संत ज्ञानेश्वर (1275–1296 ई.) : जीवन, दर्शन, शिक्षाएँ एवं योगदान

भारतीय इतिहास मध्यकालीन भारत संत ज्ञानेश्वर (1275–1296 ई.)
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संत ज्ञानेश्वर (1275–1296 ई.)

संत ज्ञानेश्वर (ज्ञानदेव) महाराष्ट्र के महान संत, दार्शनिक एवं वारकरी भक्ति परम्परा के प्रमुख आचार्यों में से एक थे। उन्होंने मराठी भाषा के माध्यम से भक्ति एवं वेदान्त के सिद्धान्तों का व्यापक प्रचार किया।

➣ ज्ञानेश्वर का जन्म 1275 ई. (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी) में आपेगाँव (पैठण के निकट, वर्तमान अहमदनगर, महाराष्ट्र) में गोदावरी नदी के तट पर हुआ। इनके पिता का नाम विट्ठलपंत कुलकर्णी तथा माता का नाम रुक्मिणी बाई था।

➣ इनके पिता ने पूर्व में संन्यास ग्रहण किया था, किन्तु गुरु की आज्ञा से पुनः गृहस्थ जीवन स्वीकार कर लिया। लोक-परम्परा के अनुसार इसी कारण ज्ञानेश्वर एवं उनके भाई-बहनों निवृत्तिनाथ, सोपानदेव तथा मुक्ताबाई को समाज से बहिष्कृत कर दिया गया था। बाद में पैठण के विद्वानों द्वारा उन्हें सामाजिक मान्यता प्राप्त हुई।

➣ संत ज्ञानेश्वर वारकरी सम्प्रदाय के प्रमुख आचार्यों एवं प्रवर्तकों में से एक थे। इस सम्प्रदाय में भगवान विठोबा (विठ्ठल) की भक्ति, नाम-स्मरण तथा तीर्थयात्रा को विशेष महत्व दिया जाता है।

➣ उनका दर्शन अद्वैत वेदान्त पर आधारित था। उन्होंने ज्ञान, योग एवं भक्ति का समन्वय करते हुए बताया कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए भक्ति और आत्मज्ञान दोनों आवश्यक हैं।

विषय संत ज्ञानेश्वर
सम्प्रदाय वारकरी सम्प्रदाय
आराध्य भगवान विठोबा (विठ्ठल)
दर्शन अद्वैत वेदान्त
विशेषता ज्ञान, योग एवं भक्ति का समन्वय

साहित्य एवं भक्ति आन्दोलन में योगदान

➣ संत ज्ञानेश्वर की सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना ‘ज्ञानेश्वरी’ (भावार्थदीपिका) है, जो श्रीमद्भगवद्गीता पर मराठी भाषा में लिखी गई विस्तृत टीका है।

1290 ई. में नेवासे (महाराष्ट्र) में इसकी रचना पूर्ण हुई। लगभग 9,000–10,000 ओवियों में रचित यह ग्रन्थ मराठी साहित्य की प्रारम्भिक एवं सर्वाधिक प्रभावशाली कृतियों में गिना जाता है।

ग्रन्थ विशेषता
ज्ञानेश्वरी (भावार्थदीपिका) भगवद्गीता पर मराठी टीका
अमृतानुभव अद्वैत एवं तत्त्वज्ञान पर आधारित स्वतंत्र दार्शनिक ग्रन्थ
चांगदेव पासष्टी योगी चांगदेव को उपदेशस्वरूप 65 ओवियों का पत्र
हरिपाठ 28 अभंगों का संग्रह

➣ ज्ञानेश्वर ने मराठी भाषा में आध्यात्मिक साहित्य की समृद्ध परम्परा को नई दिशा दी। उन्होंने वेदान्त के गूढ़ सिद्धान्तों को सरल भाषा में प्रस्तुत कर सामान्य जन के लिए सुलभ बनाया।

➣ वे संत नामदेव के समकालीन एवं घनिष्ठ सहयोगी थे। दोनों संतों ने मिलकर वारकरी भक्ति परम्परा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इनके अतिरिक्त गोरा कुम्हार, विसोबा खेचर तथा चांगदेव जैसे संतों से भी उनका घनिष्ठ आध्यात्मिक सम्बन्ध था।

➣ वारकरी सम्प्रदाय के अनुयायी उन्हें प्रेमपूर्वक माउली (माता) कहकर सम्बोधित करते हैं, जो उनके प्रति श्रद्धा एवं सम्मान का प्रतीक है।

जीवित समाधि

परम्परागत मान्यता के अनुसार मात्र 21 वर्ष की आयु में 1296 ई. में संत ज्ञानेश्वर ने आलंदी (पुणे के निकट, महाराष्ट्र) में जीवित समाधि ग्रहण की। आज आलंदी वारकरी सम्प्रदाय का प्रमुख तीर्थस्थल माना जाता है।

प्रमुख शिक्षाएँ

➣ संत ज्ञानेश्वर ने ज्ञान, योग एवं भक्ति के समन्वय पर बल दिया। उनके अनुसार ईश्वर की प्राप्ति केवल कर्मकाण्डों से नहीं, बल्कि आत्मज्ञान, निष्काम कर्म तथा सच्ची भक्ति के माध्यम से संभव है।

➣ उनका दर्शन अद्वैत वेदान्त पर आधारित था। वे मानते थे कि समस्त सृष्टि में एक ही परमात्मा का वास है, इसलिए सभी प्राणियों के प्रति प्रेम, करुणा एवं समानता का व्यवहार करना चाहिए।

➣ संत ज्ञानेश्वर ने भगवान विठोबा (विठ्ठल) की भक्ति, नाम-स्मरण तथा सत्संग को आध्यात्मिक उन्नति का सरल एवं सर्वोत्तम मार्ग बताया। उन्होंने बाहरी आडम्बरों की अपेक्षा आन्तरिक शुद्धता एवं निष्कपट भक्ति को अधिक महत्व दिया।

➣ उन्होंने वेदान्त एवं धर्म के गूढ़ सिद्धान्तों को मराठी भाषा में सरल रूप से प्रस्तुत किया, जिससे सामान्य जन भी आध्यात्मिक ज्ञान को समझ सके। उनका मानना था कि धर्म एवं ज्ञान केवल विद्वानों तक सीमित न रहकर समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचना चाहिए।

➣ उन्होंने जाति, जन्म एवं सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर मानव समानता, सदाचार तथा नैतिक जीवन पर बल दिया। उनकी शिक्षाओं ने महाराष्ट्र में भक्ति आन्दोलन को जनसामान्य से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ऐतिहासिक महत्व

➣ संत ज्ञानेश्वर ने मराठी भाषा को धार्मिक एवं दार्शनिक अभिव्यक्ति का प्रभावशाली माध्यम बनाया।

➣ उन्होंने वारकरी भक्ति परम्परा को सुदृढ़ आधार प्रदान किया तथा महाराष्ट्र में भक्ति आन्दोलन को व्यापक जनसमर्थन दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ ज्ञान, योग एवं भक्ति के समन्वय पर आधारित उनका दर्शन भारतीय भक्ति आन्दोलन की महत्वपूर्ण धरोहर माना जाता है।

जन्म : 1275 ई., आपेगाँव (पैठण के निकट, महाराष्ट्र)

सम्प्रदाय : वारकरी सम्प्रदाय

आराध्य : भगवान विठोबा (विठ्ठल)

दर्शन : अद्वैत वेदान्त (ज्ञान, योग एवं भक्ति का समन्वय)

मुख्य ग्रन्थ : ज्ञानेश्वरी (भावार्थदीपिका) – भगवद्गीता पर मराठी टीका (1290 ई.)

अन्य रचनाएँ : अमृतानुभव, चांगदेव पासष्टी एवं हरिपाठ

समकालीन संत : नामदेव

उपाधि : “माउली”

समाधि : 1296 ई. (परम्परागत मान्यता), आलंदी (पुणे के निकट) – लगभग 21 वर्ष की आयु में जीवित समाधि

➣ संत ज्ञानेश्वर ने मराठी भाषा को धार्मिक एवं दार्शनिक अभिव्यक्ति का प्रभावशाली माध्यम बनाया, जिससे भक्ति आन्दोलन को जनसामान्य तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण सहायता मिली।

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