बहमनी साम्राज्य (1347–1527 ई.) : इतिहास, प्रशासन एवं प्रमुख तथ्य

भारतीय इतिहास मध्यकालीन भारत बहमनी साम्राज्य (1347–1527 ई.)
📚 विषय सूची

दक्षिण भारत का प्रथम स्वतंत्र मुस्लिम साम्राज्य

➣ बहमनी साम्राज्य की स्थापना मुहम्मद बिन तुग़लक़ के शासन काल के अन्तिम दिनो में दक्कन में अमीरान-ए-सादाह के विद्रोह के परिणामस्वरूप 1347 ई. में हुई।

➣ दक्कन के सरदारों ने दौलताबाद के क़िले पर अधिकार कर इस्माइल अफ़ग़ान को नासिरूद्दीन शाह के नाम से दक्कन का राजा घोषित किया। इस प्रकार दक्कन का प्रथम स्वतन्त्र शासक ‘इस्माइल मख नासिरुद्दीन शाह’ था, लेकिन इस्माइल बूढ़ा और आराम तलब होने के कारण इस पद के अयोग्य सिद्ध हुआ।

➣ शीघ्र ही उसे अधिक योग्य नेता हसन गंगू (जफ़र ख़ाँ) को सरदारों ने 3 अगस्त, 1347 को अलाउद्दीन बहमनशाह के नाम से सुल्तान घोषित किया।

बहमनी साम्राज्य विस्तार
शासक संक्षिप्त परिचय
जाफर खाँ (अलाउद्दीन बहमन शाह)
(1347–1358 ई.)
बहमनी साम्राज्य का संस्थापक। 1347 ई. में दिल्ली सल्तनत से स्वतंत्र होकर बहमनी राज्य की स्थापना की तथा गुलबर्गा को राजधानी बनाया।
मुहम्मद शाह प्रथम
(1358–1373 ई.)
प्रशासन को सुदृढ़ किया तथा विजयनगर और वारंगल के विरुद्ध अनेक सफल सैन्य अभियान चलाए।
मुहम्मद शाह द्वितीय
(1378–1397 ई.)
शांतिप्रिय शासक था। शिक्षा, साहित्य और धार्मिक संस्थाओं को संरक्षण दिया तथा सांस्कृतिक विकास को बढ़ावा दिया।
ताजुद्दीन फ़िरोज़शाह बहमनी
(1397–1422 ई.)
बहमनी वंश का सबसे विद्वान शासक माना जाता है। विजयनगर से कई युद्ध लड़े तथा कला एवं साहित्य का संरक्षण किया।
अहमदशाह बहमनी
(1422–1436 ई.)
राजधानी गुलबर्गा से बीदर स्थानांतरित की। सूफी संत गेसूदराज के प्रति श्रद्धा के कारण ‘वली’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
अलाउद्दीन अहमद द्वितीय
(1436–1458 ई.)
उसके शासनकाल में दक्कनी एवं विदेशी अमीरों के बीच संघर्ष बढ़ा, जिससे साम्राज्य की आंतरिक स्थिति कमजोर हुई।
हुमायूँ शाह बहमनी
(1458–1461 ई.)
कठोर और क्रूर शासक था। उसके शासनकाल में राजनीतिक अस्थिरता और षड्यंत्र बढ़ गए।
निज़ाम शाह बहमनी
(1461–1463 ई.)
अल्पायु शासक था। शासन का अधिकांश कार्य उसकी माता और अमीरों द्वारा संचालित किया गया।
मुहम्मद शाह तृतीय बहमनी
(1463–1482 ई.)
महमूद गवाँ को प्रधानमंत्री बनाया। उसके शासनकाल में बहमनी साम्राज्य अपनी शक्ति और विस्तार के चरम पर पहुँचा।
शिहाबुद्दीन महमूद शाह बहमनी
(1482–1518 ई.)
महमूद गवाँ की मृत्यु के बाद साम्राज्य कमजोर होने लगा तथा दक्कन की पाँच स्वतंत्र सल्तनतों का उदय प्रारम्भ हुआ।
अहमदशाह चतुर्थ
(1518–1520 ई.)
कमजोर शासक था। उसके समय में केंद्रीय सत्ता का प्रभाव लगातार घटता गया।
अलाउद्दीनशाह
(1520–1523 ई.)
उसके शासनकाल में प्रांतीय सरदार अधिक शक्तिशाली हो गए और बहमनी सत्ता केवल नाममात्र रह गई।
कलीमुल्ला शाह
(1523–1527 ई.)
बहमनी वंश का अंतिम शासक। उसके शासनकाल में बहमनी साम्राज्य का पूर्ण विघटन हुआ और दक्कन की पाँच स्वतंत्र सल्तनतें स्थापित हो गईं।

जफर खाँ(1347 -1358 ई.)

➣ जफर खाँ नामक सरदार अलाउद्दीन हसन बहमन शाह की उपाधि धारण करके 1347 ई. में सिंहासनारूढ़ हुआ और बहमनी साम्राज्य की नींव डाली।

➣ फरिश्ता के अनुसार हसन प्रारम्भ में गंगू नामक ब्राह्मण का नौकर था अतः उसे हसन गंगू कहा गया। अन्य विचार के अनुसार वह अपने को पौराणिक ईरानी यौद्धा बहमन शाह का वंशज मानता था।

➣ उसने गुलबर्गा को अपनी नव-संस्थापित साम्राज्य की राजधानी बनाया तथा उसका नाम अहमदाबाद रखा एंव गुलबर्गा में जामी मस्जिद बनाई, जिसमें भारतीय एवं ईरानी वास्तुकला का मिश्रण है।

➣ अपने साम्राज्य के शासन के लिए उसने इसे चार तरफों अथवा प्रान्तों में विभाजित कर दिया- गुलबर्गा, दौलताबाद, बरार और बीदर।

➣ प्रत्येक प्रान्त एक शासक के अधीन था इसमें गुलबर्गा सबसे महत्त्वपूर्ण था जिसमें बीजापुर सम्मिलित था।

➣ जफर खाँ(1347 -1358 ई.) दक्षिण के हिन्दू शासकों को उसने अपने अधीन किया तथा अपने अनुयायियों को पद और जागीर प्रदान करने की नयी प्रथा प्रारम्भ की।

➣ अपने शासन के अन्तिम दिनों में बहमन शाह ने दाबुल पर अधिकार किया, जो पश्चिमी समुद्र तट पर बहमनी साम्राज्य से सबसे महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह था।

11 फरवरी, 1358 ई. उसकी मृत्यु हो गई।

मुहम्मद शाह प्रथम (1358-73 ई.)

➣ इसके शासन का अधिकांश समय दक्षिण के विजयनगर और उत्तर में वारंगल के काकतीय हिन्दू राजवंशों से युद्धों में ही बीता। उसके काल की मुख्य घटना विजयनगर तथा बारंगल से युद्ध तथा विजय थी।

➣ इसी के समय 1367 ई. मुदकल के किले पर बुक्का प्रथम के विरुद्ध युद्ध में पहली बार बारूद का प्रयोग किया गया था, जिससे रक्षा संगठन में एक नई क्रान्ति पैदा हुई।

➣ उसने अमीर-ए-जुमला (वित्तमंत्री) तथा वजीर-ए-अशरफ (विदेश मंत्री) भी नियुक्त किये। सेनापति को अमीर-उल-उमरा कहा जाता था, जिसके अधीन बारबरादारान होते थे, जो फौज जुटाते थे।

➣ सुल्तान के निजी अंगरक्षकों को खासखेल कहा जाता था।

मुज़ाहिद बहमनी (1358-78ई.) बहमनी वंश का तृतीय सुल्तान था। उसका चचेरा भाई दाऊद बहमनी उसका वध करके सिंहासन पर बैठ गया।

दाऊद (1378 -78ई.) भी अपने सिंहासनारोहण से एक वर्ष के भीतर ही एक ग़ुलाम द्वारा मार डाला गया।

मुहम्मद शाह द्वितीय (1378-97ई.)

➣ मुहम्मद शाह शान्तिप्रिय और विद्या-प्रेमी था। उसने अन्य राज्यों से कोई युद्ध नहीं किया। उसने प्रसिद्ध फारसी कवि हाफिज को गुलबर्गा आने का निमंत्रण दिया।

➣ उसने स्थापत्य में भी रूचि ली। उसने कई मस्जिदें बनवायीं और अनाथों के लिए निःशुल्क विद्यालयों की स्थापना की।

➣ दर्शन व कविता के प्रति अभिरूचि के कारण मुहम्मद शाह द्वितीय को दूसरे अरस्तू की उपाधि से विभूषित किया गया।

ग़यासुद्दीन बहमनी तथा शम्सुद्दीन बहमनी क्रमश: छठा व सांतवा बहमनी शासकों का काल अल्प रहा।

ताजुद्दीन फ़िरोजशाह बहमनी (1397-22 ई.)

➣ फ़िरोजशाह बहमनी वंश का सबसे योग्य शासक साबित हुआ। यह बहमनी वंश के सर्वाधिक विद्वान सुल्तानों में से एक था।

➣ फिरोज ने विजयनगर के शासक देवराय प्रथम को सोनार की बेटी के युद्ध में पराजित किया। देवराय प्रथम ने दस लाख हून, मोती व हाथी हर्जाने के रूप में दिये।

➣ देवराय ने अपनी पुत्री का विवाह फिरोज से किया व बंकापुर का क्षेत्र दहेज में दिया। फिरोज ने गौड़वाना क्षेत्र के खेरला शासक की पुत्री से भी इससे पहले विवाह किया।

➣ फिरोज विजय नगर से तीसरे युद्ध में पांगुल नामक स्थान पर देवराय प्रथम से पराजित हुआ। इस पराजय के बाद फिरोज के भाई अहमद शाह प्रथम ने उसे सिंहासन से हटा दिया व स्वयं शासक बना।

➣ फिरोज ने पश्चिम एशिया के मुसलमानों को आमन्त्रित कर प्रशासन में ऊँचे पद दिये, जिससे अमीर वर्ग अफाकी (विदेशी) व दक्कनी (घरीब/देशी) दो गुटों में बंट गया। कालांतर में इसी गुटबन्दी से बहमनी साम्राज्य का विघटन हुआ।

➣ अफाकी शिया थे व दक्कनी सुन्नी थे। अफाकियों में ईरानी, अरब व तुर्क थे।

➣ फिरोज ने भीमा नदी के किनारे फिरोजाबाद नगर एवं नक्षत्रशाला (जंतर- मंतर) की स्थापना की।

➣ फिरोजशाह अरबी, फारसी, तुर्की, तेलुगू, कन्नड़ एवं मराठी भाषाओं का जानकार था।

बुरहान ए मआसिर के लेखक के अनुसार फिरोजशाह कुरान की नकल की प्रतियां बेचकर आजीविका चलाता था।

➣ फिरोजशाह बहमनी का सबसे अच्छा कार्य प्रशासन में बड़े स्तर पर हिन्दुओं को सम्मिलित करना था। कहा जाता है कि इसी समय से प्रशासन में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करने लगे।

➣ फिरोज गुलबर्गा का अन्तिम सुल्तान था। इसके बाद अहमदशाह बहमनी ने राजधानी बीदर स्थान्तरित कर दी।

अहमदशाह बहमनी (1422-36 ई.)

➣ अहमदशाह बहमनी ने अपनी राजधानी गुलबर्गा सं हटाकर बीदर में स्थापित की तथा उसका नया नाम मुहमदाबाद रखा।

➣ उसने अपने सैनिक अभियान के अन्तर्गत विजयनगर साम्राज्य, वारंगल के हिन्दू राज्य एवं मालवा तथा कोंकण के हिन्दू राजाओं से युद्ध किये।

➣ अहमद ने वारंगल के शासक की हत्या कर वारंगल का स्वतन्त्र अस्तित्व समाप्त कर दिया। अहमद ने मालवा के हुशंग शाह को भी पराजित किया।

➣ उसके शासनकाल में दलगत राजनीति (दक्कनी एवं अफाकी) ने साम्प्रदायिक रूप लिया, क्योंकि सुल्तान ने ईरान से शिया सन्तों को भी आमंत्रित किया।

➣ खुरासान में स्थित इस्फरायीन का कवि शेख आजरी उसके दरबार में आया था।

➣ दक्षिण के प्रसिद्ध सन्त गेसूदराज से उसका घनिष्ठ सम्बन्ध था। गेसूदराज को बन्दा नवाज भी कहा जाता था। गेसूदराज दक्षिण का पहला विद्वान था जिसने उर्दू में मिरात-उल-आशिकी नामक ग्रन्थ लिखा।

➣ अहमद प्रथम ने सेना में मनसबदारी प्रथा शुरू की।

➣ शासन की दृष्टि से बहमनियों के इतिहास में अहमद प्रथम का शासनकाल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रहा; क्योंकि उसने अपने बड़े पुत्र जफर खाँ को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर ज्येष्ठता का सिद्धान्त स्थापित किया।

अलाउद्दीन अहमद द्वितीय (1436-1458 ई.)

➣ अलाउद्दीन अहमद अपने पिता अहमद प्रथम की भाँति योग्य एवं संकल्प युक्त शासक नहीं था। उसके शासन काल में अफाकियों के आगमन पहले से कहीं अधिक बढ़ गये।

➣ इसी के काल में ईरानी (अफाकी) महमूद गवाँ का उत्कर्ष हुआ। वह पहले एक व्यापारी था। उसे व्यापारियों के प्रमुख ( मलिक उत् तुज्जार) की उपाधि मिली। उसको नालकोण्डा के विद्रोह का दमन करने के लिए नियुक्त किया गया था।

➣ इसी के काल में उड़ीसा के गजपति नरेशों की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा का सूत्रपात हुआ और दक्षिण की ओर उनके विस्तारवाद के परिणामस्वरूप बहमनी एवं गजपति सेनाओं से कई बार युद्ध हुआ।

➣ उसने मस्जिदों, सार्वजनिक विद्यालयों एवं दातव्य संस्थाओं की स्थापना की, अपनी राजधानी बीदर में एक अस्पताल का निर्माण भी करवाया।

➣ उसने वहाँ दो सुन्दर गाँव धार्मिक दान के रूप में दिये थे, ताकि इन गाँवों के राजस्व को पूर्णतः दवाओं एवं पेय पदार्थों की आपूर्ति में लगाया जा सके।

हुमायूँ शाह बहमनी (1458 -61ई.)

➣ यह अलाउद्दीन का पुत्र था तथा इतना क्रूर था कि उसे जालिम की उपाधि दी गई। इसे दक्कन का नीरो भी कहा जाता था।

➣ हुमायूँ ने महमूद गवां को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया तथा एक प्रशासनिक परिषद की नियुक्ति की जिसमें राजमातागवाँ सहित चार व्यक्ति थे।

निज़ाम शाह बहमनी (1461-63ई.)

➣ 1461 ई. में अपने पिता सुल्तान हुमायूं की मृत्यु के बाद वह सिंहासनासीन हुआ। इसका शासनकाल अल्प रहा। दो वर्ष में ही उसकी मृत्यु हो गई।

➣ गद्दी पर बैठने के समय वह अल्पवयस्क था। इसलिए संचालन व्यवस्था पिता द्वारा स्थापित प्रशासनिक परिषद के पास था। इस परिषद का शासन 1461 ई. से 1463 ई. तक रहा।

➣ इस परिषद में राजमाता मकदूम-ए-जहाँ, महमूद गवाँख्वाजा जहाँ थे। राजमाता मकदूम-ए-जहाँ ने सत्ता की बागडोर अपने हाथ में रखी थी।

➣ कालान्तर में उड़ीसा तथा ख़ानदेश की संयुक्त सेना के साथ मालवा के शासक महमूद ख़िलजी ने दक्कन पर आक्रमण कर बीदर को क़ब्ज़े में ले लिया।

➣ सुल्तान के परिवार को फिरोजाबाद में शरण के लिए जाना पड़ा, परन्तु कूटनीतिज्ञ सरदार महमूद गवाँ ने गुजरात के सहयोग से मालवा के सुल्तान को परास्त कर दिया।

मुहम्मद बहमनी शाह तृतीय (1463 -82ई.)

➣ निज़ाम शाह बहमनी का छोटा भाई मुहम्मद बहमनी शाह तृतीय 9 वर्ष की अवस्था में सिंहासन पर बैठा था। महमूद गवाँ इसका प्रधानमंत्री था।

➣ उसके शासन काल में ख्वाजा-ए-जहाँ की मृत्यु हो गई। तत्पश्चात् महमूद गवाँ को ख्वाज़ा-ए-जहाँ की उपाधि प्रदान की गई और गवाँ बीजापुर का तरफदार (गवर्नर) नियुक्त किया।

➣ महमूद गवाँ ने अपरमित राजभक्ति से बहमनी राज्य की सेवा की तथा कुशल कूटनीति व सैनिक नेतृत्व से उसे ऊंचाइयों पर पहुँचा दिया।

➣ महमूद गवाँ ने अपने कुशल नेतृत्व व सैन्य शक्ति के बल पर बहमनी साम्राज्य का विस्तार किया। उसने मालवा को पराजित किया।

➣ महमूद गवाँ की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि 1472 ई. में गोवा पर अधिकार थी। गोवा विजयनगर के अधिकार में था। गोवा पश्चिमी समुद्र तट का सर्वाधिक प्रसिद्ध बन्दरगाह था। 1473 ई. में उसने बेलगाँव/बेलगाम जीता, विजयनगर से दाभोल भी जीता।

➣ महमूद गवाँ ने नवविजित प्रदेशों सहित भूतपूर्व चार तरफों (प्रान्तों) को आठ तरफों (प्रान्तों) में विभाजित किया-
1.बरार को गाविल और माहुर,
2.गुलबर्गा को बीजापुर एवं गुलबर्गा,
3.दौलताबाद को दौलताबाद एवं जुन्नार तथा
4.तेलंगाना को राजसमुद्री और वारंगल के रूप में।

➣ महमूद गवाँ ने प्रान्तीय गवर्नरों के अधिकारों पर नियंत्रण रखा तथा उनसे कुछ प्रदेश लेकर खालसा भूमि में परिवर्तित किया। गवर्नर के अधीन केवल एक ही किला रहने दिया।

➣ महमूद गवाँ ने भूमि की व्यवस्थित पैमाइश, ग्रामों के सीमा निर्धारण और लगान-निर्धारण की जाँच कराई।

➣ महमूद गवाँ साहित्यिक एवं सांस्कृतिक सुरुचि सम्पन्न व्यक्ति था। उसने शैजत-उल-इंशा तथा दीवान-ए-अक्त नामक दो ग्रन्थों की रचना की थी। उसने बीदर में एक महाविद्यालय की स्थापना की।

➣ महमूद गवाँ ने अपनी राजनीतिक गतिविधियों को न केवल बहमनी साम्राज्य तक सीमित किया, अपितु उसके बाहर ईरान, मिस्र और टर्की के सुल्तानों के साथ पत्र व्यवहार भी किया। इन पत्रों को रियाजुल इन्शा कहा जाता था।

➣ इस महान व्यक्ति का अन्त दुःखद रहा। महमूद गवाँ अफाकियोंदक्कनियों के बीच की दलीय गुटबन्दी का शिकार हो गया और मुहम्मद शाह तृतीय ने इसे 1481 में मृत्युदण्ड दे दिया।

➣ महमूद गवाँ की मृत्यु के दो दशक के भीतर बहमनी साम्राज्य का तीव्र गति से पतन प्रारम्भ हो गया और पन्द्रहवीं शताब्दी के अन्त तक बहमनी साम्राज्य का पतन हो गया।

रूसी यात्री निकितिन ने मुहम्मद तृतीय के काल में बहमनी साम्राज्य की यात्रा की।

शिहाबुद्दीन महमूद शाह बहमनी (1482–1518 ई.)

➣ इसके शासन काल में प्रान्तीय तरफदारों ने अपने स्वतन्त्रता घोषित करना प्रारम्भ कर दिया और पन्द्रहवीं शताब्दी के अन्त तक बहमनी साम्राज्य खण्डित हो गया।

➣ सुल्तान शिहाबुद्दीन महमूद द्वारा कासिम बरीद को वजीर या प्रधानमंत्री नियुक्ति करने के बाद बहमनी साम्राज्य का विघटन हो गया और उसके स्थान पर पाँच नवीन राजवंशों का उदय हुआ।

➣ सबसे पहले बरार ने 1484 ई. में स्वतन्त्रता की घोषणा की, परन्तु बीजापुर सबसे पहले स्वतन्त्र हुआ।

➣ मुहमूद शाह बहमनी और उसके शेष उत्तराधिकारी दक्कन की लोमड़ी कहे जाने वाले तुर्क सरदार अमीर अली वरीद के हाथ की कठपुतली बनकर रह गए।

➣ अन्य बहमनी शासक अहमदशाह चतुर्थ (1518-1520 ई.), अलाउद्दीनशाह (1520-1523 ई.) और कलीमुल्ला शाह (1523-1527 ई.) हुए।

➣ कलीमुल्ला बहमनी शाह, बहमनी वंश का अंतिम सुल्तान था। यह बहमनी साम्राज्य का नाम मात्र का ही शासक सिद्ध हुआ था।

➣ इसने अपने राज्य को बचने के लिए बाबर से मदद मांगी थी। लेकिन बाबर इन इसपर ध्यान नहीं दिया अंत में यह 1527 ई. में बीजापुर भाग गया।

बहमनी प्रशासन

➣ बहमनी साम्राज्य प्रान्तो में बंटा हुआ था, जिन्हें तरफ कहा जाता एवं सूबेदार को तरफदार कहा जाता था।

➣ प्रान्तों का विभाजन सरकार, परगना एवं ग्रामों में हुआ था।

➣ सुल्तान की सहायता के लिए 8 मंत्री होते थे।-

प्रधानमंत्री वकील-उस-सल्तनत
वित्तमंत्री अमीर-ए- जुमला
उपवित्तमंत्री नाजिर
विदेश मंत्री वजीर-ए-अशरफ
न्यायाधीश एवं धार्मिक कार्य सद्र-ए-जाहर
सेनापति अमीर-उल-उमरा

➣ अमीर उल उमरा के नीचे बारबरदान होते थे जो आवश्यकता के समय सेनाओं को इकट्ठा करते थे।

➣ पेशवा वजीर ए कुल एवं प्रधानमंत्री कार्यालय से सम्बन्धित था।

सैफद्दीन गोरी प्रथम पाँच बहमनी शासकों के काल में मंत्री रहा तथा महमूद गवाँ अन्तिम तीन वास्तविक बहमनी शासकों (अलाउद्दीन अहमद द्वितीय, हुमायूँ व मुहम्मद तृतीय) के काल में प्रमुख अधिकारी व प्रधानमंत्री रहा।

➣ बहमनी राज्य की मुद्रा हूण थी।

महमूद शाह तृतीय (1482-1518 ई.) के काल में एक विदेशी तुक सरदार अमीर अली बरीद का पिता कासिम बरीद प्रधानमंत्री था।

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