गुजरात : व्यापार एवं समुद्री शक्ति का प्रमुख केंद्र
➣ गुजरात का इतिहास ईस्वी पूर्व लगभग 2,000 साल पुराना है। यह भी मान्यता है कि श्री कृष्ण मथुरा छोड़कर सौराष्ट्र के पश्चिमी तट पर जा बसे थे, जो द्वारका अर्थात् प्रवेशद्वार कहलाया।
➣ कई वर्षो बाद मौर्य, गुप्त, प्रतिहार तथा अन्य अनेक राजवंशों ने इस प्रदेश पर क्रमवार शासन किया। प्रतिहार शासक नाग्भट्ट ने अरबों को खदेड़ कर यहाँ प्रतिहार वंश की नींव डाली थी।
➣ चूँकि गुजरात पश्चिम भारत का एक समृद्ध राज्य था। इसलिए उसकी समृद्धि से तुर्की आक्रमणकारी सदैव इसकी ओर आकृष्ट हुए।
➣ 1025-26 ई. में महमूद गजनवी ने सोमनाथ के प्रसिद्ध मन्दिर पर आक्रमण कर यहां से अपार धन प्राप्त किया। उस समय गुजरात का शासक भीम प्रथम शासक था।
➣ 1297 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने रायकरण को पराजित कर गुजरात को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया था। 1391 ई. में अंतिम सूबेदार जफर खाँ, जो व्यावहारिक रूप से स्वतन्त्र रहता आया था, 1401 ई. में औपचारिक रूप से दिल्ली सल्तनत की अधीनता त्याग दी और मुजफ्फर शाह की उपाधि धारण करके सुल्तान के रूप में गुजरात के स्वतन्त्र राज्य की स्थापना की। जफर खाँ दिल्ली के सुल्तानों द्वारा नियुक्त गुजरात का अन्तिम सुवदार था।
| शासक | शासनकाल | प्रमुख जानकारी / महत्वपूर्ण घटनाएँ |
|---|---|---|
| जफर खाँ मुजफ्फर शाह प्रथम | 1407–1411 ई. | दिल्ली सल्तनत से स्वतंत्र होकर गुजरात सल्तनत की स्थापना की। गुजरात का प्रथम स्वतंत्र सुल्तान माना जाता है। |
| अहमद शाह प्रथम | 1411–1442 ई. | अहमदाबाद नगर की स्थापना की। भद्र किला एवं जामा मस्जिद का निर्माण कराया। गुजरात को एक शक्तिशाली राज्य बनाया। |
| मुहम्मद शाह द्वितीय | 1442–1451 ई. | शांतिपूर्ण शासन किया तथा प्रशासन को सुदृढ़ बनाए रखा। |
| कुतुबुद्दीन अहमद शाह द्वितीय | 1451–1458 ई. | मालवा तथा राजस्थान के राज्यों से संघर्ष किया और राज्य की सीमाओं की रक्षा की। |
| महमूद बेगड़ा | 1458–1511 ई. | गुजरात का सबसे शक्तिशाली शासक। गिरनार (जूनागढ़) तथा चम्पानेर पर विजय प्राप्त की। चम्पानेर को राजधानी बनाकर उसका नाम मुहम्मदाबाद रखा। |
| मुजफ्फर शाह द्वितीय | 1511–1526 ई. | महमूद बेगड़ा का उत्तराधिकारी। मेवाड़ एवं मालवा के राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप किया। |
| बहादुर शाह | 1526–1537 ई. | मालवा पर अधिकार किया तथा 1535 ई. में चित्तौड़ पर विजय प्राप्त की। हुमायूँ से संघर्ष हुआ। पुर्तगालियों से बसीन (वसई) की संधि की तथा 1537 ई. में दीव के निकट उसकी मृत्यु हो गई। |
| मुहम्मद शाह तृतीय | 1537–1554 ई. | बहादुर शाह का उत्तराधिकारी। उसके शासनकाल में अमीरों का प्रभाव बढ़ गया और केंद्रीय सत्ता कमजोर होने लगी। |
| अहमद शाह तृतीय | 1554–1561 ई. | कमजोर शासक। दरबारी षड्यंत्रों और सरदारों के संघर्ष के कारण गुजरात में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी। |
| मुजफ्फर शाह तृतीय | 1561–1573 ई. | गुजरात सल्तनत का अंतिम शासक। 1572–73 ई. में अकबर ने गुजरात पर विजय प्राप्त कर उसे मुगल साम्राज्य में मिला लिया। |
अहमदशाह प्रथम (1411-1442 ई.)
➣ अहमद शाह स्वतंत्र गुजरात राज्य का वास्तविक संस्थापक था। वह एक साहसी और युद्ध प्रिय शासक था। पूरे शासनकाल में वह अनवरत युद्ध करता रहा तथा कभी पराजय का मुंह नहीं देखा।
➣ उसने जूनागढ़, मालवा, असीरगढ़, राजपूताना के राजाओं तथा आसपास के अन्य प्रदेशों पर विजय प्राप्त किया था। उसने अहमद शाह ने मालवा के शासक हुशंगशाह को भी पराजित किया।
➣ 1413 ई. में अहमदशाह ने आसवाल के प्राचीन नगर के स्थान पर अहमदाबाद नामक एक नवीन नगर की स्थापना की तथा पाटन के स्थान पर गुजरात की राजधानी अहमदाबाद स्थानान्तरित की थी।
➣ धार्मिक नीतिः धार्मिक रूप से अहमदशाह असहिष्णु था। उसने सिद्धपुर नामक उत्तरी गुजरात के प्राचीन तीर्थ स्थल को नष्ट कर वहां के अनेक मंदिरों का विनाश किया।
➣ सिद्धपुर के अभियान के दौरान ही अहमदशाह ने प्रथम बार गुजरात में जजिया कर लगाया। इससे पूर्व गुजरात में जजिया कर नहीं लगाया गया था।
➣ सांस्कृतिक उपलब्धियां: अहमदशाह कला और वास्तुशास्त्र का महान संरक्षक था। अहमदाबाद में उसके द्वारा जामा मस्जिद बनवाया गया।
➣ इस्लामी गुजरात के जैन स्थापत्य कला का समन्वय कर अनेक भव्य मस्जिदों, खानकाहों तथा मदरसों का निर्माण करवाया था।
➣ अपने शासकीय कर्मचारियों को निष्ठावान बनाये रखने और सुल्तान के विरुद्ध एक जुट होने से रोकने के लिए अहमदशाह ने प्रशासन के आधे पदों पर स्वतन्त्र मुसलमानों और शेष आधे पदों पर दासों को नियुक्ति किया।
➣ अहमदशाह एक प्रसिद्ध कवि भी था। मिस्र के प्रसिद्ध विद्वान बद्र-उद-दीन दमामीनी, जिसने अहमदशाह के शासन काल में गुजरात की यात्रा की थी, ने सुल्तान की प्रशंसा में लिखा है कि वह सुल्तानों में विद्वान और विद्वानों का सुल्तान था।
गयासुद्दीन मुहम्मद शाह (1446-51 ई.)
➣ अपने पिता की तरह सैनिक प्रतिभा और सैनिक निपुणता नहीं थी। वह अत्यन्त विलासी और कामुक होने के साथ-साथ उदार था।
➣ लोग साधारणतः उसे जरबख्श अर्थात् स्वर्णदान करने वाला कहते थे। अपने मृदुल स्वभाव के कारण उसने करीम या दयालु की उपाधि अर्जित की।
महमूद बेगड़ा-1 (1459-1511ई.)
➣ यह अपने वंश का सबसे महानतम शासक था। महमूद बेगड़ा गुजरात का छठाँ सुल्तान था। वह तेरह वर्ष की उम्र में गद्दी पर बैठा और 52 वर्ष तक सफलतापूर्वक राज्य करता रहा।
➣ यह अहमदशाह का पौत्र था। इसका मूल नाम अबुल फतेह खाँ था इसने महमूद शाह की उपाधि धारण की।
➣ महमूद बेगड़ा गुजरात का महानतम शासक था। उसका शासनकाल भारत में क्रोस और क्रेसेन्ट के बीच युद्ध के लिए स्मरणीय है।
➣ महमूद को बेगड़ा की उपाधि गिरनार, जूनागढ़ तथा चम्पानेर के क़िलों को जीतने के बाद मिली थी।
➣ बेगडा ने 1466 ई. में गिरनार के राजा राव मण्डलिक को परास्त कर गिरनार के पास मुस्तफाबाद नामक नगर की स्थापना की, जो गुजरात की दूसरी राजधानी थी।
➣ 1482 ई. में चम्पानेर के राजा जयसिंह को परास्त करके चम्पानेर के निकट मुहम्मदाबाद नामक नगर बसाया। उसने चम्पानेर के निकट बाग-ए-फिरदौस की स्थापना की।
➣ ख़ानदेश और मालवा को अपने अधिकार में करने की सुल्तान की योजना में चम्पानेर के क़िले का सामरिक महत्व था।
➣ अपने शासन के बाद के वर्षों में महमूद बेगड़ा ने द्वारका पर अधिकार प्राप्त किया। इसका प्रमुख कारण समुद्री डाकू थे जो बंदरगाह से मक्का जाने वाले हज यात्रियों को लूटते थे।
➣ महमूद बेगड़ा को पुर्तग़ालियों से भी संघर्ष करना पड़ा। वे पश्चिम एशिया के देशों के साथ गुजरात के व्यापार में हस्तक्षेप कर रहे थे। पुर्तग़ालियों की नौसेना शक्ति को कम करने के लिए उसने मिस्र के सुल्तान का साथ दिया। लेकिन उसमें उसे कोई सफलता नहीं मिली।
➣ महमूद बेगड़ा सुल्तान सिकंदर लोदी का समकालीन तथा मित्र था। इसके शासन काल में प्रथम बार दिल्ली के शासक (सिकंदर लोदी) ने गुजरात के शासक (महमूद बेगड़ा) को उपहार भेजे।
➣ महमूद बेगड़ा के लम्बे और शान्तिपूर्ण काल में व्यापार में उन्नति हुई। उसने यात्रियों की सुविधा के लिए अनेक कारवाँ-सरायों और यात्री-सरायों का निर्माण करवाया।
➣ उसके शासन काल में अनेक अरबी-ग्रंथों का फ़ारसी में अनुवाद किया गया, उसका दरबारी कवि उदयराज था, जो संस्कृत का कवि था, ने सुल्तान की प्रशंसा में महमूद चरित नामक कविता लिखी थी।
➣ उसके काल के विदेशी यात्री बार्थेमा व बारबोसा ने उसके विषय में अनेक रोचक तथ्य हैं। बारबोसा ने महमूद बेगड़ा को विष पुरूष कहा है।
➣ वह लिखता है कि बचपन से ही महमूद बेगड़ा को किसी विष का नियमित रूप से सेवन कराया गया था। अत: उसके हाथ पर यदि कोई मक्खी बैठ जाती थी तो वह फूलकर तुरंत मर जाती थी।
➣ पेटू के रूप में भी प्रसिद्ध था। रात को सोते समय बिस्तर के दोनों तरफ खाना रखकर सोता था व नींद में खा लेता था।
➣ ऐसा कहा जाता है कि वह नाश्ते में एक कटोरा शहद, एक कटोरा मक्खन और सौ से डेढ़ सौ तक केले खाता था। वह दिन भर में 10 से 15 किलो भोजन खाता था।
➣ इसी प्रकार बार्थेमा ने उसके विषय में लिखा है कि उसकी मूंछ इतनी लंबी थी कि वह उन्हें अपने सर के पीछे बांधता था।
➣ बार्थेमा यह भी लिखता है कि “कैम्बे के राजकुमार का प्रतिदिन का भोजन एक गधा, वेसिलिस्क और मेंढ़क था। यह राजकुमार महमूद बेगड़ा ही था।
➣ एक इतालवी यात्री लुडोविको डी वारदेमा उसके राज्य में आया था, उसने भी इन कथाओं का उल्लेख किया है।
➣ 23 नवम्बर, 1511ई. को इसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र ख़लील ख़ाँ, मुजफ़्फ़रशाह द्वितीय की पदवी ग्रहण कर सिंहासन पर बैठा।
बहादुरशाह (1526-1537 ई.)
➣ यह गुजरात का अन्तिम शासक था। उसके काल में गुजरात की शक्ति चरम पर पहुंच गई। उसने 1531 ई. में मालवा को गुजरात में मिला लिया।
➣ बहादुरशाह ने 1528 ई. में अहमदनगर को जीतकर अपना खुतबा पढ़वाया। उसने दो रूमी उस्ताद तोपची मुस्तफा (रूमी खाँ) एवं ख्वाजा जफर (सालमनी) की सेवाएं प्राप्त की थी।
➣ बहादुरशाह ने 1531 ई. में तुर्की नौसेना की सहायता से पुर्तगालियों की नौसेना को दीव में पराजित किया। इस समय पुर्तगाली गवर्नर नूनो-द-कुन्हा था।
➣ बहादुरशाह ने 1534 ई. में मेवाड़ (चित्तौड़) पर भी आक्रमण किया। मेवाड़ की महारानी कर्णवती ने हुमायूँ को राखी भेजकर सहायता मांगी।
➣ 1535 ई. में मुगल बादशाह हुमायूँ ने बहादुरशाह को पराजित किया। हुमायूँ द्वारा गुजरात पर आक्रमण करने का मुख्य कारण यह था कि बहादुर शाह ने मुगलों के राजनीतिक शरणार्थियों को अपने दरबार में शरण प्रदान की थी।
➣ 13 फरवरी, 1537 ई. में पुर्तगालियों ने धोखे से बहादुरशाह की हत्या कर दी। उसके मृत्यु के साथ ही गुजरात के महान युग का अन्त हो गया।
➣ उसके बाद अनेक दुर्बल शासकों ने वहाँ शासन किया। अन्ततः 1572 ई. में मुगल शासक अकबर ने गुजरात को अपने साम्राज्य का अंग बना लिया।
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