परिचय
➣ भारत में 17वीं एवं 18वीं शताब्दी के दौरान अनेक यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियाँ व्यापार के उद्देश्य से आईं। इनमें पुर्तगाली, डच, अंग्रेज, डेनिश तथा फ्रांसीसी प्रमुख थे।
➣ प्रारम्भ में इन सभी का उद्देश्य केवल व्यापारिक लाभ प्राप्त करना था, किन्तु समय के साथ अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच भारत में राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा आरम्भ हो गई।
➣ 18वीं शताब्दी के मध्य तक मुग़ल साम्राज्य के पतन तथा प्रांतीय राज्यों के उदय के कारण भारत की राजनीतिक स्थिति अस्थिर हो चुकी थी।
अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों ने इस परिस्थिति का लाभ उठाकर भारतीय शासकों के उत्तराधिकार संबंधी विवादों में हस्तक्षेप करना प्रारम्भ किया। इसी प्रतिस्पर्धा के परिणामस्वरूप दोनों शक्तियों के मध्य कर्नाटक युद्ध (1746–1763 ई.) लड़े गए।➣ कर्नाटक युद्ध वास्तव में केवल कर्नाटक क्षेत्र तक सीमित संघर्ष नहीं थे, बल्कि ये भारत में अंग्रेजी एवं फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कम्पनियों के बीच राजनीतिक एवं सामरिक प्रभुत्व स्थापित करने की लड़ाई थे। इन युद्धों में भारतीय शासकों के उत्तराधिकार विवादों तथा यूरोप में चल रहे युद्धों का भी महत्वपूर्ण प्रभाव दिखाई देता है।
➣ तीनों कर्नाटक युद्धों में अंततः अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी विजयी रही, जबकि फ्रांसीसी कम्पनी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का अंत हो गया।
इसके बाद फ्रांसीसी भारत में केवल कुछ व्यापारिक बस्तियों तक सीमित रह गए और अंग्रेजों के सामने कोई प्रभावशाली यूरोपीय प्रतिद्वंद्वी नहीं बचा।➣ कर्नाटक युद्धों में प्राप्त सफलता ने अंग्रेजों को भारतीय राजनीति में निर्णायक हस्तक्षेप करने का अवसर प्रदान किया। आगे चलकर प्लासी का युद्ध (1757 ई.), बक्सर का युद्ध (1764 ई.) तथा इलाहाबाद की संधि (1765 ई.) के माध्यम से अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी एक व्यापारिक संस्था से भारत की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बन गई।
| यूरोपीय शक्ति | भारत में स्थिति | परिणाम |
|---|---|---|
| पुर्तगाली | भारत में आने वाली प्रथम यूरोपीय शक्ति | धीरे-धीरे अंग्रेजों एवं डचों से पराजित |
| डच | मुख्यतः मसाला एवं समुद्री व्यापार | 1759 ई. के बेदरा युद्ध के बाद प्रभाव समाप्त |
| फ्रांसीसी | व्यापार के साथ राजनीतिक विस्तार का प्रयास | कर्नाटक युद्धों में पराजय |
| अंग्रेज | व्यापार से राजनीतिक शक्ति की ओर अग्रसर | भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव रखी |
▪ मुख्य संघर्ष – अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों के मध्य।
▪ संघर्ष का नाम – कर्नाटक युद्ध (1746–1763 ई.)।
▪ कुल युद्ध – तीन।
▪ विजेता – अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी।
▪ परिणाम – भारत में फ्रांसीसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का अंत तथा अंग्रेजी प्रभुत्व की स्थापना।
प्रथम कर्नाटक युद्ध (1746–1748 ई.)
➣ प्रथम कर्नाटक युद्ध (1746–1748 ई.) भारत में अंग्रेज़ों एवं फ्रांसीसियों के मध्य लड़ा गया पहला प्रमुख युद्ध था। यद्यपि इसका युद्धक्षेत्र दक्षिण भारत का कर्नाटक प्रदेश था, किन्तु इसका वास्तविक कारण भारत नहीं बल्कि यूरोप की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता थी।
➣ इस युद्ध का प्रमुख कारण ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार का युद्ध (1740–1748 ई.) था। यूरोप में ब्रिटेन और फ्रांस परस्पर विरोधी पक्षों में थे। जब दोनों देशों के बीच यूरोप में युद्ध प्रारम्भ हुआ, तो उसका प्रभाव भारत में स्थित उनकी व्यापारिक कम्पनियों पर भी पड़ा। परिणामस्वरूप 1746 ई. में भारत में अंग्रेज़ी एवं फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कम्पनियों के मध्य संघर्ष आरम्भ हो गया।
➣ युद्ध के प्रारम्भ में अंग्रेज़ी नौसेना के अधिकारी कमोडोर बर्नेट ने कुछ फ्रांसीसी व्यापारिक जहाज़ों को पकड़ लिया। इसके उत्तर में पांडिचेरी के फ्रांसीसी गवर्नर डूप्ले ने मॉरीशस के गवर्नर ला बोर्दने से सहायता माँगी।
➣ ला बोर्दने अपने नौसैनिक बेड़े के साथ भारत पहुँचा और सितम्बर, 1746 ई. में मद्रास पर आक्रमण कर उसका घेराव कर दिया। 21 सितम्बर, 1746 ई. को अंग्रेज़ों ने आत्मसमर्पण कर दिया और मद्रास पर फ्रांसीसियों का अधिकार स्थापित हो गया।
➣ मद्रास की विजय के बाद डूप्ले और ला बोर्दने के बीच गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए। डूप्ले मद्रास को स्थायी रूप से फ्रांसीसी राज्य के अधीन रखना चाहता था, जबकि ला बोर्दने अंग्रेज़ों से लगभग 12 लाख पैगोडा लेकर मद्रास उन्हें वापस सौंपने के पक्ष में था। इस मतभेद के कारण दोनों फ्रांसीसी अधिकारियों के संबंध बिगड़ गए और फ्रांसीसी पक्ष की एकता कमजोर पड़ गई।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| युद्ध | प्रथम कर्नाटक युद्ध |
| अवधि | 1746–1748 ई. |
| मुख्य कारण | ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार का युद्ध (यूरोप) |
| फ्रांसीसी नेतृत्व | डूप्ले एवं ला बोर्दने |
| प्रमुख घटना | 21 सितम्बर, 1746 ई. को मद्रास पर फ्रांसीसियों का अधिकार |
▪ प्रथम कर्नाटक युद्ध – 1746–1748 ई.
▪ मुख्य कारण – ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार का युद्ध।
▪ 21 सितम्बर, 1746 ई. – फ्रांसीसियों ने मद्रास पर अधिकार किया।
▪ डूप्ले मद्रास को अपने पास रखना चाहता था, जबकि ला बोर्दने उसे धन लेकर अंग्रेज़ों को लौटाने के पक्ष में था।
सेण्ट टोमे (अडयार) का युद्ध एवं ऑक्स-ला-शैपेल की संधि
➣ मद्रास पर अधिकार स्थापित करने के बाद फ्रांसीसियों की बढ़ती शक्ति से कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन चिंतित हो गए। उन्होंने फ्रांसीसियों से मद्रास अंग्रेजों को लौटाने की अपेक्षा की, किन्तु डूप्ले ने उनकी बात स्वीकार नहीं की। परिणामस्वरूप कर्नाटक के नवाब और फ्रांसीसियों के मध्य संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई।
➣ 1746/1747 ई. में नवाब अनवरुद्दीन ने अपने पुत्र महफूज़ ख़ाँ के नेतृत्व में फ्रांसीसियों के विरुद्ध एक विशाल सेना भेजी। दूसरी ओर फ्रांसीसी सेना का नेतृत्व कैप्टन पैराडाइज कर रहा था।
➣ अडयार (सेण्ट टोमे) के निकट हुए इस युद्ध में फ्रांसीसी सेना ने संख्या में बहुत कम होने के बावजूद आधुनिक यूरोपीय युद्ध-पद्धति एवं अनुशासित सैन्य संगठन के बल पर नवाब की सेना को पराजित कर दिया।
➣ इस विजय ने भारतीय शासकों को पहली बार यूरोपीय सैन्य संगठन एवं आधुनिक हथियारों की वास्तविक शक्ति का अनुभव कराया।
➣ सेण्ट टोमे (अडयार) का युद्ध प्रथम कर्नाटक युद्ध की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक माना जाता है। इस युद्ध ने सिद्ध कर दिया कि अनुशासित एवं आधुनिक प्रशिक्षण प्राप्त छोटी यूरोपीय सेना भी पारंपरिक भारतीय सेना पर विजय प्राप्त कर सकती है।
➣ मद्रास विजय के बाद 1748 ई. में डूप्ले ने अंग्रेजों के प्रमुख दुर्ग फोर्ट सेंट डेविड पर अधिकार करने का प्रयास किया, किन्तु उसे सफलता नहीं मिली। दूसरी ओर अंग्रेजों ने भी फ्रांसीसी मुख्यालय पांडिचेरी पर आक्रमण किया, परन्तु वे भी उसे जीतने में असफल रहे।
➣ इसी बीच यूरोप में ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार का युद्ध समाप्त हो गया। परिणामस्वरूप 1748 ई. में ऑक्स-ला-शैपेल की संधि सम्पन्न हुई। इस संधि के साथ ही भारत में भी प्रथम कर्नाटक युद्ध समाप्त हो गया।
➣ संधि के अनुसार मद्रास अंग्रेजों को वापस कर दिया गया, जबकि बदले में फ्रांस को उत्तरी अमेरिका का लुइसबर्ग प्राप्त हुआ।
➣ यद्यपि युद्ध समाप्त हो गया, किन्तु अंग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिद्वंद्विता समाप्त नहीं हुई और आगे चलकर यह द्वितीय कर्नाटक युद्ध का कारण बनी।
| घटना | वर्ष | महत्त्व |
|---|---|---|
| सेण्ट टोमे (अडयार) का युद्ध | 1746/1747 ई. | कैप्टन पैराडाइज के नेतृत्व में फ्रांसीसियों ने महफूज़ ख़ाँ की सेना को पराजित किया। |
| फोर्ट सेंट डेविड पर आक्रमण | 1748 ई. | डूप्ले का प्रयास असफल रहा। |
| पांडिचेरी पर अंग्रेजी आक्रमण | 1748 ई. | अंग्रेज भी सफलता प्राप्त नहीं कर सके। |
| ऑक्स-ला-शैपेल की संधि | 1748 ई. | प्रथम कर्नाटक युद्ध समाप्त; मद्रास अंग्रेजों को वापस मिला। |
▪ सेण्ट टोमे (अडयार) का युद्ध – प्रथम कर्नाटक युद्ध की सबसे महत्वपूर्ण घटना।
▪ फ्रांसीसी सेनापति – कैप्टन पैराडाइज।
▪ नवाब की सेना का नेतृत्व – महफूज़ ख़ाँ।
▪ 1748 ई. – ऑक्स-ला-शैपेल की संधि से प्रथम कर्नाटक युद्ध समाप्त हुआ।
▪ संधि का परिणाम – मद्रास अंग्रेजों को लौटा दिया गया।
द्वितीय कर्नाटक युद्ध (1749–1754 ई.)
➣ द्वितीय कर्नाटक युद्ध का प्रमुख कारण कोई युद्ध नहीं था, बल्कि हैदराबाद (दक्कन) तथा कर्नाटक के उत्तराधिकार (राजगद्दी) के विवाद थे। अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों ने इन आंतरिक विवादों में हस्तक्षेप कर अपने-अपने समर्थक उम्मीदवारों को सत्ता दिलाने का प्रयास किया।
➣ 1748 ई. में हैदराबाद के शक्तिशाली निज़ाम आसफ़जाह प्रथम (निज़ाम-उल-मुल्क) की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार का विवाद उत्पन्न हो गया। उसके पुत्र नासिर जंग तथा पौत्र मुज़फ़्फ़र जंग दोनों ने दक्कन की सूबेदारी पर अपना दावा प्रस्तुत किया।
➣ दूसरी ओर कर्नाटक में भी नवाब अनवरुद्दीन तथा उसके प्रतिद्वंद्वी चाँदा साहब के मध्य नवाबी को लेकर संघर्ष प्रारम्भ हो गया। इस प्रकार हैदराबाद एवं कर्नाटक दोनों क्षेत्रों में उत्तराधिकार के विवाद ने अंग्रेजों और फ्रांसीसियों को हस्तक्षेप का अवसर प्रदान किया।
➣ फ्रांसीसियों ने हैदराबाद में मुज़फ़्फ़र जंग तथा कर्नाटक में चाँदा साहब का समर्थन किया। इसके विपरीत अंग्रेजों ने हैदराबाद में नासिर जंग तथा कर्नाटक में अनवरुद्दीन का समर्थन किया।
➣ इस प्रकार द्वितीय कर्नाटक युद्ध केवल अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच प्रत्यक्ष संघर्ष नहीं था, बल्कि भारतीय उत्तराधिकार विवादों में दोनों यूरोपीय शक्तियों के हस्तक्षेप का परिणाम था। यही कारण है कि इस युद्ध में भारतीय शासकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही।
| क्षेत्र | फ्रांसीसियों का समर्थन | अंग्रेजों का समर्थन |
|---|---|---|
| हैदराबाद (दक्कन) | मुज़फ़्फ़र जंग | नासिर जंग |
| कर्नाटक | चाँदा साहब | अनवरुद्दीन |
▪ द्वितीय कर्नाटक युद्ध – 1749–1754 ई.
▪ मुख्य कारण – हैदराबाद एवं कर्नाटक का उत्तराधिकार विवाद।
▪ फ्रांसीसी समर्थन – मुज़फ़्फ़र जंग एवं चाँदा साहब।
▪ अंग्रेजी समर्थन – नासिर जंग एवं अनवरुद्दीन।
द्वितीय कर्नाटक युद्ध की प्रमुख घटनाएँ
➣ 1749 ई. में अम्बूर के युद्ध में चाँदा साहब एवं फ्रांसीसी सेना ने संयुक्त रूप से कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन को पराजित कर उसकी हत्या कर दी।
➣ इस विजय के बाद चाँदा साहब को कर्नाटक का नवाब घोषित कर दिया गया, जबकि अनवरुद्दीन का पुत्र मुहम्मद अली त्रिचनापल्ली भाग गया।
➣ इसी समय हैदराबाद में भी उत्तराधिकार का संघर्ष जारी रहा। 1750 ई. में नासिर जंग की हत्या कर दी गई, जिसके बाद फ्रांसीसियों ने अपने समर्थक मुज़फ़्फ़र जंग को दक्कन (हैदराबाद) का सूबेदार घोषित कर दिया।
➣ अपनी सफलता से प्रसन्न होकर मुज़फ़्फ़र जंग ने डूप्ले को लगभग 20 लाख रुपये, एक समृद्ध जागीर तथा ज़फ़र जंग की उपाधि प्रदान की।
➣ साथ ही उसने कृष्णा नदी के दक्षिण से कन्याकुमारी तक के क्षेत्र का गवर्नर भी डूप्ले को घोषित किया। इससे दक्षिण भारत में फ्रांसीसी प्रभाव अपने चरम पर पहुँच गया।
➣ इसके अतिरिक्त फ्रांसीसी कम्पनी को मसूलीपट्टनम नगर तथा पांडिचेरी के समीप अतिरिक्त भूमि भी पुरस्कार स्वरूप प्राप्त हुई, जिससे कम्पनी की आर्थिक एवं सामरिक स्थिति और अधिक सुदृढ़ हो गई।
➣ डूप्ले ने अपनी स्थिति को मजबूत बनाए रखने के लिए बुस्सी के नेतृत्व में एक फ्रांसीसी सेना हैदराबाद में तैनात कर दी। बुस्सी ने वहाँ फ्रांसीसी प्रभाव को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ इसी अवधि में मुग़ल सम्राट आलमगीर द्वितीय ने डूप्ले को नवाब ख़ाँ की उपाधि प्रदान की, जिससे भारतीय दरबारों में उसकी प्रतिष्ठा और बढ़ गई।
➣ किन्तु फ्रांसीसियों की यह सफलता अधिक समय तक नहीं टिक सकी। 13 फरवरी, 1751 ई. को कर्नूल के नवाब ने युद्ध के दौरान मुज़फ़्फ़र जंग की हत्या कर दी। इसके बाद फ्रांसीसियों ने सलाबत जंग को दक्कन का नया सूबेदार बनाया।
➣ सलाबत जंग ने फ्रांसीसियों की सहायता के बदले उन्हें उत्तरी सरकार का विस्तृत क्षेत्र प्रदान किया। इसमें मुस्तफ़ानगर, चिकाकोल (श्रीकाकुलम), राजमुंद्री तथा एलूर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र सम्मिलित थे। इससे दक्षिण भारत में फ्रांसीसी प्रभाव और अधिक सुदृढ़ हो गया।
| घटना | वर्ष | महत्त्व |
|---|---|---|
| अम्बूर का युद्ध | 1749 ई. | अनवरुद्दीन की मृत्यु; चाँदा साहब कर्नाटक का नवाब बना। |
| नासिर जंग की मृत्यु | 1750 ई. | मुज़फ़्फ़र जंग दक्कन का सूबेदार बना। |
| डूप्ले को सम्मान | 1750 ई. | 20 लाख रुपये, जागीर एवं ‘ज़फ़र जंग’ की उपाधि। |
| मुज़फ़्फ़र जंग की मृत्यु | 13 फरवरी, 1751 ई. | कर्नूल के नवाब द्वारा हत्या। |
| सलाबत जंग | 1751 ई. | दक्कन का सूबेदार; उत्तरी सरकार फ्रांसीसियों को प्रदान की। |
▪ 1749 ई. – अम्बूर के युद्ध में अनवरुद्दीन की मृत्यु।
▪ 1750 ई. – नासिर जंग की हत्या; मुज़फ़्फ़र जंग सूबेदार बना।
▪ डूप्ले को ज़फ़र जंग की उपाधि एवं 20 लाख रुपये प्राप्त हुए।
▪ 13 फरवरी, 1751 ई. – मुज़फ़्फ़र जंग की हत्या।
▪ सलाबत जंग– ने फ्रांसीसियों को उत्तरी सरकार (Northern Circars) प्रदान की।
त्रिचनापल्ली अभियान एवं द्वितीय कर्नाटक युद्ध का अंत
➣ अम्बूर के युद्ध (1749 ई.) में अनवरुद्दीन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र मुहम्मद अली अपनी सुरक्षा के लिए त्रिचनापल्ली (तिरुचिरापल्ली) के दुर्ग में चला गया। उसने कर्नाटक की नवाबी प्राप्त करने के लिए अंग्रेजों से सहायता माँगी।
➣ दूसरी ओर चाँदा साहब और फ्रांसीसी सेना ने 1751 ई. में त्रिचनापल्ली का घेरा डाल दिया। यदि यह दुर्ग उनके अधिकार में आ जाता, तो सम्पूर्ण कर्नाटक पर फ्रांसीसी प्रभाव स्थापित हो जाता।
➣ त्रिचनापल्ली पर पड़ रहे दबाव को कम करने के लिए अंग्रेज अधिकारी रॉबर्ट क्लाइव ने एक साहसिक योजना बनाई। उसने सीधे अर्काट (कर्नाटक की राजधानी) पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में ले लिया। इससे चाँदा साहब को त्रिचनापल्ली का घेरा कमजोर करना पड़ा।
➣ चाँदा साहब ने अपने पुत्र राजा साहब के नेतृत्व में सेना भेजकर अर्काट का पुनः घेराव किया, किन्तु रॉबर्ट क्लाइव ने वीरतापूर्वक उसका सामना किया। बाद में स्ट्रिंगर लॉरेंस की सहायता मिलने पर अंग्रेजों ने अर्काट पर अपना अधिकार सुरक्षित रखा और फ्रांसीसी योजना विफल हो गई।
➣ इसके बाद युद्ध का पलड़ा धीरे-धीरे अंग्रेजों की ओर झुकने लगा। चाँदा साहब त्रिचनापल्ली से भागकर तंजौर पहुँचा, जहाँ उसकी हत्या कर दी गई। इसके पश्चात् मुहम्मद अली को कर्नाटक का नवाब स्वीकार कर लिया गया।
➣ फ्रांसीसी असफलताओं के कारण 1754 ई. में फ्रांस सरकार ने डूप्ले को वापस बुला लिया तथा उसके स्थान पर गोडेहू को भारत में फ्रांसीसी प्रदेशों का गवर्नर नियुक्त किया। डूप्ले की वापसी के साथ ही भारत में फ्रांसीसी राजनीतिक विस्तार की नीति को गहरा आघात पहुँचा।
➣ अंततः 1754–55 ई. में पांडिचेरी की संधि के साथ द्वितीय कर्नाटक युद्ध समाप्त हुआ। इस संधि में दोनों पक्षों ने भारतीय शासकों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का आश्वासन दिया, यद्यपि व्यवहार में यह व्यवस्था अधिक समय तक प्रभावी नहीं रह सकी।
| घटना | वर्ष | महत्त्व |
|---|---|---|
| त्रिचनापल्ली का घेराव | 1751 ई. | चाँदा साहब एवं फ्रांसीसियों ने मुहम्मद अली को घेर लिया। |
| अर्काट अभियान | 1751 ई. | रॉबर्ट क्लाइव ने अर्काट पर अधिकार कर युद्ध की दिशा बदल दी। |
| चाँदा साहब की मृत्यु | 1752 ई. | मुहम्मद अली कर्नाटक का नवाब बना। |
| डूप्ले की वापसी | 1754 ई. | गोडेहू नया फ्रांसीसी गवर्नर नियुक्त हुआ। |
| पांडिचेरी की संधि | 1754–55 ई. | द्वितीय कर्नाटक युद्ध का समापन। |
➣ इतिहासकार मैरियट ने डूप्ले और क्लाइव की तुलना करते हुए लिखा है डूप्ले ने मद्रास में भारत की चाबी खोजने का निष्फल प्रयास किया, जबकि क्लाइव ने यह चाबी बंगाल में खोज ली। यह कथन अंग्रेजों की भविष्य की सफलता और फ्रांसीसियों की असफलता को स्पष्ट करता है।
▪ त्रिचनापल्ली में शरण – मुहम्मद अली।
▪ अर्काट अभियान – रॉबर्ट क्लाइव (1751 ई.)।
▪ चाँदा साहब – तंजौर में मारा गया।
▪ 1754 ई. – डूप्ले को वापस बुलाया गया; गोडेहू नया गवर्नर बना।
▪ 1754–55 ई. – पांडिचेरी की संधि से द्वितीय कर्नाटक युद्ध समाप्त हुआ।
तृतीय कर्नाटक युद्ध (1756–1763 ई.)
➣ यह युद्ध अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के मध्य लड़ा गया, अंतिम तथा सबसे निर्णायक युद्ध था। इस युद्ध का प्रमुख कारण यूरोप का सप्तवर्षीय युद्ध (1756–1763 ई.) था। यूरोप में ब्रिटेन और फ्रांस पुनः एक-दूसरे के विरुद्ध युद्धरत हो गए, जिसका प्रभाव भारत पर भी पड़ा।
सप्तवर्षीय युद्ध में ब्रिटेन ने प्रशा का तथा फ्रांस ने ऑस्ट्रिया का समर्थन किया। इसी यूरोपीय संघर्ष के कारण भारत में भी अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के मध्य तृतीय कर्नाटक युद्ध प्रारम्भ हुआ।
➣ इस बार संघर्ष केवल कर्नाटक तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बंगाल सहित भारत के अन्य भागों तक भी फैल गया। इस कारण तृतीय कर्नाटक युद्ध का स्वरूप पहले दोनों युद्धों की अपेक्षा अधिक व्यापक हो गया।
➣ इस युद्ध का तात्कालिक कारण 1757 ई. में रॉबर्ट क्लाइव तथा एडमिरल चार्ल्स वाट्सन द्वारा बंगाल स्थित चन्द्रनगर पर अधिकार करना था। इससे बंगाल में फ्रांसीसी व्यापारिक शक्ति को गंभीर आघात पहुँचा।
➣ फ्रांसीसी सरकार ने भारत में अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से 1758 ई. में काउण्ट डी लाली को भारत भेजा। उसने भारत पहुँचते ही फ्रांसीसी सेना का नेतृत्व संभाला और अंग्रेजों के विरुद्ध आक्रामक नीति अपनाई।
➣ 1758 ई. में लाली ने अंग्रेजों के महत्वपूर्ण दुर्ग फोर्ट सेंट डेविड पर अधिकार कर लिया। यह फ्रांसीसियों की प्रारम्भिक सफलता थी, जिससे कुछ समय के लिए उनकी स्थिति मजबूत हुई।
➣ इसके बाद लाली ने तंजौर पर आक्रमण किया, किन्तु वहाँ उसे सफलता नहीं मिली। इस असफल अभियान के कारण फ्रांसीसी सेना को आर्थिक एवं सैनिक दोनों प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
➣ इसी दौरान अंग्रेजों ने दक्कन में अपनी स्थिति मजबूत करनी प्रारम्भ कर दी। लाली ने अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए बुस्सी को हैदराबाद से वापस बुला लिया। इससे हैदराबाद में फ्रांसीसी प्रभाव कमजोर पड़ गया और अंग्रेजों को वहाँ अपनी स्थिति सुदृढ़ करने का अवसर मिल गया।
| घटना | वर्ष | महत्त्व |
|---|---|---|
| सप्तवर्षीय युद्ध | 1756–1763 ई. | तृतीय कर्नाटक युद्ध का मुख्य कारण। |
| चन्द्रनगर पर अंग्रेजों का अधिकार | 1757 ई. | युद्ध का तात्कालिक कारण। |
| काउण्ट डी लाली का आगमन | 1758 ई. | फ्रांसीसी सेना का नेतृत्व संभाला। |
| फोर्ट सेंट डेविड पर अधिकार | 1758 ई. | फ्रांसीसियों की प्रारम्भिक सफलता। |
| तंजौर अभियान | 1758 ई. | लाली असफल रहा। |
| बुस्सी को हैदराबाद से बुलाना | 1758 ई. | दक्कन में फ्रांसीसी प्रभाव कमजोर पड़ा। |
▪ तृतीय कर्नाटक युद्ध – 1756–1763 ई.
▪ मुख्य कारण – सप्तवर्षीय युद्ध।
▪ तात्कालिक कारण – 1757 ई. में चन्द्रनगर पर अंग्रेजों का अधिकार।
▪ फ्रांसीसी सेनापति – काउण्ट डी लाली।
▪ 1758 ई. – फोर्ट सेंट डेविड पर फ्रांसीसियों का अधिकार।
वाण्डिवाश का युद्ध (1760 ई.)
➣ वाण्डिवाश का युद्ध 22 जनवरी, 1760 ई. को अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों के मध्य लड़ा गया। यह तृतीय कर्नाटक युद्ध की सबसे महत्वपूर्ण तथा निर्णायक लड़ाई थी, जिसने भारत में फ्रांसीसी राजनीतिक भविष्य का निर्णय कर दिया।
➣ इस युद्ध में अंग्रेजी सेना का नेतृत्व सर आयर कूट ने किया, जबकि फ्रांसीसी सेना का नेतृत्व काउण्ट डी लाली कर रहा था। दोनों सेनाओं के मध्य वाण्डिवाश के मैदान में भीषण युद्ध हुआ।
➣ युद्ध में अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। इस पराजय के दौरान फ्रांसीसी सेनानायक बुस्सी अंग्रेजों के हाथों बंदी बना लिया गया। वाण्डिवाश की हार के बाद दक्षिण भारत में फ्रांसीसियों की सैन्य शक्ति लगभग समाप्त हो गई।
➣ विजय के बाद अंग्रेजों ने फ्रांसीसी बस्तियों पर क्रमशः अधिकार करना प्रारम्भ कर दिया। 1761 ई. में उन्होंने फ्रांसीसियों की सबसे महत्वपूर्ण बस्ती पांडिचेरी पर अधिकार कर लिया। इसके बाद जिंजी तथा माही भी अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गए।
➣ वाण्डिवाश के युद्ध ने भारत में अंग्रेजों की सैन्य श्रेष्ठता सिद्ध कर दी। इसके बाद फ्रांसीसी कम्पनी अंग्रेजों का प्रभावी प्रतिरोध करने में असमर्थ हो गई और भारत में उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ लगभग समाप्त हो गईं।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| युद्ध | वाण्डिवाश का युद्ध |
| तिथि | 22 जनवरी, 1760 ई. |
| अंग्रेजी सेनापति | सर आयर कूट (Sir Eyre Coote) |
| फ्रांसीसी सेनापति | काउण्ट डी लाली (Count de Lally) |
| प्रमुख घटना | बुस्सी अंग्रेजों द्वारा बंदी बनाया गया। |
| परिणाम | 1761 ई. में पांडिचेरी, जिंजी एवं माही पर अंग्रेजों का अधिकार। |
▪ वाण्डिवाश का युद्ध – 22 जनवरी, 1760 ई.
▪ अंग्रेजी सेनापति – सर आयर कूट।
▪ फ्रांसीसी सेनापति – काउण्ट डी लाली।
▪ बुस्सी – युद्ध में अंग्रेजों द्वारा बंदी बनाया गया।
▪ 1761 ई. – अंग्रेजों ने पांडिचेरी पर अधिकार कर लिया।
पेरिस की संधि (1763 ई.) एवं कर्नाटक युद्धों का परिणाम
➣ 1763 ई. में यूरोप में सप्तवर्षीय युद्ध की समाप्ति के साथ पेरिस की संधि सम्पन्न हुई। इसी संधि के साथ भारत में भी तृतीय कर्नाटक युद्ध का औपचारिक अंत हो गया।
➣ संधि के अनुसार फ्रांस को भारत में अपनी कुछ व्यापारिक बस्तियाँ पांडिचेरी, करैकाल, माही तथा चन्द्रनगर वापस मिल गईं, किन्तु उन्हें इन स्थानों पर किलेबंदी करने तथा सैन्य शक्ति रखने की अनुमति नहीं थी। परिणामस्वरूप फ्रांसीसी इन बस्तियों का उपयोग केवल व्यापारिक केन्द्रों के रूप में ही कर सके।
➣ तृतीय कर्नाटक युद्ध में पराजय के साथ ही भारत में फ्रांसीसियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा का अंत हो गया। इसके बाद वे भारतीय राजनीति में प्रभावी हस्तक्षेप करने की स्थिति में नहीं रहे, जबकि अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी भारत की सबसे शक्तिशाली यूरोपीय शक्ति बनकर उभरी।
➣ कर्नाटक युद्धों की सफलता ने अंग्रेजों के लिए भारत में राजनीतिक विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया। आगे चलकर उन्होंने प्लासी (1757 ई.), बक्सर (1764 ई.) तथा इलाहाबाद की संधि (1765 ई.) के माध्यम से भारतीय क्षेत्रों पर अपना अधिकार और अधिक सुदृढ़ किया।
➣ इस प्रकार कर्नाटक युद्ध भारत के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुए। इन युद्धों के परिणामस्वरूप भारत में अंग्रेजों की सर्वोच्चता स्थापित हुई तथा फ्रांसीसी केवल सीमित व्यापारिक गतिविधियों तक सिमटकर रह गए।
| युद्ध | अवधि | संधि | प्रमुख परिणाम |
|---|---|---|---|
| प्रथम कर्नाटक युद्ध | 1746–1748 ई. | ऑक्स-ला-शैपेल (1748) | मद्रास अंग्रेजों को वापस मिला। |
| द्वितीय कर्नाटक युद्ध | 1749–1754 ई. | पांडिचेरी की संधि (1754–55) | डूप्ले को वापस बुलाया गया; अंग्रेजों का प्रभाव बढ़ा। |
| तृतीय कर्नाटक युद्ध | 1756–1763 ई. | पेरिस की संधि (1763) | भारत में फ्रांसीसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का अंत; अंग्रेजों की सर्वोच्चता स्थापित। |
कर्नाटक युद्धों का समग्र प्रभाव
| पहलू | प्रभाव |
|---|---|
| विजेता | अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी |
| पराजित शक्ति | फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कम्पनी |
| राजनीतिक परिणाम | भारत में अंग्रेजों के राजनीतिक प्रभुत्व की स्थापना। |
| फ्रांसीसी स्थिति | केवल सीमित व्यापारिक बस्तियों तक सीमित। |
| ऐतिहासिक महत्त्व | भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना की पृष्ठभूमि तैयार हुई। |
▪ 1763 ई. – पेरिस की संधि से तृतीय कर्नाटक युद्ध समाप्त हुआ।
▪ वाण्डिवाश (1760) – फ्रांसीसियों की निर्णायक पराजय।
▪ फ्रांसीसियों को – व्यापारिक बस्तियाँ मिलीं, पर किलेबंदी एवं सैन्य विस्तार की अनुमति नहीं मिली।
▪ सबसे बड़ा परिणाम – भारत में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी की सर्वोच्चता स्थापित हुई।
निष्कर्ष
➣ कर्नाटक युद्ध (1746–1763 ई.) भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुए। इन युद्धों के माध्यम से अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी और फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच व्यापारिक प्रतिस्पर्धा धीरे-धीरे राजनीतिक प्रभुत्व के संघर्ष में परिवर्तित हो गई।
➣ तीनों कर्नाटक युद्धों में अंतिम विजय अंग्रेजों की हुई। वाण्डिवाश के युद्ध (1760 ई.) तथा पेरिस की संधि (1763 ई.) के बाद भारत में फ्रांसीसियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा समाप्त हो गई और वे केवल सीमित व्यापारिक बस्तियों तक सिमटकर रह गए।
➣ दूसरी ओर अंग्रेजों ने अपनी सैन्य शक्ति, कूटनीति तथा भारतीय शासकों के उत्तराधिकार विवादों का लाभ उठाकर भारत में अपना प्रभाव निरंतर बढ़ाया। कर्नाटक युद्धों की सफलता ने आगे चलकर प्लासी (1757 ई.), बक्सर (1764 ई.) तथा ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।
➣ इस प्रकार कर्नाटक युद्धों ने भारत में यूरोपीय शक्तियों के संघर्ष का अंत कर अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी को भारत की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बनने की दिशा में निर्णायक बढ़त प्रदान की।
| युद्ध | वर्ष | कारण | समाप्ति | परिणाम |
|---|---|---|---|---|
| प्रथम कर्नाटक युद्ध | 1746–1748 ई. |
▪ ऑस्ट्रियाई उत्तराधिकार युद्ध का प्रभाव। ▪ अंग्रेज़ों एवं फ्रांसीसियों के बीच वैश्विक संघर्ष। |
▪ 1748 ई. ▪ एक्स-ला-शेपल (Aix-la-Chapelle) की संधि |
▪ अंग्रेज़ों एवं कर्नाटक के नवाब की पराजय। ▪ मद्रास अंग्रेज़ों को वापस मिला। |
| द्वितीय कर्नाटक युद्ध | 1748–1754 ई. |
▪ हैदराबाद एवं कर्नाटक के उत्तराधिकार विवाद। ▪ अंग्रेज़ों एवं फ्रांसीसियों का भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप। |
▪ 1754/1755 ई. ▪ पांडिचेरी की संधि |
▪ अंग्रेज़ों की स्थिति अधिक सुदृढ़ हुई। ▪ फ्रांसीसी प्रभाव कमजोर पड़ा। |
| तृतीय कर्नाटक युद्ध | 1756–1763 ई. | ▪ यूरोप का सप्तवर्षीय युद्ध (Seven Years’ War)। |
▪ 1763 ई. ▪ पेरिस की संधि |
▪ अंग्रेज़ों की निर्णायक विजय। ▪ भारत में फ्रांसीसी राजनीतिक प्रभुत्व का अंत तथा अंग्रेज़ी सत्ता की नींव मजबूत हुई। |
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