो गया।

➣ इसके अतिरिक्त 1779 ई. में अंग्रेज़ों ने माही पर अधिकार कर लिया। माही, फ्रांसीसियों की एक छोटी बस्ती थी, जो हैदर अली के संरक्षण में थी। इसे हैदर अली ने अपनी संप्रभुता और फ्रांसीसी मित्रता के विरुद्ध अंग्रेज़ों की चुनौती माना।

➣ इन घटनाओं के परिणामस्वरूप हैदर अली ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध मराठों तथा हैदराबाद के निज़ाम के साथ एक संयुक्त मोर्चा बनाया। इसी त्रिपक्षीय गठबंधन के आधार पर 1780 ई. में द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध प्रारम्भ हुआ।

युद्ध की प्रमुख घटनाएँ

जुलाई, 1780 ई. में हैदर अली लगभग 80,000 सैनिकों तथा शक्तिशाली तोपखाने के साथ कर्नाटक में प्रविष्ट हुआ। उसने तीव्र गति से अंग्रेज़ों के अनेक क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया और उनकी संचार व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर दिया।

➣ अंग्रेज़ों ने हैदर अली की प्रगति को रोकने के लिए कर्नल विलियम बैली की सेना को गुंटूर से मद्रास की मुख्य सेना (सर हेक्टर मुनरो के नेतृत्व में) से मिलाने हेतु आगे बढ़ाया, किन्तु दोनों सेनाओं का समय पर मिलन नहीं हो सका।

10 सितम्बर, 1780 ई. को पोल्लीलुर (कांचीपुरम के निकट) के युद्ध में हैदर अली एवं उसके पुत्र टीपू सुल्तान के संयुक्त नेतृत्व में मैसूर की सेना ने अंग्रेज़ों को करारी पराजय दी।

➣ इस युद्ध में कर्नल विलियम बैली बंदी बना लिया गया तथा बाद में श्रीरंगपट्टनम के बंदीगृह में उसकी मृत्यु हो गई। अंग्रेज़ी सेना का अधिकांश भाग नष्ट हो गया अथवा बंदी बना लिया गया।

इसे भारत में अंग्रेज़ों की प्रारम्भिक सबसे बड़ी पराजयों में से एक माना जाता है, जिसकी तुलना बाद के इतिहासकारों ने कुछ हद तक चिलियांवाला (1849) जैसी पराजयों से भी की है।

अनेक इतिहासकार पोल्लीलुर (1780 ई.) की पराजय को भारत में अंग्रेज़ों की प्रारम्भिक सबसे बड़ी सैन्य पराजयों में से एक मानते हैं। इसकी तुलना बाद के चिलियांवाला के युद्ध (1849 ई.) में अंग्रेज़ों को हुई कठिन पराजय से भी की जाती है। चिलियांवाला युद्ध का सम्बन्ध सिख साम्राज्य से है।

➣ पोल्लीलुर की विजय के बाद हैदर अली ने अर्काट पर अधिकार कर लिया। इस सफलता से दक्षिण भारत में अंग्रेज़ों की स्थिति अत्यन्त कमजोर हो गई तथा मद्रास सरकार गम्भीर संकट में पड़ गई।

पोल्लीलुर का युद्ध (10 सितम्बर, 1780) द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध की पहली बड़ी घटना थी, जिसमें टीपू सुल्तान ने भी हैदर अली के साथ सक्रिय सैन्य नेतृत्व किया – यह टीपू के सैन्य कौशल के प्रारम्भिक प्रदर्शनों में से एक माना जाता है।

विषय विवरण
अवधि 1780–1784 ई.
मैसूर का नेतृत्व हैदर अली (1780–1782 ई.) एवं टीपू सुल्तान (1782–1784 ई.)
गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स
निर्णायक मोड़ पोर्टो नोवो का युद्ध (1781 ई.)
समाप्ति मंगलौर की संधि (11 मार्च, 1784 ई.)

पोर्टो नोवो का युद्ध (1781 ई.)

➣ पोल्लीलुर तथा अर्काट में मिली सफलताओं के बाद हैदर अली की शक्ति अपने चरम पर थी, जबकि दक्षिण भारत में अंग्रेज़ों की स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही थी।

➣ इस संकट से निपटने के लिए गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने अनुभवी सेनापति सर आयर कूट को विशेष सैन्य एवं वित्तीय संसाधनों के साथ दक्षिण भारत भेजा।

➣ आयर कूट पहले भी कर्नाटक युद्धों तथा वांडीवाश के युद्ध (1760 ई.) में अपनी सैन्य प्रतिभा का परिचय दे चुका था और अंग्रेज़ों का सबसे अनुभवी सेनानायक माना जाता था।

➣ साथ ही अंग्रेज़ों ने अपनी कूटनीति के माध्यम से मराठों तथा हैदराबाद के निज़ाम को हैदर अली के पक्ष से अलग कर दिया। फलस्वरूप युद्ध के आगे के चरणों में हैदर अली को लगभग अकेले ही अंग्रेज़ों का सामना करना पड़ा।

1 जुलाई, 1781 ई. को पोर्टो नोवो (वर्तमान पारंगीपेट्टई, कुड्डलोर जिला, तमिलनाडु) में हैदर अली और सर आयर कूट की सेनाओं के बीच निर्णायक युद्ध हुआ।

➣ संख्या की दृष्टि से हैदर अली की सेना अंग्रेज़ी सेना से कई गुना बड़ी थी, फिर भी आयर कूट ने अनुशासित सैन्य संगठन, प्रभावी तोपखाने तथा उत्कृष्ट युद्धनीति के बल पर मैसूर की सेना को पीछे हटने के लिए विवश कर दिया।

➣ इस युद्ध में अंग्रेज़ों ने समुद्र तट के निकट अपनी सेना की व्यूह-रचना की, जिससे उन्हें नौसैनिक सहायता, रसद तथा गोला-बारूद की नियमित आपूर्ति मिलती रही। दूसरी ओर हैदर अली अपनी विशाल सेना का पूरा लाभ नहीं उठा सका, जिससे उसे पीछे हटना पड़ा।

➣ पोर्टो नोवो की विजय ने अंग्रेज़ों का गिरता हुआ मनोबल पुनः स्थापित कर दिया तथा दक्षिण भारत में उनकी प्रतिष्ठा को पुनर्जीवित किया। इसके बाद 1781 ई. में ही पोल्लीलुर (द्वितीय युद्ध) तथा शोलिंगुर के युद्धों में भी सर आयर कूट ने हैदर अली को पीछे हटने पर विवश कर दिया।

➣ यद्यपि इन युद्धों के बाद भी अंग्रेज़ हैदर अली को निर्णायक रूप से पराजित नहीं कर सके और संघर्ष जारी रहा, फिर भी इन पराजयों के कारण मैसूर की सामरिक स्थिति पहले की अपेक्षा कमजोर हो गई। दूसरी ओर अंग्रेज़ों ने दक्षिण भारत में पुनः अपना प्रभाव स्थापित करना प्रारम्भ कर दिया।

1 जुलाई, 1781 ई. का पोर्टो नोवो का युद्ध द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का निर्णायक मोड़ माना जाता है। इस विजय के बाद दक्षिण भारत में अंग्रेज़ों की स्थिति पुनः मजबूत होने लगी। अनेक इतिहासकार इसे 18वीं शताब्दी में अंग्रेज़ों की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सैन्य विजयों में से एक मानते हैं।

हैदर अली की मृत्यु (1782 ई.)

➣ पोर्टो नोवो, द्वितीय पोल्लीलुर तथा शोलिंगुर के युद्धों के बाद भी मैसूर और अंग्रेज़ों के बीच संघर्ष जारी रहा। इस बीच युद्ध संचालन के दौरान हैदर अली गंभीर रूप से बीमार पड़ गया।

7 दिसम्बर, 1782 ई. को नरसिंगरायनपेट (चित्तूर के निकट) में उसकी मृत्यु हो गई। उस समय वह अंग्रेज़ों के विरुद्ध युद्ध का नेतृत्व कर रहा था।

➣ हैदर अली की मृत्यु के बाद उसका पुत्र टीपू सुल्तान मैसूर का शासक बना और उसने अंग्रेज़ों के विरुद्ध युद्ध जारी रखा। अंततः 1784 ई. में मंगलौर की संधि के साथ द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध समाप्त हुआ।

हैदर अली को दक्षिण भारत का ऐसा प्रथम भारतीय शासक माना जाता है जिसने अंग्रेज़ों के विरुद्ध निरन्तर संघर्ष किया और अपने जीवनकाल में कभी आत्मसमर्पण नहीं किया।

ऐतिहासिक महत्व

➣ यद्यपि वह औपचारिक रूप से वाडियार वंश का राजा नहीं था, फिर भी 1761-1782 ई. के बीच मैसूर की वास्तविक सत्ता उसी के हाथों में रही।

➣ हैदर अली को दक्षिण भारत में अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद का पहला प्रभावशाली भारतीय प्रतिद्वन्द्वी माना जाता है। उसने अपने जीवनकाल में अंग्रेज़ों के विरुद्ध निरन्तर संघर्ष किया और दक्षिण भारत में अंग्रेज़ों के शीघ्र विस्तार को रोकने का प्रयास किया।

➣ सामान्यतः हैदर अली को भारतीय इतिहास का एकमात्र ऐसा प्रमुख शासक माना जाता है जिसे अंग्रेज़ उसके जीवनकाल में निर्णायक रूप से पराजित नहीं कर सके। उसने अंग्रेज़ों की अजेयता की धारणा को गहरा आघात पहुँचाया और दक्षिण भारत में ब्रिटिश विस्तार को लंबे समय तक चुनौती दी।

➣ अनेक इतिहासकारों के अनुसार हैदर अली औपचारिक शिक्षा से वंचित होने के बावजूद एक असाधारण सैनिक, कुशल प्रशासक तथा दूरदर्शी कूटनीतिज्ञ था। उसकी सबसे बड़ी विशेषता परिस्थितियों के अनुसार त्वरित निर्णय लेने की क्षमता थी।

➣ आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि यदि हैदर अली की मृत्यु 1782 ई. में न हुई होती, तो दक्षिण भारत में अंग्रेज़ों के विस्तार की गति कुछ समय के लिए और धीमी हो सकती थी।

➣ उसकी सैन्य एवं प्रशासनिक नीतियों को उसके पुत्र टीपू सुल्तान ने आगे बढ़ाया और अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष को और अधिक सशक्त बनाया।

हैदर अली के शासनकाल की प्रमुख घटनाएँ

वर्ष प्रमुख घटना महत्त्व
लगभग 1722 ई. बूदीकोट (कोलार) में जन्म मैसूर के भावी शासक एवं महान सेनानायक
1755 ई. डिंडीगुल का फ़ौजदार नियुक्त राजनीतिक एवं सैन्य जीवन का निर्णायक मोड़
1755 ई. आधुनिक शस्त्रागार की स्थापना फ्रांसीसी सहायता से सेना का आधुनिकीकरण प्रारम्भ
1761 ई. मैसूर का वास्तविक शासक बना वाडियार वंश के नाममात्र शासन के बीच वास्तविक सत्ता प्राप्त की
1763 ई. वेदनूर (बेदनूर) पर अधिकार नाम बदलकर हैदरनगर रखा तथा पश्चिमी तट पर प्रभाव बढ़ाया
1764, 1766 एवं 1771 ई. मराठों से संघर्ष मैसूर की स्वतंत्रता बनाए रखने का प्रयास
1767-1769 ई. प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध अंग्रेज़ों से प्रथम प्रत्यक्ष संघर्ष
4 अप्रैल, 1769 ई. मद्रास की संधि प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध का अंत
1779 ई. अंग्रेज़ों द्वारा माही पर अधिकार द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का प्रमुख कारण
1780-1784 ई. द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध अंग्रेज़ों के विरुद्ध व्यापक संघर्ष
10 सितम्बर, 1780 ई. पोल्लीलुर का युद्ध टीपू सुल्तान ने कर्नल बैली की सेना को पराजित किया
1 जुलाई, 1781 ई. पोर्टो नोवो का युद्ध सर आयर कूट ने हैदर अली को पीछे हटने पर विवश किया
7 दिसम्बर, 1782 ई. हैदर अली की मृत्यु टीपू सुल्तान मैसूर का शासक बना
11 मार्च, 1784 ई. मंगलौर की संधि द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का अंत (टीपू सुल्तान के समय)

टीपू सुल्तान (1782-1799 ई.)

टीपू सुल्तान का जन्म 20 नवम्बर, 1750 ई. को देवनहल्ली (वर्तमान बेंगलुरु ग्रामीण, कर्नाटक) में हुआ था। वह हैदर अली तथा फ़ातिमा फ़ख़र-उन-निसा (फ़ख़र-उन-निसा बेगम) का ज्येष्ठ पुत्र था।

➣ बाल्यकाल से ही टीपू सुल्तान को सैनिक, प्रशासनिक एवं धार्मिक शिक्षा प्रदान की गई। उसने अरबी, फ़ारसी, कन्नड़ तथा उर्दू भाषाओं का अध्ययन किया तथा गणित, घुड़सवारी, शस्त्र संचालन एवं युद्धकला में भी दक्षता प्राप्त की।

➣ किशोरावस्था से ही टीपू अपने पिता हैदर अली के साथ विभिन्न सैन्य अभियानों में भाग लेने लगा था। इसी अनुभव ने उसे एक कुशल सेनानायक एवं दूरदर्शी शासक के रूप में विकसित किया।

द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान 10 सितम्बर, 1780 ई. को पोल्लीलुर के युद्ध में टीपू ने कर्नल बैली के नेतृत्व वाली अंग्रेज़ी सेना को पराजित कर अपनी असाधारण सैन्य प्रतिभा का परिचय दिया।

➣ इसी वीरता के कारण आगे चलकर उसे शेर-ए-मैसूर की उपाधि से सम्मानित किया गया। उल्लेखनीय है कि शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह को कहा जाता है।

टीपू सुल्तान का प्रसिद्ध कथन था- शेर की एक दिन की ज़िंदगी गीदड़ की सौ वर्ष की ज़िंदगी से बेहतर है। यही कथन उसके व्यक्तित्व, साहस और संघर्षशीलता का प्रतीक माना जाता है।

मैसूर का शासक बनना (1782 ई.)

7 दिसम्बर, 1782 ई. को हैदर अली की मृत्यु के बाद टीपू सुल्तान मैसूर का शासक बना। उस समय द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध चल रहा था, इसलिए गद्दी संभालते ही उसे अंग्रेज़ों के विरुद्ध युद्ध का नेतृत्व करना पड़ा।

➣ टीपू सुल्तान ने अपने पिता की नीति को आगे बढ़ाते हुए अंग्रेज़ों का डटकर सामना किया तथा मैसूर को एक शक्तिशाली एवं स्वतंत्र राज्य बनाए रखने का संकल्प लिया।

➣ गद्दी संभालने के तुरंत बाद उसका मुख्य उद्देश्य अंग्रेज़ों के विरुद्ध चल रहे युद्ध को सफलतापूर्वक समाप्त करना तथा मैसूर राज्य की शक्ति को और अधिक संगठित करना था। यही संघर्ष आगे चलकर 1784 ई. की मंगलौर की संधि पर समाप्त हुआ।

द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का अंतिम चरण (1782-1784 ई.)

7 दिसम्बर, 1782 ई. को हैदर अली की मृत्यु के समय द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध अपने निर्णायक चरण में था। ऐसी परिस्थिति में उसके पुत्र टीपू सुल्तान ने मैसूर की सत्ता संभाली और बिना किसी विलम्ब के अंग्रेज़ों के विरुद्ध युद्ध का नेतृत्व अपने हाथों में ले लिया।

➣ टीपू सुल्तान ने अपने पिता की सैन्य नीति को आगे बढ़ाते हुए अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा। उसने सेना का मनोबल बनाए रखा तथा मैसूर की सामरिक स्थिति को मजबूत करने का प्रयास किया।

1783 ई. में टीपू सुल्तान ने अंग्रेज़ सेनापति ब्रिगेडियर मैथ्यूज को पराजित कर बंदी बना लिया। यह अंग्रेज़ों के लिए एक बड़ा आघात था तथा इससे मैसूर की सैन्य शक्ति का पुनः परिचय मिला।

➣ युद्ध लम्बे समय तक चलता रहा, किन्तु किसी भी पक्ष को निर्णायक सफलता प्राप्त नहीं हो सकी। निरन्तर युद्ध के कारण दोनों पक्ष आर्थिक एवं सैन्य दृष्टि से थक चुके थे। फलस्वरूप दोनों ने शान्ति स्थापित करने का निर्णय लिया।

मंगलौर की संधि (11 मार्च, 1784 ई.)

11 मार्च, 1784 ई. को टीपू सुल्तान तथा मद्रास के गवर्नर लॉर्ड मैकार्टनी के बीच मंगलौर की संधि सम्पन्न हुई। इसी संधि के साथ द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध समाप्त हो गया। उस समय भारत का गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स था।

➣ इस संधि के अनुसार दोनों पक्षों ने युद्ध के दौरान जीते गए प्रदेश एक-दूसरे को वापस करने तथा सभी युद्धबंदियों को मुक्त करने पर सहमति व्यक्त की।

➣ मंगलौर की संधि अंग्रेज़ों और मैसूर के बीच समान स्तर पर सम्पन्न हुई थी। इससे स्पष्ट हुआ कि उस समय अंग्रेज़ अभी तक मैसूर को सैन्य शक्ति के बल पर पराजित करने में सफल नहीं हो सके थे।

➣ इस संधि ने दक्षिण भारत में टीपू सुल्तान की प्रतिष्ठा को और अधिक बढ़ाया तथा वह अंग्रेज़ों के सबसे शक्तिशाली भारतीय प्रतिद्वन्द्वी के रूप में स्थापित हुआ।

मंगलौर की संधि (1784 ई.) अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कम्पनी और किसी भारतीय शासक के बीच सम्पन्न अंतिम ऐसी संधि थी, जिसमें दोनों पक्षों ने समानता के आधार पर एक-दूसरे की शर्तें स्वीकार की थीं।

वारेन हेस्टिंग्स की प्रतिक्रिया

गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स इस संधि से संतुष्ट नहीं था। उसका मत था कि अंग्रेज़ों को टीपू सुल्तान के विरुद्ध अधिक कठोर नीति अपनानी चाहिए थी।

➣ लॉर्ड मैकार्टनी द्वारा सम्पन्न इस संधि पर असन्तोष व्यक्त करते हुए वारेन हेस्टिंग्स ने कहा-यह लार्ड मैकार्टनी कैसा आदमी है? मुझे अभी भी विश्वास है कि वह इस संधि के बावजूद कर्नाटक को खो देगा।

➣ यद्यपि इस संधि से कुछ समय के लिए दक्षिण भारत में शान्ति स्थापित हो गई, किन्तु अंग्रेज़ और टीपू सुल्तान दोनों ही एक-दूसरे को अपना प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी मानते रहे। परिणामस्वरूप कुछ वर्षों बाद दोनों शक्तियाँ पुनः तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-1792 ई.) में आमने-सामने आ गईं।

▪ 11 मार्च, 1784 ई. – मंगलौर की संधि
▪ पक्ष – टीपू सुल्तान एवं लॉर्ड मैकार्टनी
▪ गवर्नर जनरल – वारेन हेस्टिंग्स
▪ परिणाम – द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का अंत
▪ विशेष – अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कम्पनी और किसी भारतीय शासक के बीच समान स्तर पर हुई अंतिम संधि।

टीपू सुल्तान का प्रशासन

प्रारम्भिक नीतियाँ

➣ हैदर अली के विपरीत टीपू सुल्तान ने स्वयं को स्वतंत्र सम्राट के रूप में स्थापित किया। उसने बादशाह की उपाधि धारण की तथा अपने नाम से सिक्के जारी कराए।

➣ उसने प्रशासनिक एवं सांस्कृतिक सुधारों के अंतर्गत मौलूदीसंवत् नामक नवीन पंचांग प्रारम्भ किया तथा अनेक महीनों के नाम अरबी पद्धति के अनुसार निर्धारित किए।

➣ टीपू द्वारा जारी किए गए अनेक सिक्कों पर फ़ारसी अभिलेखों के साथ-साथ भारतीय परंपराओं के प्रतीक भी अंकित मिलते हैं, जो उसकी विशिष्ट मुद्रा-नीति को दर्शाते हैं।

प्रशासनिक व्यवस्था

टीपू सुल्तान ने अपने पिता हैदर अली की प्रशासनिक व्यवस्था को और अधिक संगठित एवं केन्द्रीकृत बनाया। उसका उद्देश्य राज्य की आय बढ़ाना, प्रशासन को कुशल बनाना तथा सेना को अधिक शक्तिशाली बनाना था।

➣ टीपू के शासन में शासन की सर्वोच्च शक्ति स्वयं सुल्तान के हाथों में केन्द्रित थी। वह राज्य के प्रशासन, न्याय, सेना, वित्त तथा विदेश नीति से सम्बन्धित प्रमुख निर्णय स्वयं लेता था।

➣ टीपू सुल्तान के शासन में प्रधानमंत्री (वज़ीर) का पद नहीं था। उसने प्रशासन को विभिन्न विभागों में विभाजित किया, जिनका संचालन मीर आसिफ के अधीन किया जाता था।

➣ केन्द्रीय प्रशासन के अंतर्गत सात प्रमुख विभाग कार्य करते थे। प्रत्येक विभाग का एक अलग अधिकारी होता था, जो सीधे सुल्तान के प्रति उत्तरदायी था। इससे प्रशासन पर सुल्तान का प्रत्यक्ष नियंत्रण बना रहता था।

प्रान्तीय प्रशासन

1784 ई. में टीपू सुल्तान ने अपने राज्य को सात प्रान्तों में विभाजित किया, जिन्हें आसफी टुकड़ी कहा जाता था। प्रत्येक प्रान्त के प्रशासन की जिम्मेदारी नियुक्त अधिकारियों को दी जाती थी।

➣ प्रान्तीय अधिकारियों पर केन्द्र सरकार का कड़ा नियंत्रण रहता था। समय-समय पर उनकी कार्यप्रणाली की समीक्षा की जाती थी, जिससे भ्रष्टाचार एवं प्रशासनिक शिथिलता पर नियंत्रण बना रहे।

➣ स्थानीय स्तर पर राजस्व, न्याय तथा कानून-व्यवस्था की देखरेख के लिए अलग-अलग अधिकारियों की नियुक्ति की जाती थी। इस प्रकार प्रशासनिक शक्तियों का विभाजन किया गया था।

धार्मिक नीति

➣ व्यक्तिगत जीवन में टीपू सुल्तान इस्लाम का अनुयायी था, किन्तु प्रशासन में उसने विभिन्न धर्मों के लोगों को समान अवसर प्रदान किए।

➣ उसके दरबार में अनेक हिन्दू अधिकारी भी उच्च पदों पर कार्यरत थे। इनमें पूरनिया तथा कृष्णराव उसके दो प्रमुख हिन्दू मंत्री थे, जिन्होंने प्रशासन एवं वित्तीय व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1791 ई. में मराठा सैनिकों द्वारा शृंगेरी शारदा पीठ पर आक्रमण एवं लूटपाट के बाद वहाँ के शंकराचार्य के अनुरोध पर टीपू सुल्तान ने मंदिर के पुनर्निर्माण तथा शारदा देवी की प्रतिमा की पुनः स्थापना के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की।

➣ श्रीरंगपट्टनम स्थित श्री रंगनाथस्वामी मंदिर तथा गंगाधरेश्वर मंदिर सहित अनेक धार्मिक संस्थानों को भी उसके शासनकाल में संरक्षण प्राप्त था।

➣ टीपू सुल्तान की धार्मिक नीति को लेकर इतिहासकारों के बीच मतभेद हैं, किन्तु यह निर्विवाद है कि उसके प्रशासन में हिन्दू अधिकारी उच्च पदों पर कार्यरत थे तथा उसने अनेक प्रमुख हिन्दू धार्मिक संस्थानों को संरक्षण और आर्थिक सहायता प्रदान की।

मुद्रा एवं पंचांग सुधार

➣ टीपू सुल्तान ने स्वयं को एक स्वतंत्र सम्राट के रूप में स्थापित करने के उद्देश्य से अपने नाम से सिक्के जारी किए तथा नई मुद्रा प्रणाली को प्रोत्साहित किया।

➣ उसने मौलूदी संवत् नामक नया पंचांग प्रारम्भ किया तथा अनेक महीनों के नाम अरबी परम्परा के अनुसार निर्धारित किए।

➣ उसके शासनकाल में सिक्कों की ढलाई, तोल एवं माप की प्रणाली में भी सुधार किए गए, जिससे व्यापार एवं राजस्व व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बनाया जा सके।

आर्थिक नीति एवं व्यापारिक सुधार

➣ टीपू सुल्तान का विश्वास था कि सुदृढ़ अर्थव्यवस्था ही शक्तिशाली सेना का आधार होती है। इसलिए उसने कृषि, उद्योग और व्यापार-तीनों क्षेत्रों के विकास पर समान रूप से बल दिया।

➣ उसने एक अवसर पर कहा था-मैं अंग्रेजों को स्थल से समाप्त कर सकता हूँ, लेकिन समुद्र को सुखा नहीं सकता। इस कथन से स्पष्ट होता है कि वह अंग्रेज़ों की वास्तविक शक्ति उनके समुद्री व्यापार और नौसैनिक प्रभुत्व को मानता था।

भारतीय शासकों में टीपू सुल्तान उन प्रारम्भिक शासकों में माना जाता है जिसने आर्थिक शक्ति को सैन्य शक्ति का आधार माना तथा कृषि, उद्योग और व्यापार के समन्वित विकास पर विशेष बल दिया।

कृषि एवं भू-राजस्व व्यवस्था

➣ टीपू सुल्तान का मानना था कि किसी भी राज्य की वास्तविक शक्ति उसकी आर्थिक समृद्धि पर निर्भर करती है। इसी कारण उसने कृषि, व्यापार तथा उद्योग को विशेष संरक्षण दिया और राज्य की आय बढ़ाने के लिए अनेक सुधार किए।

➣ टीपू ने जमींदारी व्यवस्था को समाप्त कर कृषकों से राज्य का प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्थापित किया। इससे बिचौलियों का प्रभाव कम हुआ तथा किसानों का शोषण घटाने का प्रयास किया गया।

➣ कृषकों को खेती के विकास हेतु तकावी ऋण (कृषि ऋण) प्रदान किए जाते थे, जिससे वे बीज, पशु तथा कृषि उपकरण खरीद सकें।

➣ भू-राजस्व की दर भूमि की उर्वरता तथा सिंचाई सुविधाओं के आधार पर निर्धारित की जाती थी। सामान्यतः राज्य भूमि की उपज का एक-तिहाई से आधा भाग भू-राजस्व के रूप में प्राप्त करता था।

उद्योग एवं व्यापार

➣ टीपू सुल्तान ने राज्य में आधुनिक उद्योगों को प्रोत्साहित किया तथा यह विचार प्रस्तुत किया कि भारत में भी यूरोपीय देशों की भाँति राज्य-समर्थित व्यापारिक कम्पनी स्थापित की जानी चाहिए।

➣ उसने विदेशी व्यापार को बढ़ावा देने के लिए मस्कट, ओर्मुज, जेद्दा तथा अदन जैसे प्रमुख व्यापारिक केन्द्रों में अपने व्यापारिक प्रतिनिधि नियुक्त किए तथा विदेशों में दूतावासों की स्थापना को प्रोत्साहित किया।

➣ टीपू सुल्तान ने आन्तरिक एवं विदेशी व्यापार को व्यवस्थित करने के लिए अनेक व्यापारिक नियम बनाए तथा राज्य के नियंत्रण में व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया।

➣ उसने सिक्का ढलाई, तौल एवं माप की प्रणाली में सुधार किए तथा अनेक अवैध करों और उपकरों को समाप्त कर व्यापार को अधिक सुविधाजनक बनाने का प्रयास किया।

रेशम उद्योग का विकास

➣ टीपू सुल्तान ने रेशम उत्पादन को विशेष संरक्षण दिया। उसके प्रयासों से मैसूर में रेशम उद्योग का उल्लेखनीय विकास हुआ, जिसके कारण उसे मैसूर में रेशम उद्योग का प्रणेता माना जाता है।

➣ रेशम के अतिरिक्त उसने हथियार निर्माण, चीनी, कागज़ तथा अन्य कुटीर एवं लघु उद्योगों को भी प्रोत्साहित किया, जिससे राज्य की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई।

टीपू सुल्तान के सैन्य सुधार एवं विदेश नीति

सेना का आधुनिकीकरण

➣ टीपू सुल्तान ने अपने पिता हैदर अली द्वारा स्थापित आधुनिक सैन्य व्यवस्था को और अधिक विकसित किया। उसने सेना के संगठन, प्रशिक्षण तथा शस्त्रों के आधुनिकीकरण पर विशेष बल दिया।

➣ उसने अपनी सेना को यूरोपीय शैली में संगठित किया तथा सैनिकों को आधुनिक युद्ध-पद्धति का प्रशिक्षण दिलाया। इस कार्य में उसने अनेक फ्रांसीसी सैन्य अधिकारियों की सेवाएँ प्राप्त कीं।

➣ टीपू ने पैदल सेना, घुड़सवार सेना तथा तोपखाने को सुदृढ़ बनाया और आधुनिक शस्त्रागारों की स्थापना कर हथियारों के निर्माण को प्रोत्साहित किया।

रॉकेट प्रौद्योगिकी का विकास

➣ टीपू सुल्तान को भारत में आधुनिक रॉकेट प्रौद्योगिकी का अग्रदूत माना जाता है। उसने लोहे के खोल वाले रॉकेटों का बड़े पैमाने पर निर्माण एवं युद्ध में प्रयोग कराया।

➣ इन रॉकेटों की मारक क्षमता और दूरी उस समय के अधिकांश यूरोपीय रॉकेटों से अधिक थी। आंग्ल-मैसूर युद्धों में इनके प्रयोग से अंग्रेज़ी सेना को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

➣ टीपू सुल्तान ने रॉकेट संचालन एवं उनके सैन्य उपयोग से सम्बन्धित एक सैन्य पुस्तिका भी तैयार कराई, जिससे सैनिकों को व्यवस्थित प्रशिक्षण दिया जा सके।

1799 ई. में श्रीरंगपट्टनम पर अधिकार करने के बाद अंग्रेज़ टीपू सुल्तान के अनेक रॉकेट इंग्लैंड ले गए। इन्हीं के अध्ययन के आधार पर बाद में कांग्रीव रॉकेट विकसित किए गए।

नौसेना का विकास

➣ टीपू सुल्तान का मानना था कि अंग्रेज़ों की सबसे बड़ी शक्ति उनकी नौसेना और समुद्री व्यापार है। इसलिए उसने मैसूर की नौसैनिक शक्ति को भी विकसित करने का प्रयास किया।

1796 ई. में उसने नौसेना बोर्ड की स्थापना की तथा मंगलूर, मोलीदाबाद और दाजिदाबाद में जहाज़ निर्माण हेतु डॉकयार्ड स्थापित कराए।

➣ नौसेना के संगठन में सहायता के लिए उसने फ्रांसीसी अधिकारी लेफ्टिनेंट रीपो सहित कई यूरोपीय विशेषज्ञों की सेवाएँ प्राप्त कीं। यद्यपि उसकी नौसेना अंग्रेज़ों जितनी शक्तिशाली नहीं बन सकी, फिर भी यह भारतीय शासकों द्वारा आधुनिक नौसेना विकसित करने का एक महत्त्वपूर्ण प्रयास था।

विदेश नीति

➣ टीपू सुल्तान का उद्देश्य अंग्रेज़ों के विरुद्ध एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाना था। इसके लिए उसने पश्चिम एशिया तथा यूरोप के अनेक देशों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया।

➣ उसने फ्रांस, उस्मानी (तुर्की) साम्राज्य, अरब, काबुल तथा मॉरीशस में अपने दूतमण्डल भेजे और अंग्रेज़ों के विरुद्ध सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया।

➣ विदेशी व्यापार को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ इन देशों से राजनीतिक एवं सैन्य सहयोग प्राप्त करना भी उसकी विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य था।

फ्रांसीसी क्रान्ति का प्रभाव

फ्रांसीसी क्रान्ति (1789 ई.) के आदर्शों का टीपू सुल्तान पर भी प्रभाव पड़ा। जब कुछ फ्रांसीसी अधिकारियों ने श्रीरंगपट्टनम में जैकोबिन क्लब की स्थापना का प्रस्ताव रखा, तो उसने उसे स्वीकार कर लिया।

➣ टीपू सुल्तान स्वयं इस क्लब का सदस्य बना तथा श्रीरंगपट्टनम में स्वतंत्रता का वृक्ष लगवाया। वह स्वयं को नागरिक टीपू कहलाना भी पसंद करता था।

➣ फ्रांस से उसके घनिष्ठ सम्बन्धों तथा अंग्रेज़-विरोधी नीति के कारण अंग्रेज़ी सरकार टीपू सुल्तान को भारत में अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वन्द्वी मानने लगी। यही परिस्थितियाँ आगे चलकर तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-1792 ई.) का आधार बनीं।

तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-1792 ई.)

विषय विवरण
समय 1790-1792 ई.
मैसूर का शासक टीपू सुल्तान
गवर्नर जनरल लॉर्ड कार्नवालिस
अंग्रेज़ों के सहयोगी मराठे एवं हैदराबाद का निज़ाम
समाप्ति श्रीरंगपट्टनम की संधि (मार्च, 1792 ई.)
परिणाम टीपू ने आधा राज्य खोया तथा अंग्रेज़ों का प्रभाव बढ़ा।

मंगलौर की संधि (1784 ई.) के बाद कुछ वर्षों तक मैसूर और अंग्रेज़ों के बीच शान्ति बनी रही, किन्तु दोनों पक्ष एक-दूसरे को अपना प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी मानते रहे। अंग्रेज़ दक्षिण भारत में अपने प्रभाव का विस्तार करना चाहते थे, जबकि टीपू सुल्तान मैसूर की स्वतंत्रता एवं शक्ति बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील था।

➣ अंग्रेज़ों को संदेह था कि टीपू सुल्तान फ्रांस तथा अन्य विदेशी शक्तियों से संपर्क स्थापित कर उनके विरुद्ध एक व्यापक गठबंधन बनाने का प्रयास कर रहा है। इसलिए उन्होंने टीपू को अपने साम्राज्यवादी विस्तार में सबसे बड़ी बाधा माना।

➣ युद्ध का तात्कालिक कारण 1789 ई. में टीपू सुल्तान द्वारा ट्रावनकोर पर किया गया आक्रमण था। ट्रावनकोर अंग्रेज़ों का मित्र राज्य था और उसने अंग्रेज़ों की अनुमति से अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया था।

➣ ट्रावनकोर के राजा ने कोचीन में स्थित डचों के कांगनूर तथा आयकोट के दुर्ग खरीद लिए। टीपू सुल्तान इन दुर्गों को अपने नियंत्रण में लेना चाहता था, क्योंकि वे मालाबार क्षेत्र की सुरक्षा की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण थे। इसी विवाद ने दोनों पक्षों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया।

➣ ट्रावनकोर पर टीपू के आक्रमण को अंग्रेज़ों ने मंगलौर की संधि का उल्लंघन बताते हुए युद्ध का आधार बना लिया। परिणामस्वरूप 1790 ई. में तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध प्रारम्भ हो गया।

युद्ध का प्रारम्भ

1790 ई. में अंग्रेज़ों ने जनरल विलियम मेडोज के नेतृत्व में मैसूर पर आक्रमण किया। इस युद्ध में मराठों तथा हैदराबाद के निज़ाम ने भी अंग्रेज़ों का साथ दिया, जिससे टीपू सुल्तान को तीन शक्तियों का एक साथ सामना करना पड़ा।

➣ प्रारम्भिक अभियानों में जनरल मेडोज को कोई विशेष सफलता नहीं मिली। टीपू सुल्तान ने अपनी तेज़ गति वाली सैन्य रणनीति के बल पर अंग्रेज़ी सेना की प्रगति को रोक दिया और कई स्थानों पर उन्हें भारी क्षति पहुँचाई।

कार्नवालिस का नेतृत्व

➣ जब जनरल मेडोज अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सका, तब गवर्नर जनरल लॉर्ड कार्नवालिस ने स्वयं युद्ध का नेतृत्व संभालने का निर्णय लिया।

दिसम्बर, 1790 ई. से कार्नवालिस ने युद्ध संचालन अपने हाथ में ले लिया तथा एक सुव्यवस्थित योजना के साथ मैसूर की ओर बढ़ना प्रारम्भ किया।

➣ कार्नवालिस ने वेल्लोर एवं अम्बूर मार्ग से आगे बढ़ते हुए मार्च, 1791 ई. में बंगलौर पर अधिकार कर लिया। बंगलौर की विजय अंग्रेज़ों के लिए एक बड़ी सामरिक सफलता थी, क्योंकि इससे उन्हें श्रीरंगपट्टनम तक पहुँचने का मार्ग मिल गया।

➣ बंगलौर पर अधिकार करने के बाद अंग्रेज़ी सेना ने मराठों और निज़ाम की संयुक्त सेनाओं के साथ मिलकर श्रीरंगपट्टनम की ओर कूच किया।

श्रीरंगपट्टनम की घेराबंदी

1791 ई. में अंग्रेज़ों ने पहली बार श्रीरंगपट्टनम की घेराबंदी की, किन्तु रसद की कमी, वर्षा तथा टीपू सुल्तान के प्रभावी प्रतिरोध के कारण कार्नवालिस को पीछे हटना पड़ा।

➣ इसके बाद अंग्रेज़ों ने अपनी सेना को पुनर्गठित किया तथा मराठों एवं निज़ाम की सहायता से पुनः अभियान प्रारम्भ किया।

1792 ई. के प्रारम्भ में अंग्रेज़ों ने दूसरी बार श्रीरंगपट्टनम को चारों ओर से घेर लिया। इस बार टीपू सुल्तान की स्थिति अत्यन्त कठिन हो गई और उसे अन्ततः शान्ति वार्ता के लिए विवश होना पड़ा।

तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध में पहली बार अंग्रेज़, मराठे (उस समय पेशवा माधवराव द्वितीय था, वास्तविक प्रभाव नाना फड़नवीस का था) और हैदराबाद का निज़ाम एक संयुक्त मोर्चे के रूप में टीपू सुल्तान के विरुद्ध लड़े। इसी त्रिगुट ने आगे चलकर टीपू को श्रीरंगपट्टनम की संधि (1792 ई.) करने के लिए बाध्य किया।

श्रीरंगपट्टनम की संधि (1792 ई.)

तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-1792 ई.) के दौरान अंग्रेज़, मराठों तथा हैदराबाद के निज़ाम की संयुक्त सेना ने 1792 ई. के प्रारम्भ में श्रीरंगपट्टनम को चारों ओर से घेर लिया। लगातार सैन्य दबाव और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण टीपू सुल्तान को अन्ततः संधि करने के लिए विवश होना पड़ा।

➣ परिणामस्वरूप मार्च, 1792 ई. में टीपू सुल्तान और लॉर्ड कार्नवालिस के मध्य श्रीरंगपट्टनम की संधि सम्पन्न हुई। इसी संधि के साथ तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध समाप्त हो गया।

सन्धि की प्रमुख शर्तें

➣ टीपू सुल्तान को अपने राज्य का लगभग आधा भाग अंग्रेज़ों तथा उनके सहयोगी मराठों और हैदराबाद के निज़ाम को देना पड़ा।

➣ संधि के अनुसार अंग्रेज़ों को बारामहल, डिंडीगुल तथा मालाबार का क्षेत्र प्राप्त हुआ।

मराठों को तुंगभद्रा नदी के उत्तर का क्षेत्र तथा हैदराबाद के निज़ाम को पेन्नार और कृष्णा नदी के मध्य का प्रदेश प्राप्त हुआ।

➣ युद्ध के हर्जाने के रूप में टीपू सुल्तान को तीन करोड़ रुपये (लगभग 30 लाख पाउंड) क्षतिपूर्ति के रूप में देने के लिए बाध्य किया गया।

➣ क्षतिपूर्ति की सम्पूर्ण राशि जमा होने तक टीपू सुल्तान के दो पुत्र-अब्दुल खालिक तथा मुईज़-उद-दीन-को अंग्रेज़ों के पास बंधक के रूप में रखा गया। यह घटना अंग्रेज़ी साम्राज्य की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए व्यापक रूप से प्रचारित की गई।

सन्धि का महत्व एवं परिणाम

➣ श्रीरंगपट्टनम की संधि ने मैसूर राज्य की शक्ति को गम्भीर रूप से कमजोर कर दिया। विशाल भू-भाग और आर्थिक संसाधनों के खो जाने से टीपू सुल्तान की सामरिक स्थिति पहले की अपेक्षा काफी दुर्बल हो गई।

➣ दूसरी ओर अंग्रेज़ों का प्रभाव दक्षिण भारत में और अधिक बढ़ गया। इस विजय ने अंग्रेज़ों को यह विश्वास दिलाया कि अवसर मिलने पर टीपू सुल्तान को पूर्णतः पराजित किया जा सकता है।

➣ यद्यपि इस संधि के बाद कुछ वर्षों तक शान्ति रही, किन्तु टीपू सुल्तान ने अपनी खोई हुई शक्ति पुनः प्राप्त करने तथा अंग्रेज़ों का मुकाबला करने के प्रयास जारी रखे। यही परिस्थितियाँ आगे चलकर चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799 ई.) का कारण बनीं।

लॉर्ड कार्नवालिस ने श्रीरंगपट्टनम की संधि के बाद कहा था- बिना अपने मित्रों को अत्यधिक शक्तिशाली बनाए हमने अपने सबसे बड़े शत्रु को पंगु बना दिया। यह कथन तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध की सबसे प्रसिद्ध टिप्पणियों में से एक है।

चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799 ई.)

श्रीरंगपट्टनम की संधि (1792 ई.) के बाद टीपू सुल्तान अपनी खोई हुई शक्ति को पुनः प्राप्त करने में जुट गया। उसने सेना का पुनर्गठन किया तथा अंग्रेज़ों के विरुद्ध विदेशी शक्तियों का समर्थन प्राप्त करने के प्रयास जारी रखे।

➣ इस समय भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड मॉर्निंग्टन (बाद में लॉर्ड वेलेजली) ने आक्रामक साम्राज्यवादी नीति अपनाई। उसका उद्देश्य भारत में अंग्रेज़ी प्रभुत्व का विस्तार करना तथा टीपू सुल्तान जैसी स्वतंत्र शक्तियों का अंत करना था।

➣ टीपू सुल्तान ने अंग्रेज़ों का सामना करने के लिए फ्रांस, उस्मानी (तुर्की) साम्राज्य, अफ़ग़ानिस्तान तथा विशेष रूप से नेपोलियन बोनापार्ट से सम्पर्क स्थापित करने का प्रयास किया। अंग्रेज़ों ने इन प्रयासों को अपने विरुद्ध षड्यंत्र माना।

➣ टीपू के इन प्रयासों से चिंतित होकर लॉर्ड वेलेजली ने यह निष्कर्ष निकाला कि यदि टीपू को समय रहते नहीं रोका गया, तो फ्रांसीसी प्रभाव भारत में पुनः स्थापित हो सकता है। इसलिए उसने टीपू के विरुद्ध सैन्य अभियान प्रारम्भ करने का निर्णय लिया।

➣ अंग्रेज़ों ने हैदराबाद के निज़ाम तथा कुछ मराठा सरदारों का सहयोग प्राप्त कर टीपू सुल्तान को राजनीतिक रूप से अलग-थलग कर दिया। इस प्रकार युद्ध की भूमिका तैयार हो गई।

➣ यद्यपि अंग्रेज़ों ने मराठा नेतृत्व से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखे थे, किन्तु चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध में मराठों की सक्रिय सैन्य भूमिका तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-1792 ई.) जैसी नहीं थी। इसलिए अंतिम क्षेत्रीय बँटवारे में मराठों को कोई विशेष लाभ प्राप्त नहीं हुआ।

➣ अंग्रेज़ों ने हैदराबाद के निज़ाम को अपने पक्ष में कर लिया तथा मराठा नेतृत्व के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखकर टीपू सुल्तान को राजनीतिक रूप से अलग-थलग कर दिया। इस प्रकार युद्ध की भूमिका तैयार हो गई।

यद्यपि अंग्रेज़ों और मराठों के बीच उस समय मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे, किन्तु चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799 ई.) में मराठों ने तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-1792 ई.) की भाँति कोई उल्लेखनीय संयुक्त सैन्य अभियान नहीं चलाया। इसलिए टीपू सुल्तान की पराजय के बाद हुए क्षेत्रीय बँटवारे में मराठों को कोई विशेष लाभ प्राप्त नहीं हुआ था।

➣1796 में बाजीराव द्वितीय पेशवा बना। नाना फड़नवीस, दौलतराव सिंधिया, होल्कर आदि के बीच सत्ता-संघर्ष चल रहा था और टीपू सुल्तान के साथ उसके संबंध भी मधुर नहीं थे।। इसलिए मराठा नेतृत्व का ध्यान दक्षिण में टीपू से अधिक अपनी आंतरिक राजनीति पर था।

युद्ध का घटनाक्रम

1799 ई. में अंग्रेज़ों ने दो दिशाओं से मैसूर पर आक्रमण किया। मुख्य सेना का नेतृत्व जनरल जॉर्ज हैरिस कर रहा था, जबकि दूसरी सेना का नेतृत्व जनरल स्टुअर्ट के हाथों में था।

स्टुअर्ट ने पश्चिमी दिशा से आगे बढ़ते हुए सिद्दासीर के युद्ध में सफलता प्राप्त की, जबकि जनरल हैरिस ने मलावली के युद्ध में टीपू सुल्तान की सेना को पीछे हटने पर विवश कर दिया।

➣ इन पराजयों के बाद टीपू सुल्तान अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनम लौट आया और वहीं अंतिम प्रतिरोध की तैयारी करने लगा।

श्रीरंगपट्टनम का पतन एवं टीपू की मृत्यु

➣ अंग्रेज़ी सेना ने श्रीरंगपट्टनम का चारों ओर से घेराव कर लिया। कई दिनों तक भीषण युद्ध चलता रहा, किन्तु अंग्रेज़ों की संगठित सेना और आधुनिक तोपखाने के सामने मैसूर की स्थिति लगातार कमजोर होती गई।

4 मई, 1799 ई. को अंग्रेज़ों ने श्रीरंगपट्टनम के किले पर अंतिम आक्रमण किया। टीपू सुल्तान ने आत्मसमर्पण करने के स्थान पर अंतिम क्षण तक युद्ध करना स्वीकार किया।

➣ किले की रक्षा करते हुए 4 मई, 1799 ई. को टीपू सुल्तान वीरगति को प्राप्त हुआ। उसकी मृत्यु के साथ ही मैसूर में स्वतंत्र मुस्लिम शासन का अंत हो गया तथा दक्षिण भारत में अंग्रेज़ों की सबसे बड़ी प्रतिद्वन्द्वी शक्ति समाप्त हो गई।

टीपू सुल्तान ने अंतिम समय तक आत्मसमर्पण नहीं किया। उसकी वीरता से प्रभावित होकर अंग्रेज़ अधिकारियों ने भी उसके साहस की प्रशंसा की। उसका प्रसिद्ध कथन था-शेर की एक दिन की ज़िंदगी गीदड़ की सौ वर्ष की ज़िंदगी से बेहतर है।

युद्ध का महत्व

➣ टीपू सुल्तान की मृत्यु के साथ दक्षिण भारत में अंग्रेज़ों की सबसे शक्तिशाली प्रतिद्वन्द्वी शक्ति का अंत हो गया। इसके बाद अंग्रेज़ों के लिए दक्षिण भारत में अपना प्रभुत्व स्थापित करना अपेक्षाकृत सरल हो गया।

➣ इस युद्ध के बाद अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी दक्षिण भारत की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बन गई। आगे चलकर इसी आधार पर उसने मराठों तथा अन्य भारतीय राज्यों के विरुद्ध अपनी विस्तारवादी नीति को और अधिक तीव्र किया।

टीपू सुल्तान की मृत्यु के बाद लॉर्ड वेलेजली ने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा-अब भारत हमारा है। यद्यपि इस कथन के शब्द विभिन्न स्रोतों में कुछ भिन्न मिलते हैं, किन्तु इसका आशय यही था कि दक्षिण भारत में अंग्रेज़ों की सबसे बड़ी बाधा समाप्त हो चुकी थी।

मैसूर राज्य का विभाजन

चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम मैसूर राज्य का विभाजन था। टीपू सुल्तान की मृत्यु के बाद अंग्रेज़ों ने मैसूर राज्य का पुनर्गठन कर उसके अधिकांश भू-भाग का अपने सहयोगियों तथा ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच विभाजन कर दिया।

➣ युद्ध के समय अंग्रेज़ों के सहयोगी रहे हैदराबाद के निज़ाम को गुट्टी, गुर्रमकोंडा तथा चितलदुर्ग के क्षेत्र प्रदान किए गए।

कनारा, कोयम्बटूर, वेनाड (वयनाड), धारापुरम तथा श्रीरंगपट्टनम सहित अनेक महत्त्वपूर्ण प्रदेशों को अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधीन कर लिया गया। जिससे दक्षिण भारत में अंग्रेज़ों की राजनीतिक तथा सामरिक स्थिति अत्यन्त सुदृढ़ हो गई।

➣ युद्ध के बाद अंग्रेजों ने मराठों को भी मैसूर के कुछ क्षेत्रों का प्रस्ताव दिया, किन्तु उससे जुड़ी राजनीतिक शर्तों को स्वीकार न किए जाने के कारण यह व्यवस्था लागू नहीं हो सकी। इसलिए अधिकांश क्षेत्र अंग्रेजों तथा निजाम के बीच बाँट दिए गए।

ऐतिहासिक महत्व

➣ टीपू सुल्तान ने आधुनिक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को शासन का महत्त्वपूर्ण अंग बनाया। विशेष रूप से लोहे के खोल वाले रॉकेटों का विकास तथा उनका युद्ध में प्रभावी प्रयोग उसकी महत्वपूर्ण उपलब्धियों में माना जाता है।

➣ उसने कृषि, उद्योग तथा विदेशी व्यापार को राज्य की समृद्धि का आधार माना। उसके विचार में आर्थिक शक्ति ही सैनिक शक्ति की वास्तविक आधारशिला होती है।

➣ मैसूर में रेशम उद्योग, आधुनिक शस्त्र निर्माण तथा राज्य नियंत्रित व्यापार को प्रोत्साहित कर उसने आर्थिक आत्मनिर्भरता स्थापित करने का प्रयास किया।

➣ अंग्रेज़ इतिहासकारों ने प्रायः टीपू सुल्तान को अंग्रेज़ी साम्राज्य का कट्टर विरोधी बताते हुए उसकी आलोचना की, जबकि अनेक भारतीय एवं आधुनिक इतिहासकार उसे एक राष्ट्रहितैषी, दूरदर्शी तथा प्रगतिशील शासक मानते हैं।

➣ प्रसिद्ध ब्रिटिश प्रशासक थॉमस मुनरो ने टीपू सुल्तान के विषय में कहा था कि वह नई रीति चलाने वाली अशांत आत्मा था। यह टिप्पणी उसके निरन्तर सुधारवादी दृष्टिकोण की ओर संकेत करती है।

➣ आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि यदि टीपू सुल्तान को अधिक समय और व्यापक भारतीय सहयोग प्राप्त होता, तो दक्षिण भारत में अंग्रेज़ों की विजय इतनी शीघ्र सम्भव नहीं होती।

टीपू सुल्तान उन भारतीय शासकों में था, जिसने सबसे पहले समझ लिया था कि अंग्रेज़ केवल व्यापार करने नहीं आए हैं, बल्कि पूरे भारत में अपना शासन स्थापित करना चाहते हैं। दुर्भाग्यवश वह अन्य भारतीय शासकों को इस खतरे के विरुद्ध एकजुट नहीं कर सका।
➣ इसका एक कारण यह भी था कि मराठों, हैदराबाद के निज़ाम तथा अन्य भारतीय शक्तियों को टीपू पर पर्याप्त विश्वास नहीं था और वे उसे अंग्रेज़ों की अपेक्षा अपना अधिक निकटवर्ती प्रतिद्वन्द्वी मानते थे।

वाडियार वंश की पुनर्स्थापना

➣ अंग्रेज़ों ने मैसूर पर प्रत्यक्ष शासन स्थापित करने के बजाय वहाँ वाडियार वंश को पुनः स्थापित करने की नीति अपनाई। इसके पीछे उनका उद्देश्य दक्षिण भारत में एक मित्र एवं आश्रित राज्य बनाए रखना था।

➣ वाडियार वंश के एक बालक कृष्णराज वाडियार तृतीय को मैसूर का शासक बनाया गया तथा उसके साथ सहायक संधि कर ली गई। इसके परिणामस्वरूप उसकी विदेश नीति तथा रक्षा पर अंग्रेज़ों का नियंत्रण स्थापित हो गया।

चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध के बाद मैसूर दक्षिण भारत का पहला प्रमुख राज्य बना, जिसे सहायक संधि की व्यवस्था के अंतर्गत अंग्रेज़ों के प्रभाव में लाया गया।

मैसूर पर अंग्रेज़ी नियंत्रण

➣ मैसूर में वाडियार वंश की पुनर्स्थापना के बाद भी अंग्रेज़ों का हस्तक्षेप निरन्तर बढ़ता गया। प्रशासनिक मामलों में कम्पनी के रेज़िडेंट का प्रभाव लगातार मजबूत होता गया।

1831 ई. में लॉर्ड विलियम बैंटिंक ने मैसूर में कथित कुशासन का आरोप लगाकर राज्य का प्रशासन अपने हाथों में ले लिया। इसके बाद कई वर्षों तक मैसूर का प्रशासन सीधे अंग्रेज़ अधिकारियों द्वारा संचालित किया गया।

➣ बाद में 1881 ई. में लॉर्ड रिपन ने मैसूर रेंडिशन के अंतर्गत राज्य का प्रशासन पुनः वाडियार वंश को सौंप दिया। इस घटना को मैसूर के इतिहास में रेंडिशन ऑफ मैसूर (1881) के नाम से जाना जाता है।

टीपू सुल्तान के शासनकाल की प्रमुख घटनाएँ

वर्ष प्रमुख घटना महत्त्व
20 नवम्बर, 1750 ई. देवनहल्ली में जन्म हैदर अली के ज्येष्ठ पुत्र
10 सितम्बर, 1780 ई. पोल्लीलुर का युद्ध कर्नल बैली की अंग्रेज़ी सेना पर विजय
7 दिसम्बर, 1782 ई. मैसूर का शासक बना हैदर अली की मृत्यु के बाद गद्दी संभाली
1783 ई. ब्रिगेडियर मैथ्यूज को बंदी बनाया द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध की प्रमुख घटना
11 मार्च, 1784 ई. मंगलौर की संधि द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का अंत
1784 ई. राज्य का पुनर्गठन मैसूर को सात प्रान्तों (आसफी टुकड़ी) में विभाजित किया
1784-1786 ई. प्रशासनिक एवं आर्थिक सुधार मौलूदी संवत्, नई मुद्रा एवं प्रशासनिक सुधार
1789 ई. ट्रावनकोर पर आक्रमण तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का तात्कालिक कारण
1790-1792 ई. तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध अंग्रेज़, मराठों एवं निज़ाम से संघर्ष
मार्च, 1792 ई. श्रीरंगपट्टनम की संधि आधा राज्य, 3 करोड़ रुपये हर्जाना एवं दो पुत्र बंधक
1796 ई. नौसेना बोर्ड की स्थापना आधुनिक नौसेना के विकास का प्रयास
1798 ई. जैकोबिन क्लब की सदस्यता फ्रांसीसी क्रान्ति के आदर्शों से प्रभावित
1799 ई. चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध लॉर्ड वेलेजली के काल में निर्णायक युद्ध
4 मई, 1799 ई. श्रीरंगपट्टनम में वीरगति टीपू सुल्तान की मृत्यु एवं मैसूर की स्वतंत्र शक्ति का अंत
1799 ई. मैसूर राज्य का विभाजन वाडियार वंश की पुनर्स्थापना एवं अंग्रेज़ी प्रभुत्व की स्थापना

चारों आंग्ल-मैसूर युद्ध : एक नज़र में

मैसूर राज्य और अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच 1767 ई. से 1799 ई. के मध्य कुल चार आंग्ल-मैसूर युद्ध लड़े गए। इन युद्धों के माध्यम से अंग्रेज़ों ने धीरे-धीरे दक्षिण भारत में अपना प्रभुत्व स्थापित किया। नीचे दी गई सारणी में चारों युद्धों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है।

वर्ष मैसूर का शासक गवर्नर जनरल समाप्ति प्रमुख परिणाम
1767-1769 ई. हैदर अली मद्रास की संधि (1769 ई.) अंग्रेज़ों ने हैदर अली से पारस्परिक रक्षा की संधि की।
1780-1784 ई. हैदर अली एवं टीपू सुल्तान वारेन हेस्टिंग्स मंगलौर की संधि (1784 ई.) दोनों पक्षों ने जीते हुए प्रदेश लौटाए।
1790-1792 ई. टीपू सुल्तान लॉर्ड कार्नवालिस श्रीरंगपट्टनम की संधि (1792 ई.) टीपू ने आधा राज्य एवं हर्जाना दिया।
1799 ई. टीपू सुल्तान लॉर्ड वेलेजली टीपू सुल्तान की मृत्यु मैसूर का विभाजन एवं वाडियार वंश की पुनर्स्थापना।

मराठों और निज़ाम ने टीपू के विरुद्ध अंग्रेज़ों का साथ क्यों दिया ?

➣ यह प्रश्न इतिहास में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। प्लासी (1757 ई.) और बक्सर (1764 ई.) की विजयों के बाद अंग्रेज़ों की शक्ति तेजी से बढ़ चुकी थी। फिर भी अधिकांश भारतीय शासक उनकी वास्तविक राजनीतिक महत्वाकांक्षा और दीर्घकालीन साम्राज्यवादी नीति को समय रहते नहीं समझ सके।

➣ सम्भवतः उस समय अधिकांश भारतीय शासक अंग्रेज़ों को सम्पूर्ण भारत पर अधिकार करने वाली शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली व्यापारिक कम्पनी के रूप में देखते थे। उन्हें यह अनुमान नहीं था कि यही कम्पनी आगे चलकर पूरे भारत की सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति बन जाएगी।

➣ अंग्रेज़ों ने अपनी कुशल कूटनीति के माध्यम से भारतीय शक्तियों को कभी एकजुट नहीं होने दिया। उन्होंने मराठों, निज़ाम और मैसूर के पारस्परिक मतभेदों का लाभ उठाकर एक भारतीय शक्ति को दूसरी के विरुद्ध प्रयोग किया।

➣ आगे चलकर यही नीति फूट डालो और शासन करो के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस नीति का सफल प्रयोग अंग्रेज़ पहले ही बंगाल में कर चुके थे, जहाँ दरबारी षड्यंत्रों और आन्तरिक मतभेदों का लाभ उठाकर उन्होंने प्लासी के युद्ध (1757 ई.) में विजय प्राप्त की और बंगाल पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया।

➣ दक्षिण भारत में मराठों और हैदराबाद के निज़ाम दोनों की सीमाएँ मैसूर से लगती थीं। हैदर अली और बाद में टीपू सुल्तान ने मालाबार, कोयम्बटूर, बेदनूर तथा कर्नाटक क्षेत्र में मैसूर के प्रभाव का निरन्तर विस्तार किया।

➣ यद्यपि उस समय राज्य-विस्तार सभी प्रमुख भारतीय शक्तियों की सामान्य नीति थी, फिर भी मैसूर की बढ़ती सैन्य शक्ति और लगातार हो रहे विस्तार ने मराठों तथा निज़ाम को अपनी सुरक्षा के प्रति चिंतित कर दिया।

➣ मराठों और निज़ाम को आशंका थी कि मैसूर की बढ़ती शक्ति का अगला लक्ष्य वे स्वयं बन सकते हैं। इसलिए उस समय उनके लिए सबसे बड़ा और तत्काल खतरा टीपू सुल्तान था, अंग्रेज़ नहीं। इसी कारण उन्होंने कई अवसरों पर अंग्रेज़ों के साथ मिलकर टीपू का विरोध किया।

➣ मराठों और निज़ाम को यह विश्वास था कि पहले टीपू सुल्तान जैसी शक्तिशाली क्षेत्रीय शक्ति को समाप्त कर लिया जाए, उसके बाद अंग्रेज़ों से निपटना अधिक सरल होगा। किन्तु यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल सिद्ध हुई। अंग्रेज़ों ने टीपू सुल्तान को पराजित करने के बाद अपने पूर्व सहयोगियों को ही एक-एक करके अधीन करना प्रारम्भ कर दिया।

1798 ई. में हैदराबाद के निज़ाम ने मराठों और टीपू सुल्तान के बढ़ते खतरे से अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लॉर्ड वेलेजली की सहायक संधि स्वीकार कर ली। परिणामस्वरूप वह अंग्रेज़ों पर निर्भर हो गया।

1799 ई. में टीपू सुल्तान की मृत्यु के साथ ही मैसूर की स्वतंत्र शक्ति का अंत हो गया। उल्लेखनीय है कि टीपू की मृत्यु के बाद लॉर्ड वेलेजली ने कहा था-अब भारत हमारा है। इससे स्पष्ट होता है कि मैसूर अंग्रेज़ों के साम्राज्य विस्तार में कितनी बड़ी बाधा था।

➣ इसके बाद अंग्रेज़ों ने अपना ध्यान मराठों की ओर केन्द्रित किया। 1803-1805 ई. तथा 1817-1818 ई. के आंग्ल-मराठा युद्धों में मराठा शक्ति भी पराजित हो गई। इस प्रकार अंग्रेज़ों ने अपने पूर्व सहयोगियों को भी क्रमशः अपने अधीन कर लिया।

➣ यदि मैसूर, मराठे और निज़ाम अपने मतभेद भुलाकर अंग्रेज़ों के विरुद्ध एक स्थायी गठबंधन बना लेते, तो दक्षिण भारत ही नहीं, सम्भवतः पूरे भारत में अंग्रेज़ों का विस्तार काफी कठिन हो सकता था। किन्तु तत्कालीन राजनीतिक प्रतिद्वन्द्विता, क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं तथा परस्पर अविश्वास के कारण ऐसा सम्भव नहीं हो सका।

➣ उल्लेखनीय है कि बंगाल के नवाब अलीवर्दी ख़ाँ तथा टीपू सुल्तान उन भारतीय शासकों में थे जिन्होंने अंग्रेज़ों की बढ़ती शक्ति और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को अपेक्षाकृत पहले समझ लिया था।

अलीवर्दी ख़ाँ ने यूरोपीय कंपनियों को बंगाल में किलेबंदी और सैन्य विस्तार की अनुमति नहीं दी तथा उन्हें केवल व्यापार तक सीमित रखने का प्रयास किया।

➣ दूसरी ओर टीपू सुल्तान ने अंग्रेज़ों को भारत की स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हुए फ्रांस, उस्मानी (तुर्की) साम्राज्य, अफ़ग़ानिस्तान तथा अन्य विदेशी शक्तियों से सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया था।

इतिहासकारों का मत: अंग्रेज़ों की सबसे बड़ी शक्ति केवल उनकी सेना नहीं, बल्कि उनकी कूटनीति थी। उन्होंने भारतीय राज्यों की आपसी प्रतिद्वन्द्विता और अविश्वास का लाभ उठाकर उन्हें एक-एक करके पराजित किया तथा अंततः भारत के विशाल भाग पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया।

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