मारवाड़ : राजपूत वीरता एवं सामरिक शक्ति का प्रमुख केंद्र
➣ मारवाड़ (आधुनिक जोधपुर) राजस्थान का एक प्रमुख और शक्तिशाली राज्य था। यहां राष्ट्रकूटों के वंशज राठौरों का शासन था, जो अपनी वीरता, विस्तारवादी नीति और साहस के लिए प्रसिद्ध रहे। मारवाड़ राठौरों की राजधानी के रूप में विकसित हुआ और राजपूताना की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ मारवाड़ के राठौर राजवंश का संस्थापक संतराम (सेटराम) का पुत्र सीहा (शिवाजी/सीहाजी) था। उन्होंने 1226 ई. के आसपास कन्नौज से आकर मारवाड़ क्षेत्र में राठौर वंश की नींव रखी।
➣ उन्होंने पाली क्षेत्र में मेड़ और मीणा जातियों को पराजित कर अपनी सत्ता स्थापित की। 1273 ई. में एक तुर्की (मुस्लिम) आक्रमणकारी सेना के विरुद्ध लड़ते हुए उनकी वीरगति हुई। बिथू गांव (पाली) के शिलालेख में उनकी मृत्यु का उल्लेख है।
➣ 1384 ई. में राव चूड़ा (1384-1428 ई.) गद्दी पर बैठा। दिल्ली सल्तनत की कमजोर स्थिति का लाभ उठाकर उसने मांडोर पर अपना पूर्ण आधिपत्य स्थापित कर लिया और उसे अपनी राजधानी बनाया।
➣ उसने गुजरात सुल्तान जफर खान के आक्रमण का सफलतापूर्वक मुकाबला किया, साथ ही नागौर, सम्भर, अजमेर आदि क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की। उसकी आक्रामक नीतियों से पड़ोसी राज्यों में शत्रुता बढ़ी, लेकिन उसने राठौर शक्ति को मजबूत आधार प्रदान किया।
➣ राव चूड़ा के बाद रणमल (1427-1438 ई.) शासक बना। वह मेवाड़ के साथ घनिष्ठ संबंध रखता था। उसके बाद राव जोधा (1438-1489 ई.) गद्दी पर बैठा, जो राठौर वंश का एक महान शासक सिद्ध हुआ।
➣ राव जोधा ने 1459 ई. में जोधपुर नगर की स्थापना की एवं जोधपुर दुर्ग (मेहरानगढ़ किला) का निर्माण करवाया, जो आज भी अपनी विशालता और वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है।
➣ उन्होंने मांडोर से राजधानी जोधपुर स्थानांतरित की। उनके शासनकाल में राठौर राज्य का विस्तार हुआ और उन्होंने कई पड़ोसी क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित किया।
➣ उसके समय में राठौरों की राजनीतिक शक्ति इतनी बढ़ गई थी कि राणा कुंभा (मेवाड़) को मारवाड़ और मेवाड़ के मध्य अपनी सीमाएं निश्चित करने के लिए एक संधि करनी पड़ी थी।
➣ दोनों के बीच वैवाहिक संबंध भी स्थापित हुए, जिससे अस्थायी शांति बनी। राव जोधा के शासन में राठौर वंश की प्रतिष्ठा चरम पर पहुंची।
➣ जोधा का पुत्र बीका (बीकाजी) अपने वंश का एक पराक्रमी और साहसी शासक था। 1488 ई. में इसने बीकानेर नगर की स्थापना की और वहां अलग राठौर शाखा की नींव रखी, जो बाद में बीकानेर राज्य के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
➣ मारवाड़ का सबसे महत्वपूर्ण और शक्तिशाली शासक मालदेव (1532-1562 ई.) था। उसके शासन काल में मारवाड़ अपने उत्कर्ष की पराकाष्ठा पर पहुंच गया। उसने सेना का आधुनिकीकरण किया, राज्य की सीमाओं का विस्तार किया और कई छोटे राज्यों को अधीन किया। वह राजपूताना का प्रमुख शासक माना जाता था।
➣ मालदेव ने 1544 ई. में शेरशाह सूरी से गिरि-सुमेल (समेल/जैतारण) का युद्ध किया। इस युद्ध में मालदेव के वफादार सेनापति जैता और कुंपा ने शेरशाह की विशाल सेना (लगभग 80,000) के विरुद्ध अदम्य साहस दिखाया।
➣ बड़ी मुश्किल से शेरशाह जीत सका। युद्ध के बाद शेरशाह ने कहा था — “मुट्ठी भर बाजरे के लिये मैं हिन्दुस्तान का साम्राज्य लगभग खो चुका था।” इस युद्ध में राठौर वीरों ने अद्वितीय वीरता का प्रदर्शन किया।
➣ मालदेव ने खानवा का युद्ध (1527 ई.) में राणा सांगा की तरफ से भाग लिया था (न कि पानीपत का प्रथम युद्ध)। उसने राणा सांगा की सहायता के लिए 4,000 सैनिकों के साथ युद्ध में हिस्सा लिया और घायल राणा को युद्धक्षेत्र से सुरक्षित निकालने में मदद की।
| शासक | काल | प्रमुख घटनाएं / उपलब्धियां |
|---|---|---|
| सीहा (संस्थापक) |
— मृत्यु: 1273 ई. |
मारवाड़ राठौर वंश का संस्थापक, संतराम का पुत्र। एक तुर्क आक्रमण का विरोध करते हुए 1273 ई. में मृत्यु। |
| राव चूड़ा | 1384–1432 ई. | दिल्ली सल्तनत की पतनावस्था का लाभ उठाकर मांडोर दुर्ग पर अधिकार स्थापित किया। |
| रणमल | 1427–1438 ई. | राव चूड़ा के पश्चात् शासक बना। मेवाड़ की राजनीति से जुड़ा रहा। |
| राव जोधा | 1438–1489 ई. | 1459 ई. में जोधपुर नगर की स्थापना व मेहरानगढ़ (जोधपुर दुर्ग) का निर्माण। राठौर शक्ति इतनी बढ़ी कि राणा कुंभा को मारवाड़ के साथ सीमा-निर्धारण हेतु संधि करनी पड़ी। |
| राव बीका (जोधा का पुत्र) |
स्थापना: 1488 ई. | पराक्रमी शासक। 1488 ई. में बीकानेर नगर की स्थापना कर स्वतंत्र राठौर शाखा की नींव रखी। |
| राव मालदेव | 1532–1562 ई. |
मारवाड़ का सबसे महत्वपूर्ण शासक, जिसके काल में मारवाड़ अपने उत्कर्ष की पराकाष्ठा पर पहुंचा। पानीपत का प्रथम युद्ध (1526 ई.) — राणा सांगा की तरफ से भाग लिया। गिरी-सुमेल का युद्ध (1544 ई.) — शेरशाह सूरी से युद्ध, बड़ी कठिनाई से शेरशाह विजयी हुआ। |
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