पृष्ठभूमि
➣ भारत में पुर्तगालियों के बाद डच (नीदरलैंड) आए। भारत एवं पूर्वी देशों के साथ लाभदायक मसाला व्यापार में भाग लेने के उद्देश्य से डचों ने समुद्री अन्वेषण प्रारम्भ किया।
➣ 1596 ई. में प्रथम डच नाविक कॉर्नेलिस डी हाउटमन उत्तमाशा अंतरीप (केप ऑफ गुड होप) होते हुए सुमात्रा पहुँचा। इस यात्रा ने डचों को यह विश्वास दिलाया कि वे पुर्तगालियों के एकाधिकार को चुनौती देकर पूर्वी देशों के साथ स्वतंत्र व्यापार कर सकते हैं।
➣ 1602 ई. में डच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई, जिसे डच भाषा में वेरिनिग्दे ओस्ट-इंडिशे कंपनी (Vereenigde Oostindische Compagnie – VOC) कहा जाता है। यह विश्व की पहली बहुराष्ट्रीय संयुक्त-पूँजी कंपनियों में से एक थी तथा इसे शेयर जारी करने वाली प्रथम बड़ी व्यापारिक कंपनी भी माना जाता है।
➣ डच सरकार ने इस कंपनी को 21 वर्षों का विशेष व्यापारिक चार्टर प्रदान किया। इसके अंतर्गत कंपनी को पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने, संधियाँ करने, युद्ध छेड़ने, किले बनाने, सिक्के जारी करने तथा आवश्यक होने पर क्षेत्रों पर अधिकार करने जैसे व्यापक अधिकार प्राप्त थे।
➣ कंपनी के संचालन के लिए 17 निदेशकों का एक सर्वोच्च बोर्ड गठित किया गया, जिसे हीरेन सत्रह (Heeren XVII) कहा जाता था। यही बोर्ड कंपनी की व्यापारिक, प्रशासनिक एवं सैन्य नीतियों का निर्धारण करता था।
➣ भारत में डचों का मुख्य उद्देश्य काली मिर्च तथा अन्य मसालों के व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करना था। आवश्यकता पड़ने पर वे अपनी व्यापारिक नीति की रक्षा के लिए सैन्य शक्ति का भी प्रयोग करते थे।
➣ यद्यपि डचों ने भारत में अनेक व्यापारिक केंद्र स्थापित किए, फिर भी उनकी सबसे अधिक रुचि इंडोनेशिया (जावा, सुमात्रा एवं मोलुक्का द्वीपसमूह) के मसाला व्यापार में थी, क्योंकि ये क्षेत्र लौंग, जायफल तथा जावित्री जैसे बहुमूल्य मसालों के प्रमुख उत्पादन केंद्र थे। इसी कारण डचों का मुख्य ध्यान भारत की अपेक्षा पूर्वी द्वीपसमूह पर अधिक केंद्रित रहा।
भारत में डच व्यापारिक केंद्र
➣ 1605 ई. में डचों ने भारत में अपनी प्रथम व्यापारिक फैक्ट्री आंध्र प्रदेश के मसूलीपट्टनम में स्थापित की। यही भारत में डच व्यापार का प्रारम्भिक केंद्र था। इसी वर्ष उन्होंने पुर्तगालियों से अंबोयना (इंडोनेशिया) पर अधिकार कर मसाला द्वीपों में अपना प्रभाव स्थापित कर लिया।
➣ 1610 ई. में डचों ने चंद्रगिरि के शासक से अनुमति प्राप्त कर पुलीकट (कोरोमंडल तट) में अपनी दूसरी फैक्ट्री स्थापित की। शीघ्र ही पुलीकट भारत में डचों का प्रथम मुख्यालय बन गया। यहीं स्थित गेल्ड्रिया डचों का भारत में एकमात्र प्रमुख किलाबंद दुर्ग था।
➣ पुलीकट की टकसाल से डचों ने भगवान वेंकटेश्वर (विष्णु) के चित्र वाले सोने के पैगोडा सिक्के जारी किए। इसका उद्देश्य स्थानीय व्यापारियों का विश्वास प्राप्त करना तथा व्यापार को सुगम बनाना था।
➣ इसके बाद डचों ने भारत के विभिन्न तटीय क्षेत्रों में अपनी व्यापारिक फैक्ट्रियों का विस्तार किया। उन्होंने सूरत (1616), पीपली (1627), बालासोर, चिनसुरा (1653), कासिम बाज़ार, पटना, नागपट्टनम (1658) तथा कोचीन (1663) में अपने प्रमुख व्यापारिक केंद्र स्थापित किए।
➣ बंगाल में डचों की पहली फैक्ट्री पीपली में स्थापित हुई, किन्तु बाद में व्यापारिक सुविधाओं के कारण उसका महत्व घट गया और बालासोर तथा चिनसुरा प्रमुख डच केंद्र बन गए।
➣ चिनसुरा में डचों ने गुस्तावुस दुर्ग का निर्माण कराया, जो बंगाल में उनकी व्यापारिक एवं सैन्य उपस्थिति का प्रमुख केंद्र था।
➣ डचों की अधिकांश व्यापारिक फैक्ट्रियाँ कोरोमंडल तट एवं बंगाल में स्थापित थीं। इसका प्रमुख कारण यह था कि ये क्षेत्र एक ओर भारत के समृद्ध वस्त्र-उद्योग से जुड़े थे और दूसरी ओर समुद्री मार्ग से इंडोनेशिया के मसाला द्वीपों तक आसानी से पहुँचा जा सकता था।
| व्यापारिक केंद्र | वर्ष | प्रमुख तथ्य |
|---|---|---|
| मसूलीपट्टनम | 1605 ई. | भारत में डचों की प्रथम व्यापारिक फैक्ट्री। |
| पुलीकट | 1610 ई. | भारत का प्रथम मुख्यालय; गेल्ड्रिया दुर्ग एवं पैगोडा सिक्कों की टकसाल। |
| सूरत | 1616 ई. | पश्चिमी भारत का प्रमुख व्यापारिक केंद्र। |
| पीपली | 1627 ई. | बंगाल क्षेत्र की प्रथम डच फैक्ट्री। |
| चिनसुरा | 1653 ई. | बंगाल का प्रमुख डच केंद्र, गुस्तावुस दुर्ग का निर्माण। |
| बालासोर | 1658 ई. | पीपली के स्थान पर विकसित प्रमुख व्यापारिक केंद्र। |
| नागपट्टनम | 1658 ई. | कोरोमंडल तट का प्रमुख व्यापारिक केंद्र।। |
| कोचीन | 1663 ई. | पुर्तगालियों से विजय प्राप्त कर डचों के अधिकार में आया। |
| कासिम बाज़ार एवं पटना | 17वीं शताब्दी | रेशम, अफीम एवं शोरा के व्यापार के प्रमुख केंद्र। |
➣ 1690 ई. के बाद व्यापारिक दृष्टि से अधिक अनुकूल स्थिति के कारण पुलीकट के स्थान पर नागपट्टनम भारत में डचों का प्रमुख केंद्र बन गया।
भारत में डचों का विस्तार
➣ भारत में व्यापारिक केंद्र स्थापित करने के साथ-साथ डचों ने हिन्द महासागर के प्रमुख समुद्री मार्गों एवं बंदरगाहों पर भी अपना प्रभुत्व स्थापित करना प्रारम्भ किया। उनका मुख्य उद्देश्य पुर्तग़ालियों के मसाला व्यापार के एकाधिकार को समाप्त करना था।
➣ 1605 ई. में डचों ने पुर्तग़ालियों से अंबोयना (अम्बोन) पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने मोलुक्का (मसाला द्वीप) क्षेत्र में अपना प्रभाव स्थापित किया, जो लौंग, जायफल एवं जावित्री जैसे बहुमूल्य मसालों का प्रमुख उत्पादन क्षेत्र था।
➣ 1639 ई. में डचों ने पुर्तग़ालियों की शक्ति को कमजोर करने के उद्देश्य से गोवा पर आक्रमण किया। यद्यपि वे गोवा पर अधिकार नहीं कर सके, लेकिन उन्होंने पुर्तग़ालियों के समुद्री प्रभुत्व को गंभीर चुनौती दी।
➣ 1641 ई. में डचों ने दक्षिण-पूर्व एशिया के महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र मलक्का पर अधिकार कर लिया। इससे मलक्का जलडमरूमध्य पर उनका प्रभाव स्थापित हुआ और पूर्वी एशिया के समुद्री व्यापार में उनकी स्थिति अत्यंत मजबूत हो गई।
➣ 1658 ई. में डचों ने सीलोन (वर्तमान श्रीलंका) से पुर्तग़ालियों को हटाकर वहाँ भी अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। इसके परिणामस्वरूप हिन्द महासागर के मसाला व्यापार पर उनका नियंत्रण और अधिक सुदृढ़ हो गया।
➣ 1664 ई. में मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब ने डचों को बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा में 3.5% वार्षिक चुंगी की दर पर व्यापार करने की अनुमति प्रदान की। इससे बंगाल में डच व्यापार को नया प्रोत्साहन मिला और उनका व्यापारिक प्रभाव बढ़ा।
| वर्ष | घटना | महत्त्व |
|---|---|---|
| 1605 ई. | अंबोयना पर अधिकार | पुर्तग़ालियों को मसाला द्वीपों से हटाकर डच प्रभुत्व की शुरुआत। |
| 1639 ई. | गोवा पर आक्रमण | पुर्तग़ाली समुद्री शक्ति को चुनौती। |
| 1641 ई. | मलक्का पर अधिकार | मलक्का जलडमरूमध्य पर नियंत्रण। |
| 1658 ई. | सीलोन पर अधिकार | हिन्द महासागर के मसाला व्यापार पर प्रभुत्व सुदृढ़। |
| 1664 ई. | औरंगज़ेब से व्यापारिक अनुमति | बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा में 3.5% चुंगी पर व्यापार का अधिकार। |
➣ 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक डचों ने भारत, श्रीलंका, मलक्का तथा इंडोनेशिया के प्रमुख व्यापारिक केंद्रों पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था। इस प्रकार वे एशिया में पुर्तग़ालियों के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरे और धीरे-धीरे उनके समुद्री एकाधिकार को समाप्त कर दिया।
डचों का व्यापार
➣ डचों का मुख्य उद्देश्य भारत में राजनीतिक सत्ता स्थापित करना नहीं, बल्कि अधिकतम व्यापारिक लाभ अर्जित करना था। इसलिए उन्होंने अपना अधिकांश ध्यान समुद्री व्यापार तथा व्यापारिक फैक्ट्रियों के विकास पर केंद्रित रखा।
➣ डचों की व्यापारिक गतिविधियाँ मुख्यतः कोरोमंडल तट, मालाबार तट तथा बंगाल में केंद्रित थीं। उन्होंने क्षेत्र-विशेष के अनुसार विभिन्न वस्तुओं का व्यापार विकसित किया, जिससे भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच व्यापारिक संबंध अधिक सुदृढ़ हुए।
➣ डचों ने भारत से सूती वस्त्र, नील, शोरा, अफीम, चावल, रेशम तथा काली मिर्च जैसी वस्तुओं का निर्यात किया। इनमें नील विशेष रूप से मसूलीपट्टनम से निर्यात किया जाता था।
➣ डचों ने भारतीय सूती वस्त्रों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को विशेष महत्व दिया। वे भारत से वस्त्र खरीदकर उन्हें इंडोनेशिया तथा अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्रों में मसालों के बदले विनिमय करते थे। इस प्रकार भारतीय वस्त्र उनके एशियाई व्यापार का प्रमुख आधार बन गए।
➣ यद्यपि डचों का प्रमुख लक्ष्य मसाला व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करना था, फिर भी समय के साथ भारतीय वस्त्रों का व्यापार उनके लिए अत्यंत लाभदायक सिद्ध हुआ। भारत से वस्त्रों के बड़े पैमाने पर निर्यात ने भारतीय वस्त्र उद्योग को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में नई पहचान दिलाई।
➣ डचों ने इंडोनेशिया में मसालों के व्यापार पर अपना एकाधिकार स्थापित किया, जबकि भारत को उन्होंने मुख्यतः सूती वस्त्र, नील, अफीम तथा शोरा जैसे निर्यात योग्य उत्पादों के प्रमुख स्रोत के रूप में विकसित किया।
| क्षेत्र | प्रमुख व्यापार | विशेषता |
|---|---|---|
| कोरोमंडल तट | सूती वस्त्र | डच व्यापार का प्रमुख वस्त्र केंद्र। |
| मालाबार तट | काली मिर्च एवं मसाले | मसाला व्यापार का प्रमुख क्षेत्र। |
| बंगाल | रेशम, शोरा, अफीम | पूर्वी भारत का प्रमुख व्यापारिक क्षेत्र। |
| मसूलीपट्टनम | नील | नील निर्यात का प्रमुख केंद्र। |
▪ मालाबार तट – काली मिर्च एवं मसालों का व्यापार
▪ मसूलीपट्टनम – नील निर्यात का प्रमुख केंद्र
▪ भारत से प्रमुख निर्यात – सूती वस्त्र, नील, शोरा, अफीम, चावल, रेशम एवं काली मिर्च
बेदरा का युद्ध (1759 ई.)
➣ 18वीं शताब्दी के मध्य तक भारत में अंग्रेज़ और डच दोनों ही बंगाल के लाभदायक व्यापार पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहते थे। प्लासी के युद्ध (1757 ई.) के बाद बंगाल में अंग्रेज़ों की शक्ति अत्यधिक बढ़ गई, जिसे डच स्वीकार नहीं कर पा रहे थे।
➣ अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से डचों ने 1759 ई. में बंगाल में अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाई तथा अंग्रेज़ों को चुनौती देने का प्रयास किया। इससे दोनों यूरोपीय शक्तियों के बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई।
➣ 25 नवम्बर, 1759 ई. को बेदरा (बिदेरा/चिनसुरा के निकट) में डचों और अंग्रेज़ों के बीच निर्णायक युद्ध हुआ, जिसे बेदरा का युद्ध कहा जाता है।
➣ इस युद्ध में अंग्रेज़ी सेना का नेतृत्व कर्नल फ्रांसिस फोर्ड ने किया, जबकि उस समय रॉबर्ट क्लाइव बंगाल का गवर्नर था। क्लाइव की रणनीति एवं अंग्रेज़ी नौसैनिक शक्ति ने इस युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ इस युद्ध में डचों की निर्णायक पराजय हुई। इसके परिणामस्वरूप भारत में उनकी राजनीतिक एवं सैन्य महत्वाकांक्षाओं का अंत हो गया और वे केवल सीमित व्यापारिक गतिविधियों तक ही सिमटकर रह गए।
➣ बेदरा का युद्ध (1759 ई.) भारत में डच शक्ति के पतन का निर्णायक मोड़ माना जाता है। इसके बाद अंग्रेज़ बंगाल के निर्विवाद प्रभुत्वशाली यूरोपीय शक्ति बन गए तथा भारत में डचों का प्रभाव लगातार घटता चला गया।
▪ वर्ष – 1759 ई.
▪ अंग्रेज़ी सेनापति – कर्नल फ्रांसिस फोर्ड
▪ बंगाल का गवर्नर – रॉबर्ट क्लाइव
▪ परिणाम – भारत में डच शक्ति का निर्णायक पतन
डचों का पतन
➣ (i) भारत की अपेक्षा इंडोनेशिया पर अधिक ध्यान – डचों का मुख्य उद्देश्य इंडोनेशिया (मोलुक्का, जावा, सुमात्रा) के लाभदायक मसाला व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करना था। परिणामस्वरूप उन्होंने भारत में राजनीतिक विस्तार की अपेक्षा सीमित व्यापारिक गतिविधियों पर ही अधिक ध्यान दिया।
➣(ii) अंग्रेज़ों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा – 18वीं शताब्दी तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी आर्थिक, सैन्य तथा नौसैनिक दृष्टि से डचों की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली हो गई। अंग्रेज़ों ने क्रमशः बंगाल तथा भारत के अन्य भागों में अपना प्रभाव बढ़ाकर डच व्यापार को चुनौती दी।
➣ (iii) बेदरा का युद्ध (1759 ई.) – बेदरा (बिदेरा) के युद्ध में अंग्रेज़ों ने डचों को निर्णायक रूप से पराजित किया। इस युद्ध के बाद भारत में डचों की राजनीतिक एवं सैन्य महत्वाकांक्षाओं का अंत हो गया तथा वे केवल सीमित व्यापारिक गतिविधियों तक सिमट गए।
➣ (iv) सरकारी नियंत्रण एवं प्रशासनिक कमजोरी – डच ईस्ट इंडिया कंपनी पर डच सरकार का व्यापक नियंत्रण था। इसके कारण कंपनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार स्वतंत्र एवं त्वरित निर्णय लेने में अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी की तुलना में कम सक्षम रही।
➣ (v) सीमित राजनीतिक महत्वाकांक्षा – डचों का प्रमुख उद्देश्य व्यापारिक लाभ कमाना था, न कि भारत में विशाल साम्राज्य स्थापित करना। इसी कारण वे भारतीय राजनीति में अपेक्षाकृत कम हस्तक्षेप करते रहे, जबकि अंग्रेज़ों ने स्थानीय शासकों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया।
➣ इन सभी कारणों के परिणामस्वरूप 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक भारत में डचों का प्रभाव लगभग समाप्त हो गया। इसके बाद वे केवल कुछ व्यापारिक केंद्रों तक सीमित रह गए, जबकि अंग्रेज़ भारत की प्रमुख यूरोपीय शक्ति के रूप में स्थापित हो गए।
▪ मुख्य प्रतिद्वंद्वी – ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी
▪ डचों की प्रमुख रुचि – इंडोनेशिया का मसाला व्यापार
▪ भारत में परिणाम – अंग्रेज़ों का प्रभुत्व स्थापित हुआ।
डचों का योगदान
➣ भारत में डचों का प्रमुख योगदान समुद्री व्यापार के विकास तथा भारतीय वस्तुओं को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तक पहुँचाने में रहा।पुर्तग़ालियों की अपेक्षा उनका मुख्य उद्देश्य भारत में राजनीतिक साम्राज्य स्थापित करने की अपेक्षा व्यापारिक गतिविधियों पर अधिक ध्यान दिया।
➣ डचों ने भारतीय सूती वस्त्रों के निर्यात को विशेष प्रोत्साहन दिया। विशेषकर कोरोमंडल तट के वस्त्रों की दक्षिण-पूर्व एशिया तथा यूरोप में भारी माँग उत्पन्न हुई। परिणामस्वरूप भारत का सूती वस्त्र उद्योग अंतरराष्ट्रीय व्यापार का एक महत्वपूर्ण अंग बन गया और भारतीय वस्त्रों की प्रतिष्ठा विश्वभर में बढ़ी।
➣ डचों ने भारत से नील, शोरा, अफीम, चावल, रेशम तथा मसालों के निर्यात का भी विस्तार किया। इन वस्तुओं की बढ़ती विदेशी माँग के कारण भारत के समुद्री व्यापार को प्रोत्साहन मिला तथा अनेक तटीय व्यापारिक नगरों का आर्थिक महत्व बढ़ गया।
➣ डचों ने हिन्द महासागर के समुद्री व्यापार में पुर्तग़ालियों के एकाधिकार को समाप्त कर प्रतिस्पर्धा का वातावरण बनाया। इसके परिणामस्वरूप एशियाई व्यापार में अन्य यूरोपीय शक्तियों, विशेषकर अंग्रेज़ों के प्रवेश का मार्ग भी अधिक सुगम हुआ।
➣ यद्यपि भारत में डचों का राजनीतिक प्रभाव सीमित रहा, फिर भी भारतीय समुद्री व्यापार, वस्त्र-निर्यात तथा पूर्वी एशिया के साथ वाणिज्यिक संबंधों के विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक व्यापारिक नेटवर्क से जोड़ने में डचों की भूमिका उल्लेखनीय रही।
| क्षेत्र | डचों का योगदान |
|---|---|
| समुद्री व्यापार | भारत के समुद्री व्यापार एवं विदेशी वाणिज्य को प्रोत्साहन दिया। |
| सूती वस्त्र | कोरोमंडल तट के भारतीय सूती वस्त्रों को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तक पहुँचाया। |
| निर्यात व्यापार | नील, शोरा (Saltpetre), अफीम, चावल, रेशम एवं मसालों के निर्यात का विस्तार किया। |
| हिन्द महासागर व्यापार | पुर्तग़ालियों के समुद्री एकाधिकार को समाप्त कर व्यापारिक प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया। |
| वैश्विक व्यापार | भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया एवं यूरोप के व्यापारिक नेटवर्क से सुदृढ़ रूप से जोड़ा। |
| राजनीतिक नीति | राजनीतिक विस्तार की अपेक्षा व्यापारिक लाभ को अधिक महत्व दिया। |
▪ मुख्य निर्यात – सूती वस्त्र, नील, शोरा, अफीम, चावल एवं मसाले
▪ प्रमुख योगदान – भारतीय वस्त्रों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा
▪ ऐतिहासिक महत्व – हिन्द महासागर में पुर्तग़ालियों के एकाधिकार को चुनौती दी।
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