संगम काल: दक्षिण भारत के चोल, चेर और पांड्य राजवंश

📚 विषय सूची

संगम युग : परिचय

➣ सुदूर दक्षिण के अंतर्गत तुंगभद्रा नदी के दक्षिण का समस्त भूभाग सम्मिलित था। इस भाग को द्रविड़ (तमिल देश) कहा जाता था। यही चोल, चेरपांड्य राज्यों के अस्तित्व का भाग मिलता है।

➣ पेरीप्लस में इस भाग को दमिरिका (दमिलकम्) कहा गया है। इस तिकोने भूभाग में कृष्णा, तुंगभद्रा, कावेरी तथा उसकी सहायक नदियां बहती है।

➣ नवपाषाणकालीन संस्कृति के पश्चात् सुदूर दक्षिण के इतिहास में जिस संस्कृति का प्रारंभ हुआ, उसे महापाषाणयुगीन संस्कृति कहा जाता है।

➣ इस संस्कृति के लोग लौह उपकरणों का प्रयोग करते थे तथा इनके पास काले तथा लाल रंग के मृदभांड थे।

➣ ऐतिहासिक युग के प्रारंभ में दक्षिण भारत का क्रमबद्ध इतिहास हमें जिस साहित्य से ज्ञात होता है, उसे संगम साहित्य कहा जाता है।

संगम शब्द का अर्थ परिषद अथवा गोष्ठी होती है, जिनमें तमिल कवि और विद्वान एकत्र होते थे।

➣ परंपरा के अनुसार अतिप्राचीन समय में पाण्ड्य राजाओं के संरक्षण में कुल तीन संगम आयोजित किये गये। इनमें संकलित साहित्य को ही संगम साहित्य की संज्ञा प्रदान की जाती है।

➣ संगम काल में 473 कवियों द्वारा लगभग 2289 रचनाएँ की गई थी।

संगम साहित्य-तीन संगम

  • स्थान : मदुरई
  • 89 पाण्ड्य राजाओं का संरक्षण, भाग लेने वाले कुल 549 संस्थान, 7 कवि, 4499 लेखक
  • अवधि : 4400 वर्ष
  • अध्यक्षता : ऋषि अगस्त (अगत्तियवार)
  • प्रमुख उपस्थित देवता : अगस्त्य, तिरिपुरामेरीथा (शिव), कुमरामेरिंडा (मुरुगन या सुब्रह्मण्यम), मुरांजीयुर (आदि शेष)
  • ग्रंथ : अक्कतियम (अगस्त्यकृत), परिपदल, मुदुनरै, मुदकुग, कलरियाविरुई आदि।
  • उपलब्ध ग्रंथ : कोई नहीं
  • इस संगम के आचार्य थे अगत्तियार या अगस्त्य जो कि उत्तर भारत से आर्य-संस्कृति को लेकर दक्षिण भारत आये।
  • स्थान : कपाटपुरम (वर्तमान अलवै-समुद्र में विलीन)
  • 59 पाण्ड्य राजाओं का संरक्षण
  • भाग लेने वाले 49 अकादमी सदस्य, 3700 कवि
  • अवधि : 3700 वर्ष
  • इस संगम के आचार्य थे अगत्तियार एवं तोलकाप्पियर (कार्यकारी अध्यक्ष)
  • मानक ग्रंथ : अक्कतियम (अगस्त्यकृत), तोलकाप्पियम, मापुरानम, इसै-नुनुक्कम्, भूतपुरानम्, केलि, कुरुकु, वेन्दालि एवं व्यालमलय आदि।
  • तोलकाप्पियम : लेखक – तोलकाप्पियर
  • उपलब्ध ग्रंथ : तोलकाप्पियम यह तमिल भाषा का प्राचीनतम व्याकरण ग्रंथ है। इसके तीन भाग हैं –
  • (i) इलुथु वर्ग विचार
  • (ii) सोल वाक्य विचार
  • (iii) पोरूल वस्तु
  • स्थान : उत्तरी मदुरई
  • इसमें 49 पाण्ड्य राजा, 49 संस्थान और 449 कवि सम्मिलित थे।
  • अवधि : 1850 वर्ष
  • प्रमुख उपस्थित व्यक्ति – नक्कीरर (अध्यक्ष), पाण्ड्यराजा उद्र, सित्तले सित्तनार, कपिलर, परनर आदि।
  • इस संगम के आचार्य थे नक्कीरर।
  • ग्रंथ – पदित्तुप्पत्रु, परिपादल, वरि, वेरिसै आदि।
  • द्वितीय शताब्दी तमिल साहित्य का स्वर्णयुग – अगस्त्य युग
  • तृतीय संगम में जैन, बौद्ध, हिन्दू तीनों संप्रदाय के लोगों ने भाग लिया।

➣ संगमकालीन राजनैतिक इतिहास का ज्ञान हमें संगम साहित्य से ही मिलता है। संगम साहित्य में तीन महत्त्वपूर्ण राज्यों- चेर, चोल और पांड्य का उल्लेख किया गया है।

➣ संगम साहित्य के अनुसार चेर का राज्य दक्षिण-पश्चिम में, चोलों का राज्य उत्तर-पूर्व में तथा पांड्यों का राज्य दक्षिण-पूर्व में स्थित था।

तिरुक्काम्पुलियर चेर, चोल, पाण्ड्य तीनों राज्यों का संगम स्थल था।

चेरचोलपांड्य
क्षेत्रकेरल/कावेरी नदी (उत्तर-पूर्व)आन्ध्र प्रदेश/पेन्नार व बेल्लार नदी (सुदूर दक्षिण)तमिलनाडु/कावेरी व ताम्रपणि नदी (सुदूर दक्षिण)
अवस्थितिकोचिन व मालावार क्षेत्रतंजावुर व तिरुचिरापल्लीतिन्नेवल्ली व रामनाथपुरम
राजधानी वंजि/करूयूरउरैयूरमदुरै
समुद्री राजधानी मुजिरिसपुहार/कावेरी पट्टनमकोरकई
राजकीय चिह्नधनुषबाघमछली
प्रथम शासक उखप्पहर्रेउदियन, नेडियोन
प्रथम उल्लेखएतरेय ब्राह्मणअष्टाध्यायीमेगास्थनीज
उपनामसबसे प्राचीन राज्यसर्वाधिक शक्तिशाली राज्यदक्षिणी राज्य
शाब्दिक अर्थपर्वतीय देशनया देशप्राचीन देश

प्रारम्भिक चोल राज्य(300 ई. पू. – 1279 ई)

➣ संगम काल के तीनों राज्यों में चोल राज्य सर्वाधिक शक्तिशाली था। यह पांड्य राज्य के उत्तर-पूर्व में अवस्थित था।

➣ चोल राज्य पेन्नार तथा वेल्लारू नदियों के मध्य स्थित था। चोल राज्य चोलमंडलम् या कोरोमंडल के नाम से भी जाना जाता था।

➣ चोलों का प्राचीनतम् उल्लेख कात्यायन ने किया है, इनका प्रतीक चिन्ह बाघ था।

➣ प्रारम्भ में चोल राज्य की राजधानी उत्तरी मनलूर थी, लेकिन ऐतिहासिक युग में उरैयूर राजधानी हो गयीं। तंजावूर भी चोलों की राजधानी रही है।

➣ बाद में करिकाल ने पुहार नगर (आधुनिक कावेरीपत्तनम) की स्थापना कर उसे अपनी राजधानी बनाया।

उरवप्पहरेइलनजेतचेन्नी

➣ यह चोल राजवंश का प्रथम ऐतिहासिक शासक कौन था. जिसकी राजधानी उरैयुर थी। कहा जाता है कि वह युद्ध में अपने सुन्दर रथों के लिए जाना जाता था।

एलारा

➣ ई.पू. दूसरी सदी के मध्य में एलारा नामक चोल राजा ने श्रीलंका पर विजय प्राप्त की और लगभग 50 वर्षों तक शासन किया।

करिकाल

➣ करिकाल इस काल में सबसे महत्त्वपूर्ण चोल शासक था। उसने 190 ई. के आस-पास शासन किया।

➣ करिकाल का अर्थ होता है पांव जला व्यक्ति व् शत्रुदल के हाथियों का विनाश करने वाला।

➣ करिकाल ने अपने समकालीन चेर तथा पाड्य राजाओं को परास्त किया तथा कावेरी नदी घाटी में अपनी स्थिति सुदृढ़ की।

➣ वह ब्राह्मण मतानुयायी था। उसने इस धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान किया।

➣ करिकाल ने कावेरी नदी के मुहाने पर बांध बनवाया तथा उसके जल का उपयोग सिंचाई के लिए करने के उद्देश्य से नहरों का निर्माण करवाया था।

➣ शासन के प्रारम्भिक वर्षों में करिकाल को पदच्युत कर दिया गया था तथा उसे कैद कर लिया गया था। पत्तुपात्तु नामक कविता में उसके पुनः गद्दी प्राप्त करने का वर्णन है।

➣ तंजौर के निकट वेणिण के युद्ध से करिकाल को अत्यधिक प्रसिद्धि प्राप्त हुई। इस युद्ध में उसने चेर तथा पाण्ड्य राज्य के 11 राजाओं के समूह पर पर विजय प्राप्त की थी।

वेण्णि युद्ध में चेर शासक पेरुमशेरलआवन ने अपनी पराजय के बाद आत्महत्या कर ली थी।

➣ करिकाल ने एक अन्य युद्ध बाटैप्परन्तलइ युद्ध में 9 राजाओं को परास्त किया था।

➣ करिकाल ने पत्तिनपालै के रचयिता, रूद्धनकन्नार को 16 लाख स्वर्ण मुद्राएं प्रदान की थी। पट्टिनप्पालै में करिकाल की सफलताओं का वर्णन है।

शिलप्पदिकारम नामक ग्रन्थ में करिकाल द्वारा हिमालय तक भारत विजय का वर्णन है।

➣ करिकाल की संगीत में रूचि थी। पेरुनानुन्नुपादे में करिकाल को संगीत के सप्त स्वरों का विशेषज्ञ बताया गया है।

➣ करिकाल के काल में व्यापार और वाणिज्य का बहुत बड़ा केंद्र कावेरीपत्तनम था। उसने पुहारपत्तन बंदरगाह का निर्माण करवाया।

➣ करिकाल ने अपने राज्य की आर्थिक उन्नति के लिए कृषि तथा व्यापार को पर्याप्त प्रोत्साहन दिया। जंगली भूमि को साफ करवाकर कृषि योग्य बनवाया। उसने सिंचाई के लिए तालाब निर्मित करवाए।

➣ करिकाल के पश्चात चोल राज्य कमजोर हो गया। करिकाल के तीन पुत्रों क्रमश: नलगिल्ली, नेहमुरदुक्किलि तथा मावलत्तान के अतिरिक्त संगम साहित्य में चोल वंश के कुछ अन्य राजाओं के नाम भी प्राप्त होते हैं- कोप्परुन्जोलन, पेरुनरकिल्लि, कोचेगणान् आदि।

पेरूनरकिल्लि

➣ यह अत्यंत पराक्रमी चोल शासक था। चोल राजाओं में इसी ने राजयूस जैसे महान यज्ञ का अनुष्ठान किया।

शेनगणान

➣ इसके बारे में प्रचलित था कि पूर्व जन्म में यह मकड़ा था। इसके संपूर्ण देश में शैव मंदिरों का निर्माण करवाया।

➣ कल्लिवल्लि नामक पुस्तक के एक युद्ध में चेर राजा कणक्काल को पराजित कर बंदी बना लिया था, लेकिन चेर राजा के मित्र पौपगे ने चोल राजा की प्रंशसा कर उसे मुक्त करा दिया था।

➣ संगमयुगीन चोल शासकों ने दूसरी चौथी सदी तक शासन किया। तत्पश्चात उरैयूर के चोलवंश का इतिहास अंधकारपूर्ण हो जाता है।

➣ नौवीं शताब्दी के मध्य विजयालय के नेतृत्व में पुनः चोल सत्ता का उत्थान हुआ।

पाण्ड्य राज्य (300 ई.पू. – 12वीं शताब्दी ई)

➣ पांड्य राज्य का क्षेत्र कावेरी के दक्षिण में स्थित था जिसमें वर्तमान मदुरै तथा तिरुनेलवेली के जिले और त्रावणकोर के कुछ क्षेत्र सम्मिलित थे। वैगई/वैगी नदी पाण्ड्यों की जीवन रेखा थी।

➣ पाण्ड्याओं का पहला उल्लेख मेगस्थनीज ने किया है, उसके अनुसार यह राज्य मोतियों के लिए प्रसिद्ध था और एक महिला (हेराक्ल की पुत्री) द्वारा शासित था,

➣ जो पाण्ड्य समाज में कुछ हद तक मातृसत्तात्मक प्रभाव को दर्शाता है।

➣ पाण्ड्य राज्य का उल्लेख पाणिनी की अष्टाध्यायी में है। मेगस्थनीज ने पांड्य राज्य का उल्लेख माबर नाम से किया है।

➣ पाण्ड्यों का प्रतीक चिह्न मछली (कार्प) था। इनकी प्रारम्भिक राजधानी कोरकई (कौल्ची) थी, बाद में मदुरै (मदुरा) राजधानी बनी।

नेडियोन

➣ संगम ग्रंथों के अनुसार नेडियोन प्रथम पांड्य शासक था। नेडियोन का अर्थ लम्बा आदमी है।

➣ नेडियोन ने पहरूली नदी को अस्तित्व प्रदान किया तथा समुद्र की पूजा भी इसने प्रारंभ करवाई, परंतु इसकी ऐतिहासिकता संदिग्ध है।

पलशालइ मुदुकुडुमी

➣ इसे पांड्य वंश का प्रथम ऐतिहासिक शासक माना जाता है। पलशालै का अर्थ अनेक यज्ञशालाएं बनाने वाला है। इसने अनेक यज्ञ भी किए।

➣ पल्शालइ मुदुकुडुमी ने पलशालै तथा महेश्वर उपाधियां धारण की थी।

नेदुजेलियन

➣ नेदुजेलियन पाण्ड्य राजाओं में सबसे विख्यात था। इसका शासक काल लगभग 210.ई. था।

➣ नक्कीरर तथा मांमुडि मरुदन, जैसे प्रसिद्ध कवियों ने नेडुंजेलियन पर कविताएँ लिखीं जो ‘पत्तुपात्र’ में संकलित है। ‘मदुरैकांजी’ नामक एक रचना जो मदुरा और पांड्यों से संबंधित थी, में नेडुजेलियन को कुशल शासक बताया गया है।

तलैयालंगानम का युद्ध (290 ई.)

➣ नेडुंजेलियन इस युद्ध को जीतने के कारण बहुत प्रसिद्ध हुआ। लगभग 290 ई. हुए इस युद्ध में नेह्युजेलियन ने चोल तथा चेर शासकों एवं अन्य पांच मित्र सामंतों के गुट को पराजित किया।

➣ इसी युद्ध में उसने चेर शासक शेय (हाथी की आंख वाला) को बंदी बनाकर पांड्य राज्य के बंदीगृह में डाल दिया। इस विजय के बाद इसने तलैयालंगानम की उपाधि धारण की।

मदुरा तथा पाण्ड्य देश के संबंध में मदुरैकांची नामक रचना में नेडुजेलियन के कुशल शासन का विस्तृत विवरण प्राप्त होता है।

➣ नेडुजेलियन स्वयं एक कवि था। वह कवियों एवं विद्धानों का सरंक्षक भी था। इसके दो प्रमुख आश्रित कवि नक्कीरर और मामुंडिमरूतन थे।

➣ नेडुंजेलियन के काल में ही शिलप्पादिकारम् के नायक कोवलन को मृत्युदंड दिया गया था। कहा जाता है कि वह निर्दोष था।

➣ पाण्ड्य राजाओं को रोमन सम्राट के साथ व्यापार में लाभ होता था। डुजेलियन ने रोमन सम्राट आगस्टस के दरबार में अपना दूत भेजा था।

➣ नेडुजेलियन ने वैदिक धर्म को प्रोत्साहन दिया और बहुत से यज्ञ किये थे।

➣ इसके समय पांड्यों की राजधानी मदुरै, नेडुंजेलियन के काल में सांस्कृतिक और व्यापारिक क्रियाकलापों का केंद्र थी।

वैखिरशेलिय कौरके

➣ नेडुंजेलियन की मृत्यु के बाद इसका छोटा भाई कौरके गद्दी पर बैठा। इसकी मृत्यु भित्ति चित्रों को देखते हुए हुई थी। इसलिए इसे चित्तिरमरदत्रुतुंजियवमरन के नाम से भी जाना जाता है।

जतवर्मन सुंदरा पाण्ड्य ने पाण्ड्य साम्राज्य पर 1251-61 ई. तक शासन किया। उसे श्रीलंका के द्वीपों को जीतने की वजह से द्वितीय राम कहा गया।

➣ संगम युग का अंतिम ज्ञात पाण्ड्य शासक नल्लिवकोडन था। जिसका प्रमाण नातनार की कविता में मिलता है।

चेर वंश (300 ई.पू. – 14वीं शताब्दी ई)

➣ चेर राज्य मालाबार (केरल) क्षेत्र में था। संगम साहित्य में सर्वाधिक प्राचीन वंश चेर वंश है तथा इसका ही सबसे अधिक उल्लेख है।

➣ चेरों का प्रतीक चिह्न धनुष तथा राजधानी वांजि (करूवुर) एवं दूसरी राजधानी तोण्डी थी।

➣ तीसरे संगम के समय एत्तुतोगै (अष्ट पदावली) का चौथा संग्रह पट्रिप्पत्तु (पदिरूपत्तु) है। पदिट्रप्पत्तु में दस कविताओं का संग्रह है। इसमें आठ चेर शासकों की शौर्य गाथाओं का वर्णन मिलता है।

उदियन जेरल (130 ई.)

➣ यह प्रथम चेर शासक था। इसका काल लगभग 130 ई. माना जाता है। इनके संदर्भ में कहावत है कि इसने कुरूक्षेत्र में भाग लेने वाले सभी योद्धाओं को भोजन कराया। इसी कारण से इन्हें महाभोजन उदियनजेरल की उपाधि मिली।

➣ उदियनजेरल अधिराज की उपाधि धारण करता था जो किसी समकालीन शासक पर विजय का प्रतीक था।

➣ उदियनजेरल नियमित रूप से जनता में भोजन वितरित करवाता था। इस कार्य हेतु उसने एक बड़ी पाकशाला भी बनवाई थी।

नेदुनजेरल आदन (155 ई.)

➣ इसकी राजधानी मदुरै थी। कहा जाता है कि नेदुनजेरल आदन ने सात अभिषिक्त राजाओं को पराजित कर अधिराज की उपाधि धारण की।

➣ इसके द्वारा हिमालय तक विजय और पर्वत पर चेर राजचिन्ह अंकित करने की बात की गई है। जिसके उपकक्ष में इसने इमयवरम्बन उपाधि धारण की जिसका अर्थ होता है – हिमालय तक सीमा वाला।

नेदुन जेरल आदन के समय में पश्चिमी जगत से व्यापार महत्वपूर्ण था। लेकिन व्यापार में बांधा कदम्बु नामक जनजाति करती थी जिसका इन्होंने दमन किया।

➣ मालाबारतट पर स्थित यवन व्यापारियों को बंदी बना लिया था। बाद में हीरे-मोती एवं बहुमूल्य मणियों को लेकर उन्हें मुक्त कर दिया।

➣ इसका चोल शासक इलंजेति चिन्न से संघर्ष हुआ। संघर्ष में दोनों मारे गए और दोनों की रानियां सती हो गई।

कुट्टवन (180 ई.)

➣ नेदुंजेरल आदन के छोटे भाई कुट्टवन ने कोन्गू के युद्ध में सफलता प्राप्त करके चेर राज्य को पूर्वी तथा पश्चिमी समुद्र तक विस्तृत कर दिया।

➣ इसने अनेक सामंतों को भी हराया। इसके पास बड़ी संख्या में हाथी थे। कुट्टवन को हाथियों का स्वामी कहा जाता है (यह शेनगुट्टुवन से पहले शासक बना था।)

शेनगुट्टवन अथवा धर्मपरायण कुट्टवन (180 ई.)

➣ चेर वंश का सबसे प्रतापी शासक जिसका गुणगान कवि परणर ने भी किया है। इस शासक को लाल (भला चेर) भी कहा जाता था। यह इमयवरम्बन का पुत्र था।

➣ इसने भी अधिराज की उपाधि धारण की तथा चेर राज्य में पत्तिनी (पत्नी) पूजा प्रारंभ की जिसका उल्लेख दशगीत में मिलता है। इसे कण्णगी पूजा भी कहा गया।

शिलप्पादिकारम् के अनुसार पत्नी पूजा के प्रचलन में पांड्य तथा चोल शासकों के साथ श्रीलंका के शासक भी सहायक चेर बलिपुरम् के युद्ध में इसने 9 चोल शासकों को पराजित किया तथा कदम्बों का विनाश किया।

➣ इसके बाद ही इसने कदलपिरक्कोत्तिय अर्थात् समुद्र को पीछे हटाने वाला की उपाधि धारण की थी।

➣ इसके पास एक शक्तिशाली नौसेना थी। कहा जाता है कि लाल शेनगुटुवन ने उत्तर दिशा में चढ़ाई की और गंगा को पार किया।

गजबाहु एक तमिल कवि इलम्बोधियार के साथ शेनगुट्टवन के दरबार में आया।

➣ संगम कालीन कवि परणर ने शेनगुट्टुवन का यशोगान किया है। उसके पास जहाजी बेड़ा भी था।

पेरून्जेरल इरंपोरई (190 ई.)

➣ यह चोल शासक करिकाल का समकालीन था।

➣ इसने सामेल जिले में तगडूर (धर्मपुर) के शासक आदिगैमान नडुमानअंजी को परास्त किया। आदिग इमान को दक्षिण में गन्ने की खेती प्रारम्भ करने का श्रेय प्राप्त है।

सैईयै (लगभग 210 ई.)

➣ संगम काल का अंतिम चेर शासक सेइयै ( लगभग 210 ई.) था, जिसके समकालीन पाण्ड्य शासक नेडुजेलियन ने इसे पराजित कर चेर राज्य की स्वाधीनता का अंत कर दिया।

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