मौर्योत्तर काल में सामाजिक एवं राजनीतिक परिवर्तन

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मौर्योत्तरकालीन प्रशासन

➣ मौर्योत्तर काल में विकेन्द्रीकरण की प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखने के लिए राजतन्त्र में दैवी तत्वों को समाविष्ट करने की प्रवृत्ति अपनाई गई। गौतमीपुत्र शातकर्णी की तुलना कई देवताओं से की गई।

➣ चीनी शासकों के अनुरूप कुषाण राजाओं ने देवपुत्र जैसी उपाधियाँ धारण कीं। मूर्तिपूजा का आरंभ कुषाण काल से ही माना जाता है।

➣ सम्भवतः रोम का उदाहरण लेकर कुषाण शासकों ने मृत राजाओं की मूर्तियाँ स्थापित करने के लिए मंदिर बनवाने की प्रथा (देवकुल) भी प्रारम्भ की।

➣ कुषाणों ने राज्य शासन में क्षेत्रप-प्रणाली चलाई। शकों एवं पार्थियन ने दो आनुवंशिक राजाओं के संयुक्त शासन की परिपाटी चलाई।

➣ शक-कुषाण काल से प्रशासन में सामन्तीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई। सर्वप्रथम अश्वघोष (प्रथम शताब्दी ई.) ने बुद्धचरित में सामन्त शब्द का प्रयोग जागीरदार (अधीनस्थ शासक) के लिए किया है।

➣ सातवाहन शासकों ने ब्राह्मणों एवं बौद्ध भिक्षुओं को पहली शताब्दी ई.पू. में कर-मुक्त भूमि प्रदान करने की प्रथा प्रारंभ की।

नानाघाट अभिलेख में भूमिदान का प्रथम अभिलेखीय प्रमाण मिलता है।

➣ आरम्भ में ये दान केवल कर-मुक्त ही होते थे, किन्तु धीरे-धीरे दान की गई भूमि पर से राजाओं ने प्रशासनिक नियंत्रण हटाकर इसे दानग्रहीता को ही समर्पित करना आरम्भ कर दिया।

शकों तथा पार्थियन शासकों ने संयुक्त शासन का प्रचलन प्रारम्भ किया, जिसमें युवराज सत्ता के उपभोग में राजा के बराबरी का सहभागी होता था।

➣ प्रशासन में सामन्तीकरण की प्रक्रिया शक, कुषाण काल में ही प्रारम्भ होता दिखाई देता है।

➣ कुषाण लेखों में हम पहली बार दण्डनायक तथा महादण्डनायक जैसे पदाधिकारियों का उल्लेख पाते हैं।

➣ स्मृतिकारों ने शक, पहलव, यवनकुषाणों को निम्न कोटि के क्षत्रिय माना है तथा

मौर्योत्तरकालीन व्यापार

➣ यद्यपि मौर्योत्तर काल में विकेन्द्रीकरणसामन्तवाद को बढ़ावा मिला किन्तु आर्थिक गतिविधियों व व्यापार-वाणिज्य के विकास की दृष्टि से यह युग अत्यधिक उन्नति का था।

➣ कुषाण, सातवाहन काल में नगरीकरण अपने चरम पर था, क्योंकि रोम साम्राज्य से व्यापार उन्नत अवस्था में था। रोमन साम्राज्य से व्यापार का अधिक लाभ कुषाणों के बजाय सातवाहनों को मिला।

➣ कुषाण साम्राज्य के अधीन मध्य एशिया तक के प्रदेश थे तथा चीन को रोमन साम्राज्य से जोड़ने वाले सिल्कमार्ग पर भी कुषाणों का नियन्त्रण था, अतः भारत का मध्य एशियापाश्चात्य विश्व से घनिष्ठ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हुआ।

अवदान शतक से कनिष्क कालीन व्यापार की जानकारी मिलती है। कनिष्क ने प्रथम बार अन्तर्राष्ट्रीय साम्राज्य की स्थापना की। कुषाण शासकों को सिल्क पर नियन्त्रण से भारी आय हुई। वे इससे चुंगी लेते थे।

➣ ईसा की पहली सदी में 46 ई. में हिप्पोलस नामक ग्रीक नाविक ने अरब सागर में चलने वाली मानसूनी हवाओं की खोज की। इसने समुद्री व्यापार को अधिक आसान कर दिया।

➣ इस समय व्यापार मुख्यतः अरब सागर के तटवर्ती बंदरगाहों पर होता था। इस काल में बारबेरिकस (सिंधु के मुहाने पर), अरिकामेडु (पूर्वीतट पर), बेरीगाजा या भड़ौच (पश्चिमी तट पर) आदि महत्त्वपूर्ण चंदरगाह थे।

भड़ौच मौर्योत्तर काल का सबसे महत्त्वपूर्ण एवं उन्नतिशील बन्दरगाह था।

➣ पेरिप्लस के अनुसार पश्चिमी तट का सबसे महत्वपूर्ण बन्दरगाह बेरीगाजा (भृगुकच्छ) था।

शूर्पारक (सोपारा) सबसे प्राचीन बन्दरगाह एवं कल्याण सबसे बड़ा बन्दरगाह था। ये दोनों पश्चिमी तट पर थे।

➣ पेरिप्लस ने दक्षिणा पथ में संगम कालीन दो महत्वपूर्ण अन्तरराज्य बाजारों का उल्लेख किया है, ये हैं :- प्रतिष्ठान एवं तगर । प्रतिष्ठान (पैठन) प्रसिद्ध व्यापारिक नगर था।

➣ प्लिनी ने भारतीय बहुमूल्य रत्नों की एक लम्बी सूची दी है और भारत को बहुमूल्य रत्नों का एक बड़ा उत्पादक देश बताया है। उसने भारतीय नदियों को रत्न धारक उपाधि से विभूषित किया है।

➣ यूनानी वनस्पतिशास्त्री थ्रियोकाइटस ने अपनी पुस्तक हिस्ट्री आफ प्लान्ट्स में भारत के विविध पौधों और जड़ी-बूटियों के औषधियों के रूप में प्रयोग का विवरण है।

➣ प्लिनी व पेरिप्लस के अनुसार पाण्ड्य देश में कॉलची (कॉलकै) बन्दरगाह मोतियों के लिये प्रसिद्ध था। सीप से मोती निकालने का काम अपराधियों से लिया जाता था।.

➣ ईसा की प्रथम शताब्दी में अज्ञात यूनानी नाविक द्वारा लिखी पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी नामक पुस्तक में भारत रोम व्यापार का वर्णन है। इसमें लाल सागर से भारत तक समुद्री यात्रा का वर्णन है।

➣ पेरिप्लस का कथन है कि फारस की खाड़ी से भृगुकच्छ में दासों का व्यापार किया जाता था।

➣ रोम को निर्यातित प्रमुख वस्तुएँ-मसाले, काली मिर्च, मलमल, हाथी दाँत की वस्तुएँ, इत्र, चंदन, कछुए की खोपड़ी, केसर, जटामासी, हीरा, रत्न, तोता, शेर, चीता आदि थीं। इनके क्रय का भुगतान स्वर्ण के रूप में करते थे।

➣ रोम से आयातित वस्तुएँ- शराब के दो हत्ये वाला कलश, शराब, सोना एवं चांदी के सिक्के, पुखराज, टिन, तांबा, सीसा आदि।

➣ पश्चिम के लोगों को भारतीय काली मिर्च (गोल मिर्च) इतनी प्रिय थी कि संस्कृत में काली मिर्च का नाम ही यवनप्रिय पड़ गया।

मसाला एवं लोहे की वस्तुएँ खासकर बर्तन रोमन साम्राज्य को भेजे जाने वाली मुख्य वस्तुएँ थीं। मसाले के लिए दक्षिण भारत प्रसिद्ध था।

कश्मीर, कोशल, विदर्भ और कलिंग हीरों के लिए विख्यात थे एंव मगध वृक्षों के रेशों से बने वस्त्रों के लिए तथा बंगाल मलमल के लिए प्रसिद्ध था।

व्यापार एवं विनिमय में मुद्राओं का प्रयोग मौर्योत्तर युग की सबसे बड़ी देन है।

वाणिज्य एवं व्यवसाय

➣ इस समय तक उद्योगों का स्थानीयकरण हो चुका था। यह काल प्राचीन भारत के शिल्प एवं वाणिज्य के इतिहास में चरमोत्कर्ष का काल था।

सूती वस्त्र उद्योग सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उद्योग था। उौयूरअरिकमेडु सूती वस्त्र के प्रमुख केन्द्र थे। मोटे वस्त्र उत्पादन के लिए प्रतिष्ठान एवं तगर प्रसिद्ध थे।

➣ जातकों में 18 प्रकार के शिल्पियों का उल्लेख किया गया है। दीघनिकाय में 24, महावस्तु में 36 तथा मिलिन्दपन्हो में 75 प्रकार के व्यवसायों का उल्लेख है।

➣ जहां मौर्य काल में शिल्पी राज्य के नियन्त्रण में थे, वहीं मौर्योत्तर काल में वे स्वतन्त्र रूप से कार्य करने लगे।

➣ व्यापारिक प्रगति के कारण शिल्पकारों ने शिल्प श्रेणियों को संगठित किया। श्रेणियों के पास अपना सैन्य बल होता था।

 निगम का प्रधान श्रेष्ठि
 श्रेणी का प्रधान प्रमुख
 पूग का प्रधान ज्येष्ठक

➣ श्रेष्ठियों को उत्तर भारत में सेठ एवं दक्षिण भारत में शेट्टि या चेट्टियार कहा जाता था।

➣ स्ट्रेबो के अनुसार किसी शिल्पी की आँख व हाथ को क्षति पहुंचाने वाले को मृत्युदण्ड दिया जाता था।

➣ इसी समय के मथुरा क्षेत्र के एक लेख में इस बात का उल्लेख आया है, कि एक प्रमुख ने आटा पीसने वाले कारीगरों के पास धन जमा कराया था।

➣ मथुरा साटक (सटका) नामक एक विशेष प्रकार के वस्त्र के निर्माण का एक बड़ा केन्द्र था। इसका उल्लेख पतंजलि ने भी किया है।

➣ इस काल के शिल्पियों की कम से कम चौबीस-पच्चीस श्रेणियां प्रचलित थीं। अभिलेखों से प्राप्त अधिकतर शिल्पी मथुरा क्षेत्र में तथा पश्चिमी दक्कन में जमे थे।

➣ स्ट्रैबो के अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी हस्तशिल्पी के हाथ या आँख को क्षति पहुँचाता था, तो उसे मृत्युदण्ड दिया जाता

➣ कुषाण काल में भवन निर्माण तकनीक के विकास के प्रमाण मिले हैं, सूखी तथा पकायी हुई मिट्टी के खपड़े का प्रयोग इस काल का विशेषता है।

➣ यूनानी साक्ष्य एवं जातकों से यह प्रमाण मिलता है कि व्यवसाय सामान्यतः आनुवांशिक होता था।

➣ बौद्ध साहित्य में ऐसे अनेक सन्दर्भ है, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि ब्राह्मण एवं क्षत्रिय केवल आपात काल में ही नहीं अपितु सामान्य परिस्थितियों में भी व्यापारिक उद्यमों को अपनाते थे।

➣ मौर्योत्तर काल में विभिन्न जातियों के लिये अलग-अलग ब्याज दर थी। मनु, गौतमयाज्ञवल्क्य के अनुसार ब्राह्मण 2 प्रतिशत, क्षत्रिय 3 प्रतिशत, वैश्य 4 प्रतिशत व शूद्र 5 प्रतिशत ब्याज देते थे।

➣ मौर्योत्तर प्रशासनिक व्यवस्था में व्यापारी एवं शिल्पकारों की श्रेणियों का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान है।

मौर्योत्तरकालीन सिक्के

➣ मुद्राओं पर लेख लिखनाविनिमय में नियमित रूप से मुद्रा का प्रयोग मौर्योत्तर युग की सबसे बड़ी देन है।

 सोने का सिक्कानिष्क, स्वर्ण तथा पल
 चाँदी का सिक्काशतमान
 ताँबे का सिक्काकाकणि

➣ मौर्योत्तर काल में सर्वाधिक प्रचलित सिक्का कार्षापण था। चार धातु सोना, चाँदी, ताँबा एवं शीशे से कार्षापण नामक सिक्का बनता था।

हिंद-यवन शासकों ने सर्वप्रथम सोने के सिक्के चलाए। उनके सिक्कों पर द्विभाषिक लेख होते थे एक तरफ यूनानी भाषा, यूनानी लिपि में तथा दूसरी तरफ प्राकृत भाषा, खरोष्ठी लिपि में।

➣ कुषाणों ने सर्वप्रथम शुद्ध स्वर्ण के सिक्के चलवाए, जो 124 ग्रेन का था।

➣ सातवाहना ने सीसे के अतिरिक्त चादी. तांब्रा. पोटीन(ताबा, जिंक, सोसा तथा मिश्र धातु) आदि के सिक्के भी चलाए।

➣ कुषाण शासकों ने दीनार नामक स्वर्णमुद्रा रोमन संपर्क के फलस्वरूप चलाई। दीनार गुप्तकाल में अत्यधिक लोकप्रिय थी।

सामाजिक व्यवस्था

➣ विदेशी आक्रमणों की वजह से परम्परागत वर्ण व्यवस्था को खतरा पैदा हो गया एवं अनगिनत वर्णसंकर जातियाँ उत्पन्न हुई। मनुस्मृति में 60 वर्ण संकर जातियों का उल्लेख है।

➣ कौटिल्य ने भी अनेक वर्णसंकर जातियों का उल्लेख किया है। इनकी उत्पत्ति विभिन्न वर्णों के अनुलोम एवं प्रतिलोम विवाहों से बताई गई है।

➣ कौटिल्य ने चाण्डाल के अतिरिक्त अन्य सभी वर्णसंकर जातियों को शूद्र माना है।

मनुस्मृति में कहा गया है कि पवित्र धार्मिक संस्कारों तथा ब्राह्मणों की अवहेलना करने के कारण ही यवन, शक, पहलव आदि जातियाँ धीरे- धीरे शूद्रों की श्रेणी में गिर गई।

➣ उन्हे व्रात्य क्षत्रिय (पतित क्षत्रिय) कह कर वर्ण व्यवस्था में स्थान दिया है। भगवत पुराण में कहा गया है कि ये जातियां विष्णु पूजन से पवित्र हो जाती हैं।

पाणिनी एवं पतंजलि ने दो प्रकार के शुद्रों का उल्लेख किया है-

  1. मिरवसित – नगर के बाहर रहने वाले।
  2. अनिरवसित – नगर की सीमा में रहने वाले (यवन एवं शकों को अनिरवसित श्रेणी में रखा गया है।)

➣ मनु के अनुसार शूद्रों का कार्य तीन उच्चतर वर्णों की सेवा करना था।

मनुस्मृति ने विधवाओं के मुंडन की संस्तुति की है। मनु ने कहा यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता

➣ मनुस्मृति में आठ प्रकार के विवाहों की चर्चा मिलती है। मनु ने नियोग को पशुधर्म कहा।

➣ मनु के अनुसार जिस स्त्री को पति ने छोड़ दिया हो या जो विधवा हो गई हो यदि वह अपनी इच्छा से दूसरा विवाह करे तो वह पुनर्भू तथा उसकी सन्तान पुनर्भव कहलाती थी।

➣ ब्राह्मण पुरूष एवं वैश्य माता से उत्पन्न संतान (अनुलोम विवाह) अम्बष्ठ कहलाई एवं उसकी वृत्ति चिकित्सक की कही गई।

➣ ब्रह्मण माता एवं शुद्र पिता से उत्पन्न संतान (प्रतिलोम विवाह) चाण्डाल कहलाई एवं उसकी वृत्ति वधिक या शव दाह करना मानी गई ।

➣ नियोग से उत्पन्न पुत्र क्षेत्रज कहलाता था। अविवाहित लड़की के पुत्र को सहोदर कहा जाता था।

➣ घर में रहने वाली कन्या या दासी से उत्पन्न पुत्र को कानीन कहा जाता था।

➣ विधि अनुसार समान वर्ण में विवाह से उत्पन्न पुत्र को औरस कहा जाता था। औरस, पुत्रों की श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ पुत्र था।

महाक्षत्रप शोंडास के समय एक अन्य अभिलेख में भगवत वसुदेव के मन्दिर के प्रवेश द्वार तथा वेदिकाओं के निर्माण का उल्लेख है।

➣ हुविष्क की एक स्वर्ण मुद्रा पर एक देवता अपने हाथ में चक्र और दूसरे में ऊर्ध्वलिंग लिए चित्रित किया गया है। सम्भवतः यह समन्वित देवता हरिहर की प्रतिमा का पूर्व रूप है।

➣ प्रारम्भिक स्मृतिकारों के अनुसार ब्राह्मण को शूद्र द्वारा दिया गया व स्पर्श किया गया अन्न किसी भी स्थिति में ग्रहण नहीं करना चाहिये।

➣ मौर्योत्तर काल में अधिकतर शिल्पी शूद्र वर्ण में ही आते थे, किन्तु उनके धन एवं प्रतिष्ठा में अब वृद्धि हो गई। इस प्रकार वैश्य एवं शूद्रों के बीच अन्तर कम हो गया।

➣ मौर्योत्तर काल में सती प्रथा नहीं थी एवं बाल विवाह होता था।

मौर्योत्तरकालीन कला

➣ इस काल में कला का आधार मुख्यतः बौद्ध धर्म ही रहा। इस काल में कला को प्रेरणा बौद्ध धर्म एवं यूनानी प्रभाव से मिली।

हिन्द-यूनानी शासकों ने भारत के पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त में यूनान की प्राचीन कला चलाई जिसे हेलेनिस्टिक आर्ट कहते हैं। भारत में गान्धार कला इसका उत्तम उदाहरण है।

➣ कनिष्क के शासन काल में कला के क्षेत्र में दो स्वतन्त्र शैलियों का विकास हुआ- (1) गन्धार कला, (2) मथुरा कला

➣ मथुरा कला शैली आदर्शवादीगान्धार शैली यथार्थवादी है। गान्धार व मथुरा शैली में अन्तर यह है कि गान्धार कला में शरीर रचना संबंधी विवरणों तथा शारीरिक सौंदर्य पर बल दिया गया है, जबकि मथुरा में मूर्ति को पवित्र आध्यात्मिक भावना देने का प्रयत्न किया गया है।

गांधार कला/नग्न कला

➣ ई.पृ. प्रथम शताब्दी के मध्य उत्तर-पश्चिम में गांधार में कला की एक शैली का विकास हुआ, जिसे गांधार शैली कहते हैं।

➣ इस शैली को इण्डो-ग्रीक शैली या ग्रीक बुद्धिष्ट शैली भी कहा जाता है। इसका सर्वाधिक विकास कुषाण काल में हुआ।

➣ गांधार शैली में काले रंग के स्लेटी पत्थर का प्रयोग हुआ है, जबकि मथुरा शैली में लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग हुआ है।

➣ गांधार कला के अंतर्गत मूर्तियों के शरीर की आकृति को सर्वथा यथार्थ दिखाने का प्रयत्न किया गया है। इस कला की विषय-वस्तु बौद्ध परंपरा से ली गई है, किंतु निर्माण का ढंग यूनानी था।

➣ गांधार मूर्तिकला शैली में बुद्ध की मूर्तियाँ यूनानी देवता अपोलो के समान बनाई गई है।

➣ गांधार कला शैली की उत्पत्ति का स्रोत एशिया माइनर तथा हेलेनिस्टिक कला थी।

➣ गांधार कला के अंतर्गत बुद्ध की धर्मचक्रमुद्रा, ध्यानमुद्रा, अभयमुद्रा और वरदमुद्रा आदि मूर्तियों का निर्माण किया गया।

➣ गन्धार कला के अन्तर्गत बुद्ध तथा बोधिसत्वों की बहुसंख्यक मूर्तियों का निर्माण हुआ। बोधिसत्व मूर्तियों में सबसे अधिक मैत्रेय की हैं।

मथुरा कला

➣ जैन धर्म के अनुयायियों ने मथुरा में मूर्तिकला की एक शैली को प्रश्रय दिया; जहाँ शिल्पियों ने महावीर की एक मूर्ति बनाई ।

➣ यह कला शैली, जो मथुरा शैली के नाम से प्रसिद्ध हुई, ई.पू. पहली शताब्दी के अन्त में आरम्भ हुई। कालान्तर कुषाण शासकों का प्रश्रय पाकर यह फली फूली ।

➣ मथुरा शैली की मूर्तियों में आध्यात्मिकता एवं भावुकता की प्रधानता थी। इस शैली में मुख्यत: लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग किया जाता था।

➣ भारतीय कला में गढ़ी हुई बुद्ध की सबसे प्राचीन मूर्ति मथुरा में ही मिली थी।

➣ मथुरा कला का भरहुत और साँची की कलाओं के साथ निकट का सम्बन्ध है। यह कला (मथुरा कला) विशुद्ध भारतीय कला है।

➣ ब्राह्मण धर्म से सम्बन्धित देवी देवताओं की मूर्तियों का प्रथम निर्माण मथुरा । शैली में हुआ। इसमें नग्नता का अभाव है। इस कला में बुद्ध के पीछे प्रभामण्डल है।

बुद्ध के जन्म, अभिषेक, महाभिनिष्क्रमण, सम्बोधि, धर्मचक्रप्रवर्तन, महापरिनिर्वाण आदि जीवन की विविध घटनाओं का कुशलतापूर्वक अंकन मथुरा कला के शिल्पियों द्वारा किया गया।

➣ मथुरा शैली हिन्दू, बौद्ध एवं जैन धर्म से सम्बन्धित शैली है। इस शैली का सर्वाधिक विकास गुप्तकाल में हुआ।

गांधार कलामथुरा कला
गहरे नीले एवं काले पत्थर का प्रयोग लाल पत्थर का प्रयोग
संरक्षक शक एवं कुषाणसरक्षक-कुषाण
यथार्थवादीआदर्शवादी
मुख्यत: बौद्ध की मूर्तियाँबौद्ध, जैन तथा ब्राह्मण धर्म से संबंधित मूर्तियाँ

मथुरा संग्रहालय में कुषाण कालीन मूर्तियों का भारत में सबसे बड़ा संग्रह है।

मौर्योत्तरकालीन धर्म

भक्ति का विकास इस काल के धर्म की प्रमुख विशेषता है, बाद में भक्ति के साथ अवतारवाद की परिकल्पना भी जुड़ गई, हांलाकि इसका पूर्ण विकास गुप्तकाल में हुआ था।

➣ वैदिक देवताओं के स्थान पर नवीन देव वर्ग का उदय हुआ, जिनमें ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश की त्रिमूर्ति बहुत विख्यात है।

➣ आर्य देवताओं के समानांतर गैर-आर्य देवता भी स्थापित हो गए, जैसे –गणेश, कार्तिकेय, मातृदेवी, वृक्ष पूजा, पशु पूजा, सर्प पूजा आदि।

➣ द्वितीय शताब्दी ई.पू. के घोसुण्डी वेदिका लेख में वासुदेव-संकर्षण की मूर्ति की पूजा का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

➣ मौर्योत्तर काल में बौद्ध धर्म और उसकी महायान शाखा का सर्वाधिक प्रचार-प्रसार हुआ।

➣ बौद्ध धर्म में मूर्ति पूजा आरंभ हुई एवं इसका प्रचलन ब्राह्मण, समुदाय में भी हुआ। संभवतः भारत में सबसे पहले बुद्ध की मूर्तियों की पूजा की गई।

➣ विदेशी शासकों ने बौद्ध धर्म को प्रश्रय दिया। मिनांडर वह प्रथम यवन शासक था, जिसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर ली। मीनाण्डर ने बौद्ध भिक्षु नागसेन से बौद्ध धर्म की दीक्षा ली।

➣ शक क्षत्रप षोडास के मोराकूप लेख में पंचवीरों की प्रतिमा व उनके मंदिर का उल्लेख हुआ है। शक क्षत्रप षोडास के अभिलेख में वासुदेव मन्दिर के प्रवेश द्वार के निर्माण का उल्लेख है।

➣ कई विदेशी शासक विष्णु के उपासक बन गए। हेलियोडोरस का बेसनगर (विदिशा) अभिलेखमोरा कूप अभिलेख भागवत धर्म की प्रसिद्धि को सिद्ध करते हैं।

➣ कुषाणों के विरुद्ध अपनी विजय के उपलक्ष्य में भारशिव नागों ने वाराणसी में दस अश्वमेध यज्ञ किये। इसी से वह स्थान आज भी दशाश्वमेध यज्ञ के नाम से विख्यात है।

मौर्योत्तरकालीन साहित्य

➣ सबसे प्रसिद्ध स्मृति मनुस्मृति ई. पू. दूसरी सदी में लिखी गई।

अश्वघोष रचित सौंदरानंद, बुद्ध के सौतेले भाई आनंद्र के बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के प्रसंग पर आधारित है।

अश्वघोष के नाटकों के कुछ भाग मध्य एशिया के एक विहार से प्राप्त हुए हैं।

➣ रुद्रदामन का गिरनार अभिलेख संस्कृत काव्य का अनापत उदाहरण है।

➣ कुषाण साम्राज्य के सुई विहार के अभिलेख में भी संस्कृत का प्रयोग हुआ है।

 रचनाएँ चनाकार
 गाथासप्तशतीहाल
 कामसूत्रवात्स्यायन
 महाभाष्यपतंजलि
 सौंदरानंद, बुद्धचरित अश्वघाप
 चरक संहिताचरक
 नाट्यशास्त्रभरत मुनि
 स्वप्नवासवदत्ताभास
 चारुदत्ताभास
 मिलिंदपन्हानागसन
 उरुभगभास

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