संगम काल प्रशासन: राज्य व्यवस्था और समाज

📚 विषय सूची

संगम कालीन प्रशासनिक ढांचा

➣ संगम काल में राजतंत्रात्मक व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। चेर, चोल और पांड्य तीनों राज्यों में राजतंत्रात्मक व्यवस्था ही प्रचलित थी।

राजपद वंशानुगत था। समस्त अधिकार राजा में निहित थे। राजा को कोन, को, मन्नम, वेन्दन, कारेवन, इरैवन इत्यादि उपाधियाँ दी गई थी। ये उपाधियाँ राजा एवं देवता दोनों के लिए होती थी।

➣ राजा का सर्वोच्च न्यायालय राजा की सभा (मनरम) ही होता था। संगम युग के प्रतिनिधियों की सभा मनरम् कहलाती थी।

➣ कवियों द्वारा शाही ढोल मुरचु को बजाकर सुबह राजा को नींद से जगाया जाता था। राजा की सुरक्षा हेतु सशस्त्र महिलाएं नियुक्त होती थी।

➣ राजा प्रतिदिन अपनी सभा में प्रजा के कष्टों को सुनता था और न्याय कार्य संपन्न करता था। राजधानी में एक राजसभा होती थी जिसे नालवै कहा जाता था। यह राजा के साथ न्याय का कार्य करता था।

➣ इस काल के शासक ब्राह्मण मतानुयायी थे, इसलिये उन्होंने ब्राह्मणों को प्रशासन में सर्वोच्च अधिकार एवं सुविधाएँ प्रदान की थी।

➣ पुरनानुरू में राजाओं की प्रशंसा में 400 पद्य है तथा एक कविता में चक्रवर्ती राजा की चर्चा की गई है।

➣ इस काल के शासक युद्ध प्रेमी होते थे तथा चक्रवर्ती सम्राट बनने की अभिलाषा रखते थे। युद्ध में वीरगति शुभ कार्य माना जाता था।

➣ राजा की निरंकुशता पर अंकुश लगाने के लिये पाँच समितियों का गठन किया गया था, जो है-

 1. मंत्रीअमाइच्चार अथवा अमैच्चार
 2. पुरोहित पुरोहितार
 4. राजदूत दूतार
 3. सेना नायक सेनापतियार
 5. गुप्तचर ओर्रार

नगरीय एवं ग्रामीण प्रशासन

➣ प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से राज्य को विभिन्न छोटी-छोटी इकाइयों में विभाजित किया गया था। प्रत्येक इकाई का अपना एक प्रशासनिक अधिकारी होता था।

➣ संगम काल में ग्रामीण व नगर शासन प्रबंध में मनरम मुख्य थे। ग्राम प्रशासन की सबसे छोटी इकाई पोडियल (सार्वजनिक स्थल) थी।

➣ संगमकालीन प्रशासनिक सुविधा के लिए राज्यों को विभिन्न इकाइयों में विभाजित किया गया था-

सम्पूर्ण राज्य (मंडलम)

प्रांत (नाडु)

नगर या बड़े ग्राम (उर या पेरुर)

छोटा ग्राम (सिरैयूर)

पुराना ग्राम (मुडूर)

छोटे ग्रामों की सभा (अवै)

ग्राम, प्रशासन की सबसे छोटी इकाई होती थी। छोटे ग्रामों की सभा अवै कहलाती थी, जो स्थानीय विवादोंव्यापार तथा रोजगार आदि से संबंधित होती थी।

➣ बड़े ग्राम या नगर को उर कहा जाता था। छोटा ग्राम सिरैयूर/सिरूर कहलाता था।

 मंडलम सम्पूर्ण राज्य
 नाडु प्रांत
 उर (पेरुर) नगर या बड़े ग्राम
 सिरैयूर छोटा ग्राम
 मुडूर पुराना ग्राम
 अवै छोटे ग्रामों की सभा
 पट्टिनम तटीय शहर
 सालै प्रमुख सड़क
 तेरु नगर की प्रमुख गली
 पेडियल सार्वजनिक स्थल

सैनिक व्यवस्था

कंल्लिबेली संगम साहित्य में युद्ध पद्धति की जानकारी है। सेना चतुरंगिनी थी (पैदल, हाथी, अश्व एवं रथ )। सेना में वेल्लाल (धनी कृषक) भर्ती किए जाते थे।

➣ युद्ध क्षेत्र में संकेत के रूप में ढोल या शंख का उपयोग होता था।

➣ सेना को पदै कहा जाता था। युद्ध में शौर्य प्रदर्शित करने वाले वीरों को मारया की उपाधि दी जाती थी।

➣ सेना के सेनापति को एनाडि की उपाधि दी जाती थी। सेना की अग्र टुकड़ी को तुसी तथा पिछली टुकड़ी को कुलै कहा जाता था।

➣ युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की मूर्तियाँ बनाई जाती थी, जिसमें उनका नाम और उनकी उपलब्धियाँ अंकित होती थीं। इस प्रकार के Hero stone को नडुकल या वीरकाल कहते थे।

कर प्रणाली या राजस्व

➣ राज्य का अस्तित्व खेती पर आधारित था। भूमिकर– राजस्व का प्रमुख साधन था। भूराजस्व की दर उत्पादन का 1/6 भाग था।

भूमिकर नकद या अनाज दोनों रूपों में वसूल किया जाता था।

➣ संगम काल में युद्ध से लूटा हुआ धन भी आय का एक मुख्य साधन था।

➣ कर अदा करने वाले क्षेत्र की एक प्रसिद्ध इकाई वरियमवारि थी। भूमि का उस इकाई से कर वसूलने वाला प्रभारी वरियार कहलाता था।

➣ भूमि निवर्तन के अनुसार मापी जाती थी। सुदूर दक्षिण में मा और वेलि भूमि के माप थे।

➣ यहाँ कर देने के लिये अनाज को अंबानम् में तौला जाता था। संभवतः यह बड़ा तौल था। छोटे तौल के रूप में नालि, उलाकू और अलाक प्रचलित थे।

 मा या वेल्लि भूमि की दो प्रसिद्ध माप
 करै भूमिकर
 उल्गु या संगम चुंगी एवं सीमा शुल्क
 कडमै या पाडु राजा को अदा किये जाने वाले कर
 इखैअतिरिक्त या जबरन वसूला जाने वाला कर

➣ कर अदा करने वाले क्षेत्र की एक प्रसिद्ध इकाई वरियमवारि थी। जिसका अर्थ ‘कर’ था। भूमि का उस इकाई से कर वसूलने वाला प्रभारी वरियार कहलाता था।

➣ राजा का जन्मदिन प्रतिवर्ष एक उत्सव के रूप में मनाया जाता था। जिसको पेरूनल कहा जाता था।

➣ कर अदा करने वाले क्षेत्र की एक प्रसिद्ध इकाई वरियमवारि थी।

➣ भूमि का उस इकाई से कर वसूलने वाला प्रभारी वरियार कहलाता था।

सामाजिक व्यवस्था

➣ सामाज चार वर्णों में विभक्त था, किंतु यह वर्ण व्यवस्था आर्ययुगीन वर्ण व्यवस्था से भिन्न थी-

राजा (अरासार)

ब्राह्मण (अंदणर)

वैश्य (वेणिसार)

कृषक (बेल्लाल)

➣ पुरूननानुरू में 4 जातियां (कुंडि) का उल्लेख मिलता है। ये तुडियन, पाणन, परैयम तथा कडम्बन थे।

➣ संगम काल में भी जाति प्रथा का आधार व्यवसाय ही थे। व्यवसाय का आधार विभिन्न क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति हुआ करती थी।

➣ इनके अतिरिक्त कुछ व्यावसायिक वर्गों का भी उल्लेख जैसे-

 परियार पशु की खाल या चमड़े का काम करने वाले।
 एनियर शिकारी ।
 पुलैयन रस्सी की चारपाई बनाने वाले या रस्सी का कार्य करने वाले।
 मलवर या कलवर उत्तरी सीमा पर रहने वाले लोग जो डाका डालते थे।

क्षत्रिय वर्ग, वैश्य वर्ग तथा किसान वर्ग मिलकर गैर ब्राह्मण वर्ग बनाते थे। अतः समाज मोटे रूप से ब्राह्मण एवं गैर ब्राह्मण दो भागों में ही बंटा था।

➣ खेतों में काम करने वाले मजदूरों को कडैसियर कहते थे, जो निर्धन वर्ग में आते थे।

➣ वेल्लाल दो वर्गों में विभाजित थे- 1. धनी कृषक वर्ग, 2. भूमिहीन/निर्धन वर्ग।

वेनिगर शब्द का उल्लेख व्यापारी वर्ग के लिये किया जाता था। किंतु इनकी सामाजिक प्रतिष्ठा अच्छी नहीं थी।

➣ चोल राज्य में धनी कृषकों को वेलआरशु की उपाधि दी थी व पाण्ड्य राज्य में इन्हें कविदि की उपाधि दी जाती थी।

➣ इस समय तक दक्षिण के राज्यों का आर्यीकरण हो गया था तथा वैदिक यज्ञ होने लगे थे। ब्राह्मणों को दान में भूमि, घोड़े, रथ. हाथी और स्वर्ण मुद्राएँ दी जाती थीं।

➣ तमिल क्षेत्र में ब्राह्मणों का आगमन सर्वप्रथम संगम काल में ही होता है। ब्राह्मण मांस खाते थे और ताड़ी पीते थे, जो समाज में बुरा नहीं माना जाता था।

स्त्रियों की दशा एंव दास प्रथा

➣ स्त्रियों की दशा अच्छी नहीं थी, किन्तु स्त्रियों को राजसिंहासन पर आसीन होने का भी अधिकार था। मेगस्थनीज के अनुसार पाण्ड्य राज्य में हेराक्लीज की पुत्री का शासन था।

सती प्रथा का प्रचलन था। यह प्रथम विशेष कर उच्च सैनिक वर्गों में था। विधवाओं का जीवन दुरूह था।

➣ विदुषी औरतों को अवैयार कहा जाता था। दरबारों में गायकों के साथ नर्तकियाँ नाचती थीं, जिन्हें पाणर और विडैलियर कहा जाता था।

वेश्यावृति को सम्मानीय दर्जा प्राप्त था। वैश्याओं के दो वर्ग थे- कविगैय्यर एवं परतियर |

चारण काव्य को वाचने वाली एवं नृत्य करने वाली स्त्रियां वीरलियार कहलाती थी।

➣ अन्तर्जातीय विवाह भी प्रचलित था। दो प्रकार के विवाह प्रचलित थे-

  • कलाबु – यह माता-पिता की जानकारी के बगैर किया जाता था।
  • कार्पू – यह परिवार वालों द्वारा किया जाता था।
 पांचतिणै – संगम काल में स्त्री पुरुषों का प्रणय निवेदन
 पेरून्दिणै – अनुचित प्रेम
 कैक्किडै- एक पक्षीय प्रणय निवेदन

➣ तमिल व्याकरण ग्रंथ तोल्काप्पियम् में बताया गया है कि संगम काल में विवाह को संस्कार के रूप में मान्यता दी गई थी। वैदिक धर्मशास्त्रों में वर्णित आठ प्रकार के विवाहों की चर्चा तोल्काप्पियम् में भी की गई है।

➣ संगम साहित्य में मृतक संस्कार विधियों का भी उल्लेख मिलता है। इस काल में अग्निदाह तथा समाधीकरण दोनों ही विधियाँ प्रचलित थीं।

➣ युद्ध में बन्दी बनाई गई स्त्रियाँ दास बना ली जाती थीं और उन्हें सार्वजनिक उपासना स्थलों पर रखा जाता था। जहाँ उन्हें प्रतिदिन संध्याकाल में स्नान करके दीप जलाने का कार्य कराया जाता था।

➣ समाज में अन्तर्जातीय विवाह प्रचलित था। दास प्रथा भी प्रचलित थी तथा दास-बाजारों के अस्तित्व की भी जानकारी मिलती है।

कौवा को शुभ पक्षी माना जाता था, जो अतिथि आगमन, विरहिणी को पति के आगमन की सूचना देता था एवं समुद्री जहाज की यात्रा में भी इसे साथ रखा जाता था।

 1. उमनारनमक
 2. कुचावरकुम्हार
 3. कोल्लारलोहार
 4. थैचरखाती
 5. वन्नारधोबी
 6. उलावारहलवाई
 7. परादावारमछुआरा

आर्थिक व्यवस्था

➣ संगम काल में कषि, पशुपालनशिकार जीविका के मुख्य आधार थे। संगमकालीन राज्यों की मुख्य उपज चावल थी।

➣ कावेरी नदी डेल्टा बारे में कहा जाता था- जितनी जमीन पर एक हाथी लेट सकता हो, उतनी जमीन सात आदमियों का पेट भर सकती है।

➣ कृषि के अंतर्गत धान, गन्ना, रागी, कुल्थी तथा जौ प्रमुख फसलें थीं। संगम साहित्य में गेहूँ का उल्लेख नहीं मिलता है।

➣ कृषि के अतिरिक्त मछली उत्पादन, जहाजों का निर्माण तथा कताई-बुनाई महत्त्वपूर्ण उद्योग थे।

➣ चेरों का राज्य काली मिर्च, हल्दी, मछली, कटहल तथा भैंस आदि के लिये प्रसिद्ध था। चोलों के राज्य में कावेरी नदी के जल का प्रयोग सिंचाई के लिये किया जाता था।

➣ निम्न वर्ग की महिलाएं मुख्यतः खेती कार्य में संलग्न थी, जिन्हें कडैसियर कहा जाता था।

➣ संगम साहित्य में पाँच प्रकार की भूमियों का उल्लेख है, जो तिलाई (भौगोलिक संरचना) से जुड़ी है।

➣ भूमिकर को करई कहते थे जो 1/6 था। कडमई / कडमे राजा को दिया जाने वाला भाग था।

➣ दक्षिण भारत में अगस्त्य ऋषि द्वारा कृषि का विस्तार किया गया।

व्यापार

कोडुमनल संगम काल का एक व्यापारिक केन्द्र है। संगम साहित्य से यहाँ भारत रोमन व्यापार का वर्णन मिलता है।

उरैयूर या ओर्थोरा (चोलों की प्राचीनतम राजधानी) मलमल, सूतीवस्त्रमोतियों के लिए प्रसिद्ध थी। उरैयूर सूती वस्तु उद्योग का महत्त्वपूर्ण केन्द्र था।

➣ अज्ञात नाविक द्वारा लिखी गई पेरिप्लस आफ दि ऐरिथ्रियन सी से संगम काल के व्यापार (आयात-निर्यात) के संबंध में जानकारी मिलती है।

➣ संगम काल में व्यापार का माध्यम वस्तु विनिमय था। अनाज विनिमय का सर्वाधिक स्वीकृत माध्यम होता था।

➣ आयात- घोड़ा, सोना, चांदी, तांबा, रांगा, सीसा, गदला, काँच, शराव, दोहत्थे कलश, मुद्राएँ, पुखराज इत्यादि। सर्वाधिक आयात सोना-चाँदी का था।

➣ निर्यात मसाले (जटामासी, तेजपत्ता, काली मिर्च इत्यादि), वस्त्र, मलमल, विलासिता के सामान, कछुए की खोपड़ी, मोती इत्यादि। रोमिला थापर ने कालीमिर्च को काला सोना कहा है।

कोरकई (कौल्ची) पाण्ड्यों की प्रारम्भिक राजधानी थी व मोतियों के लिए प्रसिद्ध थी।

➣ इस काल में सर्वाधिक व्यापार रोमन साम्राज्य के साथ होता था। रोमन सम्राट आगस्टस के सिक्के पुहार, मुजिरिस और अरिकामेडु से मिले हैं।

अरिकामेडु भारत-रोमन व्यापार का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थल था। अरिकामेडु स्थल जीजी या अयिरनकूपय नदी तट पर था।

➣ अरिकमेडु से तीन प्रकार के मृदभाण्ड मिले है- एरेटाइन, एम्फोरा, चक्रांकित मृदभाण्ड या रोलेट। पेरिप्लस ने अरिकमेडु को पोडुका कहा है।

➣ माना जाता है कि यवन व्यापारी अपने जहाजों से यहाँ सोना लाते थे और यहाँ से काली मिर्च, मोती, कीमती रत्न तथा पर्वतों को अमूल्य वस्तुएँ ले जाते थे।

➣ इस काल में उत्तर भारत एवं सुदूर दक्षिण के बीच व्यापार का भी उल्लेख मिलता है। प्राचीन बौद्ध ग्रंथों में जिस मार्ग का संकेत मिलता है, वह गंगा घाटी से गोदावरी घाटी तक जाता था। यह दक्षिणापथ के नाम से जाना जाता था।

संगमयुग के प्रमुख बन्दरगाह

➣ पेरिप्लस ने संगमयुग के 24 बन्दरगाहों का उल्लेख किया है, जो सिन्धु मुहाने से लेकर कन्याकुमारी तक विस्तृत थे। संगम युग का महत्वपूर्ण बन्दरगाह, पुहार था।

➣ इस काल में पूर्वी तट की अपेक्षा पश्चिमी तट पर बंदरगाहों की संख्या अधिक थी। पश्चिमी तट के मुख्य बन्दरगाह नौरा, तोण्डी, मुशिरी, कोडुमणम, बन्दर, वांजी, करोरा और नेल्सिंडा थे।

➣ पाण्ड्य राज्य के बन्दरगाह- शालियूर एवं कोरकै (कौल्ची) पूर्वी तट पर तथा नेल्सिंडा पश्चिम तट पर था।

➣ चोल राज्य के बन्दरगाह (सभी पूर्वी तट पर)-पुहार (कावेरीपत्तनम),उरैयूर, पोड्डुका

नीरपेयारू भी एक समुद्री बन्दरगाह था जहां से पश्चिम से घोड़े आयात किए जाते थे।

तिरुक्काम्युलियर नामक स्थान चेर, चोल और पांड्य राज्य के संगम स्थल के रूप में था। इस काल में रोम के अतिरिक्त मिस्र, अरब, चीन और मालदीव के साथ भी व्यापार होता था।

➣ इस समय व्यापारिक (स्थल मार्ग) कारवाँ का नेतृत्व करने वाले सार्थवाह को मासातुवान एवं समुद्री सार्थवाह को मानामिकन् कहा जाता था।

धार्मिक व्यवस्था

➣ संगम काल में मुख्य रूप से तीन धार्मिक मत थे- (1) ब्राह्मण मत, (2) बौद्ध मत और (3) जैन मत

➣ यद्दपि संगम युग के दौरान बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म का भी साथ-साथ विकास हुआ। लेकिन ब्राह्मणवादी वैदिक धर्म के अंतर्गत ही इनका प्रसार हुआ।

➣ इस काल तक दक्षिण भारत में वैदिक यज्ञ की शुरुआत हो चुकी थी। लोगों का कर्म, पुनर्जन्म तथा भाग्यवाद पर विश्वास था।

➣ इस युग में धर्म का संबंध कर्मकांडों और कतिपय आध्यात्मिक अवधारणाओं से था। उनके कर्मकांड का संबंध जीवात्मावादी तथा मानवरूपी देवपूजा के विविध रूपों में था।

➣ संगम कालीन मन्दिरों में विभिन्न देवताओं के अनेक मन्दिरों का विशेष उल्लेख हुआ है। मन्दिर नागर, कोइल, कोट्टम, पुराइदेवालय कहलाते थे।

➣ दक्षिण भारत के प्रमुख देवता मुरुगन थे। मुरुगन का एक अन्य नाम सुब्रह्मण्यम भी मिलता है। मुरुगन का प्रतीक मुर्गा अर्थात् कुक्कुट है। मुरुगन की उपासना में किए जाने वाले नृत्य को वेलनाडल कहा जाता था।

➣ संगम काल में पहाड़ी क्षेत्र के शिकारी पर्वत देव रूप में मुरुगन की पूजा करते थे।

मछुआरे तथा तटवर्ती क्षेत्र के लोग वरुण की पूजा करते थे।

किसान लोग मरुद्रम (इंद्र देव) की पूजा करते थे। पुहार में वार्षिक उत्सव में इंद्र की विशेष प्रकार की पूजा होती थी।

मरियम्मा शीतला माता थी, जो चेचक से संबंधित थीं।

➣ संगम काल में शिव, अर्द्धनारीश्वर, अनंतशायी विष्णु, कृष्ण, बलराम आदि देवताओं की उपासना भी लोकप्रिय थी। विष्णु का तमिल नाम तिरूमल है। विष्णु मन्दिर को विनागर कहते हैं।

कोरावई विजयं की देवी एंव येलम्मा सीमा की देवी थी।

वन देवी (कुडुरैकरडावुल) जिसकी प्रायः दुर्गा देवी के साथ तुलना की जाती है, की उपासना भी एक अन्य अवशिष्ट धार्मिक परंपरा थी।

➣ आयकरण के प्रभाव से शिवाख्यान, वामनावतार रास लीलाएँ आदि कथाएँ प्रचलित हो गई थीं।

➣ मणिमेखलै में कापालिक शैव संन्यासियों का वर्णन है। इसमें बौद्ध धर्म के दक्षिण में प्रसार का भी वर्णन है।

शिल्प्पादिकारम् तथा मणिमेखलै महाकाव्यों तथा कावेरीपट्टिनम (तंजाबुर) में बौद्ध तथा जैन संस्थानों के उल्लेख मिलते हैं।

 1. कुरिचि (पहाड़ियाँ)कुर्वासमुरूगन
 2. पलाई (सूखी रेतीली भूमि)मारावरकोनाईवई या कोरावई (दुर्गा)
 3. मुलाई (जंगली व चारागाह भूमि)अवारमेयन (विष्णु)
 4. मरूदम (कृषि व उपजाऊ भूमि)वैलारसइन्द्र
 5. नैडल (समुद्र तटीय मैदान)मिनिवारवरूण
कण्णगी/पत्तिनी पातिव्रत्य की देवी, हिंदू धर्म की देवी सावित्री के समतुल्य।
अयल रानी वैदिक देव इन्द्र की पत्नी इन्द्राणी के समतुल्य।
उमाइ वैदिक देव शिव की पत्नी उमा के समतुल्य।
कडुरैकरडावुल वनदेवी, वैदिक देवी दुर्गा के समतुल्य।
मरियम्मा चेचक की देवी शीतला के समतुल्य।
येलम्मा सीमा की देवी।
कोर्रवल विजय की देवी।

संगम कालीन साहित्य

➣ पाण्ड्य शासकों के संरक्षण में कुल तीन संगम आयोजित किये गये, जिनमें संकलित साहित्य को संगम साहित्य की संज्ञा दी गई। उल्लेखनीय है संगम साहित्य धार्मिक नहीं है।

➣ संगम साहित्य की भाषा तमिल एंव लिपि ब्राह्मी थी। प्राचीन काल के बाद के दिनों से तमिलों ने ग्रंथी लिपि का प्रयोग शुरू किया।

➣ प्रथम संगम मदुरा में, द्वितीय संगम कपाटपुरम् में तथा तृतीय संगम उत्तरी मदुरा में आयोजित किया गया।

➣ प्रथम संगम का कोई ग्रन्थ इस समय उपलब्ध नहीं है। तृतीय संगम के भी अधिकांश ग्रन्थ नष्ट हो गये हैं, लेकिन अवशिष्ट तमिल साहित्य तीसरे संगम से ही संबंधित है।

तोल्लकाप्पियम् द्वितीय संगम का एकमात्र उपलब्ध प्राचीनतम् साहित्य है। यह सबसे प्राचीन तमिल व्याकरण ग्रन्थ है जो सूत्र शैली में रचित है।

➣ तोल्लकाप्पियम् के रचनाकार तोल्लकाप्पियर थे, जो अगस्त्य ऋषि के 12 शिष्यों में से एक थे। इसमें आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है।

➣ संगम साहित्य की दो मुख्य विषय वस्तु है-

  • अहूम – इसका सम्बन्ध प्रेम से है।
  • पुरम – ये युद्ध के बारे में है (शासकों की उपलब्धियाँ)।

➣ संगम साहित्य को मोटे तौर पर तीन भागों में बाँटा जा सकता है- (1) पत्थुप्पातु, (2) इत्थुथोकै, (3) पदिनेनकीलकन्कु

➣ पत्थुप्पातु दस संक्षिप्त पदों का संग्रह है। संभवत: इन पदों को लिखे जाने का समय द्वितीय सदी ईसवी का है।

➣ इन संक्षिप्त पदों में पाण्ड्य राजा नेडुजेलियन और चोल राजा करिकाल के विषय में जानकारी मिलती है।

➣ इत्थुथोकै आठ कविताओं का संग्रह है।

➣ इन कविताओं में संगम काल के राजाओं के नाम और तात्कालिक समाज का विवरण है। ये कविताएँ प्राचीन तमिल साहित्य की उत्कृष्ट कृतियाँ हैं।

➣ पदिनेनकीलकन्कु अठारह छोटी कविताओं का संकलन है। इनका भाव उपदेशात्मक है।

➣ इन कविताओं में तिरुवल्लुवर द्वारा रचित तिरुक्कुरल या कुरल उत्कृष्ट रचना है। इस रचना में राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र, आचारशास्त्र और प्रेम जैसे विषय सम्मिलित हैं।

➣ संगम काल में महाकाव्यों की भी रचना की गई। यद्यपि ये ग्रंथ संगम साहित्य के अंतर्गत नहीं आते तथापि इनसे तत्कालीन जन-जीवन के विषय में पर्याप्त जानकारी प्राप्त हो जाती है।

➣ इस काल के पाँच प्रसिद्ध महाकाव्य हैं- शिलप्पादिकारम्, मणिमेखलै, जीवकचितामणि, वलयपति तथा कुंडलकेशि। इनमें प्रथम तीन ही उपलब्ध हैं।

➣ संगमकालीन महाकाव्यों में शिलप्पादिकारम् महाकाव्य का बहुत अधिक महत्त्व है।

शिलप्पादिकारम् महाकाव्य की रचना चेर शासक शेनगुट्टुवन के भाई इलंगोआदिगल ने की थी।

➣ तमिल साहित्य में शिलप्पादिकारम् को एक राष्ट्रीय काव्य के रूप में मान्यता प्राप्त है।

➣ यह एक प्रेम कथा पर आधारित महाकाव्य है। इस महाकाव्य के नायक और नायिका क्रमश: कोवलन और कण्णगी है। जो एक पति पत्नी थे।

➣ इस महाकाव्य का नायक कोवलन अपनी पत्नी कण्णगी की उपेक्षा कर माधवी नामक एक वेश्या पर अपना सारा धन लूटा देता है।

➣ कालांतर में कोवलन अपनी पत्नी के पास आता है और काबुण्डी नामक जैन भिक्षुणी के साथ मदुरा चला जाता है।

➣ मदुरा पर चोरी का झूठा आरोप लगता है। राजा कोवलन को जल्दबाजी में मृत्युदण्ड दे देता है। कण्णगी अपने पति को निर्दोष साबित करती है।

➣ निर्दोष कोवलन को मृत्युदण्ड देने की ग्लानि में राजा की मृत्यु हो जाती है तथा कण्णगी के शाप से मदुरा जल कर राख हो जाता है।

➣ प्रो. मेहण्डाले ने शिलप्पदिकारम को तमिल काव्य का इलियड और मणिमेखलै को तमिल काव्य का ओडेसी कहा है।

➣ इस महाकाव्य की रचना मदुरा के एक बौद्ध व्यापारी सीतलैसत्तनार द्वारा की गई।

➣ इस ग्रन्थ में महायान बौद्ध धर्म, तर्कशास्त्र की भ्रान्तियों की लम्बी सूची, कांची में पड़े अकाल, संगमकालीन चित्रकला की जानकारी मिलती है।

➣ इस महाकाव्य में महाकाव्य की नायिका मणिमेखलै के साहसिक जीवन का वर्णन है। मणिमेखलै’, शिलप्पादिकारम् के नायक कोवलन और उसकी प्रेमिका माधवी से उत्पन्न पुत्री थी।

➣ उल्लेखनीय है कि जहाँ पर शिलप्पादिकारम् की कहानी खत्म होती है, वहीं से मणिमेखलै की कहानी प्रारंभ होती है।

➣ इस महाकाव्य के लेखक जैन धर्मावलंबी तिरुत्तक्कदेवर हैं। इस महाकाव्य में इसके नायक जीवक का चरित्र-चित्रण किया गया है।

➣ ऐसा माना जाता है कि जीवक कुल आठ विवाह करता है और गृह जीवन के बाद परिवार का त्याग करके जैन धर्म अपनाकर संन्यास ग्रहण कर लेता है।

जीवकचिंतामणि में आठ विवाहों के वर्णन के कारण इसे धर्मग्रंथ (मणमूल) भी कहा जाता है।

➣ जीवक चिन्तामणि को विवाह की किताब भी कहा जाता है।

➣ संगम साहित्य में सर्वाधिक प्राचीन वंश चेर वंश है तथा इसका ही सबसे अधिक उल्लेख है।

ओवैयार तथा नच्चेलियर संगम काल की दो प्रसिद्ध कवयित्रियां (विदुषी स्त्रियाँ) थी।

➣ पट्टिनप्पालै भी कावेरीपत्तनम पर लिखी एक लम्बी कविता है, इसकी रचना रूद्रन कन्नार ने की।

➣ संगम कवि कपिलर को पारि नामक चेर राजा ने संरक्षण दिया। कपिलर ने परणार, कलिथोकै और कुरिन्जप्पात्तु नामक ग्रन्थ लिखे।

मामूलनार नामक तमिल कवि ने नन्दोंमौर्यों का उल्लेख किया है। तथा नन्दों ने कोष गंगा में छिपाया था, का भी उल्लेख किया है।

नच्चिरविकनियर ने संगम कृतियों पर टीका लिखी।

➣ संगम साहित्य में आठ गीतों के एक संग्रह को एत्तुतोकै कहा जाता है। इनमें आठवाँ गीत पुरनानुरू सबसे प्रसिद्ध है।

तिरुक्कुरल को तमिल साहित्य का आधार ग्रन्थ भी माना जाता है। इस ग्रन्थ की रचना श्रीलंका के शासक इल्ल एवं उसके पुत्र को शिक्षित करने के लिए की गई थी। इसे लघु वेद, पंचम वेदतमिल बाईबिल भी कहते है।

➣ तिरुक्कुरल की गणना साहित्यिक त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) के अन्तर्गत की जाती है। इसमें 133 खण्ड हैं। प्रत्येक में दस कवितायें हैं।

➣ एत्तुतोकै के चौथे संग्रह पदिरूप्पत्रु में दस कविताएं हैं। इनमें आठ चेर शासकों की प्रशस्ति मिलती है। इसमें चर राज्य में प्रचलित कलश शवाधाना का उल्लेख है/समाधियों का भी उल्लेख है।

➣ अठारह लघु गीतों का एक संग्रह पडिनैन्किल्कनक्कु है। इनमें तिरूवल्लुवर द्वारा लिखा गया तिरूक्कुरल या कुरल तमिल दर्शन ग्रन्थ है तथा दूसरा प्राचीन तमिल ग्रन्थ भी है।

➣ तमिल साहित्य के पिता अगस्तस्य थे। संगम साहित्य से ज्ञात होता है कि दक्षिण में आर्य सभ्यता का विस्तार ऋषि अगस्त्य एवं कौंडिन्य ने किया।

ग्रन्थ लेखकविशेषता
तोलकाप्पियम् तोलकप्पियार तमिल साहित्य का प्राचीनतम ग्रन्थ, एक व्याकरण ग्रन्थ है,
शिलप्पदिकारम्इलांगो अदिगलयह एक महाकाव्य है।
एतुतोग,अहनानूरू रूद्रसर्मनइस ग्रन्थ की रचना तृतीय संगम के दौरान हुई।
मणिमैकलेसीतलैसंत्तनारब्राह्मण तथा अन्य सम्प्रदायों के सदस्यों से वाद-विवाद तथा मतों का उल्लेख है।
जीवक चिंतामणि तिरुन्तक्कदेवरइस महाकाव्य में जीवक के पराक्रमपूर्ण कार्यों के बारे में बताया गया है।
पत्तुपातुइसमे चेर शासकों के शौर्य की गाथा संकलित है।

संगमकालीन प्रदेश

कुरुंजि पहाड़ी शिकारीमुरूगन
पल्लईशुष्क भूमि योद्धाकोवैि एवं दुर्गा
मुल्नै वन भूमि गडरिएकृष्ण एवं मेयन (विष्णु)
मरुदममैदानी कृषकसेनन एवं इंद्र
नेयतल तटीय मछुआरेवरुण एवं काड़लण

संगम कालीन प्रमुख नगर

 पुहारप्रसिद्ध बन्दरगाह तथा समुद्र तटीय राजधानी (चोल)
 डरैयूरचोलों की द्वीपीय राजधानी तथा सूती कपड़ों का बहुत बड़ा केन्द्र
 कोरकाईपाण्डयों की तटीय राजधानी
 मदुरैपाण्ड्यों की राजधानी
 वांजि या उरैयूर तथा मरंदैचेरों की राजधानी
 कांचीपल्लवों की राजधानी
 मुशिरी या मुजीरिसचेर बन्दरगाह

संगम काल से संबंधित शब्दावली

मा या वेल्लि भूमि की दो प्रसिद्ध माप
करै/कराई भूमिकर
उलगू या संगम चुंगी एवं सीमा कर
कडमै या पाठ कर राजा को अदा किया जाने वाला कर
इरवै अतिरिक्त या जबरन वसूला जाने वाला कर
मनरम राजा का न्यायालय
नलवैराजा की सभा
एनाडि सेनानायक की उपाधि
औरंर गुप्तचर
पेरुनल राजा का जन्मदिन
पोडियाल सार्वजनिक स्थल
मलवर डाकू
कोल्लम लोहार
तच्छन बढ़ई
कलउ गंधर्व विवाह
पंचतिणै सहज प्रेम या स्त्री-पुरुषों का प्रणय निवेदन
कैकिणै एकपक्षीय प्रेम प्रणय निवेदन
पेरुन्दिणै अनुचित प्रेम
उलावर कृषक वर्ग
मरुवर धनी यवन लोगों का निवास स्थान
अवनम बाजार जो लेनदेन का एक केन्द्र होता था।
पारण और विडैलियर दरबारों में गायकों के साथ नर्तकियां
कोरलै विजय की देवी ।
येलम्मा सीमा की देवी थीं।
मरुगन तमिलों का सर्वश्रेष्ठ देव
वेलन मरुगन का दूसरा नाम
माशनम प्रतिनिधि सभा
वेनिगर व्यापारी वर्ग
वेल्लाल धनी किसान
इराबू राज को दिया जाने वाला उपहार

📚 Chapters

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    Swipe left/right to change content

    Share This Page

    WhatsApp Telegram