1. ऋग्वेद में……ऋचाएं हैं-
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2011
उत्तर-(*)
ऋग्वेद में कुल 10 मंडल, 1028 सूक्त और 10,552 ऋचाएं (मंत्र) हैं। दिए गए विकल्पों में से कोई भी एकदम सही नहीं है, इसलिए उत्तर (*) अर्थात् कोई नहीं दिया गया है। ऋग्वेद विश्व के प्राचीनतम ग्रंथों में से एक माना जाता है और इसकी रचना लगभग 1500–1200 ईसा पूर्व हुई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद के 9वें मंडल को ‘सोममंडल’ कहते हैं क्योंकि इसमें सोम देवता की स्तुति में रची गई ऋचाएं संकलित हैं। ऋग्वेद के प्रसिद्ध गायत्री मंत्र की रचना विश्वामित्र ने की थी, जो इसके तीसरे मंडल में मिलता है।
2. ‘त्रयी’ नाम है-
U.P.P.S.C. (GIC) 2010
उत्तर-(a)
ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद — इन तीन वेदों को सम्मिलित रूप से ‘वेदत्रयी’ या ‘त्रयी’ कहा जाता है। अथर्ववेद को प्रारंभ में इस त्रयी में सम्मिलित नहीं किया गया था क्योंकि उसका विषय अन्य तीन वेदों से भिन्न (तंत्र-मंत्र, जादू-टोना आदि) था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यज्ञ में तीन प्रमुख पुरोहित होते थे — होता (ऋग्वेद का ज्ञाता), अध्वर्यु (यजुर्वेद का ज्ञाता) और उद्गाता (सामवेद का ज्ञाता) — जो इसी त्रयी पर आधारित थे। अथर्ववेद को ‘ब्रह्मवेद’ भी कहा जाता है और इसे चौथे वेद के रूप में बाद में मान्यता मिली।
3. आर्य शब्द इंगित करता है-
I.A.S. (Pre) 1999
U.P.P.C.S. (Pre) 1999
U.P.P.C.S. (Pre) 1999
उत्तर-(d)
‘आर्य’ संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ ‘श्रेष्ठ’, ‘कुलीन’ या ‘सज्जन’ होता है। वैदिक साहित्य में इसका प्रयोग किसी नृजातीय समूह या भाषा विशेष के लिए नहीं, बल्कि उच्च नैतिक आचरण वाले व्यक्ति के लिए हुआ है। सायणाचार्य ने ऋग्वेद के भाष्य में आर्य का अर्थ ‘यज्ञ का अनुष्ठाता’ और ‘आदरणीय’ बताया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध साहित्य में भी ‘आर्य’ शब्द का प्रयोग ‘चार आर्य सत्य’ (Four Noble Truths) के रूप में हुआ है, जहाँ इसका अर्थ श्रेष्ठ या पवित्र सत्य है। आधुनिक काल में 19वीं सदी में यूरोपीय विद्वानों ने ‘आर्य’ को एक भाषाई समूह (Indo-European language speakers) के लिए प्रयोग करना शुरू किया, जो मूल वैदिक अर्थ से भिन्न है।
4. निम्नलिखित चार वेदों में से किस एक में जादुई माया और वशीकरण का वर्णन है ?
Jharkhand P.C.S. (Pre) 2011
उत्तर-(c)
अथर्ववेद चार वेदों में वह एकमात्र वेद है जिसमें जादू-टोना, तंत्र-मंत्र, वशीकरण, रोगनिवारण और भूत-प्रेत आदि से संबंधित विषयों का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसमें 20 अध्याय और लगभग 730 सूक्त हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अथर्ववेद को ‘भैषज्यवेद’ भी कहते हैं क्योंकि इसमें अनेक जड़ी-बूटियों और औषधियों का उल्लेख मिलता है, जिससे आयुर्वेद के विकास में इसका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। अथर्ववेद में तत्कालीन सामाजिक जीवन, लोक-विश्वासों और जनसाधारण की संस्कृति का सर्वाधिक प्रामाणिक चित्रण उपलब्ध होता है।
5.क्लासिकीय संस्कृति में आर्य’ शब्द का अर्थ है-
U.P.Lower Sub. (Pre) 1998
उत्तर-(d)
क्लासिकीय संस्कृत साहित्य में ‘आर्य’ शब्द का प्रयोग ‘एक उत्तम व्यक्ति’ के अर्थ में होता है। वैदिक साहित्य में कहीं भी आर्य का उल्लेख किसी जाति या विशेष भाषा-भाषी समूह के रूप में नहीं हुआ है। कालिदास के नाटकों में पात्र एक-दूसरे को ‘आर्य’ कहकर संबोधित करते हैं जिसका अभिप्राय ‘सम्माननीय’ या ‘श्रेष्ठ व्यक्ति’ होता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन धर्म में ‘आर्य’ का प्रयोग उन व्यक्तियों के लिए किया गया है जो मोक्षमार्ग पर चलते हैं और अहिंसा का पालन करते हैं। रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों में भी ‘आर्य’ शब्द जाति-सूचक नहीं बल्कि गुण-सूचक है।
6.सुमेलित कीजिये-
A. अथर्ववेद 1. ईश्वर महिमा
B. ऋग्वेद 2. बलिदान विधि
C. यजुर्वेद 3. औषधियों से संबंधित
D. सामवेद 4. संगीत कूट :
A B C D
A. अथर्ववेद 1. ईश्वर महिमा
B. ऋग्वेद 2. बलिदान विधि
C. यजुर्वेद 3. औषधियों से संबंधित
D. सामवेद 4. संगीत कूट :
A B C D
M.P.P.C.S. (Pre) 1999
उत्तर-(a)
चारों वेदों का विषय-वर्गीकरण इस प्रकार है — अथर्ववेद: औषधियों, रोग-निवारण और तंत्र-मंत्र से संबंधित; ऋग्वेद: देवताओं की स्तुति (ईश्वर महिमा); यजुर्वेद: यज्ञ की विधियाँ (बलिदान विधि); सामवेद: संगीतबद्ध स्तोत्र। अतः सही सुमेलन A-3, B-1, C-2, D-4 है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यजुर्वेद के दो प्रमुख संस्करण हैं — ‘शुक्ल यजुर्वेद’ (वाजसनेयी संहिता) और ‘कृष्ण यजुर्वेद’ (तैत्तिरीय संहिता)। शुक्ल यजुर्वेद में केवल मंत्र हैं जबकि कृष्ण यजुर्वेद में मंत्रों के साथ गद्य में व्याख्या भी दी गई है।
7. किस वैदिक ग्रंथ में ‘वर्ण’ शब्द का सर्वप्रथम नामोल्लेख मिलता हैं?
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2012
उत्तर-(a)
‘वर्ण’ शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है जहाँ इसका प्रयोग ‘रंग’ के अर्थ में हुआ है — आर्यों को ‘गौर वर्ण’ (श्वेत) तथा दासों को ‘कृष्ण वर्ण’ (काला) कहा गया है। चातुर्वर्ण्य व्यवस्था (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) का उल्लेख ऋग्वेद के दसवें मंडल के पुरुष सूक्त में मिलता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वैदिक काल में वर्ण-व्यवस्था जन्म पर नहीं बल्कि कर्म और व्यवसाय पर आधारित थी; बाद के उत्तर-वैदिक काल में यह जन्माधारित और कठोर होती गई। पुरुष सूक्त के अनुसार विराट पुरुष के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य और पैरों से शूद्र की उत्पत्ति बताई गई है।
8. वर्णव्यवस्था से संबंधित पुरुष सूक्त’ मूलतः पाया जाता है-
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2014
उत्तर-(c)
वर्ण-व्यवस्था से संबंधित ‘पुरुष सूक्त’ ऋग्वेद के दसवें मंडल में स्थित है। इसमें समाज के चार वर्णों — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र — की उत्पत्ति का प्रतीकात्मक वर्णन एक विराट ‘पुरुष’ (ब्रह्मांडीय सत्ता) के विभिन्न अंगों से हुई बताई गई है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद के दसवें मंडल में ही ‘नासदीय सूक्त’ भी मिलता है जो सृष्टि की उत्पत्ति के दार्शनिक प्रश्नों पर विचार करता है और विश्व के प्राचीनतम दार्शनिक ग्रंथों में से एक माना जाता है। पुरुष सूक्त का पाठ आज भी हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है।
10.भारतीय साहित्य में वेद चार राबरी पुराना बंद कौन-सा है ?
U.P.P.C.S. (Pre) 1995
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2010
Uttarakhand U.D.A. / L.D.A. (Pre) 2007
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2010
Uttarakhand U.D.A. / L.D.A. (Pre) 2007
उत्तर-(b)
चार वेदों में ऋग्वेद सर्वाधिक प्राचीन माना जाता है। इसकी रचना लगभग 1500–1200 ईसा पूर्व के बीच हुई मानी जाती है। यह न केवल भारत का बल्कि विश्व का भी प्राचीनतम ज्ञात साहित्यिक ग्रंथ है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद को UNESCO ने 2007 में ‘विश्व धरोहर’ (Memory of the World Register) की सूची में सम्मिलित किया है। ऋग्वेद का पहला मंडल ‘अग्निसूक्त’ से आरंभ होता है जिसमें अग्नि देवता की स्तुति की गई है — “अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्।”
11. उपनिषद पुस्तकें हैं-
U.P.P.C.S. (Pre) 2002
U.P.P.C.S. (Mains) 2004
U.P.P.C.S. (Mains) 2004
उत्तर-(d)
उपनिषद मूलतः दर्शन (Philosophy) पर आधारित ग्रंथ हैं, जो आत्मा (आत्मन्) और ब्रह्म के संबंध को गहराई से विवेचित करते हैं। इन्हें ‘वेदांत’ भी कहा जाता है क्योंकि ये वेदों के अंतिम एवं सारभूत भाग हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उपनिषदों की कुल संख्या 108 मानी जाती है, किंतु दार्शनिक दृष्टि से मुख्य रूप से 12 उपनिषद ही प्रमुख माने गए हैं, जिन पर आदि शंकराचार्य ने भाष्य लिखा। सबसे प्राचीन उपनिषद ‘बृहदारण्यक’ और ‘छान्दोग्य’ माने जाते हैं। उपनिषदों का फारसी अनुवाद ‘सिर्र-ए-अकबर’ के नाम से मुगल राजकुमार दारा शिकोह ने 17वीं शताब्दी में करवाया था।
12. निम्नलिखित में से किसका संकलन ऋग्वेद पर आधारित है ?
U.P.P.C.S. (Pre) 1997
उत्तर-(b)
सामवेद में कुल 1875 ऋचाएं संकलित हैं। इनमें से अधिकांश — सामान्य मतानुसार 75 को छोड़कर शेष सभी — ऋग्वेद में भी पाई जाती हैं। कुछ विद्वान यह संख्या 99 बताते हैं। इस प्रकार सामवेद का संकलन मुख्यतः ऋग्वेद की ऋचाओं पर आधारित है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सामवेद को ‘भारतीय संगीत का जनक’ माना जाता है क्योंकि इसकी ऋचाएं विशेष धुनों (सामन्) में गाई जाती थीं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है — “वेदानां सामवेदोऽस्मि” अर्थात् वेदों में मैं सामवेद हूँ, जो इसकी श्रेष्ठता को दर्शाता है।
13. गोपथ ब्राह्मण संबंधित है-
U.P.R.O. / A.R.O. (Pre) 2014
उत्तर-(c)
गोपथ ब्राह्मण अथर्ववेद से संबद्ध एकमात्र ब्राह्मण ग्रंथ है। ब्राह्मण ग्रंथ यज्ञों और उनके अनुष्ठान-विधानों की विस्तृत व्याख्या करते हैं। प्रमुख ब्राह्मण ग्रंथों का वेद-आधार इस प्रकार है — ऐतरेय व कौषीतकी ब्राह्मण: ऋग्वेद; पंचविश/ताण्ड्य व जैमिनीय ब्राह्मण: सामवेद; शतपथ ब्राह्मण: यजुर्वेद; गोपथ ब्राह्मण: अथर्ववेद।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शतपथ ब्राह्मण सभी ब्राह्मण ग्रंथों में सबसे विशाल एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता है; इसमें 100 अध्याय हैं और इसकी रचना याज्ञवल्क्य से जोड़ी जाती है। गोपथ ब्राह्मण ही एकमात्र ऐसा ब्राह्मण ग्रंथ है जो अथर्ववेद की परंपरा को व्याख्यायित करता है।
14. भारत के किस स्थल की खुदाई से लौह धातु के प्रचलन के प्राचीनतम प्रमाण मिले हैं?
U.P.P.C.S. (Pre) 1998
उत्तर-(b)
अतरंजीखेड़ा (उत्तर प्रदेश के एटा जिले में स्थित) की पुरातात्त्विक खुदाई से लौह धातुमल (iron slag) तथा धातु शोधन में प्रयुक्त भट्टियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि यहाँ लोहे को स्थानीय रूप से गलाने और प्रसंस्करण का कार्य होता था, जो इसे भारत में लौह प्रचलन का प्राचीनतम साक्ष्य देने वाला स्थल बनाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: भारत में लौह युग का आरंभ लगभग 1000 ईसा पूर्व माना जाता है। अतरंजीखेड़ा से चित्रित धूसर मृद्भांड (Painted Grey Ware – PGW) संस्कृति के अवशेष भी मिले हैं, जो उत्तर वैदिक काल से संबद्ध है। PGW संस्कृति का काल लगभग 1100–600 ईसा पूर्व निर्धारित किया गया है।
15. ऋग्वेद संहिता का नौवां मंडल पूर्णतः किसको समर्पित है?
(a)
40th B.P.S.C. (Pre) 1995
उत्तर-(d)
ऋग्वेद के नौवें मंडल में कुल 114 सूक्त हैं और यह पूर्णतः ‘सोम’ देवता को समर्पित है। सोम एक पवित्र पेय था जिसे यज्ञों में अर्पित किया जाता था और देवताओं की प्रिय वस्तु माना जाता था। इस मंडल को ‘सोम मंडल’ भी कहते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सोम को वैदिक देवताओं में विशिष्ट स्थान प्राप्त था — इसे ‘वनस्पतिपति’ (वनस्पतियों का राजा) भी कहा गया है। ऋग्वेद में सर्वाधिक स्तुतियाँ इंद्र देव को समर्पित हैं (लगभग 250 सूक्त), जबकि अग्नि देव दूसरे स्थान पर हैं।
16. ‘यज्ञ’ संबंधी विधि-विधानों का पता चलता है-
R.A.S. / R.T.S. (Pre) 1999
उत्तर-(b)
यज्ञ संबंधी विधि-विधानों का विस्तृत विवरण यजुर्वेद में मिलता है। ‘यजुस्’ शब्द का अर्थ ही यज्ञ-सूत्र अथवा यज्ञ-मंत्र है। यजुर्वेद के दो प्रमुख भाग हैं — शुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेयि संहिता) तथा कृष्ण यजुर्वेद (तैत्तिरीय संहिता)। [नोट: विकल्प (b) गलत है; सही उत्तर (d) यजुर्वेद है।]
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शुक्ल यजुर्वेद में मंत्र और ब्राह्मण भाग अलग-अलग हैं, जबकि कृष्ण यजुर्वेद में ये मिश्रित हैं। यजुर्वेद के पुरोहित को ‘अध्वर्यु’ कहा जाता था, जो यज्ञ के समय मंत्रोच्चारण करते हुए क्रियात्मक कार्य भी संपन्न करता था।
17. ऋग्वेद है-
U.P.R.O/A.R.O. (Pre) 2016
उत्तर-(a)
ऋग्वेद विभिन्न देवताओं की स्तुति में रचित स्तोत्रों (Hymns) का संकलन है। यह विश्व का सबसे प्राचीन उपलब्ध साहित्यिक ग्रंथ माना जाता है। इसमें 10 मंडल, 1028 सूक्त (कुछ मत से 1017) और लगभग 10,552 ऋचाएं (मंत्र) हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद के प्रथम एवं दशम मंडल बाद में जोड़े गए माने जाते हैं और इनकी भाषा अपेक्षाकृत अर्वाचीन है। प्रसिद्ध ‘गायत्री मंत्र’ ऋग्वेद के तृतीय मंडल (3.62.10) में स्थित है, जो सूर्यदेव ‘सवितृ’ को समर्पित है।
18. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित करें एवं निम्न दिए हुए कूट में से सही
सूची-I सूची-II (a) ऋग्वेद (i) गोपथ
(b) सामवेद (ii) शतपथ
(c) अर्थवेद (iii) ऐतरेय
(d) यजुर्वेद (iv) पंचविश
कूट :
उत्तर का चयन करें
सूची-I सूची-II (a) ऋग्वेद (i) गोपथ
(b) सामवेद (ii) शतपथ
(c) अर्थवेद (iii) ऐतरेय
(d) यजुर्वेद (iv) पंचविश
कूट :
उत्तर का चयन करें
R.A.S. / R.T.S. (Pre) 2013
उत्तर-(c)
वेदों और उनसे संबंधित ब्राह्मण ग्रंथों का सही सुमेलन इस प्रकार है — ऋग्वेद → ऐतरेय ब्राह्मण; सामवेद → पंचविश (ताण्ड्य) ब्राह्मण; अथर्ववेद → गोपथ ब्राह्मण; यजुर्वेद → शतपथ ब्राह्मण। प्रत्येक वेद के ब्राह्मण ग्रंथ उस वेद के मंत्रों के यज्ञ-संदर्भ में अर्थ और प्रयोग की व्याख्या करते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद से जुड़ा एक अन्य ब्राह्मण ग्रंथ ‘कौषीतकी ब्राह्मण’ भी है। शतपथ ब्राह्मण में ‘पुरुषमेध’, ‘अश्वमेध’ जैसे यज्ञों के साथ-साथ सृष्टि-उत्पत्ति की कथाएं भी वर्णित हैं और इसे भारतीय गद्य साहित्य का प्रारंभिक नमूना माना जाता है।
19. निम्नलिखित में से कौन-सा ब्राह्मण ग्रंथ ऋग्वेद से संबंधित है?
M.P.P.C.S. (Pre) 2017
उत्तर-(a)
ऐतरेय ब्राह्मण और कौषीतकी ब्राह्मण — ये दोनों ऋग्वेद से संबंधित हैं। ब्राह्मण ग्रंथ यज्ञ-अनुष्ठानों की विधि, उनके पुरोहितों की भूमिका और मंत्रों की व्याख्या करते हैं। ऐतरेय ब्राह्मण में राज्याभिषेक संस्कार का विस्तृत वर्णन मिलता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऐतरेय ब्राह्मण की रचना महिदास ऐतरेय को श्रेय दी जाती है। तैत्तिरीय ब्राह्मण कृष्ण यजुर्वेद से संबद्ध है। ब्राह्मण ग्रंथ वेदों के ‘कर्मकांड’ पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि उपनिषद ‘ज्ञानकांड’ पक्ष का।
20. ऋग्वेद का कौन-सा मंडल पूर्णतः ‘सोम’ को समर्पित है?
42nd B.P.S.C. (Pre) 1997
उत्तर-(c)
ऋग्वेद में कुल 10 मंडल हैं। इनमें नौवाँ मंडल पूर्णतः सोम देवता को समर्पित है और इसमें 114 सूक्त संकलित हैं। इसे ‘पवमान मंडल’ भी कहते हैं क्योंकि इसमें सोम के शुद्धिकरण (पवमान) की स्तुतियाँ हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद के दूसरे से सातवें मंडल को ‘वंश मंडल’ या ‘गोत्र मंडल’ कहा जाता है क्योंकि ये किसी विशेष ऋषि-परिवार द्वारा रचित हैं — जैसे तृतीय मंडल विश्वामित्र द्वारा, सप्तम मंडल वसिष्ठ द्वारा। ऋग्वेद का दसवाँ मंडल सबसे बाद में जोड़ा गया और इसमें प्रसिद्ध ‘पुरुष सूक्त’ तथा ‘नासदीय सूक्त’ हैं।
21. वैदिक नदी कुभा का स्थान कहां निर्धारित होना चाहिए?
U.P.P.C.S. (Pre) 1999
उत्तर-(a)
वैदिक नदी ‘कुभा’ आधुनिक काबुल नदी है, जो अफगानिस्तान में प्रवाहित होती है। ऋग्वेद में इसका उल्लेख आर्यों की उस भौगोलिक स्थिति का संकेत देता है जब वे अफगानिस्तान के क्षेत्रों में भी निवास करते थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में कुभा के साथ-साथ ‘क्रुमु’ (कुर्रम), ‘गोमती’ (गोमल) और ‘सुवास्तु’ (स्वात) नदियों का भी उल्लेख है, ये सभी आधुनिक अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमावर्ती क्षेत्र में बहती हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि ऋग्वैदिक आर्यों का विस्तार पंजाब से परे पश्चिम की ओर भी था।
22. उपनिषदों का मुख्य विषय है –
U.P.Lower Sub. (Pre) 1998
उत्तर-(b)
उपनिषदों का केंद्रीय विषय दर्शन (Philosophy) है। इनमें आत्मा (आत्मन्), ब्रह्म, जगत की उत्पत्ति, मृत्यु के बाद का जीवन और मोक्ष जैसे गहन दार्शनिक प्रश्नों की विवेचना की गई है। इन्हें ‘वेदांत’ कहा जाता है अर्थात् वेदों का अंतिम और सर्वोच्च ज्ञान।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उपनिषदों की कुल संख्या परंपरागत रूप से 108 मानी जाती है, किंतु दार्शनिक दृष्टि से आदि शंकराचार्य द्वारा भाष्यित 12 उपनिषद ही सर्वप्रमुख हैं। ‘तत्त्वमसि’ (तुम वही हो) और ‘अहं ब्रह्मास्मि’ (मैं ब्रह्म हूँ) — ये उपनिषदों के सबसे प्रसिद्ध महावाक्य हैं।
23. ऋग्वेद में निम्नांकित किन नदियों का उल्लेख अफगानिस्तान के साथ आर्यों के संबंध का सूचक है?
U.P.C.S. (Pre) 2010
उत्तर-(c)
ऋग्वेद में उल्लिखित कुभा (काबुल नदी), क्रुमु (कुर्रम नदी), गोमती (गोमल नदी) एवं सुवास्तु (स्वात नदी) — ये सभी आधुनिक अफगानिस्तान और पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में प्रवाहित होती थीं। इनके उल्लेख से सिद्ध होता है कि आर्यों का इस क्षेत्र से सघन भौगोलिक एवं सांस्कृतिक संबंध था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इसके विपरीत, अस्किनी (चेनाब), परुष्णी (रावी), विपाशा (ब्यास) और शुतुद्री (सतलज) — ये नदियाँ पंजाब क्षेत्र की हैं और ऋग्वेद में वर्णित ‘सप्त सिंधु’ (सात नदियों) का भाग मानी जाती हैं। दशराज युद्ध (दस राजाओं का युद्ध) परुष्णी (रावी) नदी के तट पर हुआ था।
24. उपनिषद काल के राजा अश्वपति थे –
U.P.P.C.S. (Pre) 1999
उत्तर-(b)
उपनिषद काल में राजा अश्वपति केकय जनपद के शासक थे। उपनिषदों में वर्णित प्रमुख दार्शनिक राजाओं में — विदेह के राजा जनक, पांचाल के राजा प्रवाहण जाबालि, केकय के राजा अश्वपति और काशी के राजा अजातशत्रु विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: राजा जनक को ‘विदेही’ भी कहा जाता था और वे याज्ञवल्क्य जैसे महान ऋषियों के शिष्य थे; बृहदारण्यक उपनिषद में उनके दरबार में हुई दार्शनिक वाद-विवाद सभाओं का विस्तृत वर्णन है। यह तथ्य उपनिषद काल में राजाओं की दार्शनिक अभिरुचि और ज्ञान-संरक्षण की परंपरा को दर्शाता है।
25. आरंभिक वैदिक साहित्य में सर्वाधिक वर्णित नदी है-
I.A.S. (Pre) 1996
उत्तर-(a)
ऋग्वैदिक काल में सिंधु नदी का सर्वोच्च आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व था, इसीलिए ऋग्वेद में इसका उल्लेख सबसे अधिक बार हुआ है। अपने प्रचुर जल और व्यापारिक महत्व के कारण सिंधु को ‘हिरण्यनी’ (स्वर्ण प्रदान करने वाली) कहा गया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सरस्वती नदी को ऋग्वेद में ‘नदीतमा’ (नदियों में श्रेष्ठ) कहा गया है और इसे देवी के रूप में भी पूजा जाता था; परवर्ती वैदिक काल में इसकी महत्ता बढ़ गई। गंगा नदी का उल्लेख ऋग्वेद में केवल एक बार (नदी-स्तुति सूक्त में) मिलता है, जो दर्शाता है कि उस काल में आर्यों का केंद्र गंगा घाटी नहीं बल्कि सप्त सिंधु क्षेत्र था।
26. निम्नलिखित में से किस एक वैदिक हित्य में मोक्ष की चर्चा मिलती है ?
U.P.P.C.S. (Mains) 2003
उत्तर-(d)
मोक्ष की अवधारणा वेदों के अंतिम भाग अर्थात् उपनिषदों में सर्वप्रथम प्रकट होती है। ‘मोक्ष’ शब्द का प्रथम प्रयोग ‘श्वेताश्वर उपनिषद’ में मिलता है। संहिताओं और ब्राह्मण ग्रंथों में इस शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उपनिषदों में मोक्ष को ‘ब्रह्म में आत्मा का विलीन हो जाना’ (ब्रह्मानुभव) बताया गया है। हिंदू दर्शन के चार पुरुषार्थों — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — में मोक्ष को सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है, और इसकी विधिवत दार्शनिक व्याख्या सर्वप्रथम उपनिषदों में ही हुई।
27. वैदिक नदी अस्किनी की पहचान निम्नांकित नदियों में से किस एक के साथ की जाती है ?
U.P.P.S.C. (GIC) 2010
उत्तर-(c)
वैदिक नाम ‘अस्किनी’ आधुनिक चेनाब नदी का पर्याय है। ऋग्वेद में पंजाब की नदियों के वैदिक नाम इस प्रकार हैं — विपाशा = ब्यास, परुष्णी = रावी, अस्किनी = चेनाब, वितस्ता = झेलम, शुतुद्री = सतलज।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इन पाँच नदियों के कारण ही इस क्षेत्र को ‘पंचनद’ (पाँच नदियों की भूमि) कहा गया, जो कालांतर में ‘पंजाब’ कहलाया। ऋग्वेद के प्रसिद्ध दशराज युद्ध में परुष्णी (रावी) नदी के तट पर सुदास ने दस राजाओं के गठबंधन को पराजित किया था।
28. अध्यात्म ज्ञान के विषय में नचिकेता और यम का संवाद किस उपनिषद में प्राप्त होता है?
I.A.S. (Pre) 1997
U.P.P.C.S. (Pre) 1999
U.P.U.D.A. / L.D.A. (Pre) 2002
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2005
U.P.P.C.S. (Pre) 1999
U.P.U.D.A. / L.D.A. (Pre) 2002
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2005
उत्तर-(c)
कठोपनिषद में यमराज और बालक नचिकेता के मध्य आत्मा की प्रकृति और मृत्यु के रहस्य पर हुए प्रसिद्ध संवाद का वर्णन है। यमराज ने नचिकेता को उपदेश दिया — “यह आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है; यह अजन्मा, नित्य और शाश्वत है।” कठोपनिषद कृष्ण यजुर्वेद की परंपरा से संबद्ध है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नचिकेता की कथा का सबसे प्रारंभिक उल्लेख ऋग्वेद (10.135) और तैत्तिरीय ब्राह्मण में मिलता है, किंतु इसका विस्तृत दार्शनिक रूप कठोपनिषद में ही प्राप्त होता है। स्वामी विवेकानंद कठोपनिषद को वेदांत दर्शन की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्तियों में से एक मानते थे।
29. नचिकेता आख्यान का उल्लेख मिलता है-
U.P.P.C.S. (Mains) 2006
उत्तर-(c)
नचिकेता आख्यान का सर्वाधिक विस्तृत एवं दार्शनिक वर्णन कठोपनिषद में मिलता है। इस आख्यान में बालक नचिकेता अपने पिता वाजश्रवा द्वारा यमराज को दान किए जाने पर यम के पास पहुँचता है और वहाँ आत्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त करता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नचिकेता ने यमराज से तीन वर माँगे थे — पहला, पिता की प्रसन्नता; दूसरा, स्वर्गलोक की अग्नि-विद्या; और तीसरा, मृत्यु के बाद आत्मा के रहस्य का ज्ञान। यह तीसरा वर ही कठोपनिषद का मूल विषय है और इसे भारतीय दार्शनिक चिंतन की सर्वोच्च उपलब्धियों में गिना जाता है।
30. निम्नलिखित में से वैदिक साहित्य का सही क्रम कौन-सा है ?
U.P.P.C.S. (Mains ) 2014
उत्तर-(a)
वैदिक साहित्य का कालक्रमानुसार सही क्रम है — (1) वैदिक संहिताएं (ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद), (2) ब्राह्मण ग्रंथ (यज्ञ-विधान की व्याख्या), (3) आरण्यक (वन-ग्रंथ, यज्ञ के आंतरिक अर्थ की विवेचना), (4) उपनिषद (दार्शनिक विवेचन)। यह क्रम वैदिक चिंतन के कर्मकांड से ज्ञानकांड की ओर विकास को दर्शाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: आरण्यक का शाब्दिक अर्थ है ‘वन में रचित ग्रंथ’ — ये वानप्रस्थ आश्रम के लोगों के लिए लिखे गए थे और ब्राह्मण तथा उपनिषद के बीच की कड़ी माने जाते हैं। उपनिषद इसी श्रृंखला की अंतिम एवं दार्शनिक दृष्टि से सर्वोच्च कड़ी हैं, इसीलिए इन्हें ‘वेदांत’ कहा जाता है।
31. बोगजकोई महत्वपूर्ण है, क्योंकि-
U.P.P.C.S. (Pre) 1996
39th B.P.S.C. (Pre) 1994
39th B.P.S.C. (Pre) 1994
उत्तर-(b)
बोगजकोई (Bogazkoy) आधुनिक तुर्की (एशिया माइनर) में स्थित एक पुरातात्त्विक स्थल है। यहाँ से प्राप्त लगभग 1400 ई.पू. के हित्ती-मितन्नी संधि-अभिलेखों में इंद्र, वरुण, मित्र और नासत्य जैसे ऋग्वैदिक देवताओं के नाम मिले हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि वैदिक आर्य ईरान होते हुए भारत आए और उनका प्रभाव मध्य एशिया तक फैला था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:बोगजकोई से मिले अभिलेख हित्ती भाषा में लिखे गए थे, जो भारोपीय भाषा परिवार की ही एक शाखा है — यह तथ्य वैदिक आर्यों और पश्चिम एशियाई सभ्यताओं के साझा मूल की ओर संकेत करता है। इसके अतिरिक्त, इन अभिलेखों में उल्लिखित देवता ‘नासत्य’ ऋग्वेद के अश्विन देवताओं से पहचाने जाते हैं, जो वैदिक सभ्यता की व्यापक भौगोलिक उपस्थिति को सिद्ध करता है।
32. निम्नलिखित में से कौन सी प्रथा चतुष्टय वेदोत्तर काल में प्रचलित हुई?
I.A.S. (Pre) 1994
उत्तर-(a&c)
चारों पुरुषार्थ — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — की अवधारणा वेदोत्तर काल में विकसित हुई। ऋग्वैदिक काल में ‘मोक्ष’ की संकल्पना नहीं थी; यह विचार सर्वप्रथम उपनिषदों में प्रकट हुआ। उसी प्रकार चतुराश्रम व्यवस्था (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास) भी वेदोत्तर काल की देन है। ‘आश्रम’ शब्द संस्कृत की ‘श्रम’ धातु से बना है जिसका अर्थ है — परिश्रम या साधना।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘पुरुषार्थ’ की चतुष्टय व्यवस्था में मोक्ष को सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है और इसे सर्वप्रथम बृहदारण्यक उपनिषद में स्पष्ट रूप से वर्णित किया गया। इसके अलावा, आश्रम व्यवस्था का सबसे प्रारंभिक उल्लेख जाबालोपनिषद में मिलता है, जो इसकी उत्तर-वैदिक उत्पत्ति को प्रमाणित करता है।
33. निम्नलिखित वैदिक देवताओं में किसे उनका पुरोहित माना जाता था?
U.P.P.C.S. (Mains) 2013
उत्तर-(b)
वैदिक परंपरा में बृहस्पति को देवताओं का पुरोहित (देवगुरु) माना जाता था। वे ज्ञान, वाणी और बुद्धि के अधिपति देवता हैं। ऋग्वेद में बृहस्पति को ‘वाचस्पति’ भी कहा गया है — अर्थात वाणी के स्वामी। इसी कारण उन्हें देवताओं के यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों में पुरोहित की भूमिका दी गई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जिस प्रकार देवताओं के गुरु बृहस्पति हैं, उसी प्रकार असुरों (दैत्यों) के गुरु शुक्राचार्य को माना जाता है। इसके अलावा, अग्नि को भी वैदिक साहित्य में ‘पुरोहित’ कहा गया है — किंतु वे मनुष्यों और देवताओं के बीच यज्ञ-संदेशवाहक के रूप में पुरोहित हैं, जबकि बृहस्पति स्वयं देव-समाज के आचार्य हैं।
34. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट से सही
सूची-1 (वैदिक नदियां ) सूची-II (आधुनिक नाम)
A. कुभा 1. गंडक
B. परुष्णी 2. काबुल
C. सदानीरा 3. रावी
D. शुतुद्री 4. सतलज
कूट :
उत्तर का चयन कीजिए:
सूची-1 (वैदिक नदियां ) सूची-II (आधुनिक नाम)
A. कुभा 1. गंडक
B. परुष्णी 2. काबुल
C. सदानीरा 3. रावी
D. शुतुद्री 4. सतलज
कूट :
उत्तर का चयन कीजिए:
U.P.P.C.S. (Pre) 2012
उत्तर-(b)
वैदिक साहित्य में उल्लिखित नदियों और उनके आधुनिक नामों का सुमेलन इस प्रकार है — कुभा = काबुल, परुष्णी = रावी, सदानीरा = गंडक, तथा शुतुद्री (या शत्रुद्रि) = सतलज। ये नदियाँ मुख्यतः उत्तर-पश्चिम भारत और वर्तमान पाकिस्तान-अफगानिस्तान क्षेत्र में प्रवाहित होती थीं और वैदिक सभ्यता के विस्तार की साक्षी रही हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद के ‘नदी-सूक्त’ (10वें मंडल) में कुल 10 नदियों का पश्चिम से पूर्व की ओर उल्लेख है — गंगा से शुरू होकर सिंधु तक। इनमें सरस्वती नदी को सबसे पवित्र माना जाता था जो आज की घग्गर-हाकरा नदी के रूप में पहचानी जाती है और वर्तमान में लुप्तप्राय है। इसी सरस्वती के तट पर वैदिक संस्कृति का केंद्र था।
35. ऋग्वैदिक काल में निष्क शब्द का प्रयोग एक आभूषण के लिए होता था, किंतु परवर्ती काल में उसका प्रयोग इस अर्थ में हुआ-
I.A.S. (Pre) 1993
उत्तर-(d)
ऋग्वैदिक काल में ‘निष्क’ सोने का बना एक गले का आभूषण (हार) था जिसे राजा और कुलीन वर्ग के लोग धारण करते थे। कालांतर में, जब मुद्रा-विनिमय की प्रणाली विकसित हुई, तो यही ‘निष्क’ शब्द सोने के सिक्के के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा। इस प्रकार आभूषण से मुद्रा की यह यात्रा वैदिक अर्थव्यवस्था के विकास को दर्शाती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वैदिक काल में विनिमय की मुख्य इकाई ‘गाय’ (गव्य) थी और ‘निष्क’ उससे ऊँचे मूल्य की इकाई मानी जाती थी। बाद में मौर्य काल में ‘पण’ (punch-marked coins) सर्वाधिक प्रचलित मुद्रा बने। भारत में सबसे प्राचीन ज्ञात धातु-मुद्राएँ ‘आहत सिक्के’ (Punch Marked Coins) हैं जो लगभग 600 ई.पू. के आसपास प्रचलित हुईं।
36. “धर्म “तथा “ऋत” भारत की प्राचीन वैदिक सभ्यता के एक द्रीय विचार को चित्रित करते हैं। इस संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. धर्म व्यक्ति के दायित्वों एवं स्वयं तथा दूसरों के प्रति व्यक्तिगत कर्तव्यों की संकल्पना था।
2. ऋत मूलभूत नैतिक विधान था, जो सृष्टि और उसमें अंतर्निहित सारे तत्वों के क्रियाकलापों को संचालित करता था। उपर्युक्त में से कौन-सा / कौन-से कथन सही है/हैं?
1. धर्म व्यक्ति के दायित्वों एवं स्वयं तथा दूसरों के प्रति व्यक्तिगत कर्तव्यों की संकल्पना था।
2. ऋत मूलभूत नैतिक विधान था, जो सृष्टि और उसमें अंतर्निहित सारे तत्वों के क्रियाकलापों को संचालित करता था। उपर्युक्त में से कौन-सा / कौन-से कथन सही है/हैं?
I.A.S. (Pre) 2011
उत्तर-(c)
वैदिक सभ्यता में ‘धर्म’ और ‘ऋत’ दोनों ही मौलिक नैतिक-दार्शनिक अवधारणाएँ हैं। धर्म व्यक्ति के नैतिक कर्तव्यों और सामाजिक उत्तरदायित्वों की संकल्पना को व्यक्त करता है, जबकि ऋत ब्रह्मांडीय नियम है जो समस्त सृष्टि की व्यवस्था और प्राकृतिक क्रम को नियंत्रित करता है। वरुण देव इस ‘ऋत’ के संरक्षक थे और इसीलिए उन्हें ‘ऋतस्य गोपा’ कहा जाता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में ‘ऋत’ शब्द का प्रयोग लगभग 390 बार हुआ है, जो इस अवधारणा की केंद्रीयता को दर्शाता है। ईरानी (अवेस्ता) ग्रंथों में ‘ऋत’ का समकक्ष ‘आशा’ (Asha) है, जो वहाँ भी नैतिक-सत्य के नियामक के रूप में पूजित है — यह भारत-ईरानी सांस्कृतिक साझेदारी का प्रमाण है।
37. भारतीय संस्कृति के अंतर्गत ‘ऋत’ का अर्थ है-
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2016
उत्तर-(a)
‘ऋत’ वैदिक दर्शन की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण अवधारणा है जिसका शाब्दिक और भावार्थ ‘ब्रह्मांडीय प्राकृतिक नियम’ है। यह वह अदृश्य शक्ति है जो ऋतुओं के परिवर्तन, सूर्योदय-सूर्यास्त, नदियों के प्रवाह और जीव-जगत के समस्त क्रियाकलापों को सुव्यवस्थित रखती है। ऋग्वेद में सृष्टि के प्रारंभ में ऋत की उत्पत्ति को प्राथमिक माना गया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘ऋत’ से ही संस्कृत का ‘ऋतु’ शब्द बना है, जो छह ऋतुओं के प्राकृतिक चक्र को दर्शाता है। वैदिक देवता मित्र और वरुण दोनों को संयुक्त रूप से ‘ऋत के रक्षक’ माना गया था — मित्र दिन और सामाजिक नियम के और वरुण रात्रि एवं नैतिक व्यवस्था के देवता के रूप में।
38. निम्नलिखित में से कौन सी वह ब्रह्मवादिनी थी, जिसने कुछ वेद मंत्रों की रचना की थी ?
I.A.S. (Pre) 1995
उत्तर-(a)
वैदिक साहित्य में अनेक विदुषी स्त्रियों — जिन्हें ‘ब्रह्मवादिनी’ कहा जाता था — का उल्लेख मिलता है जिन्होंने वेद मंत्रों की रचना की। इनमें लोपामुद्रा प्रमुख हैं जो महर्षि अगस्त्य की पत्नी थीं और जिन्होंने ऋग्वेद के प्रथम मंडल का एक सूक्त रचा। इसके अतिरिक्त अपाला, घोषा और विश्ववारा भी प्रसिद्ध ब्रह्मवादिनी थीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में कुल 27 महिला ऋषियों (द्रष्टाओं) का उल्लेख है जिन्होंने मंत्रों की रचना की। गार्गी और मैत्रेयी, हालांकि वेद मंत्रों की रचयित्री नहीं थीं, किंतु बृहदारण्यक उपनिषद के दार्शनिक संवादों में उनकी उपस्थिति वैदिक काल में नारी की बौद्धिक स्वतंत्रता को प्रमाणित करती है।
39. ऋग्वैदिक काल में निष्क किस अंग का आभूषण था ?
U.P.P.C.S. (Mains ) 2007
उत्तर-(b)
ऋग्वैदिक काल में ‘निष्क’ गले में धारण किया जाने वाला एक विशिष्ट सुवर्ण (स्वर्ण) हार था। यह आभूषण सामाजिक प्रतिष्ठा और धन-संपदा का प्रतीक माना जाता था। राजा और अमीर वर्ग के व्यक्ति इसे विशेष अवसरों पर पहनते थे। वैदिक काल में ‘निष्क’ विनिमय के माध्यम के रूप में भी प्रचलित था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वैदिक काल के अन्य प्रसिद्ध आभूषणों में ‘रुक्म’ (सोने का वक्षाभूषण), ‘कर्णशोभन’ (कान का आभूषण) और ‘खादि’ (कंगन) का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में दान में दी जाने वाली वस्तुओं में निष्क का विशेष उल्लेख है, जो तत्कालीन दानशीलता और सामाजिक मूल्यों को दर्शाता है।
40. प्राचीन भारत में ‘निशाका’ जाने जाते थे –
U.P.P.C.S. (Pre) 2005
उत्तर-(a)
बौद्ध जातक ग्रंथों में तीन प्रकार के स्वर्ण सिक्कों का वर्णन मिलता है। इनमें ‘निशाका’ (निष्क) सर्वोच्च मूल्य की स्वर्ण मुद्रा थी, ‘सुवर्ण’ मध्यम और ‘मशाका’ सबसे न्यून मूल्य की। इस प्रकार प्राचीन भारत में स्वर्ण आभूषणों से विकसित होकर मुद्रा-व्यवस्था एक परिष्कृत रूप ले चुकी थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जातक कथाओं में ‘कार्षापण’ का उल्लेख भी एक महत्त्वपूर्ण मुद्रा के रूप में मिलता है जो विभिन्न धातुओं (सोना, चाँदी, ताँबा) में ढाली जाती थी। कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में भी मुद्राओं की विभिन्न श्रेणियों का विस्तृत विवरण दिया गया है, जो मौर्यकालीन उन्नत मौद्रिक व्यवस्था को दर्शाता है।
41. प्रसिद्ध दस राजाओं का युद्ध किस के तट पर लड़ा गया ?
42nd B.P.S. C. (Pre) 1997
उत्तर-(d)
दशराज्ञ युद्ध ऋग्वेद के सातवें मण्डल में वर्णित एक ऐतिहासिक संघर्ष है, जो परुष्णी नदी (आधुनिक रावी नदी, पंजाब) के तट पर लड़ा गया था। इस युद्ध में भरत जनजाति के राजा सुदास ने दस राजाओं के एक शक्तिशाली गठबंधन को परास्त किया। सुदास के पुरोहित विश्वामित्र थे, परंतु बाद में वशिष्ठ उनके राजपुरोहित बने।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:
• दशराज्ञ युद्ध को विश्व के प्राचीनतम दर्ज युद्धों में से एक माना जाता है, जो लगभग 1100 ई.पू. में हुआ था।
• इस युद्ध में पराजित राजाओं में अनु, द्रुह्यु, यदु, तुर्वश और पुरु जैसे प्रमुख आर्य कबीले शामिल थे।
• इस युद्ध में पराजित राजाओं में अनु, द्रुह्यु, यदु, तुर्वश और पुरु जैसे प्रमुख आर्य कबीले शामिल थे।
42. निम्नलिखित अभिलेखों में से कौन-सा ईरान से भारत में आर्यों के आने की सूचना देता है ?
U.P.P.C.S. (Mains) 2009
उत्तर-(c)
बोगजकोई अभिलेख (Boghaz-köi Inscription) आधुनिक तुर्की में स्थित है और यह लगभग 1400 ई.पू. का है। इसमें मित्र, वरुण, इंद्र एवं नासत्य जैसे वैदिक देवताओं का उल्लेख मिलता है, जो यह सिद्ध करता है कि आर्य मध्य एशिया से होते हुए ईरान और फिर भारत में आए। यह अभिलेख हित्ती राजा और मित्तानी राजा के बीच संधि का दस्तावेज़ है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:
• यह अभिलेख 1906-07 में जर्मन पुरातत्वविद् हुगो विंकलर (Hugo Winckler) ने खोजा था।
• मानसेहरा और शहबाजगढ़ी अभिलेख सम्राट अशोक के खरोष्ठी लिपि में लिखे गए शिलालेख हैं, जिनका आर्यों के आगमन से कोई संबंध नहीं है।
• मानसेहरा और शहबाजगढ़ी अभिलेख सम्राट अशोक के खरोष्ठी लिपि में लिखे गए शिलालेख हैं, जिनका आर्यों के आगमन से कोई संबंध नहीं है।
43. आर्यों का धर्म प्रमुखतः था-
I.A.S. (Pre) 2012
उत्तर-(c)
पूर्व वैदिक आर्यों का धर्म मुख्यतः प्रकृति की शक्तियों की उपासना (जैसे अग्नि, वायु, वरुण, इंद्र, सूर्य) और यज्ञ-अनुष्ठानों पर केंद्रित था। वे प्राकृतिक तत्त्वों को देवता मानकर उनकी स्तुति में ऋचाएं रचते और यज्ञ में आहुतियां देते थे। मूर्ति पूजा एवं भक्ति आंदोलन का उदय उत्तर वैदिक काल के बाद पुराण युग में हुआ।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:
• ऋग्वेद में 33 देवताओं का उल्लेख है, जिन्हें तीन श्रेणियों में बाँटा गया है — आकाश, वायु/अंतरिक्ष और पृथ्वी के देव।
• इंद्र ऋग्वेद के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देवता हैं — उनकी स्तुति में सबसे अधिक (250 से अधिक) ऋचाएं हैं।
• इंद्र ऋग्वेद के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देवता हैं — उनकी स्तुति में सबसे अधिक (250 से अधिक) ऋचाएं हैं।
44. निम्नलिखित में से किसने आर्यों के के आदि देश के बारे में लिखा था?
U.P.P.C.S. (Pre) 1996
उत्तर-(d)
बाल गंगाधर तिलक ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “The Arctic Home in the Vedas” (1903) में यह तर्क प्रस्तुत किया कि आर्यों का मूल निवास उत्तरी ध्रुव (आर्कटिक क्षेत्र) था। उन्होंने ऋग्वेद और अवेस्ता के खगोलीय संदर्भों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला। हालाँकि अधिकांश इतिहासकार इस मत को स्वीकार नहीं करते।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:
• आर्यों के मूल निवास के संदर्भ में सबसे अधिक मान्य मत मैक्स मूलर का है, जिन्होंने मध्य एशिया (बैक्ट्रिया) को आर्यों का आदि देश बताया।
• तिलक ने एक अन्य प्रसिद्ध पुस्तक “Orion” (1893) भी लिखी, जो वेदों की खगोलीय व्याख्या पर आधारित है।
• तिलक ने एक अन्य प्रसिद्ध पुस्तक “Orion” (1893) भी लिखी, जो वेदों की खगोलीय व्याख्या पर आधारित है।
45. उत्तर वैदिक काल में निम्नलिखित में से किनको आर्य संस्कृति का धुर समझा जाता था ?
U.P.P.C.S. (Mains ) 2007
उत्तर-(c)
उत्तर वैदिक काल (लगभग 1000–600 ई.पू.) में कुरु और पांचाल जनपद वैदिक सभ्यता के सांस्कृतिक एवं धार्मिक केंद्र बन गए थे। ये क्षेत्र आधुनिक उत्तर प्रदेश और हरियाणा में स्थित थे। इन्हें ‘मध्यदेश’ कहा जाता था और ये आर्य धर्म व संस्कृति का मुख्य संस्थान माने जाते थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:
• उत्तर वैदिक काल में लोहे के हथियारों और औजारों का व्यापक प्रयोग शुरू हुआ, जिससे कृषि का विस्तार हुआ और इन्हीं क्षेत्रों में पहले नगर विकसित हुए।
• महाभारत में वर्णित कुरुक्षेत्र का युद्ध इसी कुरु जनपद की भूमि पर हुआ था, जो इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्त्व को दर्शाता है।
• महाभारत में वर्णित कुरुक्षेत्र का युद्ध इसी कुरु जनपद की भूमि पर हुआ था, जो इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्त्व को दर्शाता है।
46. ऋग्वेद काल में जनता निम्न में से मुख्यतया किसमें विश्वास करती थी ?
U.P.P.C.S. (Pre) 1993
उत्तर-(d)
ऋग्वैदिक काल में समाज प्रकृति की शक्तियों (इंद्र, वरुण, अग्नि, मरुत आदि देवताओं) की स्तुति में यज्ञ, बलि और कर्मकांड में विश्वास रखता था। देवताओं को प्रसन्न करने के लिए सोमयज्ञ, अश्वमेध जैसे अनुष्ठान किए जाते थे। इस काल में मूर्ति पूजा या एकेश्वरवाद का प्रचलन नहीं था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:
• ऋग्वेद के दशम मण्डल के ‘नासदीय सूक्त’ में सृष्टि की उत्पत्ति पर दार्शनिक चिंतन मिलता है, जो एकत्ववाद (Monism) की दिशा में एक प्रारंभिक कदम माना जाता है।
• ‘सोमरस’ एक महत्त्वपूर्ण यज्ञीय पेय था जिसे देवताओं को अर्पित किया जाता था; ऋग्वेद का नौवाँ मण्डल पूर्णतः सोम की स्तुति को समर्पित है।
• ‘सोमरस’ एक महत्त्वपूर्ण यज्ञीय पेय था जिसे देवताओं को अर्पित किया जाता था; ऋग्वेद का नौवाँ मण्डल पूर्णतः सोम की स्तुति को समर्पित है।
47. 14वीं सदी ई.पू. का एक अभिलेख जिसमें वैदिक देवताओं का
वर्णन है, प्राप्त हुआ है –
U.P.P.C.S (Mains) 2016
उत्तर-(b)
तुर्की के बोगजकोई (Boghaz-köi) नामक स्थान से प्राप्त 14वीं शताब्दी ई.पू. का यह अभिलेख हित्ती राजा सुब्बिलुलियुमा और मित्तानी राजा मत्तिवाजा के बीच की संधि का दस्तावेज़ है। इसमें मित्र, वरुण, इंद्र और नासत्य (अश्विन) — चार वैदिक देवताओं के नाम साक्षी के रूप में लिए गए हैं, जो आर्यों के मध्य एशिया में प्रसार का प्रमाण है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:
• मित्तानी साम्राज्य (उत्तरी मेसोपोटामिया/आधुनिक सीरिया) में शासक वर्ग की भाषा संस्कृत के निकट थी, जो आर्य भाषा परिवार से संबंधित मानी जाती है।
• विसोटुन (बेहिस्तून) अभिलेख ईरान में है और इसमें फारसी राजा दारयवहुश (डेरियस प्रथम) की उपलब्धियों का वर्णन है — यह वैदिक देवताओं से असंबंधित है।
• विसोटुन (बेहिस्तून) अभिलेख ईरान में है और इसमें फारसी राजा दारयवहुश (डेरियस प्रथम) की उपलब्धियों का वर्णन है — यह वैदिक देवताओं से असंबंधित है।
48. शतपथ ब्राह्मण में उल्लिखित राजा विदेध माधव से संबंधित ऋषि थे-
U.P. Lower Sub. (Pre) 2015
उत्तर-(d)
शतपथ ब्राह्मण की एक प्रसिद्ध आख्यायिका में वर्णन है कि राजा विदेध माधव अपने पुरोहित ऋषि गौतम राहुगण के साथ पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़े और सदानीरा नदी (आधुनिक गंडक) को पार करते हुए विदेह (मिथिला/उत्तरी बिहार) राज्य की स्थापना की। यह कथा वैदिक आर्यों के पूर्व दिशा में सरस्वती से गंगा-यमुना की ओर विस्तार का प्रतीकात्मक वर्णन है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:
• शतपथ ब्राह्मण शुक्ल यजुर्वेद का ब्राह्मण ग्रंथ है और इसकी रचना याज्ञवल्क्य से संबंधित मानी जाती है — यह विश्व के सबसे बड़े वैदिक गद्य ग्रंथों में से एक है।
• इस आख्यायिका में अग्नि देवता की भूमिका महत्त्वपूर्ण है — ऋषि गौतम राहुगण अग्नि को अपने मुख में धारण करते थे और जहाँ-जहाँ अग्नि जलाई गई, उन वनों को आर्य भूमि मान लिया गया।
• इस आख्यायिका में अग्नि देवता की भूमिका महत्त्वपूर्ण है — ऋषि गौतम राहुगण अग्नि को अपने मुख में धारण करते थे और जहाँ-जहाँ अग्नि जलाई गई, उन वनों को आर्य भूमि मान लिया गया।
49. गोत्र शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम हुआ था-
U.P.P.C.S (Mains) 2005
उत्तर-(b)
गोत्र शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग ऋग्वेद में हुआ था। इस काल में इसका अर्थ था — गोष्ठ अर्थात वह स्थान जहाँ किसी कुल का पशुधन (गाय आदि) एक साथ पाला जाता था। कालांतर में उत्तर वैदिक काल तक आते-आते ‘गोत्र’ का अर्थ एक ऋषि से उत्पन्न वंश-परंपरा में बदल गया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:
• ‘गोत्र’ व्यवस्था एक्सोगैमी (बहिर्विवाह) के नियमों पर आधारित थी — एक ही गोत्र में विवाह वर्जित माना जाता था।
• प्राचीन भारत में आठ मूल गोत्र माने जाते थे, जो अष्टर्षि से संबंधित हैं — विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप और अगस्त्य।
• प्राचीन भारत में आठ मूल गोत्र माने जाते थे, जो अष्टर्षि से संबंधित हैं — विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप और अगस्त्य।
50. जिस ग्रंथ में ‘पुरुषमेध’ का उल्लेख हुआ है, वह है-
P.C.S. (SpL) (Pre) 2008
उत्तर-(*)
पुरुषमेध एक प्रतीकात्मक यज्ञ है जिसका उल्लेख एक से अधिक ग्रंथों में मिलता है — शुक्ल यजुर्वेद के तीसवें अध्याय, कृष्ण यजुर्वेद (तैत्तिरीय संहिता), तथा शुक्ल यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण में। चूँकि प्रश्न के विकल्पों में तीनों ग्रंथ उपस्थित हैं, इसलिए कोई एकल उत्तर सही नहीं है। अधिकांश इतिहासकार शतपथ ब्राह्मण का विशेष उल्लेख करते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:
• अधिकांश इतिहासकार मानते हैं कि पुरुषमेध कभी वास्तविक रूप से नहीं किया गया — यह एक प्रतीकात्मक (symbolic) यज्ञ था जिसमें मनुष्य को यज्ञवेदी पर बाँधकर बाद में मुक्त कर दिया जाता था।
• शुक्ल यजुर्वेद के 30वें अध्याय में पुरुषमेध के अंतर्गत विभिन्न व्यवसायों और वर्गों के 184 व्यक्तियों की सूची दी गई है, जो उस काल के सामाजिक वर्गीकरण को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
• शुक्ल यजुर्वेद के 30वें अध्याय में पुरुषमेध के अंतर्गत विभिन्न व्यवसायों और वर्गों के 184 व्यक्तियों की सूची दी गई है, जो उस काल के सामाजिक वर्गीकरण को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
51. किस वेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियां कहा गया है ?
U.P.P.C.S. (Mains) 2009
उत्तर-(d)
अथर्ववेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ बताया गया है, जो वैदिक काल की दो प्रमुख शासन-संस्थाएँ थीं। सभा मुख्यतः कुलीन और वृद्ध जनों की परिषद थी, जबकि समिति एक व्यापक जन-सभा थी जिसमें सामान्य नागरिक भी भाग लेते थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में ‘सभा’ का उल्लेख 8 बार तथा ‘समिति’ का 9 बार मिलता है। विद्वान पी.वी. काणे के अनुसार सभा न्यायिक कार्यों से भी जुड़ी थी और उसमें द्यूतक्रीड़ा (जुआ) भी खेला जाता था।
52. ऋग्वैदिक ‘पणि’ किस वर्ग के नागरिक थे?
M.P.P.C.S. (Pre) 2019
उत्तर-(d)
ऋग्वेद में ‘पणि’ शब्द उन धनी व्यापारियों के लिए प्रयुक्त हुआ है जो वाणिज्य और साहूकारी करते थे। ये लोग ऊँची ब्याज दर पर ऋण देते थे, इसीलिए इन्हें ‘सूदखोर’ की संज्ञा दी गई। आर्य इनसे प्रायः शत्रुभाव रखते थे क्योंकि ये देवताओं की पूजा नहीं करते थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पणि शब्द से ही संस्कृत का ‘वणिज्’ और आधुनिक ‘बनिया’ शब्द व्युत्पन्न माने जाते हैं। ऋग्वेद में ‘निष्क’ नामक स्वर्ण मुद्रा का उल्लेख है, जिसे व्यापार में मुद्रा के रूप में प्रयोग किया जाता था।
53. ऋग्वेद में उल्लिखित प्रसिद्ध ‘दस-राजाओं’ का युद्ध किस नदी के किनारे लड़ा गया था?
U.P.P.C.S.. (Spl.) (Mains) 2008
उत्तर-(a)
ऋग्वेद के सातवें मंडल में वर्णित ‘दाशराज्ञ युद्ध’ (दस राजाओं का युद्ध) परुष्णी नदी (आधुनिक रावी नदी) के तट पर लड़ा गया था। इस युद्ध में भरत जनजाति के राजा सुदास ने दस शत्रु राजाओं के संघ को पराजित किया था। यह युद्ध ऋग्वैदिक काल की सबसे महत्त्वपूर्ण सैन्य घटना मानी जाती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: दस राजाओं के संघ में पाँच आर्य जनजातियाँ (पुरु, यदु, तुर्वश, अनु, द्रुह्यु) और पाँच अनार्य जनजातियाँ शामिल थीं। इस विजय के बाद भरत जन सर्वोच्च आर्य जनजाति बन गई और भारतवर्ष का नाम इन्हीं के नाम पर पड़ा।
54. वैदिकयुगीन सभा-
R.A.S. / R.T.S. (Pre) 1994
उत्तर-(c)
वैदिक युग में ‘सभा’ मुख्यतः कुलीन, वृद्ध और प्रभावशाली व्यक्तियों की एक चुनिंदा परिषद थी जो राजा को परामर्श देती थी और उसकी निरंकुशता पर अंकुश रखती थी। यह मंत्रिपरिषद के समान कार्य करती थी। इसके विपरीत ‘समिति’ एक व्यापक जन-सभा थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वैदिक काल में ‘विदथ’ नामक एक तीसरी संस्था भी थी जो आर्थिक एवं धार्मिक कार्यों से जुड़ी थी। ऋग्वेद में ‘विदथ’ का उल्लेख सबसे अधिक बार (लगभग 122 बार) हुआ है, जो उसके महत्त्व को दर्शाता है।
55. सूची-1 एवं सूची-1 को सुमेलित कीजिए तथा नीचे दिए गए कूट सही उत्तर चुनिए-
सूची – I सूची – II
(a) ब्रीही (i) गन्ना
(b) मुद्ग (ii) चावल
(c) यव (iii) चावल
(d) इक्षु (iv) चावल
कूट :
सूची – I सूची – II
(a) ब्रीही (i) गन्ना
(b) मुद्ग (ii) चावल
(c) यव (iii) चावल
(d) इक्षु (iv) चावल
कूट :
R.A.S. / R.T.S (Pre) 2021
उत्तर-(d)
वैदिक साहित्य में कृषि उत्पादों के लिए विशिष्ट संस्कृत शब्दों का प्रयोग हुआ है — व्रीही (चावल), मुद्ग (मूँग), यव (जौ) और इक्षु (गन्ना)। इनमें से जौ (यव) ऋग्वैदिक काल की सर्वप्रमुख फसल थी जबकि चावल (व्रीही) का उत्तर वैदिक काल में अधिक महत्त्व बढ़ा।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अथर्ववेद में ‘तिल’ और ‘उमा’ (अलसी) जैसी फसलों का भी उल्लेख मिलता है। उत्तर वैदिक ग्रंथ शतपथ ब्राह्मण में व्रीही (चावल) और यव (जौ) को ‘अन्नों का राजा’ कहा गया है।
56. उस जनजाति का नाम बतलाइए, जो ऋग्वैदिक आर्यों के पंचजन
से संबंधित नहीं है-
U.P.P.C.S. (Mains) 2009
उत्तर-(d)
ऋग्वैदिक ‘पंचजन’ में पाँच प्रमुख आर्य जनजातियाँ — यदु, द्रुह्यु, पुरु, अनु और तुर्वसु — सम्मिलित थीं। ‘किकट’ इनमें से कोई नहीं है; यह एक अनार्य जाति थी जो मगध क्षेत्र में निवास करती थी और वैदिक धर्म से अपरिचित थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद के तृतीय मंडल में किकटों को ‘अव्रत’ (यज्ञ न करने वाले) कहा गया है। बाद के काल में ‘पुरु’ जनजाति सर्वाधिक प्रभावशाली बनी और ‘भरत’ जन उसी की शाखा थी जिसके नाम पर ‘भारत’ नाम पड़ा।
57. प्राचीन काल में आर्यों के जीविकोपार्जन का मुख्य साधन था –
U.P.P.C.S. (Pre) 1993
उत्तर-(a)
आर्यों की अर्थव्यवस्था मूलतः कृषि और पशुपालन पर आधारित थी। ऋग्वेद में वर्षा की कामना, हल चलाने, और फसल काटने के अनेक संदर्भ मिलते हैं। ‘गो’ (गाय) सबसे महत्त्वपूर्ण सम्पत्ति थी और युद्ध प्रायः गायों के लिए लड़े जाते थे। उत्तर वैदिक काल में कृषि और अधिक विकसित हुई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में ‘गव्य’ (गायों का समूह) और ‘गोत्र’ (गायों का बाड़ा) जैसे शब्द आर्थिक जीवन में पशुओं के केंद्रीय महत्त्व को दर्शाते हैं। ऋग्वेद में ‘युद्ध’ के लिए ‘गविष्टि’ शब्द भी प्रयुक्त है जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘गायों की खोज।’
58. निम्न में से किस नदी को ऋग्वेद में “मातेतमा’ ‘देवीतमा’ एवं ‘नदीतमा’ संबोधित किया है ?
U.P.P.C.S. (Spl.) (Mains) 2008
उत्तर-(b)
ऋग्वेद में सरस्वती नदी को सर्वोच्च सम्मान दिया गया है — उसे ‘मातेतमा’ (सर्वश्रेष्ठ माँ), ‘देवीतमा’ (सर्वश्रेष्ठ देवी) और ‘नदीतमा’ (सर्वश्रेष्ठ नदी) कहा गया है। यह नदी वैदिक सभ्यता के केंद्र में थी और इसी के तट पर अनेक यज्ञ और सांस्कृतिक क्रियाकलाप होते थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: आधुनिक भूविज्ञान और उपग्रह चित्रों के आधार पर माना जाता है कि सरस्वती नदी लगभग 4000 वर्ष पूर्व जलवायु परिवर्तन और भूगर्भीय हलचलों के कारण विलुप्त हो गई। ऋग्वेद में सरस्वती को ‘सिन्धु माता’ भी कहा गया है, जो उसके विशाल आकार का संकेत देता है।
59. ऋग्वेद में उल्लिखित ‘यव’ शब्द किस कृषि उत्पाद हेतु प्रयुक्त किया गया है ?
U.P.P.C.S. (Spl.) (Mains) 2008
उत्तर-(a)
ऋग्वेद में ‘यव’ शब्द जौ (Barley) के लिए प्रयुक्त हुआ है। जौ ऋग्वैदिक काल की सबसे प्रमुख और व्यापक रूप से उगाई जाने वाली फसल थी। इसका उपयोग भोजन, यज्ञ में आहुति और ‘सुरा’ (मदिरा) बनाने में होता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में ‘धान्य’ शब्द का सामान्य अर्थ अनाज है और जौ उस काल का ‘प्रमुख धान्य’ था। बाद के उत्तर वैदिक काल में ‘व्रीहि’ (चावल) का महत्त्व बढ़ा और शतपथ ब्राह्मण में चावल की खेती का विस्तृत विवरण मिलता है।
60. वैदिक युग में प्रचलित लोकप्रिय शासन प्रणाली थी-
R.A.S. / R.T.S. (Pre) 1993
उत्तर-(d)
वैदिक काल में वंश-परंपरागत राजतंत्र सबसे प्रचलित शासन प्रणाली थी, जिसमें राजपद पिता से पुत्र को हस्तांतरित होता था। हालाँकि राजा की शक्ति पर ‘सभा’ और ‘समिति’ जैसी संस्थाओं का नियंत्रण रहता था, जिससे शासन पूर्णतः निरंकुश नहीं था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वैदिक काल में ‘राजसूय यज्ञ’ राजा के राज्यभिषेक का प्रमुख अनुष्ठान था जो उसकी वैधता को धार्मिक स्वीकृति देता था। ‘अश्वमेध यज्ञ’ सार्वभौम सत्ता के दावे का प्रतीक था — राजा का घोड़ा जितने क्षेत्र में विचरण करता था, वह सब उसका राज्य माना जाता था।
61. सर्वाधिक ऋग्वैदिक सूक्त समर्पित हैं-
U.P.P.C.S. (Mains ) 2002
उत्तर-(b)
ऋग्वेद में इंद्र को सर्वाधिक 250 सूक्त समर्पित हैं, जो उन्हें ऋग्वैदिक काल के सबसे प्रमुख और शक्तिशाली देवता के रूप में स्थापित करता है। अग्नि को लगभग 200 सूक्त समर्पित हैं, जिससे वे दूसरे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देवता माने जाते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इंद्र को ‘पुरंदर’ (किलों को नष्ट करने वाला) कहा गया है, जो दास एवं दस्युओं के किलों को तोड़ने का प्रतीक है। वरुण को नैतिक व्यवस्था के रक्षक (ऋत के पालनकर्ता) के रूप में जाना जाता था, जो पापियों को दंड देते थे।
62. ऋग्वैदिक धर्म था-
U.P.P.C.S. (Mains) 2014
उत्तर-(a)
ऋग्वैदिक धर्म मूलतः बहुदेववादी (Polytheistic) था, जिसमें आर्य अनेक देवताओं में आस्था रखते थे। इन देवताओं को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया था — द्युस्थान (आकाश) के देवता, अंतरिक्ष के देवता और पृथ्वी के देवता। जिस देवता की स्तुति होती थी, उसे उस समय सर्वश्रेष्ठ माना जाता था — इसे एकैकदेवतावाद या हेनोथेइज्म (Henotheism) कहते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद का प्रसिद्ध वाक्य “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति” एकेश्वरवाद की ओर संकेत करता है, जिसका अर्थ है — सत्य एक है, विद्वान उसे अनेक नामों से पुकारते हैं। मैक्स मूलर ने ऋग्वैदिक धर्म को ‘हेनोथेइज्म’ कहा था।
63. गायत्री मंत्र किस पुस्तक में मिलता है ?
39th B.P.S.C. (Pre) 1994
उत्तर-(c)
गायत्री मंत्र ऋग्वेद के तृतीय मंडल में संकलित है। इसके रचयिता विश्वामित्र हैं और यह मंत्र सूर्य देवता ‘सविता’ को समर्पित है। यह मंत्र हिंदू धर्म का सर्वाधिक पवित्र और प्रचलित मंत्र माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गायत्री मंत्र को ‘वेदमाता’ भी कहा जाता है। यह अनुष्टुप छंद में न होकर गायत्री छंद में रचित है, जिसमें 24 अक्षर होते हैं।
64. किस वेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियां कहा गया है ?
U.P.P.C.S. (Mains) 2009
उत्तर-(d)
अथर्ववेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ बताया गया है। सभा एक छोटी, कुलीन एवं न्यायिक संस्था थी, जबकि समिति एक व्यापक जनसभा थी जो राजनीतिक निर्णयों में भाग लेती थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अमेरिकी विद्वान ए.ए. मैकडोनेल और कीथ के अनुसार, सभा और समिति वैदिककालीन लोकतांत्रिक संस्थाओं के जीवंत प्रमाण हैं। समिति में राजा का निर्वाचन भी होता था, जो उस काल की लोकतांत्रिक व्यवस्था को दर्शाता है।
65. 800 से 600 ईसा पूर्व का काल किस युग से जुड़ा है ?
U.P.P.C.S. (Pre) 2002
उत्तर-(a)
800 से 600 ईसा पूर्व का समय ब्राह्मण ग्रंथों की रचना का युग माना जाता है। ब्राह्मण ग्रंथ वेदों की गद्यात्मक व्याख्याएँ हैं जो यज्ञ-कर्मकांड को विस्तार से समझाते हैं। इसके पश्चात लगभग सातवीं-छठी शताब्दी ई.पू. से तीसरी शताब्दी ई.पू. तक का काल सूत्रकाल कहलाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रमुख ब्राह्मण ग्रंथों में ऋग्वेद का ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ और ‘कौषीतकि ब्राह्मण’, तथा सामवेद का ‘पंचविंश ब्राह्मण’ विशेष उल्लेखनीय हैं। ये ग्रंथ उत्तर वैदिक काल में धार्मिक कर्मकांड की जटिलता के साक्षी हैं।
66. वैदिक देवमंडल में निम्न में से कौन देवता युद्ध का देवता माना जाता है ?
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2016
उत्तर-(b)
इंद्र ऋग्वैदिक देवमंडल में सबसे शक्तिशाली देवता थे और उन्हें आर्यों का युद्ध नेता माना जाता था। उन्हें ‘पुरंदर’ (दुर्गभेदी), ‘वृत्रहंता’ (वृत्रासुर का नाश करने वाला) तथा ‘शतक्रतु’ (सौ शक्तियों के स्वामी) जैसे उपनामों से पुकारा जाता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इंद्र ने वृत्रासुर नामक राक्षस का वध कर नदियों को मुक्त किया था — यह घटना वर्षा और कृषि के संदर्भ में प्रतीकात्मक रूप से महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। इंद्र को ‘सोमपा’ भी कहा जाता था क्योंकि वे सोमरस के प्रिय पीने वाले थे।
67. ‘आयुर्वेद’ अर्थात ‘जीवन का विज्ञान’ का उल्लेख सर्वप्रथम मिलता है-
U.P.P.C.S. (Pre) 1994
उत्तर-(d)
अथर्ववेद में आयुर्वेद का प्रारंभिक उल्लेख मिलता है। इस वेद में रोग निवारण, औषधि, मंत्र-तंत्र, विवाह, प्रणय-गीत, राजभक्ति और सामान्य जन-जीवन के विचारों का विस्तृत विवरण है। अथर्ववेद की भाषा और विषय-वस्तु अन्य तीनों वेदों से भिन्न एवं लौकिक जीवन के अधिक करीब है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अथर्ववेद को ‘ब्रह्मवेद’ भी कहा जाता है। इसमें 20 काण्ड, 731 सूक्त और लगभग 5987 मंत्र हैं। आयुर्वेद की परंपरा को आगे चरक संहिता और सुश्रुत संहिता ने विकसित किया।
68. ऋग्वैदिक जन सभा जो न्यायिक कार्यों से संबंधित थी-
Jharkhand P.C.S. (Pre) 2016
उत्तर-(a)
ऋग्वैदिक काल में सभा, समिति और विदथ — तीन प्रमुख जनतांत्रिक संस्थाएँ थीं। इनमें ‘सभा’ न्यायिक कार्यों से जुड़ी थी और यह कुलीन एवं वृद्ध जनों की परिषद थी। ऋग्वेद में सभा का आठ बार उल्लेख हुआ है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘विदथ’ ऋग्वैदिक काल की सबसे प्राचीन संस्था मानी जाती है, जिसमें स्त्रियाँ भी भाग लेती थीं। ‘समिति’ में राजनीतिक और प्रशासनिक निर्णय लिए जाते थे तथा इसमें सामान्य जन की भी भागीदारी होती थी।
69. ऋग्वेद में सर्वाधिक संख्या में मंत्र संबंधित हैं-
U.P.P.C.S. (Mains) 2010
उत्तर-(a)
ऋग्वेद में सर्वाधिक मंत्र इंद्र को समर्पित हैं, परंतु दिए गए विकल्पों में इंद्र का नाम न होने के कारण अग्नि सही उत्तर है, जिन्हें लगभग 200 मंत्र समर्पित हैं। अग्नि को देवताओं और मनुष्यों के बीच दूत (संदेशवाहक) माना जाता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अग्नि को ‘गृहपति’ अर्थात गृह का स्वामी कहा जाता था। यज्ञ में अग्नि की केंद्रीय भूमिका होती थी क्योंकि वे आहुति को देवताओं तक पहुँचाने वाले माने जाते थे।
70. वैदिक देवता इंद्र के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए तथा नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए-
1. झंझावत के देवता थे।
2. पापियों को दंड देते थे।
3. नैतिक व्यवस्था के संरक्षक थे। 4. वर्षा के देवता थे।
कूट : उत्तर चुनिए-
1. झंझावत के देवता थे।
2. पापियों को दंड देते थे।
3. नैतिक व्यवस्था के संरक्षक थे। 4. वर्षा के देवता थे।
कूट : उत्तर चुनिए-
U.P.P.C.S. (Mains ) 2017
उत्तर-(d)
इंद्र को वर्षा, आँधी और तूफान का देवता माना जाता था, इसलिए कथन 1 और 4 सही हैं। नैतिक व्यवस्था के संरक्षक वरुण को माना जाता था, इसलिए कथन 3 गलत है। कुछ मंत्रों में पापियों को दंड देने के लिए इंद्र और सोम दोनों से प्रार्थना की गई है, लेकिन यह इंद्र का प्रमुख गुण नहीं था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वरुण को ‘ऋत’ (सत्य और नैतिक व्यवस्था) का रक्षक माना जाता था। वे समुद्र के देवता भी थे और उन्हें ‘सर्वज्ञ’ (सब कुछ जानने वाला) कहा गया है।
71. निम्नलिखित में से किसे ऋग्वेद में युद्ध-देवता समझा जाता है ?
U.P.P.C.S. (Mains) 2011
उत्तर-(b)
ऋग्वेद में इंद्र को आर्यों का सर्वप्रमुख युद्ध-नेता और देवता माना गया है। वे दुर्गों और शत्रुओं को नष्ट करने के लिए जाने जाते थे। उन्हें ‘पुरभिद्’ (किला भेदने वाला) और ‘दस्युहंता’ (दस्युओं का नाश करने वाला) कहा गया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इंद्र के अस्त्र ‘वज्र’ का निर्माण ऋषि दधीचि की हड्डियों से हुआ था — यह पौराणिक मान्यता आर्यों के दशराज्ञ युद्ध (दस राजाओं के युद्ध) से जुड़ी है जिसका उल्लेख ऋग्वेद के सप्तम मंडल में मिलता है।
72. निम्नलिखित में से पूर्व वैदिक आर्यों का सर्वाधिक लोकप्रिय देवता कौन था ?
U.P.P.C.S. (Mains ) 2008
उत्तर-(d)
पूर्व वैदिक (ऋग्वैदिक) आर्यों में इंद्र सबसे लोकप्रिय देवता थे। उन्हें 250 से अधिक सूक्त समर्पित हैं, जो किसी भी अन्य देवता से अधिक है। इंद्र की लोकप्रियता का मुख्य कारण वर्षा, युद्ध और शत्रु-विनाश में उनकी भूमिका थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वैदिक काल में विष्णु और रुद्र अपेक्षाकृत कम महत्त्वपूर्ण थे। परवर्ती वैदिक और पौराणिक काल में इनका महत्त्व बढ़ा और विष्णु तथा शिव (रुद्र का विकसित रूप) हिंदू धर्म के प्रमुख देवता बन गए।
73. जीविकोपार्जन हेतु ‘वेद-वेदांग’ पढ़ाने वाला अध्यापक कहलाता था-
Uttarakhand U.D.A./L.D.A. (Mains) 2007
उत्तर-(c)
वैदिक शिक्षा व्यवस्था में शिक्षकों को उनके कार्य और पारिश्रमिक के आधार पर अलग-अलग नामों से जाना जाता था। जो शिक्षक जीविकोपार्जन के लिए शुल्क लेकर वेद और वेदांग पढ़ाता था, उसे उपाध्याय कहा जाता था। इसके विपरीत, आचार्य वह गुरु होता था जो गुरुकुल स्थापित करके शिष्यों को निःशुल्क शिक्षा देता था और केवल दक्षिणा स्वीकार करता था। अध्वर्यु यजुर्वेद का पाठ करने वाला पुरोहित होता था, जबकि पुरोहित राजा का प्रमुख धार्मिक सलाहकार होता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वैदिक काल में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली में शिष्य ‘ब्रह्मचारी’ कहलाता था और उसे गुरु के घर रहकर शिक्षा ग्रहण करनी होती थी। शिक्षा समाप्त होने पर ‘समावर्तन संस्कार’ किया जाता था, जो वर्तमान के दीक्षांत समारोह के समान था।
74. प्राचीन भारतीय समाज के प्रसंग में निम्नलिखित शब्दों में से कौन-सा शब्द शेष तीन के वर्ग का नहीं है?
I.A.S. (Pre) 1996
उत्तर-(c)
प्राचीन भारतीय समाज में कुल (परिवार की इकाई), वंश (पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा परिवार-समूह) और गोत्र (एक सामान्य पूर्वज से उत्पन्न वंश-परंपरा) — ये तीनों पारिवारिक और सामाजिक संरचना से संबंधित हैं। इनके विपरीत कोश का अर्थ है खजाना या भंडार, जो राज्य की आर्थिक शक्ति का प्रतीक था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राज्य के सात अंगों (सप्तांग सिद्धांत) में कोश को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसलिए ‘कोश’ शेष तीन के वर्ग का नहीं है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वैदिक समाज में सामाजिक संगठन की सबसे छोटी इकाई कुल थी, इसके ऊपर ग्राम, फिर विश, फिर जन और सबसे बड़ी इकाई राष्ट्र थी। गोत्र विवाह वर्जित था क्योंकि एक ही गोत्र के लोग एक पूर्वज की संतान माने जाते थे।
75. संस्कारों की कुल संख्या कितनी है ?
M.P.P.C.S. (Pre) 2015
उत्तर-(d)
हिंदू धर्म में ‘संस्कार’ शब्द का अर्थ है — परिष्कार, शुद्धता अथवा पवित्रता। विभिन्न धर्मग्रंथों में संस्कारों की संख्या अलग-अलग बताई गई है। गौतम धर्मसूत्र में 40 संस्कारों का उल्लेख है, जबकि मनुस्मृति में गर्भाधान से प्रारंभ होने वाले 13 संस्कारों का वर्णन है। बाद की स्मृतियों में यह संख्या 16 (षोडश संस्कार) पर स्थिर हो गई, जो आज सर्वाधिक प्रचलित और मान्य है। इन 16 संस्कारों में गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक के सभी महत्वपूर्ण जीवन-संस्कार शामिल हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: 16 संस्कारों में प्रमुख हैं — गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, विद्यारंभ, उपनयन, वेदारंभ, केशांत, समावर्तन, विवाह और अंत्येष्टि। उपनयन संस्कार (यज्ञोपवीत) को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता था, जिसके बाद बालक ‘द्विज’ कहलाता था।
76. ऋग्वैदिक काल के प्रारंभ में निम्न में से किसे महत्वपूर्ण मूल्यवान संपत्ति समझा जाता था?
U.P.P.C.S. (Pre) (Re-Exam) 2015
उत्तर-(b)
ऋग्वैदिक काल के प्रारंभ में गाय को सबसे महत्वपूर्ण और मूल्यवान संपत्ति माना जाता था। यह काल मुख्यतः पशुपालन-प्रधान था, इसलिए गाय विनिमय (वस्तु-विनिमय) का प्रमुख माध्यम भी थी। ऋग्वेद के कुछ सूक्तों में गाय को देवता के रूप में चित्रित किया गया है और उसे ‘अघन्या’ (न मारी जाने योग्य) कहा गया है। युद्ध का एक प्रमुख कारण गायों को हथियाना भी था, जिन्हें ‘गव्य’ या ‘गोग्रह’ के संघर्ष कहा जाता था। भूमि उस काल में उतनी महत्वपूर्ण नहीं थी जितनी उत्तर वैदिक काल में हो गई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में ‘गोमत्’ शब्द का अर्थ ‘धनी व्यक्ति’ है और ‘गविष्टि’ का अर्थ ‘गायों की खोज में युद्ध’ है। इससे स्पष्ट है कि गाय ही उस युग की वास्तविक मुद्रा और संपदा थी। ऋग्वेद में दूरी नापने की एक इकाई ‘गव्यूति’ भी थी जो गाय से संबंधित थी।
77. ऋग्वेद-कालीन आर्यों और सिंधु घाटी के लोगों की संस्कृति के बीच अंतर के संबंध में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से
सही है/हैं?
1. ऋग्वेद-कालीन आर्य कवच और शिरस्त्राण (हेलमेट) का उपयोग करते थे, जबकि सिंधु घाटी सभ्यता के इनके उपयोग का कोई साक्ष्य नहीं मिलता।
2. ऋग्वेद-कालीन आर्यों को स्वर्ण, चांदी और जबकि सिंधु घाटी के लोगों को केवल ताम्र और लौह का ज्ञान था।
3. ऋग्वेद-कालीन आर्यों ने घोड़े को पालतू बना लिया था, जबकि इस बात का कोई साक्ष्य नहीं है कि सिंधु घाटी के लोग इस पशु को जानते थे।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-
1. ऋग्वेद-कालीन आर्य कवच और शिरस्त्राण (हेलमेट) का उपयोग करते थे, जबकि सिंधु घाटी सभ्यता के इनके उपयोग का कोई साक्ष्य नहीं मिलता।
2. ऋग्वेद-कालीन आर्यों को स्वर्ण, चांदी और जबकि सिंधु घाटी के लोगों को केवल ताम्र और लौह का ज्ञान था।
3. ऋग्वेद-कालीन आर्यों ने घोड़े को पालतू बना लिया था, जबकि इस बात का कोई साक्ष्य नहीं है कि सिंधु घाटी के लोग इस पशु को जानते थे।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-
I.A.S. (Pre) 2017
उत्तर-(a)
तीनों कथनों का विश्लेषण इस प्रकार है —
कथन 1 (सही): ऋग्वेद में ‘वर्म’ (कवच) का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। सैंधव सभ्यता के उत्खनन में कवच या शिरस्त्राण का कोई साक्ष्य नहीं मिला, जो दर्शाता है कि वे शांतिप्रिय थे।
कथन 2 (गलत): ऋग्वैदिक आर्यों को स्वर्ण, चांदी और ताम्र का ज्ञान था, किंतु लोहे का नहीं। सिंधु घाटी के लोगों को ताम्र और कांसे का ज्ञान था। लोहे का प्रयोग भारत में लगभग 1000–600 ई.पू. के मध्य प्रारंभ हुआ।
कथन 3 (गलत): सिंधु सभ्यता के कई स्थलों — मोहनजोदड़ो (मिट्टी की घोड़े की आकृति), लोथल (तीन मृणमूर्तियाँ) और सुरकोटडा (घोड़े की हड्डियाँ) — से घोड़े के प्रमाण मिलते हैं।
अतः केवल कथन 1 सही है।
कथन 1 (सही): ऋग्वेद में ‘वर्म’ (कवच) का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। सैंधव सभ्यता के उत्खनन में कवच या शिरस्त्राण का कोई साक्ष्य नहीं मिला, जो दर्शाता है कि वे शांतिप्रिय थे।
कथन 2 (गलत): ऋग्वैदिक आर्यों को स्वर्ण, चांदी और ताम्र का ज्ञान था, किंतु लोहे का नहीं। सिंधु घाटी के लोगों को ताम्र और कांसे का ज्ञान था। लोहे का प्रयोग भारत में लगभग 1000–600 ई.पू. के मध्य प्रारंभ हुआ।
कथन 3 (गलत): सिंधु सभ्यता के कई स्थलों — मोहनजोदड़ो (मिट्टी की घोड़े की आकृति), लोथल (तीन मृणमूर्तियाँ) और सुरकोटडा (घोड़े की हड्डियाँ) — से घोड़े के प्रमाण मिलते हैं।
अतः केवल कथन 1 सही है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सिंधु सभ्यता के लोगों को लोहे का ज्ञान नहीं था — यह एक महत्वपूर्ण विशेषता है। इसी कारण सिंधु सभ्यता को ‘कांस्य युगीन सभ्यता’ (Bronze Age Civilization) कहा जाता है। साथ ही, ऋग्वेद में लोहे का कोई उल्लेख नहीं है; ‘अयस्’ शब्द का प्रयोग संभवतः ताँबे या कांसे के लिए था।
78. सूची 1 को सूची II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए :
सूची-1 सूची – II
A. सिंधु घाटी सभ्यता 1. चारागाह
B. उत्तर वैदिक समाज 2. जमींदारी
C. ऋग्वैदिक समाज 3. कृषक
D. मध्य काल 4.नगरीय
कूट :
A B C Dसूची-1 सूची – II
A. सिंधु घाटी सभ्यता 1. चारागाह
B. उत्तर वैदिक समाज 2. जमींदारी
C. ऋग्वैदिक समाज 3. कृषक
D. मध्य काल 4.नगरीय
कूट :
U.P.P.C.S. (Pre) 2020
उत्तर-(d)
विभिन्न ऐतिहासिक कालों की आर्थिक प्रकृति के आधार पर सही सुमेलन इस प्रकार है —
सिंधु घाटी सभ्यता → नगरीय: यह भारत की प्रथम नगरीय सभ्यता थी जिसमें सुनियोजित नगर, पक्की सड़कें और जल-निकासी व्यवस्था थी।
उत्तर वैदिक समाज → कृषक: उत्तर वैदिक काल में कृषि का विस्तार हुआ और भूमि का महत्व बढ़ा।
ऋग्वैदिक समाज → चारागाह: ऋग्वैदिक काल में पशुपालन प्रधान था और गाय चारागाह (pasture) अर्थव्यवस्था का आधार थी।
मध्य काल → जमींदारी: मध्यकालीन भारत में भूमि पर जमींदारों का वर्चस्व था।
अतः सही उत्तर विकल्प (d) है।
सिंधु घाटी सभ्यता → नगरीय: यह भारत की प्रथम नगरीय सभ्यता थी जिसमें सुनियोजित नगर, पक्की सड़कें और जल-निकासी व्यवस्था थी।
उत्तर वैदिक समाज → कृषक: उत्तर वैदिक काल में कृषि का विस्तार हुआ और भूमि का महत्व बढ़ा।
ऋग्वैदिक समाज → चारागाह: ऋग्वैदिक काल में पशुपालन प्रधान था और गाय चारागाह (pasture) अर्थव्यवस्था का आधार थी।
मध्य काल → जमींदारी: मध्यकालीन भारत में भूमि पर जमींदारों का वर्चस्व था।
अतः सही उत्तर विकल्प (d) है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उत्तर वैदिक काल में हल को ‘लांगल’ या ‘सीर’ कहा जाता था और लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग प्रारंभ हो गया था। इस काल में ‘बलि’ (कर) नामक एक स्वैच्छिक कर का भी उल्लेख मिलता है जो बाद में अनिवार्य हो गया।
79. ऋग्वेद में अघन्या का प्रयोग हुआ है-
U.P. U.D.A./L.D.A. (Spl.) (Pre) 2010
उत्तर-(b)
ऋग्वेद में ‘अघन्या’ शब्द का प्रयोग गाय के लिए किया गया है। इस शब्द का शाब्दिक अर्थ है — ‘जो मारी न जाए’ या ‘जिसे वध नहीं करना चाहिए।’ यह शब्द गाय की पवित्रता और उसके वध पर निषेध को दर्शाता है। ऋग्वैदिक काल में गाय आर्थिक समृद्धि का प्रतीक थी और उसकी रक्षा करना धार्मिक कर्तव्य समझा जाता था। इसी से ‘अघन्या’ शब्द गाय की सामाजिक-धार्मिक महत्ता का सूचक बना।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में गाय के लिए अनेक नामों का प्रयोग हुआ है जैसे — ‘अघन्या’, ‘गो’, ‘धेनु’ आदि। इसी प्रकार ऋग्वेद में ‘गोघ्न’ शब्द का प्रयोग उस अतिथि के लिए किया गया है जिसके सम्मान में गाय का वध किया जाता था, जो यह दर्शाता है कि वैदिक काल में गाय का वध पूर्णतः वर्जित नहीं था, बल्कि धार्मिक अवसरों पर किया जाता था।
80. ऋग्वेद में कई परिच्छेदों में प्रयुक्त ‘अघन्य शब्द संदर्भित है-
U.P.P.C.S. (Pre) 2017
उत्तर-(c)
ऋग्वेद में अनेक परिच्छेदों (passages) में ‘अघन्य’ (स्त्रीलिंग में ‘अघन्या’) शब्द का प्रयोग गाय के संदर्भ में हुआ है। इस शब्द का अर्थ है ‘जिसे नहीं मारना चाहिए।’ यह शब्द गाय के प्रति आर्यों की श्रद्धा और उसकी आर्थिक-धार्मिक महत्ता को प्रकट करता है। गाय केवल दूध देने वाला पशु ही नहीं थी, बल्कि वह वैदिक समाज में धन, यज्ञ और जीवन-यापन का आधार थी। इसीलिए ऋग्वेद में गाय को ‘देवी’ तुल्य माना गया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में ‘उषा’ देवी की तुलना गाय से की गई है, जो गाय की दिव्यता को उजागर करती है। इसके अलावा ऋग्वेद में पृथ्वी को भी ‘गौ’ (गाय) के रूप में रूपकात्मक ढंग से चित्रित किया गया है, जो इस पशु के प्रतीकात्मक महत्व को और बढ़ाता है।
81. जीविकोपार्जन हेतु ‘वेद-वेदांग’ पढ़ाने वाला अध्यापक कहलाता था-
Uttarakhand U.D.A./L.D.A. (Mains) 2007
उत्तर-(c)
वैदिक शिक्षा व्यवस्था में शिक्षकों को उनके कार्य और पारिश्रमिक के आधार पर अलग-अलग नामों से जाना जाता था। जो शिक्षक जीविकोपार्जन के लिए शुल्क लेकर वेद और वेदांग पढ़ाता था, उसे उपाध्याय कहा जाता था। इसके विपरीत, आचार्य वह गुरु होता था जो गुरुकुल स्थापित करके शिष्यों को निःशुल्क शिक्षा देता था और केवल दक्षिणा स्वीकार करता था। अध्वर्यु यजुर्वेद का पाठ करने वाला पुरोहित होता था, जबकि पुरोहित राजा का प्रमुख धार्मिक सलाहकार होता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वैदिक काल में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली में शिष्य ‘ब्रह्मचारी’ कहलाता था और उसे गुरु के घर रहकर शिक्षा ग्रहण करनी होती थी। शिक्षा समाप्त होने पर ‘समावर्तन संस्कार’ किया जाता था, जो वर्तमान के दीक्षांत समारोह के समान था।
82. प्राचीन भारतीय समाज के प्रसंग में निम्नलिखित शब्दों में से कौन-सा शब्द शेष तीन के वर्ग का नहीं है?
I.A.S. (Pre) 1996
उत्तर-(c)
प्राचीन भारतीय समाज में कुल (परिवार की इकाई), वंश (पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा परिवार-समूह) और गोत्र (एक सामान्य पूर्वज से उत्पन्न वंश-परंपरा) — ये तीनों पारिवारिक और सामाजिक संरचना से संबंधित हैं। इनके विपरीत कोश का अर्थ है खजाना या भंडार, जो राज्य की आर्थिक शक्ति का प्रतीक था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राज्य के सात अंगों (सप्तांग सिद्धांत) में कोश को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसलिए ‘कोश’ शेष तीन के वर्ग का नहीं है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वैदिक समाज में सामाजिक संगठन की सबसे छोटी इकाई कुल थी, इसके ऊपर ग्राम, फिर विश, फिर जन और सबसे बड़ी इकाई राष्ट्र थी। गोत्र विवाह वर्जित था क्योंकि एक ही गोत्र के लोग एक पूर्वज की संतान माने जाते थे।
83. संस्कारों की कुल संख्या कितनी है ?
M.P.P.C.S. (Pre) 2015
उत्तर-(d)
हिंदू धर्म में ‘संस्कार’ शब्द का अर्थ है — परिष्कार, शुद्धता अथवा पवित्रता। विभिन्न धर्मग्रंथों में संस्कारों की संख्या अलग-अलग बताई गई है। गौतम धर्मसूत्र में 40 संस्कारों का उल्लेख है, जबकि मनुस्मृति में गर्भाधान से प्रारंभ होने वाले 13 संस्कारों का वर्णन है। बाद की स्मृतियों में यह संख्या 16 (षोडश संस्कार) पर स्थिर हो गई, जो आज सर्वाधिक प्रचलित और मान्य है। इन 16 संस्कारों में गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक के सभी महत्वपूर्ण जीवन-संस्कार शामिल हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: 16 संस्कारों में प्रमुख हैं — गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, विद्यारंभ, उपनयन, वेदारंभ, केशांत, समावर्तन, विवाह और अंत्येष्टि। उपनयन संस्कार (यज्ञोपवीत) को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता था, जिसके बाद बालक ‘द्विज’ कहलाता था।
84. ऋग्वैदिक काल के प्रारंभ में निम्न में से किसे महत्वपूर्ण मूल्यवान संपत्ति समझा जाता था?
U.P.P.C.S. (Pre) (Re-Exam) 2015
उत्तर-(b)
ऋग्वैदिक काल के प्रारंभ में गाय को सबसे महत्वपूर्ण और मूल्यवान संपत्ति माना जाता था। यह काल मुख्यतः पशुपालन-प्रधान था, इसलिए गाय विनिमय (वस्तु-विनिमय) का प्रमुख माध्यम भी थी। ऋग्वेद के कुछ सूक्तों में गाय को देवता के रूप में चित्रित किया गया है और उसे ‘अघन्या’ (न मारी जाने योग्य) कहा गया है। युद्ध का एक प्रमुख कारण गायों को हथियाना भी था, जिन्हें ‘गव्य’ या ‘गोग्रह’ के संघर्ष कहा जाता था। भूमि उस काल में उतनी महत्वपूर्ण नहीं थी जितनी उत्तर वैदिक काल में हो गई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में ‘गोमत्’ शब्द का अर्थ ‘धनी व्यक्ति’ है और ‘गविष्टि’ का अर्थ ‘गायों की खोज में युद्ध’ है। इससे स्पष्ट है कि गाय ही उस युग की वास्तविक मुद्रा और संपदा थी। ऋग्वेद में दूरी नापने की एक इकाई ‘गव्यूति’ भी थी जो गाय से संबंधित थी।
85. ऋग्वेद-कालीन आर्यों और सिंधु घाटी के लोगों की संस्कृति के बीच अंतर के संबंध में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से
सही है/हैं?
1. ऋग्वेद-कालीन आर्य कवच और शिरस्त्राण (हेलमेट) का उपयोग करते थे, जबकि सिंधु घाटी सभ्यता के इनके उपयोग का कोई साक्ष्य नहीं मिलता।
2. ऋग्वेद-कालीन आर्यों को स्वर्ण, चांदी और जबकि सिंधु घाटी के लोगों को केवल ताम्र और लौह का ज्ञान था।
3. ऋग्वेद-कालीन आर्यों ने घोड़े को पालतू बना लिया था, जबकि इस बात का कोई साक्ष्य नहीं है कि सिंधु घाटी के लोग इस पशु को जानते थे।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-
1. ऋग्वेद-कालीन आर्य कवच और शिरस्त्राण (हेलमेट) का उपयोग करते थे, जबकि सिंधु घाटी सभ्यता के इनके उपयोग का कोई साक्ष्य नहीं मिलता।
2. ऋग्वेद-कालीन आर्यों को स्वर्ण, चांदी और जबकि सिंधु घाटी के लोगों को केवल ताम्र और लौह का ज्ञान था।
3. ऋग्वेद-कालीन आर्यों ने घोड़े को पालतू बना लिया था, जबकि इस बात का कोई साक्ष्य नहीं है कि सिंधु घाटी के लोग इस पशु को जानते थे।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-
I.A.S. (Pre) 2017
उत्तर-(a)
तीनों कथनों का विश्लेषण इस प्रकार है —
कथन 1 (सही): ऋग्वेद में ‘वर्म’ (कवच) का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। सैंधव सभ्यता के उत्खनन में कवच या शिरस्त्राण का कोई साक्ष्य नहीं मिला, जो दर्शाता है कि वे शांतिप्रिय थे।
कथन 2 (गलत): ऋग्वैदिक आर्यों को स्वर्ण, चांदी और ताम्र का ज्ञान था, किंतु लोहे का नहीं। सिंधु घाटी के लोगों को ताम्र और कांसे का ज्ञान था। लोहे का प्रयोग भारत में लगभग 1000–600 ई.पू. के मध्य प्रारंभ हुआ।
कथन 3 (गलत): सिंधु सभ्यता के कई स्थलों — मोहनजोदड़ो (मिट्टी की घोड़े की आकृति), लोथल (तीन मृणमूर्तियाँ) और सुरकोटडा (घोड़े की हड्डियाँ) — से घोड़े के प्रमाण मिलते हैं।
अतः केवल कथन 1 सही है।
कथन 1 (सही): ऋग्वेद में ‘वर्म’ (कवच) का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। सैंधव सभ्यता के उत्खनन में कवच या शिरस्त्राण का कोई साक्ष्य नहीं मिला, जो दर्शाता है कि वे शांतिप्रिय थे।
कथन 2 (गलत): ऋग्वैदिक आर्यों को स्वर्ण, चांदी और ताम्र का ज्ञान था, किंतु लोहे का नहीं। सिंधु घाटी के लोगों को ताम्र और कांसे का ज्ञान था। लोहे का प्रयोग भारत में लगभग 1000–600 ई.पू. के मध्य प्रारंभ हुआ।
कथन 3 (गलत): सिंधु सभ्यता के कई स्थलों — मोहनजोदड़ो (मिट्टी की घोड़े की आकृति), लोथल (तीन मृणमूर्तियाँ) और सुरकोटडा (घोड़े की हड्डियाँ) — से घोड़े के प्रमाण मिलते हैं।
अतः केवल कथन 1 सही है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सिंधु सभ्यता के लोगों को लोहे का ज्ञान नहीं था — यह एक महत्वपूर्ण विशेषता है। इसी कारण सिंधु सभ्यता को ‘कांस्य युगीन सभ्यता’ (Bronze Age Civilization) कहा जाता है। साथ ही, ऋग्वेद में लोहे का कोई उल्लेख नहीं है; ‘अयस्’ शब्द का प्रयोग संभवतः ताँबे या कांसे के लिए था।
86. सूची 1 को सूची II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए :
सूची-1 सूची – II
A. सिंधु घाटी सभ्यता 1. चारागाह
B. उत्तर वैदिक समाज 2. जमींदारी
C. ऋग्वैदिक समाज 3. कृषक
D. मध्य काल 4.नगरीय
कूट : A B C D
सूची-1 सूची – II
A. सिंधु घाटी सभ्यता 1. चारागाह
B. उत्तर वैदिक समाज 2. जमींदारी
C. ऋग्वैदिक समाज 3. कृषक
D. मध्य काल 4.नगरीय
कूट : A B C D
U.P.P.C.S. (Pre) 2020
उत्तर-(d)
विभिन्न ऐतिहासिक कालों की आर्थिक प्रकृति के आधार पर सही सुमेलन इस प्रकार है —
सिंधु घाटी सभ्यता → नगरीय: यह भारत की प्रथम नगरीय सभ्यता थी जिसमें सुनियोजित नगर, पक्की सड़कें और जल-निकासी व्यवस्था थी।
उत्तर वैदिक समाज → कृषक: उत्तर वैदिक काल में कृषि का विस्तार हुआ और भूमि का महत्व बढ़ा।
ऋग्वैदिक समाज → चारागाह: ऋग्वैदिक काल में पशुपालन प्रधान था और गाय चारागाह (pasture) अर्थव्यवस्था का आधार थी।
मध्य काल → जमींदारी: मध्यकालीन भारत में भूमि पर जमींदारों का वर्चस्व था।
अतः सही उत्तर विकल्प (d) है।
सिंधु घाटी सभ्यता → नगरीय: यह भारत की प्रथम नगरीय सभ्यता थी जिसमें सुनियोजित नगर, पक्की सड़कें और जल-निकासी व्यवस्था थी।
उत्तर वैदिक समाज → कृषक: उत्तर वैदिक काल में कृषि का विस्तार हुआ और भूमि का महत्व बढ़ा।
ऋग्वैदिक समाज → चारागाह: ऋग्वैदिक काल में पशुपालन प्रधान था और गाय चारागाह (pasture) अर्थव्यवस्था का आधार थी।
मध्य काल → जमींदारी: मध्यकालीन भारत में भूमि पर जमींदारों का वर्चस्व था।
अतः सही उत्तर विकल्प (d) है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उत्तर वैदिक काल में हल को ‘लांगल’ या ‘सीर’ कहा जाता था और लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग प्रारंभ हो गया था। इस काल में ‘बलि’ (कर) नामक एक स्वैच्छिक कर का भी उल्लेख मिलता है जो बाद में अनिवार्य हो गया।
87. ऋग्वेद में अघन्या का प्रयोग हुआ है-
U.P. U.D.A./L.D.A. (Spl.) (Pre) 2010
उत्तर-(b)
ऋग्वेद में ‘अघन्या’ शब्द का प्रयोग गाय के लिए किया गया है। इस शब्द का शाब्दिक अर्थ है — ‘जो मारी न जाए’ या ‘जिसे वध नहीं करना चाहिए।’ यह शब्द गाय की पवित्रता और उसके वध पर निषेध को दर्शाता है। ऋग्वैदिक काल में गाय आर्थिक समृद्धि का प्रतीक थी और उसकी रक्षा करना धार्मिक कर्तव्य समझा जाता था। इसी से ‘अघन्या’ शब्द गाय की सामाजिक-धार्मिक महत्ता का सूचक बना।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में गाय के लिए अनेक नामों का प्रयोग हुआ है जैसे — ‘अघन्या’, ‘गो’, ‘धेनु’ आदि। इसी प्रकार ऋग्वेद में ‘गोघ्न’ शब्द का प्रयोग उस अतिथि के लिए किया गया है जिसके सम्मान में गाय का वध किया जाता था, जो यह दर्शाता है कि वैदिक काल में गाय का वध पूर्णतः वर्जित नहीं था, बल्कि धार्मिक अवसरों पर किया जाता था।
88. ऋग्वेद में कई परिच्छेदों में प्रयुक्त ‘अघन्य शब्द संदर्भित है-
U.P.P.C.S. (Pre) 2017
उत्तर-(c)
ऋग्वेद में अनेक परिच्छेदों (passages) में ‘अघन्य’ (स्त्रीलिंग में ‘अघन्या’) शब्द का प्रयोग गाय के संदर्भ में हुआ है। इस शब्द का अर्थ है ‘जिसे नहीं मारना चाहिए।’ यह शब्द गाय के प्रति आर्यों की श्रद्धा और उसकी आर्थिक-धार्मिक महत्ता को प्रकट करता है। गाय केवल दूध देने वाला पशु ही नहीं थी, बल्कि वह वैदिक समाज में धन, यज्ञ और जीवन-यापन का आधार थी। इसीलिए ऋग्वेद में गाय को ‘देवी’ तुल्य माना गया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में ‘उषा’ देवी की तुलना गाय से की गई है, जो गाय की दिव्यता को उजागर करती है। इसके अलावा ऋग्वेद में पृथ्वी को भी ‘गौ’ (गाय) के रूप में रूपकात्मक ढंग से चित्रित किया गया है, जो इस पशु के प्रतीकात्मक महत्व को और बढ़ाता है।
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