कश्मीर के राजवंश (7वीं शताब्दी-1339 ई.)

📚 विषय सूची

➣ कश्मीर के हिंदू राज्य का इतिहास कल्हण की राजतरंगिणी से ज्ञात होता है। यह संस्कृत में लिखित प्रथम ऐतिहासिक रचना है।

➣ कल्हण जाति से ब्राह्मण था। राजतरंगिणी की रचना उसने जयसिंह (1127-1159 ई.) के शासनकाल में पूरी की थी।

➣ 7वीं शताब्दी-12वीं शताब्दी के मध्य कश्मीर में तीन राजवंशों ने शासन किया जिनका क्रम इस प्रकार है।
i. कार्कोट वंश (7वीं शताब्दी-8 वीं शताब्दी)
ii. उत्पल वंश (855-1003.ई.)
iii. लोहार वंश (1003-1339 ई.)

कार्कोट वंश

➣ 7वीं शताब्दी में दुर्लभवर्धन नामक व्यक्ति द्वारा कश्मीर में कार्कोट राजवंश की स्थापना की थी। चीनी वृत्तों में दुर्लभ वर्धन को तु-लोन-प नाम से पुकारा गया है।

➣ कर्कोटक वंश के प्रसिद्ध राजाओं में ललितादित्य (724-760 ई.) तथा जयापीड विनयादित्य (770-810 ई.) का नाम मुख्य रूप से लिया जाता है।

➣ दुर्लभवर्धन के पुत्र दुर्लभक (632-682 ई.) शासक बना इसने प्रतापदित्य की उपाधि धारण की तथा प्रतातपुर नामक नगर की स्थापना की। इसके अनेक सिक्के प्राप्त हुए हैं। इन पर इसे श्रीप्रताप कहा गया है।

➣ दुर्लभक का उत्तराधिकारी चन्द्रपीड था। चन्द्रापीड ने केवल 9 वर्ष तक शासन किया था। इसने अरबों तथा तुर्को के विरुद्ध सहायता के लिए 713 ई. में चीन के शासक के पास एक दूत भेजा था।

➣ वह एक न्यायप्रिय शासक था, किन्तु अन्त में अपने भाई तारापीड के षड्यन्त्रों का शिकार हुआ और मार डाला गया। तारापीड उसका उत्तराधिकारी हुआ।

ललितादित्य मुक्तापीड (724-760 ई.)

➣ कश्मीर के शासकों में ललितादित्य मुक्तापीड सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। वह एक साम्राज्यवादी शासक था।

➣ ललितादित्य ने तिब्बतियों, कम्बोजों, तुर्कों आदि को पराजित किया। उसकी विजय ने कश्मीर राज्य को गुप्तों के बाद भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली राज्य बना दिया।

➣ उसने तिब्बतियों, कम्बोजों एवं तुर्को को पराजित किया। उसकी श्रेष्ठ उपलब्धि थी – कन्नौज नरेश यशोवर्मन की पराजय।

➣ उसने 733 ई. में कन्नौज के राजा यशोधर्मन को हराने के बाद उसके दरबारी कवियों भवभूति तथा वाक्पतिराज को ललितादित्य ने कश्मीर बुलाकर अपने दरबार में रखा।

ह्वेनसांग के विवरण आधार पर कहा जाता है कि उसके राज्य की सीमा के अंतर्गत तक्षशिला, सिंहपुर, उरशा, पुंच एवं राजपूताना शामिल थे।

➣ विजेता होने के साथ ही ललितादित्य एक महान् निर्माता भी था। उसके महत्त्वपूर्ण निर्माण कार्यो में सूर्य का प्रसिद्ध मार्तण्ड मंदिर शामिल हैं। उसने कश्मीर में परिहासपुर नगर बसाया।

➣ धार्मिक दृष्टि से उदार होने के कारण उसने अनेक बौद्ध मठों एवं हिन्दू मंदिरों का निर्माण करवाया।

जयापीड विनयादित्य (770 से 810 ई.)

➣ ललितादित्य के बाद उसका पुत्र जयापीड विनयादित्य सिंहासन पर बैठा। उसने कन्नौज शासक ब्रजायुध को हराकर अपने राज्य की सीमा का विस्तार किया।

➣ उसे विद्धानों के आश्रयदाता के रूप मं भी जाना जाता है। उसके राज दरबार को झीर, उद्भट्ट, दामोदर गुप्त आदि विद्धान सुशोभित करते थें।

लगभग 810 ई. में उसकी मृत्यु के साथ ही कर्कोटक वंश का अंत हो गया।

उत्पल वंश (855-1003.ई.)

➣ कार्कोट वंश के बाद कश्मीर में उत्पल वंश का शासन स्थापित हुआ। इस वंश की स्थापना अवन्तिवर्मन (855 ई-883ई.) ने अपने मंत्री शूर की सहायता से की।

अवन्तिवर्मन एक लोकोपकारी शासक था जिसने कृषि की उन्नति के लिए नहरों का निर्माण करवाया। उसने अनेक नगरों के अंतर्गत अवन्तिपुरसुय्यापुरा (आधुनिक सोपार) निर्माण करवाया था।

➣ उसके दरबार में आनन्दवर्धन जैसे विद्वान भी रहते थे जिन्होंने काव्यशास्त्र पर प्रसिद्ध पुस्तक ध्वन्यालोक लिखी। अन्य कवि रत्नाकर ने हरिविजय’ की रचना की।

➣ अवन्ति वर्मन की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारियों के मध्य गृह युद्ध हुआ, जिसमें अवन्ति वर्मन का वैध उत्तराधिकारी शंकर वर्मन विजयी रहा।

➣ अवन्तिवर्मन के बाद उत्तराधिकार युद्ध में शंकर वर्मन (883 से 902ई.) विजयी हुआ। उसने अपने साम्राज्य विस्तार के अन्तर्गत दार्वाभिसार, त्रिगर्त एवं गुर्जर को जीता।

शंकर वर्मन (885-902 ई.) को लगातार युद्ध करने के कारण धन की कमी का सामना करना पड़ा। इस समस्या को हल करने के लिए व कमी को पूरा करने के लिए उसने जनता (प्रजा) पर कई प्रकार के कर लगाये, जिसके कारण जनता की आर्थिक दुष्प्रभावित हुई।

➣ युद्धों के कारण अपने रिक्त खजाने को भरने के लिए उसने मन्दिरों की सम्पत्ति लूटी और राज्य द्वारा विद्या को प्रदान किये जाने वाले संरक्षण में भी कटौती कर दी।

➣ इन करों ने उसे प्रजा में अत्यन्त अलोकप्रिय बना दिया तथा उसे एक क्रूर तथा अत्याचारी शासक कहा जाने लगा।

➣ शंकरवर्मन की हत्या के बाद उसकी पत्नी सुगन्धा ने अपने पुत्र गोपालवर्मन (902-904 ई) की संरक्षिका के रूप में शासन किया। बाद में प्रभाकर नामक मंत्री द्वारा गोपालवर्मन की हत्या किये जाने पर सुगन्धा ने स्वतंत्र रूप से शासन किया।

➣ शंकर वर्मन की विधवा सुगंधा ने 914 ई. तक शासन किया। 904 ई. से 939 ई. के समय दरबार तान्त्रिन (सैनिक गुट) व दो गुटों में बंटा रहा। इसी गुटबन्दी में सुगन्धा की 914 ई. में हत्या कर दी गई।

➣ इस कुल के अंतिम राजा उन्मत्तावंती के अनौरस पुत्र सूरवर्मन द्वितीय ने केवल कुछ महीने ही राज किया। उत्पल वंश का अंत मंत्री प्रभाकरदेव द्वारा हुआ।

यशस्कर वंश

➣ 939 ई. में उत्पल वंश के पतन के बाद ब्राह्मणों ने प्रभाकर के पुत्र यशस्कर (939 से 948 ई.) को राजा चुना।

क्षेमेन्द्रगुप्त 950 ई. में गद्दी पर बैठा। इसका विवाह लोहार वंश की राजकुमारी दिद्दा से हुआ। दिद्दा के नाना काबुल के हिन्दूशाही वंश के राजा थे।

➣ क्षेमेन्द्रगुप्त के बाद कश्मीर की सत्ता व्यवहारिक रूप से रानी दिद्दा के हाथ में पचास वर्षों तक रही। वह एक महत्वाकांक्षी शासिका थी।

➣ दिद्दा ने 980 से 1003 ई. तक शासन किया। इससे पहले दिद्दा ने 958 से 980 ई. तक अपने अल्प वयस्क पुत्र अभिमन्यु की संरक्षिका के रूप में शासन किया।

दिद्दा कश्मीर व भारतीय इतिहास की प्रसिद्ध महिला शासिका थी। उसने सिक्कों पर भी अपना नाम चलवाया एवं लक्ष्मी आकृति के सिक्के चलाये।

1003 ई. में रानी की मृत्यु के बाद संग्रामराज शासक बना, जिसने कश्मीर में लोहार वंश की नींव रखी।

लोहार वंश (1003-1028 ई.)

➣ इस वंश का संस्थापक संग्राम राज (1003-1028 ई.) था। संग्राम राज रानी दिद्दा का भतीजा था। उसकी मृत्यु के पश्चात उसने लोहार वंश की नीव रखी।

➣ संग्राम राज ने अपने मंत्री तुंग को भटिंडा के शाही शासक त्रिलोचन पाल की ओर से महमूद गजनवी से लड़ने के लिए भेजा था।

➣ संग्रामराज के बाद अनंत राजा हुआ। उसकी पत्नी सूर्यमती प्रशासन को सुधारने में उसकी सहायता करती थी।

हर्ष (1089 से 1101 ई.)

➣ इस वंश का अन्य महत्त्वपूर्ण राजा हर्ष था। हर्ष में सद्गुणों व दुर्गुणों का विचित्र सम्मिश्रण था। अपनी विद्वत्ता के कारण वह दूसरे राज्यों में प्रसिद्ध हुआ। परंतु शासक के रूप में वह क्रूर व अत्याचारी था। कल्हण उसके अत्याचारों का वर्णन करता है।

➣ अपव्यय व आंतरिक विद्रोहों के कारण जब उसका राजशाही कोष रिक्त हो गया तो उसने राजकोष की पूर्ति के लिए मंदिरों को लूटा तथा अपनी प्रजा पर अनेक कर लगाए।

कल्हण राजतरंगिणी का लेखक तथा हर्ष का आश्रित कवि था। उसने मन्दिर कोष जब्त करने के कारण हर्ष की आलोचना की। हर्ष को राजतरंगिणी में तुरूष्क और मूर्तिभंजक कहा गया है।

➣ राज्य में आन्तरिक अशान्ति के कारण हुए विद्रोह में लगभग 1101 ई. में उत्सल एवं सुस्सल नामक भाईयों ने हर्ष की हत्या कर दी।

➣ लोहार वंश का अंतिम शासक जयसिंह (1128-1155 ई.) था। उसने अपने शासनकाल में यवनों को परास्त किया। कल्हण को राजतरंगिणी का विवरण जयसिंह के शासन के साथ ही समाप्त हो जाता है।

1339 ई. में कश्मीर तुर्को के कब्जे में आ गया। तुर्क शासकों में सर्वाधिक लोकप्रिय शासक जैनुल आबदीन था जिसे कश्मीर का अकबर कहा जाता है।

कल्हण की राजतरंगिणी

➣ राजतरंगिणी कल्हण द्वारा रचित एक संस्कृत ग्रन्थ है, जिसकी रचना 1148 से 1150 ई. के बीच हुई।

➣ कल्हण ने अपनी राजतरंगिणी हर्ष के समय लिखना प्रारंभ किया और अंतिम लोहार राजा जयसिंह के शासनकाल में पूरा किया।

➣ यह ग्रंथ संस्कृत में ऐतिहासिक घटनाओं के क्रमबद्ध इतिहास लिखने का प्रथम प्रयास है। इसमें आदिकाल से लेकर 1151 ई. के आरम्भ तक के कश्मीर के प्रत्येक शासक के काल की घटनाओं का क्रमानुसार विवरण दिया गया है। यह कश्मीर के राजनीतिक उथलपुथल का काल था।

कश्मीर के इतिहास पर आधारित इस ग्रंथ की रचना में कल्हण ने ग्यारह अन्य ग्रंथों का सहयोग लिया है, जिसमें अब केवल नीलमत पुराण ही उपलब्ध है।

➣ कल्हण की राजतरंगिणी में कुल आठ तरंग एवं लगभग 8000 श्लोक हैं। पहले के तीन तरंगों में कश्मीर के प्राचीन इतिहास की जानकारी मिलती है।

➣ चौथे से लेकर छठवें तरंग में कार्कोट एवं उत्पल वंश के इतिहास का वर्णन है। अन्तिम सातवें एवं आठवें तरंग में लोहार वंश का इतिहास उल्लिखित है। कल्हण (ब्राह्मण) कश्मीर के लोहार वंशी राजा हर्ष के सलाहकार थे।

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