भारत में डेनिशों का आगमन, विस्तार एवं पतन (1620–1845 ई.)

भारतीय इतिहास आधुनिक भारत यूरोपीय कंपनियों का भारत आगमन भारत में डेनिशों का आगमन, विस्तार एवं पतन (1620–1845 ई.)
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पृष्ठभूमि

17वीं शताब्दी में पुर्तगाल, स्पेन, नीदरलैंड (डच), इंग्लैंड तथा फ्रांस की भाँति डेनमार्क ने भी एशिया के लाभदायक समुद्री व्यापार में भाग लेने का प्रयास किया। इसी उद्देश्य से 1616 ई. में डैनिश ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना की गई।

➣ यद्यपि भारत में डैनिशों का राजनीतिक एवं व्यापारिक प्रभाव अंग्रेज़ों, फ्रांसीसियों या डचों की तुलना में सीमित रहा, फिर भी उन्होंने ट्रैंक्वेबार (थारंगमबाड़ी), सेरामपुर तथा अन्य व्यापारिक केन्द्र स्थापित किए और लगभग दो शताब्दियों तक भारत में व्यापार किया।

➣ इसके अतिरिक्त शिक्षा, मुद्रण, ईसाई मिशनरी गतिविधियों तथा तमिल भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में भी उनका उल्लेखनीय योगदान रहा।

डेनमार्क की समुद्री व्यापार नीति

15वीं एवं 16वीं शताब्दी में यूरोपीय देशों के बीच समुद्री खोजों का युग प्रारम्भ हुआ। समुद्री मार्गों की खोज के बाद एशिया के साथ व्यापार स्थापित करने तथा उस पर अपना प्रभुत्व कायम करने की होड़ बढ़ने लगी।

➣ सर्वप्रथम पुर्तगालियों ने भारत के समुद्री व्यापार पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। उनकी सफलता को देखकर अन्य यूरोपीय देशों ने भी इस दिशा में प्रयास प्रारम्भ किए। इसी क्रम में डेनमार्क ने भी भारत के साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित करने का निश्चय किया।

➣ डेनमार्क का प्रमुख उद्देश्य एशिया के साथ प्रत्यक्ष समुद्री व्यापार स्थापित कर आर्थिक लाभ प्राप्त करना तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अपनी भागीदारी बढ़ाना था।

➣ डेनमार्क के शासकों का विश्वास था कि यदि एशिया के साथ प्रत्यक्ष व्यापार स्थापित किया जाए तो देश की आय एवं अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक स्थिति को सुदृढ़ बनाया जा सकता है।

➣ इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए डेनमार्क ने 1616 ई. में डैनिश ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना की, जिसने आगे चलकर भारत एवं दक्षिण-पूर्व एशिया में व्यापारिक केन्द्र स्थापित किए।

डैनिश ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना (1616 ई.)

डैनिश ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना 1616 ई. में डेनमार्क के राजा क्रिश्चियन चतुर्थ (Christian IV) के संरक्षण में की गई।

➣ कम्पनी को एशिया के देशों के साथ व्यापार करने का राजकीय एकाधिकार (Royal Charter) प्रदान किया गया, जिससे उसे पूर्वी देशों में व्यापारिक केन्द्र स्थापित करने तथा समुद्री व्यापार संचालित करने का विशेष अधिकार प्राप्त हुआ।

➣ कम्पनी का मुख्यालय कोपेनहेगन (Copenhagen) में स्थापित किया गया, जहाँ से इसके समुद्री एवं व्यापारिक अभियानों का संचालन किया जाता था।

➣ कम्पनी ने एशिया में व्यापारिक केन्द्र स्थापित करने के उद्देश्य से अनेक समुद्री अभियानों का आयोजन किया। इन्हीं अभियानों के माध्यम से आगे चलकर डैनिश व्यापार भारत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुँचा।

कम्पनी की स्थापना के उद्देश्य

डैनिश ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना निम्नलिखित प्रमुख उद्देश्यों से की गई थी—

  • भारत एवं पूर्वी देशों के साथ प्रत्यक्ष समुद्री व्यापार स्थापित करना।
  • मसाले, सूती एवं रेशमी वस्त्र, नील, काली मिर्च तथा अन्य बहुमूल्य वस्तुओं का आयात कर आर्थिक लाभ अर्जित करना।
  • पुर्तगालियों एवं डचों के व्यापारिक प्रभुत्व को चुनौती देकर अपने लिए व्यापारिक अवसर प्राप्त करना।
  • डेनमार्क की आर्थिक समृद्धि एवं समुद्री शक्ति को सुदृढ़ बनाना।
  • एशिया में व्यापारिक केन्द्र एवं गोदाम स्थापित कर स्थायी व्यापारिक नेटवर्क विकसित करना।

डैनिशों का व्यापार

डैनिश ईस्ट इंडिया कम्पनी का मुख्य उद्देश्य भारत से मूल्यवान वस्तुओं का निर्यात कर यूरोप में लाभ अर्जित करना था।

भारत से निर्यात यूरोप से आयात
सूती वस्त्र धातु की वस्तुएँ
रेशमी वस्त्र हथियार एवं बारूद
नील (Indigo) शराब एवं विलासिता की वस्तुएँ
काली मिर्च एवं अन्य मसाले ताँबा एवं अन्य धातुएँ
साल्टपीटर (शोरा) यूरोपीय निर्मित वस्तुएँ
स्थापना1616 ई.
संरक्षकराजा क्रिश्चियन चतुर्थ (Christian IV)
मुख्यालयकोपेनहेगन (डेनमार्क)
प्रथम भारतीय अभियान का नेतृत्वओवे ग्येदे (Ove Gjedde)
मुख्य उद्देश्यभारत एवं पूर्वी देशों के साथ व्यापार

भारत में डैनिशों का आगमन

डैनिश ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना के बाद डेनमार्क ने भारत एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ प्रत्यक्ष व्यापार स्थापित करने का निर्णय लिया। इसी उद्देश्य से कम्पनी ने अपना प्रथम समुद्री अभियान भारत की ओर भेजा।

➣ इस अभियान का नेतृत्व प्रसिद्ध डैनिश नौसैनिक अधिकारी ओवे ग्येदे को सौंपा गया। उन्होंने 1618 ई. में डेनमार्क से समुद्री यात्रा प्रारम्भ की।

➣ लंबी एवं कठिन समुद्री यात्रा के बाद डैनिश बेड़ा 1620 ई. में भारत के दक्षिण-पूर्वी तट (कोरोमण्डल तट) पर पहुँचा।

➣ उस समय दक्षिण भारत में तंजौर (थंजावुर) पर नायक वंश का शासन था। डैनिशों ने स्थानीय शासक से व्यापारिक अधिकार प्राप्त करने का प्रयास किया।

तंजौर के नायक शासक से संधि (1620 ई.)

ओवे ग्येदे ने तंजौर के नायक शासक रघुनाथ नायक (Raghunatha Nayak) से वार्ता की। यह संधि भारत में डैनिश व्यापार की वास्तविक शुरुआत मानी जाती है।

➣ वार्ता के परिणामस्वरूप 1620 ई. में दोनों पक्षों के बीच एक संधि हुई, जिसके अंतर्गत डैनिशों को ट्रैंक्वेबार (थारंगमबाड़ी) में व्यापारिक बस्ती एवं व्यापारिक केन्द्र स्थापित करने की अनुमति मिली।

➣ इस संधि के बदले डैनिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने नायक शासक को वार्षिक कर (Tribute) देने तथा स्थानीय नियमों एवं शर्तों का पालन करने का वचन दिया।

ट्रैंक्वेबार (थारंगमबाड़ी) की प्राप्ति

1620 ई. की संधि के बाद डैनिशों को ट्रैंक्वेबार (वर्तमान थारंगमबाड़ी, तमिलनाडु) प्राप्त हुआ, जहाँ उन्होंने भारत की अपनी पहली स्थायी व्यापारिक बस्ती स्थापित की।

➣ ट्रैंक्वेबार भारत में डैनिश ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रथम एवं सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र बना, जिसने आगे चलकर डैनिश व्यापारिक एवं प्रशासनिक गतिविधियों की नींव रखी।

डान्सबोर्ग किले का निर्माण

➣ ट्रैंक्वेबार पर अधिकार प्राप्त करने के बाद डैनिशों ने अपनी सुरक्षा तथा व्यापारिक गतिविधियों के संरक्षण के लिए डान्सबोर्ग (Dansborg) किले का निर्माण कराया।

➣ यह किला डैनिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के प्रशासन, रक्षा एवं व्यापारिक गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र बन गया।

➣ किले के भीतर कम्पनी के कार्यालय, गोदाम, सैनिक छावनी तथा अधिकारियों के निवास बनाए गए थे, जहाँ से ट्रैंक्वेबार का प्रशासन संचालित होता था।

➣ आज भी डान्सबोर्ग किला तमिलनाडु के थारंगमबाड़ी में डैनिश उपस्थिति की ऐतिहासिक स्मृति के रूप में विद्यमान है तथा भारत में डैनिश स्थापत्य का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।

▪ प्रथम भारतीय अभियान का नेतृत्व- ओवे ग्येदे (Ove Gjedde)
▪ भारत आगमन- 1620 ई.
▪ संधि- रघुनाथ नायक (तंजौर) से
▪ प्रथम व्यापारिक केन्द्र- ट्रैंक्वेबार (थारंगमबाड़ी), तमिलनाडु
▪ प्रमुख किला- डान्सबोर्ग (Dansborg Fort)

भारत में डैनिशों के प्रमुख व्यापारिक केन्द्र

भारत में डैनिश ईस्ट इंडिया कम्पनी का उद्देश्य मुख्यतः व्यापार था। इसलिए उन्होंने ऐसे स्थानों का चयन किया जो समुद्री व्यापार के लिए अनुकूल थे। यद्यपि उनके व्यापारिक केन्द्र अंग्रेज़ों या डचों की तुलना में कम थे, फिर भी ट्रैंक्वेबार एवं सेरामपुर उनके प्रमुख केन्द्र बने।

व्यापारिक केन्द्र वर्तमान स्थान प्रमुख विशेषता / व्यापार
ट्रैंक्वेबार (थारंगमबाड़ी) तमिलनाडु डैनिशों का पहला एवं प्रमुख केन्द्र; सूती वस्त्र, मसाले, नील तथा समुद्री व्यापार का मुख्य केन्द्र
सेरामपुर (फ्रेडरिक्सनागोर) पश्चिम बंगाल बंगाल व्यापार का प्रमुख केन्द्र; वस्त्र, नील, शोरा (Saltpetre) तथा बाद में शिक्षा एवं मुद्रण का केन्द्र
निकोबार द्वीप अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह उपनिवेश स्थापित करने का प्रयास, किन्तु स्थायी व्यापारिक केन्द्र नहीं बन सका

ट्रैंक्वेबार (थारंगमबाड़ी)

1620 ई. में तंजौर के नायक शासक रघुनाथ नायक से संधि के बाद डैनिशों ने ट्रैंक्वेबार (वर्तमान थारंगमबाड़ी, तमिलनाडु) में अपनी पहली व्यापारिक बस्ती स्थापित की।

कोरोमण्डल तट पर स्थित होने के कारण यह समुद्री व्यापार के लिए अत्यंत उपयुक्त था। यहाँ से दक्षिण भारत, श्रीलंका तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ आसानी से व्यापार किया जा सकता था।

➣ ट्रैंक्वेबार डैनिश ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रमुख प्रशासनिक एवं व्यापारिक केन्द्र बन गया। यहीं से कम्पनी के अधिकांश व्यापारिक अभियान, जहाज़ों का संचालन तथा व्यापारिक गतिविधियाँ नियंत्रित की जाती थीं।

➣ इस केन्द्र से मुख्यतः सूती वस्त्र, मसाले, काली मिर्च, नील तथा अन्य स्थानीय उत्पादों का निर्यात यूरोप भेजा जाता था, जबकि यूरोप से धातु की वस्तुएँ एवं अन्य निर्मित सामान भारत लाए जाते थे।

➣ ट्रैंक्वेबार केवल व्यापारिक केन्द्र ही नहीं था, बल्कि आगे चलकर डैनिश प्रशासन, ईसाई मिशनरी गतिविधियों तथा शिक्षा का भी प्रमुख केन्द्र बन गया।

सेरामपुर (श्रीरामपुर)

1755 ई. में डैनिशों ने बंगाल के सेरामपुर (वर्तमान श्रीरामपुर, पश्चिम बंगाल) को अपना दूसरा प्रमुख व्यापारिक केन्द्र बनाया।

➣ डैनिशों ने इस नगर का नाम फ्रेडरिक्सनागोर (Frederiksnagore) रखा, जो डेनमार्क के राजा फ्रेडरिक पंचम के सम्मान में रखा गया था।

हुगली नदी के किनारे स्थित होने के कारण यह बंगाल के व्यापार का महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया। यहाँ से जहाज़ों द्वारा भारत के अन्य भागों तथा यूरोप के लिए व्यापार किया जाता था।

➣ सेरामपुर से मुख्यतः सूती एवं रेशमी वस्त्र, नील, शोरा (Saltpetre) तथा अन्य व्यापारिक वस्तुओं का निर्यात किया जाता था।

➣ बाद में सेरामपुर ईसाई मिशनरियों, शिक्षा तथा मुद्रण कार्य का भी प्रमुख केन्द्र बन गया, जिससे इसका सांस्कृतिक महत्व भी बढ़ गया।

निकोबार द्वीप

➣ डैनिशों ने निकोबार द्वीप समूह पर भी अपना अधिकार स्थापित करने तथा वहाँ व्यापारिक बस्ती बसाने का प्रयास किया।

➣ उनका उद्देश्य बंगाल की खाड़ी में एक सुरक्षित समुद्री केन्द्र स्थापित कर पूर्वी देशों के साथ व्यापार को बढ़ावा देना था।

➣ किन्तु उष्णकटिबंधीय जलवायु, बीमारियों, सीमित संसाधनों तथा आर्थिक कठिनाइयों के कारण यह प्रयास सफल नहीं हो सका।

➣ परिणामस्वरूप निकोबार द्वीप डैनिशों के लिए स्थायी व्यापारिक केन्द्र नहीं बन सका और आगे चलकर उन्होंने इस क्षेत्र पर अपना प्रभाव खो दिया।

▪ प्रथम व्यापारिक केन्द्र- ट्रैंक्वेबार (1620 ई.)
▪ द्वितीय प्रमुख केन्द्र- सेरामपुर / फ्रेडरिक्सनागोर (1755 ई.)
▪ निकोबार द्वीप पर भी उपनिवेश स्थापित करने का प्रयास किया।
▪ प्रमुख निर्यात- सूती वस्त्र, नील, मसाले, काली मिर्च एवं शोरा
▪ मुख्य उद्देश्य- व्यापार, राजनीतिक विस्तार नहीं

प्रशासन एवं व्यापारिक नीति

➣ भारत में डैनिश ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रशासन उसके व्यापारिक केन्द्रों से संचालित होता था। कम्पनी का मुख्य उद्देश्य व्यापार से लाभ अर्जित करना था, इसलिए उसने भारत में राजनीतिक विस्तार के बजाय व्यापारिक गतिविधियों पर अधिक ध्यान दिया।

➣ ट्रैंक्वेबार तथा सेरामपुर में कम्पनी के प्रतिनिधि स्थानीय प्रशासन, कर-संग्रह एवं यूरोप के साथ समुद्री व्यापार का संचालन करते थे।

➣ डैनिश कम्पनी की नीति मुख्यतः शांतिपूर्ण व्यापार पर आधारित थी। उसने स्थानीय भारतीय शासकों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखे तथा व्यापारिक संधियों के माध्यम से अपने केन्द्रों का संचालन किया।

➣ कम्पनी भारत से सूती वस्त्र, नील, मसाले तथा अन्य मूल्यवान वस्तुएँ खरीदकर यूरोप भेजती थी तथा बदले में यूरोपीय निर्मित वस्तुओं का आयात करती थी।

➣ सीमित आर्थिक एवं सैन्य संसाधनों के कारण डैनिश कम्पनी अंग्रेज़ों, डचों एवं फ्रांसीसियों जैसी शक्तिशाली व्यापारिक प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकी। परिणामस्वरूप उसका व्यापार सीमित रहा और वह भारतीय राजनीति में कोई महत्वपूर्ण प्रभाव स्थापित नहीं कर सकी।

भारत में डैनिशों का योगदान

➣ यद्यपि भारत में डैनिशों का राजनीतिक प्रभाव सीमित रहा, फिर भी उन्होंने शिक्षा, मुद्रण, ईसाई मिशनरी गतिविधियों तथा तमिल भाषा एवं साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। दक्षिण भारत, विशेषकर ट्रैंक्वेबार (थारंगमबाड़ी), इन गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र था।

➣ भारत में डैनिश ईस्ट इंडिया कम्पनी का योगदान केवल व्यापार तक सीमित नहीं था। उन्होंने ईसाई मिशनरी कार्यों, शिक्षा, मुद्रण, तमिल भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए, जिनका प्रभाव विशेष रूप से दक्षिण भारत में देखा गया।

क्षेत्र प्रमुख योगदान
धर्म प्रोटेस्टेंट मिशन की स्थापना एवं ईसाई धर्म का प्रचार
शिक्षा विद्यालयों की स्थापना एवं आधुनिक शिक्षा को प्रोत्साहन
मुद्रण 1712 ई. में ट्रैंक्वेबार में प्रारम्भिक मुद्रणालय की स्थापना
भाषा एवं साहित्य तमिल भाषा का अध्ययन, व्याकरण, शब्दकोश एवं बाइबिल का तमिल अनुवाद
प्रमुख व्यक्तित्व बार्थोलोमियस ज़ीगेनबाल्ग एवं हेनरिक प्लुट्शाउ

ईसाई मिशनरियों की गतिविधियाँ

➣ डैनिश बस्तियाँ केवल व्यापार तक सीमित नहीं थीं, बल्कि वे ईसाई मिशनरी गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण केन्द्र बनीं।

1706 ई. में जर्मन लूथरन मिशनरी बार्थोलोमियस ज़ीगेनबाल्ग एवं हेनरिक प्लुट्शाउ (Heinrich Plütschau) ट्रैंक्वेबार पहुँचे।

➣ इन मिशनरियों ने स्थानीय भाषाएँ सीखीं तथा ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ शिक्षा एवं सामाजिक कार्यों में भी योगदान दिया।

➣ ट्रैंक्वेबार दक्षिण भारत में प्रोटेस्टेंट मिशन का प्रमुख केन्द्र बन गया।

मुद्रणालय एवं शिक्षा के क्षेत्र में योगदान

➣ डैनिश मिशनरियों ने 1712 ई. में ट्रैंक्वेबार में भारत के प्रारम्भिक मुद्रणालयों (Printing Press) में से एक की स्थापना की।

➣ इस मुद्रणालय से धार्मिक एवं शैक्षिक पुस्तकों का प्रकाशन किया गया।

➣ उन्होंने स्थानीय लोगों के लिए विद्यालय स्थापित किए तथा शिक्षा के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

➣ डैनिश मिशनरियों के प्रयासों से दक्षिण भारत में आधुनिक शिक्षा के विकास को भी प्रोत्साहन मिला।

तमिल भाषा एवं साहित्य में योगदान

➣ डैनिश मिशनरियों ने तमिल भाषा का गहन अध्ययन किया तथा अनेक धार्मिक एवं शैक्षिक ग्रंथों का तमिल भाषा में अनुवाद किया।

बार्थोलोमियस ज़ीगेनबाल्ग ने बाइबिल के कुछ भागों का तमिल भाषा में अनुवाद कराया, जिससे स्थानीय लोगों तक ईसाई धर्मग्रंथ उनकी भाषा में पहुँचे।

➣ उन्होंने तमिल भाषा के व्याकरण, शब्दकोश तथा साहित्य के अध्ययन में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

➣ इस प्रकार डैनिशों की पहचान केवल व्यापारिक शक्ति के रूप में ही नहीं, बल्कि शिक्षा, मुद्रण एवं भाषा-साहित्य के क्षेत्र में भी रही।

डैनिशों की नीतिशांतिपूर्ण व्यापार एवं स्थानीय शासकों से सहयोग
1706 ईबार्थोलोमियस ज़ीगेनबाल्ग एवं हेनरिक प्लुट्शाउ ट्रैंक्वेबार पहुँचे।
1712 ई.ट्रैंक्वेबार में प्रारम्भिक मुद्रणालय की स्थापना।
प्रमुख योगदान शिक्षा, मुद्रण, तमिल भाषा एवं ईसाई मिशनरी कार्य
भारतीय राजनीति में हस्तक्षेपनगण्य

डैनिश ईस्ट इंडिया कम्पनी का पतन

➣ 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक भारत में अंग्रेज़, फ्रांसीसी एवं डच के बीच व्यापारिक प्रतिस्पर्धा अत्यधिक बढ़ गई। सीमित संसाधनों वाली डैनिश ईस्ट इंडिया कम्पनी इस प्रतिस्पर्धा में पीछे रह गई।

➣ यद्यपि डैनिशों ने भारत में लगभग दो शताब्दियों तक व्यापार किया, किन्तु वे कभी भी अंग्रेज़ों की भाँति शक्तिशाली व्यापारिक या राजनीतिक शक्ति नहीं बन सके।

➣ 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक कम्पनी का व्यापार निरंतर घटता गया, जिससे उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर होती चली गई।

कारण
  • सीमित आर्थिक संसाधन– डेनमार्क एक छोटा यूरोपीय राष्ट्र था, इसलिए कम्पनी के पास पर्याप्त पूँजी एवं संसाधनों का अभाव था।
  • अंग्रेज़ों की बढ़ती शक्तिप्लासी (1757 ई.) एवं बक्सर (1764 ई.) के बाद अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी भारत की सबसे शक्तिशाली यूरोपीय शक्ति बन गई, जिससे अन्य कम्पनियों के लिए प्रतिस्पर्धा करना कठिन हो गया।
  • सीमित व्यापारिक केन्द्र– डैनिशों के पास मुख्यतः ट्रैंक्वेबार एवं सेरामपुर जैसे कुछ ही केन्द्र थे, जबकि अंग्रेज़ों का व्यापारिक नेटवर्क पूरे भारत में फैल चुका था।
  • राजनीतिक विस्तार का अभाव– डैनिश कम्पनी ने भारतीय राज्यों में हस्तक्षेप कर अपना साम्राज्य स्थापित करने का प्रयास नहीं किया। परिणामस्वरूप उसकी राजनीतिक एवं आर्थिक शक्ति सीमित रही।
  • घटता व्यापार– अंग्रेज़ों के प्रभुत्व के कारण डैनिश कम्पनी का व्यापार निरंतर कम होता गया और उसका संचालन लाभदायक नहीं रहा।

डैनिश शासन का अंत (1845 ई.)

➣ व्यापार में लगातार हो रहे घाटे के कारण डेनमार्क सरकार ने भारत में अपनी बस्तियाँ बेचने का निर्णय लिया।

1845 ई. में डेनमार्क ने ट्रैंक्वेबार (थारंगमबाड़ी), सेरामपुर (फ्रेडरिक्सनागोर) तथा भारत में स्थित अपनी अन्य बस्तियाँ अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी को बेच दीं।

➣ इसके साथ ही भारत में लगभग 225 वर्षों से चली आ रही डैनिश उपस्थिति एवं शासन का अंत हो गया तथा डेनमार्क ने भारतीय व्यापार और राजनीति से स्वयं को अलग कर लिया।

➣ आज भी थारंगमबाड़ी (ट्रैंक्वेबार) का डान्सबोर्ग किला, पुराने चर्च तथा अन्य ऐतिहासिक भवन भारत में डैनिश विरासत की याद दिलाते हैं।

➣ यद्यपि डैनिश भारत में कोई विशाल साम्राज्य स्थापित नहीं कर सके, फिर भी व्यापार, शिक्षा, मुद्रण तथा तमिल भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में उनका योगदान भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण माना जाता है।

डैनिश ईस्ट इंडिया कम्पनी : कालक्रम

वर्ष घटना
1616 ई. डैनिश ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना
1620 ई. ट्रैंक्वेबार (थारंगमबाड़ी) में पहली व्यापारिक बस्ती की स्थापना
1706 ई. ज़ीगेनबाल्ग एवं प्लुट्शाउ का ट्रैंक्वेबार आगमन
1712 ई. ट्रैंक्वेबार में मुद्रणालय की स्थापना
1755 ई. सेरामपुर (फ्रेडरिक्सनागोर) व्यापारिक केन्द्र बना
1845 ई. डैनिश बस्तियाँ अंग्रेज़ों को बेच दी गईं

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