ऋग्वैदिक का काल (1500-1000 ई. पू.) | One Liner Practice
❑ वेद शब्द का अर्थ ज्ञान होता है।
❑ भारतीय परंपरा में वेदों को अपौरुषेय कहा गया है।
❑ ब्रह्मा ने कुछ ऋषियों को मन्त्रों का प्रकाश दिया। ऋषियों ने अपने शिष्यों को बताया। कालान्तर में वेद व्यास ने इस ज्ञान को संकलित कर लिया। इसी कारण वेदों को श्रुति भी कहा गया है।
❑ ऋग्वैदिक का काल 1500-1000 ई. पू. है जबकि उत्तरवैदिक की समयावधि 1000-600 ई. पू. है।
❑ खगोलीय आधार पर जर्मन भारतविद् प्रो. हरमन जैकोबी के अनुसार ऋग्वेद की ऋचाएँ 4500 ई.पू.-2500 ई.पू. संकलित की गई थी।
❑ ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद को वेदत्रयी या त्रयी कहा जाता है।
❑ ऋग्वेद में 10 मण्डल तथा 1028 सूक्त हैं।
❑ दूसरे से सातवें मण्डल तक को वंश मण्डल कहा जाता है।
❑ ऋग्वेद का आठवाँ मण्डल कण्व और अंगिरस वंश को समर्पित है।
❑ ऋग्वेद के नौवें मण्डल को सोम मण्डल कहा जाता है।
❑ आरंभिक वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था व्यवसाय पर आधारित थी।
❑ ऋग्वेद के दसवें मण्डल में पुरुष सूक्त है, जिसमें चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) की उत्पत्ति का साक्ष्य है।
❑ यजुर्वेद (यज्ञ सूत्र) की प्रमुख विशेषता कर्मकाण्ड है। इसमें पहली बार राजसूय एवं वाजपेय यज्ञ का उल्लेख हुआ है। यह वेद पद्य एवं गद्य दोनों में है।
❑ आर्यों का आगमन 1500 ई. पू. के पहले है।
❑ आर्य सर्वप्रथम सप्त सैंधव प्रदेश में लाये थे।
❑ आर्य शब्द का अर्थ श्रेष्ठ होता है।
❑ क्लासिकल संस्कृत में आर्य का अर्थ एक उत्तम व्यक्ति है।
❑ सुदास ने अनार्यों को पराजित किया था।
❑ दशराज्ञ युद्ध परुष्णी नदी (रावी) के तट पर सुदास एवं दस जनों के बीच लड़ा गया था।
❑ ऋग्वैदिक काल की सबसे महत्त्वपूर्ण नदी सिन्धु थी।
❑ ऋग्वेद के तीसरे मण्डल में गायत्री मन्त्र का उल्लेख है।
❑ ऋग्वेद के दशम् मण्डल में नदी सूक्त है। ऋग्वेद में सर्वाधिक पवित्र नदी सरस्वती को नदियों की माता कहा गया है।
❑ ऋग्वेद के ऋचाओं के पढ़ने वाले ऋषि को होतृ कहा जाता था।
❑ यजुर्वेद के पाठकर्ता को अध्वर्यु कहा जाता था।
❑ सामवेद के पाठकर्ता को उदागातृ (उद्गाता) कहा जाता था।
❑ सबसे नया वेद अथर्ववेद है।
❑ अथर्ववेद में वेदत्रयी नहीं आता है। इसमें जादू-टोना तथा तन्त्र-मन्त्र का उल्लेख है।
❑ वेदों की टीकाओं को ब्राह्मण ग्रंथ कहा जाता है।
❑ ऋग्वैदिक काल का समाज कबीले के रूप में संगठित था।
❑ आर्यों का प्रारम्भिक जीवन मुख्यतः पशुचारक था तथा कृषि उनका गौण धंधा था।
❑ भरतकुल के पुरोहित वशिष्ठ थे।
❑ आर्यों ने घोड़ों द्वारा चलाए जा रहे रथों का प्रयोग किया।
❑ ऋग्वेद में 21 नदियों का जिक्र मिलता है।
❑ आर्यों की सर्वाधिक प्राचीन संस्था विदथ थी।
❑ श्रेष्ठ लोगों की संस्था को समिति कहते थे। राजा को चुनने एवं पदच्युत करने का अधिकार समिति को था।
❑ ऋग्वैदिक काल में पुलिस को उग्र तथा गुप्तचर को स्पश कहते थे। ऊनी कपड़े को सामूल्य कहते थे।
❑ तम्बाकू का ज्ञान वैदिक काल के लोगों को नहीं था।
❑ इन्द्र ऋग्वैदिक काल के सबसे प्रतापी देवता थे, जिन्हें किला तोड़ने वाला कहा गया है।
❑ ऋग्वेद में इन्द्र का सर्वाधिक 250 बार उल्लेख हुआ है।
❑ उत्तरवैदिक काल के सर्वाधिक प्रतापी देवता प्रजापति थे।
❑ शूद्रों के देवता पूषन थे, जो पशुओं से भी सम्बद्ध थे।
❑ आश्रम व्यवस्था का सर्वप्रथम उल्लेख छान्दोग्य उपनिषद् में मिलता है।
❑ राजा का प्रमुख सलाहकार पुरोहित होता था।
❑ आर्यों के मनोरंजन के मुख्य साधन थे-संगीत, रथदौड़, घुड़दौड़ एवं द्यूतक्रीड़ा।
❑ ऋग्वेद में नाई को वप्ता कहा जाता था।
❑ वैदिक युग में राजा अपनी जनता से जो कर वसूल करते थे, उसे बलि कहते थे।
❑ सर्वप्रथम कर लगाने की प्रथा उत्तर वैदिक काल में शुरू हुई।
❑ मगध में निवास करने वाले लोगों को अथर्ववेद में व्रात्य कहा गया है।
❑ वैदिक आर्यों का मुख्य भोजन दूध और उसके उत्पाद थे।
❑ जौ के सत्तू को दही में मिलाकर करव नामक खाद्य पदार्थ बनाया जाता था।
❑ वैदिक काल में जौ, गेहूँ, मूँग, तिल, उड़द आदि प्रमुख अन्न थे।
❑ ऋग्वैदिक आर्यों को बढ़ईगीरी, कुम्हार, बुनकर, चर्मकार, रथकार, स्वर्णकार आदि के बारे में मालूम था परंतु उस समय लुहारगीरी की जानकारी नहीं थीं परंतु उत्तरवैदिक काल में लोहे की जानकारी आर्यों को हो गयी थी।
❑ अथर्ववेद में सभा तथा समिति को प्रजापति की दो पुत्रियों के समान माना गया है।
❑ अथर्ववेद को ब्रह्मवेद भी कहा जाता है।
❑ यजुर्वेद पर विद्वानों ने सर्वाधिक भाष्य लिखे हैं।
❑ अगत्स्य ऋषि ने दक्षिण भारत का आर्यकरण किया था।
❑ ऋग्वेद में क्षत्रिय के लिये राजन्य शब्द का प्रयोग होता था।
❑ ऋग्वैदिक काल में पर्दा प्रथा नहीं थी। इस काल में स्त्रियों की दशा बहुत अच्छी थी।
❑ ऋग्वैदिक काल में सती प्रथा नहीं थी। पर्दा प्रथा का उल्लेख वैदिक काल में नहीं मिलता है।
❑ आकाश के देवता – सूर्य, द्यौस, मित्र, पूषन्, विष्णु, उषा, अश्विन, सवितृ, आदित्य आदि।
❑ अन्तरिक्ष के देवता – इन्द्र, मरुत, रुद्र, वायु, पर्जन्य आदि।
❑ पृथ्वी के देवता – अग्नि, सोम, पृथ्वी, वृहस्पति, सरस्वती।
❑ वैदिक काल में नियोग प्रथा प्रचलित थी।
❑ शतपथ ब्राह्मण में पत्नी को अर्द्धांगिनी कहा गया है।
❑ ऋग्वैदिक काल में दास प्रथा का प्रचलन था।
❑ गाय को अघन्या (न मारने योग्य) माना जाता था।
❑ ऋग्वैदिक काल में संयुक्त परिवार की प्रथा थी।
❑ ओउम शब्द का सर्वप्रथम निश्चित वर्णन वृहदारण्यक उपनिषद् में मिलता है।
❑ सत्यमेव जयते शब्द मुण्डकोपनिषद् से लिया गया है।
❑ पाप-पुण्य तथा स्वर्ग-नरक का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद में मिलता है।
❑ महाभारत काल में अनार्य जातियों को पणि या दास कहा जाता था।
❑ ऋग्वेद में वैद्य या चिकित्सक को भेषज कहा जाता था।
❑ अग्नि, देवता एवं मानवों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाला देव था।
❑ मरुत को तूफान का देवता कहा जाता था।
❑ प्राचीन भारत के दो महाकाव्य हैं रामायण तथा महाभारत।
❑ वैदिक लोगों द्वारा ताँबा का प्रयोग पहले किया गया था।
उत्तर वैदिक काल ( 1000 ई. पू. – 600 ई. पू.) | One Liner Practice
❑ उत्तर वैदिक काल के पुरातात्विक स्रोत – चित्रित धूसर मृदभांड, लोहा, स्थायी निवास एंव साहित्यिक स्रोत – सामवेद , यजुर्वेद, अथर्ववेद , आरण्यक उपनिषद्
❑ उत्तर वैदिक काल में भरत एवं पुरु ने मिलकर कुरु जनपद की स्थापना की तथा तुर्वस एवं क्रिवि ने मिलकर पांचाल जनपद की स्थापना की।
❑ उत्तर वैदिक ग्रंथ में लोहे को श्याम अयस् तथा कृष्ण अयस् कहा गया है।
❑ प्रारंभ में उनकी राजधानी असन्दनीवात थी। कालांतर में हस्तिनापुर उनकी राजधानी हुई।
❑ महत्त्वपूर्ण राजा हुए-बाल्हिक प्रतिपीय, राजा परीक्षित, जन्मेजय आदि। अथर्ववेद में परीक्षित का उल्लेख मिलता है।
❑ अंतिम कुरुवंशी शासक निचक्षु ने बाढ़ से विनष्ट होने के कारण हस्तिनापुर की जगह कौशाम्बी को अपनी राजधानी बनाया।
❑ महाभारत – कुरुकुल का गृहयुद्ध-950 ई. पू. में हुआ था। इस काल में कबीलों ने जनपद रूप ग्रहण किया।
❑ विदेह माधव ने अपने गुरु राहुल गण की सहायता से अग्नि के द्वारा इस क्षेत्र का सफाया किया। यह शतपथ ब्राह्मण में वर्णित है।
❑ शतपथ ब्राह्मण में महाजनी प्रथा का पहली बार जिक्र हुआ है तथा सूदखोर को कुसीदिन कहा गया है।
❑ पुरुषार्थ– मनुष्य के भौतिक सुख एवं आध्यात्मिक सुखों के मध्य सामजस्य हेतु
❑ 1. धर्म-न्याय, सद्गुण, नैतिकता, कर्तव्य पालन
❑ 2. अर्थ– अर्थ (धन) की प्राप्ति और मर्यादा से उपभोग
❑ 3. काम-धर्माचरण एवं सृष्टि के विकास हेतु सन्तानोत्पत्ति
❑ 4. मोक्ष-जीवन चक्र से मुक्ति
❑ पुनर्जन्म का सिद्धांत सर्वप्रथम शतपथ ब्राह्मण में दिखाई देता है।
❑ शतपथ ब्राह्मण में राजा को विषमता (जनता का भक्षक) कहा गया है।
❑ ऐतरेय ब्राह्मण में राजा को उत्तर में विराट, दक्षिण में भोज, पूर्व में सम्राट और पश्चिम में स्वराट कहा जाता था।
❑ उत्तर वैदिक काल में तीन आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ एवं वानप्रस्थ होता था। परन्तु कालान्तर में संन्यास नाम से चौथा आश्रम भी इस व्यवस्था का अंग बन गया।
❑ चार आश्रम व्यवस्था बुद्ध काल एवं सूत्रकाल में स्थापित हुई।
❑ यम और नचिकेता और उनके बीच तीन वर प्राप्त करने की कहानी कठोपनिषद् में वर्णित है।
❑ छंदोग्य उपनिषद् में इतिहास पुराण को स्पष्ट रूप से पंचम वेद कहा गया है।
❑ अथर्ववेद में मवेशियों की वृद्धि के लिए प्रार्थना की गई है।
❑ उत्तर वैदिक काल में गोत्र व्यवस्था स्थापित हुई।
❑ उत्तर वैदिक काल में ही मूर्ति पूजा का आरंभ हुआ।
❑ अथर्ववेद संभा तथा समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है।
❑ जाबालोपनिषद् में प्रथम बार चारों आश्रम की चर्चा हुई है।
❑ ऐतरेय ब्राह्मण द्वारा बहुविवाह के प्रचलन का संकेत मिलता है।
❑ विधवा विवाह का प्रचलन तैत्तिरीय संहिता में मिलता है।
❑ विधवा पुत्र को देधिपत्य कहा जाता था।
❑ शतपथ ब्राह्मण कृषि की समस्त प्रक्रिया का वर्णन मिलता है।
❑ काठक संहिता में 24 बैलों द्वारा खींचे जाने वाले हलों का उल्लेख मिलता है।
❑ उत्तर वैदिक काल में वेद विरोधी और ब्राह्मण विरोधी धार्मिक अध्यापकों को श्रमण नाम से जाना जाता था।
❑ अथर्वदेव के अनुसार राजा को आय का 16वाँ भाग मिलता था।
❑ शतपथ ब्राह्मण में एक स्थान पर क्षत्रियों को ब्राह्मणों से श्रेष्ठ बताया गया है।
❑ अथर्ववेद में सिंचाई के साधन के रूप में वर्णाकूप और नहर (कूल्या) का उल्लेख मिलता है।
❑ अथर्ववेद में परीक्षित को मृत्युलोक का देवता बताया गया है।
❑ छांदोग्य उपनिषद् में एक दुर्भिक्ष का उल्लेख मिलता है।
❑ 1. राजसूय यज्ञ : राज्याभिषेक के समय यह याज्ञिक अनुष्ठान किया जाता था। जिससे प्रजा में विश्वास उत्पन्न होता था कि उसके राजा को दिव्य शक्ति प्राप्त है।
❑ 2. अश्वमेध यज्ञ : राज्य विस्तार हेतु घोड़े को छोड़कर दिग्विजयी होने का प्रतीक।
❑ 3. वाजपेय यज्ञ : रथों की दौड़ का आयोजन राजा की श्रेष्ठता का प्रतीक।
❑ 4. अग्निष्टोम यज्ञ : इसमें सात्विक जीवन व्यतीत करते हुए जन कल्याण हेतु अग्नि को पशुबलि दी जाती थी।
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