मालवा सल्तनत (1401–1562 ई.) : इतिहास, शासक एवं प्रमुख घटनाएँ

भारतीय इतिहास मालवा सल्तनत (1401–1562 ई.)
📚 विषय सूची

मालवा : मध्य भारत का शक्तिशाली एवं समृद्ध राज्य

शासक शासनकाल प्रमुख जानकारी / महत्वपूर्ण घटनाएँ
दिलावर खाँ गौरी 1401–1406 ई. मालवा सल्तनत का संस्थापक। तैमूर के आक्रमण के बाद दिल्ली सल्तनत की कमजोरी का लाभ उठाकर मालवा में स्वतंत्र शासन स्थापित किया।
अल्प खाँ (होशंग शाह) 1406–1435 ई. मालवा का प्रथम स्वतंत्र सुल्तान। माण्डू को राजधानी बनाया। होशंग शाह का मकबरा बनवाया गया, जिसे भारत का पहला संगमरमर का मकबरा माना जाता है।
मुहम्मद शाह गौरी 1435–1436 ई. कमजोर शासक। उसके शासनकाल में दरबारी षड्यंत्र बढ़े और शीघ्र ही सत्ता समाप्त हो गई।
महमूद शाह खिलजी प्रथम 1436–1469 ई. मालवा के खिलजी वंश का संस्थापक। मेवाड़, गुजरात, जौनपुर एवं बहमनी राज्यों से अनेक युद्ध किए। राज्य का सर्वाधिक विस्तार किया।
गयासुद्दीन खिलजी 1469–1500 ई. विलासप्रिय शासक। माण्डू में विशाल हरम बनवाया। उसके शासनकाल में कला एवं स्थापत्य का विकास हुआ।
नासिरुद्दीन खिलजी 1500–1510 ई. अपने पिता गयासुद्दीन खिलजी को विष देकर सत्ता प्राप्त करने के लिए प्रसिद्ध। उसके शासनकाल में राज्य की शक्ति कमजोर होने लगी।
महमूद शाह खिलजी द्वितीय 1510–1531 ई. राणा सांगा से संघर्ष हुआ। बाद में गुजरात के बहादुर शाह ने मालवा पर अधिकार कर लिया।
मल्लू खाँ (कादिर शाह) 1531–1537 ई. बहादुर शाह द्वारा मालवा का शासक नियुक्त किया गया। बाद में स्वतंत्र होने का प्रयास किया, लेकिन सफल नहीं हुआ।
शुजात खाँ 1537–1555 ई. शेरशाह सूरी ने उसे मालवा का गवर्नर नियुक्त किया। सूर साम्राज्य के अधीन मालवा का प्रशासन संभाला।
बाज़ बहादुर 1555–1562 ई. मालवा का अंतिम स्वतंत्र शासक। संगीत प्रेमी शासक था। रूपमती के साथ उसकी प्रेमकथा प्रसिद्ध है। 1561 ई. में आदम खाँ एवं पीर मुहम्मद खाँ ने अकबर के आदेश पर मालवा पर आक्रमण किया। 1562 ई. तक मालवा पूरी तरह मुगल साम्राज्य में सम्मिलित हो गया।

➣ मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग तथा राजस्थान के दक्षिणी-पश्चिमी भाग से गठित यह क्षेत्र आर्थिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टि से समृद्ध राज्य था। मालव देवी लक्ष्मी के आवास का हिस्सा कहलाता है।

➣ नर्मदा व ताप्ती नदियों के बीच पठारी क्षेत्र में स्थित होने के कारण इसका सामरिक महत्व था। इसी कारण तुर्की विजेताओं की दृष्टि इस पर सदा लगी रहती थी।

➣ स्थापत्य कला में भी मालवा का स्थान सर्वोच्च है। यहां के सुल्तानों ने राजधानी माण्डू में अनेक भव्य एवं सुन्दर महलों, मस्जिदोंमकबरों का निर्माण करवाया था।

➣ मालवा की राजधानी माण्डू में अनेक सुन्दर स्मारकों के कारण इस नगर को अल्हाद प्रदायक नगर की संज्ञा दी गयी है।

1305 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा को जीतकर उसे दिल्ली सल्तनत में मिलाया। 1305 ई. से 1398 ई. तक मालवा दिल्ली के सुल्तानों के अधीन रहा।

गौरी वंश

➣ मालवा के गौरी वंश के गवर्नर दिलावर खाँ गौरी (हुसैन खाँ गौरी) ने 1401 ई. में तैमूर के आक्रमण के बाद स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी, लेकिन

➣ मालवा की स्वतन्त्र सल्तनत की स्थापना (1401 ई.) गौरी वंश के गवर्नर दिलावर खाँ गौरी (हुसैन खाँ गोरी) ने की थी, जिसे फिरोज तुगलक ने अमीर के रूप दिलावर खाँ की उपाधि प्रदान की थी।

➣ उसने स्वयं को राजा घोषित नहीं किया। उसने धार को अपना प्रान्तीय मुख्यालय (राजधानी) बनाया।

➣ उसके पुत्र अल्प खाँ (1406-35 ई.) ने हुशंग शाह की उपाधि धारण करके स्वयं को राजा/सुल्तान घोषित किया।

1407 ई. में गुजरात के शासक मुजफ्फर शाह ने मालवा पर आक्रमण कर हुशंग शाह को बन्दी बना लिया व गुजरात ले गया।

➣ गुजरात से मुक्त होने के बाद हुशंग शाह ने माण्डू को अपनी राजधानी बनाई।

➣ हुशंग शाह एक अत्यन्त लोकप्रिय शासक था। उसने बहुसंख्यक हिन्दुओं को मालवा में बसने के लिए प्रोत्साहित किया।

➣ हुशंग शाह ने जैनियों को सहायता प्रदान की, जो राज्य के मुख्य व्यापारी एवं साहूकार थे। सफल व्यापारी नरदेव सोनी उसका खजांची और सलाहकार था।

➣ हुशंग शाह महान विद्वान और रहस्यवादी सूफी सन्त शेख बुहरानुद्दीन का शिष्य था। उसके संरक्षण में अनेक सूफी सन्त मालवा की ओर आकर्षित हुए। उसने हिन्दुओं को मन्दिर आदि निर्मित कराने की पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान की।

1435 ई. में अपनी मृत्यु से पूर्व उसने नर्मदा के किनारे होशंगाबाद नगर की स्थापना।

खलजी वंश

महमूद खलजी प्रथम (1436-1469 ई.)

➣ 1436 ई. में सुल्तान महमूद गोरी को उसके वजीर खलजी तुर्क महमूद खाँ ने जहर देकर मार डाला और तख्त पर कब्जा करके खलजी वंश की नींव डाली।

➣ उसने अपना अधिकांश जीवन विभिन्न राजाओं से युद्ध करने में बिताया। ऐसा कोई वर्ष मुश्किल से नहीं जाता रहा होगा, जब वह मैदान में न उतरता हो ।

➣ उसके विषय में फरिश्ता ने लिखा है कि इस तरह शिविर उसका घर बन गया था और युद्ध का मैदान उसके लिए आरामगाह था। वह अपने फुरसत के क्षण दुनिया के विभिन्न राजदरबारों के इतिहासों और संस्मरणों को सुनने में व्यतीत करता था।

➣ महमूद खलजी मालवा का सबसे योग्य व शक्तिशाली शासक था। उसने गुजरात के अहमद शाह प्रथम, बहमनी सम्राट मुहम्मद शाह तृतीय और मेवाड़ के राणा कुम्भा के विरुद्ध युद्ध किया।

➣ मेवाड़ के राणा कुंभा के साथ युद्ध के उपरांत महमूद ख़िलजी और राणा कुंभा दोनों ने जीत का दावा किया तथा इसके उपलक्ष्य में राणा कुंभा ने चित्तौड़ में विजय स्तंभ तो महमूद ख़िलजी ने मांडू में सात मंजिलों वाले स्तंभ का निर्माण करवाया।

➣ माण्डू की जामा मस्जिद का निर्माण हुशंगशाह ने शुरू किया था, किन्तु महमूद खलजी प्रथम के समय में इसका निर्माण पूरा हुआ।

➣ मिस्र के खलीफा ने महमूद खलजी को सुल्तान की उपाधि दी। उसके दरबार में मिस्र के सुल्तान अबु सईद का एक मिशन भी आया था।

➣ उसके शासनकाल में मालवा का गौरव अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया। उसने गैर मुस्लिम प्रजा के प्रति उदारतापूर्ण नीति अपनाई और उन्हें शासन में उच्च पदों पर नियुक्त किया।

➣ उसने व्यापार एवं वाणिज्य के संवर्धन के लिए जैन पूंजीपतियों को संरक्षण प्रदान किया।

➣ प्रजा के स्वास्थ के लिए उसने माण्डू में एक चिकित्सालय (दारुल शिफा) एवं आवासीय महाविद्यालय भी स्थापित किया।।

गयासुद्दीन शाह (1469-1500 ई.)

➣ वह धार्मिक प्रवृत्ति का सुल्तान था। शराबइस्लाम में वर्जित अन्य वस्तुओं का सेवन नहीं करता था।

➣ वह शान्तिप्रिय व्यक्ति था किन्तु उसका पारिवारिक जीवन कलहपूर्ण था। उसके सबसे बड़े पुत्र नासिरूद्दीन ने उसे जहर देकर मार डाला।

➣ गयासुद्दीन ने माण्डू में जहाज महल बनवाया तथा महिला शिक्षा के लिए सारंगपुर में एक मदरसा बनवाया।

नासिरुद्दीन शाह (1500-1510 ई.)

➣ गयासुद्दीन के चरित्र में बड़ा अन्तर्विरोध था। वह बाह्य तौर पर पवित्र एवं धार्मिक जीवन व्यतीत करने का दिखावा करता था, पर व्यक्तिगत जीवन में वह नितान्त इन्द्रियलोलुप था।

➣ उसके महल में 16000 दासियाँ थीं, जिनमें से अनेक हिन्दू सरदारों की पुत्रियाँ भी थीं। उसने इथोपियाई एवं तुर्की दासियों की एक अंगरक्षक सेना गठित की।

महमूद शाह खलजी द्वितीय (1511 ई.)

➣ महमूद द्वितीय मालवा का अन्तिम शासक था। वह बड़ी विषम परिस्थितियों में सुल्तान बना था।

➣ उसने मुसलमान अमीरों के षड्यन्त्रों से अपनी रक्षा के लिए चन्देरी के राजपूत शासक मेदनी राय को अपना वजीर नियुक्त किया।

➣ वह चित्तौड़ के शासक राणा सांगा से पराजित हुआ। परन्तु राणा सांगा ने उसे बंदी बनाकर छोड़ दिया।

1531 ई. में गुजरात के शासक बहादुरशाह ने माण्डू पर आक्रमण कर महमूद द्वितीय को पराजित कर मालवा को गुजरात में मिला लिया व मालवा का स्वतन्त्र अस्तित्व समाप्त हो गया।

बाज बहादुर मांडु का शासक था। रानी रूपमती-बाज बहादुर एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक प्रेमकथा इसी शासक से सम्बंधित है।

अन्य तथ्य

1535 ई. में जब हुमायूँ ने गुजरात पर आक्रमण किया तो मालवा दिल्ली साम्राज्य का हिस्सा बन गया, लेकिन शीघ्र ही उसके हाथ से निकल गया। हुमायूँ प्रथम मुगल बादशाह था, जिसने मालवा जीता।

➣ अंततः बादशाह अकबर ने 1561-62 ई. में अब्दुल्ला खाँ के नेतृत्व में मालवा पर विजय हेतु मुगल सेना भेजी। उस समय वहाँ का शासक बाजबहादुर था जिसे परास्त कर मालवा को अंतिम रूप से मुगल साम्राज्य का हिस्सा बना लिया गया।

➣ 1724 में पेशवा बाजीराव के नेतृत्व और सिंधिया, होल्कर और पुआर की मदद से मराठों ने मालवा में प्रवेश किया। तीसरे मराठा युद्ध (1817) में सत्ता अंग्रेज़ों के हाथों में चली गई।

➣ भारत स्वतंत्रता के पश्चात 1948 और उसके बाद 1956 में औपचारिक रूप से मालवा का विभाजन मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र तथा राजस्थान राज्यों के बीच कर दिया गया।

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