यादव वंश देवगिरि (1187-1312 ई.) : सिंघण

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत यादव वंश देवगिरि (1187-1312 ई.)
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यादव वंश का उदय

राष्टकूटों और चालुक्यों के उत्कर्ष काल में यादव वंश के राजा अधीनस्थ सामन्त राजाओं की स्थिति रखते थे, लेकिन जब चालुक्यों की शक्ति क्षीण हुई तो वे स्वतंत्र हो गए।

➣ वर्त्तमान हैदराबाद के क्षेत्र में स्थित देवगिरि (दौलताबाद) को केन्द्र बनाकर उन्होंने अपने उत्कर्ष का प्रारम्भ किया।

भिल्लम (1187-1191 ई.): देवगिरि यादव राज्य की स्थापना

➣ चालुक्य नरेश सोमेश्वर-IV के शासनकाल में उसका यादव सामंत भिल्लम अपनी स्वतंत्रता स्थापित करने वाला प्रथम महत्वाकांक्षी व्यक्ति था।

➣ 1187 ई. में उसने चालुक्य राज्य पर आक्रमण कर उसके उत्तरी जिलों पर अधिकार कर लिया। फलस्वरूप सोमेश्वर-IV को अपनी राजधानी कल्याणी छोड़कर बनवासी में शरण लेनी पड़ी।

कल्याणी पर यादवों का अधिकार हो गया। भिल्लम ने देवगिरि नामक नगर की स्थापना की तथा उसे अपनी राजधानी बनाया।

द्वारसमुद्र (मैसूर) में यादव क्षत्रियों के एक अन्य वंश का शासन था, जो होयसाल कहलाते थे। होयसालों ने भी स्थिति का लाभ उठाया।

➣ उनके राजा वीर बल्लाल द्वितीय ने उत्तर की ओर अपनी शक्ति का विस्तार करते हुए भिल्लम के राज्य पर भी आक्रमण किया। इस प्रकार बल्लाल और भिल्लम के मध्य एक ज़ोरदार संघर्ष हुआ।

➣ युद्ध में भिल्लम ने वीरगति प्राप्त की और उसके राज्य पर, जिसमें कल्याणी का प्रदेश भी शामिल था, होयसालों का अधिकार हो गया।

जैत्रपाल (1191 – 1210 ई.) : साम्राज्य विस्तार

➣ भिल्लम का उत्तराधिकारी जैत्रपाल प्रथम हुआ, उसने अनेक युद्धों के द्वारा अपने वंश के गौरव का पुनरुद्धार किया।

➣ होयसालों ने कल्याणी और देवगिरि पर स्थायी रूप से शासन का प्रयत्न नहीं किया था, इसलिए जैत्रपाल को फिर से अपने राज्य के उत्कर्ष का अवसर मिल गया।

➣ उसने वारंगल के काकतीय शासक रुद्रदेव के ऊपर आक्रमण कर उसकी हत्या कर दी तथा उसके भतीजे गणपति को बंदी बना लिया।

➣ इस प्रकार अपने पड़ोसी राज्यों से निरन्तर युद्ध करते हुए जैत्रपाल प्रथम ने यादव राज्य की शक्ति को भली-भाँति स्थापित कर लिया।

➣ संभवत: रूद्र के भाई महादेव के काल में संभवतः पुनः यादवों तथा काकतीयों में युद्ध हुआ।

1199 ई. में महादेव की मृत्यु के बाद जैतुगी ने उसके पुत्र गणपति को मुक्त कर दिया तथा उसे वारंगल की गद्दी पर बैठाया।

सिंघन (1210-1247 ई.) : यादव वंश का स्वर्णकाल

➣ जैतुगी का पुत्र तथा उत्तराधिकारी सिंघन हुआ। यह यादव वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था।

37 वर्ष के अपने शासन काल में उसने चारों दिशाओं में बहुत से युद्ध किए और देवगिरि के यादव राज्य को उन्नति की चरम सीमा पर पहुँचा दिया।

➣ होयसल राजा वीर बल्लाल ने उसके पितामह भिल्लम को युद्ध में मारा था और यादव राज्य को बुरी तरह से परास्त किया था।

➣ अपने कुल के इस अपमान का प्रतिशोध करने के लिए सिंघण ने द्वारसमुद्र के होयसाल राज्य पर आक्रमण किया और वहाँ के राजा वीर बल्लाल द्वितीय को परास्त कर उसके अनेक प्रदेशों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।

➣ होयसल राजा कि विजय के बाद सिंघण ने उत्तर भारत में विजय यात्रा के लिए प्रस्थान किया। गुजरात पर उसने कई बार आक्रमण किए और मालवा को अपने अधिकार में लाकर काशी और मथुरा तक विजय यात्रा की।

➣ उसने कलचुरी राज्य को परास्त कर अफ़ग़ान शासकों के साथ भी युद्ध किए, जो उस समय उत्तर-भारत के बड़े भाग को अपने स्वामीत्व में ला चुके थे।

कोल्हापुर के शिलाहार, बनवासी के कदम्ब और पांड्य देश के राजाओं को भी सिंघण ने परास्त किया और अपनी इन दिग्विजयों के उपलक्ष्य में कावेरी नदी के तट पर एक विजय स्तम्भ की स्थापना की।

➣ इसमें सन्देह नहीं कि यादव राज सिंघण एक विशाल साम्राज्य का निर्माण करने में सफल हुआ था और न केवल सम्पूर्ण दक्षिणापथ अपितु कावेरी तक का दक्षिणी भारत और विंध्याचल के उत्तर के भी कतिपय प्रदेश उसकी अधीनता में आ गए थे।

➣ सिंघण न केवल अनुपम विजेता था, अपितु साथ ही विद्वानों का आश्रयदाता और विद्याप्रेमी भी था। संगीतरत्नाकर का रचयिता सारंगधर उसी के आश्रय में रहता था।

➣ प्रसिद्ध ज्योतिषी चांगदेव भी उसकी राजसभा का एक उज्ज्वल रत्न था। भास्कराचार्य द्वारा रचित सिद्धांतशिरोमणि तथा ज्योतिष सम्बन्धी अन्य ग्रंथों के अध्ययन के लिए उसने एक शिक्षाकेन्द्र की स्थापना भी की थी।

सिंघण के उत्तराधिकारी

➣ सिंघण के बाद उसके पोते कृष्ण (1247-1260ई.) ने और फिर कृष्ण के भाई महादेव (1260-1271ई.) ने देवगिरि के राजसिंहासन को सुशोभित किया।

➣ इन राजाओं के समय में भी गुजरात और शिलाहार राज्य के साथ यादवों के युद्ध जारी रहे।

रामचन्द्र’ (1271-1309 ई.) : दिल्ली सल्तनत से संघर्ष

➣ महादेव के बाद रामचन्द्र (1271-1309ई.) यादवों का राजा बना। यह यादव वंश का अंतिम स्वतंत्र शासक हुआ।

➣ उसके समय में 1294 ई. में दिल्ली के अफ़ग़ान शासक अलाउद्दीन ख़िलजी ने दक्षिणी भारत में विजय अभियान किया।

अलाउद्दीन ख़िलजी ने दक्षिणी राज्यों में सबसे पहले आक्रमण रामचंद्र पर किया था। इसमें उसका सेनापति मालिक काफूर था।

➣ अलाउद्दीन ख़िलज़ी ने यादव राज के प्रति मैत्रीभाव प्रदर्शित कर उस पर अचानक हमला कर दिया। रामचन्द्र ने विवश होकर अलाउद्दीन ख़िलज़ी के साथ सन्धि कर ली।

➣ इस सन्धि के परिणामस्वरूप अफ़ग़ान ने अपार सम्पत्ति प्राप्त की। इसके अतिरिक्त रामचन्द्र ने अलाउद्दीन ख़िलज़ी को वार्षिक कर भी देना स्वीकृत किया।

अलाउद्दीन ख़िलज़ी प्रथम मुस्लिम शासक था जिसने दक्षिण अभियान किया। उल्लेखनीय है उसने दक्षिणी राज्यों को दिल्ली सल्तनत में नहीं मिलाया था केवल वार्षिक कर वसूला।
दक्षिणी राज्यों को दिल्ली सल्तनत में मिलाने का श्रेय फिरोजशाह तुगलक को है।

➣ कालांतर में रामचन्द्र ने फिर स्वतंत्रता होने का प्रयत्न किया और ख़िलज़ी को वार्षिक कर देना बन्द कर दिया।

➣ इस पर अलाउद्दीन ने अपने सेनापति मलिक काफ़ूर को उस पर आक्रमण करने के लिए भेजा। काफ़ूर का सामना करने में रामचन्द्र असमर्थ रहा और उसे गिरफ़्तार करके दिल्ली भेज दिया गया।

➣ अलाउद्दीन रामचन्द्र की शक्ति से भली-भाँति परिचित था। उसने उसका स्वागत किया और उसे रायरायाओ की उपाधि से विभूषित किया।

➣ कुछ समय दिल्ली में रहने के पश्चात उसे वापस उसके राज्य भेज दिया गया रामचन्द्र अब अधीनस्थ राजा बनकर शासन करने लगा।

शंकर (1309-1312ई.) : यादव वंश का अंत

➣ रामचन्द्र के पश्चात उसका पुत्र शंकर उत्तराधिकारी हुआ। यह यादव वंश का अंतिम शासक था।

➣ शंकर ने अलाउद्दीन ख़िलज़ी के विरुद्ध विद्रोह किया। एक बार फिर मलिक काफ़ूर देवगिरि पर आक्रमण करने के लिए गया और उससे युद्ध में शंकर ने 1312 ई. में वीरगति प्राप्त की।

1316 ई. में जब अलाउद्दीन की मृत्यु हुई तो रामचन्द्र के जामाता हरपाल के नेतृत्व में यादवों ने एक बार फिर स्वतंत्र होने का प्रयत्न किया, पर उन्हें सफलता नहीं मिली।

➣ इस प्रकार देवगिरि के यादव वंश की सत्ता का अन्त हुआ।

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