प्रारम्भिक जीवन एवं परिवार
➣ गुरु हरकिशन सिखों के अष्टम गुरु थे। उनका जन्म 7 जुलाई 1656 ई. को कीरतपुर साहिब (वर्तमान पंजाब) में हुआ। वे सिखों के सप्तम गुरु गुरु हरराय एवं माता कृष्ण कौर (सुलखनी) के कनिष्ठ पुत्र थे। उनके बड़े भाई रामराय थे।
➣ गुरु हरकिशन का पालन-पोषण धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण में हुआ। बाल्यावस्था से ही वे अत्यंत विनम्र, करुणामय, सेवाभावी एवं बुद्धिमान थे। अल्पायु में ही उन्होंने गुरुबाणी, सेवा-भाव तथा सिख परंपराओं का गहन ज्ञान प्राप्त कर लिया था, जिससे संगत उनके प्रति विशेष श्रद्धा रखती थी।
➣ 1661 ई. में गुरु हरराय ने अपने ज्येष्ठ पुत्र रामराय द्वारा गुरुबाणी के अर्थ में परिवर्तन किए जाने के कारण उन्हें गुरुगद्दी के अयोग्य घोषित कर दिया। इसके पश्चात् उन्होंने अपने केवल 5 वर्षीय पुत्र हरकिशन को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। इस प्रकार गुरु हरकिशन सिख इतिहास के सबसे कम आयु में गुरुगद्दी ग्रहण करने वाले गुरु बने।
➣ अल्पायु होने के बावजूद गुरु हरकिशन ने सेवा, विनम्रता एवं मानव कल्याण को अपने जीवन का आधार बनाया। आगे चलकर दिल्ली में महामारी के दौरान रोगियों की निःस्वार्थ सेवा के कारण वे सम्पूर्ण सिख इतिहास में करुणा एवं मानवता के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| जन्म | 7 जुलाई 1656 ई. |
| जन्मस्थान | कीरतपुर साहिब, पंजाब |
| पिता | गुरु हरराय |
| माता | माता किशन कौर (सुलक्षणी) |
| गुरुकाल | 1661–1664 ई. |
| गुरु बने | 5 वर्ष की आयु में |
➣ 1661 ई. में गुरु हरराय के निधन के पश्चात् गुरु हरकिशन ने मात्र 5 वर्ष की आयु में गुरुगद्दी संभाली। वे सिख इतिहास के सबसे कम आयु के गुरु माने जाते हैं।
➣ गुरु हरराय ने अपने ज्येष्ठ पुत्र रामराय के स्थान पर गुरु हरकिशन को उत्तराधिकारी नियुक्त किया, क्योंकि रामराय ने औरंगज़ेब के दरबार में गुरुबाणी के अर्थ में परिवर्तन कर दिया था, जिसे गुरु हरराय ने अस्वीकार्य माना।
गुरु हरकिशन का व्यक्तित्व
➣ गुरु हरकिशन सिख इतिहास के सबसे कम आयु के गुरु होने के बावजूद अत्यंत करुणामय, विनम्र, सेवाभावी एवं आध्यात्मिक व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने अपने संक्षिप्त गुरुकाल में मानव सेवा, समानता और दया के आदर्शों को अपने आचरण से स्थापित किया।
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| मानव सेवा | महामारी से पीड़ित लोगों की निःस्वार्थ सेवा की। |
| समानता | सभी धर्मों एवं जातियों के लोगों की बिना भेदभाव सहायता की। |
| करुणा | रोगियों एवं जरूरतमंदों के प्रति दयालु एवं संवेदनशील व्यवहार। |
| उपाधि | “बाला पीर” |
➣ अपने विनम्र स्वभाव, निःस्वार्थ सेवा एवं आध्यात्मिक प्रभाव के कारण गुरु हरकिशन को जनता ने अत्यंत श्रद्धा एवं सम्मान दिया। उनकी सेवा-भावना से प्रभावित होकर अनेक लोगों ने उन्हें “बाला पीर” की उपाधि प्रदान की।
➣ गुरु हरकिशन का जीवन यह संदेश देता है कि सच्ची महानता आयु में नहीं, बल्कि सेवा, करुणा, विनम्रता एवं मानव कल्याण के कार्यों में निहित होती है। इसी कारण उनका जीवन सिख इतिहास में प्रेरणा का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।
रामराय का विरोध
➣ गुरुगद्दी प्राप्त होने के बाद गुरु हरकिशन को अपने बड़े भाई रामराय के विरोध का सामना करना पड़ा। रामराय स्वयं गुरुगद्दी प्राप्त करना चाहता था और उसने अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए मुगल दरबार का समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया।
➣ गुरु हरराय द्वारा रामराय को गुरुगद्दी से वंचित किए जाने के कारण उत्तराधिकार का यह विवाद और गहरा हो गया। यद्यपि सिख संगत ने गुरु हरकिशन को ही वैध गुरु के रूप में स्वीकार किया, फिर भी रामराय ने अपना प्रभाव बनाए रखने का प्रयास जारी रखा।
➣ इस उत्तराधिकार विवाद के कारण मुगल सम्राट औरंगज़ेब ने गुरु हरकिशन को दिल्ली बुलाने का आदेश दिया। उसका उद्देश्य गुरु की लोकप्रियता, प्रभाव एवं उनके नेतृत्व की परीक्षा लेना भी था।
➣ गुरु हरकिशन दिल्ली की यात्रा पर निकले। मार्ग में अनेक संगतों ने उनका स्वागत किया तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालु उनके दर्शन के लिए एकत्रित हुए, यात्रा के दौरान पंजोखरा में एक पंडित ने गुरु हरकिशन की अल्पायु को देखकर उनकी विद्वत्ता पर प्रश्न भी उठाया था।
➣ तब गुरु हरकिशन ने परंपरा के अनुसार छज्जू नामक एक गूँगे एवं अशिक्षित व्यक्ति के सिर पर अपना दंड (छड़ी) स्पर्श कराया। इसके बाद उसने भगवद्गीता के गूढ़ अर्थों का सरल एवं स्पष्ट वर्णन कर दिया।
➣ इस घटना को सिख परंपरा में गुरु हरकिशन की आध्यात्मिक कृपा एवं दिव्य ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। यह घटना ऐतिहासिक तथ्य की अपेक्षा जनश्रुति के रूप में अधिक प्रसिद्ध है।
दिल्ली आगमन एवं मानव सेवा
➣ गुरु हरकिशन के दिल्ली पहुँचने के समय नगर में चेचक तथा अन्य संक्रामक रोगों की महामारी फैली हुई थी। चारों ओर भय एवं अव्यवस्था का वातावरण था।
➣ गुरु हरकिशन ने बिना किसी जाति, धर्म, वर्ग अथवा ऊँच-नीच का भेद किए रोगियों की निःस्वार्थ सेवा प्रारम्भ की। उन्होंने पीड़ित लोगों को सांत्वना दी, उपचार की व्यवस्था कराई तथा मानव सेवा को सर्वोच्च धर्म बताया।
➣ उनकी करुणा, सेवा-भाव एवं आध्यात्मिक व्यक्तित्व से प्रभावित होकर हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग उन्हें श्रद्धापूर्वक “बाला पीर” (बाल संत) कहकर पुकारने लगे।
महामारी के दौरान सेवा एवं मृत्यु
➣ दिल्ली में अपने प्रवास के दौरान गुरु हरकिशन ने चेचक एवं हैजा जैसी महामारियों से पीड़ित लोगों की निःस्वार्थ सेवा की थी। उन्होंने जाति, धर्म अथवा सामाजिक भेदभाव किए बिना सभी रोगियों की सहायता की और उन्हें सांत्वना प्रदान की।
➣ रोगियों की सेवा करते-करते गुरु हरकिशन स्वयं चेचक से संक्रमित हो गए। गंभीर रूप से अस्वस्थ होने के बावजूद उन्होंने सेवा एवं मानव कल्याण का कार्य नहीं छोड़ा।
➣ अन्तंत: 30 मार्च 1664 ई. को दिल्ली में उनका निधन हो गया। उस समय उनकी आयु केवल लगभग 8 वर्ष थी, जिसके कारण वे सिख इतिहास के सबसे कम आयु में गुरुगद्दी संभालने वाले तथा अल्पायु में दिवंगत होने वाले गुरु माने जाते हैं।
➣ वर्तमान गुरुद्वारा बंगला साहिब (नई दिल्ली) गुरु हरकिशन की स्मृति से जुड़ा प्रमुख तीर्थस्थल है। माना जाता है कि यहीं से उन्होंने महामारी के समय रोगियों की सेवा एवं सहायता का कार्य किया था। इसलिए यह गुरुद्वारा आज भी मानव सेवा एवं निःस्वार्थ समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
“बाबा बकाला” का संकेत
➣ अपने अंतिम समय में जब संगत ने अगले गुरु के विषय में पूछा, तब गुरु हरकिशन ने केवल दो शब्द कहे—“बाबा बकाला”। उन्होंने किसी व्यक्ति का नाम न लेकर केवल यह संकेत दिया कि अगले गुरु बकाला नामक स्थान पर मिलेंगे।
➣ इस संकेत के बाद बाबा बकाला में अनेक व्यक्तियों ने स्वयं को गुरु घोषित कर दिया, जिससे सिख समुदाय में कुछ समय के लिए भ्रम एवं असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई।
➣ इसी समय प्रसिद्ध सिख व्यापारी मक्खन शाह लुबाना, जिन्होंने संकट के समय गुरु से की गई अपनी मनौती पूरी करने का संकल्प लिया था, वास्तविक गुरु की खोज के लिए बाबा बकाला पहुँचे। उन्होंने अपनी सूझबूझ एवं श्रद्धा के माध्यम से वास्तविक गुरु की पहचान करने का निश्चय किया।
➣ अंततः मक्खन शाह लुबाना ने गुरु तेगबहादुर की पहचान वास्तविक गुरु के रूप में की और ऊँचे स्वर में “गुरु लाधो रे” (गुरु मिल गए) का उद्घोष किया। इसके बाद गुरु तेगबहादुर सिखों के नवम् गुरु के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
गुरु हरकिशन का योगदान
➣ यद्यपि गुरु हरकिशन का गुरुकाल अत्यंत अल्प (1661–1664 ई.) था, फिर भी उन्होंने अपनी करुणा, सेवा-भाव एवं आध्यात्मिक आदर्शों के माध्यम से सिख इतिहास पर अमिट छाप छोड़ी।
| क्षेत्र | योगदान |
|---|---|
| मानव सेवा | महामारी से पीड़ित लोगों की निःस्वार्थ सेवा की। |
| समानता | धर्म, जाति एवं वर्ग का भेद किए बिना सभी की सहायता की। |
| आध्यात्मिक आदर्श | अल्पायु में भी विनम्रता, करुणा एवं सेवा का आदर्श प्रस्तुत किया। |
| उत्तराधिकार | “बाबा बकाला” कहकर अगले गुरु का संकेत दिया। |
➣ आज भी गुरु हरकिशन को मानव सेवा, दया एवं परोपकार के प्रतीक के रूप में श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है। विशेष रूप से महामारी के समय रोगियों की सेवा का उनका आदर्श सिख धर्म की सबसे प्रेरणादायक घटनाओं में से एक माना जाता है।
Quick Revision
| विषय | तथ्य |
|---|---|
| जन्म | 7 जुलाई 1656 ई., कीरतपुर साहिब |
| अष्टम गुरु | 1661–1664 ई. |
| सबसे कम आयु के गुरु | 5 वर्ष की आयु में गुरुगद्दी प्राप्त की। |
| समकालीन मुगल शासक | औरंगज़ेब |
| प्रसिद्ध उपाधि | “बाला पीर” |
| प्रमुख घटना | दिल्ली में महामारी के दौरान मानव सेवा। |
| अंतिम शब्द | “बाबा बकाला” |
| उत्तराधिकारी | गुरु तेगबहादुर (बाद में मक्खन शाह लुबाना द्वारा पहचान की गई) |
| मृत्यु | 30 मार्च 1664 ई., दिल्ली (चेचक से) |
प्रातिक्रिया दे