संत रविदास (रैदास) (1377–1520 ई.) : जीवन, शिक्षाएँ, भक्ति आंदोलन एवं योगदान

भारतीय इतिहास मध्यकालीन भारत संत रविदास (रैदास) (1377–1520 ई.)
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संत रविदास (रैदास) : निर्गुण भक्ति संत

संत रविदास (रैदास) मध्यकालीन भारत के महान निर्गुण भक्ति संत, समाज-सुधारक एवं संत-कवि थे। उन्होंने जाति-भेद, छुआछूत तथा सामाजिक ऊँच-नीच का विरोध करते हुए मानव समानता, भक्ति एवं कर्म पर बल दिया।

➣ परम्परागत मान्यता के अनुसार संत रविदास का जन्म 1377 ई. में सीर गोवर्धनपुर (वर्तमान वाराणसी) में हुआ। कुछ परम्पराओं में उनका जन्मस्थान मंडुआडीह भी बताया जाता है।

➣ इनके पिता का नाम संतोख दास (संतोक दास) तथा माता का नाम कलसा देवी (कर्मा देवी) था। वे चर्मकार (चमार) समुदाय से सम्बन्ध रखते थे तथा जूते बनाने का पारम्परिक व्यवसाय करते थे।

➣ परम्परा के अनुसार संत रविदास रामानन्द के प्रमुख शिष्यों में थे। उनकी शिक्षाओं से प्रेरित होकर आगे चलकर रविदासिया (रैदासी) सम्प्रदाय का विकास हुआ।

निर्गुण भक्ति

➣ संत रविदास निर्गुण भक्ति धारा के प्रमुख संत थे। उनके अनुसार ईश्वर निराकार, सर्वव्यापी तथा प्रत्येक प्राणी के हृदय में विद्यमान है।

➣ उन्होंने बाह्य आडम्बरों, जातिगत भेदभाव तथा छुआछूत का विरोध करते हुए आन्तरिक शुद्धता, सदाचार एवं निष्काम भक्ति को सर्वोच्च महत्व दिया।

➣ उनका प्रसिद्ध कथन है- “मन चंगा तो कठौती में गंगा”, जिसका आशय है कि यदि मन पवित्र हो तो ईश्वर की प्राप्ति किसी भी स्थान पर सम्भव है।

➣ संत रविदास का विश्वास था कि मनुष्य की श्रेष्ठता उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसके कर्मों से निर्धारित होती है।

➣ उनका प्रसिद्ध पद है- “जाति-जाति में जाति है, जो केतन के पात। रैदास मनुष न जुड़ सके, जब तक जाति न जात॥”

➣ उन्होंने पराधीनता को सबसे बड़ा दोष बताते हुए कहा- “पराधीनता पाप है, जान लेहु रे मीत। रैदास दास पराधीन सौ, कौन करै है प्रीत॥”

रचनाएँ एवं वाणी

➣ संत रविदास ने लोकभाषा में अनेक पदों एवं भजनों की रचना की, जिनमें भक्ति, मानव समानता, सामाजिक न्याय तथा ईश्वर-प्रेम का संदेश मिलता है।

➣ संत रविदास की वाणी के लगभग 40 पद (शबद) सिखों के पवित्र ग्रन्थ ‘गुरु ग्रन्थ साहिब’ में संकलित हैं। वे उन प्रमुख संतों में से हैं जिनकी वाणी को इस ग्रन्थ में स्थान प्राप्त हुआ है।

➣ उनकी वाणी दादूपंथ के प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘पंचवाणी’ में भी संकलित है।

रचना / स्रोत विशेषता
गुरु ग्रन्थ साहिब लगभग 40 पद (शबद) संकलित हैं।
पंचवाणी दादूपंथ का प्रमुख ग्रन्थ, जिसमें संत रविदास की वाणी भी संकलित है।

सामाजिक योगदान

➣ संत रविदास ने मानव समानता, श्रम की गरिमा तथा सामाजिक समरसता पर विशेष बल दिया। उन्होंने जाति-भेद एवं छुआछूत का विरोध करते हुए सभी मनुष्यों को समान माना।

➣ उनके आदर्श समाज की कल्पना ‘बेगमपुरा’ के रूप में प्रसिद्ध है, जहाँ किसी प्रकार का दुःख, अन्याय, कर अथवा सामाजिक भेदभाव नहीं है।

➣ संत रविदास के विचारों का प्रभाव आगे चलकर भक्ति आन्दोलन तथा दलित चेतना दोनों पर पड़ा। उन्होंने कर्म, समानता एवं मानवीय गरिमा पर बल देकर समाज में सामाजिक न्याय और धार्मिक सहिष्णुता की भावना को सुदृढ़ किया।

प्रमुख अनुयायी

परम्परा के अनुसार मीराबाई ने संत रविदास को अपना गुरु माना। मीरा की अनेक रचनाओं में संत रविदास के प्रति श्रद्धा का उल्लेख मिलता है।

➣ कुछ परम्पराओं में चित्तौड़ की झालारानी को भी उनका शिष्य माना गया है।

➣ संत रविदास की शिक्षाओं का प्रभाव उत्तर भारत के अनेक संतों तथा भक्ति परम्पराओं पर पड़ा। वर्तमान में रविदासिया सम्प्रदाय के अनुयायी भारत एवं विदेशों में उनकी जयंती एवं वाणी का व्यापक रूप से प्रचार-प्रसार करते हैं।

मृत्यु

➣ संत रविदास के देहावसान के सम्बन्ध में विभिन्न मत प्रचलित हैं। अधिकांश परम्पराओं के अनुसार उनका निधन वाराणसी में हुआ, जबकि कुछ परम्पराएँ चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) को उनकी निर्वाण-स्थली मानती हैं।

जन्म : परम्परागत मान्यता के अनुसार 1377 ई., सीर गोवर्धनपुर (वाराणसी)

माता-पिता : संतोख दास एवं कलसा देवी

जाति : चर्मकार (चमार)

गुरु : रामानन्द (परम्परागत मान्यता)

भक्ति धारा : निर्गुण भक्ति

सम्प्रदाय : रविदासिया (रैदासी) सम्प्रदाय

प्रसिद्ध वचन : “मन चंगा तो कठौती में गंगा”

प्रमुख अवधारणा : ‘बेगमपुरा’ (समानता एवं भेदभाव-मुक्त आदर्श समाज)

गुरु ग्रन्थ साहिब : लगभग 40 पद (शबद) संकलित

• प्रमुख रचनाएँ : पद एवं भजन (गुरु ग्रन्थ साहिब एवं पंचवाणी में संकलित)

प्रमुख अनुयायी : परम्परा के अनुसार मीराबाई

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