ओडिशा के क्षेत्रीय राजवंश

भारतीय इतिहास ओडिशा के क्षेत्रीय राजवंश
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ओडिशा : गजपति साम्राज्य एवं जगन्नाथ संस्कृति का प्रमुख केंद्र

➣ मुगल शासकों द्वारा ओडिशा पर अधिकार करने से पूर्व वहां अनेक क्षेत्रीय राजवंशों का शासन था। यह राज्य गंगा नदी के डेल्टा से लेकर गोदावरी नदी के मुहाने तक फैला था।

➣ ओडिशा पर तीन वंश के शासकों ने शासन किया- पूर्वी गंग वंश, सूर्यवंशी गजपति वंश और भोई वंश। इन तीनों वंशों ने क्रमश: ओडिशा पर शासन किया।

पूर्वी गंग वश

➣ पूर्वी गंग वंश मध्यकालीन भारत के प्रमुख राजवंशों में से एक था। यह वंश मुख्य रूप से कलिंग (आधुनिक ओडिशा) पर शासन करता था। इसकी जड़ें 5वीं शताब्दी तक जाती हैं, लेकिन इसका साम्राज्यिक स्वरूप 11वीं शताब्दी में आया।

अनंतवर्मन चोडगंग (1078-1148 ई.) पूर्वी गंग वंश के सबसे महान और दीर्घकालिक शासकों में से एक थे। उन्होंने लगभग 70 वर्ष तक शासन किया। चोल राजकुमारी राजसुंदरी के पुत्र होने के कारण उनका नाम चोडगंग पड़ा।

➣ उन्होंने ओडिशा को एक शक्तिशाली, संगठित और विस्तृत राज्य के रूप में स्थापित किया। उनकी राजधानी कटक (या कटक नगर) थी। उन्होंने पुरी में जगन्नाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया तथा भुवनेश्वर में लिंगराज मंदिर का निर्माण कराया। उनके शासनकाल में संस्कृत और तेलुगु साहित्य को संरक्षण मिला। उन्होंने कलिंग से गंगा नदी तक और गोदावरी तक राज्य का विस्तार किया।

नरसिंहदेव वर्मन-I (1238-1264 ई.) गंग वंश का सर्वाधिक विख्यात और पराक्रमी शासक था। मुस्लिम आक्रमणों (विशेषकर बंगाल सल्तनत) के विरुद्ध उसने विलक्षण सफलता प्राप्त की।

1243 ई. में उसने दक्षिणी बंगाल पर आक्रमण कर गौड़ा पर कब्जा किया। इसने पुरी जिले के कोणार्क में सूर्यमंदिर (कोणार्क सूर्य मंदिर) का निर्माण करवाया, जो आज यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है। उसने जगन्नाथ मंदिर के निर्माण/विस्तार को भी पूर्णता प्रदान की। यह मंदिर सूर्य देव को समर्पित है और अपनी रथाकार वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है।

➣ नरसिंहदेव वर्मन-I विद्या एवं विद्वानों का महान संरक्षक था। उसने अपने दरबार में अनेक विद्वानों को आश्रय दिया। उसका प्रमुख दरबारी कवि विद्याधर था, जिसने अलंकार शास्त्र पर एकावली नामक प्रसिद्ध संस्कृत ग्रन्थ की रचना की।

➣ विद्याधर ने नरसिंहदेव-I को हम्मीरमद-मर्दन (अमीरों/मुस्लिम आक्रमणकारियों पर विजय प्राप्त करने वाला) की उपाधि प्रदान की थी।

राजराज तृतीय (1198-1211 ई.) के शासनकाल में बख्तियार खिलजी के भाइयों मोहम्मद और अहमद के नेतृत्व में ओडिशा पर आक्रमण किया गया। राजराज तृतीय इस आक्रमण का प्रभावी प्रतिरोध नहीं कर सके, जिससे राज्य की सीमाओं पर दबाव बढ़ा।

अनंगभीम तृतीय (1211-1238 ई.) ने मुस्लिम आक्रमणों का सफल मुकाबला किया। उसने गयासुद्दीन एवज (बंगाल का शासक) को पराजित किया। उसने स्वयं को भगवान जगन्नाथ का रौत (उप-शासक) घोषित किया और जगन्नाथ को कलिंग का अधिपति माना। उसने मेघेश्वर मंदिर (भुवनेश्वर) का निर्माण करवाया।

भानुदेव प्रथम के शासनकाल में मुहम्मद बिन तुगलक के आक्रमण का सामना करना पड़ा। उसने राज्य की अखंडता बनाए रखने के लिए कूटनीतिक और सैन्य प्रयास किए।

भानुदेव द्वितीय (1352-1378 ई.) के शासनकाल में फिरोजशाह तुगलक ने ओडिशा (जाजनगर) पर आक्रमण किया (लगभग 1353-1360 ई.)। इस आक्रमण में जगन्नाथ मन्दिर को काफी क्षति पहुंची और कुछ विध्वंस भी हुआ।

➣ फिरोजशाह मुख्य रूप से हाथियों की लूट और वसूली के उद्देश्य से आया था। इस काल में गंग वंश की शक्ति में तेजी से गिरावट आई।

भानुदेव तृतीय (1414-1435 ई.) पूर्वी गंग वंश का अंतिम प्रमुख शासक था। उसके बाद वंश की सत्ता कमजोर हो गई और 1434-35 ई. के आसपास मंत्री कपिलेंद्र देव ने सूर्यवंशी गजपति वंश की नींव रखी, जिसने गंग वंश का अंत कर दिया।

सूर्यवंशी, गजपति वंश

सूर्यवंशी गजपति वंश (1435-1540 ई.) पूर्वी गंग वंश के पतन के बाद ओडिशा (कलिंग) पर शासन करने वाला एक शक्तिशाली हिन्दू राजवंश था। इस वंश के शासकों ने गजपति (हाथियों के स्वामी) की उपाधि धारण की।

➣ उन्होंने ओडिशा को राजनीतिक, सैन्य और सांस्कृतिक रूप से मजबूत बनाया तथा जगन्नाथ संस्कृति का संरक्षण किया। गजपति शासक दक्षिण भारत की राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

कपिलेंद्र देव (1434/35-1467 ई.) सूर्यवंशी गजपति वंश के संस्थापक थे। वे मूल रूप से गंग वंश के एक मंत्री थे और उन्होंने गंग वंश के अंतिम शासक भानुदेव तृतीय को पराजित कर सत्ता हथिया ली।

➣ उनके शासनकाल में राज्य गंगा नदी (उत्तर में) से कावेरी नदी (दक्षिण में) तक फैल गया। उन्होंने बहमनी सल्तनत (बीडर) और विजयनगर साम्राज्य के विरुद्ध अनेक युद्ध किए तथा काफी सफलता प्राप्त की।

➣ कपिलेंद्र देव ने बंगाल के सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद को पराजित किया और गौड़ेश्वर (गौड़ का स्वामी) की उपाधि धारण की। उन्होंने जगन्नाथ मंदिर की परंपरा को मजबूत किया और राज्य में वैष्णव धर्म को प्रोत्साहन दिया। उनके शासन में ओडिशा की सैन्य शक्ति चरम पर थी।

पुरुषोत्तम देव (1467-1497 ई.) कपिलेंद्र के पुत्र थे। उनके शासनकाल से गजपति वंश का धीरे-धीरे पतन प्रारंभ हो गया। उन्होंने विजयनगर के विरुद्ध युद्ध किए, लेकिन गोदावरी नदी के दक्षिण का बड़ा भाग उनके राज्य से अलग हो गया। फिर भी उन्होंने जगन्नाथ पुरी की गरिमा बनाए रखी और कई मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया।

प्रतापरुद्र देव (1497-1540 ई.) गजपति वंश के अंतिम शक्तिशाली हिन्दू शासक थे। उनके शासनकाल में ओडिशा पर विजयनगर के महान शासक कृष्णदेव राय ने आक्रमण किया (1510-1516 ई. के आसपास) और उड़ीसा के कई दक्षिणी क्षेत्रों (विशेषकर गोदावरी-कृष्णा क्षेत्र) पर कब्जा कर लिया। इसके अतिरिक्त गोलकुंडा के कुतुबशाही शासकों ने भी बार-बार आक्रमण किए।

➣ प्रतापरुद्र देव एक विद्वान और धर्मनिष्ठ शासक थे। उन्होंने संस्कृत साहित्य को संरक्षण दिया। उनके दरबार में प्रसिद्ध कवि रामानुज और अन्य विद्वान थे। 1540 ई. में उनकी मृत्यु के बाद गजपति वंश तेजी से कमजोर पड़ गया।

भोई वंश (Bhoi Dynasty) गजपति वंश के पतन के बाद ओडिशा में स्थापित हुआ एक अल्पकालिक राजवंश था। यह वंश लगभग 1540 से 1559 ई. तक चला।

गोविंद विद्याधर (Govind Vidyadhara) गजपति वंश के बाद भोई (भोई/भुई) वंश की स्थापना करने वाले पहले शासक थे। वे प्रतापरुद्र देव के एक सेनापति/मंत्री थे। उन्होंने गजपति वंश के अंतिम शासकों को हटाकर सत्ता पर कब्जा किया। उनके शासन में आंतरिक अस्थिरता बढ़ी और राज्य की एकता कमजोर हुई।

➣ भोई वंश का अंत मुकुंद देव (Mukunda Deva) ने किया, जिन्होंने भोई वंश को समाप्त कर चलुक्य-गजपति या नया राजवंश शुरू करने का प्रयास किया। मुकुंद देव (1559-1568 ई.) आखिरी स्वतंत्र हिन्दू शासक थे।

➣ अंततः 1568 ई. में बंगाल के अफगान शासक सुलैमान काररानी ने ओडिशा पर आक्रमण कर मुकुंद देव को पराजित किया। उसके बाद 1586 ई. के आसपास बंगाल सल्तनत (अकबर के समय में) ने ओडिशा को पूर्ण रूप से जीतकर अपने राज्य में मिला लिया। इस घटना के साथ ओडिशा में स्वतंत्र हिन्दू राजवंशों का युग समाप्त हो गया।

कोणार्क सूर्य मंदिर

कोणार्क सूर्य मंदिर ओडिशा राज्य के पुरी जिले में कोणार्क नामक स्थान पर स्थित है। यह मंदिर बंगाल की खाड़ी के तट के निकट निर्मित है तथा भारत के सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं भव्य मंदिरों में गिना जाता है।

➣ इस मंदिर का निर्माण पूर्वी गंग वंश के शासक नरसिंह देव प्रथम ने 13वीं शताब्दी (लगभग 1250 ई.) में करवाया था। यह मंदिर सूर्य देव (अर्क) को समर्पित है, जिसके कारण इसे “अर्क क्षेत्र” या कोणार्क (कोण + अर्क) भी कहा जाता है।

➣ मंदिर की वास्तुकला अत्यन्त अद्भुत है — इसे विशाल रथ (चैरियट) के रूप में निर्मित किया गया है, जिसमें 24 विशाल पत्थर के पहिये तथा सात अश्व (घोड़े) उत्कीर्ण हैं, जो सूर्य देव के रथ को दर्शाते हैं। प्रत्येक पहिया एक सूर्य घड़ी (sundial) के रूप में भी कार्य करता है, जिससे समय की सटीक गणना की जा सकती है।

➣ यह मंदिर कलिंग वास्तुकला शैली (कलिंग स्थापत्य) का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है तथा इसे “ब्लैक पैगोडा” के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इसका रंग समय के साथ काला पड़ गया था। यह नाविकों के लिए एक महत्वपूर्ण दिशा-सूचक चिह्न के रूप में भी कार्य करता था।

➣ मंदिर की दीवारों पर अत्यन्त सूक्ष्म एवं कलात्मक शिल्पकला (मूर्तिकला) उत्कीर्ण है, जिसमें देवी-देवताओं, अप्सराओं, पशु-पक्षियों एवं दैनिक जीवन के दृश्यों का सुन्दर चित्रण मिलता है। इसमें कामुक एवं श्रृंगारिक मूर्तियां भी उत्कीर्ण हैं, जो खजुराहो मंदिरों की शिल्पकला से समानता रखती हैं।

➣ वर्तमान समय में मंदिर का मुख्य गर्भगृह (विमान) क्षतिग्रस्त अवस्था में है तथा केवल जगमोहन (सभा मण्डप) ही सुरक्षित अवस्था में शेष है। मंदिर के क्षतिग्रस्त होने के कारणों में प्राकृतिक आपदाएं तथा कुछ इतिहासकारों के अनुसार मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा विध्वंस भी माना जाता है।

कोणार्क सूर्य मंदिर को 1984 ई. में यूनेस्को (UNESCO) द्वारा विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) घोषित किया गया। यह भारतीय पर्यटन एवं स्थापत्य कला की दृष्टि से एक अत्यन्त महत्वपूर्ण धरोहर मानी जाती है तथा प्रत्येक वर्ष यहां कोणार्क नृत्य महोत्सव का आयोजन भी किया जाता है, जिसमें भारत की शास्त्रीय नृत्य शैलियों का प्रदर्शन होता है।

➣ इस मंदिर को भारत सरकार द्वारा अपने 10 रुपये के नोट पर भी चित्रित किया गया है, जो इसकी राष्ट्रीय महत्ता को दर्शाता है।

शासक (शासनकाल) प्रमुख जानकारी / महत्वपूर्ण घटनाएँ
भानुदेव चतुर्थ (1414–1434 ई.) पूर्वी गंग वंश का अंतिम प्रमुख शासक। उसके शासनकाल में राज्य कमजोर होने लगा, जिससे गंग वंश का पतन हुआ।
कपिलेंद्र देव (1434–1467 ई.) सूर्यवंशी गजपति वंश का संस्थापक। ओडिशा साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार किया। बंगाल, आंध्र तथा दक्षिण भारत तक अपना प्रभाव स्थापित किया।
पुरुषोत्तम देव (1467–1497 ई.) विजयनगर के साथ संघर्ष किया। कांची अभियान के लिए प्रसिद्ध। उसके शासनकाल में ओडिशा की शक्ति बनी रही।
प्रतापरुद्र देव (1497–1540 ई.) गजपति वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक। श्री चैतन्य महाप्रभु उसके समकालीन थे। कृष्णदेवराय से युद्ध हुए तथा दक्षिण के कुछ प्रदेश खो दिए।
कालुआ देव (1540–1541 ई.) अल्पकालीन शासन। उसके समय में गजपति साम्राज्य की शक्ति तेजी से घटने लगी।
कखारुआ देव (खारुआ प्रताप) (1541 ई.) बहुत अल्पकालीन शासक। शीघ्र ही सत्ता परिवर्तन हो गया।
गोविन्द विद्याधर (1541–1549 ई.) भोंई (भुईं) वंश का संस्थापक। गजपति वंश का अंत कर स्वयं सत्ता पर अधिकार किया।
चक्रप्रताप देव (1549–1557 ई.) भोंई वंश का शासक। उसके शासनकाल में राज्य लगातार कमजोर होता गया।
नरसिंह जेना (1557–1558 ई.) अल्पकालीन शासक। उसके बाद राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ गई।
रघुराम जेना (1558–1560 ई.) कमजोर शासन। राज्य पर बाहरी आक्रमणों का खतरा बढ़ गया।
मुकुन्द देव (1560–1568 ई.) ओडिशा का अंतिम स्वतंत्र हिन्दू शासक1568 ई. में बंगाल के सुल्तान सुलैमान कर्रानी ने ओडिशा पर आक्रमण किया। युद्ध में मुकुन्द देव मारा गया और ओडिशा पर कर्रानी वंश का अधिकार हो गया।
कर्रानी वंश का शासन (1568–1592 ई.) ओडिशा बंगाल के कर्रानी वंश के अधीन रहा। इस अवधि में अफगान शासकों का नियंत्रण स्थापित रहा।
अकबर द्वारा ओडिशा विजय (1592 ई.) राजा मानसिंह के नेतृत्व में मुगल सेना ने अफगानों को पराजित किया। 1592 ई. में अकबर ने ओडिशा को मुगल साम्राज्य में मिला लिया।

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