➣ यह विजयनगर का दूसरा राजवंश था जिसका संस्थापक सालुव नरसिंह था।
सालुव नरसिंह (1485-1490 ई.)
➣ विजयनगर साम्राज्य के तीसरे राजवंश सालुव वंश की स्थापना सालुव नरसिंह ने की। यह विजयनगर के इतिहास में महत्वपूर्ण मोड़ था क्योंकि इससे पहले संगम वंश का शासन था, परंतु संगम वंश के अंतिम शासकों के समय राज्य में अव्यवस्था और कमजोरी फैल गई थी।
➣ सालुव नरसिंह मूलतः चंद्रगिरि का एक शक्तिशाली सामंत (सेनापति) था। संगम वंश के अंतिम शासक की निर्बलता और प्रशासनिक अव्यवस्था का लाभ उठाते हुए उसने बलपूर्वक राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया।
➣ यह विजयनगर के इतिहास में पहली बार था जब सत्ता बलपूर्वक (हड़पकर) प्राप्त की गई थी, न कि वंशानुगत उत्तराधिकार से। सत्ता हस्तांतरण की इस प्रक्रिया का उल्लेख समकालीन इतिहासकार निकोलो कोंटी और बाद के स्रोतों में मिलता है।
➣ सत्ता प्राप्त करने के पश्चात् सालुव नरसिंह के सामने सबसे बड़ी चुनौती राज्य की आंतरिक अव्यवस्था थी। उसने सर्वप्रथम विजयनगर के सामंत शासकों और विद्रोही नायकों के विद्रोहों का सुदृढ़ता से दमन किया, जिससे केंद्रीय सत्ता पुनः मजबूत हुई।
➣ इन आंतरिक विद्रोहों को कुचलने में उसके दो प्रमुख सेनापतियों नरसा नायक और तुलुव ईश्वर नायक की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जो आगे चलकर विजयनगर के इतिहास में अत्यंत प्रभावशाली बने।
➣ आंतरिक स्थिरता प्राप्त करने के बाद उसने विदेशी आक्रमणों का मुकाबला किया। इस समय उड़ीसा का गजपति शासक पुरुषोत्तम गजपति अत्यंत शक्तिशाली बन चुका था और दक्षिण भारत के क्षेत्रों पर अपना विस्तार कर रहा था।
➣ पुरुषोत्तम गजपति ने विजयनगर पर आक्रमण किया तथा सालुव नरसिंह को युद्ध में पराजित कर बंदी बना लिया। यह विजयनगर साम्राज्य के लिए अत्यंत अपमानजनक घटना थी।
➣ बंदी अवस्था में सालुव नरसिंह ने अपनी मुक्ति के लिए गजपति शासक से याचना (प्रार्थना) की। उसकी प्रार्थना स्वीकार कर उसे मुक्त कर दिया गया, परंतु इस संधि की शर्त के रूप में सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण उदयगिरि का प्रदेश गजपतियों के अधिकार में चला गया, जो विजयनगर के लिए एक बड़ी क्षेत्रीय हानि थी।
➣ इस पराजय से निराश हुए बिना सालुव नरसिंह ने अपनी सैन्य शक्ति को पुनः सुदृढ़ करने का प्रयास किया। भारत में उत्तम नस्ल के घोड़ों की कमी थी, इसलिए उसने अरब व्यापारियों को प्रलोभन और प्रोत्साहन देकर अधिक से अधिक घोड़े आयात करने हेतु प्रेरित किया।
➣ इस नीति से विजयनगर की घुड़सवार सेना की गुणवत्ता और संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जिससे भविष्य में राज्य की सैन्य क्षमता मजबूत हुई।
➣ सालुव नरसिंह ने कर्नाटक के तुलव प्रदेश (वर्तमान दक्षिण कन्नड़ क्षेत्र) पर सफलतापूर्वक विजयनगर की सत्ता स्थापित की, जिससे साम्राज्य की सीमाओं का पुनः विस्तार हुआ।
➣ 1490 ई. में सालुव नरसिंह की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के पश्चात् उसके सेनापति नरसा नायक ने वास्तविक सत्ता पर नियंत्रण स्थापित कर लिया, जिससे शीघ्र ही तुलुव वंश के उदय की पृष्ठभूमि तैयार हुई।
सालुव नरसिंह के उत्तराधिकारी
➣ बंदी राजा के नाम पर नरसा नायक ने अगले 12-13 वर्षों तक अत्यंत सफलतापूर्वक शासन किया। इस दौरान उसने सालुव नरसिंह के काल में खोए हुए विजयनगर के प्रदेशों को पुनः अपने अधिकार में लिया, जिससे साम्राज्य की प्रतिष्ठा फिर से स्थापित हुई।
➣ उसने सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रायचूर दोआब क्षेत्र के अनेक किलों पर अधिकार कर लिया। इसके साथ ही बीजापुर, बीदर, मदुरा और श्रीरंगपट्टम के शासकों के विरुद्ध संचालित सैन्य अभियानों में भी उसे सफलता मिली।
➣ 1498 ई. में नरसा नायक ने बीजापुर के शासक आदिल खां को युद्ध में पराजित किया, जो उसकी एक बड़ी सैन्य उपलब्धि मानी जाती है।
➣ उसने सुदूर दक्षिण भारत के चोल, पांड्य और चेर शासकों को भी सैन्य दबाव द्वारा विजयनगर की प्रभुसत्ता (Sovereignty) स्वीकार करने हेतु बाध्य किया, जिससे दक्षिणी क्षेत्रों में विजयनगर का प्रभाव पुनः मजबूत हुआ।
➣ इसके अतिरिक्त उसने बीदर के शासक कासिम बारीद के साथ संयुक्त रूप से अभियान चलाकर रायचूर दोआब के अनेक अन्य किलों पर भी अधिकार स्थापित किया।
सालुव वंश का अंत और तुलुव वंश की स्थापना
➣ 1505 ई. में नरसा नायक के पुत्र वीर नरसिंह ने बंदी राजा इम्माड़ि नरसिंह की हत्या कर दी। इस हत्या के साथ ही सालुव वंश का पूर्णतः अंत हो गया।
➣ इम्माड़ि नरसिंह की हत्या के बाद वीर नरसिंह ने स्वयं विजयनगर के राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया, जिससे विजयनगर साम्राज्य के तृतीय राजवंश – तुलुव वंश की स्थापना हुई। यही वंश आगे चलकर कृष्णदेव राय जैसे महान शासक को जन्म देने वाला सिद्ध हुआ।
वीर नरसिंह द्वारा इम्माड़ि नरसिंह की हत्या करके सत्ता पर अधिकार करने की इस घटना को इतिहास में द्वितीय बलापहार कहा जाता है।
इससे पूर्व प्रथम बलापहार सालुव नरसिंह द्वारा संगम वंश से सत्ता बलपूर्वक छीनने की घटना को कहा गया था।
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