➣ तुलुव वंश विजयनगर का तीसरा राजवंश था। इसकी स्थापना वीर नरसिंह ने की थी। तुलुव वंश के कुल छह शासकों ने 60 वर्ष तक शासन किया।
➣ कृष्ण देव राय केवल तुलुव वंश का नहीं बल्कि विजयनगर साम्राज्य का महानतम शासक था। तिरुमल तुलुव वंश का अन्तिम शासक था।
वीर नरसिंह (1505-1509 ई.)
➣ वीर नरसिंह तुलुव वंश का संस्थापक था। इसने केवल 4 वर्ष तक शासन किया। इम्माड़ि-नरसिहं की हत्या कर सिंहासन पर अधिकार करने के कारण उसके विरुद्ध असंतोष फैल गया।
➣ वीर नरसिंह अपने अल्प शासन काल में आन्तरिक विद्रोहों व वाह्य आक्रमणों का मुकाबला करता रहा।
➣ वीर नरसिंह ने भुजबल की उपाधि ग्रहण की थी। पुर्तगाली गवर्नर अल्मीड़ा से उसके द्वारा लाए गए सभी घोड़ों को खरीदने हेतु एक समझौता किया।
➣ उसने विवाह कर को हटा कर एक उदार नीति शुरू किया था। पुर्तगाली यात्री नूनिज द्वारा वीर नरसिंह का वर्णन एक धार्मिक राजा के रूप में किया गया है, जो पवित्र स्थानों पर दान किया करता था।
➣ 1509 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद इसका छोटा भाई कृष्ण देव राय शासक सिंहासनारूढ़ हुआ।
कृष्णदेव राय (1509-1529 ई.)
➣ कृष्णदेव राय 1509 ई. में गद्दी पर बैठा। कृष्ण देवराय का शासनकाल विजयनगर राज्य के ऐश्वर्य व शक्ति का चर्मोत्कर्ष था। वह विजयनगर साम्राज्य का महानतम शासक हुआ।
राणा साँगा (1509 – 1528 ई.) एंव कृष्णदेव राय (1509-1529 ई.) दोनों एक दुसरे के समकालीन थे जहाँ उत्तर-भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक राणा सांगा थे वहीँ दक्षिण भारत में कृष्ण देवराय सबसे शक्तिशाली शासक हुए।
➣ बाबर ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा में जिन भारतीय राज्यों का उल्लेख किया है, उनमें 5 मुस्लिम (बंगाल, दिल्ली, मालवा, बहमनी व गुजरात) तथा 2 हिन्दू राज्य (मेवाड़ व विजयनगर) थे।
बाबर ने विजयनगर के शासक कृष्णदेव राय को तत्कालीन भारत का सबसे शक्तिशाली शासक कहा है।
सैन्य अभियान
➣ उस समय तक बहमनी राज्य 5 राज्यों में विभाजित गया था। वे सभी विजयनगर के शत्रु थे। उड़ीसा का गजपति नरेश प्रतापरुद्र का उदयगिरि के तटवर्ती क्षेत्रों पर अधिकार था।
➣ 1509-10 ई. में कृष्णदेव राय की कठिनाईयों का लाभ उठाकर बीदर के सुल्तान मुहम्मदशाह ने विजयनगर पर आक्रमण किया। किन्तु अदोनी के निकट विजयनगर की सेनाओं ने उसे पराजित किया।
➣ इसी युद्ध में बीजापुर के शासक युसुफ आदिल शाह मारा गया। आदिशाह की मृत्यु के बाद बीजापुर में अव्यवस्था फैल गयी क्योंकि युसुफ आदिल का उत्तराधिकारी इस्माइल अल्पव्यस्क था।
➣ इस स्थिति का लाभ उठाकर कृष्णदेव राय ने 1512 ई. में रायचूर व गुलबर्गा के किले पर अधिकार कर लिया। तत्पश्चात् उसने बीदर पर आक्रमण कर बहमनी शासक महमूद शाह को कासिम बरीद के अधिकार से निकाल कर पुनः सिंहासनारूढ़ किया और देवराय ने स्वंय यवनराज्य स्थानाचार्य की उपाधि ग्रहण की।
➣ गजपतियों को पराजित कर कृष्णदेव राय ने वहां से बालकृष्ण की मूर्ति विजय स्मारक के रूप में ले आया तथा विजयनगर में कृष्णस्वामी मंदिर में एक रत्नजड़ित मंडप में प्रतिमा की स्थापना की।
➣ 1513-1518 ई. के बीच कृष्णदेव राय ने उड़ीसा के गजपति शासक प्रतापरुद्र देव से कम से कम चार बार पराजित किया और उदयगिरी, तेलंगाना, वारंगल, राजमुन्द्री, कोंडपल्लि व कोण्डाविदू जीतकर अपने राज्य क्षेत्रों को पुनः प्राप्त किया।
➣ पराजय से निराश प्रतापरुद्र देव ने कृष्णदेव राय से संधि की याचना कर उसके साथ अपनी पुत्री का विवाह कर दिया। प्रतापरूद्र देव पर विजय के उपलक्ष में कृष्णदेव ने विजय भवन (सिंहासन मंच) का निर्माण करवाया।
➣ गोलकुण्डा के सुल्तान कुली कुतुबशाह को कृष्णदेव राय ने सालुव तिम्म के द्वारा परास्त करवाया।
➣ कृष्णदेव राय का अन्तिम सैनिक अभियान बीजापुर के सुल्तान इस्माइल आदिलशाह के विरुद्ध था। उसने आदिल को परास्त कर गुलबर्गा के प्रसिद्ध क़िले को ध्वस्त कर दिया।
➣ 1520 ई. तक कृष्णदेव राय ने अपने समस्त शत्रुओ को परास्त कर दिया।
पुर्तग़ालियों से सम्बन्ध
➣ कृष्ण देवराय के पुर्तगालियों से अच्छे सम्बन्ध थे व उनसे सबसे पहले सन्धि की क्योंकि वे घोड़ों की आपूर्ति करते थे तथा विजय की भांति पुर्तगालियों की भी बहमनी साम्राज्य से शत्रुता थी।
➣ मालाबार में पुर्तगालियों ने कालीकट के जमोरिन की शक्ति की अवज्ञा की और कोचीन व कानानोर में अपने मोर्चेबंद कारखाने स्थापित किए।
➣ उन्होंने 1509 ई. में कालीकट तथा मिस्र की संयुक्त नौसेना को भी पराजित कर दिया तथा भारतीय समुद्रों में अपनी प्रभुसत्ता स्थापित की।
➣ पुर्तगाली अपनी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए विजयनगर की सहायता चाहते थे।
➣ 1510 ई. पुर्तगाली अल्बुकर्क ने अपने एक दूत फादर लुई को कालीकट के विरुद्ध युद्ध संबंधी समझौता करने और भत्कल व मंगलौर के मध्य एक कारखाने की अनुमति मांगने के लिए कृष्णदेव राय के पास भेजा।
➣ अरब एवं फ़ारस से होने वाले घोड़ों के व्यापार पर पुर्तग़ालियों का पूर्ण अधिकार था। इन सुविधाओं के बदले कृष्णदेव राय ने पुर्तग़ालियों से गोवा की विजय में सहायता तथा घोड़ों की पूर्ति का एकाधिकार देने का वचन लिया।
विदेशी यात्री
➣ पुर्तगाली यात्री एडवर्डी बारबोसा व डोमिंगो पायस कृष्णदेव राय के समय में भारत आए तथा विजयनगर की यात्रा की थी।
➣ इतालवी यात्री पाएस कृष्णदेव के दरबार में अनेक वर्षों तक रहा। वह यह कहता है कि- वह महान् शासक और न्याय प्रिय शासक है, लेकिन उसे क्रोध बहुत जल्दी आता था।
रचनाएं
➣ कृष्णदेव राय एक महान् विद्वान, विद्या प्रेमी और विद्वानों का उदार संरक्षक भी था, जिसके कारण वह अभिनव भोज या आंध्र भोज एवं आन्ध्र पितामह के रूप में प्रसिद्ध था।
➣ उसने तेलुगु के प्रसिद्ध ग्रंथ अमुक्त माल्यद(मोतियों की माला) या विस्वुवितीय की रचना की। उसकी यह रचना तेलुगु के पाँच महाकाव्यों में से एक है।
➣ आमुक्त माल्यद ग्रन्थ को विष्णुचितीय एवं विस्ववितीय भी कहा गया है। इसमें कृष्णदेव राय के राजनैतिक विचारों एवं प्रशासनिक नीतियों का विवेचन है। इस ग्रन्थ में विष्णु के अवतार रंगनायक एवं आलवार महिला संत अंडाल के विवाह का वर्णन है।
➣ वह तेलुगु के साथ संस्कृत का भी अच्छा विद्वान् था। उसने संस्कृत में जाम्बवती कल्याणम्, उषा परिणय तथा मदालसा चरित्र नामक पुस्तकों की भी रचना की।
➣ उषा परिणय नाटक में उषा एवं अनिरूद्ध के विवाह का वर्णन है।
साहित्य के क्षेत्र में कृष्णदेव राय के काल को तेलुगु साहित्य का क्लासिकी युग कहा गया है।
➣ कृष्णदेवराय के दरबार में 8 तेलगू विद्वान रहते थे जिन्हें अष्ट दिग्गज कहा जाता था।
अष्टदिग्गज एवं उनकी रचनाएं
➣ उसके दरबार में तेलुगू के आठ महान् विद्वान एवं कवि रहते थे जिन्हें अष्टदिग्गज कहा जाता था। इसका समय तेलुगू साहित्य का शास्त्रीय युग माना जाता है।
| 1. अल्लासीनपेदन | मनुचरित्र, स्वारोचित सम्भव, हरिकथा सार |
| 2. नन्दी तिम्मन | पारिजात हरण |
| 3. भट्टमूर्ति | नरस भूपालियम |
| 4. धूर्जटि | कलहस्ति महात्म्य |
| 5. मादय्यागिरी मल्लन | राजशेखर चरित |
| 6. अच्चलराजु रामचन्द्र रामाय्युदयम | सकल कथा सार संग्रह |
| 7. पिंगलीसूरन | राघव पाण्डवीय |
| 8. तेनाली रामकृष्ण | पाण्डुरंग माहत्म्य |
➣ अष्टदिग्गज में सर्वाधिक महत्वपुर्ण अल्लसानि पेद्दन था जो संस्कृत एवं तेलुगू दोनों भाषाओं का ज्ञाता था। पेड्डाना को आन्ध्रकविता एवं तेलुगू कविता का पितामह भी कहा जाता है।
स्थापत्य कला
➣ कृष्ण देवराय जहां-जहां गए, वहां प्राचीन मन्दिरों का जीर्णोद्धार किया, उनमें राजगोपुरम का निर्माण कराया तथा नए मन्दिर बनवाए। इसमें हजारा मंदिर (राम को समर्पित) व विवृद्धल स्वामी (कृष्ण) के मंदिर प्रमुख हैं।
➣ नीलकण्ठ शास्त्री के अनुसार चिदम्बरम मन्दिर का निर्माण कृष्णदेवराय ने कराया था।
➣ कृष्णदेवराय का राजदरबार भुवन विजय (विश्व विजय) था। प्रतिवर्ष भुवन विजय में बसन्त उत्सव मनाया जाता, जहां कवियों को सम्मानित किया जाता था।
➣ कृष्णदेव राय ने राजधानी के दक्षिणी सीमांत पर अपने मां के नाम पर नांगलपुर तथा पत्नी की स्मृति पर होस्पेट नामक नगर बसाया था।
➣ 1529 ई. में देव राय की मृत्यु हो गयी।
अन्य
➣ कृष्णदेवराय की वैष्णव धर्म में आस्था थी। वह अन्य धर्मों के प्रति भी उदार था।
➣ कृष्णदेवराय के राजगुरु का नाम व्यास राज था। उसका प्रधानमंत्री महाप्रधान था।
➣ कृष्णदेवराय की दो रानियां तिरूमला देवी और चिन्ता देवी थी।
➣ कृष्णदेव ने बंजर एवं जंगली भूमि को कृषि योग्य बनाने का प्रयत्न किया तथा विवाह कर जैसे अलोकप्रिय कर को समाप्त किया।
➣ कृष्णदेव राय ने भूमि का विस्तृत सर्वेक्षण कराया तथा कर निर्धारण किया। कृष्णदेवराय के अनुसार राज्य की आय चार बराबर भागों में बांटी जानी चाहिए।
अच्युत राय (1529-1542 ई.)
➣ कृष्णदेव राय अपनी मृत्यु के पूर्व ही अपने चेचेरे भाई अच्युत देव राय को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया क्योंकि उसका एकमात्र पुत्र जो 18 महीने का था सिंहासन के योग्य नहीं था।
➣ किन्तु कृष्णदेव राय के जमाता, रामराय को यह व्यवस्था पसंद नहीं थी। उसने अपने साले सदाशिव का दावा प्रस्तुत किया जबकि अच्युतदेव राय के साले राज तिरुमल व चिन तिरुमल ने अच्युत का समर्थन किया। फलस्वरूप गृहयुद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गयी।
➣ रामराय के प्रयत्नों को विफल करने के लिए अच्युत देवराय ने अपना दो बार राज्याभिषेक दो अलग-अलग स्थलों पर करवाया था।
➣ अन्त में अच्युत देवराय ने रामराय को शासन में सहभागी बनाकर सत्ता के लिए संघर्ष को समाप्त किया।
➣ अच्युतदेवराय के दरबारी कवि राजनाथ डिंडिम ने संस्कृत काव्य अच्युतारायभ्युदय में अच्युतदेवराय की उपलब्धियों का वर्णन किया है।
➣ तिरूवलाब्मा देवी ने वरदम्बिका परिणय में अच्युतदेवराय एवं उसकी रानी वरदम्बिका के विवाह का वर्णन है।
➣ उसने अपने शासन काल में बीजापुर के शासक इस्माइल आदिल ख़ान से रायचूर एवं मुद्गल के क़िले को छीन लिया।
➣ गजपति शासक के आक्रमण को असफल किया और साथ ही 1530 ई. में गोलकुण्डा के सुल्तान को पराजित किया।
➣ अच्युतदेव राय के समय में ही पुर्तगालियों ने तूतीकोरिन के मोती उत्पादक क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। इसी के समय में पुर्तगाली यात्री नूनीज ने भारत की यात्रा की थी। वह कुछ समय तक अच्युतदेव राय के दरबार में भी रहा।
➣ नूनीज घोड़े का व्यापारी था। उसने अपनी पुस्तक क्रानिकल ऑफ फर्नास नूनीज में विजयनगर साम्राज्य के प्रारम्भ से लेकर अच्युतदेवराय के शासन के अंतिम वर्षों का इतिहास प्रस्तुत किया है।
➣ राजनाथ डिंडिम अच्युत देवराय का दरबारी कवि था। उसने व्यक्तित्व व कृतित्व पर आधारित अच्युतरायम्युदय नामक संस्कृत काव्य की रचना की थी।
➣ अच्युतदेवराय ने महामण्डलेश्वर नामक नये अधिकारी की नियुक्ति की।
➣ रामराय ने तिरुमल को कई युद्धों में परास्त कर अच्युतदेव राय के भतीजे सदाशिवराय को गद्दी पर बैठाया।
➣ अच्युतदेव राय का विवाह पाण्ड्य राजकुमारी वरदाम्बिका से हुआ था। 1542 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी।
➣ उसकी मृत्यु के बाद अच्युत के साले सलकराज तिरुमल ने अच्युत के अल्पायु पुत्र वेंकट प्रथम को सिंहासन पर बैठाया। उसका शासन काल मात्र 6 महीने तक रहा।
➣ इसके बाद विजयनगर साम्राज्य की सत्ता अच्युत के भतीजे सदाशिव राय के हाथों में आ गई।
सदाशिव राय (1542-1570 ई.)
➣ सदाशिव तुलुव वंश का अन्तिम शासक था। यह कठपुतली शासक था। सदाशिव राय के शासन काल में वास्तविक सत्ता रामराय के हाथों में थी।
➣ शासन पर अपना नियंत्रण रखने के लिए उसने पुराने विश्वासपात्र अधिकारियों को हटाकर उनके स्थान पर अपने व्यक्तियों को नियुक्त किया।
➣ सरामराय ने सेना में मुसलमानों की भर्ती की एवं पुर्तगालियों के साथ कभी मैत्री एवं कभी संघर्ष किया।
विजयनगर काल में सबसे ज्यादा मुसलमानों की भर्ती रामराय ने की थी।
➣ रामराय ने विजयनगर की परम्परा के विपरीत पड़ोसी मुस्लिम राज्यों की आन्तरिक राजनिति में हस्तक्षेप किया। उसका यह हस्तक्षेप विजयनगर साम्राज्य के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ।
➣ रामराय ने नीतिगत परिवर्तन किया व दक्कन के सुल्तानों के झगड़े में सक्रिय हस्तक्षेप किया। 1558 ई. में रामराय ने बीजापुर व गोलकुण्डा के साथ मिलकर अहमदनगर को लूटा।
➣ इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप ही प्रसिद्ध तालीकोटा का युद्ध हुआ जिसने विजयनगर साम्राज्य को विध्वंस कर दिया। बीजापुर के अली आदिलशाह इस संघ के मुखिया थे।
तालीकोटा/राक्षस तंगडी का युद्ध-1565
➣ तालीकोटा का युद्ध 25 जनवरी, 1565 ई. को विजयनगर साम्राज्य व् मुस्लिम संघ अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुण्डा और बीदर के विरुद्ध हुआ। इस युद्ध को राक्षसी तंगड़ी का युद्ध और बन्नीहट्टी का युद्ध के नाम से भी जाना जाता है।
➣ गोलकुण्डा और बरार के मध्य पारस्परिक शत्रुता के कारण बरार इसमें शामिल नहीं था।
➣ इस संघ का नेतृत्व कर रहे अली आदिलशाह ने रामराय से रायचूर, मुद्गल, अदोनी किलो की वापसी की मांग कर की। जिसे रामराय ने ठुकरा दिया।
➣ रामराय द्वारा माँग ठुकराये जाने पर दक्षिण के सुल्तानों की संयुक्त सेना राक्षसी-तंगड़ी की ओर बड़ी, जहाँ पर 25 जनवरी, 1565 को रामराय एवं संयुक्त मोर्चे की सेना में भंयकर युद्ध प्रारम्भ हुआ।
➣ युद्ध के दौरान रामराय के दो मुस्लिम सेनापति गिलानी बंधु विरोधी सेना में सम्मिलित हो गये।
➣ युद्ध क्षेत्र में ही सत्तर वर्षीय रामराय को घेर कर मार दिया गया। युद्ध में रामराय की हत्या हुसैन शाह ने की थी। रामराय का भाई वेंकटाद्रि भी मारा गया।
➣ तालीकोटा के युद्ध के साथ ही दक्षिण में हिन्दू राज्य विजयनगर का वैभव समाप्त हो गया।
➣ तालीकोटा युद्ध को क्रस्न का युद्ध भी कहा जाता है। इतिहासकार एन. वेंकटरमण्य ने इस युद्ध को विजयनगर के इतिहास का वाटरलू कहा है।
➣ रॉबर्ट सेवेल (1845-1925 ई.) ने अपनी पुस्तक ए फारगोटेन एम्पायर में विजयनगर का इतिहास एवं तालीकोटा युद्ध का वर्णन करते हुए लिखा है कि “संसार के में कभी भी इतने वैभवशाली नगर का इस प्रकार सहसा सर्वनाश नहीं किया गया, जैसा कि विजयनगर का।”
➣ सेवेल जो इस युद्ध का प्रत्यक्षदर्शी था जिसने ए. फारगटन एम्पायर नामक पुस्तक की रचना की है। तालिकोटा के युद्ध के तत्काल बाद विदेशी यात्री सीजर फ्रेडरिक ने विजयनगर की यात्रा की एवं स्थिति का वर्णन किया।
➣ तालिकोटा के युद्ध (1565 ई.) में रामराय की मृत्यु के पश्चात् विजयनगर की संयुक्त बहमनी सेना (बहमनी सुल्तानों का गठबंधन) ने विजयनगर नगर में प्रवेश कर उसे पूरी तरह से नष्ट कर दिया।
➣ शहर को लूटा गया, मंदिरों और महलों को तोड़ा गया तथा आग लगा दी गई। इस विनाश को भारतीय इतिहास के सबसे भयावह और विनाशकारी युद्धों में से एक माना जाता है।
➣ रामराय का भाई तिरुमल (तिरुमल देव) ने युवराज सदाशिव राय को लेकर पेनुकोंडा चला गया तथा वहीं से शासन करने लगा।
➣ उसने पेनुकोंडा को अस्थायी राजधानी बनाया और विजयनगर साम्राज्य को पुनः संगठित करने का प्रयास किया, हालांकि राज्य की पूर्व शक्ति अब लौट नहीं पाई।
➣ कालांतर में तिरुमल (तिरुमल देव राय) ने 1570 ई. में सदाशिव राय की मृत्यु के बाद (कुछ स्रोतों के अनुसार सिंहासन छीनकर) विजयनगर के सिंहासन पर अधिकार कर लिया तथा अरविदु वंश (चौथे और अंतिम वंश) की नींव रखी, जिसे कर्णाट राजवंश के नाम से भी जाना जाता है।
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