भारतीय इतिहास के विभिन्न चरण एंव स्रोत

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इतिहास के विभिन्न चरण

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हेरोडोटस (Herodotus), यूनान का प्रथम इतिहासकार व भूगोलवेत्ता था। हेरोडोटस का संस्कृत नाम हरिदत्त था।

हेरोडोटस हिस्ट्री (History) शब्द के प्रथम प्रयोगकर्ता थे। इन्होंने वास्तविक इतिहास लेखन की नींव रखी थी।

➣ रोमन दार्शनिक सिसरो ने हेरोडोटस को इतिहास का जनक/पिता (Father of History) की संज्ञा दी थी।

➣ इन्होंने अपने इतिहास का विषय पेलोपोनेसियन युद्ध को बनाया था। इनकी प्रसिद्ध पुस्तक हिस्टोरिका (Historica) थी।

भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI)

➣ यह भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण, पर्यटन एवं संस्कृति मन्त्रालय के अन्तर्गत कार्य करता है।

➣ भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) ब्रिटिश पुरातत्त्वशास्त्री विलियम जोन्स द्वारा 15 जनवरी, 1784 को स्थापित एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल (कोलकाता) का उत्तराधिकारी था।

1788 में इनका पत्र द एशियाटिक रिसचेंज प्रकाशित होना आरम्भ हुआ था और 1814 में यह प्रथम संग्रहालय बंगाल में बना।

➣ ASI अपने वर्तमान रूप में 1861 में ब्रिटिश शासन के अधीन सर अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा तत्कालीन वायसराय चार्ल्स जॉन कैनिंग की सहायता से स्थापित हुआ था।

➣ भारत में पाषाणकालीन सभ्यता की खोज का कार्य सर्वप्रथम 1863 ई. में अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा आरम्भ हुआ।

➣ पुरातत्त्व के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए कनिंघम को भारतीय पुरातत्त्व का जनक कहा जाता है।

➣ पुरातत्त्व विभाग के तीसरे महानिदेशक जॉन मार्सल के निदेशन से ही दयाराम साहनी ने सिंधु सभ्यता का उत्खनन किया था।

भारतीय इतिहास के स्रोत

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➣ भारतीय इतिहास जानने के स्रोत को तीन भागों में विभाजित किया गया है – 1. साहित्यिक साक्ष्य
2. पुरातात्विक साक्ष्य
3. विदेशी यात्रियों का विवरण

साहित्यिक साक्ष्य एंव पुरातात्विक साक्ष्य

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साहित्यिक साक्ष्य

➣ इसके अन्तर्गत साहित्यिक ग्रन्थों से प्राप्त ऐतिहासिक वस्तुओं का अध्ययन किया जाता है। साहित्यिक साक्ष्य को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है- धार्मिक साहित्य और लौकिक साहित्य

धार्मिक साहित्य

➣ धार्मिक साहित्य के अन्तर्गत ब्राह्मण तथा ब्राह्मणेत्तर साहित्य की चर्चा की जाती है।

ब्राह्मण ग्रन्थों में-वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, पुराण, स्मृति ग्रन्थ आते हैं। जबकि ब्राह्मणेत्तर ग्रन्थों में जैन तथा बौद्ध ग्रन्थों को सम्मिलित किया जाता है।

बौद्ध ग्रन्थ
सुत्तपिटकआनंदबुद्ध के धार्मिक विचारों एवं उपदेशों का संग्रह।
दीर्घ निकाय
मज्झिम निकाय
संयुक्त निकाय
अंगुत्तर निकाय
खुद्दक निकाय
विनयपिटकउपालिमठ में रहने वाले के लिए अनुशासन संबंधी नियम
अभिधम्म पिटकमोग्गलिपुत्र तिस्सबौद्ध मतों को दार्शनिक व्याख्या
दीपवंशश्रीलंका का इतिहास
महावंशमगध नरेशों की सूची
मिलिंदपन्होनागसेनमिनाडंर और बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच वार्ता
बुद्धचरितअश्वघोसगौतम बुद्ध का जीवन-चरित
सौन्दरानंदअश्वघोसनंद की प्रवज्या की कथा
सारिपुत्र प्रकरणअश्वघोससारिपुत्र और मौद्गल्यायन को प्रवज्या का वर्णन
जैन ग्रन्थ

➣ जैन साहित्य को आगम कहा जाता है। आगम के अंतर्गत 12 अंग के अतिरिअत 12 उपांग, 10 प्रकीर्ण, 6 छंद सूत्र, नंदिसूत्र, अनुयोग द्वार एवं मूल सूत्र आते हैं।

➣ इन आगम ग्रंथों की रचना महावीर की मृत्यु के बाद श्वेतांबर संप्रदाय के आचार्यों द्वारा की गई।

➣ 12 अंग इस प्रकार हैं-1. आचारंग सूत्र, 2. सूयगदंग सूत्र, 3. ठाणंग सूत्र, 4. समवायंग सूत्र, 5. भगवती सूत्र, 6. न्यायधम्मकहा, 7. उवासगदसाओं, 8. अंतगडद्साओं, 9. अणुत्तरोववाइय दसाओं, 10. पण्हावागरणिआई, 11. विवागसुयम्, 12. दिट्टिवाय।

लौकिक साहित्य

➣ वह साहित्य है, जो अर्द्ध ऐतिहासिक होता है तथा इसमें कल्पना व सत्य का मिश्रण होता है। इसके अंतर्गत नाटक, काव्य, कथा साहित्य समाहित होता है।

➣ प्रमुख लौकिक साहित्यिक ग्रंथ निम्नलिखित हैं-

रचनारचनाकार>विशेष तथ्य
अष्टाध्यायीपाणिनीव्याकरण ग्रंथ की संस्कृत रचना
महाभाष्यपतंजलिपुष्यमित्र शुंग के विषय में जानकारी।
मुद्राराक्षसविशाखदत्तमौर्य काल के बारे में पर्याप्त जानकारी।
कथासरित्सागरसोमदेवमौर्य काल के विषय में जानकारी।
बृहत्कथामंजरीक्षेमेंद्रमौर्य काल के विषय में जानकारी।
अर्थशास्त्रकौटिल्यमौर्य काल के बारे में वृहद जानकारी।
नीतिसारकामदकगुप्तकालीन राजतंत्र पर जानकारी।
मालविकाग्नित्रिमकालिदासशुंग वंश के बारे में जानकारी।
मृच्दकटिकम्शूद्रकगुप्तकालीन समाज का वर्णन।
हर्षचरितबाणभट्टहर्ष की उपलब्धियों का वर्णन।
रामचरितसंध्याकरनंदी बंगाल के शासक रामपाल की जीवन कथा।
पृथ्वीराज रासों चंदबरदाई पृथ्वीराज चौहान की उपलब्धियों का वर्णन।
राजतरंगिणीकल्हणकश्मीर के राजवंशों की क्रमबद्ध जानकारी।
धर्म-ग्रन्थ

➣ प्राचीन काल में भारत के धर्म प्रधान देश होने के कारण यहां प्रायः तीन धार्मिक धारायें- वैदिक, जैन एवं बौद्ध प्रवाहित हुईं। वैदिक धर्म ग्रन्थ को ब्राह्मण धर्म ग्रन्थ भी कहा जाता है।

ब्राह्मण धर्म-ग्रंथ

➣ ब्राह्मण धर्म – ग्रंथ के अन्तर्गत वेद, उपनिषद्, महाकाव्य तथा स्मृति ग्रंथों को शामिल किया जाता है।

पुरातात्विक साक्ष्य

➣ पुरातात्विक साक्ष्य के अंतर्गत मुख्यतः अभिलेख, सिक्के, स्मारक, भवन,टीले , मूर्तियां चित्रकला आदि आते हैं।

अभिलेख

➣ इतिहास निमार्ण में सहायक पुरातत्त्व सामग्री में अभिलेखों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसके अध्ययन को पुरालेखशास्त्र (एपिग्राफी) कहा जाता है।

➣ अभिलेख अधिकांशतः स्तम्भों, शिलाओं, ताम्रपत्रों, मुद्राओं पात्रों, मूर्तियों, गुहाओं आदि में खुदे हुए मिलते हैं।

➣ प्राचीनतम अभिलेख मध्य एशिया के बोगजकोई नाम स्थान से क़रीब 1400 ई.पू. में पाये गये जिनमें अनेक वैदिक देवताओं – इन्द्र, मित्र, वरुण, नासत्य आदि का उल्लेख मिलता है।

शासकअभिलेख
 हाथीगुम्फा अभिलेखकलिंग राज खारवेल
 जूनागढ़ अभिलेखरूद्रदामन
 नासिक अभिलेखगौतमी बलश्री
 प्रयाग स्तम्भ लेखसमुद्रगुप्त
 ऐहोल अभिलेखपुलकेशिन-II
 मन्दसौर अभिलेखमालवा नरेश यशोवर्मन
 ग्वालियर अभिलेखप्रतिहार नरेश भोज
 भितरी व जूनागढ़ अभिलेखस्कंदगुप्त
 देवपाड़ा अभिलेखबंगाल शासक विजयसेन

उदय गिरि से प्राप्त हाथी गुफा अभिलेख से कलिंग नरेश खारवेल की उपलब्धियों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। यह अभिलेख प्राकृत भाषा में लिखित स्वयं खारवेल का है।

शक क्षत्रप रूद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख से शक शासक रूद्रदामन के संदर्भ में जानकारी प्राप्त होती है।

➣ पुलुमावी के नासिक गुहा अभिलेख के माध्यम से उनकी धार्मिक सहिष्णुता तथा उनकी संस्कृति के संदर्भ में जानकारी प्राप्त होती है।

➣ समुद्रगुप्त के प्रयाग स्तंभ लेख से समुद्रगुप्त के दिग्विजय तथा विजित राजाओं के साथ उसकी नीतियों के संदर्भ में जानकारी प्राप्त होती है।

ऐहोल अभिलेख से चालुक्य नरेश पुलिकेशन द्वितीय तथा हर्षवर्धन के मध्य युद्ध के विषय में जानकारी प्राप्त होती है।

ग्वालियर अभिलेख के माध्यम से गुर्जर-प्रतिहार शासकों के संदर्भ में जानकारी प्राप्त होती है।

➣ यवन राजदूत हेलियोडेरस के बेसनगर (विदिशा) से प्राप्त गुरूड़ स्तंभ अभिलेख से भागवत धर्म संबंधी जानकारी माप्त होती है।

➣ मध्य प्रदेश के एरण से प्राप्त वाराह प्रतिमा से हूण नेता तोरमाण के विषय में जानकारी प्राप्त मिलती है।

➣ 510 ई. में गुप्त काल के ऐरण अभिलेख से सर्वप्रथम सती प्रथा का अभिलेखीय प्रमाण मिलता है।

भारतीय मुद्रा शास्त्र के जनक जेम्स प्रिसेप थे।


1. प्राकृत लिपि आरंभिक अभिलेख प्राकृत भाषा में है।
2. ब्राह्मी लिपि अशोक के शिलालेख ब्राह्मी लिपि में हैं। यह लिपि बाएं से दाएं लिखी जाती थी।
3. खरोष्ठी लिपि अशोक के कुछ शिलालेख खरोष्ठी लिपि में हैं जो दाएं से बाएं लिखी जाती थी
4. यूनानी एवं आरामाइक लिपि पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान में अशोक के शिलालेखों में इन लिपियों का प्रयोग हुआ है।

मुद्राएं अथवा सिक्के

➣ मुद्रों या सिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र (न्यूमेस्मेटिक्स) कहते हैं। मुद्राओं पर केवल आकृतियों उत्कीर्ण होती थी जिन्हे पंचमार्क या आहत सिक्के कहा है।

➣ सिक्कों पर लेख एंव तिथि उत्कीर्ण करने का श्रेय यूनानी शासकों को जाता है।

➣ भारत में खुदाई से बड़ी मात्रा में ताम्बें, चाँदी , सोने एंव सीसे के सिक्के मिले हैं। सबसे पहले जिस धातु का प्रयोग सिक्के बनाने में हुआ था वह सम्भवत ताम्बा थी।

गुप्त शासकों ने सबसे अधिक सोने के सिक्के तथा सबसे शुद्ध सोने के सिक्के कुषाण शासकों ने जारी किये। जबकि सीसे के सिक्के जारी करने वाले सातवाहन थे।

विवरणशासक
जहाज के चित्रयुक्त सिक्केयज्ञश्री शातकर्णी
धर्मचक्रयुक्त कांस्य मुद्रा .मिनाण्डर
भारत में प्रथम स्वर्ण सिक्केविम कडफिसस
शिव, स्कन्द, विष्णु आकृति युक्त सिक्केहुविष्क
वीणा बजाते हुए चित्रित राजा के सिक्केसमुद्रगुप्त
मयूर आकृति युक्त सिक्के कुमार गुप्त
बैल आकृति शैव सिक्केस्कन्द गुप्त
मयूर पर सवार कार्तिकेय स्कन्द सिक्केकुमार गुप्त-I
कालिया व लक्ष्मी अंकित सिक्केमुहम्मद गोरी
टकसाल अंकित सिक्केइल्तुतमिश
सूर्य चन्द्रमा अंकित सिक्केअकबर
राम व सीता अंकित सिक्केअकबर
बाज व तिथि अंकित स्वर्ण सिक्केअकबर
आना अंकित सिक्केशाहजहा
हाथ में शराब अंकित सिक्केजहाँगीर
हिन्दू देवी देवता व हिन्दू संवत अकित सिक्केटीपू सुल्तान

चित्रकला/मूर्तिकला

➣ भारतीय चित्रकला का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। पाषाण काल में ही मानव ने गुफ़ा चित्रण करना प्रारम्भ कर दिया था, जिसके साक्ष्य होशंगाबाद और भीमवेतका आदि स्थानों की कंदराओं और गुफ़ाओं में मिलते हैं।

सिंधु घाटी सभ्यता में भवनों के ध्वस्त हो जाने के कारण चित्रकला के प्रमाण स्पष्ट नहीं हैं। लेकिन मूर्तिकला के साक्ष्य मिले हैं। जिसमे एक नग्न कांस्य मूर्ति उकृष्ट नमूना है।

➣ प्राचीन काल में मूर्तियों का निर्माण कुषाण काल से आरंभ होता है। कुषाणों, गुप्त शासकों एवं उत्तरी गुप्तकाल में निर्मित मूर्तियों के विकास में जनसामान्य की धार्मिक भावनाओं का विशेष योगदान रहा है।

कुषाणकालीन मूर्तियोंगुप्तकालीन मूर्तियों में मूलभूत अंतर है। कुषाणकालीन मूर्तियां विदेशी प्रभाव से युक्त है। वहीं पर गुप्तकालीन मूर्तियां स्वाभाविकता से परिपूर्ण हैं।

भरहुत, बोधगया, सांची और अमरावती में मिली मूर्तियां, मूर्तिकला में जनसामान्य के जीवन की अति सजीव स्वरूप प्रस्तुत करती है।

➣ चित्रों में माता और शिशु या मरणशील राजकुमारी जैसे चित्रों से गुप्तकाल की कलात्मक पराकाष्ठा का पूर्ण प्रमाण मिलता है।

➣ आधुनिक शैली की चित्रकला में अजंता की गुफाओं में की गयी चित्रकारी से मानवीय भावनाओं की सुन्दर अभिव्यक्ति प्राप्त होती है।

स्मारक भवन

➣ विभिन्न स्मारकों के माध्यम से तत्कालीन समाज की धार्मिक आर्थिक तथा राजनैतिक स्थितियों का बोध प्राप्त होता है।

मोहनजोदड़ों की खुदाई से सिंधु सभ्यता के संदर्भ में पता चलता है।

➣ दक्षिण भारत में अरिकमेडु नामक स्थान की खुदाई में रोम-भारत के व्यापारिक संबंधों का पता चलता है।

विदेशी यात्रियों के विवरण

➣ प्राचीन समय से भारत में कई यात्री आते रहे। जिनमे कुछ शिक्षा के तात्पर्य से तो कुछ विदेशी आक्रमणकारियों के साथ आये। सभी यात्रियों ने अपनी पुस्तकों में भारतीय जीवन शैली का विवरण प्रस्तुत किया है।

➣ इन यात्रियों एवं लेखकों के विवरण से भी हमें भारतीय इतिहास की जानकारियाँ मिलती है। इन्हे तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है –
1. यूनानी-रोमन
2. चीनी
3. मुस्लिम

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➣ इनमे पहला यात्री मेगास्थनीज था , जो 305 ईसा पू0, चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया। इसके पश्चात डाईमेकस एंव डायनोसीयस क्रमश: बिन्दुसार एंव सम्राट अशोक के दरबार में आये।

Note:अन्य यात्रियों का विवरण बाहर दिया गया है।

इतिहास प्रमुख शब्दावली

अर्केलॉजी जो लेख मुहर, प्रस्तरस्तंभो स्तूपों, चट्टानों और ताम्रपत्रों पर मिलते हैं उन्हें अभिलेख कहते हैं।
एपिग्राफीअभिलेख अध्ययन का पुरालेखशास्त्र (एपिग्राफी) कहते हैं।
पेलिअंग्राफीअभिलेख तथा दूसरे प्राचीन दस्तावेजों की प्राचीन तिथि के अध्ययन को पुरालिपिशास्त्र (पेलिग्राफी) कहते हैं।
न्यूमिस्मेटिक्ससिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र (न्यूमिस्मेटिक्स) कहते हैं।
मेगालिथदक्षिण भारत के कुछ लोगमृत व्यक्ति के शव साथ औजार, हथियार, मिट्टी के बर्तन व अन्य वस्तुएं भी कब्र में दफना देते थे तथा इसके ऊपर एक घेरे में बड़े-बड़े पत्थर रख दिये जाते थे। ऐसे स्मारक को ही प्रायः मेगालिथ (महापाषाण) कहते हैं।
पुरातत्वप्राचीन काल में मानव द्वारा प्रयोग में लाए गये वस्तुओं, निर्मित मंदिरों, भवनों के अवशेषों का अध्ययन पुरातत्व कहलाता है। इसका अध्ययन करने वाला पुरातत्ववेत्ता कहलाता है।

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