मध्वाचार्य : द्वैत वेदान्त (तत्त्ववाद) के प्रवर्तक
➣ मध्वाचार्य (माधवाचार्य) मध्यकालीन भारत के महान वैष्णव आचार्य तथा द्वैत वेदान्त (तत्त्ववाद) के प्रवर्तक थे। उन्होंने वैष्णव भक्ति परम्परा को दार्शनिक आधार प्रदान किया तथा उडुपी को अपने सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र बनाया।
➣ इनका जन्म 1238 ई. में वर्तमान कर्नाटक के पाजका (पजक) ग्राम (उडुपी के निकट) में एक तुलु ब्राह्मण परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम मध्यगेह भट्ट (नारायण भट्ट) तथा माता का नाम वेदवती था।
➣ इनका बचपन का नाम वासुदेव था। सात वर्ष की आयु में इनका उपनयन संस्कार हुआ, जिसके बाद इन्होंने वेद एवं शास्त्रों का अध्ययन प्रारम्भ किया। बाल्यावस्था से ही वे अपनी असाधारण शारीरिक शक्ति एवं तीक्ष्ण बुद्धि के लिए प्रसिद्ध थे।
➣ इनके गुरु अच्युतप्रेक्ष थे, जो प्रारम्भ में अद्वैत वेदान्त के अनुयायी थे। संन्यास ग्रहण करने पर इन्हें पूर्णप्रज्ञ नाम प्राप्त हुआ। बाद में आनन्दतीर्थ नाम से प्रसिद्ध हुए तथा आचार्य पद प्राप्त करने के पश्चात मध्वाचार्य कहलाए।
➣ परम्परा के अनुसार मध्वाचार्य को वायु का तृतीय अवतार माना जाता है। वैष्णव परम्परा में हनुमान, भीम तथा मध्वाचार्य को क्रमशः वायु के प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय अवतार के रूप में स्वीकार किया जाता है।
द्वैत वेदान्त (तत्त्ववाद)
➣ मध्वाचार्य ने द्वैत वेदान्त, जिसे तत्त्ववाद भी कहा जाता है, का प्रतिपादन किया। यह शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त तथा रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैत वेदान्त से भिन्न दर्शन है।
➣ इनके अनुसार ब्रह्म (विष्णु), जीव तथा जगत तीनों का अस्तित्व वास्तविक है। जीव और ब्रह्म के मध्य शाश्वत भेद है तथा जगत माया नहीं, बल्कि वास्तविक है।
➣ मध्वाचार्य ने भगवान विष्णु को सर्वोच्च ब्रह्म (परमतत्त्व) माना तथा भक्ति को मोक्ष प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन बताया।
| विषय | द्वैत वेदान्त का सिद्धान्त |
|---|---|
| परम सत्य | भगवान विष्णु ही सर्वोच्च ब्रह्म हैं। |
| जीव | जीव और ब्रह्म सदैव भिन्न हैं। |
| जगत | जगत वास्तविक है, माया नहीं। |
| मोक्ष | भगवान विष्णु की भक्ति एवं उनकी कृपा से प्राप्त होता है। |
➣ मध्वाचार्य ने उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता तथा ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखे। इसके अतिरिक्त उन्होंने महाभारत, भागवत पुराण तथा अन्य वैदिक ग्रन्थों पर भी टीकाएँ लिखीं।
➣ उनकी प्रमुख रचनाओं में अनुव्याख्यान, गीताभाष्य, गीतातात्पर्यनिर्णय, महाभारततात्पर्यनिर्णय, तत्त्वसंख्यान तथा तत्त्वविवेक प्रमुख हैं। परम्परा के अनुसार उन्हें लगभग 37 ग्रन्थों (सर्वमूल ग्रन्थ) की रचना का श्रेय दिया जाता है।
ब्रह्म संप्रदाय
➣ ब्रह्म संप्रदाय वैष्णव धर्म की चार प्रमुख परंपराओं में से एक है, जिसके प्रमुख प्रवर्तक मध्वाचार्य थे। इस संप्रदाय का दार्शनिक आधार द्वैत वेदान्त है।
➣ इस संप्रदाय की परंपरा के अनुसार इसका प्रारंभ ब्रह्मा से माना जाता है। ब्रह्मा से यह ज्ञान नारद, वेदव्यास और आगे मध्वाचार्य तक पहुँचा। इसी कारण इसे ब्रह्म संप्रदाय कहा जाता है।
➣ ब्रह्म संप्रदाय में भगवान विष्णु (नारायण) को सर्वोच्च एवं स्वतंत्र परम सत्ता माना गया है तथा अन्य सभी देवताओं को उनके अधीन स्वीकार किया गया है।
➣ मध्वाचार्य ने द्वैत वेदान्त के आधार पर ब्रह्म संप्रदाय को संगठित रूप प्रदान किया तथा दक्षिण भारत, विशेषकर कर्नाटक में इसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया।
➣ इस संप्रदाय के अनुसार जीव और ब्रह्म सदा-सर्वदा भिन्न हैं तथा मोक्ष प्राप्त होने पर भी यह भेद बना रहता है।
➣ ब्रह्म संप्रदाय में भक्ति, भगवान विष्णु की कृपा तथा धार्मिक आचरण को मोक्ष प्राप्ति का प्रमुख साधन माना गया है।
➣ मध्वाचार्य ने उडुपी में श्रीकृष्ण मंदिर को अपने धार्मिक कार्यों का प्रमुख केंद्र बनाया तथा संप्रदाय के संचालन के लिए अष्टमठ (आठ मठ) की स्थापना की।
➣ ब्रह्म संप्रदाय के प्रमुख धार्मिक ग्रंथों में वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, ब्रह्मसूत्र तथा मध्वाचार्य द्वारा रचित उनके भाष्यों को विशेष महत्व दिया जाता है।
| विषय | तथ्य |
|---|---|
| संप्रदाय | ब्रह्म संप्रदाय |
| प्रमुख प्रवर्तक | मध्वाचार्य |
| दार्शनिक आधार | द्वैत वेदान्त |
| उपास्य देव | भगवान विष्णु (नारायण) |
| मोक्ष का साधन | भक्ति, विष्णु की कृपा एवं धार्मिक आचरण |
| प्रमुख केंद्र | उडुपी (कर्नाटक) |
| महत्वपूर्ण संस्था | अष्टमठ (आठ मठ) |
| प्रमुख ग्रंथ | वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, ब्रह्मसूत्र एवं मध्वाचार्य के भाष्य |
उडुपी एवं अष्टमठ
➣ मध्वाचार्य ने उडुपी में श्रीकृष्ण मंदिर की स्थापना कर उसे अपने सम्प्रदाय का प्रमुख धार्मिक केन्द्र बनाया। यह मंदिर आज भी द्वैत वेदान्त का प्रमुख तीर्थस्थल माना जाता है।
➣ उन्होंने उडुपी में आठ मठों (अष्टमठ) की स्थापना की तथा अपने आठ प्रमुख शिष्यों को उनका प्रथम आचार्य नियुक्त किया। इन मठों के माध्यम से द्वैत वेदान्त का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ।
➣ अष्टमठों में पालिमारु, अदमारु, कृष्णपुर, पुत्तिगे, शिरूर, सोढे, कनियूर तथा पेजावर प्रमुख हैं। आज भी इन मठों के आचार्य क्रमशः उडुपी श्रीकृष्ण मंदिर की पूजा-व्यवस्था का संचालन करते हैं।
भक्ति आन्दोलन में योगदान
➣ मध्वाचार्य ने वैष्णव भक्ति को दार्शनिक आधार प्रदान करते हुए भगवान विष्णु (विशेषतः श्रीकृष्ण) की उपासना पर बल दिया। उनके द्वारा प्रतिपादित द्वैत वेदान्त दक्षिण भारत में भक्ति आन्दोलन की प्रमुख धाराओं में से एक बना।
➣ उन्होंने भक्ति को मोक्ष प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन माना तथा भगवान विष्णु की कृपा को मुक्ति के लिए अनिवार्य बताया।
➣ मध्वाचार्य ने वैष्णव परम्परा में शंख, चक्र, गदा एवं पद्म के चिह्न धारण करने की परम्परा को प्रोत्साहित किया, जो आगे चलकर उनके अनुयायियों की विशिष्ट पहचान बनी।
सामाजिक योगदान
➣ मध्वाचार्य ने वैदिक धर्म, नैतिक जीवन तथा अहिंसा पर बल दिया। उन्होंने धार्मिक आडम्बरों एवं अनावश्यक पशुबलि जैसी प्रथाओं का विरोध करते हुए भक्ति एवं सदाचार को अधिक महत्व दिया।
➣ उन्होंने सरल, अनुशासित एवं नैतिक जीवन का संदेश दिया तथा लोगों को सत्य, संयम, सेवा और ईश्वर-भक्ति के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया।
➣ मध्वाचार्य ने मठों को शिक्षा एवं धार्मिक प्रचार का प्रमुख केंद्र बनाया, जहाँ वेदों, शास्त्रों और धार्मिक शिक्षा का प्रसार किया जाता था।
➣ उन्होंने उडुपी श्रीकृष्ण मंदिर तथा उससे जुड़े अष्टमठों के माध्यम से धार्मिक एवं सामाजिक संगठन को सुदृढ़ बनाया, जिससे जनसामान्य में वैष्णव भक्ति का व्यापक प्रचार हुआ।
➣ उनके उपदेशों ने भक्ति आन्दोलन को नई दिशा प्रदान की तथा दक्षिण भारत में वैष्णव परंपरा के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मृत्यु
➣ परम्परा के अनुसार 1317 ई. में लगभग 79 वर्ष की आयु में मध्वाचार्य बद्रीनाथ स्थित व्यास आश्रम की ओर प्रस्थान कर गए और पुनः वापस नहीं लौटे। वैष्णव परम्परा में इसे उनका देहावसान अथवा ब्रह्मलीन होना माना जाता है।
• जन्म : 1238 ई., पाजका (उडुपी, कर्नाटक)
• बचपन का नाम : वासुदेव
• माता-पिता : मध्यगेह भट्ट (नारायण भट्ट) एवं वेदवती
• गुरु : अच्युतप्रेक्ष
• संन्यास-नाम : पूर्णप्रज्ञ → आनन्दतीर्थ → मध्वाचार्य
• दर्शन : द्वैत वेदान्त (तत्त्ववाद)
• आराध्य देव : भगवान विष्णु (विशेषतः श्रीकृष्ण)
• प्रमुख ग्रन्थ : अनुव्याख्यान, गीताभाष्य, गीतातात्पर्यनिर्णय, महाभारततात्पर्यनिर्णय, तत्त्वसंख्यान
• स्थापना : उडुपी श्रीकृष्ण मंदिर एवं अष्टमठ
• अवतार मान्यता : वायु के तृतीय अवतार (हनुमान → भीम → मध्वाचार्य)
• मृत्यु : 1317 ई. (परम्परागत मान्यता), बद्रीनाथ स्थित व्यास आश्रम की ओर प्रस्थान
शंकराचार्य, रामानुजाचार्य एवं मध्वाचार्य के दर्शन की तुलना
| आचार्य | दर्शन | जगत | जीव-ब्रह्म सम्बन्ध | मोक्ष का साधन |
|---|---|---|---|---|
| शंकराचार्य | अद्वैत | माया (मिथ्या) | दोनों अभिन्न | ज्ञान |
| रामानुजाचार्य | विशिष्टाद्वैत | वास्तविक | जीव ब्रह्म का विशिष्ट अंश | भक्ति एवं प्रपत्ति |
| मध्वाचार्य | द्वैत | वास्तविक | जीव एवं ब्रह्म सदा भिन्न | भक्ति |
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