भारत का नाम इंडिया कैसे पड़ा
➣ इण्डिया शब्द इण्डस से निकला है, जिसे संस्कृत में सिन्धु कहा जाता है।
➣ भारतवर्ष नाम सर्वप्रथम पाणिनी की अष्टाध्यायी में आया है।
➣ भारत देश का यह नामकरण ऋग्वैदिक काल के प्रमुख जन भरत के नाम पर किया गया।
➣ वैदिक काल में उत्तरी भारत को आर्यावर्त कहा जाता था। और दक्षिण भारत को दक्षिणापथ कहा जाता था।
➣ जैन कथाओं के अनुसार देश का यह नाम प्रथम जैन तीर्थकर ऋषभदेव के बड़े पुत्र का नाम भारत था जो प्रतापी व शक्तिशाली राजा थे।
➣ पौराणिक कथाओं के अनुसार पौरूव वंश के राजा दुष्यन्त एवं शकुन्तला के पुत्र भरत के नाम पर दिया गया था। ब्राह्मण ग्रंथों में इस देश को भारतवर्ष कहा गया है।
➣ विष्णुपुराण में समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण में जो देश स्थित हैं। उसका नाम भारत है क्योंकि यहां भारती संतति (भारत की प्रजाति) निवास करती है। भागवत पुराण में इस देश को अजनाभवर्ष की संज्ञा दी गयी थी।
➣ भारत को जम्बूद्वीप का एक भाग भी माना जाता है। बौद्ध ग्रन्थों में जम्बूद्वीप उस भू-भाग को कहा गया है, जहां ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में मौर्य वंश का शासन था।
➣ यूनानियों ने भारतवर्ष के लिए इण्डिया शब्द का प्रयोग किया जबकि मध्यकालीन लेखकों ने इस देश को हिन्द अथवा हिन्दुस्तान नाम से सम्बोधित किया। यह शब्द भी फारसी शब्द हिंदू (Hindu) से बना है।
➣ यूनानी भाषा के इंदे के आधार पर अंग्रेज इसे इंडिया कहने लगे। देश का र्वतमान नाम भारत भी प्राचीन काल से प्रचलित रहा है। इसका अर्थ भरतों का देश है। भरत एक प्राचीन कबीले का नाम था।
भारतवर्ष का सर्वप्रथम उल्लेख हाथी गुम्फा अभिलेख में मिलता है।
➣ हिंदुस्तान शब्द उल्लेख सर्वप्रथम 262 ई. के सासानी अभिलेख में मिलता है।
➣ भारत के संविधान अनुच्छेद-1 में (भारत अर्थात् इंडिया राज्यों का संघ होगा-India, that is Bharat shall be a Union of State) स्पष्ट किया गया है।
इतिहास के जन्मदाता कौन हैं
➣ हेरोडोटस (Herodotus), यूनान का प्रथम इतिहासकार व भूगोलवेत्ता था। हेरोडोटस का संस्कृत नाम हरिदत्त था।
➣ हेरोडोटस हिस्ट्री (History) शब्द के प्रथम प्रयोगकर्ता थे। इन्होंने वास्तविक इतिहास लेखन की नींव रखी थी।
➣ रोमन दार्शनिक सिसरो ने हेरोडोटस को इतिहास का जनक/पिता (Father of History) की संज्ञा दी थी।
➣ इन्हो ने अपने इतिहास का विषय पेलोपोनेसियन युद्ध को बनाया था। इनकी हेरोडोटस प्रसिद्ध पुस्तक हिस्टोरिका (Historica) थी।
प्रागैतिहासिक पुरातत्व के जनक
➣ भारत में पुरापाषाण काल से संबंधित पुरातात्विक खोज को शुरू करने का श्रेय रॉबर्ट ब्रूस फूट को दिया जाता है।
➣ भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के रॉबर्ट ब्रूस फूट ने वर्तमान तमिलनाडु राज्य के चिंगलपुट जिला के पल्लवरम (चेन्नई/मद्रास के निकट) नामक पुरास्थल से 30 मई, 1863 ई. को लैटेराइट मिट्टी के जमाव से हस्त कुठार खोज निकाला था।
रॉबर्ट ब्रूस फूट को भारत में प्रागैतिहासिक पुरातत्व का जनक कहा जाता है।
भारतीय पुरातत्व के जनक
➣ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ब्रिटिश पुरातत्वशास्त्री विलियम जोन्स द्वारा 15 जनवरी, 1784 को स्थापित एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल (कोलकाता) का उत्तराधिकारी थे।
➣ 1788 में इनका पत्र द एशियाटिक रिसर्चेज प्रकाशित होना आरंभ हुआ था और 1814 में यह प्रथम संग्रहालय बंगाल में बना।
➣ ASI अपने वर्तमान रूप में 1861 में ब्रिटिश शासन के अधीन सर अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा तत्कालीन वायसराय चार्ल्स जॉन कैनिंग की सहायता से स्थापित हुआ था।
➣ पुरातत्व के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए सर अलेक्जेंडर कनिंघम कनिंघम को भारतीय पुरातत्व का जनक (Father of Indian Archaeology) कहा जाता है।
➣ 1944 में, जब मॉर्टिमर व्हीलर महानिदेशक बने, तब इस विभाग का मुख्यालय, रेलवे बोर्ड भवन शिमला में स्थित था।
➣ यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है।
C-14 निर्धारण विधि क्या है
➣ सभी सजीव वस्तुओं में एक प्रकार का रेडियोधर्मी कार्बन होता है, जिसे कार्बन-14 कहते हैं।
➣ कार्बन डेटिंग प्रणाली का विकास बिलार्ड फ्रैंक लिब्बी द्वारा 1940 ई. में किया गया था। इनको 1960 ई. में इस खोज के लिए नोबल पुरस्कार प्रदान किया था।
➣ जीवित अवस्था में मनुष्य, पशु-पक्षी व पौधे वायुमंडल से कार्बन-14 लेते हैं और उतनी ही मात्रा में रेडियोधर्मिता के कारण उसमें ह्रास होता रहता है।
➣ मृत होने पर वे नया कार्बन नहीं लेते परंतु उसे एक निश्चित दर से ह्रास होते रहते हैं।
➣ किसी वस्तु में निहित कार्बन-14 (C14) की मात्रा को ज्ञात करने की प्रक्रिया को रेडियो कार्बन-14 निर्धारण विधि या कार्बन डेटिंग कहते हैं।
➣ जब कोई वस्तु जीवित रहती है तो कार्बन ग्रहण करती है। कार्बन के समस्थानिको में कार्बन-12 रेडियोधर्मी नहीं होता है जबकि कार्बन-14 रेडियोधर्मी होता है।
➣ जीवित पेड़-पौधों व जन्तुओं में C12 व C14 दोनों समान अनुपात में पाये जाते हैं। जब पेड़-पौधे व जीव-जन्तु मर जाते हैं तब C12 की मात्रा यथावत स्थिर रहती है| लेकिन C14 की मात्रा क्रमशः कम होने लगती है।
➣ जब वस्तु निष्प्राण हो जाती है तब इसमें विद्यमान C में आई कमी को माप कर उसके समय का निर्धारण किया जा सकता है। यह इसलिए सम्भव है क्योंकि C14 का आधा जीवन 5568 वर्षों का होता है।
➣ इस प्रकार वस्तु का भार 5568 वर्षों पहले निष्प्राण हो गई तो उसकी C. धारिता उस समय की तुलना में आधी रह जायेगी जब तक जीवित थी। जिस वस्तु में C14 की मात्रा जितनी ही कम पायी जाती है। वह उतनी ही प्राचीन मानी जाती है।
➣ कार्बन डेटिंग से 50 हजार वर्ष तक के जीवाश्मों की आयु आसानी से ज्ञात की जा सकती है। इससे पुरानी वस्तुओं की आयु ज्ञात करने के लिए यूरेनियम डेटिंग का प्रयोग होता है।
नटराज की कांस्य प्रतिमा
➣ चोलवंश के अधिकांश शासक उत्साही शैव थे, अतः इस काल में शैव मूर्तियों का निर्माण ही अधिक हुआ। पाषाण मूर्तियों से भी अधिक धातु (कांस्य) मूर्तियों का निर्माण हुआ।
➣ सर्वाधिक सुंदर मूर्तियां नटराज (शिव) की है जो बहुत बड़ी संख्या में मिली है। ये मूर्तियां प्रायः चतुर्भुज है। जो कि चोल कला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं।
➣ त्रिचनापल्ली के तिरुभरंगकुलम से नटराज की एक विशाल कांस्य प्रतिमा मिली है जो इस समय दिल्ली संग्रहालय में हैं। इसी जिले के तिरुवलनकडु से शिव के अर्द्धनारीश्वर रूप की एक मूर्ति मिलती तांबे की बनी नटराज (शिव) की प्रतिमा है जो मद्रास संग्रहालय में सुरक्षित है।
➣ इसमें नारी तथा पुरुष की शारीरिक विशेषताओं को उभारने में कलाकार को विशेष सफलता मिली है।
➣ इसके अतिरिक्त ब्रह्म, विष्णु, लक्ष्मी, भूदेवी, राम-सीता, कालियानाग पर नृत्य करते हुए बालक कृष्ण तथा कुछ शैव संतों की मूर्तियां भी प्राप्त होती हैं जो कलात्मक दृष्टि से भव्य एवं सुंदर है।
बौद्ध स्तूप क्या है
➣ महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनकी अस्थियों को 8 भागों में बांटा गया तथा उन पर समाधियों का निर्माण किया गया। इन्हे ही बौद्ध स्तूप कहा जाता है।
➣ स्तूप के निर्माण की प्रथा बुद्ध काल के पूर्व की है। स्तूप का शाब्दिक अर्थ किसी वस्तु का ढेर होता है। चूकि यह चिता के स्थान पर बनाया जाता था, अतः इसका एक नाम चैत्य भी हो गया।
➣ स्तूप का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद में प्राप्त होता है जहां अग्नि की उठती हुई ज्वालाओं को स्तूप कहा गया हैं।
➣ बुद्ध के पहले ही स्तूप का सम्बन्ध महापुरूष के साथ जुड़ गया था। मौलिक रूप में स्तूप का संबंध मृतक संस्कार से था।
➣ शव-दाह के बाद बची हुई अस्थियों को किसी पात्र में रखकर मिट्टी से ढ़क देने की प्रथा से स्तूप का जन्म हुआ। कालांतर में बौद्धों ने इसे अपनी संघ-पद्धति में अपना लिया।
➣ इन स्तूपों में बुद्ध अथवा उनके प्रमुख शिष्यों की धातु रखी जाती थी। अत: वे बौद्धों की श्रद्धा व उपासना के प्रमुख केंद्र बन गये।
4 प्रकार के स्तूप
1. शारीरिक इनमें बुद्ध तथा उनके प्रमुख शिष्यों की अस्थियों तथा उनके शरीर के विविध अंग (दंत, नख, केश) रखे जाते थे। 2. पारिभौगिक इनमें बुद्ध द्वारा उपयोग में लाई गयी वस्तुयें (भिक्षा पात्र, चरण-पादुका, आसन) रखी जाती थी। 3. उद्देशिक इनमें वे स्तूप आते थे जिन्हें महात्मा बुद्ध के जीवन की घटनाओं से संबंधित अथवा उनकी यात्रा से पवित्र हुए स्थानों पर स्मृति रूप में निर्मित किया जाता था। ऐसे स्थल बोधगया, लुम्बिनी, सारनाथ, कुशीनगर में है। 4. संकल्पित ये छोटे आकार के होते थे और इन्हें बौद्ध तीर्थ स्थलों पर श्रद्धालुओं द्वारा स्थापित किया जाता था। बौद्ध धर्म में इसे पुण्य का काम बताया गया है।सांची का स्तूप
➣ मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के समीप सांची बौद्ध स्तूपों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहां पहाड़ी पर मौर्य शासक अशोक ने विशाल स्तूप का निर्माण करवाया था।
➣ यह ईंटों का बना था जिसके चारों ओर लकड़ी की बाड़ लगी थी। सांची के दीर्घकाल तक बौद्धधर्म से संबंधित रहने के कारण इसका नाम चेतिया (चैत्यगिरि) प्रसिद्ध हुआ।
➣ अशोक द्वारा निर्मित महास्तूप शुंगकाल में पाषाण पट्टिकाओं से जड़ा गया। लकड़ी के स्थान पर पाषाण वेदिका बनाई गयी तथा चारो दिशाओं में 4 तोरण (Gateways) लगा दिये गये।
➣ बुद्ध के जीवन की घटनाओं व जातक कथाओं के चित्रों से भरे है और नीचे से ऊपर तक अलंकृत हैं इन पर सिंह, हाथी, धर्मचक्र, यज्ञ, त्रिरत्ल के चित्र खुदे हुए है।
➣ वेदिकाओं पर अंकित लेखों में दानकर्ताओं के नाम सुरक्षित है जिन्होंने स्मारकों के निर्माण में योगदान किया। इनमें शासक, भिक्षु, सामान्य जन सभी है।
➣ मुख्य स्तूप के दक्षिणी द्वार पर उत्कीर्ण लेख में सातवाहन शासक शातकर्णी का नाम है।
गोमतेश्वर की मूर्ति
➣ कर्नाटक के हासन जिला के श्रवणबेलगोला में बिना किसी सहारे खड़ी पत्थर से निर्मित विश्व की ऊंची प्रतिमा स्थापित की गई है, जिसका निर्माण चामुंडराय (गंगसेनापति) ने करवाया था। गंग नरेश राजमल्ल IV के दरबार में मंत्री था।
➣ चंद्रगुप्त मौर्य (मौर्य वंश संस्थापक) को भ्रदबाहु (जैनगुरू) द्वारा सन्यास लेने के बाद शेष दिन यहा व्यतीत किये थे। गोमतेश्वर या बाहुबली जैन धर्म के प्रथम उपदेशक ऋषभदेव के पुत्र थे।
➣ गोमतेश्वर प्रतिमा (विध्यगिरि पर्वत) 17.5 मीटर ऊंची है यह एक बड़ी चट्टान को काटकर बनायी गई है।
➣ यह मूर्ति विजयनगर के शासकों भैरासा सामंतों द्वारा 1432 ई. में स्थापित की गई थी।
➣ प्रत्येक 12 वर्ष बाद इस मूर्ति को विधि-विधान से दूध-दही व घी से स्नान कराया जाता है। इस प्रक्रिया को महामस्तकाभिषेक कहते हैं।
दास-प्रथा क्या थी
➣ भारत में दास-प्रथा की प्राचीनतम उल्लेख त्रग्वैदिक ग्रन्थ से प्राप्त होता है। उत्तर वैदिक साहित्य से भी दासों के विषय में वृहत जानकारी मिलती है।
➣ ऐतरेय ब्राह्मण एक ऐसे राजा का उल्लेख करता है जिसने अपने अभिषेक के समय दस हजार दासियों को उपहार स्वरुप पुरोहित को दिया था।
➣ हालाँकि मौर्य काल तथा गुप्तकाल, दोनों में दास प्रथा के प्रमाण मिले हैं।
➣ मौर्यकालीन शासक अशोक के अभिलेखों में भी दासों का उल्लेख मिलता है।
➣ अर्थशास्त्र में 5 प्रकार के दासों का उल्लेख है- उदरदास,आत्मविक्रयी , आत्माधाता, दण्डप्रणीतदाम , ध्वजाह्रत।
➣ मनुस्मृति में 7 प्रकार के दासों का उल्लेख किया गया है- ध्वजाह्रत , भक्तदास, गृहज, क्रीत, दत्त्रिम , पैत्रिक , दण्ड दास।
➣ नारद स्मृति में 15 प्रकार के दासों का उल्लेख किया गया है। दास मुक्ति के अनुष्ठान का विधान सर्वप्रथम नारद ने ही किया है।
➣ विज्ञानेश्वर ने मिताक्षरा में पन्द्रह प्रकार के दासों का उल्लेख मिलता है।
➣ भारत में ब्रिटिश शासन के समय 1843 ई. में इस प्रथा को बन्द करने के लिए एक अधिनियम पारित कर दिया गया था।
➣ चौथी शताब्दी ई. पू. भारत के विषय में मेगस्थनीज ने लिखा था कि भारतवर्ष में दास प्रथा नहीं है।
➣ अशोक के अभिलेखों में दासों तथा सेवकों के प्रति उचित व्यवहार किये जाने का आदेश मिलता है। सम्भवत: प्राचीन भारत दासों की स्थिति प्राचीन रोम तथा यूनान के दासों की अपेक्षा बहुत अच्छी थी।
सती प्रथा क्या थी
➣ अथर्ववेद से सती प्रथा की औपचारिकता पूरी करने के लिए पत्नी अपने पति के साथ चिता पर लेटती थी। जहाँ से उसके सम्बन्धी उसके उठने का आग्रह करते थे।
➣ वैदिक समाज में सती प्रथा प्रचलित नहीं थी।
➣ रामायण के मूल अंश में इसका उल्लेख नहीं मिलता , दशरथ तथा रावण की मृत्यु के पश्चात् उनकी पत्नियॉं के सती होने का उल्लेख नहीं मिलता। किन्तु उत्तरकाण्ड में वेदयंती की माता के सती होने का उल्लेख है।
➣ ब्राह्मण साहित्य , बौद्ध साहित्य एंव गृह सूत्रों से भी इसका उल्लेख नहीं मिलता।
➣ महाभारत में इस प्रथा का विस्तृत उल्लेख नहीं मिलता है, पाण्डु की मुत्यु बाद उनकी पत्नी माद्री सती हो गयी थी जबकि अभिमन्यु, घटोत्कच तथा द्रोण की पत्नियाँ सती नहीं हुई थीं।
➣ कौटिल्य के अर्थशास्त्र (मौर्यकाल) में सती प्रथा का कोई प्रमाण नहीं मिलता है किन्तु यूनानी लेखकों ने उत्तर-पश्चिम में सैनिकों की स्त्रियों के सती होने का उल्लेख किया है।
➣ दूसरी शताब्दी ई. के लगभग चेर शासक नेदुनजेरल आदन का चोल शासक पत्तिनी से युद्ध हुआ। जिसमे दोनों मारे गये फलस्वरूप दोनों की पत्नियां सती हो गयीं।
➣ पुराणों में सती होने का उल्लेख मिलता हैं। वात्स्यायन , भास् , कालिदास एंव शूद्रक जैसे विद्वानों ने इसका उल्लेख किया है।
➣ सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय प्रमाण गुप्तकाल में मिलता है। 510 ई. के ऐरण अभिलेख से पता चलता है कि, गुप्त नरेश भानुगुप्त का मित्र गोप राज (सैनिक) हूणों के विरुद्ध वीरगति को प्राप्त हुआ तत्प्श्चात उसके पत्नी के सती होने का उल्लेख है।
➣ गुप्त साम्राज्य के पश्चात पुष्यभूति वंश में हर्षवर्द्धन ने अपनी बहन राज्यश्री को अपने मित्र की सहायता से सती होने से बचा लिया था।
➣ इस प्रथा का अपने-अपने समय में कश्मीर के शासक सिकन्दर, पुर्तगाली गवर्नर अल्बुकर्क, मुगल सम्राट अकबर, पेशवाओं , लॉर्ड कार्नवालिस, लॉर्ड हैस्टिंग्स और लॉर्ड विलियम बैंटिक द्वारा विरोध किया गया।
➣ 1829 ई. में भारत के गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक द्वारा सती प्रथा को प्रतिबन्धित करने के लिये लाये गये कानून को लागू करवाने में राजा राम मोहन राय ने सरकार की मदद की थी। अंततः सती प्रथा को अवैध घोषित किया गया।
तक्षशिला विश्वविद्यालय का इतिहास
➣ तक्षशिला गांधार साम्राज्य की राजधानी थी। यह नगर सिंधु और झेलम (Hydaspes) नदियों के बीच स्थित था। वर्तमान में यह पाकिस्तान के रावलपिण्डी से 18 मील उत्तर की ओर स्थित है।
➣ अध्ययन का एक प्रमुख केंद्र, तक्षशिला विश्वविद्यालय विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय था, जिसकी स्थापना 700 ई.पू. में की गयी थी।
➣ यह समय नालन्दा विश्वविद्यालय से लगभग 1200 वर्ष पहले था।
➣ इस विश्वविद्यालय में पूरे विश्व के 10,500 से अधिक छात्र अध्ययन करते थे। इस में राजा और रंक सभी विद्यार्थियों के साथ समान व्यवहार होता था।
➣ यहां आयुर्वेद, भाषा, व्याकरण, दर्शनशास्त्र, चिकित्सा, शल्य चिकित्सा, कृषि, भूविज्ञान, ज्योतिष, खगोलशास्त्र, समाजशास्त्र, धर्म, तंत्रशास्त्र, मनोविज्ञान तथा योगविद्या आदि 60 से भी अधिक विषयों को पढ़ाया जाता था।
➣ तक्षशिला में भारत के किसी भी हिस्से आए छात्रों का नामांकन होता था और उनको निःशुल्क शिक्षा दी जाती थी। यहां सिर्फ चांडालों को पढ़ने की अनुमति नहीं थी। नागार्जुन, पाणिनी, चाणक्य, प्रसेनजित आदि यहां शिक्षा ग्रहण कर चुके हैं। चाणक्य ने यहां अध्यापन का भी कार्य किया।
➣ 500 ई.पू. में हूण शासक तोरमान ने यहां आक्रमण किया और विश्वविद्यालय परिसर को ध्वस्त कर दिया था। उधर सिकंदर ने तक्षशिला से कई विद्वानों को लेकर यूनान गया।
धर्मचक्रप्रवर्तन क्या है
➣ ज्ञान प्राप्ति के पश्चात भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ, उत्तर प्रदेश में दिया, जिसे धर्मचक्रप्रवर्तन कहा जाता है।
➣ इस उपदेश में उन्होंने चार आर्यसत्य की व्याख्या की, जो हैं- 1. दु:ख, 2. समुदय या तृष्णा (दु:ख का कारण), 3. दु:ख का निरोध, 4. इसका मार्ग (प्रतिपदा)।
➣ बुद्ध के अनुसार, दु:ख के कारण के निरोध का मार्ग ‘मध्यमा प्रतिपदा’ है, जिससे मनुष्य भोग और तप की सीमाओं को छोड़कर रुचि का मार्ग अपनाता है। यह मार्ग आर्य आष्टांगिक मार्ग कहलाता है।
➣ ये आठ मार्ग हैं- सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वचन, सम्यक आजीव, सम्यक कर्म, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि।
➣ इसे एक चक्र में आठ तीलियों के रूप में दर्शाया जाता है और इसे धर्मचक्र का नाम दिया जाता है।
मेगस्थनीज की इण्डिका
➣ मेगस्थनीज, सेल्यूकस का राजदूत था जो चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में 304 ई.पू. से 299 ई. पू. के बीच रहा।
➣ मैगस्थनीज़ ने ‘इण्डिका’ में भारतीय जीवन, परम्पराओं, रीति-रिवाजों का वर्णन किया है। उसके ग्रंथ इण्डिका से चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रशासन की विश्वसनीय जानकारी प्राप्त होती है। हालाँकि यह ग्रंथ अपने मूल रूप में उपलब्ध नहीं है।
यह भारत आने वाला प्रथम राजदूत था।
➣ इण्डिका ग्रीक भाषा में है इसे मौर्य समाज का दर्पण कहा जाता है।
➣ मेगस्थनीज ने चन्द्रगुप्त का नाम सैन्ड्रोकाट्स के रूप में उद्धृत किया है। इसके अनुसार शासक के चारों ओर सशस्त्र महिलाएं अंगरक्षक के रूप में रहती थी।
➣ चन्द्रगुप्त की राजधानी पोलिब्रोधा (पाटलिपुत्र) का विस्तृत वर्णन किया उसके अनुसार पाटलिपुत्र गंगा व सोन नदियों के संगम पर स्थित था तथा पूर्वी भारत का सबसे बड़ा नगर था।
➣ मेगस्थनीज ने उत्तरापथ का वर्णन किया है। यह सड़क सिन्ध को बंगाल के सोनारगाँव से जोड़ती थी। इस सड़क का निर्माण चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा करवाया गया था।
➣ मेगस्थनीज के अनुसार भारत में दास प्रथा विद्यमान नहीं थी, जबकि कौटिल्य ने 9 प्रकार के दासों का वर्णन किया है।
➣ मेगस्थनीज ने लिखा है कि भारत में अकाल नहीं पड़ते थे, जबकि चन्द्रगुप्त मौर्य के समय अकाल पड़ने का वर्णन मिलता है।
➣ अकाल के समय राज्य द्वारा अनाज वितरण (राशनिंग प्रणाली) का वर्णन है।
मेगस्थनीज के अनुसार भारत में लेखन कला का अभाव था।
➣ उसने सिलास नामक एक ऐसी नदी का उल्लेख किया है, जिसमें कुछ भी तैर नहीं सकता था।
➣ मैगस्थनीज़ ने भारत से प्राप्त होने वाली खनिज सम्पदा में सोना, चांदी, ताँबा एवं टिन की प्रशंसा की है।
➣ मैगस्थनीज़ के अनुसार भारत में चीटियां सोने का संग्रह करती थीं।
प्राकृत भाषा क्या है
➣ प्राकृत भाषा भारतीय आर्यभाषा का एक प्राचीन रूप है। इसके प्रयोग का समय 500 ई.पू. से 1000 ई. सन् तक माना जाता है। धार्मिक कारणों से जब संस्कृत का महत्व कम होने लगा तो प्राकृत भाषा अधिक व्यवहार में आने लगी।
➣ इसके चार रूप विशेषत: उल्लेखनीय हैं- अर्द्धमागधी प्राकृत, पैशाची प्राकृत, महाराष्ट्री प्राकृत और शौरसेनी प्राकृत।
➣ यह जैन आगमों की भाषा मानी जाती है। भगवान महावीर ने भी इसी प्राकृत भाषा के अर्धमागधी रूप में अपना उपदेश दिया था। यह शिलालेखों की भी भाषा रही है।
➣ हाथीगुंफा शिलालेख, नासिक शिलालेख, अशोक के शिलालेख प्राकृत भाषा में ही हैं।
➣ अर्धमागधी प्राकृत में जैन और बौद्ध साहित्य अधिक हैं।
पालि भाषा क्या है
➣ एक प्रकार से पालि प्राचीन हिन्दी है।
➣ पालि प्राचीन उत्तर भारत के लोगों की भाषा थी जो पूर्व में बिहार से पश्चिम में हरियाणा-राजस्थान तक और उत्तर में नेपाल-उत्तर प्रदेश से दक्षिण में मध्य प्रदेश तक बोली जाती थी।
➣ भगवान बुद्ध भी इन्हीं प्रदेशों में लोगों को धर्म समझाते रहे। यह हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार की एक बोली है। पालि ब्राह्मी परिवार की लिपियों में लिखी जाती थी।
➣ भगवान बुद्ध के उपदेशों का संग्रह पालि भाषा में ही है। इसी भाषा में त्रिपिटक आदि बौद्ध धर्मग्रंथों की रचना हुई।
➣ मिलिंदपन्हो नामक ग्रंथ भी पालि भाषा में ही लिखा गया। इस प्रकार पालि थेरवादी बौद्ध धर्मशास्त्र की पवित्र भाषा है।
पतंजलि का परिचय
➣ महर्षि पतंजलि पुष्यमित्र शुंग (195-142 ई. पू.) के शासनकाल में थे।
➣ महर्षि पतंजलि ने योग के 195 सूत्रों को इकट्ठा किया और अष्टांग योग का प्रतिपादन किया।
➣ इनके गुरु का नाम व्याकरणाचार्य पाणिनी था।
➣ उन्होंने अष्टांग योग के नाम इस प्रकार हैं-
1. यम, 2. नियम, 3. आसन, 4. प्राणायाम, 5. प्रत्याहार, 6. धारणा, 7. ध्यान और 8. समाधि।
➣ पतंजलि को योगशास्त्र के जन्मदाता की उपाधि भी दी गयी हैं।
➣ योगसूत्र पतंजलि का महान अवदान है। उन्होंने पाणिनी के अष्टाध्यायी पर अपनी टीका लिखी, जिसे महाभाष्य कहा जाता है।
शक संवत क्या है
➣ इस संवत का आरंभ 78 ई.पू. हुआ था।
➣ कुषाण राजा कनिष्क महान ने अपने राज्यारोहण को उत्सव के रूप में मनाने और उस तिथि को यादगार बनाने के लिए इस संवत की शुरुआत की।
➣ इस संवत की पहली तिथि चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा है और इसी तिथि पर कनिष्क ने राज्य सत्ता सम्हाली थी।
➣ शक संवत भारत का राष्ट्रीय कैलंडर है। भारत सरकार द्वारा इसे प्रयोग में लाया जाता है।
➣ भारत में इस संवत का प्रयोग वराहमिरि द्वारा 500 ई. से किया गया।
➣ यह संवत अन्य संवतों की तुलना में कहीं अधिक वैज्ञानिक और त्रुटिहीन है।
➣ यह संवत प्रत्येक वर्ष में 22 मार्च को शुरू होता है और इस दिन सूर्य विषुवत रेखा के ऊपर होता है और इसी कारण दिन और रात बराबर के समय के होते हैं।
➣ शक संवत के 365 दिन होते हैं और इसका लीप इयर भी अंग्रेजी ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ ही होता है।
➣ लीप ईयर होने पर शक संवत 23 मार्च को शुरू होता है और उसमें 366 दिन होते हैं।
➣ एक अन्य विचार के अनुसार, उज्जयिनी में शक क्षत्रप चष्टन (78-110 ई.) ने शक संवत का प्रवर्तन किया।
विक्रम संवत क्या है
➣ विक्रम संवत की शुरुआत राजा विक्रमादित्य ने 57 ई.पू. में थी।
➣ कहा जाता है कि राजा विक्रमादित्य ने अपनी सम्पूर्ण प्रजा का ऋण खुद चुकाकर इस संवत की शुरुआत की थी।
➣ विक्रम संवत में समय की पूरी गणना सूर्य और चांद के आधार पर की गयी है यानी दिन, सप्ताह, मास और वर्ष की गणना पूरी तरह से वैज्ञानिक है।
➣ विक्रम संवत और शक संवत में अंतरः दोनों संवतों के महीनों के नाम समान हैं और दोनों संवतों में शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष भी हैं। अंतर सिर्फ दोनों पक्षों के शुरू होने में है।
➣ विक्रम संवत में नया महीना पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष से होता है,
➣ जबकि शक संवत में नया महीना अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष से शुरू होता है। इसी कारण इन संवतों के शुरू होने वाली तारीखों में भी अंतर आ जाता है।
➣ शक संवत में चैत्र के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, उस महीने की पहली तारीख है जबकि विक्रम संवत में यह सोलहवीं तारीख है।
चाणक्य कौन थे
➣ चाणक्य (लगभग 375-283 ई.पू.) चन्द्रगुप्त मौर्य के गुरु और महामंत्री थे।
➣ चाणक्य को कौटिल्य और विष्णुगुप्त के नाम से भी जाना जाता है।
➣ चाणक्य की पत्नी का नाम यशोमती था।
➣ उन्होंने नंदवंश का नाश करके चन्द्रगुप्त मौर्य को राजा बनवाया। उन्होंने बिंदुसार और अशोक का भी मार्गदर्शन किया।
➣ चाणक्य ने तक्षशिला विश्वविद्यालय से पढ़ाई की और वहां के आचार्य भी बने।
➣ चाणक्य के कहने पर सिकंदर के सेनापति सेल्युकस की बेटी हेलेना से चंद्रगुप्त ने विवाह किया था। चंद्रगुप्त के राज्य निर्माण का समस्त इतिहास वस्तुतः उसके गुरु चाणक्य का कार्य था।
➣ कुछ विद्वान मानते हैं कि हेलेना ने ही चाणक्य की हत्या करवा दी।
➣ कौटिल्य ने अर्थशास्त्र की रचना की, जो राजनीति, अर्थनीति, कृषि, समाजनीति आदि का एक महान ग्रंथ है। इसमें उन्होंने वर्णन किया है कि एक राजा किस प्रकार से राजनीतिक और आर्थिक शक्ति प्राप्त कर सकता है।
कालिदास का परिचय
➣ कालिदास संस्कृत भाषा के महान कवि और नाटककार थे।
➣ वे चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में शामिल थे।
➣ उन्होंने भारत की पौराणिक कथाओं और दर्शन को आधार बनाकर रचनाएं की।
➣ कालिदास नाट्य, महाकाव्य तथा गीतिकाव्य के क्षेत्र में अपनी अद्भुत रचनाशक्ति का प्रदर्शन के लिए प्रसिद्ध हैं।
➣ इनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध नाटक अभिज्ञान शाकुन्तलम् है। जिनसे इन्हे सर्वाधिक प्रसिद्धि मिली।
➣ उनके दो अन्य नाटक हैं- विक्रमोर्वशीय तथा मालविकाग्निमित्र।
➣ उनके चार महाकाव्य हैं- ‘रघुवंश’, कुमारसंभव’, ‘मेघदूत’ और ‘ऋतुसंहार’।
प्रथम चीनी यात्री फाह्यान
➣ चन्द्रगुप्त-II के काल में चीनी यात्री फाह्यान भारत आया। यह बौद्ध धर्म का अनुयायी था।
➣ चीनी भाषा में फा का अर्थ धर्म है। हियान का अर्थ आचार्य है। इस प्रकार फाह्यान नाम से तात्पर्य धर्माचार्य है।
➣ फ़ाह्यान की भारत यात्रा का उदेश्य बौद्ध हस्तलिपियों एवं बौद्ध स्मृतियों को खोजना था। इसीलिए फ़ाह्यान ने उन्हीं स्थानों के भ्रमण को महत्त्व दिया, जो बौद्ध धर्म से सम्बन्धित थे।
➣ फाह्यान ने भारत में बिताए 12 वर्षों में से 6 वर्ष यात्रा में और 6 वर्ष अध्यवसाय में बिताए थे।
➣ मध्य देश ब्राह्मणों का देश था, जहां लोग सुखी और सम्पन्न थे।
➣ यहां मृत्युदंड नहीं दिया जाता था, केवल आर्थिक दंड प्रचलित थे। बार-बार राजद्रोह के अपराध में केवल दाहिना हाथ काट लिया जाता था।
➣ मध्य देश के लोग न तो किसी जीवित प्राणी की हत्या करते है और न ही मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन का प्रयोग करते थे।
➣ केवल चांडाल इसके अपवाद थे तथा समाज से बहिष्कृत थे। इस प्रकार चांडालों का विस्तृत वर्णन करने वाला फाह्यान प्रथम विदेशी यात मध्य देश के लोग सुअर व पक्षियों को नहीं पालते थे। पशुओं का व्यापार भी नहीं करते थे।
➣ बाजारों में बूचड़खाने तथा मदिरालय नहीं थे।
➣ मध्य देश के लोग क्रय-विक्रय में कोड़ियों का प्रयोग करते थे।
➣ मध्य देश में ब्राह्मण धर्म का ही बोलबाला
चीनी यात्री ह्वेनसांग
➣ हर्षवर्धन के समय में विख्यात चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत आया था।
➣ ह्वेनसांग बौद्धधर्म के विषय में विस्तृत जानकारी प्राप्त करेन के उद्देश्य से 630 ई. में भारत आया तथा वह 644 ई. तक भारत में रहा। जिसमें से 6 वर्ष नालंदा में शिक्षा ग्रहण किया।
➣ ह्वेनसांग सिल्क मार्ग से भारत में हिन्दुकुश पर्वत पार का सर्वप्रथम कपिशा पहुंचा।
➣ चीनलौटकर उसने पाश्चात्य संसार के लेख (शी-यू-की) नामक पुस्तक में तत्कालीन भारतीय समाज हर्ष (महायान बौद्धधर्मी) को वह शिलादित्य कहता है और भारत को ब्राह्मणों का देश कहा है।
➣ वह अपने साथ भारत से लगभग 150 बुद्ध के अवशेषों के कण, सोने, चांदी एवं सन्दल द्वारा बनी बुद्ध की मूर्तियाँ और 657 पुस्तकों की पाण्डुलिपियों को ले गया था।
➣ हर्ष को उसने फीसे या वैश्य जाति बताया।
➣ हर्ष को उसने शिलादित्य के नाम से सम्बोधित किया है।
➣ हर्ष के समय के सामंतों की कई श्रेणियों का भी उल्लेख किया है।
➣ उसने सिंध व मतिपुर के राजाओ को शूद्र बताया है। उसने शूद्रों को कृषक कहा है।
➣ उसके समय में नालंदा के प्राचार्य शीलभद्र थे।
➣ ह्वेनसांग के अनुसार इस समय सिंचाई घटी यंत्र (रहट) द्वारा होती थी।
➣ उसके अनुसार भारत के घोड़े अरब, ईरान एवं कम्बोज से आते थे।
➣ ह्वेनसांग ने कन्नौज की धर्मसभा व प्रयाग की महामोक्षपरिषद् का भी वर्णन किया है।
ह्वेनसांग को प्रिंस ऑफ ट्रैवलर्स अर्थात’ यात्रियों का राजकुमार कहा जाता है।
➣ ह्वेन त्सांग की भारत यात्रा का वृतांत हमें चीनी ग्रंथ सी यू की, वाटर्ज की पुस्तक On Yuan Chwang’s Travel In India एवं ह्मुली की पुस्तक Life of lliven Tsang में मिलता है।
गांधार शैली क्या है
➣ गांधार शैली का विकास आधुनिक पेशावर और अफगानिस्तान के निकट पंजाब की पश्चिमी सीमाओं में 50 ई.पू. से लेकर 500 ई. तक हुआ।
➣ इस शैली पर यूनानी या हेलेनिस्टिक मूर्तिकला का काफी प्रभाव रहा, इसलिए इसे भारतीय-यूनानी कला के रूप में जाना जाता है।
➣ इस शैली को ग्रीक-बौद्ध शैली भी कहा जाता है।
➣ इसका सर्वाधिक विकास कुषाण काल में हुआ। इस काल की विषयवस्तु बौद्ध परम्परा से ली गयी थी, किन्तु निर्माण का ढंग यूनानी था।
➣ गांधार शैली की प्रारम्भिक बौद्ध मूर्तियों में बुद्ध का मुख ग्रीक देवता अपोलो से मिलता-जुलता है। यही कला हद्दा से बामियान और वहां से तुर्किस्तान और चीन पहुंची।
➣ गांधार कला के अंतर्गत मूर्तियों में शरीर की आकृति को सर्वथा यथार्थ दिखाने का प्रयत्न जाता है। इस रूप में गांधार कला यथार्थवादी थी।
➣ गांधार शैली में बुद्ध योगी मुद्रा में बैठे होते हैं और बहुत कम आभूषण धारण किए होते हैं। उनको लहराते बालों के साथ आध्यात्मिक मुद्रा में दिखाया गया है। आखें ऐसी बंद हैं जैसे कि ध्यान मुद्रा में हों और इनके सर पर जटा या उभार को दिखाया गया है। यह बुद्ध की सर्वज्ञता को दर्शाता है।
➣ प्रारंभिक गांधार शैली में नीले-धूसर बलुआ प्रस्तर का प्रयोग किया जाता था, जबकि बाद की अवधि मिट्टी और प्लास्टर उपयोग में लाए जाते थे।
मथुरा शैली क्या है
➣ जैन धर्म के अनुयायियों ने मथुरा में मूर्तिकला की एक शैली को प्रश्रय दिया, जहां शिल्पियों ने महावीर की एक मूर्ति बनाई। यह मधुरा शैली के नाम से प्रसिद्ध है।
➣ कालांतर में कुषाण शासकों का प्रश्रय पाकर यह फली-फूली। यह शैली बाह्य संस्कृतियों से प्रभावित नहीं थी और स्वदेशी शैली के रूप से विकसित हुई थी।
➣ इस शैली की मूर्तियों को चित्तिदार लाल बलुआ प्रस्तर का उपयोग करके बनाया गया था।
➣ इस शैली पर हिंदू, जैन और बौद्ध तीनों धर्मों का प्रभाव था।
➣ मथुरा शैली में शरीर को यथार्थ दिखलाने का प्रयल नहीं किया गया है, अपितु मुखाकृति में आध्यात्मिक सुख और शांति व्यक्त की गयी है। दूसरे शब्दों में, मथुरा शैली आदर्शवादी है।
➣ इसमें बुद्ध को मुस्कुराते चेहरे के साथ प्रसन्नचित दिखाया गया है। शरीर हृष्ट-पुष्ट और तंग कपड़े पहने हुए हैं। चेहरा और सिर मुंडा हुआ है। सर पर उभार या जटा दिखाई गयी है। बुद्ध को विभिन्न मुद्राओं में पदमासन में बैठे दिखाया गया है और उनका चेहरा विनीत भाव दर्शाता है।
विक्रमशिला विश्वविद्यालय का इतिहास
➣ 8वीं शताब्दी में पाल वंश के शासक धर्मपाल द्वारा बिहार प्रांत के भागलपुर में विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी।
➣ यह विश्वविद्यालय नालंदा के समकक्ष माना जाता था। यहां पर बौद्ध धर्म एवं दर्शन के अतिरिक्त न्याय, तत्व ज्ञान एवं व्याकरण का भी अध्ययन कराया जाता था।
➣ इस विश्वविद्यालय के सर्वाधिक प्रतिभाशाली भिक्षु दीपंकर ने लगभग 200 ग्रंथों की रचना की।
➣ इस शिक्षा केन्द्र में लगभग 3,000 अध्यापक कार्यरत थे। यहां पर विदेशों से भी छात्र अध्ययन के लिए आते थे। सम्भवतः तिब्बत के छात्रों की संख्या सर्वाधिक थी।
➣ पाल शासकों का तिब्बत के साथ घनिष्ठ सांस्कृतिक संबंध था। संतरक्षित तथा दीपांकर (जिसे अतिशा कहा जाता था) जैसे प्रमुख बौद्ध विद्वानों को तिब्बत में आमंत्रित किया गया और उन्होंने वहां बौद्ध धर्म के एक नये रूप का प्रचार किया। परिणामस्वरूप बहुत से तिब्बती बौद्ध विद्योपार्जन के लिए नालंदा और विक्रमशिला आये।
➣ 1203 ई. में बख्तियार खिलजी के आक्रमण के फलस्वरूप यह विश्वविद्यालय नष्ट हो गया।
ओदन्तपुरी विश्वविद्यालय
➣ ओदन्तपुरी (उदंतपुरी) विश्वविद्यालय भी नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय की तरह विख्यात था, परंतु इसका उत्खनन कार्य नहीं होने के कारण यह आज भी धरती के गर्भ में दबा है। फलस्वरूप बहुत ही कम लोग इस विश्वविद्यालय के इतिहास से परिचित हैं।
➣ यह विश्वविद्यालय बौद्ध धर्म के माननेवाले तथा भिक्षुओं का मुख्य केंद्र था।
➣ कहा जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय जब अपने पतन की ओर अग्रसर हो रहा था, उसी समय इस विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी थी।
➣ इसकी स्थापना प्रथम पाल नरेश गोपाल ने 7वीं शताब्दी में की थी।
➣ तिब्बती पांडुलिपियों से ऐसा ज्ञात होता है कि इस महाविहार के संचालन का भार ‘भिक्षुसंघ’ के हाथ में था।
➣ मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने सर्वप्रथम इसी को अपने आक्रमण का निशाना बनाया।
➣ खिलजी ने 1197 ई. में इस विश्वविद्यालय को चारों और से घेर लिया। कुछ भिक्षुओं ने संघर्ष किया और कुछ भिक्षु बंगाल तथा ओडिशा की ओर भाग गये। अंत में इस यहाँ आग लगा दी गयी।
➣ उल्लेखनीय है कि उदंतपुर को ही न दिनों बिहारशरीफ (बिहार) के नाम से ना जाता है। उदंतपुरी के प्रधान आचार्य तारि और अतिशा दीपंकर के शिष्य थे।
➣ एक समय विद्या और आचार्यों की प्रसिद्धि के कारण इसका महत्व नालंदा से अधिक बढ़ गया था। इस विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति प्रभाकर थे।
एलोरा की गुफाएं
➣ एलोरा की गुफाएं महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में एलोरा नामक स्थान पर स्थित हैं।
➣ 7वीं – 9वीं शताब्दी के बीच बनाई गईं 34 शैलकृत गुफाओं में 1 से 12 तक बौद्धों तथा 13 से 29 तक हिन्दुओं और 30 से 34 तक जैनों की गुफाएं हैं।
➣ एलोरा की गुफा में 10 चैत्यगृह हैं, जो शिल्प देवता विश्वकर्मा को समर्पित हैं।
➣ एलोरा गुहा मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूटों के समय में किया गया था। इनके निर्माण कार्यों में एलोरा का कैलाश गुहा मंदिर सर्वाधिक उत्कृष्ट है, जिसका निर्माण राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम ने कराया था।
➣ बौद्ध, जैन और हिन्दू धर्म से प्रभावित ये शिल्प कलाएं पहाड़ में विस्तृत पच्चीकारी दर्शाती हैं। जिसमे सर्वाधिक प्रभावशाली पच्चीकारी कैलाश मंदिर की है (गुफा 16), जो विश्वभर में एक ही पत्थर की शिला से बनी हुई सबसे बड़ी मूर्ति है।
➣ हिन्दू गुफाओं में एक गुफा तो एक ही पहाड़ को काटकर बनाई गयी है। इस गुफा मंदिर, हाथी और दो मंजिली इमारत छेनी हथौड़ी से तराश कर बनाई गयी है। इन गुफाओं का निर्माण छठी से बारहवीं सदी के बीच कलचूरी, चालुक्य और राष्ट्रकूट राजाओं द्वारा कराया गया था।
➣ वर्ष 1983 में यूनेस्को ने एलोरा की गुफाओं को विश्व विरासत स्थल का दर्जा प्रदान किया।
अजंता की गुफाएं
➣ सह्याद्रि की पहाड़ियों पर स्थित अजंता की गुफाएं औरंगाबाद के उत्तर में 107 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं।
➣ ये गुफाएं अपनी भित्ति-चित्रकला के लिए प्रसिद्ध हैं।
➣ इन गुफाओं का नाम अजिंठा गांव के नाम पर रखा गया है। इन गुफाओं की खोज 1819 में ब्रिटिश सेना की मद्रास रेजीमेंट के सैन्य अधिकारी द्वारा शिकार खेलते समय की गयी थी।
➣ अजंता की गुफाएं घोड़े की नाल के आकार की चट्टान की सतह पर उत्कीर्ण की गयी हैं, जो बाघोरा नाम की एक संकीर्ण नदी के ऊपर लगभग 76 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैं।
➣ इन गुफाओं का निर्माण लगभग दूसरी सदी से लेकर छठी सदी ई. तक सातवाहन और वाकाटक काल के दौरान किया गया था।
➣ वाकाटक वंश के वसुगुप्त शाखा के शासक हरिषेण (475-500ई.) के मंत्री वराहमंत्री ने गुफा ने संख्या 16 को बौद्ध संघ को दान में दिया था। जबकि गुफा संख्या 17 का निर्माण हरिषेण नामक सामन्त ने कराया था।
➣ इन गुफाओं में जातक कथाओं के माध्यम से भगवान बुद्ध के जीवन की घटनाओं को दर्शाया गया है।
➣ अजंता में निर्मित कुल 29 गुफाओं में से वर्तमान में केवल 6 (गुफा संख्या 1, 2, 9, 10, 16, 17) ही शेष हैं।
➣ अजंता की गुफाओं को दो भागों में बांटा जा सकता है- एक भाग में बौद्ध धर्म के हीनयान और दूसरे भाग में महायान संप्रदाय की झलक देखने को मिलती है।
➣ गुफा संख्या -16 में उत्कीर्ण मरणासन्न राजकुमारी का चित्र प्रशंसनीय है।
➣ अजंता की गुफाओं को वर्ष 1983 में यूनेस्को ने विश्व विरासत स्थल की सूची में शामिल किया था।
एलीफैण्टा गुफा
➣ चालुक्य स्थापत्य के नमूने एलीफैण्टा तथा जागेश्वरी से भी मिलते है। एलीफैण्टा मे चालुक्यों के सामन्त शिलाहार शासन करते थे।
➣ 9वीं शताब्दी के प्रारम्भ में यहां सुन्दर गुहायें उत्कीर्ण की गयी। मुख्य गुफा में एक विशाल मण्डप है जिसके चतुर्दिक प्रदक्षिणापथ है।
➣ वर्गाकार गर्भगृह में विशाल शिवलिंग स्थापित है। चबूतरे से गर्भगृह में जाने के लिये सीढ़ियां बनाई गयी है।
➣ गर्भगृह के चारों ओर निर्मित देव प्रकोष्ठों में शिव के विविध रूपों की मूतियां बनी है। इनमें सर्वाधिक सुन्दर महेश मूर्ति भारतीय कला की धरोहर है।
➣ यहां की गुफा में शिव, ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य, इन्द यम, गणेश स्कन्द की मूर्तियां बनाई गयी है।
➣ शिव के विविध रूपों एवं लीलाओ से संबंधित मूर्तियां काफी अच्छी है। उत्तरी द्वार के सामने प्रसिद्ध त्रिमूर्ति है जो समस्त राष्ट्रकूट कला की सर्वोत्तम रचना है।
➣ पहले ऐसा समझा गया था कि यह ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव की संयुक्त प्रतिमा है जिनकी गणना त्रिदेव में की जाती है।
➣ जे० एन० बनर्जी ने इस अवधारणा का खण्डन करते हुए मूर्ति का तादात्म्य शिव के 03 रूपों शान्त, उग्र, तथा शक्ति से करते हुए इसे महेश मूर्ति की संज्ञा दी है। बीच का मुख शिव के शान्त दायी ओर का मुख रौद्र तथा दायी ओर का मुख (नारी मुख है) शक्ति रूप का प्रतीक है।
राजा भोज : कला संरक्षक
➣ भोज परमार, सिन्धु राजा का पुत्र था। एक अभिलेख में उसने स्वयं को सार्वभौम कहा है। उदेपुर प्रशस्ति में उसे कैलाश मलय पर्वत का स्वामी बताया गया है।
➣ भोज अपनी विद्धन्ता के कारण कविराज उपाधि से प्रख्यात थे। उनके द्वारा लिखित एवं चिकित्साशास्त्र पर आयुर्वेद सर्वस्व एवं स्थापत्यशास्त्र पर समरांगणसूत्रधार विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
➣ इनके अतिरिक्त सरस्वती कण्ठाभरण सिद्धान्त संग्रह योगसूत्रवृन्ति राजमार्तण्ड विद्याविनोद, युक्तिकल्पतरू, चारूचर्चा आदित्य प्रताप सिद्धान्त प्रमुख है।
➣ भोज ने धारा नगरी का विस्तार किया और वहाँ भोजशाला के रूप में प्रख्यात एक महाविद्यालय की स्थापना कर उसमें वाग्यदेवी की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा करवाया था।
➣ इस भोजशाला की दीवारों के प्रस्तर खण्डों पर आज भी संस्कृत श्लोक अभिलिखित है। अपने नाम पर उसके भोजपुर नगर बसाया तथा एक बहुत बड़े
➣ भोजसर नामक तालाब को निर्मित करवाया। चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण मंदिर बनवाया था।
➣ आइने अकबरी के वर्णन के आधार पर माना जाता है कि उसके दाजदरबार में 500 विद्वान थे। भोज के दरबारी कवियों में भास्कर भट्ट, दामोदर मित्र, धनपाल प्रमुख थे।
जंतर मंतर क्या है
➣ जन्तर मन्तर राजस्थान राज्य के जयपुर शहर में स्थित है। महाराजा सवाई जयसिंह ने सन 1718 ई. में इस वैधशाला की आधार शिला रखी।
➣ इस ज्योतिष यंत्रालय में समय की जानकारी, सूर्योदय, सूर्योस्त एवं नक्षत्रों की जानकारी प्राप्त करने के उपकरण अवस्थित हैं।
➣ वैधशाला में स्थापित यंत्रों में वृहत सम्राट यंत्र, जय प्रकाश यंत्र, राम यंत्र, कपाली यंत्र, नाडी वलय यंत्र, घोटा यंत्र आदि मुख्य है।
➣ देश में सबसे पहली वेधशाला दिल्ली में 1724ई. में बनवाई गई और उसके दस वर्ष बाद जयपुर में वेधशाला बनाई गई थी। जयपुर के बाद उज्जैन, बनारस और मथुरा में वेधशालाएं बनवायी गई।
➣ जयपुर की वेधशाला सबसे विशाल एवं विश्व विख्यात हैं। यहाँ स्थित सम्राट यंत्र विश्व की सबसे बडी सौर घड़ी मानी जाती हैं।
बृहदेश्वर मंदिर
➣ यह मंदिर तमिलनाडु के तंजौर ज़िले में स्थित प्रसिद्ध हिंदू मंदिर है। तमिल भाषा में इसे बृहदीश्वर के नाम से संबोधीत किया जाता है।
➣ ग्यारहवीं सदी के आरम्भ में बनाया गया था। यह मंदिर चोल शासकों की महान् कला केन्द्र रहा है। भगवान शिव को समर्पित बृहदीश्वर मंदिर शैव धर्म के अनुयायियों के लिए पवित्र स्थल रहा है।
➣ प्रारंभिक समय में इसका नाम राजराजेश्वर था बाद में इसका नामकरण बृहदेश्वर मंदिर किया गया।
➣ विश्व में यह अपनी तरह का प्रथम और एकमात्र मंदिर है जो कि ग्रेनाइट का बना हुआ है। इस मंदिर को यूनेस्को ने विश्वधरोहर घोषित किया है।
➣ बृहदेश्वर मंदिर चोल वास्तुकला का शानदार उदाहरण है, जिनका निर्माण चोल शासक महाराजा राजराज प्रथम के राज्य के दौरान केवल 5 वर्ष की अवधि में (1004 ई. -1009 ई. ) निर्मित किया गया था। उनके
➣ रिजर्व बैंक ने 1 अप्रैल 1954 ई. को एक हजार रुपये का नोट जारी किया था। जिस पर बृहदेश्वर मंदिर की भव्य तस्वीर है।
➣ मंदिर के गर्भ गृह में चारों ओर दीवारों पर भित्ती चित्र बने हुए हैं जिनमें भगवान शिव की विभिन्न मुद्राओं को दर्शाया गया है।
➣ इन चित्रों में एक भित्तिचित्र जिसमें भगवान शिव असुरों के किलों का विनाश करके नृत्य कर रहे है।
कोणार्क सूर्य मंदिर
➣ सूर्यमन्दिर भारत का इकलौता सूर्य मन्दिर है जो पूरी दुनिया में अपनी भव्यता और बनावट के लिए जाना जाता है।
➣ सूर्य मन्दिर उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से 65 किलोमीटर दूर कोणार्क में अपने समय की उत्कृष्ट वास्तु रचना है। इस मन्दिर की मूर्तियाँ लेहराइट, क्लोराइट और खोण्डोलाइट नाम के पत्थरों से बनाई गई हैं।
➣ पूर्वी गंग वंश के राजा नरसिंह देव प्रथम ने सूर्य मन्दिर को 13वीं शताब्दी (लगभग 1278 ई.) में बनवाया था। प्राचीन उड़िया स्थापत्य कला का यह मन्दिर बेजोड़ उदाहरण है।
➣ सूर्य की चार पत्नियाँ रजनी, निक्षुभा, छाया और सुवर्चसा मूर्ति के दोनों तरफ़ हैं। सूर्य की मूर्ति के चरणों के पास ही रथ का सारथी अरुण भी उपस्थित है।
➣ मन्दिर को रथ का स्वरूप देने के लिए मन्दिर के आधार पर दोनों ओर एक जैसे पत्थर के 24 पहिए बनाए गए।
➣ आधार की बाहरी दीवार पर लगे पत्थरों पर विभिन्न आकृतियों उकेरा गया है। इनमें कुछ स्थानों पर खजुराहो की तरह कामातुर आकृतियाँ तो कहीं पर नारी सौंदर्य, महिला व पुरुष वादकों व नर्तकियों की विभिन्न आकृतियाँ हैं।
➣ इसके अलावा इसमें मानव, पेड़-पौधों, जीव-जन्तुओं के साथ पुष्पीय व ज्यामितीय अंकरण हैं।
➣ सन 1838 ई. में एशियाटिक सोसाइटी ने पहली बार इसके संरक्षण की बात उठाई। वर्ष 1900 में यहाँ पर वास्तविक संरक्षण करने का प्रयास हुआ।
➣ 20वीं सदी के मध्य में इसे भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के अधीन कर दिया गया। वर्ष 1984 के बाद इसे विश्व विरासत स्थल घोषित किया गया।
➣ कोणार्क के अतिरिक्त एक अन्य सूर्य मंदिर उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा में कटारमल नामक स्थान पर भी स्थित है। इस कारण इसे कटारमल सूर्य मन्दिर कहा जाता है।
➣ यह सूर्य मन्दिर न सिर्फ़ समूचे कुमाऊँ मंडल का सबसे विशाल, ऊँचा और अनूठा मन्दिर है, बल्कि उड़ीसा के कोणार्क सूर्य मन्दिर के बाद एकमात्र प्राचीन सूर्य मन्दिर भी है।
सोमनाथ मंदिर का इतिहास
➣ यह एक महत्वपूर्ण हिन्दू मंदिर है जिसकी गणना 12 ज्जोतिलिगों में सर्वप्रथम ज्जोतिर्लिंग के रूप में होती है। यह गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह में प्रभास पटन में स्थित है।
➣ इसका निर्माण स्वयं चन्द्रदेव ने किया था। इसका उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है। यह मंदिर हिंदू धर्म के उत्थान पतन के इतिहास का प्रतीक रहा है।
➣ अत्यंत वैभवशाली होने के कारण इतिहास में कई बार यह मंदिर तोड़ा तथा पुनर्निर्मित किया गया। द्वितीय बार मंदिर का पुनर्निर्माण सदी में वल्लभी के मैत्रक राजाओं ने किया।
➣ 8वीं सदी के सिंध के अरबी गवर्नर जूनायद ने इसे नष्ट करने के लिए अपनी सेना भेजी। प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका तीसरा पुनर्निर्माण किया।
➣ अरब यात्री अलबेरूनी ने अपने यात्रा वृतान्त में इसका विवरण लिखा जिससे प्रभावित हो महमूद गजनवी ने सन 1025 ई. में कुछ 5,000 साथियों के साथ सोमनाथ मंदिर पर हमला किया,
➣ मंदिर की सम्पन्ति लूटी गई और उसे नष्ट कर दिया 50,000 लोग मंदिर के अंदर हाथ जोड़कर पूजा अर्चना कर रहे थे, प्राय: सभी कत्ल कर दिये गये।
➣ इसके बाद गुजरात के राजा भीम और मालवा के राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया। सन 1297 ई. में जब दिल्ली सल्तनत ने गुजरात पर कब्जा किया तो इसे 5वी बार गिराया गया।
➣ मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसे पुनः 1706 ई. में गिरा दिया।
➣ कालांतर में नया मंदिर बनाया गया। इस नए भव्य मंदिर का डिजाइन प्रसिद्ध आर्कीटेक्टर प्रभाशंकर ने तैयार किया था।
➣ इस समय जो मंदिर खड़ा है उसे भारत के गृह मन्त्री सरदार बल्लभ भाई पटेल (लौह पुरूष) ने बनवाया और 1 दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया।
दिलवाड़ा का जैन मंदिर
➣ दिलवाड़ा मंदिर विस्तृत 5 मंदिरों का एक समूह है। इन मंदिरों का निर्माण 11वीं शताब्दी के बीच हुआ था।
➣ जैन धर्म के तीर्थकरों को समर्पित इन मंदिरों में यह सर्वाधिक प्राचीन मंदिर है। प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित यह मंदिर 1031 ई. में बना था।
➣ 22वें तीर्थंकर नेमीनाथ को समर्पित यहां का लुन वासाही मंदिर भी काफी लोकप्रिय है। यह मंदिर 1231 ई. में वास्तुपाल व तेजपाल नामक दो भाइयों द्वारा बनवाया गया था।
➣ यहां के जैन मंदिरों में सबसे बड़े मंदिर विमल वासाही मंदिर का निर्माण गुजरात के चालुक्य वंश के राजा भीमदेव के सेनापति विमल शाह ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा पूरी होने पर करवाया था।
➣ इसके अलावा मंदिर परिक्षेत्र में पीतल हर अर्वेश्वर मंदिर, शारतशाही पार्श्वनाथ मंदिर और भगवान महावीर स्वामी मंदिर स्थित है। इसमें महावीर स्वामी मंदिर सबसे छोटा और सादगीपूर्ण है।
➣ इसी प्रकार पीतल मंदिर का निर्माण गुजरात के भीमशाह ने करवाया था। बाद में सुंदर व गदा नामक व्यक्तियों ने इसका जीर्णोधार करवाया व इसमें ऋषभदेव की पंचधातु की मूर्ति स्थापित करवायी जिसका वजन एक मन माना जाता है।
➣ इसके अलावा यहां एक चौमुखी मंदिर भी दर्शनीय है। इसे खारतवासी मंदिर भी कहा जाता है। इसमें भगवान पार्श्वनाथ की सुंदर मूर्ति विराजमान है।
➣ भूरे पत्थर से बना यह तीन मंजिला मंदिर अपने शिखर सहित दिलवाड़ा सभी मंदिर में सबसे ऊंचा है। समूह के 5वें खेताम्बर मंदिर के साथ भगवान समूह कुथुनाथ ने यहां काले पत्थर का एक ऊंचा स्तंभ बनाया था।
➣ दिलवाड़ा के जैन मंदिर भारतीय शिल्पकला का मानव जाति को एक अनूठा उपहार माना जा सकता है।
अलबरूनी का भारत वर्णन
➣ अलबरुनी एक फ़ारसी विद्वान् लेखक, वैज्ञानिक, धर्मज्ञ तथा विचारक था। वह अरबी, फ़ारसी, तुर्की, संस्कृत, गणित, खगोल का प्रमुख जानकर था।
➣ संस्कृत भाषा का विद्वानी होने के कारण , अल्बरूनी को हिन्दू विद्वानों द्वारा विद्या सागर (Occan of Knowledge) की उपाधि दी गयी थी।
➣ उसने प्राकृतिक विज्ञान, विशेष रूप से खगोलशास्त्र, गणित, रसायन विज्ञान और खनिजशास्त्र आदि पर अनेक कृतियों की रचना की।
➣ उसका असली नाम अबू रैहान मुहम्मद था, लेकिन वह अलबेरूनी के नाम से ही अधिक विख्यात हुआ , जिसका अर्थ होता है- उस्ताद। इसे मुनिज्ज्म के नाम से भी जाना जाता है।
➣ अल बिरूनी का जन्म 973 ई. में ख़्वारिज़्म में हुआ था जिस पर उस समय तूरान और ईरान के सामानी वंश (874-999) का शासन था। 1017 ई. में ख्वारिज़्म को महमूद ग़ज़नवी द्वारा जीत लिया गया।
➣ उसकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर महमूद ग़ज़नवी ने उसे अपने राज्य का राज ज्योतिष नियुक्त कर दिया।
➣ वह सुल्तान महमूद ग़ज़नवी की सेना के साथ भारत आया और कई वर्षों तक पंजाब में रहा।
➣ भारत के संबंध में उसने लगभग 20 पुस्तकों की रचना की, जिसमें अनुवाद और मूल कृति दोनों शामिल हैं।
➣ भगवदगीता और पुराणों का अध्ययन करने वाला अलबरूनी पहला मुसलमान था। सम्भवत: मुस्लिम जगत में भगवद्गीता के अध्ययन से परिचित कराने वाला यह प्रथम मुसलमान था।
➣ किताब-उल-हिन्द पुस्तक का सम्पूर्ण नाम है किताब फ़ी तहफ़ूक़ मा लिल हिन्द मिन मक़ाला मक़्बूला फ़िल अक़्ल-औ-मरजूला जिसे आम तौर पर किताब उल हिन्द कहा जाता है।
➣ अलबेरूनी द्वारा रचित पुस्तकों में यह सबसे अधिक प्रसिद्ध पुस्तक थी। जिसे दक्षिण एशिया के इतिहास का प्रमुख स्रोत माना जाता है।
➣ उसकी पुस्तक तहकीक-ए-हिन्द (भारत की खोज) नामक पुस्तक में हिन्दुओं के इतिहास, चरित्र, आचार-व्यवहार, परम्पराओं और वैज्ञानिक ज्ञान का विशद वर्णन मिलता है।
➣ किताब बल हिन्द का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद जर्मन विद्वान एडवर्ड मी. द्वारा Alharunis Indin शीर्षक से कराया गया।
➣ इस पुस्तक की मूल भाषा फ़ारसी थी। आगे चलकर इस का हिन्दी भाषा में अनुवाद शांताराम, उर्दू में मैय्यद अशगर तथा बंगाली में ए. बी. हबीबुल्ला ने किया।
इब्नबतूता का भारत वर्णन
➣ इब्नबतूता अरब यात्री, विद्वान तथा लेखक था। इसका जन्म उत्तरी अफ्रीका के मोरक्को प्रदेश के प्रसिद्ध नगर तांजियर में 24 फरवरी, 1304 ई. को हुआ। इसका पूरा नाम मुहम्मद बिन अब्दुल्ला इब्नबतूता था।
➣ इब्नबतूता 1333 ई. में सुल्तान मुहम्मद तुग़लक़ के राज्यकाल में भारत आया। भारत के उत्तर पश्चिम द्वार से प्रवेश करके इब्नबतूता सीधा दिल्ली पहुँचा, जहाँ तुगलक सुल्तान मुहम्मद ने उसे राजधानी का काजी नियुक्त किया।
➣ 1342 में मुहम्मद तुगलक ने उसे चीन के बादशाह के पास अपना राजदूत बनाकर भेजा।
➣ इसके बाद उसने पश्चिम एशिया, उत्तर अफ्रीका तथा स्पेन के मुस्लिम स्थानों क भ्रमण किया और अंत में टिंबकट आदि होता वह 1354 ई. के आरंभ में मोरक्को की राजधानी फेज लौट गया।
➣ फेज’ लौटकर उसने अपना भ्रमणवृत्तांत सुल्तान को सुनाया। सुल्तान के आदेशानुसार उसके सचिव मुहम्मद इब्न जुज़ैय ने उसे लेखबद्ध किया।
➣ इब्नबत्तूता के भ्रमणवृत्तांत को तुहफ़तअल नज्ज़ार फ़ी गरायब अल अमसार व अजायब अल अफ़सार का नाम दिया गया। इसकी एक प्रति पेरिस के राष्ट्रीय पुस्तकालय में सुरक्षित हैं।
फ़रिश्ता इतिहासकार
➣ वह प्रसिद्ध मुस्लिम इतिहासकार था, जिसने फ़ारसी में इतिहास लिखा है। फ़रिश्ता का जन्म फ़ारस में कैस्पियन सागर के तट पर अस्त्राबाद में हुआ था। उसका पूरा नाम मुहम्मद क़ासिम हिन्दू शाह था।
➣ वह अपनी युवावस्था में पिता के साथ अहमदाबाद, भारत आया और यहाँ 1589 ई. तक रहा। 1612 ई. में बीजापुर में ही उसकी मृत्यु हुई।
➣ इसके बाद वह बीजापुर चला गया, जहाँ उसने सुल्तान इब्राहीम आदिलशाह द्वितीय का संरक्षण प्राप्त कर लिया।
➣ फ़रिश्ता को सुल्तान इब्राहीम आदिलशाह ने ही भारत का इतिहास लिखने के लिए कहा था। सुल्तान द्वारा दिया गया यह कार्य फ़रिश्ता ने 1609 ई. में पूरा किया।
➣ फ़रिश्ता ने भारत के इतिहास पर अपनी एक पुस्तक भी लिखी थी, जो तारीख़-ए-फ़रिश्ता के नाम से प्रसिद्ध हुई।
➣ ब्रिग्स ने उसकी पुस्तक का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया भारत में मुसलमानी शक्ति के विकास का इतिहास नाम से किया है।
➣ उसका प्रसिद्ध इतिहास ग्रन्थ आज भी भारत में मुस्लिमों के शासन काल पर सबसे अधिक प्रामाणिक तथा सटीक माना जाता है।
बर्नियर का भारत वर्णन
➣ बर्नियर एक फ़्राँसीसी था। वह एक चिकित्सक, राजनीतिज्ञ, दार्शनिक तथा इतिहासकार था। वह 17वीं सदी में फ्राँस से भारत आया, जिस समय भारत पर मुग़लों का शासन था।
➣ बर्नियर की भारत यात्रा पुस्तक में बर्नियर द्वारा लिखित यात्रा का वृत्तांत उस काल के भारत की छवि हमारे समक्ष उजागर करता है।
➣ भारत में वह 1656 ई. से 1668 ई. तक रहे, बर्नियर ने सारे देश का भ्रमण किया और शाहजहाँ तथा औरंगज़ेब के मध्यवर्ती शासनकालों में उसने भारत में जो कुछ देखा उसका रोचक विवरण प्रस्तुत किया है।
➣ उसने मुग़ल दरबार के प्रमुख दरबारी दानिशमन्द की नौकरी कर ली थी।
➣ वह दिल्ली में उस समय मौजूद था, जब दारा शिकोह को राजधानी की सड़कों पर घुमाया जा रहा था और औरंगज़ेब के सैनिक उसे घसीट रहे थे।
➣ शाहजादा दारा के पीछे-पीछे भारी भीड़ चल रही थी, जो कि उसके दुर्भाग्य पर विलाप कर रही थी। फिर भी भीड़ में से किसी व्यक्ति को अपनी तलवार निकालकर दारा को छुड़ाने का साहस नहीं हुआ।
➣ इस प्रकार बर्नियर ने विदेशी होने पर भी सत्ताधारियों के सम्मुख भारतीय जनता की निष्क्रियता तथा असहायावस्था को लक्षित कर लिया था।
➣ बर्नियर ने शाहजहाँ तथा औरंगज़ेब के रेखाचित्र भी प्रस्तुत किए हैं।
➣ बंगाल की समृद्धि से वह बहुत प्रभावित हुआ था, परन्तु जनसाधारण की निर्धनता ने उसे अत्यधिक द्रवित भी किया था।
➣ दरबार की शान-शौक़त तथा विशाल सेना का ख़र्च निकालने के लिए प्रजा पर करों का भारी बोझ लाद दिया जाता था।
➣ बर्नियर के अनुसार इस विशाल सेना का उपयोग जनता को दबाये रखने के लिए किया जाता था।
कल्हण और राजतरंगिणी
➣ राजतरंगिणी कल्हण द्वारा रचित एक संस्कृत ग्रन्थ है, जिसकी रचना 1148 से 1150 ई. के बीच हुई।
➣ कल्हण ने अपनी राजतरंगिणी हर्ष के समय लिखना प्रारंभ किया और अंतिम लोहार राजा जयसिंह के शासनकाल में पूरा किया।
➣ यह ग्रंथ संस्कृत में ऐतिहासिक घटनाओं के क्रमबद्ध इतिहास लिखने का प्रथम प्रयास है। इसमें आदिकाल से लेकर 1151 ई. के आरम्भ तक के कश्मीर के प्रत्येक शासक के काल की घटनाओं का क्रमानुसार विवरण दिया गया है। यह कश्मीर के राजनीतिक उथलपुथल का काल था।
➣ कश्मीर के इतिहास पर आधारित इस ग्रंथ की रचना में कल्हण ने ग्यारह अन्य ग्रंथों का सहयोग लिया है, जिसमें अब केवल नीलमत पुराण ही उपलब्ध है।
➣ कल्हण की राजतरंगिणी में कुल आठ तरंग एवं लगभग 8000 श्लोक हैं। पहले के तीन तरंगों में कश्मीर के प्राचीन इतिहास की जानकारी मिलती है।
➣ चौथे से लेकर छठवें तरंग में कार्कोट एवं उत्पल वंश के इतिहास का वर्णन है। अन्तिम सातवें एवं आठवें तरंग में लोहार वंश का इतिहास उल्लिखित है। कल्हण (ब्राह्मण) कश्मीर के लोहार वंशी राजा हर्ष के सलाहकार थे।
हम्पी : पत्थरों का स्वप्नलोक
➣ हम्पी कर्नाटक की तुंगभद्रा नदी के किनारे स्थित एक प्राचीन गौरवशाली साम्राज्य विजयनगर का अवशेष है।
➣ प्राचीन स्मारकों का यह केंद्र उत्तरी कर्नाटक के बेल्लारी जिले में बेंगलुरू से 353 किमी., बेल्लारी से 74 किमी. और हॉसपेट से 13 किमी. की दूरी पर स्थित अब एक गांव है।
➣ हम्पी को यूनेस्को ने भारत में स्थित विश्व विरासत का दर्जा 1986 ई. में दिया है।
➣ इस गांव में आज भी विजयनगर साम्राज्य के कई अवशेष है। इतिहास और पुरातत्व के दृष्टि से हम्पी एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।
➣ हम्पी को प्राचीन काल में कई नामों से जाना जाता था, जैसे-पम्पा क्षेत्र, भास्कर क्षेत्र, हम्पे, किष्किंधा क्षेत्र है।
➣ हम्पी नाम में कन्नड़ शब्द हम्पे से पड़ा है और हम्प शब्द तुंगभद्रा नदी के प्राचीन नाम पम्पा से आया था।
➣ हम्पी का इतिहास काफी प्राचीन है, लेकिन यहां विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 1336 ई. में 2 भाइयों हरिहर राय और बुक्का राय ने की थी।
➣ यह काफी कम समय में ही बेहद संपन्न और धनी राज्य बन गया। यह साम्राज्य कृष्णदेव राय के शासन में चरम पर था। बुद्धिमान तेनालीराम इन्हीं के दरबार में थे।
➣ इस साम्राज्य का विस्तार मौजूदा कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के क्षेत्रों तक हो गया था।
➣ यह अपनी सम्पत्ति, कला, साहित्य, संस्कृति, व्यापार के लिए काफी ख्याति प्राप्त कर चुका था, लेकिन मुस्लिम आक्रमण से विजयनगर साम्राज्य नष्ट हो गया और हम्पी भी खंडहर में परिवर्तित हो गया।
➣ बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर और बीदर के मुस्लिम राज्यों ने इस राज्य पर आक्रमण करने के लिए एक गठजोड़ बना लिया और 1565 ई. की लड़ाई में विजयनगर साम्राज्य हार गया।
➣ उसके बाद इन राज्यों की सेनाओं ने इस शहर को बर्बाद कर दिया। हम्पी के एशिया में सबसे बड़ा खुले स्मारकों वाला गुम हुआ शहर मान जाता है। विजयवाड़ा राज्य की कतार में किलेबंदी की गई थी।
➣ हम्पी एक महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र भी रहा है। मिथकों के अनुसार रामायण कथा के द्वारा, भगवान राम और लक्ष्मण जब मां सीमा की तलाश में भटक रहे थे,
➣ तो वह किष्किंधा क्षेत्र में वहां के शासक वानर भाइयों वाली और सुग्रीव की खोज में पहुंचे थे।
➣ इस क्षेत्र का एक प्रख्यात धार्मिक आकर्षण विरूपाक्ष मंदिर भी है, जो विजयनगर के देवता भगवान विरूपाक्ष को समर्पित है।
➣ हम्पी में प्रत्येक वर्ष नवंबर माह में वार्षिक समारोह मनाया जाता है, जिसे हम्पी उत्सव या विजय उत्सव कहते है।
अमीर खुसरो का परिचय
➣ अबुल हसन यामिन उद्दीन अमीर खुसरो का जन्म 1253 ई. में एटा, उत्तर प्रदेश के पटियाली नामक कस्बे में हुआ था।
➣ इनके गुरु शेख निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे।
➣ वह एक प्रमुख कवि, शायर, गायक, इतिहासकार और संगीतकार थे। वह प्रथम मुस्लिम कवि थे, जिन्होंने हिंदी शब्दों का खुलकर प्रयोग किया है।
➣ यह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने हिंदी, हिन्दवी और फारसी में एक साथ लिखा।
➣ अमीरो खुसरो को खड़ी बोली के आविष्कार का श्रेय दिया जाता है।
➣ यह संस्कृत भाषा के भी अच्छे जानकार थे। उनको हिन्द या भारत का तोता कहा जाता है।
➣ इन्होने कई गजल, खयाल, कव्वाली, रुबाई और तराना आदि की रचनाएं की।
➣ सितार और तबले का आविष्कार का श्रेय भी आमिर खुसरो को जाता है। साथ ही इन्हे दिल्ली सल्तनत का आश्रय भी प्राप्त हुआ था।
➣ यह गुलाम, खिलजी और तुगलक-तीन राजवंशों तथा 7 सुल्तानों का उत्थान-पतन के समकालीन रहे।
➣ अपने गुरु की मृत्यु के बाद अमीर खुसरो ने भी 1325 ई. में मृत्यु हो गई।
कोहिनूर हीरे का इतिहास
➣ कोहिनूर हीरा विश्व के सभी हीरों का राजा है, जिसे गोलकुंडा (भारत) की एक खान से निकाला गया था।
➣ कोहिनूर को फारसी में कूह-ए-नूर कहा जाता है, जिसका अर्थ है- प्रकृति की विशाल आभा। यह हीरा 105 कैरेट का है।
➣ दिल्ली सल्तनत के उत्तराधिकारियों के हाथों से 1526 में यह बाबर के हाथ लगा।
➣ शाहजहां ने कोहिनूर को अपने मयूर सिंहासन (तख्त-ए-ताउस) में जड़वाया। नादिरशाह मुगल शासक शाह मोहम्मद से सिंहासन सहित कोहिनूर लूट ले गया।
➣ 1747 में नादिरशाह की हत्या के बाद कोहिनूर अहमदशाह अब्दाली के हाथों में पहुंचा। इसके बाद यह अफगानिस्तान के तत्कालीन पदच्युत शासक शूजाशाह के हाथ लगा और वह कोहिनूर के साथ पंजाब पहुंचा।
➣ उसने वहां के महाराजा रणजीत सिंह को यह हीरा भेंट किया। बाद में महाराजा रणजीत सिंह के उत्तराधिकारी दलीप सिंह ने एक समझौते के तहत इसको इंग्लैंड की महारानी को भेंट किया।
➣ कोहिनूर हीरा 2007 तक लंदन टॉवर में नुमाइश के लिए रखा गया था। फिलहाल कोहिनूर हीरे को भारत वापस लाने को कोशिशें जारी हैं।
चौथ और सरदेशमुखी क्या थी
➣ मराठा कराधान प्रणाली में दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण कर थे- चौथ और सरदेशमुखी।
➣ चौथ के विषय में इतिहासकारों में एकमत नहीं है। फिर भी यह माना जाता है कि ‘चौथ’ एक सैन्य कर था, जो तीसरी शक्ति के आक्रमण से सुरक्षा प्रदान करने के बदले में वसूल किया जाता था।
➣ चौथ किसी भी क्षेत्र से प्राप्त कुल भूमि आय का एक चौथाई होता था। 16 प्रतिशत भाग राजा स्वयं अपने लिए रखता था।
➣ सरदेशमुखी मराठा राजा को उसके देशस्वामी (सरदेशमुख) होने के नाते दिया जाने वाला एक पुराना कर था। यह आय का 10% या 1/10 अंश के रूप में होता था।
➣ यह कर उन क्षेत्रों पर लगाया जाता था,जो मराठा राज्य के बाहर थे और विजय द्वारा मराठा राज्य में सम्मिलित कर लिये गये थे।
➣ शाहू के समय मराठा सरदार अपने पृथक कर अधिकारी नियुक्त करने लगे थे, जो केन्द्रीय अधिकारियों से भिन्न होते थे। सरदारों द्वारा गुमाश्ता नियुक्त किया जाता था, जो उनके लिए 10% सरदेशमुखी एकत्रित करता था।
सूर्यास्त कानून क्या था
➣ कार्नवालिस ने 1794 ई. में सूर्यास्त कानून (Sunset Law) बनाया।
➣ इसके अनुसार अगर एक निश्चित तिथि को सूर्यास्त होने तक जमींदार जिला कलेक्टर के पास भू-राजस्व की रकम जमा नहीं करता तो उसकी पूरी जमींदारी नीलाम हो जाती थी।
➣ इसके बाद 1799 और 1812 ई. के रेग्युलेशन के आधार पर किसानों को पूरी तरह जमींदारों के नियंत्रण में कर दिया गया।
➣ इसके तहत यह प्रवधान किया गया कि यदि एक निश्चित तिथि को किसान जमींदार को भू-राजस्व की रकम अदा नहीं करते तो जमींदार उनकी चल और अचल दोनों प्रकार की सम्पत्ति का अधिग्रहण कर सकता है।
➣ परिणामस्वरूप भू-राजस्व की रकम अधिकतम रूप में निर्धारित की गयी तथा इसके लिए 1790-91 के वर्ष को आधार वर्ष बनाया गया। निष्कर्षत: 1765-93 के बीच कंपनी ने बंगाल में भू-राजस्व की दर में दुगुनी वृद्धि कर दी।
आनन्दमठ उपन्यास -1882
➣ आनन्दमठ बंगाली साहित्यकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय के द्वारा रचित एक प्रसिद्ध उपन्यास है, जिसकी रचना 1882 ई. में हुई थी।
➣ भाषा मूलतः बंगाली में है। अभी तक इसमें 4 बार संशोधन से चुके हैं।
➣ मूलकथा 1772 ई. में पूर्णिया, दानापुर व तिरहुत में अंग्रेज और स्थानीय मुस्लिम राज्य के विरूद्ध संयासियों के विद्रोह की घटना से प्रेरित है।
➣ वन्देमातरम गीत, जिसने सभी भारतवासियों को देश की आज़ादी के प्रति जागरुक किया और उनमें एक नई चेतना जागृत कर दी, वह आनन्दमठ में ही संकलित था।
➣ सन 1952 में बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय के इस उपन्यास पर आनन्दमठ नाम से एक फ़िल्म भी बनी थी, जिसमें वन्देमातरम गीत भी प्रमुख रूप से शामिल किया गया था।
➣ आनंद मठ का सार यह है कि किस प्रकार से हिंदू संयासियों ने मुस्लिम शासकों को हराया था। आनंद मठ मुस्लिम विरोधी उपन्यास नहीं, बल्कि राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत उपन्यास है।
नीलदर्पण नाटक (1858-1859)
➣ नीलदर्पण बांग्ला भाषा में लिखा गया प्रसिद्ध नाटक है, जिसके रचनाकार दीनबंधु मित्र थे। इसकी रचना 1858-1859 में हुई।
➣ यह बंगाल में नील विद्रोह का अन्दोलन का कारण बना। यह बंगाली रंगमंच के विकास का अग्रदूत भी बना।
➣ नाटक नीलदर्पण में बंगाल में नील की खेती करने वालों का अंग्रेज़ों द्वारा शोषण, भारतीय किसानों के ऊपर अमानुषिक अत्याचारों की बड़ी भावपूर्ण अभिव्यक्ति हुई है।
➣ कोलकाता के नेशनल थिएटर में 1872 में यह नाटक खेला गया, जो कि पहला व्यावसायिक नाटक था।
➣ बांग्ला के पहले सार्वजनिक टिकट बिक्री से चलने वाले मंच पर यह नाटक जब 1872 में खेला गया तो एक ओर दर्शकों की भीड़ उमड़ पड़ी और दूसरी ओर अंग्रेज़ी अखबारों में इस पर बड़ी तीखी टिप्पणी हुई।
➣ 1876 में अंग्रेज़ सरकार द्वारा ड्रैमेटिक परफार्मेन्सेज कन्ट्रोल ऐक्ट लाना नील दर्पण जैसे नाटकों की विद्रोही भावना का दमन भी एक उद्देश्य था।
➣ इस नाटक का ऐतिहसिक महत्त्व तो है ही, इसके अलावा तत्कालीन अंग्रेज़ी शासन में न्याय के पाखंड और पक्षपातपूर्ण व्यवहार पर भी प्रकाश पड़ता है।
भूदान आंदोलन के प्रणेता : विनोबा भावे
➣ विनोबा भावे का जन्म 11 सितंबर, 1895 को गाहोदे, गुजरात, भारत में हुआ था। विनोबा भावे का मूल नाम विनायक नरहरि भावे था।
➣ इनकी समस्त ज़िंदगी साधु संयासियों जैसी रही, इसी कारणवश ये एक संत के तौर पर प्रख्यात हुए।
➣ सन् 1921 से लेकर 1942 तक अनेक बार जेल यात्राएं हुई। सन् 1922 में नागपुर का झंडा सत्याग्रह किया। 1925 में हरिजन सत्याग्रह के दौरान जेल यात्रा हुई।
➣ 12 मार्च 1930 को गाँधी जी ने दांडी मार्च शुरू किया। विनोबा फिर से जेल पंहुच गए।
➣ 11 अक्टूबर 1940 को गाँधी द्वारा व्यक्तिगत सत्याग्रह के प्रथम सत्याग्रही के तौर पर विनोबा को चुना गया। 21 अक्टूबर को विनोबा को गिरफ़्तार किया गया।
➣ भूदान आंदोलन विनोबा भावे द्वारा 1951 ई. में प्रारंभ किया गया स्वैच्छिक भूमि सुधार आंदोलन था। इसका उद्देश्य अहिंसात्मक तरीके से देश में सामाजिक परिवर्तन लाना था।
➣ 18 अप्रैल 1951 ई. को आचार्य बिनोवा भावे को भूमि का प्रथम दान मिला था। उन्हें यह भूमि तेलगांना क्षेत्र में स्थित पोचमपल्ली गांव में मिली थी।
➣ 1955 ई. में आंदोलन का नया रूप जिसे ग्राम दान के रूप में पहचाना गया। इसका अर्थ- सारी भूमि गोपाल की है। इसकी शुरूआत उड़ीसा से हुई थी।
➣ अपने अंतिम समय में विनोबा भावे ने सल्लेख्न्ना विधि से दीपावली के दिन 15 नवम्बर को निर्वाण के रूप में चुना।
➣ विनोबा को 1958 में प्रथम रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
➣ भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से 1983 में मरणोपरांत सम्मानित किया।
इल्बर्ट बिल क्या था
➣ वायसराय लॉर्ड रिपन के कार्यकाल के दौरान इल्बर्ट बिल लाया गया था। इस बिल को सर सी.पी. इल्बर्ट ने 1883 ई. में पेश किया था।
➣ इस बिल के द्वारा भारतीय न्यायाधीशों को उन मामलों की सुनवाई करने का भी अधिकार प्रदान कर दिया गया जिनमें यूरोपीय नागरिक भी शामिल होते थे।
➣ भारतीय जनता ने इस बिल का जोरदार स्वागत किया, लेकिन अंग्रेजों ने इसका तीव्र विरोध किया। अन्ततः सरकार को झुकना पड़ा और उसने इल्बर्ट बिल में में संशोधन कर दिया।
➣ इस बिल में संशोधन (1884) करते हुए यह प्रावधान किया गया कि यूरोपीय अथवा ब्रिटिश नागरिक उस जूरी द्वारा अपने मामले की सुनवाई की मांग कर सकते थे, जिसके आधे सदस्य यूरोपीय या अमेरिकी हों। इसीलिए यह काला फैसला के नाम से भी जाना जाता है।
हन्टर शिक्षा आयोग
➣ हन्टर शिक्षा आयोग की स्थापना ब्रिटिश शासनकाल में लॉर्ड रिपन (1880-1884 ई.) द्वारा 1882 ई. में की गई थी।
➣ चार्ल्स वुड के घोषणा पत्र द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में हुई प्रगति की समीक्षा के लिए सरकार ने विलियम विलसन हन्टर की अध्यक्षता में इस आयोग की नियुक्ति की थी।
➣ इस आयोग में आठ भारतीय सदस्य भी थे। हन्टर शिक्षा आयोग को प्राथमिक शिक्षा एवं माध्यमिक शिक्षा की समीक्षा तक ही सीमित कर दिया गया था।
➣ हन्टर शिक्षा आयोग’ ने जो महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए, वे निम्नलिखित थे-
➣ हाई स्कूल स्तर पर दो प्रकार की शिक्षा की व्यवस्था हो, जिसमें एक व्यवसायिक एवं व्यापारिक शिक्षा दिये जाने पर बल दिया जाये तथा दूसरी ऐसी साहित्यिक शिक्षा दी जाये, जिससे विश्वविद्यालय में प्रवेश हेतु सहायता मिले।
➣ प्राथमिक स्तर पर शिक्षा के महत्व पर बल एवं स्थानीय भाषा तथा उपयोगी विषय में शिक्षा देने की व्यवस्था की जाये।
➣ शिक्षा के क्षेत्र में निजी प्रयासों का स्वागत हो, लेकिन प्राथमिक शिक्षा उसके बगैर भी दी जाये।
➣ प्राथमिक स्तर पर शिक्षा का नियंत्रण ज़िला व नगर बोर्डों को सौंप दिया जाये।
द्वैध शासन पद्धति क्या थी
➣ द्वैध शासन पद्धति संवैधानिक व्यवस्था का एक रूप थी। ‘द्वैध शासन’ का सिद्धान्त सबसे पहले अंग्रेज़ लियोनेल कर्टिस ने प्रतिपादित किया था, जो बहुत दिनों तक राउण्ड टेबिल का सम्पादक रहा। बाद में यह सिद्धान्त 1919 ई. के ‘भारतीय शासन विधान’ में लागू किया गया, जिसके अनुसार प्रान्तों में द्वैध शासन स्थापित हुआ।
➣ अंग्रेज़ों द्वारा यह कहा गया कि– “यह शासन पद्धति भारतीयों को नेतृत्व का प्रशिक्षण देने के लिए है”, किंतु वास्तव में यह पद्धति भारतीयों की क्षमताओं पर एक भीषण आघात था।
➣ इस पद्धति के अनुसार प्रान्तों में शिक्षा, स्वायत्त शासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, सार्वजनिक निर्माण, कृषि तथा सहकारिता आदि विभागों का प्रशासन मंत्रियों को हस्तांतरित कर दिया गया। ये मंत्री प्रान्तीय विधान सभा के निर्वाचित सदस्य होते थे और विधान सभा के प्रति उत्तरदायी होते थे।
➣ दूसरी ओर राजस्व, क़ानून, न्याय, पुलिस, सिंचाई, श्रम तथा वित्त आदि विभागों का प्रशासन गवर्नर की एक्जीक्यूटिव कौंसिल के सदस्यों के लिए सुरक्षित रखा गया था।
सैडलर आयोग
➣ सैडलर आयोग का गठन 1917 ई. में कलकत्ता विश्वविद्यालय की समस्याओं के अध्ययन के लिए डॉक्टर एम.ई. सैडलर के नेतृत्व में किया गया था।
➣ इस आयोग में दो भारतीय भी, डॉक्टर आशुतोष मुखर्जी एवं डॉक्टर जियाउद्दीन अहमद सदस्य थे। इस आयोग ने कलकत्ता विश्विद्यालय के साथ-साथ माध्यमिक स्नातकोत्तरीय शिक्षा पर भी अपना मत व्यक्त किया।
इसके निम्नलिखित बिंदु इस प्रकार थे – 1. सैडलर आयोग ने 1904 ई. के ‘विश्विद्यालय अधिनियम’ की कड़े शब्दों में निंदा की। आयोग ने अपने सुझाव भी दिए, जो निम्नलिखित थे- 2. इंटर व उत्तर माध्यमिक परीक्षा को माध्यमिक तथा विश्वविद्यालयी शिक्षा के मध्य विभाजन रेखा मानना चाहिए। 3. स्कूली शिक्षा 12 वर्ष की होनी चाहिए। 4. ऐसी शिक्षण संस्थायें स्थापित करने का सुझाव दिया गया, जो इण्टरमीडिएट महाविद्यालय कहलायें। ये महाविद्यालय चाहे तो स्वतन्त्र रहें या फिर हाई स्कूल से सम्बद्ध हो जायें। 5. इन संस्थाओं के प्रशासन हेतु माध्यमिक तथा उत्तर माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के निर्माण की सिफारिश की गई। 6. इण्टरमीडिएट के बाद स्नातक स्तर की शिक्षा तीन वर्ष की होनी चाहिए। 7.आयोग ने पास तथा ऑनर्स व साधारण तथा प्रवीण्य पाठ्यक्रम शुरू करने का भी सुझाव दिया। 8. विश्वविद्यालयों को यह सुझाव भी दिया गया था, कि बहुत सख्त नियम न बनाये जायें। 9. प्राचीन सम्बद्ध विश्वविद्यालयों की जगह पूर्ण स्वायत्त आवासीय एवं एकात्मक स्वरूप के विश्वविद्यालयों की स्थापना का सुझाव दिया गया। 10. कलकत्ता विश्वविद्यालय’ के कार्य के भार को कम करने के लिए आयोग ने ढाका में ‘एकाकी विश्वविद्यालय’ की स्थापना का सुझाव दिया। 11. आयोग ने ढाका एवं कलकत्ता विश्वविद्यालयों में अध्यापकों के प्रशिक्षण के लिए शिक्षा विभाग खोलने की सलाह दी।➣ इस आयोग ने व्यावसायिक कॉलेज खोलने की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित किया।
➣ सैडलर आयोग’ के सुझाव पर उत्तर प्रदेश में एक बोर्ड ऑफ़ सेंकेडरी एजूकेशन की स्थापना हुई।
रौलट एक्ट-1919
➣ रौलट एक्ट 8 मार्च, 1919 ई. को लागू किया गया था।
➣ भारत में क्रान्तिकारियों के प्रभाव को समाप्त करने तथा राष्ट्रीय भावना को कुचलने के लिए ब्रिटिश सरकार ने न्यायाधीश सर सिडनी रौलट की अध्यक्षता में एक कमेटी नियुक्त की।
➣ कमेटी द्वारा दिये गये सुझावों के आधार पर केन्द्रीय विधानमण्डल में फ़रवरी, 1919 ई. में दो विधेयक लाये गये। इन विधेयकों को ‘रौलट एक्ट’ या ‘काला क़ानून’ के नाम से जाना गया।
➣ इस विधेयक में की गयी व्यवस्था के अनुसार मजिस्ट्रेटों के पास यह अधिकार था कि वह किसी भी संदेहास्पद स्थिति वाले व्यक्ति को गिरफ्तार करके उस पर मुकदमा चला सकता था।
➣ अपने इस अधिकार के साथ अंग्रेज़ सरकार किसी भी निर्दोष व्यक्ति को दण्डित कर सकती थी। इस प्रकार क़ैदी को अदालत में प्रत्यक्ष उपस्थित करने अर्थात् बंदी प्रत्यक्षीकरण के क़ानून को निलंबित करने का अधिकार सरकार ने रौलट क़ानून से प्राप्त कर लिया।
➣ इस एक्ट को बिना अपील, बिना वकील तथा बिना दलील का क़ानून भी कहा गया। इसके साथ ही इसे काला अधिनियम एवं आतंकवादी अपराध अधिनियम के नाम से भी जाना जाता हैं।
➣ राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने इस एक्ट का पुरजोर विरोध किया और ब्रिटिश सरकार को शैतानी लोगों की संज्ञा दी
जलियांवाला बाग हत्याकांड
➣ 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के पर्व पर पंजाब में अमृतसर के जलियांवाला बाग में ब्रिटिश ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर द्वारा किए गए निहत्थे मासूमों के हत्याकांड को जलियांवाला बाग हत्याकांड नाम से जाना जाता है।
➣ पंजाब के दो बड़े नेताओं सत्यपाल और डॉ. किचलू को गिरफ्तार कर निर्वासित कर दिया गया जिससे अमृतसर में लोगों का गुस्सा फूट पड़ा था।
➣ 13 अप्रैल को बैसाखी के दिन आंदोलनकारी जलियांवाला बाग में जमा हुए , जैसे ही पंजाब प्रशासन को यह खबर मिली। ब्रिगेडियर जनरल डायर के कमान सैनिक टुकड़ी जलियांवाला बाग पहुंची।
➣ बिना चेतावनी के जनरल डायर ने भारतीयों पर अंधाधुंध गोलियों चलाई जिसमें हज़ारों निहत्थे पुरुष, महिलाएँ और बच्चे मारे गए थे।
➣ घटना के पश्चात् बंगाली कवि, रवींद्रनाथ टैगोर ने नाइटहुड(1915) की उपाधि को त्याग दिया। महात्मा गांधी ने कैसर-ए-हिंद की उपाधि वापस कर दी, जिसे इन्हें बोअर युद्ध के दौरान अंग्रेज़ों द्वारा दिया गया था।
हंटर आयोग और उसकी रिपोर्ट
➣ देश में जलियांवाला बाग के हत्याकांड को लेकर जो उग्र प्रदर्शन आदि हुए,उससे विवश होकर ब्रिटिश सरकार द्वारा 1 अक्टूबर, 1919 को हंटर आयोग का गठन किया गया।
➣ लॉर्ड हंटर को इसका अध्यक्ष नियुक्त किया गया।
➣ आठ सदस्यों वाले इस आयोग में पांच अंग्रेज लॉर्ड हंटर, जस्टिस सर जॉर्ज रैंकिग, डब्ल्यू.एफ. राइस, मेजर जनरल सर जॉर्ज बैरो एवं सर टॉमस स्मिथ, तीन भारतीय सदस्य सर चिमन सीतलवाड़, साहबजादा सुल्तान अहमद एवं जगत नारायण थे।
➣ इस आयोग ने मार्च 1920 ई में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें उसने जलियांवाला बाग के सम्पूर्ण प्रकरण पर लीपा-पोती करने का प्रयास किया।
➣ इस रिपोर्ट प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं-
1. पंजाब के गवर्नर को निर्दोष घोषित किया गया। जनरल डायर ने कर्तव्य को गलत समझते हुए जरूरत से अधिक बल प्रयोग किया, पर जो कुछ किया, निष्ठा से किया। 2. डायर को इस अपराध के लिए नौकरी से हटाने का दण्ड दिया गया।➣ जनरल डायर के घृणित कृत्य के बावजूद ब्रिटिश सरकार ने उसकी सेवाओं के लिए उसे मान की तलवार की उपाधि प्रदान की। ब्रिटिश अखबारों ने उसे ब्रिटिश साम्राज्य का रक्षक एवं हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने उसे ब्रिटिश साम्राज्य का शेर कहा।
➣ उधम सिंह ने जलियाबाग हत्याकांड के जनरल ओ डायर की 13 मार्च 1940 को लन्दन के रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी के कार्यक्रम में हत्या कर दी। इन्हें वहीं पेन्टनविले जेल में 31 जुलाई, 1940 को फांसी की सजा दी गई।
साइमन कमीशन और उसकी सिफारिशें
➣ 8 नवम्बर, 1927 को ब्रिटिश सरकार ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में भारतीय वैधानिक आयोग के गठन की घोषणा की।
➣ इसमें कुल सदस्यों की संख्या 7 थी, जिसमें कोई भी भारतीय प्रतिनिधि नहीं था। इसीलिए इसको श्वेत आयोग कहा गया।
➣ इस आयोग ने 27 मई, 1930 को अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसकी प्रमुख सिफारिशें इस प्रकार थीं-
➣ 1919 के भारत सरकार अधिनियम के तहत लागू की गयी द्वैध शासन व्यवस्था को समाप्त कर उत्तरदायी शासन की स्थापना हो।
➣ 1. भारत के लिए एक संघीय संविधान होना चाहिए।
➣ 2. भारत के लिए एक ऐसा लचीला संविधान बनाया जाये, जिसे स्वयं भारतीय विकसित करें।
➣ 3. उच्च न्यायालय को भारत सरकार के नियंत्रण में कर दिया जाये।
➣ 4. बर्मा (वर्तमान म्यांमार) को भारत से विलग किया जाये तथा उड़ीसा एवं सिंध को अलग राज्य का दर्जा दिया जाये। प्रांतीय विधानमंडलों में सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाये।
नेहरू समिति व उसकी रिपोर्ट
➣ साइमन कमीशन के बहिष्कार के बाद भारत सचिव लॉर्ड बर्कन हेड ने भारतीयों को अपना संविधान बनाने की चुनौती दी। इस चुनौती को स्वीकार करते हुए पं. मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में 28 फरवरी, 1928 को नेहरू समिति का गठन किया गया।
➣ इस समिति के अन्य सदस्य में शामिल थे-
➣ सर अली इमाम, एम.एस. अणे, तेजबहादुर सघू, मंगल सिंह, जी.आर. प्रधान, शोएब कुरेशी, सुभाषचन्द्र बोस, एन. एम. जोशी और जी.पी. प्रधान आदि।
➣ इस समिति ने 28 अगस्त, 1928 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसके प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं-
➣ भारत को डोमिनियन स्टेट्स का दर्जा दिया जाये।
➣ 1. संसदीय रूप की सरकार स्थापित की जाये जिसमें द्विसदनीय विधायिका- सीनेट और प्रतिनिधि सभा हो।
➣ 2. सीनेट का गठन 7 वर्ष के लिए चुने जाने वाले 200 सदस्यों से मिलकर हो और प्रतिनिधि सभा में 5 वर्ष के लिए चुने जाने वाले 500 सदस्य शामिल हों।
➣ 3. गवर्नर जनरल कार्यकारी परिषद की सलाह पर कार्य करे जो सामूहिक रूप से संसद के प्रति उत्तरदायी हो।
➣ 4. न्यायपालिका विधायिका से स्वतंत्र हो।
➣ 5. प्रांतों में द्वैध शासन को समाप्त कर प्रांतीय स्वायत्तता प्रदान की जाये।
➣ 6. नागरिकों को मौलिक अधिकार दिये जायें।
➣ 7. साम्प्रदायिक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन प्रणाली हो।
➣ 8. अल्पसंख्यकों को उनकी संख्या के अनुपात में आरक्षण मिले।
अगस्त प्रस्ताव क्या था
➣ मार्च 1940 में कांग्रेस ने अपने रामगढ़ अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित कर ब्रिटिश सरकार से कहा कि यदि वह केन्द्र में एक अंतरिम राष्ट्रीय सरकार गठित करे तो, कांग्रेस द्वितीय विश्व युद्ध में सरकार का सहयोग कर सकती है।
➣ इसके जवाब में 8 अगस्त, 1940 को भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने अगस्त प्रस्ताव की घोषणा की।
➣ इस प्रस्ताव के प्रमुख प्रावधान इस प्रकार थे-
➣ अतिशीघ्र वायसराय की सलाहकार परिषद के विस्तार के साथ ही कार्यकारिणी में भारतीय प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाना।
1. अल्पसंख्यकों को विश्व में लिये बिना किसी भी संवैधानिक परिवर्तन को लागू नहीं किया जा सकेगा। 2. युद्ध संबंधी विषयों पर विचार हेतु युद्ध परामर्श समिति का गठन किया जायेगा। 3. युद्ध समाप्त होने के बाद भारत को डोमिनियन स्टेट्स का दर्जा प्रदान किया जायेगा। 4. युद्ध के समाप्त होने पर विभिन्न भारतीय दलों के प्रतिनिधियों की एक सभा बुलाकर उनके साथ संवैधनिक विकास पर विचार-विमर्श किया जायेगा।➣ यह प्रथम अवसर था जब भारतीयों के संविधान निर्माण के अधिकार को स्वीकार किया गया और कांग्रेस ने संविधान सभा के गठन को सहमति प्रदान की। कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
➣ जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि डोमिनियन राज्य का सिद्धांत अब मृतप्राय हो चुका है। उन्होंने कहा कि जिस डोमेनियन स्टेट की स्थिति पर यह प्रस्ताव आधारित है, वह दरवाजे में जड़ी जंग लगी कील की तरह है। गांधीजी ने कहा कि इस घोषणा ने राष्ट्रवादियों और ब्रिटिश शासकों के बीच की खाई को और चौड़ा कर दिया है।
क्रिप्स मिशन
➣ ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल द्वारा सर स्टैफोर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में मार्च 1942 में क्रिप्स मिशन भारत भेजा गया, जिसका उद्देश्य भारत के राजनीतिक गतिरोध को दूर करना था।
➣ हालांकि इस मिशन का वास्तविक उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीयों को सहयोग प्रदान करने के लिए उन्हें फुसलाना था।
➣ इस मिशन के दो अन्य सदस्य थे- एवी अलेक्जेंडर तथा पैथिक लॉरेंस।
➣ इस मिशन ने जो प्रस्ताव प्रस्तुत किये उसके प्रमुख प्रावधान इस प्रकार थे-
1. डोमिनियन राज्य के दर्जे के साथ एक भारतीय संघ की स्थापना की जायेगी। 2. भारतीय संघ राष्ट्रमंडल के साथ अपने संबंधों के निर्धारण में स्वतंत्र होगा तथा संयुक्त राष्ट्र संघ एवं अन्य अंतर्राष्ट्रीय निकायों एवं संस्थाओं में अपनी भूमिका को स्वयं निर्धारित करेगा। 3. युद्ध की समाप्ति के बाद नये संविधान निर्माण के लिए संविधान निर्माण सभा का गठन किया जायेगा। इसके कुछ सदस्य प्रांतीय विधायिकाओं द्वारा निर्वाचित किये जायेंगे तथा कुछ राजाओं द्वारा मनोनीत किये जायेंगे। 4. संविधान सभा द्वारा निर्मित संविधान जिन प्रांतों को स्वीकार नहीं होगा, वे भारतीय संघ से पृथक होने के अधिकारी होंगे। पृथक होने वाले प्रांतों को अपना पृथक संविधान बनाने का अधिकार होगा। देशी रियासतों को भी इसी प्रकार का अधिकार होगा। 5. नवगठित सविधान सभा तथा ब्रिटिश सरकार सत्ता के हस्तांतरण और प्रजातीय एवं धार्मिक अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के मुद्दे को आपसी समझौते द्वारा हल करेंगे। 6. नये भारतीय संविधान के निर्माण होने तक भारतीयों की रक्षा का उत्तरदायित्व ब्रिटिश सरकार पर होगा। 7. गवर्नर जनरल की समस्त शक्तियां पूर्ववत् बनी रहेंगी।➣ क्रिप्स मिशन 23 मार्च, 1942 को दिल्ली पहुंचा।
➣ कांग्रेस की ओर से जवाहरलाल नेहरू तथा मौलाना अबुल कलाम आजाद को क्रिप्स मिशन के संदर्भ में परीक्षण एवं विचार-विमर्श करने के लिए अधिकृत किया गया था।
➣ महात्मा गांधी ने इस प्रस्ताव को दिवालिया बैंक के नाम भविष्य की तिथि में भुनाने वाला चेक’ (Outdated Cheque) कहा, जबकि पं. नेहरू ने कहा कि क्रिप्स प्रस्ताव एक ऐसे बैंक के नाम चेक है, जो टूट रहा है।
➣ मुस्लिम लीग ने भी इसे अस्वीकार कर दिया, क्योंकि इसमें पाक का उल्लेख नहीं था।
➣ 11 अप्रैल, 1942 को इसे वापस ले लिया गया।
सी.आर. फार्मूला
➣ चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग के समझौते के पक्षधर थे। देश की सांप्रदायिक समस्या सुलझाने के उद्देश्य से 10 जुलाई, 1944 को गांधीजी की स्वीकृति से उन्होंने कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के बीच समझौते की एक योजना प्रस्तुत की, जिसे सी.आर. फॉर्मूला कहा जाता है।
➣ इस फॉर्मूला के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं-
1. मुस्लिम लीग भारतीय स्वतंत्रता की मांग का समर्थन करे। 2. अस्थायी सरकार के गठन में कांग्रेस के साथ सहयोग की भूमिका अदा करे। 3. द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद भारत के उत्तर-पश्चिमी व पूर्वी भागों में स्थित मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्रों की सीमा का निर्धारण करने के लिए एक आयोग का गठन किया जाये। 4. इन क्षेत्रों में जनमत संग्रह द्वारा निर्णय किया जाये कि वे भारत से अलग होना चाहते हैं या नहीं।➣ देश विभाजन की स्थिति में रक्षा, संचार, यातायात या अन्य अनिवार्य विषयों पर आपसी समझौते की व्यवस्था की जाये।
➣ उपर्युक्त शर्ते तभी मानी जायेंगी, जब ब्रिटेन भारत को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करे।
➣ इस फॉर्मूले को नेताओं ने स्वीकार नहीं किया,
➣ लेकिन कालांतर में इसी फॉर्मूले के आधार पर भारत का विभाजन किया गया।
➣ राजगोपालाचारी पहले कांग्रेसी नेता थे, जिन्होंने पाकिस्तान की मांग का समर्थन किया।
दिल्ली भारत की राजधानी कैसे बनी
➣ नई दिल्ली नाम से निकला न्यू देलही तोमर राजा अनंगपाल ने 11वीं सदी में अपने साम्राज्य को स्थापित करने के लिए किसी किंवदन्ती के अन्तर्गत लालकोट में एक लोहे की कील भूमि में लगवाई थी।
➣ 1000 ईसा पूर्व पहले मौर्य वंश के राजा दिल्लू ने शहर का पुनर्निमाण किया और उसी के नाम पर दिल्ली को इसका वर्तमान नाम प्राप्त हुआ था। दिल्ली शब्द लालकोट क्षेत्र में बसे शहर का नाम पड़ गया, जो बाद में दिल्ली में परिवर्तित हो गया।
➣ दिल्ली नगर की स्थापना 11वीं शताब्दी में तोमर वंश के राजपूत शासक द्वारा की गयी और बाद में पृथ्वी राज चौहान ने दिल्ली पर शासन किया।
➣ 1192 ई. में तराइन की दूसरी लड़ाई में मुहम्मद गौरी से पृथ्वी राज चौहान के पराजित हो जाने पर दिल्ली मुस्लिम शासकों के नियंत्रण में आ गई और आगामी 600 वर्षों तक मुस्लिम शासकों के अधीन रही।
| हिन्दू काल | |
| 1. इन्द्रप्रस्थ | पाण्डवों |
| 2. अनंगपुर या अड़गपुर | अनंगपाल |
| 3. राय पिथौरा | पृथ्वीराज चौहान |
| मुस्लिम काल | |
| 1.किलाराय पिथौरा (महरौली) | गुलाम बादशाहो |
| 2. किलोखड़ी | कैकुबाद की दिल्ली |
| 3. सीरी | अलाउद्दीन खिजली |
| 4. तुगलकाबाद | ग्यासुद्दीन तुगलक |
| 5. जहांपनाह | मुहम्मद आदिलशाह |
| 6. फिरोजाबाद | फिरोज तुगलक |
| 7. खिजाबाद | खिज्र खां |
| 8. मुबारकाबाद | मुबारकशाह |
| 9. दीनपनाह | हुमायूं |
| 10. शेरगढ़ | शेरशाह सूरी |
| 11. सलीमगढ़ | सलीमशाह सूरी |
| 12. शाहजहांनाबाद | शाहजहां |
| ब्रिटिश काल | |
| 1. सिविल लाइंस | |
| 2. ल्युटियन की दिल्ली | |
| 3. नई दिल्ली | |
➣ प्लासी युद्ध के पश्चात् अंग्रेजों ने कोलकाता, बंगाल को राजधानी के रूप में इस्तेमाल किया।
➣ 12 दिसम्बर 1911 में दिल्ली में राजधानी बनाने की घोषणा जॉर्ज पंचम के द्वारा की गई थी। तत्प्श्चात 1912 में राजधानीदिल्ली स्थान्तरित हुई।
➣ इसके लिए एडवर्ड लुटियन और हरबर्ट बेकर ने नई राजधानी की रूपरेखा बनाई गई। उन्होंने इंडिया गेट,राष्ट्रपति भवन को भी आकार दिया था।
➣ नई देलही शब्द का प्रयोग प्रथम बार 1916 में किया गया था। शहर का उद्घाटन 13 फरवरी, 1931 को तत्कालीन गर्वनर जनरल लार्ड इरविन ने किया था।
➣ 1857 ई. के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के समय अंग्रेजों ने दिल्ली के मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को सत्ता से हटाकर अपने साम्राज्य में मिला लिया।
➣ 1911 ई. में ब्रिटिश साम्राज्य की राजधानी कोलकाता से हटाकर दिल्ली लायी गयी तथा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इसे ही भारत संघ की राजधानी बनाया गया।
➣ 1 नवम्बर, 1956 को दिल्ली को केंद्र शासित क्षेत्र घोषित किया गया।
➣ दिसम्बर 1991 में संसद ने 69वां संविधान संशोधन करके दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र घोषित किया गया।
वायसराय भवन या राष्ट्रपति भवन
➣ रायसीन पहाड़ी पर निर्मित वायसराय भवन अब राष्ट्रपति भवन कहलाता है। इसमें निवास करने वाला प्रथम वायसराय लॉर्ड इरविन था।
➣ इस भवन के मुख्य वास्तुकार एडविन लुटियंस जबकि इसके प्रमुख इंजीनियर हग कीलिंग थे। इस भवन का अधिकतम निर्माण कार्य ठेकेदार हारून अल राशिद के द्वारा किया गया।
➣ यह भवन 330 एकड़ में फैला हुआ है। इस भवन में 340 कमरे, 74 बरामदे, 37 सभागृह, क़रीब एक किलोमीटर का गलियारा, 18 सीढ़ियाँ मार्ग और 37 फ़व्वारे हैं।
➣ भवन का निर्माण कार्य 1912 से शुरू हुआ और 1929 को पूर्ण रूप से तैयार हुआ जबकि 1931 में खोला गया।
➣ स्वाधीनता प्राप्ति के बाद 15 अगस्त 1947 को दरबार हॉल में ही नई सरकार का शपथ ग्रहण समारोह हुआ था।
➣ वर्तमान भारत के राष्ट्रपति, राष्ट्रपति भवन के उन कक्षों में नहीं रहते है, जहां वायसराय निवास किया करते थे बल्कि वे अतिथि कक्ष में रहते है।
संसद भवन
➣ संसद भवन का निर्माण 1921-29 के दौरान किया गया था यह एक विशाल
➣ वृत्ताकार भवन है। संसद भवन की अभिकल्पना दो प्रसिद्ध वास्तुकार एडविन लुटियंस एवं हरबर्ट बेकर ने किया था।
➣ इसकी आधारशिला 12 फरवरी 1921 को द ड्यूक ऑफ कनाट ने रखी थी। इसके निर्माण में कुल 6 वर्ष लगे।
➣ इसका उद्घाटन समारोह भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड इरविन ने 18 जनवरी 1927 को आयोजित किया।
➣ संसद भवन का केंद्र बिंदु केंद्रीय कक्ष या सेंट्रल हॉल का विशाल वृत्ताकार ढ़ाचा है।
➣ भारत के संविधान सभा की बैठक इसी कक्ष में हुई थी।
➣ 1947 में अंग्रेजों से भारतीयों के हाथों में सत्ता का इस कक्ष का प्रयोग अब दोनों सदनों की संयुक्त बैठक के लिए तथा राष्ट्रपति और विशिष्ट अतिथियों राज्य या शासनाध्यक्ष के अभिभाषण के लिए किया जाता है।
➣ केंद्रीय कक्ष के दरवाजे के ऊपर पंचतंत्र से संस्कृत का एक पद्यांश लिखा मिलता है, जिसका अर्थ यह मेरा है और होता है। वह पराया है इस तरह की धारणा संकीर्ण मन वालों की होती है । विशाल हृदय वालों के लिए सारा विश्व ही उनका कुटुंब
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