मुग़लकालीन विदेशी आक्रमण
➣ अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ तथा औरंगज़ेब जैसे शक्तिशाली मुगल सम्राटों के शासनकाल में उत्तर-पश्चिमी सीमा सुरक्षित रही, जिसके कारण किसी विदेशी शासक ने भारत पर बड़े स्तर का आक्रमण करने का साहस नहीं किया।
➣ किन्तु 1707 ई. में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य का पतन आरम्भ हो गया। अयोग्य उत्तराधिकारी, उत्तराधिकार के निरंतर युद्ध, शक्तिशाली अमीरों का हस्तक्षेप, प्रांतीय राज्यों का उदय तथा कमजोर केंद्रीय शासन के कारण साम्राज्य की सैन्य एवं प्रशासनिक शक्ति धीरे-धीरे कमजोर पड़ गई।
➣ मुगल साम्राज्य की इसी दुर्बलता का लाभ उठाकर पश्चिम से दो शक्तिशाली विदेशी शासकों ने भारत पर आक्रमण किए। इन दोनों आक्रमणों ने मुगल साम्राज्य की शेष शक्ति को भी गहरा आघात पहुँचाया-
1. पहला आक्रमण फ़ारस (ईरान) के शासक नादिरशाह ने किया।
2. दूसरा आक्रमण अफ़ग़ानिस्तान के शासक अहमदशाह अब्दाली (दुर्रानी) ने किया।
➣ नादिरशाह के आक्रमण ने मुगल साम्राज्य की सैन्य कमजोरी और आर्थिक दुर्बलता को उजागर कर दिया, जबकि अहमदशाह अब्दाली के लगातार आक्रमणों ने उत्तर भारत की राजनीतिक स्थिति को अस्थिर कर दिया।
➣ इन घटनाओं का लाभ अंततः अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी को मिला, जिसने धीरे-धीरे भारत में अपनी राजनीतिक शक्ति स्थापित कर ली।
नादिरशाह एवं भारत पर आक्रमण
➣ नादिरशाह फ़ारस (वर्तमान ईरान) का एक महान सेनानायक एवं शासक था। अपनी असाधारण सैन्य प्रतिभा और विजयों के कारण उसे ‘ईरान का नेपोलियन’ भी कहा जाता है। 1736 ई. में उसने सफ़वी वंश के शासक तहमास्प द्वितीय को हटाकर स्वयं फ़ारस का शासक बन गया और शीघ्र ही पश्चिम एवं मध्य एशिया का एक शक्तिशाली शासक बनकर उभरा।
➣ उस समय भारत का मुगल साम्राज्य राजनीतिक रूप से कमजोर हो चुका था, जबकि उसकी अपार धन-संपत्ति की ख्याति पूरे एशिया में फैली हुई थी। मुगल दरबार के आंतरिक षड्यंत्र, सीमाओं की उपेक्षा तथा उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों की असुरक्षा ने नादिरशाह को भारत पर आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित किया।
➣ कुछ समकालीन स्रोतों में यह भी उल्लेख मिलता है कि अवध के नवाब सआदत ख़ाँ तथा कुछ असंतुष्ट मुगल अमीरों ने नादिरशाह से संपर्क किया था। हालांकि आधुनिक इतिहासकार इसे निर्विवाद तथ्य नहीं मानते। इसलिए नादिरशाह के आक्रमण का मुख्य कारण मुगल साम्राज्य की कमजोरी और भारत की अपार संपत्ति को ही माना जाता है।
नादिरशाह का भारत अभियान (1738–1739 ई.)
➣ भारत पर आक्रमण का निर्णय लेने के बाद नादिरशाह ने पहले उत्तर-पश्चिमी सीमा के प्रमुख नगरों पर अधिकार करना आरम्भ किया, ताकि भारत में प्रवेश का मार्ग पूरी तरह सुरक्षित हो जाए। उस समय मुगल साम्राज्य की सीमाओं की सुरक्षा अत्यंत कमजोर हो चुकी थी, जिसका उसे पूरा लाभ मिला।
➣ 11 जून, 1738 ई. को नादिरशाह ने ग़ज़नी पर अधिकार कर लिया। इसके बाद 29 जून, 1738 ई. को उसने काबुल पर कब्ज़ा कर लिया। काबुल पर अधिकार के साथ ही भारत का उत्तर-पश्चिमी प्रवेश-द्वार उसके नियंत्रण में आ गया।
➣ काबुल विजय के बाद नादिरशाह ने अपनी सेना के साथ सिंधु नदी पार की और आगे बढ़ते हुए पेशावर तथा लाहौर की ओर कूच किया। मुगल प्रशासन उसकी प्रगति को रोकने में असफल रहा।
➣ उस समय लाहौर का सूबेदार ज़कारिया ख़ाँ था। उसने नादिरशाह की विशाल एवं संगठित सेना का सामना करने के बजाय आत्मसमर्पण कर दिया। उसने भारी धनराशि तथा बहुमूल्य उपहार भेंट किए, जिसके बाद नादिरशाह ने उसे पुनः लाहौर का सूबेदार बने रहने की अनुमति दे दी।
➣ लाहौर पर अधिकार करने के बाद नादिरशाह ने बिना किसी बड़े प्रतिरोध के पंजाब पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। इसके बाद उसका अगला लक्ष्य मुगल सम्राट मुहम्मद शाह की राजधानी दिल्ली था। दोनों सेनाएँ शीघ्र ही करनाल के मैदान में आमने-सामने आ गईं, जहाँ उत्तरकालीन मुगल इतिहास का एक निर्णायक युद्ध लड़ा गया।
➜ 11 जून, 1738 ई. — ग़ज़नी पर अधिकार
➜ 29 जून, 1738 ई. — काबुल पर अधिकार
➜ लाहौर का सूबेदार — ज़कारिया ख़ाँ
➜ अगला लक्ष्य — दिल्ली
➜ निर्णायक युद्ध — करनाल का युद्ध (1739 ई.)
करनाल का युद्ध (24 फ़रवरी, 1739 ई.)
➣ लाहौर पर अधिकार करने के बाद नादिरशाह तेज़ी से दिल्ली की ओर बढ़ा। मार्ग में वह सरहिन्द पहुँचा और वहाँ से आगे बढ़ते हुए करनाल के मैदान में पहुँचा।
➣ दूसरी ओर मुगल सम्राट मुहम्मद शाह भी अपनी विशाल सेना के साथ उसका सामना करने के लिए करनाल पहुँच चुका था।
➣ मुगल सेना संख्या की दृष्टि से नादिरशाह की सेना से कहीं अधिक थी, किन्तु उसके प्रमुख सेनानायकोंनिज़ाम-उल-मुल्क, सआदत ख़ाँ तथा ख़ान-ए-दौराँ—के बीच आपसी मतभेद थे। इसके विपरीत नादिरशाह की सेना अनुशासित, संगठित तथा आधुनिक युद्ध-कौशल से सुसज्जित थी।
➣ 24 फ़रवरी, 1739 ई. को दोनों सेनाओं के बीच करनाल का युद्ध हुआ। युद्ध में मुगल सेना को करारी पराजय का सामना करना पड़ा।
➣ इस संघर्ष में मुगल सेनापति ख़ान-ए-दौराँ गंभीर रूप से घायल हुआ और बाद में उसकी मृत्यु हो गई, जबकि सआदत ख़ाँ नादिरशाह के हाथों बंदी बना लिया गया।
➣ करनाल की विजय के बाद नादिरशाह की स्थिति अत्यंत मजबूत हो गई। पराजित मुगल सम्राट मुहम्मद शाह को अंततः नादिरशाह के शिविर में जाकर उससे भेंट करनी पड़ी।
➣ प्रारम्भिक वार्ता में निज़ाम-उल-मुल्क की मध्यस्थता से यह सहमति बनी कि मुगल सम्राट युद्ध-क्षतिपूर्ति के रूप में धनराशि देगा और नादिरशाह वापस लौट जाएगा।
➣ इसी बीच बंदी बनाए गए सआदत ख़ाँ ने नादिरशाह को बताया कि दिल्ली में अपार धन-संपत्ति मौजूद है और वहाँ से उसे युद्ध-क्षतिपूर्ति की तुलना में कहीं अधिक धन प्राप्त हो सकता है। इससे प्रभावित होकर नादिरशाह ने अपना निर्णय बदल दिया और सीधे दिल्ली की ओर कूच करने का निश्चय किया।
➣ करनाल का युद्ध उत्तरकालीन मुगल इतिहास का एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। इस पराजय ने मुगल साम्राज्य की सैन्य कमजोरी को पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया तथा दिल्ली पर नादिरशाह के अधिकार का मार्ग प्रशस्त कर दिया।
दिल्ली पर अधिकार, नरसंहार एवं लूट
➣ करनाल के युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद नादिरशाह ने मुगल सम्राट मुहम्मद शाह को अपने साथ लेकर 20 मार्च, 1739 ई. को दिल्ली में प्रवेश किया।
➣ प्रारम्भ में उसने राजधानी में शांति बनाए रखने का प्रयास किया और मुगल सम्राट को औपचारिक रूप से अपने साथ रखा।
➣ दिल्ली पहुँचने के कुछ ही दिनों बाद यह अफ़वाह फैल गई कि नादिरशाह की हत्या कर दी गई है। इससे उत्साहित होकर दिल्ली के लोगों ने फ़ारसी सैनिकों पर हमला कर दिया, जिसमें लगभग 700 फ़ारसी सैनिक मारे गए।
➣ इस घटना से क्रोधित होकर 22 मार्च, 1739 ई. को नादिरशाह ने दिल्ली में व्यापक नरसंहार का आदेश दे दिया। अनेक समकालीन विवरणों के अनुसार इस नरसंहार में लगभग 30,000 लोग मारे गए।
➣ अंततः मुगल सम्राट मुहम्मद शाह के अनुरोध पर नादिरशाह ने यह आदेश वापस ले लिया। नरसंहार के बाद दिल्ली की अपार धन-संपत्ति लूट ली गई।
➣ इस लूट में नादिरशाह अपने साथ लगभग 30 करोड़ रुपये मूल्य का धन, बहुमूल्य आभूषण, कोहिनूर हीरा, तख़्त-ए-ताऊस (मयूर सिंहासन) तथा अनेक बहुमूल्य वस्तुएँ फ़ारस ले गया। इस लूट ने मुगल राजकोष को लगभग खाली कर दिया।
➣ दिल्ली में लगभग 57 दिनों तक रहने के बाद नादिरशाह ने मुहम्मद शाह को पुनः मुगल सम्राट के रूप में स्वीकार कर लिया। उसने कश्मीर तथा सिंधु नदी के पश्चिम के कुछ क्षेत्रों को अपने साम्राज्य में मिला लिया और मुहम्मद शाह की पुत्री का विवाह अपने पुत्र नासिरुल्लाह मिर्ज़ा से कराकर भारत से वापस लौट गया।
नादिरशाह के आक्रमण के परिणाम➣ नादिरशाह के आक्रमण ने मुगल साम्राज्य की सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक कमजोरी को पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया। इसके बाद मुगल साम्राज्य का पतन और अधिक तीव्र हो गया तथा मराठों, अफ़ग़ानों और अंततः अंग्रेज़ों के लिए भारत में अपना प्रभाव बढ़ाना अपेक्षाकृत आसान हो गया।
अहमदशाह अब्दाली एवं आक्रमण
➣ अहमदशाह अब्दाली (अहमद शाह दुर्रानी) अफ़ग़ानिस्तान के दुर्रानी साम्राज्य का संस्थापक था। अपनी वीरता और नेतृत्व क्षमता के कारण उसे ‘दुर्रे-दुर्रानी’ (युग का मोती) की उपाधि प्राप्त हुई।
➣ वह प्रारम्भ में नादिरशाह की सेना का एक प्रमुख सेनापति था और उसकी अनेक विजयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुका था।
➣ 1747 ई. में नादिरशाह की हत्या के बाद अहमदशाह अब्दाली ने कंधार में स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित किया और शीघ्र ही अफ़ग़ानिस्तान में दुर्रानी साम्राज्य की स्थापना की।
➣ सत्ता संभालने के बाद उसकी दृष्टि भारत की अपार संपत्ति तथा उत्तर-पश्चिमी सीमावर्ती प्रदेशों पर टिक गई।
➣ उस समय मुगल साम्राज्य पहले से ही राजनीतिक रूप से कमजोर हो चुका था। सीमाओं की सुरक्षा लगभग समाप्त हो गई थी और पंजाब सहित उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में मुगल प्रशासन का नियंत्रण निरंतर कमज़ोर पड़ता जा रहा था।
➣ इन परिस्थितियों का लाभ उठाकर अहमदशाह अब्दाली ने भारत पर लगातार कई आक्रमण किए।
अब्दाली के प्रारम्भिक आक्रमण
➣ 1748 ई. में अहमदशाह अब्दाली ने भारत पर अपना प्रथम आक्रमण किया। उसका उद्देश्य पंजाब पर अधिकार स्थापित करना था, किन्तु मानुपुर (मच्छीवाड़ा के निकट) के युद्ध में मुगल सेना ने उसका सामना किया।
➣ इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व शहज़ादा अहमद (भावी सम्राट अहमदशाह बहादुर) तथा सफ़दरजंग ने किया। इस संघर्ष में अब्दाली को पीछे हटना पड़ा और उसका पहला आक्रमण असफल रहा।
➣ इसके बाद 1749 ई. में उसने पुनः पंजाब पर आक्रमण किया। मुगल प्रशासन की कमजोरी का लाभ उठाते हुए उसने पंजाब पर अपना प्रभाव बढ़ा लिया और वहाँ के सूबेदार मुईन-उल-मुल्क (मीर मन्नू) को अपने प्रभाव में ले लिया।
➣ 1752 ई. में अहमदशाह अब्दाली ने तीसरा आक्रमण किया। इस बार मुगल साम्राज्य उसकी शक्ति का सामना नहीं कर सका और अंततः पंजाब तथा मुल्तान पर उसका अधिकार स्वीकार करना पड़ा। इसके साथ ही मुगल साम्राज्य की उत्तर-पश्चिमी सीमा लगभग अफ़ग़ानों के नियंत्रण में चली गई।
➣ 1753 ई. में मुईन-उल-मुल्क की मृत्यु के बाद पंजाब में उत्तराधिकार का संकट उत्पन्न हो गया। मुगल दरबार द्वारा वहाँ के प्रशासन में हस्तक्षेप किए जाने से अहमदशाह अब्दाली और अधिक असंतुष्ट हो गया। यही परिस्थितियाँ उसके अगले और अधिक विनाशकारी आक्रमण का कारण बनीं।
चौथा एवं पाँचवाँ आक्रमण (1756–1757 ई.)
➣ 1753 ई. में पंजाब के सूबेदार मुईन-उल-मुल्क (मीर मन्नू) की मृत्यु के बाद वहाँ की राजनीतिक स्थिति अत्यंत अस्थिर हो गई। मुगल दरबार ने पंजाब के प्रशासन में हस्तक्षेप करना प्रारम्भ कर दिया, जिससे अहमदशाह अब्दाली नाराज़ हो गया। उसने इसे अपने प्रभाव क्षेत्र में हस्तक्षेप माना और पुनः भारत पर आक्रमण की तैयारी शुरू कर दी।
➣ 1756 ई. के अंत में अहमदशाह अब्दाली ने भारत पर अपना चौथा प्रमुख आक्रमण किया। उसने बिना किसी बड़े प्रतिरोध के पंजाब पर अधिकार स्थापित किया और आगे बढ़ते हुए 23 जनवरी, 1757 ई. को दिल्ली पहुँच गया। उस समय मुगल साम्राज्य इतना कमजोर हो चुका था कि राजधानी उसकी सेना का प्रभावी प्रतिरोध नहीं कर सकी।
➣ दिल्ली पर अधिकार करने के बाद अब्दाली लगभग एक माह तक वहाँ रुका। इस दौरान राजधानी तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में व्यापक लूटपाट हुई। इसके बाद उसने मथुरा, वृंदावन और आगरा तक अपने अभियान का विस्तार किया, जहाँ भारी जनहानि और धन-संपत्ति की लूट हुई।
➣ भारत में अपने प्रभाव को स्थायी बनाए रखने के उद्देश्य से अहमदशाह अब्दाली ने आलमगीर द्वितीय को मुगल सम्राट के पद पर बने रहने दिया।
➣ साथ ही नजीबुद्दौला को मीर बख़्शी तथा अपना प्रमुख सहयोगी नियुक्त किया। इसके अतिरिक्त कश्मीर, लाहौर, मुल्तान और सरहिन्द पर उसका प्रभाव स्थापित हो गया।
➣ इन प्रदेशों के प्रशासन की देखभाल के लिए उसने अपने पुत्र तैमूर शाह दुर्रानी को पंजाब का प्रतिनिधि नियुक्त किया और स्वयं अफ़ग़ानिस्तान लौट गया।
मराठों का पुनः उदय
➣ अहमदशाह अब्दाली के लौटने के बाद 1758 ई. में मराठा सरदार रघुनाथराव तथा मल्हारराव होल्कर के नेतृत्व में मराठा सेना उत्तर भारत पहुँची।
➣ मराठों ने दिल्ली पर पुनः अधिकार कर लिया और नजीबुद्दौला को राजधानी छोड़ने पर विवश कर दिया। इसके बाद मराठों ने अदीना बेग ख़ाँ को पंजाब का सूबेदार नियुक्त किया तथा लाहौर तक अपना प्रभाव स्थापित कर लिया।
➣ मराठों का पंजाब तक पहुँचना अहमदशाह अब्दाली के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया। इसी कारण उसने एक बार फिर भारत पर आक्रमण करने का निर्णय लिया, जिसका परिणाम आगे चलकर पानीपत के तृतीय युद्ध (1761 ई.) के रूप में सामने आया।
पानीपत का तृतीय युद्ध (1761 ई.)
➣ 1758 ई. में मराठों द्वारा दिल्ली, लाहौर तथा पंजाब पर अधिकार स्थापित कर लेने से अहमदशाह अब्दाली की प्रतिष्ठा और उत्तर भारत में उसका प्रभाव गंभीर रूप से प्रभावित हुआ।
➣ मराठों का अफ़ग़ान सीमा तक पहुँच जाना उसके लिए सीधी चुनौती था। इसी कारण उसने एक विशाल सेना के साथ पुनः भारत पर आक्रमण किया। दूसरी ओर मराठा साम्राज्य भी उत्तर भारत में अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहता था।
➣ इस अभियान का नेतृत्व सदाशिवराव भाऊ कर रहे थे, जबकि विश्वासराव (पेशवा बालाजी बाजीराव के पुत्र) भी इस युद्ध में सम्मिलित थे। अब्दाली को नजीबुद्दौला, रूहेला सरदारों तथा शुजाउद्दौला (अवध) जैसे सहयोगियों का समर्थन प्राप्त था।
➣ दोनों सेनाओं के बीच 14 जनवरी, 1761 ई. को पानीपत के मैदान में निर्णायक युद्ध हुआ। यह अठारहवीं शताब्दी के सबसे भीषण युद्धों में से एक माना जाता है।
➣ लंबे और रक्तरंजित संघर्ष के बाद मराठा सेना पराजित हुई। युद्ध में सदाशिवराव भाऊ, विश्वासराव सहित अनेक प्रमुख मराठा सेनानायक मारे गए तथा मराठा सेना को भारी जनहानि उठानी पड़ी।
➣ यद्यपि इस युद्ध में अहमदशाह अब्दाली विजयी रहा, फिर भी वह भारत में स्थायी साम्राज्य स्थापित नहीं कर सका। कुछ समय दिल्ली में रहने के बाद वह अफ़ग़ानिस्तान लौट गया और उत्तर भारत के प्रशासन की व्यवस्था स्थानीय सहयोगियों के हाथों छोड़ दी।
➣ भारत छोड़ने से पूर्व अब्दाली ने शाह आलम द्वितीय को मुगल सम्राट के रूप में स्वीकार किया तथा नजीबुद्दौला को मीर बख़्शी के पद पर बनाए रखा। इसके बाद मुगल सम्राट नाममात्र का शासक रह गया और वास्तविक सत्ता क्षेत्रीय शक्तियों तथा बाद में अंग्रेज़ों के हाथों में जाने लगी।
पानीपत के तृतीय युद्ध के परिणाम➣ इस युद्ध से मराठा साम्राज्य को भारी क्षति पहुँची और उत्तर भारत में उसका प्रभाव कुछ समय के लिए कमजोर पड़ गया। दूसरी ओर मुगल साम्राज्य भी इतना निर्बल हो चुका था कि वह इस स्थिति का कोई लाभ नहीं उठा सका।
➣ परिणामस्वरूप उत्तर भारत में राजनीतिक शून्यता उत्पन्न हुई, जिसका लाभ आगे चलकर अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी ने उठाया और धीरे-धीरे भारत की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति बन गई।
अब्दाली का अंतिम आक्रमण
➣ 1767 ई. में अहमदशाह अब्दाली ने पंजाब में बढ़ती सिख शक्ति को दबाने के उद्देश्य से पुनः भारत पर आक्रमण किया। उस समय सिख मिसलों ने पंजाब के अनेक क्षेत्रों पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था और अफ़ग़ान अधिकारियों के लिए गंभीर चुनौती बन चुके थे।
➣ इस अभियान में अब्दाली को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। सिखों ने छापामार युद्ध-पद्धति अपनाकर उसकी सेना को लगातार परेशान किया।
➣ दूसरी ओर उसके सैनिक भी लंबे अभियानों से थक चुके थे और उनमें असंतोष बढ़ने लगा था। इन परिस्थितियों के कारण उसे बिना किसी निर्णायक सफलता के अफ़ग़ानिस्तान लौटना पड़ा। भारत पर यह उसका अंतिम प्रमुख अभियान सिद्ध हुआ।
➣ इसके बाद उसने भारत पर कोई प्रभावी आक्रमण नहीं किया। कुछ वर्षों बाद 1772 ई. में अहमदशाह अब्दाली की मृत्यु हो गई और उसके साथ ही भारत में अफ़ग़ान प्रभुत्व स्थापित करने का उसका सपना भी समाप्त हो गया।
विदेशी आक्रमणों का प्रभाव
➣ नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली के आक्रमणों ने उत्तरकालीन मुगल साम्राज्य को गहरा आघात पहुँचाया। इन आक्रमणों से मुगल साम्राज्य की सैन्य शक्ति, आर्थिक संसाधन तथा राजनीतिक प्रतिष्ठा लगभग समाप्त हो गई।
➣ दिल्ली की लूट, राजकोष की हानि, प्रांतीय राज्यों की बढ़ती स्वायत्तता तथा केंद्रीय सत्ता की कमजोरी के कारण मुगल सम्राट केवल नाममात्र का शासक रह गया। मराठों, सिखों तथा अन्य क्षेत्रीय शक्तियों का प्रभाव लगातार बढ़ता गया।
➣ इन परिस्थितियों का सबसे अधिक लाभ अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी को मिला। एक समय जो कंपनी मुगल सम्राटों से भारत में व्यापार करने की अनुमति प्राप्त करती थी, वही धीरे-धीरे भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप करने लगी और अंततः भारत की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति बनकर उभरी।
➣ इस प्रकार नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण केवल दो विदेशी आक्रमण भर नहीं थे, बल्कि वे मुगल साम्राज्य के पतन को तीव्र करने वाली ऐसी घटनाएँ सिद्ध हुए, जिन्होंने भारत के राजनीतिक इतिहास की दिशा ही बदल दी।
मुग़लकालीन विदेशी आक्रमण : कालक्रम
| वर्ष | घटना | महत्त्व |
|---|---|---|
| 1736 ई. | नादिरशाह फ़ारस (ईरान) का शासक बना | सफ़वी वंश का अंत कर सत्ता प्राप्त की |
| 11 जून, 1738 ई. | ग़ज़नी पर अधिकार | भारत अभियान का प्रारम्भ |
| 29 जून, 1738 ई. | काबुल पर अधिकार | भारत का प्रवेश द्वार सुरक्षित किया |
| 1738 ई. | लाहौर पर अधिकार | ज़कारिया ख़ाँ ने आत्मसमर्पण किया |
| 24 फ़रवरी, 1739 ई. | करनाल का युद्ध | मुहम्मद शाह की पराजय |
| 20 मार्च, 1739 ई. | दिल्ली में प्रवेश | नादिरशाह ने राजधानी पर अधिकार किया |
| 22 मार्च, 1739 ई. | दिल्ली का नरसंहार | लगभग 30,000 लोगों की मृत्यु |
| 1739 ई. | तख़्त-ए-ताऊस एवं कोहिनूर की लूट | मुग़ल राजकोष लगभग खाली हो गया |
| 1747 ई. | नादिरशाह की मृत्यु | अहमदशाह अब्दाली ने दुर्रानी साम्राज्य की स्थापना की |
| 1748 ई. | अहमदशाह अब्दाली का प्रथम आक्रमण | मानुपुर के युद्ध में पराजित |
| 1749 ई. | दूसरा आक्रमण | पंजाब पर प्रभाव स्थापित |
| 1752 ई. | तीसरा आक्रमण | पंजाब एवं मुल्तान पर अधिकार |
| 1756–57 ई. | चौथा प्रमुख आक्रमण | दिल्ली, मथुरा एवं आगरा में लूटपाट |
| 23 जनवरी, 1757 ई. | दिल्ली पर अधिकार | आलमगीर द्वितीय को नाममात्र का सम्राट रहने दिया |
| 1758 ई. | मराठों ने दिल्ली एवं पंजाब पर पुनः अधिकार किया | अब्दाली के साथ निर्णायक संघर्ष की भूमिका बनी |
| 14 जनवरी, 1761 ई. | पानीपत का तृतीय युद्ध | मराठों की पराजय, अब्दाली की विजय |
| 1767 ई. | अब्दाली का अंतिम प्रमुख आक्रमण | सिखों के बढ़ते प्रभाव को रोकने का प्रयास असफल |
| 1772 ई. | अहमदशाह अब्दाली की मृत्यु | भारत में अफ़ग़ान विस्तार की नीति समाप्त |
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