सैयद वंश : परिचय
➣ सन 1398 में भारत पर तैमूर लंग का आक्रमण हुआ था जिसने लाखों की संख्या में कत्ले आम किया इसमें उसका सेनापति ख्रिज खां था जिसने आगे चलकर सैय्यद वंश की नींव रखी।
➣ महमूद शाह की मृत्यु 1412 ई. में हो जाने के पश्चात् तुगलक वंश लगभग समाप्त हो गया तथा सैयद वंश अस्तित्व में आया।
➣ तैमूर लंग जिस समय भारत से वापस जा रहा था, उसने ख़िज़्र ख़ाँ को मुल्तान, लाहौर एवं दीपालपुर का शासक नियुक्त कर दिया।
➣ सल्तनत काल में शासन करने वाला यह एक मात्र शिया वंश था।
| शासक | संक्षिप्त परिचय |
|---|---|
| खिज्र खां (1414–1421 ई.) | सैयद वंश का संस्थापक। तैमूर के प्रतिनिधि के रूप में दिल्ली पर अधिकार किया और सैयद वंश की स्थापना की। |
| मुबारकशाह (1421–1434 ई.) | सैयद वंश का सबसे योग्य शासक। अनेक विद्रोहों का दमन किया तथा मुबारकाबाद नगर की स्थापना कराई। |
| मुहम्मद शाह (1434–1445 ई.) | कमजोर शासक। उसके शासनकाल में सल्तनत की शक्ति लगातार घटती गई और प्रांतीय सरदार अधिक शक्तिशाली हो गए। |
| अलाउद्दीन आलमशाह (1445–1451 ई.) | सैयद वंश का अंतिम शासक। उसने स्वेच्छा से दिल्ली छोड़ दी, जिसके बाद बहलोल लोदी ने 1451 ई. में लोदी वंश की स्थापना की। |
खिज्र खाँ (1414-1421 ई.)
➣ 1414 ई. में खिज्र खाँ ने दौलत खां लोदी को परास्त कर सैयद वंश की की नींव रखी।
➣ खिज्र खाँ मुल्तान के गवर्नर मलिक सुलेमान का पुत्र था। मलिक सुलेमान की मृत्यु के पश्चात् खिज्र खाँ को मुल्तान का गवर्नर नियुक्त किया गया।
➣ शासक बनने के बाद खिज्र खाँ ने सुल्तान की उपाधि धारण नहीं की बल्कि खुद को रैय्यत-ए-आला कहा अर्थात् तैमूर का ‘मातहत’।
➣ उसका मूल उद्देश्य तुर्क एवं अफगान सरदारों को सन्तुष्ट रखना और अपनी प्रजा की सहानुभूति प्राप्त करना था।
➣ इस काल में न तो ख़िलजी काल की तरह साम्राज्य विस्तार के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई, और न ही तुगलक काल की तरह व्यापक प्रशासनिक सुधार।
➣ खिज्र खाँ ने स्वतंत्र शासक के रूप में शासन न करके तैमूर के पुत्र शाहरूख के सहायक के रूप में ही शासन करता था। उसने शाहरूख के नाम का खुतबा पढ़वाया एवं वह उसे सालाना कर देता था।
➣ तारीख-ए-मुबारकशाही में खिज्र खाँ को सैय्यद बताया गया है। सैय्यद से आशय है पैगम्बर मुहम्मद (सल्लाहु अलैहि वसल्लम) के वंशज। हालाँकि इतिहासकारों के बीच इसे लेकर मतभेद है।
➣ खिज्र खाँ ने सिक्कों पर तुगलक सुल्तानों के नाम रहने दिये। नए सिक्कों पर उसने तैमूर तथा उसके पुत्र शाहरुख मिर्ज़ा का नाम अंकित करवाया।
➣ अपने शासन काल में उसने पंजाब, मुल्तान एवं सिंध पुनः दिल्ली सल्तनत के अधीन हो गये उसने कटेहर, इटावा, खोर, चलेसर, ग्वालियर, बयाना, मेवात, बदायूँ के विद्रोह को कुचल कर उन्हें जीतने का प्रयास किया।
➣ 20 मई, 1421 ई. को खिज्र खां की मृत्यु हो गयी थी। फ़रिश्ता के अनुसार ख़िज़्र ख़ाँ एक न्यायप्रिय एवं उदार शासक था जिसकी मृत्यु पर युवा, वृद्ध और स्वतंत्र सभी ने काले वस्त्र पहनकर दुःख प्रकट किया।
➣ ऐसा कहा जाता है कि खिज्र खाँ को राजस्व वसूलने के लिए भी प्रतिवर्ष सैनिक अभियान का सहारा लेना पड़ता था।
मुबारक शाह (1421-1434 ई.)
➣ खिज्र खां के पश्चात उसका पुत्र मुबारक खां मुबारक शाह के नाम से मई 1421 ई. को दिल्ली का सुल्तान बना।
➣ वह खिज्र खां रैयत-ए-आला की उपाधि से संतुष्ट नहीं था। इसलिए उसने स्वयं को सुल्तान घोषित कर शाही की उपाधि धारण किया। अपने नाम का खुतबा पढ़वाया और अपने नाम के सिक्के जारी किये।
➣ साथ ही ख़त्वे से तैमूर के वंशजों व सिक्कों से तुगलक वंश के शासकों का नाम हटवा दिया। उसने सिक्कों पर अपना नाम मुईज़-उद्-दीन मुबारक शाह खुदवाया।
➣ मुबारकशाह सैय्यद वंश का सबसे महान शासक था। वह कठिन परिस्थितियों में गद्दी पर बैठा था। उसके समय में अनेक विद्रोह हुए जिनका सामना उसने वीरतापूर्वक किया।
➣ अपने शासन काल में मुबारक शाह ने भटिण्डा एवं दोआब मे हुए विद्रोह को सफलतापूर्वक दबाया, परन्तु खोक्खर जाति के नेता जसरथ द्वारा किये गये विद्रोह को दबाने में वह असफल रहा।
➣ उसने 1433 ई. में यमुना नदी के किनारे मुबारकाबाद नामक एक नए नगर बसाया था।
➣ विख्यात इतिहासकार वाहिया-बिन-अहमद सरहिंदी उसका समकालीन और आश्रित था। उसकी पुस्तक तारीख-ए-मुबारकशाही में मुबारकशाह के कार्यों का वर्णन मिलता है।
➣ मुबारकशाह से असंतुष्ट लोगों ने उसके विरुद्ध षडयन्त्र रचना आरंभ कर दिया। उन्होंने सुल्तान की हत्या की योजना बनाई।
➣ जिस समय सुल्तान नये नगर मुबारकाबाद का निरीक्षण कर रहा था। उसके वज़ीर सरवर-उल-मुल्क ने षड़यन्त्र द्वारा 19 फ़रवरी, 1434 ई. को सिद्धपाल नामक व्यक्ति द्वारा उसकी हत्या कर दी।
मुहम्मद शाह (1434-1445 ई.)
➣ मुबारकशाह के बाद उसका दत्तक पुत्र मुहम्मद शाह गद्दी पर बैठा। वह मुबारक शाह के भाई फरीद खां का पुत्र था।
➣ मुहम्मद शाह एक अयोग्य शासक सिद्ध हुआ।
➣ अपनी अयोगयता से उसने सैय्यद वंश के पतन का मार्ग प्रशस्त किया।
➣ मुबारक शाह की हत्या में प्रमुख भूमिका निभाने वाले सरवर-उल-मुल्क को दंड की बजाय सुल्तान ने उसे वजीर का पद दिया। मुहम्मद शाह के काल में वास्तविक शक्ति सरवर-उल-मुल्क के पास ही थी।
➣ मोहम्मद शाह ने सरवर-उल-मुल्क को खान-ए-जहां की उपाधि प्रदान की और हत्यारों में शामिल मीरान सद्र को मुईनुलमुल्क की उपाधि से विभूषित किया गया।
➣ अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए सरवर-उल-मुल्क ने इक्ताओं का पुनर्वितरण कर अपने समर्थकों का एक दल तैयार किया और विरोधियों को नष्ट करने का प्रयास करने लगा। फलतः सल्तनत में अराजकता का वातावरण फैलने लगा।।
➣ सुल्तान ने सरवर-उल-मुल्क की बढ़ती महत्त्वाकांक्षा को देखते हुए अमीरों की सहायता से उसकी हत्या करवा दी। लेकिन अभी भी दिल्ली में विद्रोही शक्तियाँ अराजकता पैदा कर रही थीं।
➣ कालांतर में कमाल-उल-मुल्क को कमाल खां की उपाधि के साथ वजीर के पद पर नियुक्त किया गया।
➣ दिल्ली सल्तनत पर मालवा के शासक महमूद ख़िलजी ने आक्रमण किया, किंतु उचित समय पर सरहिंद (पंजाब) के अफगान राज्यपाल बहलोल लोदी की सैन्य सहायता के कारण दिल्ली सल्तनत महमूद ख़िलजी के आक्रमण से बच गई।
➣ मुहम्मद शाह ने अफगानी बहलोल का सम्मान किया, उसे अपना पुत्र कह कर पुकारा और खान-ए-खाना की उपाधि से विभूषित किया।
➣ दिल्ली के बीस करोड़ (20 कोस) की परिधि में अमीर उसके विरोधी हो गए थे। ऐसी स्थिति में 1445 ई. में मुहम्मदशाह की मृत्यु हो गयी। उसकी मृत्यु के साथ ही सैयद वंश पतन की ओर अग्रसर हो गया।
अलाउद्दीन आलम शाह (1445-1451 ई.)
➣ 1445 ई. में अपने पिता मुहम्मद शाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अलाउद्दीन, आलमशाह की उपाधि धारण कर राजगद्दी पर बैठा। वह इस वंश का अंतिम शासक था।
➣ यह अपने वंश के शासकों में सर्वाधिक अयोगय सिद्ध हुआ। उसके समय में दिल्ली सल्तनत का क्षेत्र अत्यंत सीमित हो गया था। इसके समय में यह कहावत लोकप्रिय देखों शाह-ए-आलम का राज्य दिल्ली से पालम तक हो गया।
➣ इसी के समय में दिल्ली सल्तनत के शासन की बागडोर सैय्यदों से निकलकर लोदियों के हाथ में चली गयी थी।
➣ अलाउद्दीन आलमशाह को अपने वज़ीर हमीद ख़ाँ से मतभेद होने के कारण दिल्ली छोड़कर अंत में 1447 ई. में बदायूं चला गया और वहीं स्थायी रूप से बस गया। शासक बनने से पूर्व वह बदायूं का राज्यपाल रह चुका था।
➣ बदायूं जाने से पूर्व उसने दिल्ली का शासन अपने पत्नी के दो भाइयों जो क्रमशः शहना-ए-शहर व अमीरे कोहथे को सौंप दिया।
➣ शीघ्र ही दिल्ली की सत्ता के लिए दोनों भाइयों में विवाद हुआ जिसमें एक मारा गया। दूसरे भाई को दिल्ली की जनता ने मार डाला।
➣ हमीद ख़ाँ ने बहलोल लोदी को दिल्ली आमंत्रित किया। कालान्तर में बहलोल लोदी ने दिल्ली आने के कुछ दिन बाद हमीद ख़ाँ की हत्या करवाकर 1451 ई. में दिल्ली प्रशासन को अपने अधिकार में कर लिया।
➣ दूसरी तरफ सुल्तान अलाउद्दीन आलमशाह ने अपने को बदायूँ में ही सुरक्षित महसूस किया और वहीं पर 1476 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।
➣ इस प्रकार लगभग 37 वर्ष के बाद सैय्यद वंश समाप्त हो गया और दिल्ली तख़्त पर बहलोल लोदी ने लोदी वंश के नाम से एक नए राजवंश की स्थापना की।
➣ सैय्यद वंश के शासकों ने कुल 37 वर्षों तक दिल्ली सल्तनत पर शासन किया, लेकिन इस दौरान सैय्यद शासकों ने अपने पूर्ववर्ती ख़िलजियों की तरह न तो क्षेत्र विस्तार और न ही धन प्राप्त किया और न ही तुगलकों की तरह आंतरिक प्रशासन सुदृढ़ किया।
➣ सैय्यद वंश के काल में दिल्ली सल्तनत का क्षेत्र और छोटा हो गया। इस प्रकार – सैय्यद वंश की ऐसी कोई उपलब्धि नहीं रही, जिससे उन्हें इतिहास में आदर एवं सम्मान प्राप्त हो।
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