चौहान वंश दिल्ली (8वीं शताब्दी–1192 ई.) : पृथ्वीराज चौहान

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत चौहान वंश दिल्ली (8वीं शताब्दी–1192 ई.)
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चौहानों की उत्पति

कवि चंद बरदाई द्वारा लिखित पृथ्वीराज रासो के अनुसार एक बार ऋषियों ने आबू पर्वत पर यज्ञ करना आरंभ किया तो राक्षसों ने अपवित्र वस्तुएं डालकर यज्ञ को भ्रष्ट करने की चेष्टा की।

➣ इस पर महर्षि वसिष्ठ ने यज्ञ की रक्षा के लिये मंत्र-सिद्धि से चार पुरुषों को उत्पन्न किया जो प्रतिहार, परमार, चौलुक्य और चौहान कहलाये।

➣ पुराणों में आए आबू पर्वत के यज्ञ के वर्णन के आधार पर चारण तथा भाट चौहान, चौलुक्य, प्रतिहार एवं परमारों को अग्निवंशीय मानते हैं।

पृथ्वीराज विजय, हम्मीर रासो, हम्मीर महाकाव्य आदि ग्रंथो में चौहानों को सूर्यवंशीय बताया गया है।

➣ चौहानों के एक भी शिलालेख में यह नहीं कहा गया है कि वे अग्निवंशी हैं। प्रत्येक शिलालेख में चौहानों ने स्वयं को सूर्यवंशी ही लिखा है।

डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने भी चौहानों को सूर्यवंशीय क्षत्रिय माना है जिन्हें गोत्रोच्चार में चंद्रवंशीय माना जाता है।

डॉ. दशरथ शर्मा चौहानों को ब्राह्मणों से उत्पन्न हुआ मानते हैं। चाहमानों का एक अत्यंत प्राचीन शिलालेख राजा रायपाल के समय का मिला है। इसे सेवाड़ी अभिलेख कहते हैं। इस अभिलेख में चाहमानों को इंद्र का वंशज बताया गया है।

➣ कुछ प्रमाणों के आधार पर चौहानों का सम्बन्ध मोरी वंश से जोड़ा जाता है जो प्राचीन मौर्य राजकुल के वंशज थे तथा चित्तौड़गढ़ के आसपास शासन करते थे।

कर्नल टॉड ने इन्हें विदेशी माना है तथा अपने कथन के समर्थन में कहा है कि चाहमानों के रस्म और रिवाज मध्य एशियाई जाति के रस्म और रिवाज जैसे हैं। डॉ. स्मिथ तथा क्रुक ने भी इसी मत को स्वीकार किया है किंतु ओझा इस मत को स्वीकार नहीं करते।

➣ प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है कि चौहानों का प्रारम्भिक राज्य राजस्थान के बीकानेर एवं नागौर क्षेत्र में था। यह रेगिस्तानी प्रदेश है तथा महाभारत काल से ही जांगल प्रदेश कहलाता था।

मौर्य काल से लेकर गुप्तवंश के काल में इस क्षेत्र पर प्राचीन नागवंशी क्षत्रिय शासन करते थे। उनकी राजधानी को अहिछत्रपुर और नागौर भी कहा जाता था।

➣ अजमेर के सरस्वती कण्ठाभरण मंदिर (अब ढाई दिन का झौंपड़ा) परिसर से चौहान शासक विग्रहराज (चतुर्थ) के समय का एक शिलालेख मिला है जो अब राजकीय संग्रहालय अजमेर में सुरक्षित है।

➣ इस शिलालेख में चौहानों के आदि पुरुष चाहमान की स्तुति की गई है तथा उसे मालव वंश में उत्पन्न बताया गया है जो कि सूर्यवंश के इक्ष्वाकु कुल में उत्पन्न भगवान राम के छोटे पुत्र कुश के वंशज थे।

मालव जाति प्रथम शताब्दी ईस्वी के अंत तक वर्तमान अजमेर जिले की सीमा पर वर्तमान जयपुर तथा टोंक नगरों के आसपास शासन करती थी। अतः पर्याप्त संभव है कि मालवों में से ही चाहमान नामक कोई राजा हुआ हो और उसके वंशजों से चौहानों की अलग शाखा चली हो।

➣ चूंकि चौहानों ने अपने शिलालेखों में स्वयं को रघुवंशी एवं सूर्यवंशी लिखा है, इसलिए चौहानों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में यही मत सर्वाधिक विश्वसनीय प्रतीत होता है कि वे मूलतः मालव थे।

➣ भारत के अधिकांश लोग पृथ्वीराज रासो को पृथ्वीराज चौहान का समकालीन ग्रंथ मानते हैं जो गलत है। पृथ्वीराज चौहान 12वीं सदी का शासक था जबकि पृथ्वीराज रासो 16वीं शताब्दी ई में लिखी गई।

चन्दरबरदाई उसका मित्र व राजकवि था जिसका ग्रंथ पृथ्वीराज रासो हिन्दी साहित्य का प्रथम महाकाव्य माना जाता है।

➣ पृथ्वीराज चौहान के समय में कश्मीरी पंडित जयानक द्वारा पृथ्वीराज विजयम् संस्कृत महाकाव्य नामक ग्रंथ की रचना की गई थी। केवल यही ग्रंथ पृथ्वीराज चौहान के समय घटित घटनाओं का सबसे प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है।

शासक शासनकाल परिचय / प्रमुख तथ्य
अजयदेव चौहान 1105 – 1133 ई. चौहान वंश का महत्वपूर्ण शासक, अजमेर नगर को विकसित किया और उसे राजधानी के रूप में मजबूत बनाया। तुर्क आक्रमणों के विरुद्ध प्रतिरोध की नीति अपनाई।
विग्रहराज चतुर्थ (वीसलदेव) 1155 – 1163 ई. चौहान वंश का शक्तिशाली शासक, दिल्ली और हरियाणा क्षेत्र तक प्रभाव बढ़ाया। साहित्य और शिक्षा का संरक्षक था। संस्कृत विद्यालयों और विद्वानों को संरक्षण दिया।
पृथ्वीराज द्वितीय 1165 – 1169 ई. अल्पकालीन शासक, चौहान सत्ता की स्थिरता बनाए रखने का प्रयास किया लेकिन राजनीतिक चुनौतियाँ बढ़ती रहीं।
सोमेश्वर 1169 – 1178 ई. पृथ्वीराज तृतीय के पिता, अजमेर और शाकंभरी क्षेत्र में चौहान शक्ति को बनाए रखा। उनके समय में चौहान साम्राज्य उत्तर भारत की प्रमुख शक्तियों में शामिल था।
पृथ्वीराज तृतीय (पृथ्वीराज चौहान) 1178 – 1192 ई. चौहान वंश का सबसे प्रसिद्ध और अंतिम महान शासक। तराइन के प्रथम युद्ध (1191 ई.) में मुहम्मद गोरी को हराया, लेकिन तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में पराजित हुआ। इसके बाद उत्तर भारत में तुर्क शक्ति और दिल्ली सल्तनत की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।

प्रारम्भिक शासक

राजशेखर (नौवीं-दसवीं शताब्दी ई) द्वारा लिखित प्रबंधकोष के अनुसार चौहान शासकों में वासुदेव पहला शासक था जिसने 551 ई. में सपादलक्ष (सांभर) में शासन किया।

सन 551 ई. के लगभग चौहान शासक वासुदेव ने बीकानेर और नागौर के शुष्क रेतीले क्षेत्रों से आगे बढ़कर शाकंभरी नामक झील पर अधिकार कर लिया जिसे सांभर भी कहा जाता है। इस कारण उन्हें शाकंभरीश्वर तथा साम्भरेश्वर कहा जाने लगा।

➣ कुछ प्राचीन ग्रंथों में आए एक वर्णन के अनुसार भगवान शिव की पत्नी पार्वती देवी ने किसी चौहान राजकुमार की सेवा से प्रसन्न होकर इस पूरे क्षेत्र की भूमि को चांदी की झील में बदल दिया। तभी से इस देवी का नाम शाकंभरी पड़ा और वह चौहानों की कुल देवी कहलाई।

वासुदेव चौहान का समय 551 के आसपास माना जाता है। पर्याप्त संभव है कि यह चौहानों का पहला राजा नहीं हो और चौहान राजवंश उससे पहले ही अस्तित्व में आ चुका हो क्योंकि वासुदेव तो चौहानों का वह पहला राजा था जिसने सांभर झील का प्रवर्तन किया था।

➣ वासुदेव चौहान का पुत्र सामंतदेव/सामंतराज हुआ। सामंतदेव का वंशज अजयराज था। अजयराज के वंशज प्रतिहार शासकों के अधीन रहकर राज्य करते थे।

683 ई. के आसपास अजयपाल चौहानों का राजा हुआ। उसने अजमेर नगर की स्थापना की। अपने अंतिम वर्षों में वह अपना राज्य अपने पुत्र को देकर पहाड़ियों में जाकर तपस्या करने लगा। आज भी वे पहाड़ियां अजयपाल की घाटी कहलाती हैं।

➣ अजमेर में अजयपाल की पूजा अजयपाल बाबा के नाम से होती है। उसके नाम पर प्रतिवर्ष एक मेला भरता है जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु अजयपाल बाबा को श्रद्धांजलि देते हैं

➣ अजयपाल के बाद उसका पुत्र विग्रहराज प्रथम अजमेर का शासक हुआ। विग्रहराज प्रथम के बाद विग्रहराज प्रथम का पुत्र चंद्रराज प्रथम, चंद्रराज प्रथम के बाद विग्रहराज प्रथम का दूसरा पुत्र गोपेन्द्रराज अजमेर का राजा हुआ। इसे गोविंदराज प्रथम भी कहते हैं।

➣ गोविंदराज प्रथम मुसलमानों से लड़ने वाला पहला चौहान राजा था। उसने मुसलमानों की सेनाओं को अजमेर पहुचने से पहले ही नष्ट करके उनके सेनापति सुल्तान बेग वारिस को बंदी बनाया था।

➣ गोविंदराज प्रथम के बाद दुर्लभराज प्रथम अजमेर का राजा हुआ। अनेक ग्रंथों में इसे दुर्लभराय, दूल्हराय तथा दूलाराय भी कहा गया है। वह प्रतिहारों के अधीन शासन करता था।

➣ जब प्रतिहार शासक वत्सराज ने बंगाल के शासक धर्मपाल पर आक्रमण किया तब दुर्लभराज, प्रतिहारों के सेनापति के रूप में इस युद्ध में सम्मिलित हुआ था। दुलर्भराय का गौड़ राजपूतों से भी संघर्ष हुआ।

चौहान शासक दुर्लभराज प्रथम पहला राजा था जिसके समय में अजमेर नगर पर मुसलमानों का सर्वप्रथम आक्रमण हुआ।

अजमेर पर मुस्लिम आक्रान्ताओं का कब्ज़ा

दुर्लभराज प्रथम के शासन काल में 724 ई. के लगभग खलीफा वली अब्दुल मलिक की सेना व्यापारियों के वेष में सिंध के मार्ग से अजमेर तक चढ़ आई।

➣ कुछ इतिहासकारों के अनुसार अजमेर दुर्ग पर यह आक्रमण 724 – 726 ई. के बीच, अब्दुल रहमान अल मारी के पुत्र जुनैद के नेतृत्व में हुआ जो खलीफा हाशम के अधीन सिंध का कमाण्डर था। खलीफा हाशम का काल 724 -743 ई. माना जाता है।

➣ इस युद्ध में राजा दुर्लभराज को प्रमुख चौहान सामंतों का सहयोग प्राप्त नहीं हुआ हुआ। इस कारण दुर्लभराज के परिवार के प्रत्येक पुरुष ने युद्ध में तलवार लेकर शत्रु का सामना किया था।

➣ इस युद्ध में राजा दुर्लभराज प्रथम का सात वर्षीय पुत्र लोत एक तीर लग जाने से वीर गति को प्राप्त हुआ। राजा दुर्लभराज की भी युद्धक्षेत्र में ही हत्या कर दी गई और तथा चौहान रानियों ने तारागढ़ दुर्ग में जौहर का आयोजन किया।

➣ इस प्रकार चौहानों के प्रमुख दुर्ग तारागढ़ पर मुसलमानों का अधिकार हो गया।

➣ राजा दुर्लभराज का छोटा भाई माणक राय अजमेर छोड़कर सांभर भाग गया। उसने संभवतः इस युद्ध में राजा दुर्लभराज का साथ नहीं दिया था। माणकराय सांभर का राजा बन गया। उसने सांभर में शाकम्भरी देवी का मंदिर बनवाया।

➣ खलीफा के गवर्नर द्वारा नासिरुद्दीन को अजमेर का शासक नियुक्त किया गया। संभवतः कुछ दिनों बाद मुसलमानों ने सांभर पर भी आक्रमण किया तथा राजा माणिकपाल भी मुसलमानों के हाथों मारा गया।

➣ कालांतर में जब राजा दुर्लभराज प्रथम का पुत्र गूवक बड़ा हुआ तो उसने तारागढ़ पर आक्रमण करके नासिरुद्दीन से अजमेर छीन लिया।

कर्नल जेम्स टॉड ने मुलसमानों से अजमेर लेने वाले राजा का नाम हर्षराय लिखा है। वस्तुतः हर्षराय, राजा गूवक की उपाधि थी जो उसने भगवान शिव का हर्ष मंदिर बनवाकर प्राप्त की थी।

चौहान शासक स्वयं को राय कहते थे। गूवक के पिता दुर्लभराज को दूल्हराय तथा चाचा माणिकपाल को माणिकराय कहा जाता था। इसी प्रकार पृथ्वीराज चौहान को राय पिथौरा कहा जाता था।

➣ राजा गूवक, जालौर के प्रतिहार राजा नागभट्ट का सामंत था। एक शिलालेख में कहा गया है कि राजा दुर्लभराज के पुत्र गूवक को 805 में नागावलोक की सभा में सम्मनित किया गया तथा उसे वीर की उपाधि दी गई। इस नागावलोक का आशय नागभट्ट से है।

➣ गूवक के काल में चौहानों की शक्ति में काफी विस्तार हुआ। उसने अपनी शक्ति के प्रतीक के रूप में भगवान शिव का एक मंदिर बनवाया जिसे हर्ष मंदिर कहा जाता था।

➣ भगवान शिव को भी हर्ष कहते हैं तथा उनके एक भैरव अवतार का नाम भी हर्ष है। भगवान हर्ष अजमेर के चौहानों द्वारा पूज्य थे।

➣ यह मंदिर इतना महत्वपूर्ण था कि जिन पहाड़ियों पर यह मंदिर स्थित है, उन्हें हर्ष की पहाड़ियां कहा जाता है।

➣ वर्तमान में इस मंदिर के खण्डहर राजस्थान के सीकर जिले में स्थित हैं। मंदिर से प्राप्त सबसे पुराना अभिलेख 956 का है जिसमें तत्कालीन चौहान शासक विग्रहराज का नाम अंकित है।

813 से 833 तक अब्बासिया खानदान का अलमामूं बगदाद का खलीफा हुआ। उसने अपनी सेनाएं भारत पर आक्रमण करने के लिए भेजीं। इस सेना ने चित्तौड़ पर भी आक्रमण किया। उस समय चित्तौड़ पर गुहिल वंशी राजा खुंमाण द्वितीय का शासन था।

➣ चौहान शासक गूवक प्रथम के बाद उसका पुत्र चंद्रराज द्वितीय अजमेर का शासक हुआ। उसके बाद गूवक द्वितीय अजमेर का राजा हुआ।

➣ इस काल तक चौहानों की प्रतिष्ठा इतनी बढ़ गई थी कि गूवक द्वितीय की बहिन कलावती का विवाह प्रतिहार शासक भोज प्रथम के साथ हुआ।

➣ गूवक द्वितीय के बाद चंदनराज अजमेर की गद्दी पर बैठा। चंदनराज ने दिल्ली के निकट तंवरावटी पर आक्रमण किया तथा तंवरावटी के तोमर राजा रुद्रेन अथवा रुद्रपाल का वध कर दिल्ली के तोमर शासक, को अजमेर के अपने अधीन किया। तब से दिल्ली अजमेर के अधीन सामंत हो गए

पृथ्वीराज विजय के अनुसार चंदनराज का उत्तराधिकारी वाक्पतिराज प्रथम हुआ जिसे बप्पराज भी कहा जाता है। हर्षनाथ लेख में उसे महाराज कहा गया है जो उसकी राजनीतिक स्थिति का सूचक है।

11वीं शताब्दी ई में वाक्पतिराज चौहान ने प्रतिहारों को परास्त करके उनके कई क्षेत्र अपने राज्य में मिला लिये। इस कारण उसके राज्य की दक्षिणी सीमा विंध्याचल पर्वत तक जा पहुँची।

➣ वाक्पतिराज के तीन पुत्र थे। सिंहराज, लक्ष्मणराज तथा वत्सराज। वाक्पतिराज की मृत्यु के बाद 950 में सिंहराज उसका उत्तराधिकारी हुआ। लक्ष्मणराज नाडौल के पृथक राज्य का स्वामी हुआ जिसे लखनसी भी कहते थे।

➣ सिंहराज 956 तक जीवित रहा। हर्ष अभिलेख के अनुसार हर्ष मंदिर का निर्माण उसके काल में ही पूरा हुआ। इस अभिलेख में चौहानों की तब तक की वंशावली दी गई है।

➣ सिंहराज के बाद उसका पुत्र विग्रहराज द्वितीय चौहानों की गद्दी पर बैठा। विग्रहराज द्वितीय भी अपने पिता सिंहराज की तरह प्रतापी शासक हुआ। शक्राई लेख में उसे महाराजाधिराज लिखा गया है। उसने अपने राज्य का बड़ा विस्तार किया।

➣ विग्रहराज द्वितीय ने 973-996 के बीच की अवधि में गुजरात पर आक्रमण किया। इस समय गुजरात का शासक मूलराज सोलंकी (चौलुक्य) अपनी राजधानी छोड़ कच्छ भाग गया।

हम्मीर महाकाव्य के अनुसार विग्रहराज द्वितीय ने गुजरात के राजा मूलराज का वध किया। यहाँ से चौहानों तथा चौलुक्यों का संघर्ष आरंभ हुआ जिसका लाभ अफगानियों ने उठाया।

➣ उसने दक्षिण में अपना राज्य नर्मदा तक बढ़ा लिया। उसने भरूच में आशापूर्णा देवी का मंदिर बनवाया। आशापूर्णा चौहानों की पूज्य देवी है जिसके मंदिर आज भी गुजरात एवं राजस्थान में मिलते हैं।

➣ विग्रहराज द्वितीय के बाद दुर्लभराज द्वितीय तथा उसके बाद गोविंदराज द्वितीय अजमेर के शासक हुए।

1008-09 ई. में जब अफगानी आक्रांता महमूद गजनवी ने अजमेर राज्य पर आक्रमण किया। इस युद्ध में अजमेर के शासक गोविंदराज द्वितीय ने महमूद गजनवी को बुरी तरह परास्त किया था।

पृथ्वीराज विजय में लिखा है कि गोविंदराज को वैरीघट्ट की उपाधि दी गयी थी। अर्थात् राजा गोविंदराज अपने शत्रुओं के लिए उस चक्की के समान सिद्ध हुआ जिसने शत्रु सेनाओं को अनाज की तरह पीस दिया।

गोविंदराज चौहान द्वितीय का उत्तराधिकारी उसका पुत्र वाक्पतिराज चौहान द्वितीय हुआ। उसने मेवाड़ के गुहिल शासक अम्बाप्रसाद का वध किया। वाक्पतिराज द्वितीय के बाद वीर्यराम चौहान अजमेर का राजा हुआ।

महमूद गजनवी को परास्त करने वाले अजमेर के चौहान शासक वीर्यराम की मृत्यु के बाद उसका पुत्र चामुण्डराय चौहान उसका उत्तराधिकारी हुआ।

➣ चामुण्डराय के बाद सिंहट और सिंहट के बाद दुर्लभराज चौहान तृतीय अजमेर के शासक हुए।

दुर्लभराज तृतीय ई.1075 में चौहानों के सिंहासन पर बैठा जिसे दूसल भी कहते हैं। उसने तुर्क सेनापति शहाबुद्दीन को परास्त किया। 1080 ई. में मेवात के शासक महेश ने दुर्लभराज तृतीय की अधीनता स्वीकार की।

1091 में दुर्लभराज ने गुजरात पर आक्रमण किया तथा वहाँ के चौलुक्य राजा कर्ण को मार डाला ताकि मालवा का शासक उदयादित्य, गुजरात पर अधिकार कर सके।

➣ कालांतर में मेवाड़ के गुहिल शासक वैरिसिंह ने चौहान शासक दुर्लभराज तृतीय को कुंवारिया में हुए युद्ध में मार डाला।

दुर्लभराज तृतीय का उत्तराधिकारी विग्रहराज तृतीय हुआ जिसे वीसल भी कहते हैं। पृथ्वीराज रासो के अनुसार वीसल के सिंहासन पर बैठने के कुछ समय बाद गजनी के शासक की तरफ से अजमेर के शासक से कर तथा वफादारी की शपथ मांगी गई।

➣ पृथ्वीराज विजय के अनुसार राजा विग्रहराज तृतीय ने मुस्लिम आक्रांताओं के विरुद्ध एक संघ बनाया। गंगा और यमुना के बीच अंतरप्रदेश के सैनिक तथा समस्त राजपूत शाखाएं विग्रहराज के झण्डे के नीचे एकत्रित हुईं।

➣ विग्रहराज के नेतृत्व में भारतीय राजाओं ने मिलकर हांसी, थाणेश्वर और नगरकोट से मुस्लिम गवर्नरों को मार भगाया।

➣ वीसलदेव का उत्तराधिकारी पृथ्वीराज प्रथम हुआ। उसके समय में चौलुक्यों की सेना पुष्कर को लूटने आई।

➣ पृथ्वीराज प्रथम के बाद अजयदेव अजमेर का राजा हुआ जिसे अजयराज एवं अजयपाल भी कहा जाता है।

अजयदेव चौहान (1105 – 1133 ई.) : अजयमेरु (अजमेर) नगर का विकास

➣ अजयदेव को अजयराज चौहान कहकर भी कई स्थानों पर सम्बोधित किया गया है। उसके काल को चौहानों के साम्राज्य निर्माण का काल कहा जाता है।

➣ अजयदेव चौहान ने तारागढ़ की पहाड़ी पर एक क़िला गढ़-बिटली (तारागढ़) नाम से बनवाया था, जिसे कर्नल टॉड ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ में राजपूताने की कुँजी कहा है। चौहान नरेश अजयराज चौहान के नाम पर चारण-भाट इसे अजयमेरु और क़िले को अजयमेरु दुर्ग कहने लगे थे।

➣ अजमेर में उसने एक विशाल टकसाल गृह की स्थापना की। पृथ्वीराज विजय के अनुसार अजयदेव ने संसार को सिक्कों से भर दिया।

➣ अजयराज ने चांदी तथा ताम्बे के सिक्के चलाये। उसके कुछ सिक्कों पर उसकी रानी सोमलवती का नाम भी अंकित है। उसकी रानी सोमलदेवी नये सिक्कों की डिजाइन बनाने में रुचि रखती थी।

1123 ई. में राजा अजयदेव चौहान ने मालवा के मुख्य सेनापति साल्हण को पकड़ लिया। उसने अजमेर पर चढ़कर आये मुस्लिम आक्रांताओं को परास्त कर उनका बड़ी संख्या में संहार किया।

➣ अजयराज ने चाचिक, सिंधुल तथा यशोराज पर विजय प्राप्त की तथा उन्हें मार डाला। वह मालवा के राजा नरवर्मन को परास्त करके उसके प्रधान सेनापति सल्हण को पकड़ कर अजमेर ले आया तथा उसे एक मजबूत दुर्ग में बंद कर दिया।

➣ अजयराज को अजयराज चक्री भी कहते थे क्योंकि उसने चक्र की तरह, दूर-दूर तक बिखरे हुए शत्रुदल को युद्ध में जीता था। अर्थात् वह चक्रवर्ती विजेता था।

1130 ई. से पहले किसी समय अजयराज ने पुत्र अर्णोराज को राज्य का भार सौंप दिया। राजा अजयराज 1140 तक जीवित रहा।

➣ अजयराज स्वयं तो शैवधर्म का उपासक था किंतु वह अन्य धर्मों के प्रति भी धर्म-सहिष्णु था। उसने जैन और वैष्णव धर्मावलम्बियों को सम्मान की दृष्टि से देखा। उसने प्रसिद्ध पार्श्वनाथ जैन मंदिर में स्वर्ण कलश चढ़ाया था।

➣ अजयदेव से पृथ्वीराज चौहान तृतीय के समय तक अजमेर, नरायनापुष्कर में जैन विद्वानों के अनेक शास्त्रार्थ होते रहने के उल्लेख भी इतिहास में मिलते हैं।

राजा अजयदेव चौहान के बाद उसका पुत्र अर्णोराज अजमेर का स्वामी हुआ। अर्णोराज को आनाजी भी कहते हैं। वह 1133 के आसपास चौहानों के सिंहासन पर बैठा तथा 1155 ई. तक शासन करता रहा।

➣ इसके शासन काल में चौहानों की शक्ति काफ़ी बढ़ गयी। चौहान शक्ति का सबसे अधिक विस्तार अर्णोराज के समय में ही हुआ। उसने महाराजाधिराज परमेश्वर तथा परम भट्टारक महाराजाधिराज की उपाधियां धारण कीं।

➣ 1158 ई. के नरहड़ लेख में विग्रहराज (चतुर्थ) के नाम के आगे परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर श्रीमद्, तथा नाम के पीछे देवराज्ये उपाधियाँ अंकित की गई हैं।

➣ उसके राज्य की सीमा पंजाब, राजपूताना तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक फैली थी। उसका समकालीन लाहौर का तुर्क शासक खुशरूशाह था जिसने उसके राज्य पर आक्रमण किया।

➣ अर्णोराज तारागढ़ से कुछ किलोमीटर दूर स्थित एक विशाल मैदान में तुर्कों का भयानक संहार किया। इस संहार के कारण तुर्कों की विशाल सेना का इतना रक्त बहा कि पूरा मैदान रक्त से लथपथ हो गया।

➣ राजा अर्णोराज पुष्कर की पहाड़ियों से निकलने वाली चन्द्रा नदी से एक नहर बनवाकर इस मैदान की तरफ लाया जिससे सारे शव बहकर दूर चले गये।

➣ बाद में अर्णोराज ने इस स्थान की खुदाई करवाकर वहाँ की मिट्टी भी हटवा दी और पक्के घाट बनाकर झील का निर्माण करवा दिया।

➣ जिस स्थल पर यवनों का रक्त गिरा था उस स्थल को शुद्ध करने के लिये राजा अर्णोराज ने एक हवन किया तथा उस स्थान पर आनासागर झील बनाई।

आनासागर झील

➣ अजमेर नगर की समृद्धि और विस्तार का जितना श्रेय तारागढ़ दुर्ग को दिया जाता है, उससे कहीं अधिक श्रेय इस झील को जाता है।

➣ इस झील के सौन्दर्य पर मुग्ध होकर ही मुगलों, मराठों, राठौड़ों तथा अंग्रेजों ने अजमेर को बहुत महत्त्व दिया।

जहाँगीर ने इस झील के निकट दौलतबाग का निर्माण करवाया जिसे अब सुभाष उद्यान कहते हैं। शाहजहाँ ने आनासागर झील के तट पर संगमरमर की बारादरी बनवाई।

➣ अंग्रेज तो इस झील के दीवाने ही थे। आज भी यह झील अजमेर नगर की पहचान बनी हुई है।

➣ राजा अर्णोराज चौहान ने मालवा के राजा नरवर्मन को परास्त किया तथा अपनी विजय पताका को सिंधु और सरस्वती नदी के प्रदेशों तक ले जाकर अपने वंश के महत्त्व को बढ़ाया।

➣ अर्णोराज ने हरितानक देश (हरियाणा, दिल्ली एवं मेरठ) तक अभियान का नेतृत्व करके अपनी पैतृक विजय भावनाओं के प्रति कटिबद्धता प्रकट की।

➣ इन विजयों से उसने पंजाब के कुछ पूर्वी भाग (अब हरियाणा) और संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) के पश्चिमी भाग को अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया।

➣ अर्णोराज ने हरियाणा, दिल्ली तथा वर्तमान उत्तरप्रदेश के बुलन्दशहर जिले पर भी अधिकार कर लिया जिसे तब वरणनगर कहते थे।

➣ राजा अर्णोराज सनातन धर्म का अनुयाई था किंतु दूसरे सम्प्रदायों के प्रति भी उसमें संकीर्णता नहीं थी। उसने खतरगच्छ के अनुयायियों के लिये भूमिदान दिया तथा पुष्कर में वराह का विश्व-प्रसिद्ध मंदिर बनवाया।

➣ अर्णोराज के समय देवबोध तथा धर्मघोष नामक प्रकाण्ड विद्वान हुए जिन्हें अर्णोराज ने सम्मानित किया। इनके नामों से अनुमान होता है कि ये बौद्ध भिक्षु रहे होंगे!

चौहानों और चौलुक्यों का आपसी संघर्ष

चौलुक्यों तथा चौहानों के बीच राज्य विस्तार को लेकर पिछली कई शताब्दियों से संघर्ष चला आ रहा था। चौहान शासक अर्णोराज के समय में यह संघर्ष अपने चरम को पहुँच गया।

➣ अर्णोराज अपने राज्य का विस्तार मालवा की तरफ करना चाहता था जबकि गुजरात का चौलुक्य शासक सिद्धराज जयसिंह अपने राज्य का विस्तार राजस्थान की ओर बढ़ाना चाहता था। इस कारण दोनों राज्य एक दूसरे से लड़कर राष्ट्र की क्षति करने में लग गए।

1134 ई. में सिद्धराज जयसिंह ने अजमेर पर आक्रमण किया किंतु अर्णोराज ने उसे परास्त कर दिया। इसके बाद हुई संधि के अनुसार सिद्धराज जयसिंह ने अपनी पुत्री कांचनदेवी का विवाह अर्णोराज से कर दिया। कालान्तर में इस विवाह से सोमेश्वर चौहान हुआ।

1142 ई. में चौलुक्य कुमारपाल, चौलुक्यों की गद्दी पर बैठा तो चाहमान-चौलुक्य संघर्ष फिर से तीव्र हो गया।

➣ विख्यात लेखक एवं व्याकरणाचार्य जैन मुनि हेमचंद्र ने लिखा है कि अर्णोराज ने कुछ राजाओं को एकत्रित करके गुजरात पर धावा बोल दिया।

➣ उसने 1145 ई. में कुमारपाल पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में कुमारपाल चौलुक्य हार गया तथा उसने अपनी बहिन देवलदेवी का विवाह अर्णोराज चौहान के साथ कर दिया।

➣ अर्णोराज तथा कुमारपाल के बीच दूसरा युद्ध 1150 ई. के आसपास हुआ। आबू के निकट दोनों सेनाओं में युद्ध हुआ जिसमें कुमारपाल ने अर्णोराज को परास्त कर दिया।

➣ कुछ समय बाद एक बार फिर अर्णोराज ने अपनी विफलता का बदला लेने की योजना बनाई। इस बार फिर चौलुक्य आगे बढ़ते हुए अजमेर तक आ पहुँचे तथा एक बार पुनः अर्णोराज की हार हुई।

➣ इस प्रकार 1150 ई. में चौलुक्य कुमारपाल ने अजमेर पर अधिकार कर लिया। अर्णोराज को कुमारपाल के साथ अपनी बहिन का विवाह करना पड़ा तथा हाथी-घोड़े भी उपहार में देने पड़े।

➣ लगातार दो बार चौलुक्यों से पराजित हो जाने के कारण चौहानों की प्रतिष्ठा को बड़ा धक्का लगा किंतु कुछ समय बाद ही अर्णोराज ने गजनवियों को परास्त करके खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त कर ली।

➣ उसने अपनी विजय पताका सांभर झील से आगे बढ़कर सिंधु और सरस्वती नदी के प्रदेशों में फहरा दी तथा जिससे सांभर के चौहान उत्तरी भारत की सबसे बड़ी शक्ति बन गए।

➣ राजा अर्णोराज के तीन पुत्र थे। उनमें से जगदेव तथा विग्रहराज (चतुर्थ) के जन्म मारवाड़ की राजकुमारी सुधवा के गर्भ से हुए थे जबकि सोमेश्वर का जन्म अन्हिलवाड़ा पाटन की चौलुक्य राजकुमारी कंचनदेवी के गर्भ से हुआ था।

➣ सोमेश्वर प्रसिद्ध पृथ्वीराज चौहान का पिता था। उसका बचपन अपने नाना सिद्धराज जयसिंह की राजसभा में बीता था।

➣ उसके पुत्र राजकुमार जगदेव ने हेमचन्द्र सूरि से वशीभूत होकर राज्य के लालच में सन .1155 ई. में अपने पिता अर्णोराज की हत्या कर दी और स्वयं अजमेर की गद्दी पर बैठ गया।

➣ चौहान शासक अर्णोराज वीर, धर्मप्रिय, विद्वानों का सम्मान करने वाला तथा प्रजापालक राजा था

➣ कालांतर में अर्णोराज के द्वितीय पुत्र एंव उसके छोटे भाई विग्रहराज ने जगद्देव को पराजित किया एवं सिहांसनरूढ़ हुआ।

विग्रहराज चतुर्थ / वीसलदेव (1155 – 1163 ई.) : संस्कृत विद्यालय स्थापना एवं दिल्ली विजय

अजयराज का पौत्र विग्रहराज चतुर्थ अथवा बीसलदेव चौहान वंश का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं शक्तिशाली शासक था। उसका काल चौहानों का स्वर्णकाल कहलाता है। इसके समय चौहान साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार हुआ।

➣ वीसलदेव ने 1155 से ई.1163 के बीच तोमरों से दिल्ली तथा हॉंसी छीन लिए। नागरी प्रचारिणी पत्रिका के अनुसार वीसलदेव ने तोमर राजा अनंगपाल से दिल्ली छीनी।

➣ इसी अनंगपाल ने दिल्ली में विष्णुपाद पहाड़ी पर लोहे का लाट लगावाया था जिस पर आज तक जंग नहीं लगा। यह लाट विष्णु की ध्वजा के रूप में स्थापित करवाया था। इसे कीली भी कहते हैं।

पृथ्वीराज रासो ने इसी अनंगपाल की पुत्री कमला का विवाह अजमेर के चौहान राजा सोमेश्वर के साथ होना तथा उस विवाह से पृथ्वीराज चौहान का उत्पन्न होना बताया है किंतु अन्य स्रोतों के अनुसार पृथ्वीराज की माता चेदि देश की राजकुमारी कर्पूर देवी थी न कि तंवर/तोमर राजकुमारी कमला।

➣ वीसलदेव ने गुजरात के चौलुक्यों और उनके अधीन आबू एवं मारवाड़ क्षेत्र के परमार राजाओं से भारी युद्ध किये तथा उन्हें पराजित करके उनसे नाडोल, पाली, जालोर एवं आसपास के क्षेत्र छीन लिए।

➣ वीसलदेव ने जालोर के परमार सामन्त को दण्ड देने के लिए जालोर नगर को जलाकर राख कर दिया। राजा वीसलदेव ने चौलुक्य कुमारपाल को परास्त करके उसने अपने पिता की पराजय का बदला लिया।

तुर्कों से भी बीसलदेव ने अनेक युद्ध लड़े। वीसलदेव के समय तुर्कों की एक सेना वव्वेरा गांव तक आ गई। वीसलदेव ने उस सेना को परास्त कर दिया।

➣ इसके बाद वह एक विशाल सेना लेकर उत्तर दिशा की तरफ बढ़ा। दिल्ली से अशोक का एक स्तंभ लेख मिला है जिस पर वीसलदेव के समय में एक और शिलालेख उत्कीर्ण किया गया।

➣ इस शिलालेख के अनुसार वीसलदेव ने देश से मुसलमानों का सफाया कर दिया तथा अपने उत्तराधिकारियों को निर्देश दिया कि वे मुसलमानों को अटक नदी के उस पार तक सीमित रखें।

➣ वीसलदेव के राज्य की सीमायें शिवालिक पहाड़ी, सहारनपुर तथा उत्तर प्रदेश तक प्रसारित थीं। शिलालेखों के अनुसार जयपुर और उदयपुर जिले के कुछ भाग उसके राज्य के अंतर्गत थे।

शिवालिक लेख के अनुसार वीसलदेव के राज्य की सीमायें हिमालय से लेकर विंध्याचल पर्वत तक विस्तृत थीं। इस पूरे क्षेत्र से उसने मुस्लिम गवर्नरों को परास्त करके अटक के उस पार तक मार भगाया था।

प्रबन्धकोष उसे तुरुष्कों का विजेता बताता है। इस काल में दिल्ली केवल ठिकाणा बन कर रह गई जिसकी राजधानी अजमेर थी।

➣ वीसलदेव की विशाल सेना में एक हजार हाथी, एक सौ हजार घुड़सवार तथा उससे भी अधिक संख्या में पैदल सिपाही थे।

➣ विग्रहराज (चतुर्थ) साहित्य प्रेमी राजा था और साहित्यकारों का आश्रयदाता भी। उसके समय के लोग उसे कविबांधव कहते थे। वह स्वयं हरकेलि नाटक का रचयिता था।

पृथ्वीराज विजय के अनुसार जब विग्रहराज की मृत्यु हो गई तो कविबांधव की उपाधि निरर्थक हो गई क्योंकि इस उपाधि को धारण करने की क्षमता किसी में नहीं रह गई थी।

➣ उसके दरबारी कवि सोमदेव ने ललित विग्रहराज नामक सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक की रचना की।

विग्रहराज (चतुर्थ) ने अजमेर में धार की ही तरह का एक संस्कृत विद्यालय एवं सरस्वती मंदिर बनवाया जो अब अढ़ाई दिन का झौंपड़ा के नाम से अवशेष रूप में रह गया है।

सरस्वतीकण्ठाभरणविद्यापीठ विग्रहराज द्वारा निर्मित एक संस्कृत विद्यालय था, जिसे बाद में शाहबुद्दीन मुहम्मद ग़ोरी ने अढ़ाई दिन का झोपड़ा नामक मस्जिद का रूप दे दिया।

➣ उसने अपने नाम पर अजमेर में वीसलसर झील बनवाई जिसके बीच उसके रहने के प्रासाद और उसके चारों ओर अनेक मंदिर बनवाये।

➣ राजा विग्रहराज ने वीसलपुर नामक कस्बे की स्थापना की तथा कई दुर्गों का निर्माण करवाया। धर्मघोष सूरी के कहने पर उसने एकादशी के दिन पशुवध पर प्रतिबन्ध लगाया।

1158 के नरहड़ लेख में विग्रहराज (चतुर्थ) के नाम के आगे परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर श्रीमद्, तथा नाम के पीछे देवराज्ये अंकित किया गया है।

➣ ये उपाधियां चौहानों द्वारा प्रतिहारों से छीनी गई थीं। इन उपाधियों से यह भी ज्ञात होता है कि इस काल में चौहान अपने विशाल साम्राज्य के सम्पूर्णप्रभुत्व सम्पन्न शासक थे।

1163 ई. में विग्रहराज (चतुर्थ) की मृत्यु के बाद उसका अवयस्क पुत्र अमरगंगेय अथवा अपरगंगेय (1163–1165 ई) अजमेर की गद्दी पर बैठा।

➣ अमरगंगेय मात्र 5-6 वर्ष ही शासन कर सका और अपने ही चचेरे भाई पृथ्वीराज द्वितीय द्वारा हटा दिया गया। पृथ्वीराज द्वितीय, पितृहंता जगदेव का पुत्र था।

विग्रहराज (चतुर्थ) अर्थात् वीसलदेव भारत का प्रथम चौहान सम्राट था और उसका भतीजा पृथ्वीराज चौहान भारत का अंतिम चौहान सम्राट एंव अंतिम हिन्दू सम्राट था।

पृथ्वीराज द्वितीय (1165 – 1169 ई.) : चौहान सीमा सुदृढ़ीकरण

➣ पृथ्वीराज द्वितीय उपकार के कार्यों के लिये जाना गया। उसने राजा वास्तुपाल को हराया, तुर्कों को पराजित किया तथा हांसी के दुर्ग में एक महल बनवाया।

➣ पृथ्वीराज द्वितीय ने मुसलमानों को अपने राज्य से दूर रखने के लिये अपने मामा गुहिल किल्हण को हांसी का अधिकारी नियुक्त किया।

➣ उसका राज्य अजमेर और शाकम्भरी के साथ-साथ थोड़े (जहाजपुर के निकट), मेनाल (चित्तौड़ के निकट) तथा हांसी अर्थात् (पंजाब) तक विस्तृत था। 1169 ई. में पृथ्वीराज द्वितीय की निःसंतान अवस्था में ही मृत्यु हो गई।

➣ इस समय अर्णोराज के कुल में तीन वयस्क राजकुमार जीवित थे। इनमें से पहला अमरगंगेय अथवा अपरगांग्य था जो स्वर्गीय अर्णोराज का पौत्र था। आरम्भ में इसे ही पृथ्वीराज द्वितीय द्वारा अपदस्थ किया गया था।

➣ राज्य का दूसरा दावेदार नागार्जुन था जो स्वर्गीय अर्णोराज का पौत्र तथा राजा विग्रहराज (चतुर्थ) का दूसरा पुत्र था।

➣ राज्य का तीसरा दावेदार सोमेश्वर था। वह स्वर्गीय अर्णोराज का तीसरा पुत्र तथा स्वर्गीय विग्रहराज (चतुर्थ) का सबसे छोटा भाई था। अंतत: सामंतो ने सोमेश्वर को ही गद्दी पर बैठाया।

सोमेश्वर (1169 – 1178 ई.) : पृथ्वीराज तृतीय के पूर्ववर्ती शासक

➣ सोमेश्वर का जन्म चौलुक्य राजा सिद्धराज जयसिंह की पुत्री कंचनदेवी के गर्भ से हुआ था। वह बचपन गुजरात में अपने नाना सिद्धराज जयसिंह तथा सौतेले मामा कुमारपाल के दरबार में बीता था।

➣ सोमेश्वर ने ननिहाल में रहने के दौरान ही अपने मामा चौलुक्यराज कुमारपाल के शत्रु कोंकण नरेश मल्लिकार्जुन का युद्ध में सिर काटकर ख्याति प्राप्त की थी।

➣ कोंकण विजय के समय ही सोमेश्वर ने कलचुरियों की राजकुमारी कर्पूरदेवी से विवाह किया। कर्पूरदेवी का पिता अचलराज चेदि देश का राजा था। चेदि देश वर्तमान जबलपुर के आसपास था।

रानी कर्पूरदेवी के गर्भ से दो पुत्रों का जन्म हुआ जिनमें से बड़े पुत्र का नाम पृथ्वीराज तृतीय तथा छोटे पुत्र का नाम हरिराज रखा गया।

➣ कर्पूरदेवी के ज्येष्ठ पुत्र को ही पृथ्वीराज को इतिहास में पृथ्वीराज तृतीय तथा राय पिथौरा कहा जाता है। राजा सोमेश्वर की एक पुत्री भी था जिसका नाम पृथा था।

➣ इन दोनों राजकुमारों की शिक्षा अजमेर की सरस्वती कण्ठाभरण पाठशाला में हुई जिसका निर्माण पृथ्वीराज के ताऊ विग्रहराज चतुर्थ ने करवाया था तथा जिसे अब अढाई दिन का झौंपड़ा कहा जाता है।

➣ सोमेश्वर प्रतापी राजा हुआ। उसके राज्य में बीजोलिया, रेवासा, थोड़, अणवाक आदि भाग भी सम्मिलित किए गए। हालाँकि उसके समय में फिर से चौलुक्य-चौहान संघर्ष छिड़ गया जिससे उसे हानि उठानी पड़ी।

➣ सोमेश्वर ने भी अपने पूर्वजों की भांति नगर, मंदिर और प्रासादों के निर्माण में रुचि ली। उसने अपने पिता अर्णोराज की मूर्ति बनवाकर तथा अपनी स्वयं की मूर्ति बनवाकर लगवाई और उत्तरी भारत में मूर्ति निर्माण कला को बढ़ावा दिया।

शैव धर्मावलम्बी होते हुए भी उसने जैन धर्म के प्रति सहिष्णुतापूर्ण नीति का अवलम्बन किया। उसने वैद्यनाथ का विशाल मंदिर बनवाया जो वीसलदेव के महलों से भी ऊँचा था। इस मंदिर में उसने ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश की मूर्तियाँ स्थापित करवाईं ।

1178 ई. में अजमेर के चौहान राजा सोमेश्वर की मृत्यु हो गई। उस समय पृथ्वीराज केवल 12-13 वर्ष का बालक था।

पृथ्वीराज तृतीय (1178 – 1192 ई.) : तराइन युद्ध एवं मोहम्मद गोरी संघर्ष

1178 ई. में सोमेश्वर का पुत्र व उत्तराधिकारी पृथ्वीराज तृतीय अजमेर की गद्दी पर बैठा। वह चौहान राजवंश का अंतिम शासक एंव अंतिम चौहान सम्राट व् हिन्दू सम्राट था।

➣ सम्राट पृथ्वीराज चौहान को भारत के इतिहास में पृथ्वीराज चौहान तथा राय पिथौरा के नाम से जाना जाता है।

➣ आधुनिक काल में लिखी गई इतिहास की पुस्तकों में उसे पृथ्वीराज तृतीय, भारतेश्वर तथा सपादलक्षेश्वर भी कहा गया है।

पृथ्वीराज विजय महाकाव्यम् में उसे गुर्जरराज तथा मरुगुर्जरराज कहा गया है जिसका अर्थ होता है- गुर्जर देश अथवा मरु-गुर्जर देश का स्वामी

➣ पृथ्वीराज एंव उसके अनुज शिक्षा अजमेर की सरस्वती कण्ठाभरण पाठशाला (अब अढाई दिन का झौंपड़ा) में हुई जिसका निर्माण पृथ्वीराज के ताऊ विग्रहराज चतुर्थ ने करवाया था।

पृथ्वीराज विजय महाकव्यम् के अनुसार पृथ्वीराज को धर्मशास्त्र, चित्रकला, संगीतकला, इंद्रजाल, कविता, वाणिज्य विनय, संस्कृत एवं अपभ्रंश के साथ-साथ अनेक देशज भाषाएं, पक्षियों की भाषा तथा गणित की भी शिक्षा दी गई।

➣ पृथ्वीराज को तलवार, भाला एवं धनुष सहित 36 प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण करने एवं चलाने आते थे। पृथ्वीराज विजय महाकाव्यम् में लिखा है कि सम्राट पृथ्वीराज को संस्कृत, अपभ्रंश, प्राकृत, पैशाची, मागधी एवं शूरसैनी नामक छः भाषाएं आती थीं।

कर्पूरदेवी का संरक्षण-काल

➣ सिंहासन पर बैठते समय पृथ्वीराज के अल्प वयस्क होने के कारण अजमेर का शासन उसकी माता कर्पूर देवी के हाथों में था।

➣ कर्पूर देवी, चेदि देश की राजकुमारी तथा कुशल राजनीतिज्ञ थी। उसने बड़ी योग्यता से अपने अल्पवयस्क पुत्र के राज्य को संभाला। उसने दाहिमा राजपूत कदम्बवास को अपना प्रधानमंत्री बनाया जिसे इतिहास की पुस्तकों में केम्बवास तथा कैमास भी कहा गया है।

➣ कर्पूरदेवी का संरक्षण-काल कम समय का था किंतु इस काल में अजमेर और भी सम्पन्न एवं समृद्ध नगर बन गया।

➣ कर्पूरदेवी के संरक्षण में सम्राट पृथ्वीराज ने कई भाषाओं और शास्त्रों का अध्ययन किया तथा अपनी माता के निर्देशन में अपनी प्रतिभा को अधिक सम्पन्न बनाया।

➣ इसी अवधि में सम्राट पृथ्वीराज ने राज्य-कार्य में दक्षता अर्जित की तथा अपनी भावी योजनाओं को निर्धारित किया जो उसकी निरंतर विजय योजनाओं से प्रमाणित होता है।

➣ कर्पूरदेवी के शासन काल में नागों ने चौहानों के विरुद्ध विद्रोह किया किंतु उन्हें सफलता पूर्वक दबा दिया गया।

➣ पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि जयानक द्वारा लिखित पृथ्वीराजमहाकाव्यम् नामक ग्रंथ जिसे पृथ्वीराज विजय भी कहा जाता है, में पृथ्वीराज की प्रारंभिक विजयों एवं शासन सुव्यवस्थाओं का श्रेय कर्पूरदेवी को दिया गया है।

सत्ता पर एकाधिकार

1180 ई. में केवल 14 वर्ष की आयु में सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने राज्य के समस्त अधिकार अपनी माता से अपने हाथ में ले लिए।

➣ इस क्रम में सर्वप्रथम पृथ्वीराज ने राज्य के समस्त उच्च पदों पर नियुक्त अपनी माता के विश्वस्त मंत्रियों एवं अधिकारियों को हटाकर अपने विश्वास के मंत्रियों एवं अधिकारियों को नियुक्त कर दिया।

➣ सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अपने पिता एवं अपनी माता के शासन काल में प्रधानमंत्री पद पर कार्य कर रहे कदम्बवास अथवा कैमास दहिया की शक्ति को कम कर दिया तथा उसके स्थान पर अपने अन्य मंत्री प्रतापसिंह को अधिकार सम्पन्न बना दिया।

➣ पृथ्वीराज का मुख्य सेनापति स्कंद गुजरात का नागर ब्राह्मण था। पृथ्वीराज के मंत्रियों में जयानक भी सम्मलित था जिसने पृथ्वीराज महाकाव्यम् की रचना की।

➣ पृथ्वीराज का मंत्री रामभट्ट, इतिहास में चन्द बरदायी नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसने पृथ्वीराज रासो की रचना की। जिसे हिन्दी साहित्य का प्रथम महाकाव्य माना जाता है।

➣ चौहानों की सेना में बड़ी संख्या में अश्व सैनिक, हस्ति सैनिक और पदाति सैनिक भर्ती किए जाते थे। पृथ्वीराज के राजा बनने के समय उसकी सेना में 70 हजार अश्वारोही सैनिक थे। समय के साथ यह संख्या बढ़ती चली गई।

➣ पृथ्वीराज के गद्दी पर बैठने के कुछ समय बाद उसके पिता के चचेरे भाई अपरगांग्य ने विद्रोह का झण्डा उठाया। उसने गुड़पुर पर अधिकार कर लिया जिसे अब गुड़गांव तथा गुरुग्राम कहा जाता है।

➣ पृथ्वीराज ने अपरगांग्य को परास्त किया तथा उसकी हत्या करवाई। इस पर अपरगांग्य के छोटे भाई नागार्जुन ने विद्रोह को प्रज्ज्वलित किया तथा गुड़गांव पर अधिकार कर लिया। किन्तु वह भी असफल रहा।

पृथ्वीराज का दिग्विजय अभियान

1182 ई. के लगभग पृथ्वीराज चौहान दिग्विजय अभियान प्रारंभ किया। सबसे पहले उसने भण्डानकों पर आक्रमण किया तथा उनकी बस्तियां घेर लीं। बहुत से भण्डानक मारे गये और बहुत से उत्तर दिशा की ओर भाग गये।

➣ इस आक्रमण का वर्णन समकालिक लेखक जिनपति सूरि ने किया है। खतरगच्छ पट्टावली में लिखा है कि सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने भण्डानकों की हाथियों की सेना को पकड़ लिया।

➣ इस आक्रमण के बाद भण्डानकों की शक्ति सदा के लिये क्षीण हो गई। इसके बाद से इतिहास के पन्नो में भण्डानक जाति का उल्लेख नहीं मिलता है।

➣ भण्डानकों के प्रबल दमन का परिणामस्वरूप पृथ्वीराज के राज्य की दो धुरियां- अजमेर तथा दिल्ली एक राजनीतिक सूत्र में बंध गईं। अब चौहान राज्य का स्वरूप एक साम्राज्य जैसा हो गया था।

1182 में भण्डानकों का दमन करने के पश्चात् पृथ्वीराज चौहान की शक्ति में अद्भुत वृद्धि हो गई। जिसका उपयोग उसने अपने साम्राज्य की सीमाओं में वृद्धि करने के लिए किया। इस समय पृथ्वीराज की आयु मात्र 16 वर्ष थी।

1182 ई. में ही उसने गुजरात पर आक्रमण किया, पर गुजरात के शासक भीम द्वितीय ने, जो पहले मुइज्जुद्दीन मुहम्मद को पराजित कर चुका था, पृथ्वीराज को मात दी, इस पराजय से बाध्य होकर पृथ्वीराज को पंजाब तथा गंगा घाटी की ओर मुड़ना पड़ा।

तबकाते नासिरी नामक ग्रंथ में लिखा है कि जम्मू के शासक विजयराज और पृथ्वीराज चौहान के सम्बन्ध अच्छे नहीं थे। इसलिए पृथ्वीराज की सेना ने जम्मू पर आक्रमण करके जम्मू राज्य को लूटा।

➣ निरंतर किए गए युद्धों एवं प्राप्त विजयों के कारण पृथ्वीराज चौहान के राज्य की सीमायें उत्तर-पश्चिम में मुस्लिम सत्ता से, दक्षिण-पश्चिम में चौलुक्यों से तथा पूर्व में चंदेलों के राज्य (बुन्देलखण्ड) से जा मिलीं।

चौहान-चौलुक्य संघर्ष

➣ पृथ्वीराज चौहान के काल में चौहान-चौलुक्य संघर्ष फिर से उठ खड़ा हुआ। चौहान शासक पृथ्वीराज तृतीय और चौलुक्य शासक भीमदेव द्वितीय दोनों ही महत्त्वाकांक्षी राजा थे।

➣ पृथ्वीराज चौहान की राज्य-विस्तार की नीति के कारण दोनों राज्यों की सीमायें आबू के आसपास एक दूसरे को छूने लगी थीं। इसलिये दोनों में युद्ध होना अवश्यम्भावी था।

खतरगच्छ पट्टावली एंव वीरावल अभिलेख में 1187 में पृथ्वीराज द्वारा गुजरात अभियान करने का वर्णन मिलता है। कुछ साक्ष्य इस युद्ध की तिथि 1184 बताते हैं। इस युद्ध में चौलुक्यों की पराजय हो गई।

➣ इस अभियान में 1187 में पृथ्वीराज चौहान ने आबू के परमार शासक धारावर्ष को भी हराया।

➣ चंदेलों के राज्य को बुन्देलखण्ड राज्य, जेजाकभुक्ति तथा महोबा राज्य भी कहा जाता है।

➣ चौहान साम्राज्य की पूर्वी सीमा चंदेलों के राज्य से मिलती थी। चंदेलों के राज्य में मध्यभारत के बुन्देलखण्ड, जेजाकभुक्ति तथा महोबा के क्षेत्र आते थे। कलिंजर का प्रसिद्ध दुर्ग भी इसी राज्य में स्थित था।

➣ सम्राट पृथ्वीराज का ननिहाल चेदि देश भी बुंदेलखण्ड का ही हिस्सा था किंतु उस पर कलचुरियों का शासन था। इस प्रकार चंदेलों एवं कलचुरियों के पूरे प्रदेश को मिलाकर बुंदेलखण्ड कहा जाता था।

➣ पृथ्वीराज के समय में चंदेल राजा परमारदी देव महोबा का राजा था जिसे कुछ ग्रंथों में राजा परमाल भी कहा गया है। महोबा राज्य के दूसरी तरफ कन्नौज राज्य स्थित था।

माऊ शिलालेख के अनुसार महोबा के चंदेलों और कन्नौज के गाहड़वालों में मैत्री सम्बन्ध था। चंदेलों और गहड़वालों का संगठन, पृथ्वीराज के लिये सैनिक व्यय का कारण बन गया, जिसका फायदा आगे चलकर गौरी को हुआ।

बुन्देलखण्ड का युद्ध

1182 ई. में राजा परमारदी देव ने पृथ्वीराज चौहान के कुछ घायल सैनिकों को मरवा दिया। उनकी हत्या का बदला लेने के लिये पृथ्वीराज चौहान ने चंदेलों पर आक्रमण कर दिया।

➣ चौहान सेनाएं चंदेल राज्य में घुस गईं तथा लूट-पाट करती हुई महोबा की तरफ बढ़ने लगीं। परमारदी देव ने भी बड़ी भारी सेना लेकर चौहान सेनाओं का सामना किया।

➣ उसने अपने, इतिहास-प्रसिद्ध योद्धाओं आल्हा तथा ऊदल को पृथ्वीराज की सेनाओं के विरुद्ध रणक्षेत्र में उतारा। इस प्रकार परमारदी देव की तरफ से चंदेलों के साथ-साथ बनाफरों ने भी भाग लिया।

बैरागढ़ के मैदान में पृथ्वीराज के सेनापति चामुंडराय, जिसे आल्हखंड में चौड़ा कहा गया है, ने धोखे से ऊदल की हत्या कर दी। ऊदल की हत्या के बाद चौहान योद्धा बड़ी तेजी से चंदेल सेना को मारने लगे।

➣ जब आल्हा को अपने छोटे भाई ऊदल के वीरगति को प्राप्त होने की सूचना मिली तो वह अपना आपा खो बैठा और पृथ्वीराज चौहान की सेना पर टूट पड़ा। आल्हा के सामने जो भी आया मारा गया।

➣ कुछ समय पश्चात पृथ्वीराज और आल्हा आमने-सामने हो गए। दोनों में भीषण युद्ध हुआ। पृथ्वीराज चौहान बुरी तरह घायल होकर युद्ध के मैदान में ही गिर गया।

➣ आल्ह-खण्ड के अनुसार सम्राट पृथ्वीराज चौहान के दो पुत्र भी इस युद्ध में मारे गए।

➣ आल्हा के गुरु गोरखनाथ के कहने पर आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को जीवनदान दिया। आल्हा ने उसी क्षण युद्ध बंद कर दिया और गुरु के आदेश पर नाथ पंथ स्वीकार करके योगी बन गया।

➣ अंत में चंदेल राजा परमारदी देव की पराजय हो गई। 1182 ई. के मदनपुर लेख के अनुसार सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने जेजाकभुक्ति के प्रदेश को नष्ट कर दिया।

➣ यद्यपि इस युद्ध में राजा परमारदी देव परास्त हो गया किंतु उसका राज्य नष्ट नहीं हुआ। वह 1203 तक महोबा पर राज्य करता रहा। 1203 में मुसलमानों ने उसका राज्य नष्ट किया।

महोबा राज्य पर विजय प्राप्त करने के बाद पृथ्वीराज के राज्य की सीमाएं कन्नौज राज्य से जा लगीं। इस समय वहां का शासक जयचन्द था।

आल्हा और ऊदल, चंदेल राजा परमल के सेनापति दसराज के पुत्र थे।

दिल्ली की गद्दी को लेकर विवाद

➣ कुछ भाटों के अनुसार राजा अनंगपाल की एक पुत्री का विवाह अजमेर के राजा सोमेश्वर से हुआ जिससे पृथ्वीराज चौहान उत्पन्न हुआ

➣ जबकि अनंगपाल की दूसरी पुत्री का विवाह कन्नौज के राजा विजयपाल से हुआ जिसका पुत्र जयचन्द हुआ। इस प्रकार पृथ्वीराज चौहान और जयचन्द मौसेरे भाई थे।

➣ अनंगपाल ने पृथ्वीराज की वीरता और कार्यकुशलता को देखकर उसे दिल्ली की भी गद्दी सौंप दी। इस प्रकार दिल्ली और अजमेर दोनों एक हो गए।

➣ यदि पृथ्वीराज और जयचंद मौसेरे भाई होते तो पृथ्वीराज संयोगिता का चाचा होता। ऐसी स्थिति में पृथ्वीराज द्वारा संयोगिता का हरण एक अनैतिक कार्य माना जाता। अतः पृथ्वीराज और जयचंद में कोई रक्त सम्बन्ध नहीं माना गया है।

➣ बल्कि 1155 ई. में विग्रहराज (चतुर्थ) ने दिल्ली के तोमर राजा अनंगपाल को परास्त करके दिल्ली को दुबारा से चौहानों के अधीन किया था। इसलिए राजा जयचंद का दिल्ली पर किसी भी तरह का दावा नहीं था।

राजकुमारी संयोगिता

➣ संयोगिता कन्नौज के महाराज जयचन्द्र की पुत्री थी। जयचन्द्र ने संयोगिता के विवाह हेतु स्वयंवर का आयोजन किया था, किंतु पृथ्वीराज चौहान से शत्रुता के कारण उसे स्वयंवर का निमंत्रण नहीं भेजा गया।

➣ इसके अलावा जयचंद्र ने लोहे की पृथ्वीराज की मूर्ति बनवा कर द्वारपाल के स्थान पर प्रस्थापित कर दी। परन्तु स्वयंवर के समय संयोगिता ने पृथ्वीराज की मूर्ति को ही वरमाला पहनाई।

➣ द्वार पर स्थित संयोगिता जब पृथ्वीराज की मूर्ति को वरमाला पहना रही थी, उसी समय पृथ्वीराज ने प्रासाद (महल) में प्रवेश किया और राजकुमारी का हरण कर लिया।

➣ इस घटना से दोनों राजाओं में इतनी शत्रुता हो गई कि तराइन के युद्ध में जयचन्द्र ने चौहान और गौरी के युद्ध से तटस्थ ही रहा।

मुहम्मद गौरी का भारत आक्रमण

पृथ्वीराज ने कई विजय अभियान किये और अपना काफी साम्राज्य विस्तार किया जिससे उसे उत्तर-भारत काफी ख्याति भी प्राप्त हुई किन्तु साथ ही अन्य राजों एंव उसके मध्य वैमनस्य स्थिति पैदा हो गई।

➣ जैसे पश्चिम में मुसलमान प्रांतपति चौहानों के शत्रु थे, वैसे ही उत्तर में जम्मू का राजा, दक्षिण में चौलुक्य शासक, पूर्व में चंदेल और उत्तर-पूर्व में गहड़वाल चौहानों के शत्रु थे।

➣ जिस समय पृथ्वीराज चौहान, दक्षिण में चौलुक्यों, उत्तर में जम्मू एवं कांगड़ा के राजाओं, पूर्व में चंदेलों एवं उत्तर-पूर्व में गाहड़वालों से उलझा हुआ था, उस समय पश्चिम दिशा में अफगानिस्तान से आए तुर्क भारत में बड़ी तेजी से अपना विस्तार कर रहे थे।

➣ मुहम्मद गौरी के भारत-आक्रमणों के बहुत पहले से सिंध, मुल्तान, पंजाब और नागौर आदि क्षेत्रों में छोटे-छोटे मुसलमान शासक शासन कर रहे थे।

➣ जिस समय मुहम्मद गौरी ने भारत पर पहला आक्रमण किया, उस समय उत्तर भारत में चार प्रमुख हिन्दू राजा शासन कर रहे थे –

1.   सम्राट पृथ्वीराज (चौहान वंश) दिल्ली तथा अजमेर
2.   राजा जयचंद (गहड़वाल वंश) कन्नौज
3.   राजा गोविंदपाल (पाल वंश) बिहार
4.   राजा लक्ष्मण सेन (सेन वंश) बंगाल

➣ इन समस्त राज्यों में परस्पर फूट थी तथा ये परस्पर संघर्षों में व्यस्त थे। पृथ्वीराज तथा जयचंद में वैमनस्य चरम पर था।

➣ मुहम्मद गौरी का भारत पर पहला आक्रमण 1175 ई.में मुल्तान पर हुआ। मुल्तान पर उस समय शिया मुसलमान करमाथियों का शासन था।

➣ मुहम्मद गौरी ने उनको परास्त करके मुल्तान पर अधिकार कर लिया। उसी वर्ष गौरी ने ऊपरी सिंध के कच्छ क्षेत्र पर आक्रमण किया तथा उसे अपने अधिकार में ले लिया।

➣ चूंकि इसे मुसलमानों का आपसी मामला समझा गया इसलिए हिन्दू राजाओं द्वारा इस आक्रमण को कोई महत्व नहीं दिया गया।

➣ मुहम्मद गौरी का भारत पर दूसरा आक्रमण 1178 ई. में गुजरात के चौलुक्य राज्य पर हुआ जो उस समय एक धनी राज्य हुआ करता था। गुजरात पर इस समय मूलराज द्वितीय शासन कर रहा था। उसकी राजधानी अन्हिलवाड़ा थी।

➣ गौरी मुल्तान, कच्छ और पश्चिमी राजपूताना में होकर आबू के निकट पहुंचा। वहाँ कयाद्रा गांव के निकट मूलराज द्वितीय की सेना से उसका युद्ध हुआ।

➣ इस युद्ध में नाडौल का चौहान शासक कान्हड़देव, जालोर का चौहान शासक कीर्तिपाल और आबू का परमार शासक धारावर्ष भी अपनी सेनाएं लेकर चौलुक्यों की सहायता के लिए आ गए।

➣ इस युद्ध में मुहम्मद गौरी की सेना के बहुत से सैनिक मारे गए। मुहम्मद गौरी बुरी तरह परास्त हुआ। वह अपनी जान बचाकर रेगिस्तान के रास्ते फिर से अफगानिस्तान भाग गया।

राजपूत राजाओं द्वारा मुहम्मद गौरी को परास्त करके भगा दिया गया था, इसलिए भारत के अन्य राजपूतों ने मुहम्मद गौरी को कोई बड़ी मुसीबत नहीं समझा और भारतीय राजा अपनी परस्पर लड़ाइयों में व्यस्त रहे।

1178 ई. में गुजरात के चौलुक्यों से मिली कड़ी पराजय के बाद मुहम्मद गौरी ने भारतीय राजाओं से संघर्ष करने के बजाय पहले भारत के मुस्लिम अमीरों को जीतना चाहा ताकि वह भारत में पैर जमाता हुआ धीरे-धीरे आगे बढ़ सके।

➣ उन दिनों पंजाब में कई छोटे-छोटे मुस्लिम-अमीर शासन कर रहे थे जिन्हें महमूद गजनवी ने भारत में स्थापित किया था। इसलिए मुहम्मद गौरी ने गुजरात को छोड़कर पंजाब के रास्ते भारत में घुसने की योजना बनाई।

➣ उस समय पेशावर पर गजनवी वंश का खुसरव मलिक शासन कर रहा था। गौरी ने 1179 में पेशावर पर आक्रमण करके पेशावर पर अधिकार कर लिया। 1181 ई. में गौरी ने पंजाब पर दूसरा आक्रमण किया तथा स्यालकोट तक का प्रदेश जीत लिया।

1182 ई. में मुहम्मद गौरी ने भारत के निचले सिंध क्षेत्र पर आक्रमण करके देवल नामक राज्य को जीता तथा वहाँ के हिन्दू शासक को अपनी अधीनता स्वीकार करने पर विवश किया।

1185 ई. में मुहम्मद गौरी ने तीसरा आक्रमण लाहौर पर किया तथा लाहौर तक का प्रदेश अपने राज्य में शािमल कर लिया।

➣ इस प्रकार मुहम्मद गौरी गजनी से लेकर लाहौर तक के विशाल क्षेत्र का स्वामी बन गया। अब वह भारत के राजाओं से सीधा संघर्ष कर सकता था।

लाहौर पर अधिकार कर लेने के बाद मुहम्मद गौरी के राज्य की सीमा पंजाब के सरहिंद तक आ पहुंची थी जिसे मुस्लिम इतिहासकारों ने तबरहिंद कहा है।

मुहम्मद गौरी से संघर्ष

सरहिंद का दुर्ग दिल्ली एवं अजमेर के चौहान शासक पृथ्वीराज तृतीय के साम्राज्य के अधीन था। मुहम्मद गौरी ने यहीं से चौहान साम्राज्य पर आक्रमण करने का निर्णय लिया।

1189 ई. में मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान के राज्य पर सीधा पहला आक्रमण किया तथा भटिण्डा के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। उस समय भटिण्डा का दुर्ग चौहानों के अधीन था।

➣ पृथ्वीराज चौहान उस समय तो चुप बैठा रहा किन्तु 1191 ई. में जब मुहम्मद गौरी, तबरहिंद अर्थात् सरहिंद को जीतने के बाद आगे बढ़ा तो पृथ्वीराज ने करनाल जिले के तराइन के मैदान में उसका रास्ता रोका।

इस प्रकार गौरी का भटिण्डा अभियान एवं तवरहिन्द के किले को जीतना तराइन के प्रथम युद्ध (1191 ई.) का प्रमुख कारण था।

➣ तराइन का यह युद्ध (भारत के इतिहास में तराइन की प्रथम लड़ाई के नाम से प्रसिद्ध) पृथ्वीराज चौहान के पक्ष में रहा एंव गौरी भागकर लाहौर पहुँचा तथा अपने घावों का उपचार करवाकर गजनी लौट गया।

➣ सम्राट पृथ्वीराज ने आगे बढ़कर सरहिंद के दुर्ग पर फिर से अधिकार कर लिया तथा मुहम्मद गौरी के किलेदार काजी जियाउद्दीन को बंदी बनाकर अजमेर ले आया।

➣ काजी ने पृथ्वीराज चौहान से प्रार्थना की कि काजी का जीवन बख्श दिया जाए। बदले में काजी ने पृथ्वीराज को विपुल धन दिया। जियाउद्दीन काजी चौहानों से मुक्त होकर गजनी लौट गया।

➣ गजनी पहुँचने के बाद पूरे एक साल तक मुहम्मद गौरी अपनी सेना में वृद्धि करता रहा। जब उसकी सेना में 1,20,000 सैनिक जमा हो गये तो 1192 ई. में वह पुनः पृथ्वीराज से लड़ने के लिये अजमेर की ओर चल दिया।

तराइन का द्वितीय युद्ध भारतीय इतिहास के निर्णायक युद्धो में माना जाता है। जिसने भारतीय भूमि में मुस्लिम सत्ता स्थापित होने का मार्ग प्रशस्त कर दिया था।

पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के बीच इक्कीस लड़ाइयाँ हुईं जिनमें चौहान विजयी रहे।

हम्मीर महाकाव्य ने पृथ्वीराज द्वारा सात बार गौरी को परास्त किया जाना लिखा है।

सिंघवी जैन ग्रंथ माला, पृथ्वीराज प्रबन्ध के संदर्भ से आठ बार हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष का उल्लेख करता है।

प्रबन्धकोष का लेखक बीस बार मुहम्मद गौरी को पृथ्वीराज द्वारा कैद करके मुक्त करना बताता है।

सुर्जन चरित्र में इक्कीस बार और प्रबन्ध चिन्तामणि में तेबीस बार गौरी का हारना अंकित है।

➣ इतने सारे विवरणों के आधार पर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि मुहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान की सेनाओं के बीच कई बार संघर्ष हुआ।

➣ पुष्ट ऐतिहासिक विवरणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि मुहम्मद गौरी एवं सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बीच सम्मुख युद्ध दो बार हुआ जिन्हें तराइन की पहली लड़ाई एवं तराइन की दूसरी लड़ाई के नाम से जाना जाता है।

तराइन का द्वितीय युद्ध भारतीय इतिहास के निर्णायक युद्धो में माना जाता है। जिसने भारतीय भूमि में मुस्लिम सत्ता स्थापित होने का मार्ग प्रशस्त कर दिया था।

पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के बीच इक्कीस लड़ाइयाँ हुईं जिनमें चौहान विजयी रहे।

हम्मीर महाकाव्य ने पृथ्वीराज द्वारा सात बार गौरी को परास्त किया जाना लिखा है।

सिंघवी जैन ग्रंथ माला, पृथ्वीराज प्रबन्ध के संदर्भ से आठ बार हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष का उल्लेख करता है।

प्रबन्धकोष का लेखक बीस बार मुहम्मद गौरी को पृथ्वीराज द्वारा कैद करके मुक्त करना बताता है।

सुर्जन चरित्र में इक्कीस बार और प्रबन्ध चिन्तामणि में तेबीस बार गौरी का हारना अंकित है।

➣ इतने सारे विवरणों के आधार पर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि मुहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान की सेनाओं के बीच कई बार संघर्ष हुआ।

➣ पुष्ट ऐतिहासिक विवरणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि मुहम्मद गौरी एवं सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बीच सम्मुख युद्ध दो बार हुआ जिन्हें तराइन की पहली लड़ाई एवं तराइन की दूसरी लड़ाई के नाम से जाना जाता है।

1192 में चौहान सम्राट पृथ्वीराज तृतीय की मृत्यु के साथ ही भारत का इतिहास मध्यकाल में प्रवेश कर जाता है। अब अजमेर, दिल्ली, हांसी, सिरसा, समाना तथा कोहराम के क्षेत्र मुहम्मद गौरी के अधीन हो गये।

➣ अजमेर नगर में पृथ्वीराज चौहान के ताऊ विग्रहराज (चतुर्थ) अर्थात् वीसलदेव द्वारा निर्मित संस्कृत पाठशाला एवं सरस्वती मंदिर को भी तोड़ डाला गया तथा उसके एक हिस्से को मस्जिद में बदल दिया गया।

➣ गौरी के दरबारी लेखक हसन निजामी ने अपनी पुस्तक ताज-उल-मासिर में लिखा है कि पृथ्वीराज को मारने के बाद शहाबुद्दीन गौरी ने पृथ्वीराज चौहान के अवयस्क पुत्र गोविन्दराज से विपुल कर धन लेकर गोविंदराज (1192 ई) को अजमेर की गद्दी पर बैठा दिया। इसके बाद शहाबुद्दीन गौरी कुछ समय तक अजमेर में रहकर दिल्ली चला गया।

➣ पृथ्वीराज के पश्चात उसका भाई हरिराज (1193–1194 ई) कुछ समय के लिए राजा बना। उसने अजमेर पर आक्रमण कर गोरी द्वारा नियुक्त पृथ्वीराज के अवयस्क पुत्र से सिंहासन छीनने का प्रयास किया। किन्तु गोरी के सेनापति कुतुबद्दीन ऐबक ने उसे पराजित किया।

➣ कालांतर में सेनानियों के विद्रोह के बाद पृथ्वीराज के पुत्र को भी गद्दी से उतार दिया गया और उसकी जगह अजमेर का शासन एक तुर्की सेनाध्यक्ष को सौंपा दिया गया।

➣ दिल्ली पर तुर्कों का शासन हो गया और दिल्ली सल्तनत का शासन आरंभ हुआ। गौरी ने चौहान साम्राज्य के छोटे-छोटे टुकड़े कर दिये।

कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली का गवर्नर बनाया तथा भारत के समस्त मुस्लिम आधिपत्य वाले क्षेत्र उसके अधीन कर दिए।

अजमेर तथा नागौर मुस्लिम सत्ता के प्रमुख केन्द्र बनाये गए। गौरी ने अमीर अली को नागौर का मुक्ति अर्थात् जागीरदार तथा हमीदुद्दीन नागौरी को नागौर का काजी अर्थात् न्यायाधीश नियुक्त किया।

डॉ. दशरथ शर्मा तथा एडवर्ड थॉमस ने अजमेर से प्राप्त एक सिक्के का उल्लेख किया है जिसके एक तरफ पृथ्वीराज चौहान तथा दूसरी तरफ मुहम्मद बिन साम अंकित है।

➣ शहाबुद्दीन गौरी को ही मुहम्मद-बिन-साम कहते थे। यह सिक्का संभवतः उस समय का है जब शहाबुद्दीन अजमेर में था तथा पृथ्वीराज जीवित था।

➣ गौरी ने अजमेर से और भी कई सिक्के चलाये। उसके चलाये हुए सोने के सिक्कों पर एक ओर देवी लक्ष्मी की मूर्ति और दूसरी ओर नागरी लिपि में श्रीमहमद-विनि-साम लिखा हुआ मिलता है।

➣ संभवतः यह भी सम्राट पृथ्वीराज अथवा उससे पूर्व के किसी चौहान राजा द्वारा जारी किया गया सिक्का था, इसी कारण इसके एक तरफ लक्ष्मीजी की मूर्ति है तथा दूसरी ओर गौरी ने अपना नाम अंकित करवाया।

➣ गौरी के अजमेर से मिले ताम्बे के सिक्कों पर एक ओर नंदी तथा त्रिशूल के साथ ‘स्रीमहमद-साम और दूसरी तरफ चौहानों के सिक्कों के समान स्रीहमीर लेख है।

नंदी एवं त्रिशूल वाला सिक्का संभवतः कोई पुराना सिक्का था जिसे मुहम्मद गौरी ने फिर से जारी किया जबकि दोनों तरफ लेख वाला सिक्का मुहम्मद गौरी से सम्बन्ध नहीं रखता।

1193 ई. में मुहम्मद गौरी ने कन्नौज के राजा जयचंद पर आक्रमण करके उसे भी मार डाला तथा उसका राज्य नष्ट कर दिया। इससे कन्नौज तथा बदायूं आदि के क्षेत्र भी मुसलमानों के अधीन हो गए।

हम्मीर महाकाव्य में पृथ्वीराज को कैद किए जाने और अंत में मरवा दिए जाने का उल्लेख है।

➣ पृथ्वीराज चौहान के दो समसामयिक लेखक यूफी तथा हसन निजामी पृथ्वीराज को कैद किये जाने का उल्लेख तो करते हैं।

हसन निजामी ने ताजुल मासिर में लिखा है कि पृथ्वीराज को कैद कर अजमेर ले जाया गया जहां उसने गौरी के अधीनस्थ कुछ वर्षों तक शासन किया। हसन निजामी के इस कथन की पुष्टि संस्कृत ग्रंथकिसलविधिविद्धमसां से भी होती है।

मिनहाज उस सिराज पृथ्वीराज के भाग जाने पर पकड़े जाने और फिर मरवाए जाने का उल्लेख करता है। मिन्हाज के अनुसार पृथ्वीराज की मृत्यु सिरसा (सरसुती) में हुई। फरिश्ता भी इसी कथन का अनुमोदन करता है।

इलियट ने भी मिन्हाज उस सिराज तथा फरिश्ता द्वारा लिखे गए मत को स्वीकार किया है।

अबुल फजल ने आइन-ए-अकबरी में लिखा है कि पृथ्वीराज को सुलतान गजनी ले गया जहाँ पृथ्वीराज की मृत्यु हो गई।

चन्दरबरदाई उसका मित्र व राजकवि था जिसका ग्रंथ पृथ्वीराज रासो हिन्दी साहित्य का प्रथम महाकाव्य माना जाता है।

➣ पृथ्वीराज को युद्ध क्षेत्र से पकड़कर अजमेर लाया गया तथा कुछ दिनों तक बंदी बनाकर रखने के बाद अजमेर में ही उसकी हत्या की गई।

➣ इस अनुमान की पुष्टि पृथ्वीराज चौहान के उन सिक्कों से भी होती है जिन्हें मुहम्मद गौरी ने एक तरफ अपने नाम का खुतबा लिखवाकर फिर से जारी करवाया। ऐसा एक सिक्का अजमेर से मिला है।

निष्कर्ष

➣ यह सम्राट पृथ्वीराज की अदूरदर्शिता ही कही जाएगी कि उसने अपने स्वजातीय बंधुओं महोबा नरेश परमारदी चंदेल, कन्नौज नरेश जयचंद गाहड़वाल, अन्हिलवाड़ा नरेश भोला भीम, जम्मू नरेश विजयराज अथवा चक्रदेव आदि को अपना शत्रु बना लिया।

➣ उसका सेनापति स्कंद, मंत्री प्रतापसिंह एवं सोमेश्वर भी उसके प्रति समर्पित नहीं थे। इन सब कारणों से 1192 में पृथ्वीराज चौहान मुहम्मद गौरी के हाथों परास्त हुआ और अपमानजनक स्थितियों में मारा गया।

➣ यदि पृथ्वीराज पर लगे अदूरदर्शिता के आक्षेप को अलग रख दिया जाए तो पृथ्वीराज का जीवन शौर्य और वीरता की अनुपम कहानी है। वह वीर, विद्यानुरागी, विद्वानों का आश्रयदाता था।

➣ उसे भारत का अन्तिम हिन्दू सम्राट भी कहा जाता है। उसका राज्य सतलज नदी से बेतवा तक तथा हिमालय के नीचे के भागों से लेकर आबू पर्वत तक विस्तृत था। उसके बाद कोई हिन्दू राजा इतने बड़े भू-भाग का स्वामी नहीं हुआ।

1190 ई. में पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि कश्मीरी पण्डित जयानक ने सुप्रसिद्ध ग्रंथ पृथ्वीराजविजय महाकाव्यम् की रचना की।

➣ उसके दरबार में विद्वानों का एक बहुत बड़ा समूह रहता था। उसे छः भाषायें आती थीं तथा वह प्रतिदिन व्यायाम करता था। वह उदारमना तथा विराट व्यक्तित्व का स्वामी था।

जिनपलोदय, खतरगच्छ गौरवावली के अनुसार पृथ्वीराज की सभा में धार्मिक एवं साहित्यक चर्चाएं होती थीं। उसके शासनकाल में अजमेर में खतरगच्छ के जैन आचार्य जिनपति सूरि तथा उपकेशगच्छ के आचार्य पद्मप्रभ के बीच शास्त्रार्थ हुआ।

मृत्युपरांत भारत की स्थिति

पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बाद देश का राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य बहुत तेजी से बदलने लगा। हिन्दू राजा नेपथ्य में जाने लगे और दिल्ली सल्तनत का विस्तार होने लगा। सर्वाधिक हानि चौहान राज्य की हुई।

➣ चौहानों ने अब अजमेर से दूर रहकर छोटे-छोटे राज्य स्थापित करने के प्रयास आरंभ कर दिये। उनकी शक्ति रणथंभौर, बूंदी, कोटा, नाडोल, जालोर, सिरोही तथा आबू के राज्यों में बँटती चली गई।

रणथम्भौर के चौहान

➣ पृथ्वीराज चौहान के पुत्र गोविंदराज ने रणथंभौर की चौहान शाखा की नींव रखी। आगे चलकर इस वंश में हम्मीर चौहान नामक विख्यात राजा हुआ जिसने 1282 से 1301 ई. तक अपनी मृत्यु पर्यन्त राज्य किया।

➣ हम्मीर चौहान जो अपनी शरणागत वत्सलता, प्रण और वीरता के लिए प्रसिद्ध हुआ। उसने अल्लाउद्दीन के खेमे से भागकर आए हुए मुसलमानों की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया।

हम्मीर चौहान ने अपने राज्य की सीमा मालवा में उज्जैन तक तथा राजपूताना में आबू पर्वत तक बढ़ा ली थी। उसने मालवा का एक भाग तथा गढ़मंडल जीत लिया था। बूंदी और कोटा के चौहान राज्य भी इसी गोविंदराज के वंशजों ने स्थापित किए।

➣ कालांतर में अलाउद्दीन ख़िलजी दिल्ली की गद्दी पर बैठा। प्रारम्भ में उसे सफलता नहीं मिली। किन्तु कई आक्रमणों के पश्चात सन 1301 ई. में उसने रणथम्भौर को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया।

उल्लेखनीय है रणथम्भौर को जीतने वाला प्रथम मुस्लिम शासक इल्तुतमिश था।

➣ अकबर के समय में बूंदी और रणथंभौर के राज्य गोविंदराज के वंशज सुरजनराय के अधीन थे। सुरजनराय ने अकबर से इस शर्त पर संधि की कि बूंदी राज्य की राजकुमारियों के डोले कभी भी मुगलों के लिए नहीं भेजे जाएंगे।

जालौर के चौहान

➣ जालौर के चौहान शाखा का संस्थापक कीर्तिपाल था। प्राचीन शिलालेखों में जालौर का नाम जाबालिपुर और क़िले का सुवर्णगिरि मिलता है, जिसको अपभ्रंश में सोनगढ़ कहते हैं। इसी पर्वत के नाम से चौहानों की यह शाखा सोनगरा कहलाई।

नाडोल का चौहान राज्य पृथ्वीराज चौहान के पूर्वज चौहान राजकुमारों द्वारा स्थापित किया गया था। जालोर का चौहान राज्य इसी नाडौल राज्य के चौहान राजकुमारों द्वारा स्थापित किया गया था।

➣ जालोर के चौहानों द्वारा सिरोही, आबू एवं मण्डोर में अलग चौहान राज्यों की स्थापना की गई थी। जब इल्तुतमिश दिल्ली का सुल्तान हुआ तो उसने जालोर, मण्डोर तथा नाडोल के चौहानों को परास्त कर उनके छोटे-छोटे राज्यों पर अधिकार कर लिया।

➣ दिल्ली के अगले प्रबल सुल्तान बलबन ने रणथंभौर एवं नागौर पर अधिकार करके लाहौर से रणथंभौर तक का भाग अपने अधीन कर लिया जिसकी राजधानी नागौर में रखी।

➣ इनमें से कुछ राज्यों ने स्वतंत्र होने का प्रयास किया किंतु अलाउद्दीन खिलजी ने रणथंभौर, चित्तौड़, सिवाना एवं जालौर पर अधिकार करके उन्हें फिर से दिल्ली सल्तनत के अधीन कर लिया। इस प्रकार कुछ ही वर्षों में सम्पूर्ण चौहान साम्राज्य मुसलमानों के अधीन चला गया।

➣ लगभग 1311 ई. में जालौर का पूर्णत: पतन हो गया।

➣ भारतीय जनमानस यह मानता आया है कि राजा जयचंद गाहड़वाल ने सम्राट पृथ्वीराज चौहान से अपनी पुरानी शत्रुता का बदला लेने के लिए 1192 ई. में गजनी के शासक मुहम्मद गौरी को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया था।

➣ इस धारणा का मुख्य आधार मिनाहाजुद्दीन सिराज द्वारा लिखी गई पुस्तक तबकाते नासिरी है। मिनहाजुद्दीन सिराज दिल्ली का काजी था। वह 1246 से 1266 तक दिल्ली के सुल्तान रहे नासिरुद्दीन महमूद का समकालीन था।

➣ सिराज ने लिखा है कि गौरी को कन्नौज के राजा जयचंद तथा जम्मू के विजयपाल द्वारा सैन्य सहायता उपलब्ध करवाई गई।

तबकात-ए-नासिरी के इस कथन की पुष्टि किसी भी अन्य ग्रंथ से नहीं होती कि राजा जयचंद ने इस युद्ध में मुहम्मद गौरी की सहायता की थी।

➣ अतः हम कह सकते हैं कि केवल मिनहाजुद्दीन सिराज की तबकाते नासिरी को आधार बनाकर जयचंद को दोषी ठहराना इतिहास की एक बड़ी भूल है।

चंदबरदाई की पृथ्वीराज रासो : हिंदी साहित्य का प्राचीनतम महाकाव्य

पृथ्वीराज रासो हिंदी साहित्य का प्राचीनतम महाकाव्य माना जाता है। इसकी रचना चंदबरदाई ने की थी, जो पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि तथा मित्र थे। इसकी रचना 12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मानी जाती है।

➣ इस ग्रंथ में वीर रस की प्रधानता है, साथ ही श्रृंगार रस भी अत्यंत सुंदर रूप में व्यक्त हुआ है। इसकी भाषा अपभ्रंश मिश्रित पुरानी अवधी-हिंदी है, जो उस काल की लोकभाषा को प्रतिबिंबित करती है।

➣ यह महाकाव्य राजा पृथ्वीराज चौहान के पूर्ण जीवन चरित्र पर आधारित है। इसमें उनके जन्म, बाल्यकाल, शिक्षा, योद्धा के रूप में वीरता, अजमेर और दिल्ली पर शासन, कन्नौज के राजा जयचंद की पुत्री संयोगिता के साथ स्वयंवर तथा प्रेम विवाह का वर्णन मिलता है।

➣ साथ ही मोहम्मद ग़ोरी के साथ हुए तराइन के दो प्रसिद्ध युद्धों (1191 एवं 1192 ई.), पृथ्वीराज के बंदी बनाए जाने, आँखों में लोहे की सलाखें डालकर अंधा किए जाने तथा उनकी अंतिम वीरगाथा का भी विस्तृत वर्णन मिलता है।

➣ कुछ आधुनिक विद्वान (जैसे रामचंद्र शुक्ल आदि) इसकी पूर्ण ऐतिहासिकता पर संदेह व्यक्त करते हैं, फिर भी यह रचना राजपूत शौर्य, स्वाभिमान, देशप्रेम, वीरता और योद्धा परंपरा का अद्भुत एवं जीवंत चित्रण प्रस्तुत करती है।

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