बंगाल का सेन वंश (1070-1230 ई.): बल्लालसेन

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत बंगाल का सेन वंश (1070-1230 ई.)
📚 विषय सूची

सेन वंश (11वीं – 13वीं शताब्दी) : बंगाल एवं बिहार की प्रमुख शक्ति

➣ पाल राजवंश के पतनोपरान्त बंगाल का शासन सेन राजवंश के नियंत्रण में आ गया जिसका स्थापना सामंत सेन ने राढ़ नामक स्थल पर किया था। सेन मूलतः दक्कन के कर्नाटक क्षेत्र के थे। देवपाड़ा प्रशस्ति में सेन अपने आपको ब्रह्म क्षत्रिय मानते थे।

शासक शासनकाल परिचय / प्रमुख तथ्य
सामंतसेन व हेमंतसेन 1070 – 1096 ई. सेन वंश के प्रारंभिक शासक, बंगाल (राढ़ क्षेत्र) में आधार स्थापित किया। पाल वंश के पतन का लाभ उठाकर स्वतंत्र सत्ता की नींव रखी।
विजयसेन 1095 – 1158 ई. सेन वंश का वास्तविक संस्थापक, बंगाल में पूर्ण स्वतंत्रता स्थापित की। गौड़ क्षेत्र पर नियंत्रण किया और सेना को मजबूत किया।
बल्लाल सेन 1158 – 1178 ई. प्रशासनिक सुधार और सामाजिक व्यवस्था (जाति व्यवस्था) के लिए प्रसिद्ध। नदिया (Nadia) को प्रमुख केंद्र बनाया और राज्य को स्थिर किया, बंगाल के ब्राह्मणों और कायस्थों में कुलीन प्रथा (Kulin System) का प्रवर्तक।
लक्ष्मणसेन 1178 – 1205 ई. सेन वंश का अंतिम महान शासक। साहित्य, धर्म और संस्कृति का संरक्षक। उसकी राजधानी नदिया थी। 1204–1205 ई. में बख्तियार खिलजी के आक्रमण से बंगाल में सेन वंश का पतन हुआ।

सामंतसेन व हेमंतसेन (1070 – 1096 ई.) : सेन वंश की नींव

➣ बंगाल में सेनवंश का संस्थापक सामंत सेन को माना जाता है।

➣ अपने जीवन के आरंभिक चरण में उसने कर्णाट में अपनी सैनिक गतिविधियां व राढ़ में स्थायी रूप से छोटा सा राज्य स्थापित किया परन्तु कोई राजकीय पद धारण नहीं किया।

➣ सामंतसेन का पुत्र हेमंत सेन उसका उत्तराधिकारी बना अभिलेखों में उसे महाराजाधिराज की उपाधि से विभूषित किया गया।

➣ सामंतसेन की तुलना में हेमंतसेन की सत्ता अधिक सुदृढ़ थी।

विजयसेन (1095 – 1158 ई.) : बंगाल में सेन शक्ति का विस्तार

➣ इस वंश का प्रथम महत्वपूर्ण शासक था जो सामंत सेन का पुत्र था। विजयसेन सेन वंश का पराक्रमी शासक हुआ। उमापतिधर द्वारा रचित देवपाड़ा प्रशस्ति में विजय सेन की विजयों का उल्लेख मिलता है।

➣ उसने बंगाल को पुनः पूर्ण राजनीतिक एकता प्रदान की। कलिंग, कामरूप एवं मगध को जीत कर विजयसेन ने अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया।

कवि धोयी द्वारा रचित देवपाड़ा प्रशस्ति लेख में विजयसेन की यशस्वी विजयों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि उसने नव्यवीर (नेपाल व मिथिला) को पराजित किया।

➣ विजय सेन की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि गौड़राज (पाल शासक) मदनपाल को परास्त करना था। उसने मदनपाल को बंगाल से खदेड़ कर उत्तरी बंगाल में अपनी सत्ता स्थापित कर ली।

➣ विजय सेन ने विजयपुरी एवं विक्रमपुरी नामक दो राजधानियां स्थापित की। उसने परमेश्वर, परमभट्टारक तथा महाराजधिराज की उपाधि धारण की।

➣ विजय सेन शैव धर्म का अनुयायी था जिसकी पुष्टि उसे अरिराज वृषशंकर की उपाधि से स्पष्ट होता है।

➣ उसकी रानी ने कनकतुलापुरुषमहादान यज्ञ करवाया था।

➣ विजयसेन की उपलब्धियों से प्रभावित होकर श्री हर्ष ने उसकी प्रशंसा में विजयप्रशस्ति तथा गौड़ोविर्श प्रशस्ति काव्यों की रचना की।

बल्लालसेन (1158 – 1178 ई.) : सामाजिक सुधार एवं स्थिर शासन

➣ बल्लाल सेन विजयसेन की मृत्यु के बाद बंगाल का शासक बना। बंगाल के सेन वंश का प्रमुख शासक था। उसने गोडेश्वर, निःशंक शंकर आदि उपाधियां धारण की।

➣ उसने उत्तरी बंगाल पर विजय प्राप्त की और मगध के पालों के विरुद्ध भी अभियान चलाया और बंगाल में पाल वंश के शासन का अन्त कर दिया।

लघुभारत एवं वल्लालचरित ग्रंथ के उल्लेख से प्रमाणित होता है कि वल्लाल का अधिकार मिथिला और उत्तरी बिहार पर था। इसके अतिरिक्त राधा, वारेन्द्र, वाग्डी एवं वंगा वल्लाल सेन के अन्य चार प्रान्त थे।

➣ उसने जाति प्रथा एवं कुलीन को अपने शासन काल में प्रोत्साहन दिया। इसे बंगाल में जाति प्रथाकुलीन प्रथा को संगठित करने का श्रेय प्राप्त है।

इसलिए उसे बंगाल के ब्राह्मणों और कायस्थों में कुलीन प्रथा का प्रवर्तक माना जाता है।

➣ बल्लालसेन स्वयं विद्वान तथा विद्वानों का संरक्षक था। बल्लाल सेन ने आचार सागर व प्रतिष्ठा सागर नामक धार्मिक व सामाजिक ग्रन्थों की रचना की।

➣ इसके अलावा उसने दानसागर ग्रंथ की रचना किया था। एक अन्य ग्रंथ अंद्भुत सागर की रचना को प्रारंभ किया, परंतु उसे पूर्ण नहीं करा पाया। पुत्र लक्ष्मण सेन (1178 से 1205 ई.) ने पूरा किया। अद्भुत सागर खगोल विज्ञान की पुस्तक है।

➣ उसका साहित्यिक गुरु विद्वान् अनिरुद्ध था। उसने गौड़ेश्वर तथा निशंकर की उपाधि से उसके शैव मतालम्बी होने का आभास होता है। जीवन के अन्तिम समय में वल्लालसेन ने सन्न्यास ले लिया था।

लक्ष्मणसेन (1178 – 1205 ई.) : बख्तियार खिलजी आक्रमण एवं पतन

➣ बल्लालसेन का उत्तराधिकारी पुत्र लक्ष्मणसेन था। उसने प्राचीन राजधानी गौड़ के समीप अन्य राजधानी लक्ष्मणवती (लखनौती) की स्थापना प. बंगाल में किया था।

➣ लक्ष्मण सेन अपने वंश के विपरीत वैष्णव धर्म का अनुयायी था। उसके लेख विष्णु की स्तुति से प्रारम्भ होते हैं।

➣ उसका शासन सम्पूर्ण बंगाल पर विस्तृत था। कुछ समय तक उसके राज्य सीमा दक्षिण-पूर्व में उड़ीसा और पश्चिम में वाराणसी, इलाहाबाद तक थी।

➣ उसका समकालीन कन्नौज का शासक गहड़वाल वंशीय जयचन्द्र एंव अजमेर व दिल्ली का चौहान वंशीय शासक पृथ्वी राज चौहान थे।

➣ लक्ष्मणसेन गहड़वाल शासक जयचंद को पराजित कर परमभागवत की उपाधि धारण की इस उपाधि से उसके वैष्णव धर्म का अनुयायी होने का पता चलता है।

➣ लक्ष्मण सेन स्वयं विद्वान था। उसने बल्लाल सेन द्वारा प्रारम्भ किये गये उद्भुत सागर नामक ग्रन्थ की रचना को पूरा किया। श्रीधरदास उसका दरबारी कवि था।

➣ इसके अतिरिक्त जयदेव (गीत गोविन्द के लेखक), जलायुध (ब्राह्मण सर्वस्व के लेखक), धोई (पवनदूतम् के लेखक) तथा गोवर्धन उसके दरबार को सुशोभित करते थे।

➣ हलायुध उसका प्रधान न्यायाधीश तथा मुख्यमंत्री था।

➣ लक्ष्मण सेन ने लक्ष्मण संवत चलाया। उसकी राजसभा में 5 रत्न थे जयदेव, धोयी, श्रीधरदास, हलायुध एवं उमापतिधर।

➣ सेन शासक शैव धर्म के अनुयायी थे। विजय सेन ने देवपाड़ा में प्रद्युमनेश्वर शिव का शानदार मन्दिर बनवाया।

➣ 1202 ई. में इख़्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार ख़िलजी ने लक्ष्मण सेन की राजधानी लखनौती पर आक्रमण कर उसे नष्ट कर दिया। इस घटना का वर्णन मिनहाज ने तबकाते-नासिरी में किया है।

➣ सके शासनकाल के अन्तिम चरण में उसके कई सामन्तों ने विद्रोह करके स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर ली। लक्ष्मणसेन के बाद कमज़ोर उत्तराधिकारी सत्ता में आये।

विश्वरूप सेन (1206-1225 ई.) तथा केशवसेन (1225-1230 ई.) शासको की विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है। ये संभवत: सूर्य उपासक थे।

📚 Chapters

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    Swipe left/right to change content

    Share This Page

    WhatsApp Telegram